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Monday, August 14, 2017

फिल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ - शैलेन्द्र


Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 02
Shailendra 

फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के दूसरे एपिसोड में सुनिए कहानी शैलन्द्र की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....


Sunday, June 4, 2017

राग पूरियाधनाश्री : SWARGOSHTHI – 320 : RAG PURIYADHANASHRI




स्वरगोष्ठी – 320 में आज

संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन – 6 : राग पूरियाधनाश्री

राग पूरियाधनाश्री में पण्डित भीमसेन जोशी से खयाल और आशा भोसले से गीत सुनिए




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की जारी श्रृंखला “संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन” की छठी कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम फिल्म जगत में 1948 से लेकर 1967 तक सक्रिय रहे संगीतकार रोशन के राग आधारित गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। रोशन ने भारतीय फिल्मों में हर प्रकार का संगीत दिया है, किन्तु राग आधारित गीत और कव्वालियों को स्वरबद्ध करने में उन्हें विशिष्टता प्राप्त थी। भारतीय फिल्मों में राग आधारित गीतों को स्वरबद्ध करने में संगीतकार नौशाद और मदन मोहन के साथ रोशन का नाम भी चर्चित है। इस श्रृंखला में हम आपको संगीतकार रोशन के स्वरबद्ध किये राग आधारित गीतों में से कुछ गीतों को चुन कर सुनवा रहे हैं और इनके रागों पर चर्चा भी कर रहे हैं। इस परिश्रमी संगीतकार का पूरा नाम रोशन लाल नागरथ था। 14 जुलाई 1917 को तत्कालीन पश्चिमी पंजाब के गुजरावालॉ शहर (अब पाकिस्तान) में एक ठेकेदार के परिवार में जन्मे रोशन का रूझान बचपन से ही अपने पिता के पेशे की और न होकर संगीत की ओर था। संगीत की ओर रूझान के कारण वह अक्सर फिल्म देखने जाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने एक फिल्म ‘पूरन भगत’ देखी। इस फिल्म में पार्श्वगायक सहगल की आवाज में एक भजन उन्हें काफी पसन्द आया। इस भजन से वह इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने यह फिल्म कई बार देख डाली। ग्यारह वर्ष की उम्र आते-आते उनका रूझान संगीत की ओर हो गया और वह पण्डित मनोहर बर्वे से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मनोहर बर्वे स्टेज के कार्यक्रम को भी संचालित किया करते थे। उनके साथ रोशन ने देशभर में हो रहे स्टेज कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। मंच पर जाकर मनोहर बर्वे जब कहते कि “अब मैं आपके सामने देश का सबसे बडा गवैया पेश करने जा रहा हूँ” तो रोशन मायूस हो जाते क्योंकि “गवैया” शब्द उन्हें पसन्द नहीं था। उन दिनों तक रोशन यह तय नहीं कर पा रहे थे कि गायक बना जाये या फिर संगीतकार। कुछ समय के बाद रोशन घर छोडकर लखनऊ चले गये और पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी द्वारा स्थापित मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान में भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) में प्रवेश ले लिया और कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के मार्गदर्शन में विधिवत संगीत की शिक्षा लेने लगे। पाँच वर्ष तक संगीत की शिक्षा लेने के बाद वह मैहर चले आये और उस्ताद अलाउदीन खान से संगीत की शिक्षा लेने लगे। एक दिन अलाउदीन खान ने रोशन से पूछा “तुम दिन में कितने घण्टे रियाज करते हो। ” रोशन ने गर्व के साथ कहा ‘दिन में दो घण्टे और शाम को दो घण्टे”, यह सुनकर अलाउदीन बोले “यदि तुम पूरे दिन में आठ घण्टे रियाज नहीं कर सकते हो तो अपना बोरिया बिस्तर उठाकर यहाँ से चले जाओ”। रोशन को यह बात चुभ गयी और उन्होंने लगन के साथ रियाज करना शुरू कर दिया। शीघ्र ही उनकी मेहनत रंग आई और उन्होंने सुरों के उतार चढ़ाव की बारीकियों को सीख लिया। इन सबके बीच रोशन ने उस्ताद बुन्दु खान से सांरगी की शिक्षा भी ली। उन्होंने वर्ष 1940 में दिल्ली रेडियो केंद्र के संगीत विभाग में बतौर संगीतकार अपने कैरियर की शुरूआत की। बाद में उन्होंने आकाशवाणी से प्रसारित कई कार्यक्रमों में बतौर हाउस कम्पोजर भी काम किया। वर्ष 1948 में फिल्मी संगीतकार बनने का सपना लेकर रोशन दिल्ली से मुम्बई आ गये। श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में आज हमने 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘सूरत और सीरत’ का एक गीत चुना है, जिसे रोशन ने राग पूरियाधनाश्री के स्वरों में पिरोया है। यह गीत आशा भोसले की आवाज़ में प्रस्तुत है। इसके साथ ही इसी राग में निबद्ध एक खयाल सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं।



