music review 2013 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
music review 2013 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

नए साल पर टी सीरीस का एक संगीतमय तोहफा : "आई लव न्यू ईयर"

टी सीरीस के भूषण कुमार संगीतमयी रोमांटिक फिल्मों के सफल निर्माता रहे हैं. चूँकि इन फिल्मों का संगीत भी दमदार रहता है तो उनके लिए दोहरे फायदे का सौदा साबित होता है. इस साल आशिकी २ और नौटंकी साला की जबरदस्त सफलता के बाद वो हैट्रिक लगाने की तैयारी में थे आई लव न्यू ईयर के साथ. मगर फिल्म की प्रदर्शन तिथि, एक के बाद एक कारणों से टलती चली गयी. पहले यमला पगला दीवाना २ के प्रमोशन के चलते फिल्म का प्रदर्शन अप्रैल-मई से टल कर सितम्बर कर दिया गया. फिर भूषण और फिल्म के नायक सन्नी देओल के बीच कुछ धन राशि के भुगतान को लेकर मामला छिड़ गया. अब जाकर फिल्म को दिसंबर के अंतिम सप्ताह में जारी करने की सहमती बनी है. फिल्म के शीर्षक के लिहाज से भी ये एक सही कदम है. पर अभी तक फिल्म का प्रचार ठंडा ही दिखाई दे रहा है. बहरहाल हम फिल्म के संगीत की चर्चा तो कर ही सकते हैं. 

फिल्म में प्रीतम प्रमुख संगीतकार हैं, मगर एक एक गीत फलक शबीर (नौटंकी साला वाले), और अनुपम अमोद के हिस्से भी आया है, साथ ही पंचम द के एक पुराने हिट गीत को भी एल्बम में जोड़ा गया है. गीत मयूर पुरी, सईद कादरी और फलक शबीर ने लिखे हैं. फिल्म के निर्देशक राधिका राव और विनय सप्रू हैं जिनकी पहली फिल्म लकी - नो टाईम फॉर लव बॉक्स ऑफिस पर भी लकी साबित हुई थी, जिसमें सलमान खान की लोकप्रियता और अदनान सामी के संगीत का बड़ा योगदान था. यानी इस निर्देशक जोड़ी को अच्छे संगीत की पहचान निश्चित ही है और जब साथ हो टी सीरीस जैसे बैनर का तो उम्मीदें बढ़ ही जाती है, आईये देखें कि कैसा है आई लव न्यू ईयर  के संगीत एल्बम का हाल.

गुड नाल इश्क मीठा एक पारंपरिक पंजाबी गीत है जो शादी ब्याह और संगीत के मौकों पर अक्सर गाया बजाया जाता है. इसी पारंपरिक धुन को संगीतकार अनुपम अमोद ने बेहद अच्छे टेक्नो रिदम में डाल कर पेश किया है एल्बम के पहले गीत में, और उतने ही मस्त मौजी अंदाज़ में गाया है बेहद प्रतिभाशाली तोचि रैना ने जिनकी आवाज़ को अलग से पहचाना जा सकता है. आज के दौर में जहाँ नए गायकों की भरमार है ये एक बड़ी उपलब्धि है. गीत निश्चित ही कदम थिरकाने वाला है. मयूर पुरी ने 'पंच' को वैसा ही रखा है और उसके आप पास अच्छे शब्द रचे हैं.

तुलसी कुमार और सोनू निगम साथ आये हैं अगले गीत जाने न क्यों/आओ न में. धीमी शुरुआत के बाद गीत अच्छी उड़ान भरता है और एक बार श्रोताओं को अपनी जद में लेने के बाद अपनी पकड़ ढीली नहीं पड़ने देता. रिदम में तबले का सुन्दर प्रयोग है अंतरे से पहले सेक्सोफोन का पीस भी शानदार है. सोनू पूरे फॉर्म में हैं और तुलसी की आवाज़ भी उनका साथ बखूबी देती है. सैयद कादरी के शब्द बेहद अच्छे हैं. बहुत ही खूबसूरत युगल गीत है जो कहीं कहीं प्रीतम के जब वी मेट दिनों की यादें ताज़ा कर देती हैं.

