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Sunday, April 17, 2011

मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है....अरे नहीं साहब ये तो गाने के बोल हैं, हमारे अंगने में तो आपका ही काम है...आईये

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 636/2010/336

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! आज हम एक नए सप्ताह में क़दम रख रहे हैं और इन दिनों जारी है लघु शृंखला 'सितारों की सरगम', जिसके अंतर्गत हम कुछ ऐसे गीत सुनवा रहे हैं जिन्हें आवाज़ दी है फ़िल्म अभिनेता और अभिनेत्रियों नें। शृंखला के पहले हिस्से में जिन पाँच सितारों की सरगमी आवाज़ से आपका परिचय हुआ वो थे राज कपूर, दिलीप कुमार, मीना कुमारी, नूतन और अशोक कुमार। आइए आज से शुरु हो रही इस शृंखला के दूसरे हिस्से में बात करें अगली पीढ़ी के सितारों की। ऐसे में शुरुआत 'मेगास्टार ऒफ़ दि मिलेनियम' के अलावा और किनसे हो सकती है भला! जी हाँ, बिग बी अमिताभ बच्चन। साहब उनकी आवाज़ के बारे में क्या कहें, यह तो बस सुनने की चीज़ है। और मज़े की बात यह है कि फ़िल्मों में आने से पहले जब उन्होंने समाचार वाचक की नौकरी के लिए वॊयस टेस्ट दिया था, तो उसमें वो फ़ेल हो गये थे और उन्हें बताया गया था कि उनकी आवाज़ वाचन के लिए सही नहीं है। और क़िस्मत ने क्या खेल खेला कि उनकी वही आवाज़ आज उनकी पहचान है। बच्चन साहब नें जो सफलता और शोहरत कमाई है अपने लम्बे करीयर में और जो सिलसिला आज भी जारी है, इस ऊँचाई तक बहुत कम लोग पहुँच पाते हैं। हमारे बौने हाथ उनकी उपलब्धि को छू भी नहीं सकते। बहुत साल पहले विविध भारती के एक मुलाक़ात में बच्चन साहब से पूछा गया था कि "अमित जी, आप जिस मुकाम पर आ गये हैं वहाँ संघर्ष आपको छू भी नहीं सकता, पर जब पहली बार आपको सफलता मिली थी, उस वक़्त आपको कैसा महसूस हुआ था?"; इसके जवाब में अमित जी का कहना था, "पहली बात तो यह है कि संघर्ष कभी ख़त्म नहीं होती, आज भी मुझे उतना ही संघर्ष करना पड़ता है जितना उस ज़माने में करना पड़ता था। मेरे बाबूजी कहते हैं कि जब तक जीवन है संघर्ष है। और जहाँ तक सफलता का सवाल है, ख़ुशी तो हुई थी, पर उसके लिए कोई ख़ास तरीक़े से मनाया नहीं गया था।"