आशा  भोसले 
सातवें दशक के आरम्भिक दौर की फिल्मों में रोशन का संगीत गुणबत्ता के साथ-साथ लोकप्रियता की कसौटी पर खरा उतरता है। इस दौर की सर्वाधिक सफलतम फिल्म ‘बरसात की रात’ थी। इसी फिल्म में फिल्म संगीत के इतिहास की सर्वश्रेष्ठ कव्वाली शामिल थी, जिसकी रिकार्डिंग में 29 घण्टे का समय लगा था। इस फिल्म में राग आधारित गीतों की भरमार थी। इसके अलावा रोशन ने इस फिल्म में आकर्षक गज़लें भी संगीतबद्ध की थी। फिल्मों में सर्वश्रेष्ठ गज़लें संगीतबद्ध करने में लोग मदन मोहन को आज भी याद करते हैं। परन्तु रोशन की स्वरबद्ध गज़लें भी तुलनात्मक दृष्टि से मदन मोहन की गज़लों से कम आकर्षक नहीं हैं। फिल्म ‘बरसात की रात’ के बाद के दौर में कुछ संगीत समीक्षकों के मतानुसार रोशन लोकप्रियता की ओर अधिक ध्यान देने लगे थे। इसी तथ्य को दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि रोशन की रचनाओं में अब वह लोच और स्पर्श आगया था जो रचनाओं को आम श्रोताओं के बीच पसंदीदा बनाता है। रोशन के संगीत से सजी इसी दौर की फिल्म ‘बाबर’ और ‘आरती’ में भी राग आधारित गीतों की उत्कृष्ठता थी। इन फिल्मों के गीतों का हमने पिछले अंकों में आपको रसास्वादन कराया है। आज के अंक में हम 1962 की ही फिल्म ‘सूरत और सीरत’ की चर्चा कर रहे हैं, जिसमें रोशन का संगीत था। इस फिल्म में रोशन को गीतकार शैलेन्द्र और साहिर लुधियानवी का साथ मिला। इस फिल्म में साहिर लुधियानवी का लिखा और लता मंगेशकर का गाया गीत –“गीत मेरा सुलाए जगाए तुझे...” एक मधुर रचना थी। इसी फिल्म में गायक मुकेश की आवाज़ में, शैलेन्द्र का लिखा गीत राग शिवरंजिनी के स्वरों की छाया लिए –“बहुत दिया देने वाले ने तुझको, आँचल ही न समाये तो क्या कीजे...” दशकों बाद भी सदाबहार गीतों की श्रेणी में रखे जाने योग्य है। इस फिल्म में आशा भोसले के स्वर में राग पूरियाधनाश्री पर आधारित एक गीत है, जिसे हमने आज के अंक के लिए चुना है। शैलेन्द्र के इस गीत को रोशन ने अनूठे कहरवा ताल में निबद्ध कर एक मधुर गीत का रूप दिया है। गीत के बोल हैं, -“प्रेम लगन मन में बसा ले...”। अब आप फिल्म “सूरत और सीरत’ का राग पूरियाधनाश्री पर आधारित यह गीत सुनिए।

राग पूरियाधनाश्री : “प्रेम लगन मन में बसा ले...” : आशा भोसले : फिल्म – सूरत और सीरत