फलक शबीर के बारे में हम पहले भी काफी कुछ कह चुके हैं. उनका लिखा, स्वरबद्ध किया और बहतरीन अंदाज़ में गाया गीत जुदाई एल्बम का खास आकर्षण है. धुन में कुछ खास नयेपन के अभाव में भी गीत टीस से भर देता है. इसे एक ब्रेक अप गीत माना जा सकता है. और शायद एक ब्रेक अप सिचुएशन पर पहली बार कोई गीत बना है. गीत सुनते हुए आप महसूस कर सकते हैं दो छूटते हुए हाथ, चार नम ऑंखें और बहुत सा दर्द. गीत का एक अनप्लग्ड संस्करण भी है जो सुनने लायक है.

तुलसी कुमार एक बार फिर सुनाई देती है, इस बार शान के साथ गीत हल्की हल्की में. ये एक हंसी मजाक वाला गीत है. वास्तव में इस एल्बम के सभी गीत मेरे लिए एक सुखद आश्चर्य ही हैं. हर गीत को सुनने से पहले मेरी उम्मीदें बिलकुल शून्य थी, मगर हर गीत को सुनना एक हैरान करने वाला अनुभव साबित हुआ हर बार. ये भी एक बेहद सुरीला गीत है, जहाँ संयोजन में सधी हुई सटीकता है. दोनों गायकों की परफेक्ट ट्यूनिंग जानदार है और मयूर पुरी के शब्द भी ठीक ठाक है.

पंचम ने फिल्म सागर में जो थीम पीस रचा था, टी सीरिस ने उसी धुन को लेकर एस पी बालासुब्रमण्यम से गवाया था बरसों पहले आज मेरी जान का नाद. इसी रचना को एक बार फिर से जिंदा किया गया है एल्बम में. मौली दवे की नशीली आवाज़ में इस रचना को सुनना पंचम की सुर गंगा में एक बार फिर उतरने जैसा है. खुशी की बात है कि गीत की मूल सरंचना से अधिक छेड छाड नहीं की गयी है.

आई लव न्यू ईयर एक अच्छी एल्बम है जहाँ कोई भी गीत निराश नहीं करता. ये गीत धीरे धीरे आपके दिल में उतर जायगें और लंबे समय तक वहीँ घर बना लेंगें.

एल्बम के बहतरीन गीत - गुड नाल इश्क, जुदाई, आओ न, आजा मेरी जान 
हमारी रेटिंग - ४.४  .   

  

शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

'गन्दी बात' में भी बहुत कुछ अच्छा है प्रीतम दा के साथ


बॉलीवुड में दक्षिण की सफल फिल्मों का रिमेक जोरों पे जारी है. सभी बड़े सुपर स्टार जैसे सलमान, अजय देवगन, अक्षय कुमार आदि इन फिल्मों से सफलता का स्वाद चख चुके हैं, अब शाहिद कपूर भी आ रहे हैं रेम्बो राजकुमार बनकर....ओह माफ कीजियेगा आर...राजकुमार बनकर. फिल्म के नाम में रेम्बो का इस्तेमाल वर्जित (कोपीराईट कारणों से) होने के कारण फिल्म के नाम में ये बदलाव करना पड़ा. फिल्म में संगीत है हिट मशीन प्रीतम का, आईये नज़र डालें इस फिल्म के एल्बम पर, और जानें कि संगीत प्रेमियों के लिए क्या है इस एक्शन कोमेडी फिल्म के गीतों में. 