दोस्तों, अमिताभ बच्चन साहब के अभिनय का लोहा तो हर किसी ने माना ही है, उनकी गायन क्षमता की भी जितनी दाद दी जाये कम है। उन्होंने कई फ़िल्मों में गीत गाया है और कई बार संवाद भी ऐसे निराले तरीक़े से कहे हैं गीतों में कि उस वजह से गीत एक अलग ही मुकाम तक पहुँच गया है। ऐसा ही एक गीत है फ़िल्म 'सिलसिला' का "ये कहाँ आ गये हम युंही साथ साथ चलते"। फ़िल्म 'ख़ुदा गवाह' में भी उनका बोला हुआ संवाद "सर ज़मीन-ए-हिंदुस्तान' को सॊंग् साउण्डट्रैक में शामिल किया गया था। 'नसीब' के "चल चल मेरे भाई" और 'अमर अक्बर ऐंथनी' में "माइ नेम इज़ ऐंथनी गोल्ज़ल्वेज़" में भी उनके हुए संवाद यादगार हैं। अमिताभ बच्चन के गायन से समृद्ध फ़िल्मों में जो नाम सब से पहले ज़हन में आते हैं, वो हैं - 'सिलसिला', 'मिस्टर नटवरलाल', 'लावारिस', 'पुकार', 'जादूगर', 'महान', 'तूफ़ान', 'बागबान'। 'सिलसिला' में दो गीत उन्होंने गाये थे, "नीला आसमाँ सो गया" और "रंग बरसे भीगे चुनरवाली"। यह होली गीत तो शायद सब से लोकप्रिय होली गीत होगा फ़िल्म जगत का! 'मिस्टर नटवरलाल' में "मेरे पास आओ मेरे दोस्तों", 'पुकार' में "तू मयके मत जैयो, मत जैयो मेरी जान", 'जादूगर' में "पड़ोसी अपनी मुरगी को रखना सम्भाल मेरा मुर्गा हुआ है दीवाना", 'महान' में "समुंदर में नहाके और भी नमकीन हो गई है", 'तूफ़ान' में "बाहर है प्रॊब्लेम अंदर है प्रॊब्लेम", और 'बागबान' में "होली खेले रघुवीरा", "चली चली देखो चली चली" और "मैं यहाँ तू वहाँ, ज़िंदगी है कहाँ" जैसे गीत ख़ूब लोकप्रिय हुए। लेकिन जो एक गीत जिसके उल्लेख के बग़ैर बच्चन साहब के गीतों की चर्चा अधूरी है, वह है फ़िल्म 'लावारिस' का "मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है"। अमिताभ बच्चन और अल्का याज्ञ्निक द्वारा अलग अलग गाये यह डबल वर्ज़न गीत लोक शैली में रचा हुआ एक हास्य गीत है जिसमें पत्नी की अलग अलग शारीरिक रूप को हास्य व्यंग के द्वारा दर्शाया गया है। अमिताभ बच्चन वाले वर्ज़न में अमित जी ख़ुद ही महिला का भेस धारण कर इन अलग अलग शारीरिक रूपों को दर्शाते हैं जिससे इस गीत को सुनने के साथ साथ देखना भी अत्यावश्यक हो जाता है। 'लावारिस' के संगीतकार थे कल्याणजी-आनंदजी, जिन्होंने कई अभिनेताओं से गीत गवाये हैं। जब उनसे इसके बरे में पूछा गया था 'विविध भारती' के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में, तब उन्होंने कहा था, "इत्तेफ़ाक़ देखिये, शुरु शुरु में पहले ऐक्टर्स ही गाया करते थे। एक ज़माना वो था जो गा सकता था वो ही हीरो बन सकता था। तो वो एक ट्रेण्ड सी चलाने की कोशिश की जब जब होता था, जैसे राइटर जितना अच्छा गा सकता है, अपने वर्ड्स को इम्पॊर्टैन्स दे सकता है, म्युज़िक डिरेक्टर नहीं दे सकता, जितना म्युज़िक डिरेक्टर दे सकता है कई बार सिंगर नहीं दे सकता, एक्स्प्रेशन-वाइज़, सब कुछ गायेंगे, अच्छा करेंगे, लेकिन ऐसा होता है कि वो सैटिस्फ़ैक्शन कभी कभी नहीं मिलता है कि जो हम चाहते थे वो नहीं हुआ। तो ये हमने कोशिश की, जैसे कि बहुत से सिंगरों ने गाया भी, कुछ कुछ लाइनें भी गाये, बहुत से कॊमेडी कलाकारों नें भी गाये, लेकिन बेसिकली जो पूरे गाने गाये, वो अमिताभ बच्चन जी थे, मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है"। तो आइए सुना जाये इस अनोखे सदाबहार गीत को जिसे लिखा है अंजान साहब नें।



क्या आप जानते हैं...
कि अमिताभ बच्चन को चार बार राष्ट्रीय पुरस्कार और १४ बार फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। वो भारतीय संसद के निर्वाचित सदस्य भी रहे १९८४ से १९८७ के बीच।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 7/शृंखला 14
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - इस युगल गीत में किशोर दा की भी आवाज़ है.

सवाल १ - किस बड़ी अभिनेत्री ने अपने लिए पार्श्वगायन किया है यहाँ - १ अंक
सवाल २ - परदे पर इस अभिनेत्री के साथ कौन दिखते है अभिनय करते - २ अंक
सवाल ३ - गीतकार कौन हैं - ३ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
दरअसल अमित जी का पहला उत्तर गलत था, गुड्डी में धर्मेन्द्र की भूमिका अतिथि की थी, समित ने अमिताभ वाला रोल उनसे छिना था, खैर किसी और ने इसका सही जवाब नहीं दिया और खुद अमित जी ने ही अंततः समित का नाम लिया तो ३ अंक के हकदार वो ही हुए, हिन्दुस्तानी जी और शरद जी भी सही निकले. अनजाना जी कहाँ गायब रहे.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Friday, July 3, 2009