पण्डित भीमसेन  जोशी
पूर्वी थाट के विभिन्न रागों में राग पूरियाधनाश्री एक अत्यन्त लोकप्रिय राग है। राग पूर्वी की तरह राग पूरियाधनाश्री भी सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इस राग के आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर इस्तेमाल किये जाते हैं। इसका ऋषभ और धैवत स्वर कोमल होता है तथा मध्यम स्वर तीव्र होता है। आरोह के स्वर- नि रे(कोमल) ग म॑(तीव्र) प (कोमल) प नि सां और अवरोह के स्वर- रे(कोमल) नि (कोमल) प म॑(तीव्र) ग म॑(तीव्र) रे(कोमल) ग रे(कोमल) सा होते हैं। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। राग पूरियाधनाश्री के गायन-वादन के लिए सायंकाल सन्धिप्रकाश के सामय को उपयुक्त माना जाता है। राग पूरियाधनाश्री दो रागों; पूरिया और धनाश्री का मिश्रण है। प्रचलित राग धनाश्री काफी थाट का राग है, जिसमे गान्धार और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। अतः अधिकतर संगीतज्ञ राग पूरियाधनाश्री को एक स्वतंत्र राग मानते हैं। इसमें पूर्वी थाट के दो रागों पूरिया और धनाश्री का मिश्रण है। हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव लिखित पुस्तक ‘राग परिचय’, भाग – 3 में इस राग के बारे में एक तथ्य का उल्लेख है। इसके अनुसार पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे कृत ‘क्रमिक पुस्तक मालिका’ के चौथे भाग इस राग का वादी-संवादी स्वर क्रमशः पंचम और ऋषभ माना गया है। हम सभी जानते हैं कि वादी-संवादी में षडज-पंचम भाव अथवा षडज-मध्यम भाव का होना आवश्यक है। पंचम और ऋषभ में इनमें से कोई भाव नहीं है। इस दृष्टि से कोमल ऋषभ का संवादी होना उचित नहीं है। इस राग में कोमल ऋषभ स्वर पर कभी भी न्यास नहीं किया जाता। इस दृष्टि से भी ऋषभ का संवादी होना उचित नहीं है। कोमल ऋषभ के स्थान पर षडज स्वर को संवादी मानना न्यायसंगत है। कुछ विद्वान पंचम को वादी और षडज को संवादी मानते हैं। आइए, अब आप राग पूरियाधनाश्री में एक द्रुत खयाल पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में सुनिए।आप इस गीत का रसास्वादन कीजिए और  मुझे  आज  के  इस  अंक  को  यहीं  विराम  देने  की  अनुमति  दीजिए।

राग पूरियाधनाश्री : “पायलिया झंकार मोरी....” : पण्डित भीमसेन जोशी



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 320वें अंक की पहेली में आज हम आपको संगीतकार रोशन द्वारा स्वरबद्ध सातवें दशक के आरम्भिक दौर की एक फिल्म के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 320वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – गीत में किस राग का आधार है? हमें राग का नाम लिख भेजिए।

2 – रचना में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम लिखिए।

3 – यह किस पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 10 जून, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 322वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘‘स्वरगोष्ठी’ की 318वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘आरती’ के एक राग आधारित गीत का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – खमाज, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – मुहम्मद रफी

इस अंक की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागी, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने प्रश्नों के सही उत्तर दिए हैं और इस सप्ताह के विजेता बने हैं। उपरोक्त सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला ‘संगीतकार रोशन के गीतों में राग-दर्शन’ के इस अंक में हमने आपके लिए राग पूरियाधनाश्री पर आधारित रोशन के एक गीत और राग की शास्त्रीय संरचना पर चर्चा की और इस राग का एक उदाहरण भी प्रस्तुत किया। रोशन के संगीत पर चर्चा के लिए हमने फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार सुजॉय चटर्जी के आलेख और लेखक पंकज राग की पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ का सहयोग लिया है। हम इन दोनों विद्वानों का आभार प्रकट करते हैं। आगामी अंक में हम भारतीय संगीत जगत के सुविख्यात संगीतकार रोशन के एक अन्य राग आधारित गीत पर चर्चा करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, January 15, 2017

प्रातःकाल के राग : SWARGOSHTHI – 301 : MORNING RAGAS




स्वरगोष्ठी – 301 में आज

राग और गाने-बजाने का समय – 1 : दिन के प्रथम प्रहर के राग

‘जग उजियारा छाए, मन का अँधेरा जाए...’



 "रेडियो प्लेबैक इण्डिया" के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हम एक नई श्रृंखला- ‘राग और गाने-बजाने का समय’ आरम्भ कर रहे हैं। श्रृंखला की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। है। उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात, संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर, दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर, रात्रि के प्रहर कहलाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा करेंगे। श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हम आपसे दिन के प्रथम प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के प्रमुख राग बिलावल की एक बन्दिश सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही राग भैरव पर आधारित, फिल्म ‘जागते रहो’ का एक गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में भी सुनवा रहे हैं।