एल्बम के पहले तीन गीत पूरी तरह से दक्षिण के तेज रिदम वालों गीतों से प्रेरित हैं. इनमें प्रीतम की झलक कम और दक्षिण के संगीतकारों की छवि अधिक झलकती है. पहला गीत गन्दी बात एक मस्त मलंग गीत है जिसकी ताल और धुन इतनी जबरदस्त है कि सुनकर कोई भी खुद को कदम थिरकाने से नहीं रोक पायेगा. अनुपम अमोद के शब्द चटपटे हैं और कुछ पारंपरिक श्रोताओं को आपत्तिजनक भी लग सकते हैं. मिका की आवाज़ इस गीत के लिए एकदम सही चुनाव है पर गीत का सुखद आश्चर्य है कल्पना पटोवरी की जोशीली आवाज़ जिसने मिका को जबरदस्त टक्कर दी है. निश्चित ही एक हिट गीत. 

नए गायक नक्श अज़ीज़ ने खुल कर गाया है अगला गीत साडी के फाल से गायिका अन्तरा मित्रा के साथ. गीत की सरंचना बहुत खूब है, जहाँ गायक के हिस्से में मुखड़े की धुन और अंतरा पूरा का पूरा गायिका ने निभाया है. धुन मधुर है और रिदम भी बहुत ही कैची है. शब्द अच्छे हो सकते थे, पर शायद ही इसकी कमी गीत की लोकप्रियता पर असर डालेगी. हाँ मगर बेहतर शब्द इसे एक यादगार गीत में तब्दील अवश्य कर देते. गीत के अंत में नक्श की हंसी खूब जची है. 

दक्षिण की धुनों से प्रेरित तीसरा गीत मत मारी में कुणाल गांजावाला की आवाज़ सुनाई दी है बहुत समय के बाद, अगर कहें कि ये गीत अगर इतना मस्त बन पाया है तो इसकी सबसे बड़ी वजह कुणाल और गायिका सुनिधि की आवाजें हैं तो गलत नहीं होगा. खास तौर पर सुनिधि ने अपना हिस्सा इतनी खूबी से गाया है कि क्या कहने. कहीं कहीं तो वो हुबहू फिल्म की नायिका सोनाक्षी की ही आवाज़ में ढल गयीं हैं. वाकई जैसे कि गीत में कहा गया है कि मुझे तेरी गाली भी लगती है ताली...सुनिधि ने गलियां भी सुरीले अंदाज़ में गायीं हैं. वैसे गीत के अंत में सोनाक्षी अपने खास अंदाज़ में खामोश भी कहती है, जो गीत का एक और खास आकर्षण बन गया है. इस गीत की भी सफलता तय है. 

अरिजीत सिंह का रोमांटिक अंदाज़ सुनाई देता है अगले गीत धोखा धड़ी में. ये एल्बम का पहला और एकमात्र गीत है जहाँ लगता है कि ये प्रीतम की एल्बम है. गीत में प्रीतम की छाप है, निलेश मिश्रा के शब्द बेहद अच्छे हैं. एल्बम के तेज तड़क गीतों में ये गीत कुछ कम सुना रह जाए तो आश्चर्य नहीं होगा. 

अंतरा मित्रा का एक अलग अंदाज़ नज़र आता है कद्दू कटेगा गीत में. एकबार तो लगेगा कि ये ममता शर्मा हैं मायिक के पीछे. आशीष पंडित का लिखा ये गीत फिर एक बार दक्षिणी गीतों से प्रेरित है, पर एल्बम में शामिल इस श्रेणी के अन्य गीतों के मुकाबले ये गीत बेहद कमजोर है. हाँ इसका फिल्मांकन जरूर धमाल होने वाला है. 

एल्बम के गीत लंबे समय तक बेशक लोगों को याद न रहें, पर इनका हिट फ्लेवर फिल्म को सफलता की राह अवश्य दिखा सकता है. संक्षेप में कहें तो आर...राजकुमार एक मास अपील एल्बम है जो क्लब पार्टियों में तो शूम मचायेगा ही, गली मोहल्लों के उत्सवों में भी जमकर बजेगा. 