तुम ही मेरे मीत हो, तुम ही मेरी प्रीत हो - हेमंत कुमार और सुमन कल्याणपुर का बेहद रूमानी गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 130

दोस्तो, कल ही हम बात कर रहे थे दो गीतों में शाब्दिक और सांगीतिक समानता की। इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए आज जो गीत हम लेकर आये हैं उस गीत में आप को फ़िल्म 'ख़ानदान' के गीत "तुम ही मेरे मंदिर तुम ही मेरी पूजा" से कुछ निकटता नज़र आयेगी। 'ख़ानदान' फ़िल्म 1965 में आयी थी जिसके संगीतकार थे रवि। और आज जिस गीत को हम लेकर आये हैं वह है फ़िल्म 'प्यासे पंछी' का, जो आयी थी सन् 1961 में। इसका अर्थ यह है कि 'प्यासे पंछी' फ़िल्म का यह गीत 'ख़ानदान' के गीत से पहले बना था, लेकिन लोकप्रियता की दृष्टि से फ़िल्म 'ख़ानदान' के गीत को ज़्यादा सफलता मिली। संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी ने 'प्यासे पंछी' में संगीत दिया था और लक्ष्मीकांत इस फ़िल्म में उनके सहायक थे। सुमन कल्याणपुर और हेमन्त कुमार की आवाज़ों में यह गीत है "तुम ही मेरे मीत हो, तुम ही मेरी प्रीत हो, तुम ही मेरी आरज़ू का पहला पहला गीत हो"। उन दिनों सुमन जी की आवाज़ लता जी की आवाज़ से इस क़दर मिलती थी कि कई बार तो बड़े-बड़े दिग्गज और फ़िल्म संगीत के बड़े जानकार भी धोखा खा जाते थे। इस गीत को सुनते हुए भी यही आभास होता है कि कहीं लता जी तो नहीं गा रहीं। सुमन कल्याणपुर के लिये यह वरदान भी था और अभिशाप भी कि उनकी आवाज़ लताजी से मिलती-जुलती थी। लेकिन सरगम के अथाह सागर में डूबकर मोती तलाश करनेवालों को सुमन जी के गाये गानों की अहमीयत का अंदाज़ा है। उनकी आवाज़ का अल्हड़पन और शोख़ी सुननेवालों को लुभाते हैं। उन दिनों लताजी की गायिकी का असर इतना विशाल था कि हर फ़िल्मकार उनसे गानें गवाना चाहते थे। लेकिन कम बजट की फ़िल्मों के निर्माताओं के लिए चूँकि लताजी महंगी साबित होतीं, इसलिए उन फ़िल्मों में सुमन कल्याणपुर से गवाया जाता था। सुमन जी को 'गरीबों की लता' कहा जाने भी लगा था। ये तो थी सुमन जी की कुछ बातें, हेमन्त दा के बारे में कुछ बातें हम पहले बता चुके हैं, कुछ आगे भी बतायेंगे, फ़िल्हाल बस इतना ही कहेंगे कि कल्याणजी-आनंदजी ने हेमन्त दा से कई ख़ूबसूरत गाने गवाये हैं, जिनमें से कुछ लता जी के साथ युगल गीत हैं। सुमन जी के साथ उनका गाया हुआ यह गीत सब से ज़्यादा मशहूर हुआ था।

1961 में बनी 'प्यासे पंछी' का निर्माण श्री प्रकाश पिक्चर्स ने किया था और इस का निर्देशन किया था हरसुख भट्ट ने। अभी हाल ही में हम ने आप को 'रेशमी रूमाल' फ़िल्म का एक गीत सुनवाया था, उस फ़िल्म के निर्देशक भी हरसुख भट्ट साहब ही थे। 'प्यासे पंछी' के मुख्य कलाकार थे महमूद और अमीता। प्रस्तुत गीत के अलावा इस फ़िल्म में मुकेश के गाये कई गीत प्रसिद्ध हुए थे, ख़ास कर फ़िल्म का शीर्षक गीत "प्यासे पंछी नील गगन में गीत मिलन के गाये"। इस फ़िल्म में कुल 10 गीत थे जिनमें से 3 मुकेश ने गाये, 2 लता, 1 मुकेश-लता, 1 रफ़ी-बलबीर-शमशाद बेग़म, 1 गीता दत्त-मन्ना डे, 1 रफ़ी-सुमन कल्याणपुर और सुमन-हेमन्त का गाया प्रस्तुत गीत। यह फ़िल्म कल्याणजी-आनंदजी की शुरू-शुरू की फ़िल्मों में से एक है। फ़िल्म तो बहुत ज़्यादा नहीं चली थी, लेकिन इस प्रतिभाशाली संगीतकार जोड़ी के काम को काफ़ी सराहना मिली थी इस फ़िल्म से।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. योगेश का लिखा गीत।
2. इस फिल्म में अमिताभ बच्चन डॉक्टर की भूमिका में हैं।
3. मुखड़े में शब्द है 'चुपके'।