पण्डित भीमसेन जोशी
भारतीय कालगणना सिद्धान्तों के अनुसार नये दिन का आरम्भ सूर्योदय के साथ होता है। सूर्योदय से लेकर तीन घण्टे तक प्रथम प्रहर माना जाता है। भारत में सूर्योदय का समय ऋतु और स्थान के अनुसार चार से सात बजे के बीच बदलता रहता है। संगीत के प्रथम प्रहर का निर्धारण समान्यतः प्रातःकाल 6 से 9 बजे के बीच किया गया है। रागों का समय निर्धारण कुछ प्रमुख सिद्धान्तों के आधार पर किया गया है। इन सिद्धान्तों की चर्चा हम अगली कड़ी से करेंगे। सामान्यतः प्रातःकाल के रागों में शुद्ध मध्यम वाले राग और ऋषभ और धैवत कोमल स्वर वाले राग होते हैं। प्रथम प्रहर के कुछ मुख्य राग हैं- बिलावल, अल्हैया बिलावल, अरज, भैरव, अहीर भैरव, आनन्द भैरव, आभेरी, आभोगी, गुणकली, जोगिया, देशकार, रामकली, विभास, वैरागी और भैरवी आदि। आज हम पहले राग बिलावल का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। बिलावल राग, बिलावल थाट का आश्रय राग है। यह सभी शुद्ध स्वरों वाला सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात इसके आरोह और अवरोह सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। राग बिलावल का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। अब हम आपके लिए इस राग की एक बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। तीनताल में निबद्ध इस रचना के बोल है- “कोई तारा नज़र नहीं आवे...”। यह बन्दिश हम सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित भीमसेन जोशी की आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। यह बन्दिश तीनताल में निबद्ध है।

राग बिलावल : “कोई तारा नज़र नहीं आवे...” : पण्डित भीमसेन जोशी



लता मंगेशकर और सलिल चौधरी
आज का दूसारा प्रातःकालीन राग भैरव थाट का आश्रय राग भैरव है। इस राग का गायन अथवा वादन सन्धिप्रकाश काल में भी किया जाता है। राग भैरव भी सम्पूर्ण जाति का राग है किन्तु इसमें ऋषभ और धैवत स्वर कोमल प्रयोग होता है। इसका वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग ‘भैरव’ पर आधारित फिल्मी गीतों में से एक अत्यन्त मनमोहक गीत आज हमने चुना है। 1956 में विख्यात फ़िल्मकार राज कपूर ने महत्वाकांक्षी फिल्म ‘जागते रहो’ का निर्माण किया था। इस फिल्म के संगीतकार सलिल चौधरी का चुनाव स्वयं राज कपूर ने ही किया था, जबकि उस समय तक शंकर-जयकिशन उनकी फिल्मों के स्थायी संगीतकार बन चुके थे। फिल्म ‘जागते रहो’ बाँग्ला फिल्म ‘एक दिन रात्रे’ का हिन्दी संस्करण था और बाँग्ला संस्करण के संगीतकार सलिल चौधरी को ही हिन्दी संस्करण के संगीत निर्देशन का दायित्व दिया गया था। सलिल चौधरी ने इस फिल्म के गीतों में पर्याप्त विविधता रखी। इस फिल्म में उन्होने एक गीत ‘जागो मोहन प्यारे, जागो...’ की संगीत रचना ‘भैरव’ राग के स्वरों पर आधारित की थी। शैलेन्द्र के लिखे गीत जब लता मंगेशकर के स्वरों में ढले, तब यह गीत हिन्दी फिल्म संगीत का मीलस्तम्भ बन गया। आइए, आज हम राग ‘भैरव’ पर आधारित, फिल्म ‘जागते रहो’ का यह गीत सुनते हैं। आप इस गीत का रसास्वादन करें और हमें श्रृंखला की पहली कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भैरव : ‘जागो मोहन प्यारे...’ : लता मंगेशकर और साथी : फिल्म - जागते रहो



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की संगीत पहेली क्रमांक 301 में आज हम आपको राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 310वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पहले सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। 




1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह किस राग पर आधारित है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – मुख्य गायक-स्वर को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 21 जनवरी, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 303सरे अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता



‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 299 में हमने आपसे संगीत पहेली का कोई भी प्रश्न नहीं पूछा था। अतः इस अंक की पहेली का कोई भी विजेता नहीं है। अगले अंक से पहेली का उत्तर और विजेताओं के नाम पूर्ववत प्रकाशित करेंगे।

अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ नई लघु श्रृंखला “राग और गाने-बजाने का समय” का यह पहला अंक था। अगले अंक में हम दिन के दूसरे प्रहर के रागों पर आधारित चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Saturday, May 7, 2016

"गाता रहे मेरा दिल...", क्यों फ़िल्म के बन जाने के बाद इस गीत को जोड़ा गया?