एल्बम के सर्वश्रेष्ठ गीत - गन्दी बात, साडी के फाल से, मत मारी, धोखा धड़ी 
हमारी रेटींग - ४.२      

शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

सोनू निगम ने सुर जोड़े 'सिंह साहेब' की ललकार में

न्नी देओल निर्देशक अनिल शर्मा के साथ जोड़ीबद्ध होकर लौटे हैं एक बार फिर, जिनके साथ वो ग़दर -एक प्रेम कथा, और अपने जैसी हिट संगीतमयी फ़िल्में दे चुके हैं. सिंह साहेब द ग्रेट में अनिल ने चुना है सोनू निगम को जो इस फिल्म के साथ बतौर संगीतकार फिल्मों में अपनी नई पारी शुरू कर रहे हैं, पार्श्वगायन में अपने लिए एक खास मुकाम बना लेने के बाद सोनू ने हालाँकि अपनी एल्बम क्लासीकली माईल्ड में संगीत निर्देशन का जिम्मा उठाया था पर सिंह साहेब उनकी पहली फिल्म है इस नए जिम्मे के साथ.

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सोनू ने फिल्म जगत में कदम रखा था बतौर बाल कलाकार फिल्म बेताब से, जो कि सन्नी देओल की भी पहली फिल्म थी बतौर नायक. अब इसे नियति ही कहेंगें कि सोनू की इस नई कोशिश में भी उन्हें साथ मिला है सन्नी पाजी का. एल्बम में कुल ५ गीत हैं जिसमें एक गीत अतिथि संगीतकार आदेश श्रीवास्तव का रचा हुआ है, आईये एक नज़र डालें इस ताज़ा एल्बम में संकलित गीतों पर. 

शीर्षक गीत में सोनू ने अपने 'कम्फर्ट ज़ोन' से बाहर आकर पंजाबी लोक गीतों के गायकों के भांति ऊंची पिच पर लेकर गाया है और उनका ये प्रयास बहुत ही कामियाब और सुरीला रहा है. सोनू की बहन तीशा निगम ने अपना हिस्सा बहुत ही खूबी से निभाया है. दोनों की गायकों का विरोधाभासी अंदाज़, लोक सुरों से उपजी धुन और सटीक शब्द इस गीत को बेहद खास मुकाम दे देते हैं. 

पंजाबी फ्लेवर की बात हो और जिक्र न हो दारु का तो बात कुछ अधूरी लगती है. दारु बंद कल से एक ऐसा फ्रेस है जो हर शराबी अपने अंतिम जाम के साथ बोलता है और अलगी महफ़िल के सजने तक वो इस वादे को निभाता भी है....खैर वापस आते गईं गीत पर, जहाँ गीतकार ने इस फ्रेस को हुक बनाकर अच्छा खाका रचा है. एक बार फिर सोनू गायकी में ऊर्जा से भरपूर रहे हैं, वास्तव में पूरी एल्बम में उन्होंने खुद को नए पिचों पर आजमाया है, कहा जा सकता है संगीत निर्देशन में उनकी प्रेरणा अपने भीतर के गायक को विविध आयामों में देखना ही है.

पान और पनवाडी का जिक्र लाकर उत्तर पूर्व के दर्शकों /श्रोताओं को रिझाने के लिए बना है आईटम गीत पलंग तोड़ जिसे आदेश श्रीवास्तव ने स्वरबद्ध किया है और गाया भी है प्रमुख गायिका सुनिधि चौहान के साथ मिलकर. गीत इन दिनों चल रहे आईटम गीतों सरीखा ही है. बहुत दिनों तक इसका स्वाद टिका रहेगा, कहना मुश्किल है. 

जब मेहंदी लग लग जाए में सोनू और श्रेया की सदाबहार जोड़ी एक साथ आई है एक सुरीले शादी गीत के साथ. गीत में पंजाबी शादियों की महक भी है और पर्याप्त मस्ती का इंतजाम भी. कदम थिरकाते बीट्स और शब्द भी सार्थक हैं. निश्चित ही एल्बम के बेहतर गीतों में से एक. सोनू ने एल्बम में एक हीर भी गाई है, पारंपरिक हीर का सुन्दर प्रयोग श्रोता सुन चुके हैं फिल्म प्रतिज्ञा के सदाबहार उठ नींद से मिर्ज़ा गीत में. प्रस्तुत हीर को सुनकर उस यादगार गीत की यादें अवश्य ताज़ी हो जाती है पर यहाँ अच्छे शब्दों के अभाव में वो माहौल नहीं बन पाया है जिसकी अपेक्षा थी. 