पिछली पहेली का परिणाम-
इस बार हमारी दिग्गज़ मात खा गईं। हमने इस बार क्लू थोड़े कम दिये, शायद इसलिए भी स्वप्न मंजूषा कंफ्यूज़ हो गईं। शरद जी ने बिलकुल सही जवाब दिया। बधाई। शरद जी ने 32 अंक हो गये। पराग जी आपका धन्यवाद

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, February 22, 2009

डम डम डिगा डिगा...मौसम भीगा भीगा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 03

"ओल्ड इस गोल्ड" की शृंखला में आज का गीत है फिल्म छलिया से. दोस्तों, एक 'टीम' बनी थी राज कपूर, मुकेश, शैलेन्द्र, हसरत जयपुरी और शंकर जयकिशन की. 50 के दशक में इस 'टीम' ने एक से एक बेहतरीन 'म्यूज़िकल' फिल्में हमें दी. मुकेश की आवाज़ राज कपूर पर कुछ ऐसी जमी कि इन दोनो को एक दूसरे से जुदा करना नामुमकिन सा हो गया. सन 1960 में जब सुभाष देसाई ने फिल्म छलिया बनाने की सोची तो उन्होने अपने भाई मनमोहन देसाई को पहली बार निर्देशन का मौका दिया. फिल्म का मुख्य किरदार राज कपूर को ध्यान में रखकर लिखा गया. इस तरह से मुकेश को गायक चुन लिया गया. लेकिन गीत संगीत का भार शैलेन्द्र - हसरत और शंकर जयकिशन के बजाय सौंपा गया क़मर जलालाबादी और कल्याणजी आनांदजी को. लेकिन इस फिल्म के गीतों को सुनकर ऐसा लगता है की जैसे वही पुरानी 'टीम' ने बनाए हैं इस फिल्म के गीत. कल्याणजी आनांदजी ने उसी अंदाज़ को ध्यान में रखकर इसके गाने 'कंपोज़' किए. और आगे चलकर कल्याणजी आनंदजी के संगीत निर्देशन में ही मुकेश ने अपने 'करियर' के सबसे ज़्यादा गाने गाए जिनमें से ज़्यादातर मक़बूल भी हुए.

फिल्म छलिया के जिस गीत का ज़िक्र आज हो रहा है, वो है "डम डम डिगा डिगा, मौसम भीगा भीगा". यूँ तो जब मुकेश और कल्याणजी आनंदजी के 'कॉम्बिनेशन' की बात आती है तो हमारे ज़हन में कुछ संजीदे, जीवन दर्शन से ओत-प्रोत, या फिर दर्द भरे नगमें उभरकर सामने आते हैं. लेकिन यह एक ऐसा गीत है जिसमें है भरपूर मस्ती, एक संग्रामकता कि इसे जो भी सुन लेता है वो खुद बा खुद थिरकने लगता है. मुकेश ने इस गाने में यह साबित कर दिया कि वो इस तरह के मस्ती वाले गीतों में भी उतने ही पारदर्शी हैं जितने की संजीदे गीतों में. और एक बात इस गाने से जुडी हुई. अगर आप अंताक्षरी खेलने के शौकीन हैं तो आप ने यह ज़रूर महसूस किया होगा की अंताक्षरी में जब भी 'दा' अक्षर से गीत गाने की बारी आती है तो सबसे पहले यही गीत झट से ज़ुबान पर आ जाता है. यही तो है इस गीत की ख़ासीयत. तो सुनिए यह गीत और झूम जाइए बिन पीए. लेकिन याद रहे, कहीं गिर ना जाना.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. १९७० में आई इस फ़िल्म में संजीव कुमार की प्रमुख भूमिका थी.
२. इस महान संगीतकार को इस फ़िल्म के लिए राष्टीय पुरस्कार मिला था.
३. लता मंगेशकर की डेट्स न मिल पाने के कारण फिल्मांकन के लिए संगीतकार ने इस गीत को अपनी आवाज़ में रिकॉर्ड किया था. बाद में इसे लता ने भी गाया.