एक गीत सौ कहानियाँ - 81
 

'गाता रहे मेरा दिल...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 81-वीं कड़ी में आज जानिए 1966 की मशहूर फ़िल्म ’गाइड’ के मशहूर गीत "गाता रहे मेरा दिल..." के बारे में जिसे किशोर कुमार और लता मंगेशकर ने गाया था। बोल शैलेन्द्र के और संगीत सचिन देव बर्मन का। 
  

फ़िल्मों को बहुत ध्यान से देखने और फ़िल्म के हर पहलु पर गम्भीरता से सोच विचार करने वाले लोग अक्सर
किशोर और देव
फ़िल्मकारों की त्रुटियों, या फिर यूं कहिए चालाकियों, को पकड़ ही लेते हैं। कई कारणों से फ़िल्म निर्माण के दौरान फ़िल्म की स्क्रिप्ट, पात्र, कहानी, गीत-संगीत आदि क्षेत्रों में फेर-बदल करने के निर्णय लिए जाते हैं, कुछ जोड़े जाते हैं, कुछ हटाए जाते हैं, या कुछ फेर बदल किए जाते हैं। लक्ष्य बस एक ही होता है कि ये बदलाव फ़िल्म के लिए शुभ सिद्ध हों, फ़िल्म लोगों को पसन्द आए, फ़िल्म सफलता की सीढ़ियाँ चढ़े। ऐसा ही कुछ हुआ फ़िल्म ’गाइड’ के एक गीत के साथ। ’गाइड’ विजय आनन्द की महत्वाकांक्षी फ़िल्म थी जिसके लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की। फ़िल्म के गीत-संगीत का पक्ष बेहद मज़बूत रहा। शैलेन्द्र, सचिन देव बर्मन, लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी ने मिल कर इस फ़िल्म के गीतों को वो मुकाम दिलवाया कि आज तक ये गीत उतने ही लोकप्रिय हैं जितने उस ज़माने में हुआ करते थे। आप यह सोच रहे होंगे कि मैं किशोर कुमार का नाम कैसे भूल गया, आख़िर उन्होंने भी तो अपनी आवाज़ दी है इस फ़िल्म के सर्वाधिक लोकप्रिय गीत "गाता रहे मेरा दिल..." में! किशोर कुमार का उल्लेख इसलिए नहीं किया क्योंकि फ़िल्म बन कर पूरी होने तक यह गीत फ़िल्म में था ही नहीं। जब एक बार फ़िल्म पत्रकार पीयुष शर्मा ने विजय आनन्द से यह सवाल पूछा कि मुझे हमेशा ऐसा लगा है कि "गाता रहे मेरा दिल..." गीत फ़िल्म में बाद में जोड़ा गया है एक ’पैच-वर्क’ के रूप में, तब विजय आनन्द ने जवाब दिया - "लगता है आपने मेरी चोरी पकड़ ली, तब तो मैं अपने प्रयास में व्यर्थ हो गया!" "बिल्कुल नहीं, आपका काम फिर भी उच्चस्तरीय है", पीयुष ने कहा। विजय आनन्द ने फिर खुलास करते हुए इस गीत के बनने की कहानी को विस्तार से बताया। 