सिंह साहेब द ग्रेट का संगीत सुरीला अवश्य है पर नयेपन का अभाव है. एक दो गीतों को छोड़ दिया जाए तो बाकी गीतों में श्रोताओं को बाँध के रखने का माद्दा नहीं है. फिर भी सोनू की संगीतकार और गायक की दोहरी भूमिका को सराहा जा सकता है. उम्मीद करेंगें कि वो आने वाले दिनों में कुछ और बेहतर गीतों का तोहफा अपने श्रोताओं को देंगें. 

एल्बम के बहतरीन गीत - सिंह साहेब द ग्रेट, जब मेहंदी लग लग जाए, दारू बंद कल से
हमारी रेटिंग - ३.४      

  

शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

'चिंगम' चबा के आया गोरी तेरे प्यार में

संगीतकार जोड़ी विशाल शेखर का अपना एक मुक्तलिफ़ अंदाज़ है. उनके गीतों में नयापन भी होता है और अपने ही किस्म की शोखी भी. अनजाना अनजानी, आई हेट लव स्टोरी और स्टूडेंट ऑफ द ईयर के संगीत में हमें यही खूबी बखूबी नज़र आई थी. इस साल आई चेन्नई एक्सप्रेस में उनके गीत बेशक से कामियाब रहे पर उन्हें हम विशाल शेखर के खास अंदाज़ से नहीं जोड़ सकते. इसी कमी को पूरा करने के लिए ये जोड़ी लौटी है अपनी नई एल्बम गोरी तेरे प्यार में के साथ. आईये देखें क्या क्या लाये हैं विशाल शेखर अपने संगीत पिटारे में इस बार. 

आइटम रानी ममता शर्मा और मिका सिंह की जोशीली आवाज़ में आया है पहला गीत टून।  रिदम ऐसी है जो क़दमों को थिरकने पर मजबूर कर दे. ममता और मिका की आवाजों में पर्याप्त मस्ती और जोश है. निश्चित ही विशाल शेखर का निराला रूप जमकर बिखरा है इस शादी गीत में. 

अदिति सिंह शर्मा और सनम पुरी है मायिक के पीछे, पार्टी गीत धत तेरे की में. शब्द कुछ आपत्तिजनक अवश्य हैं और गीत की मस्ती और रिदम जबरदस्त है. पार्टी का मूड हो, मन और तेवर कुछ बागी से हों तो ये नया गीत लगाएं और जम कर नाचिये. एक और विशाल शेखर ट्रेड मार्क गीत. 

चिंगम गीत एल्बम का सबसे सधा हुआ गीत है जिसमें शंकर महादेवन की चटपटी आवाज़ को बहुत अच्छे से टक्कर दी है श्यामली खोलगडे ने. गीत का आरंभ जिस पीस से होता है उसी से खत्म भी होता है, ये बहुत ही बढ़िया पीस है, गीत का संयोजन भी एल्बम के अन्य गीतों से बेहतर है. जल्दी ही ये गीत श्रोताओं की जुबाँ पे चढा होगा इसमें कोई शक नहीं. 

कमाल खान और नीति मोहन की सुरीली आवाजों में तेरे नैना गीत बढ़िया है पर कुछ नया पेश नहीं करता। राहत मार्का इस सूफी गीत को कमाल ने बेशक बहुत बढ़िया निभाया है. नीति बहुत बाद में गीत का हिस्सा बनती है, पर इस गीत को कमाल का ही कमाल माना जाना चाहिए।

श्रुति पाठक और नितीश कदम का गाया दिल डफ्फर एक बार फिर विशाल शेखर के चिर परिचित अंदाज़ का गीत  है जहाँ नितीश की दबी आवाज़ पर श्रुति की मिठास भरी खुली खुली आवाज़ का विरोधाभास खूब जचता है. गीत का संयोजन सरल और मनभावन है. एल्बम के ने गीतों की तुलना में इस गीत के शब्द बेहतर हैं. 