कुछ याद आया...?

कल की पहेली का सही जवाब दिया एक बार फ़िर मनु जी ने. आप को बधाई.

प्रस्तुति - सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सदर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, August 27, 2008

दर्द को सुरीलेपन की पराकाष्ठा पर ले जाने वाले अमर गायक मुकेश

आज सुबह आपने पढ़ा हृदयनाथ मंगेशकर का संस्मरण 'वो जाने वाले हो सके तो॰॰॰॰' आज हम पूरे दिन मुकेश को याद कर रहे हैं, उनके गाये गीत सुनवाकर, उनसी जुड़ी यादें बाँटकर॰॰॰॰आगे पढ़िए तपन शर्मा 'चिंतक' की प्रस्तुति 'मैं तो दीवाना, दीवाना, दीवाना'


मुकेश के साथ कल्याण जी
चित्र साभार- हमाराफोटोज
वे परिश्रम से कभी गुरेज़ नहीं करते थे. कितनी ही बार री-टेक करो,उन्हें नाराज़ी नहीं होती.कितनी ही बार रिहर्सल के लिये कॉल करो वे तैयार..बस अभी आया.उन्हें अपने परफ़ॉरमेंस से जल्द सेटिसफ़ेक्शन नहीं होता था. बता रहे थे ख्यात संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी के स्व.कल्याणजी भाई. नब्बे के दशक में जब वे लता पुरस्कार लेने इन्दौर आए तो दो दिन का डेरा था मेरे शहर. आयोजन का एंकर होने की वजह से हमेशा से कलाकारों का संगसाथ आसानी से मिलता रहा है सो कल्याणजी भाई से लम्बी बात करने का मौक़ा भी मिल ही गया. एक दिन उनके संगीत सफ़र की चर्चा होती रही, दूसरे दिन गायक-गायिकाओं पर. जब मुकेशजी पर बात आई तो कल्याणजी भाई भावुक हो उठे. मुकेशजी के घर में गुजराती परिवेश भी रहा क्योंकि पत्नी सरल गुजराती थीं (अभी इसी साल सरलबेन का देहांत हुआ है) कल्याणजी भाई बोले हम गुजराती में ही बतियाते और ख़ूब ठहाके लगाते . बहुत हँसमुख थे मुकेश भाई लेकिन जब दर्द भरे गीत की पंक्तियाँ गाने लगते तो सारे आलम का दर्द अपने गायन में उड़ेल देते.

फ़िल्म हिमालय की गोद में का गीत था "मैं तो एक ख़्वाब हूँ..." की रिहर्सल लगभग पूर्णता की ओर आ गई थी. कल्याणजी भाई ने बताया हम लगभग संतुष्ट थे, लेकिन ये लगभग मुकेशजी मेरे और आनंदजी के चेहरे पर पढ़ लिया था. बोले कुछ कमी लग रही है क्या . हमने कहा हाँ गीत का स्टार्ट और बेहतर हो सकता था. मुकेशजी ने कहा तो भाई बताओ न क्या चाहते हो. कल्याणजी ने कहा आप ऐसा स्टार्ट लीजिये जैसे आप मोहम्मद रफ़ी हैं.मुकेशजी ने कहा ऐसा बोलो न .. रिकॉर्डिंग शुरू हुई और क्या लाजवाब गीत बना है याद कीजिये आप. बात यहीं ख़त्म नहीं हो जाती. गाना पूरा होने के बाद मुकेशजी ने रफ़ी साहब को फ़ोन किया रफ़ी भाई मैंने आपका कुछ चुरा लिया. रफ़ी साहब हैरान कहने लगे मैंने एक गीत में आपके स्टाइल में आमद ली है. रफ़ी साहब और मुकेशजी देर तब फ़ोन पर बतियाते रहे. बात बड़ी सादी है, लेकिन सादा तबियत और नेक इंसान मुकेशजी की महानता देखिये कि अपने समकालीन गायक का थोड़ा सा अंदाज़ भी फ़ॉलो किया तो उसे जताया,यहाँ आजकल पूरी की पूरी धुन चुराई जा रही है और फ़िर भी शर्म नहीं है किसी को.