"गाता रहे मेरा दिल..." फ़िल्म पूरी होने के बाद जोड़ा गया था जिसकी एक ख़ास वजह थी। बात यह थी कि एक
(बायें से) - पंचम, देव और दादा बर्मन
अरसे से किशोर कुमार ने देव आनन्द और सचिन देव बर्मन के साथ कोई गीत नहीं गाया था। इसकी कोई ख़ास वजह तो नहीं थी, बस नहीं हो पाया था। मधुबाला की बीमारी एक मुख्य कारण रहा किशोर कुमार के रिहर्सल और रेकॉर्डिंग्स के लिए समय ना दे पाने का। दूसरी तरफ़ रफ़ी साहब के साथ नवकेतन का तालमेल बहुत अच्छा चल रहा था। पर कहीं ना कहीं देव साहब को किशोर की कमी खटक रही थी। और एक दिन वो चले गए किशोर से मिलने। और एक तरह से उनको घसीटते हुए दादा बर्मन के घर ले गए। किशोर कुमार को देख कर बर्मन दादा ख़ुशी से उन्हें गले लगाया और पूछा कि इतने दिन कहाँ रह गए थे? दो चार बातों के बाद बर्मन दादा ने कहा कि चलो रोहर्सल शुरू करते हैं, एक गाना रेकॉर्ड करना है। और वो लग गए "ख़्वाब हो तुम या कोई हक़ीक़त कौन हो तुम बतलाओ..." को कम्पोज़ करने में। उस दिन वहाँ दादा बर्मन के साथ देव आनन्द, किशोर कुमार और पंचम शामिल थे। एक अरसे के बाद देव-किशोर-दादा बर्मन की तिकड़ी का यह गीत बना। किशोर ने जिस तरह से गीत को गाया, दादा बर्मन ने उनका माथा चूम लिया। यही चीज़ देव और विजय आनन्द मिस कर रहे थे किशोर की अनुपस्थिति में। और तभी देव आनन्द के दिमाग़ में यह ख़याल आया कि फ़िल्म ’गाइड’ तो ’तीन देवियाँ’ से पहले रिलीज़ होने वाली है क्योंकि ’तीन देवियाँ’ में कुछ काम अभी और बाक़ी है। और तो और ’तीन देवियाँ’ एक छोटे कैनवस पर बनने वाली श्याम-श्वेत फ़िल्म है जिससे लोगों को बहुत ज़्यादा उम्मीदें नहीं है। पर ’गाइड’ को बड़ी फ़िल्म है और रंगीन भी। तो क्यों ना एक गीत किशोर कुमार का ’गाइड’ में भी डाल दिया जाए! और तब काफ़ी दिमाग़ लगाने के बाद "गाता रहे मेरा दिल..." के लिए ज़बरदस्ती का सिचुएशन निकाला गया। और इत्तेफ़ाक़ देखिए कि यही गीत फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत बन कर उभरा।



"गाता रहे मेरा दिल..." गीत को ग़ौर से सुनने पर पता चलता है कि इस गीत में किशोर कुमार का हिस्सा लता
लता, देव, बर्मन दादा, किशोर
मंगेशकर के हिस्से से थोड़ा अधिक है। इसके पीछे कारण यही है कि यह किशोर का गाया फ़िल्म का एकमात्र गीत है, इसलिए उन्हें इस गीत में ज़्यादा प्रॉमिनेन्स दिया गया। अब अगला सवाल यह उठता है कि माना कि किशोर कुमार का यह गीत बाद में जोड़ा गया था, तो फिर ’तीन देवियाँ, ’ज्वेल थीफ़’ जैसी फ़िल्मों में किशोर कुमार से सारे गाने क्यों नहीं गवाए गए, वहाँ भी तो रफ़ी साहब मौजूद थे? इस सवाल के जवाब में विजय आनन्द ने बताया कि किसी की हिम्मत नहीं थी जो बर्मन दादा को यह निर्देश दे सके कि कौन सा गाना कौन गाएगा। उनका अपना तरीक़ा था यह विचार करने का कि किस गीत के लिए कौन सी आवाज़ सटीक होगा। एक बार उन्होंने यह तय कर लिया कि फ़लाना गीत फ़लाना गायक गाएगा तो किसी कि क्या मजाल जो उनके निर्णय को चुनौती दे! अगर उनका सुझाया गायक किसी कारण से नहीं मिल पाया तो कई बार तो वो उस गीत को ही रद्द कर देते, पर किसी और से नहीं गवाते। और फिर नया गाना बनाने में जुट जाते। उन्हें अपनी सोच पर दृढ़ विश्वास था। ख़ैर, "गाता रहे मेरा दिल..." को उस वर्ष ’बिनाका गीत माला’ के वार्षिक कार्यक्रम में दूसरा स्थान मिला था। पहला स्थान मिला था फ़िल्म ’सूरज’ के रफ़ी साहब के गाए "बहारों फूल बरसाओ..." को। उस वार्षिक कार्यक्रम में फ़िल्म ’गाइड’ के जिस अन्य गीत को स्थान मिला, वह था दादा बर्मन का गाया "वहाँ कौन है तेरा मुसाफ़िर जाएगा कहाँ..."। इस गीत को 25-वाँ पायदान मिला था कुल 32 पायदानों में। 




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आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Saturday, November 21, 2015

"दिल तड़प-तड़प के कह रहा है आ भी जा..." - जानिए पोलैण्ड के उस गीत के बारे में भी जिससे इस गीत की धुन प्रेरित है