एक बेहद अलग अंदाज़ का गुज्जू गीत है मोटो घोटालो, जहाँ शब्द चटपटे हैं और धुन नटखटी है. सुखविंदर की आवाज़ गीत की जान है. गुजराती शब्द का तडका बेहद सुहाता है. एल्बम में विशाल शेखर की हर एल्बम की तरह एक मेशअप भी है जो ठीक ठाक है पर उतना बढ़िया नहीं है जितना स्टूडेंट ऑफ द ईयर का था. बहरहाल एक बार फिर विशाल शेखर ने अच्छी वापसी की है. अन्विता गुप्तन, कौसर मुनीर, और कुमार के शब्द कुछ अनूठे न सही पर शायद फिल्म की कहानी की जरुरत अनुरूप हैं. 

एल्बम के बेहतरीन गीत - चिंगम, धत तेरे की, दिल डफ्फर
हमारी रेटिंग - ४/५         
      

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

बुलट राजा आये हैं तमंचे पे डिस्को कराने

त्योहारों का मौसम गर्म है, यही वो समय होता है जब सभी नाम चीन सितारे जनता के दरबार में उतरते हैं अपने अपने मनोरंजन का पिटारा लेकर.  इस बार दिवाली पर हृतिक क्रिश का चोगा पहनेगें तो क्रिसमस पर अमीर धूम मचाने की तैयारी कर रहे हैं. शाहरुख, सलमान, अक्षय और अजय देवगन कुछ छुट्टी के मूड में थे तो उनकी कमी को भरने मैदान में उतरेगें शाहिद (आर...राजकुमार), इमरान (गोरी तेरे प्यार में) जैसे नए तीरंदाज़ तो सैफ (बुलट राजा) और सन्नी देओल (सिंह साहेब द ग्रेट) जैसे पक्के खिलाड़ी भी अपना जौहर लेकर दर्शकों के मनोरजन का पूरा इंतजाम रखेंगें. इन सभी फिल्मों के संगीत की हम बारी बारी चर्चा करेगें, तो चलिए आज जिक्र छेड़ते हैं सैफ अली खान और सोनाक्षी सिन्हा की बुलट राजा के सगीत की.

तिन्ग्मान्शु धुलिया पान सिंह तोमर और साहेब बीवी और गैंगस्टर जैसी लीक से हटकर फिल्मों के लिए जाने जाते हैं, पर जहाँ तक बुलट राजा का सवाल है, ऐसा लग रहा है कि ये बॉलीवुड व्यावसायिक फिल्मों की तरफ मसालों से भरी पूरी होने वाली है. संदीप नाथ, कौसर मुनीर, शब्बीर एहमद और रफ़्तार के हैं शब्द और प्रमुख संगीतकार हैं साजिद वाजिद, एक गीत देकर अतिथि संगीतकार की भूमिका निभा रहे हैं मशहूर पॉप बैंड RDB. 

बुलट राजा की संगीत एल्बम RDB के दनदनाते तमंचे पे डिस्को से खुलता है. गीत में निंदी कौर भी हैं RDB के साथ. गीत में पर्याप्त मस्ती है और रिदम भी कदम थिरकाने वाला है. शब्द बेतरतीब हैं जिनका जिक्र जरूरी नहीं है, गीत का उद्देश्य कदम थिरकाना और मौज मस्ती लुटाना है जिसमें गीत कामियाब है. 

श्रेया घोषाल की मधुर आवाज़ है गीत सामने है सवेरा में. गीत बेहद मधुर है, और साजिद वाजिद की चिरपरिचित छाप लिए हुए है. पुरुष स्वर है वाजिद की इस युगल गीत में. गीत में बोन्नी चक्रवर्ति का गाया एक छोटा सा बांग्ला पीस भी है जिसके साथ श्रेया के स्वर बेहद खूबसूरती से घुलमिल गए हैं. कह सकते है कि ये एल्बम का सबसे यादगार गीत होने वाला है. 