शास्त्रीय संगीत के पेचोख़म से दूर रहने वाले गायक थे मुकेश. एक सुर पर लम्बा टिकना उनके लिये मुमकिन नहीं होता था क्योंकि हर वॉइस कल्चर की अपनी लिमिटेशन तो होती ही है लेकिन मुकेश अपनी इस मर्यादा से ख़ूब वाकिफ़ थे. उन्होनें बंधे हुए मीटर में रहते हुए भावप्रणवता और इमोशन्स पर अपना ध्यान रखा . जब नौशाद साहब के साथ मेला और अंदाज़ के गीत गाए तो आप महसूस करेंगे कि मुकेश जी ने अपने ऊपर चढ़ी सहगल अंदाज़ की केंचुली निकाल फ़ेंकी और पूरे फ़ार्म में आ गए.

मेरा मानना है कि मुकेश सर्वहारा के गायक थे.शर्तिया कह सकता हूँ कि आप-हमसब कम से कम मुकेशजी के गीत तो गुनगुनाते ही हैं. आप नोटिस लीजियेगा कि पारिवारिक अंताक्षरी में जब भी पुराने गीत गुनगुनाए जाते हैं, उसमें मुकेश का रंग गाढ़ा ही नज़र आता है. उनके गीतों की संख्या कम है लेकिन लोकप्रियता के लिहाज़ से मुकेश आज भी सर्वश्रेष्ठ कहे जा सकते हैं.

एक ख़ास बात मुकेश स्मृति-दिवस पर यह बात विशेष रूप से कहना चाहूँगा कि भारतीय रजत-पट के शो-मेन राजकपूर को जन-जन में पहुँचाने में मुकेश का गायन एक महत्वपूर्ण कड़ी है और इसके महत्व को कभी ख़ारिज न किया जा सकेगा.

इस बात का ज़िक्र बहुत कम होता है लेकिन यहाँ ज़रूर करूंगा. फ़िल्म संगीत के लिये जो कुछ मुकेशजी ने किया वह तो अदभुत है ही लेकिन फ़िल्मों से अलहदा श्री रामचरितमानस की पाँच घंटे की ध्वनि-मुद्रिका संचयन मुकेशजी का एक अनोखा कारनामा है भारतीय संस्कृति के लिये.

मुकेश जी की आवाज़ में कसक,दर्द,करूणा,हास्य,आशा-निराशा और श्रंगार रस की अभिव्यक्ति सहजता से उभरती थी लेकिन दर्द में तो वे बेमिसाल थे.वे इंसानियत के तक़ाज़ों की दृष्टि से भी विलक्षण थे.अभी पिछले दिनों उनके पुत्र नितिन से आत्मीय मुलाक़ात हुई तब उन्होने विनम्रता से बताया कि पापा अच्छाइयों का सूर्य थे .उनकी गायकी से मिली छाया से जितना कर पाया कम है लेकिन मैं संतुष्ट हूँ.क्या अगले जन्म में मुकेश बनना चाहेंगे आप, मैने नितिन भाई से पूछा था.तो भावुक होकर बोले मुकेशजी जैसे इंसान दुनिया में दोबारा नहीं आते.मैं अगले जन्म में भी उनका बेटा ही बनना चाहूँगा.

इसमें कोई शक नहीं कि नौशाद,शंकर-जयकिशन, कल्याणजी-आनंदजी,सलिल चौधरी,सचिनदेव बर्मन,रोशन,ह्सरत जयपुरी,शैलेंद्र,साहिर और इंदीवर के गीतों और संगीत को निर्वेवाद रूप से अनमोल कहा जा सकता है लेकिन इन रचनाओं को अमरत्व प्रदान करने काम तो मुकेश ने ही किया यह भी अकाट्य सत्य है.

जीवन का आना-जाना चलता रहेगा. संसार की गति थमने का नाम नहीं लेगी.फूल-पत्तियाँ खिलते रहेंगे,आवाज़े आतीं रहेंगी और संगीत बजता रहेगा लेकिन मुकेश जैसे कोमल स्वर की कमी कभी पूरी न हो सकेगी. संगीतप्रेमी मन हमेशा कहता रहेगा...

ये घाट,तू ये बाट कभी भूल न जाना
ओ जाने वाले, हो सके तो लौट के आना

सुनिए लोक-संगीत से रचा-बसा बम्बई का बाबू फिल्म का एक गीत 'चल री सजनी, अब क्या सोचे?'





पढ़िए हृदयनाथ मंगेशकर का संस्मरण 'ओ जाने वाले हो सके तो॰॰॰'

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