एक गीत सौ कहानियाँ - 70
 

'दिल तड़प-तड़प के कह रहा है आ भी जा...' 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 70-वीं कड़ी में आज जानिए 1958 की फ़िल्म ’मधुमति’ के गीत "दिल तड़प-तड़प के कह रहा है आ भी जा..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर और मुकेश ने गाया था। बोल शैलेन्द्र के और संगीत सलिल चौधरी का।

मैं आजकल पोलैण्ड में हूँ। कार्यालय के काम से मुझे एक महीने के लिए यहाँ रहना पड़ेगा। नवंबर का मध्य होते ही यूरोप में जाड़ा ज़ोर पकड़ चुका है। 3 डिग्री तापमान, बादलों भरा आकाश, धूप का कहीं नामोनिशान नहीं, सूर्योदय सुबह 7:30 और सूर्यास्त शाम 4 बजे, चारों तरफ़ ठण्ड और धुंधलाहट के मद्देनज़र रविवार होने के बावजूद बाहर घूमने-फिरने का ख़ास मौका नहीं मिल रहा। ऐसे में होटल के कमरे में फ़्री वाई-फ़ाई के सहारे लैपटॉप पर दफ़्तर के काम के साथ-साथ यू-ट्यूब पर गाने सुनने या फ़िल्म देखने के अलावा और कोई काम नहीं। यकायक ख़याल आया कि पोलैण्ड आने की तैयारी की भागा-दौड़ी में अगले सप्ताह का ’एक गीत सौ कहानियाँ’ लिखना तो रह ही गया था। दिल मचल उठा यह सोच कर कि अगले एक घंटे का समय इसे लिखते हुए गुज़ार दूँगा। किस गीत के बारे में लिखूँ आज? कुछ सूझ नहीं रहा। बगल के कमरे से पोलैण्ड के किसी गीत के बोल और ताल कानों पर पड़ रही है। अचानक जैसे कोई बिजली सी कौंध गई। याद आया कि फ़िल्म ’मधुमति’ में एक गीत है जो एक पोलिश (पोलैण्ड की भाषा) गीत की धुन पर आधारित है। मन रोमांच से भर उठा। कभी सोचा न था कि पोलैण्ड जैसे देश में भी मेरे क़दम पड़ेंगे। यहँ रहते हुए यहाँ की लोक-धुन से प्रेरित हिन्दी फ़िल्मी गीत का शोध निस्संदेह एक आनन्ददायक अनुभूति होगी।


"दिल तड़प-तड़प के कह रहा है आ भी जा, तू हमसे आँख ना चुरा, तुझे क़सम है आ भी जा..." गीत के कम्पोज़िशन के लिए सलिल चौधरी ने पोलैण्ड के एक लोक धुन का सहारा लिया था। इस गीत के अलावा सलिल दा ने कई बार विदेशी लोक धुनों या विदेशी आधुनिक धुनों का इस्तेमाल अपने गीतों में किया है। उदाहरण स्वरूप ’दो बिघा ज़मीन’ का "धरती कहे पुकार के..." गीत आधारित था लेव निपर द्वारा स्वरबद्ध 'Meadowlands' पर। ’तांगेवाली’ फ़िल्म का "हल्के हल्के चलो साँवरे..." गीत प्रेरित था ’The Wedding Samb” से। फ़िल्म ’छाया’ के "इतना ना मुझसे..." तो सर्वविदित है कि यह मोज़ार्ट के एक सिम्फ़नी से प्रेरित है। फ़िल्म ’माया’ का "ज़िन्दगी क्या है सुन मेरे यार..." चार्ली चैपलिन के 1951 की फ़िल्म ’Limelight' के थीम से प्रेरित था। ’मेमदीदी’ फ़िल्म का "बचपन बचपन..." आधारित था नर्सरी राइम 'A-Tisket, A-Tasket' से जबकि ’हाफ़ टिकट’ का "आँखों में तुम..." 1948 के चार्टबस्टर 'Buttons and Bows' से प्रेरित था। "दिल तड़प-तड़प के..." जिस मूल गीत के धुन पर आधारित है वह गीत है "Szla dzieweczka do gajeczka" जिसका उच्चारण है "shwah jeh-vehtch-ka duh lah-sech-kah"। मूल लोक गीत का रिदम धीमा है ("दिल तड़प-तड़प..." का रिदम इससे थोड़ा तेज़ है), जबकि इस पोलिश लोक गीत के आधुनिक संस्करण भी बने हैं जिनकी रिदम काफ़ी तेज़ है। "Szla dzieweczka do gajeczka" दरसल एक कहानी है जो गीत के माध्यम से कही गई है। यह कहानी है एक युवती की जो जंगल में जाती है फल तोड़ने के लिए। वहाँ उसकी मुलाक़ात एक नौजवान शिकारी से होती है जो जंगल में अपना रास्ता भटक गया है। नौजवान युवती से दो चीज़ें माँगता है - खाना और प्यार। युवती का जवाब है कि वह सारा खाना ख़ुद खा चुकी है और जहाँ तक प्यार का सवाल है तो हालाँकि नौजवान शिकारी बहुत ही ख़ूबसूरत है पर उसके मन में अभी तक उसका पहला प्यार हावी है जिसे वो भुला नहीं पा रही है। बस इतनी सी है इस गीत की कहानी। और हाँ "Szla dzieweczka" का शाब्दिक अर्थ है "चलती हुई लड़की"। 