बहुत दिनों बाद सुनाई दिए नीरज श्रीधर, जो इन दिनों प्रीतम कैम्प से कुछ गायब से हैं. गीत है हरे गोविंदा हरे गोपाला. नीरज का ठप्पा है पूरे गीत में. यूँ भी वो सैफ के लिए बहुत से हिट गीतों में पार्श्व गायन कर चुके हैं. शब्द चुटीले हैं और धुन भी बेहद कैची है. गीत का फिल्मांकन इसे लोकप्रिय बनाने में मदद करेगा.  

ममता शर्मा के लेकर एक और मुन्नी सरीखा आईटम रचने की कोशिश की है साजिद वाजिद ने डोंट टच माई बॉडी में. ममता ने जरूरी उन्ह आह भरा है गीत में (कन्फुज शब्द का उच्चारण बेहद चुटीला लगता है). पर शब्दों की तुकबंदी बेअसर है, धुन और संयोजन में भी कोई नयापन नहीं मिलता. ममता जैसी गायिका से कुछ और भी तरह के गीत गवा लीजिए साजिद वाजिद भाई, और मुन्नी के हैंगओवर से बहार आ जाईये. 

कीर्ति सगाथिया ने सुखविंदर के अंदाज़ में गाया है बुलट राजा का शीर्षक गीत. गीत की रिदम और ताल बेशक जबरदस्त है. पर गीत साजिद वाजिद के दबंग और दबंग २ के शीर्षक गीतों से कुछ अलग और बेहतर पेश नहीं करता. हुर्र...चुर्र मुर्र...सब मसाले ज्यों के त्यों मौजूद हैं यहाँ भी. 

सटाके ठोको फिर एक ऐसा गीत है जहाँ बस एक पंच शब्द युग्म पर गीत परोसा गया है. कीर्ति सगाथिया ने अच्छा निभाया है गीत का. शब्दों में भी यहाँ कुछ विविधता है, और वाजिद वाजिद ने संयोजन भी सिचुएशन के हिसाब से बढ़िया किया है. गीत परदे पर बेहद बढ़िया लगेगा, हाँ फिल्म के जाने के बाद इसे याद रखा जायेगा या नहीं, कहना मुश्किल है.

एल्बम के बहतरीन गीत - सामने है सवेरा, तमंचे पे डिस्को, हरे गोविदा हरे गोपाला...
हमारी रेटिंग - ३.४/५ 

शुक्रवार, 18 अक्तूबर 2013

राम चाहे सुरों की "लीला"

निर्देशक से संगीतकार बने संजय लीला बंसाली ने 'गुज़ारिश' में जैसे गीत रचे थे उनका नशा उनका खुमार आज तक संगीत प्रेमियों के दिलो-जेहन से उतरा नहीं है. सच तो ये है कि इस साल मुझे सबसे अधिक इंतज़ार था, वो यही देखने का था कि क्या संजय वाकई फिर कोई ऐसा करिश्मा कर पाते हैं या फिर "गुजारिश" को मात्र एक अपवाद ही माना जाए. दोस्तों रामलीला, गुजारिश से एकदम अलग जोनर की फिल्म है. मगर मेरी उम्मीदें आसमां छू रही थी, ऐसे में रामलीला का संगीत सुन मुझे क्या महसूस हुआ यही मैं आगे की पंक्तियों में आपको बताने जा रहा हूँ. 

अदिति पॉल की नशीली आवाज़ से खुलता है गीत अंग लगा दे. हल्की हल्की रिदम पर मादकता से भरी अदिति के स्वर जादू सा असर करती है उसपर शब्द 'रात बंजर सी है, काले खंजर सी है' जैसे हों तो नशा दुगना हो जाता है. दूसरे अंतरे से ठीक पहले रिदम में एक तीव्रता आती है जिसके बाद समर्पण का भाव और भी मुखरित होने लगता है. कोरस का प्रयोग सोने पे सुहागा लगता है. 