"Szla dzieweczka" गीत पोलैण्ड के दक्षिण-पश्चिम प्रान्त सिलेसिआ (Silesia) में उत्पन्न हुआ था; यह प्रान्त शताब्दियों से जर्मनी के अधीन हुआ करता था जहाँ पोलिश लोग अल्पसंख्यक हुआ करते थे। यहाँ के लोकगीत और लोकनृत्य साधारण और सरल हुआ करते थे। इस गीत पर शोध करते हुए कार्तिक एस. का लिखा एक ब्लॉग मिला जहाँ इसके बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराई गई है। कार्तिक लिखते हैं कि उनके पिता ने उन्हें यह जानकारी दी थी कि "दिल तड़प-तड़प के..." गीत की धुन से मिलती जुलती धुन उन्होंने एक वृत्तचित्र 'Music and dances of Silesia' में सुना है जो Polish World War II के पार्श्व पर बनी Andrez Wajda की क्लासिक फ़िल्म 'Kanal' के साथ जोड़ी गई है। कार्तिक को सुन्दर श्रीनिवासन के ब्लॉग से भी यह पता चला कि ’मधुमति’ का यह गीत किसी विदेशी गीत से प्रेरित है। फिर सुन्दर की सहायता से कार्तिक ने बैंगलोर में ’रेडियो सिटी’ की RJ शीतल अय्यर से सम्पर्क किया जिनके भाई का पोलिश मूल की लड़की से विवाह हुआ है। इस तरह से शीतल अय्यर के भाभी को जब ’मधुमति’ का गीत सुनवाया गया तो उन्होंने तुरन्त "Szla dzieweczka" की धुन को पहचान लिया।

कार्तिक ने इस गीत के बारे में अधिक जानकारी के लिए कई पोलिश म्युज़िक फ़ोरम्स में लिखा था, और कार्तिक को आश्चर्य-चकित करते हुए University of Southern California के Polish Music Center के निर्देशन मिस वान्डा विल्क (Wanda Wilk) ने जवाब देते हुए कई महत्वपूर्ण तथ्य इस गीत के दिए। मिस विल्क के ही शब्दों में - 


Ms. Wanda Wilk
"The song is a very popular folk-song that originated in the Silesian (South-Western) part of Poland i.e., from the regions of Slask Gorny (High Silesia), Cieszyn and Opole regions. The ethnographer Juliusz Roger identifies it as coming from Rybnik, which is near the Czech border. That is where the famous Polish jazz pianist, Adam Makowicz, and the famous Polish composer, Henryk Gorecki, come from. It has been very popular throughout Poland for many years, for various celebratory occasions like namesday, youth gatherings etc. It has been recorded by the professional Folk Song & Dance Ensemble, 'Slask' produced by Polskie Nagrania, by the Lira Ensemble of Chicago and by popular singers like Maryla Rodowicz and popular Polish dance bands.

As far as the pronunciation, it goes something like this...

Szla dzieweczka: shwah jeh-vehtch-ka
do laseczka: duh lah-sech-kah
do zielonego: duh zhyeh-loh-neh-go
nadeszla tam mysliweczka: nah-desh-wah tahm mih-shlee-vetch-kah
bardzo szwarnego: bahr-dzoh schwahr-neh-goh
O moj mily mysliweczku: Oh mooy mee-lyh mih-shlee-vetch-koo
dalabym ci chleba z maslem: dah-wah-bim chee hleh-bah z mahs-wem
alem juz zjadla: a-lehm yoosh zyad-wah" 

लीजिए, अब आप फिल्म 'मधुमती' का यही गीत मुकेश और लता मंगेशकर की आवाज़ में सुनिए। इसके बाद आप मूल पोलिश लोकगीत भी सुन सकते हैं। 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




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