धूप से छनके उतरता है अगला गीत श्रेया की रेशम सी बारीक आवाज़ में, सुरों में जैसे रंग झलकते हैं. ताल जैसे धडकन को धड्काते हों, शहनाई के स्वरों में पारंपरिक स्वरों की मिठास...रोम रोम नापता है, रगों में सांप सा है....सरल मगर सुरीला और मीलों तक साया बन साथ चलता गीत. 

संजय की फिल्मों में गायक के के एक जरूरी घटक रहते हैं पर जाने क्यों यहाँ उनकी जगह उन्होंने चुना आदित्य नारायण को. शायद किरदार का रोबीलापन उनकी आवाज़ में अधिक जचता महसूस हुआ होगा. आदित्य का गाया पहला गीत है इश्कियाँ डीश्कियाँ. फिल्म के दो प्रमुख किरदारों के बीच प्रेम और नफ़रत की जंग को गीत के माध्यम से दर्शाता है ये गीत. 

अरिजीत सिंह की रूहानी आवाज़ में एक और दिल को गहरे तक छूता गीत मिला है श्रोताओं को लाल इश्क में. आरंभिक कोरस को सुनकर एक सूफी गीत होने का आभास होता है मगर जैसे ही अरिजीत की आवाज़ मिलती है गीत का कलेवर बदल जाता है. रिदम ऊपर के सभी गीतों की ही तरह लाजवाब और संयोजन बेमिसाल. शब्द करीने से चुने हुए और गायिकी गजब की. जब अरिजीत 'बैराग उठा लूँ' गाते हैं तो उनकी आवाज़ में भी एक बैराग उभर आता है. 

शैल हडा तो जैसे लगता है अपना सर्वश्रेष्ठ संजय की धुनों के लिए ही बचा कर रखते हैं. पारंपरिक गुजराती लोक धुन की महक के बाद शैल की कशिश भरी आवाज़ में लहू मुँह लग गया में नफ़रत को प्रेम में बदलते उन नाज़ुक क्षणों की झनकार है. धुन कैची है और जल्द ही श्रोताओं के मुँह लग जायेगा इसमें शक नहीं. गीत के अंतरे खूबसूरती से रचे गए हैं. 

अगले दो गीत फिल्म की गुजरती पृष्भूमि को उभारते हुए हैं मोर बनी थन्घट करे अधिक पारंपरिक है और लोक गायकों की आवाज़ में बेहद जचता है. वहीँ नगाडा संग ढोल में हम दिल दे चुके सनम की ढोल बाजे की झलक होने के बावजूद गीत अपनी एक अलग छाप छोड़ता है. श्रेया की आवाज़ गीत का खास आकर्षण है. 

शैल को एक और रूहानी गीत दिया है संजय ने पूरे चाँद की ये आधी रात है में, पहले गीत से अधिक जटिल गीत है ये पर शैल ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी है. हाँ पर मुझे यहाँ के के की कमी जरा सी खली. गीत में ठहराव है गजब का और गति भी है चढ़ते ढलते चाँद सी. अनूठा विरोधाभास है गीत में. बार बार सुनने को मन हो जाए ऐसा.

रामलीला के ठेठ अंदाज़ में शुरु होता है राम चाहे लीला गीत. अक्सर रामलीला में पर्दा गिरने और उठने के बीच कुछ गीत परोसे जाते हैं मनोरंजन के लिए. इन्डियन आइडल से चर्चा में आई भूमि त्रिवेदी को सौंपा संजय ने इस मुश्किल गीत को निभाने का जिम्मा. यकीं मानिये भूमि ने इंडस्ट्री में धमाकेदार एंट्री कर दी है इस गीत के साथ. यहाँ शब्द भी काफी ठेठ हैं. राम चाहे लीला चाहे लीला चाहे राम....देखे तो सरल मगर गहरे तक चोट करते शब्द हैं. जबरदस्त गीत. 

अंतिम गीत राम जी की चाल देखो में रामलला की झाँकी का वर्णन है, अगर कोई भी और संगीतकार होते तो आज के चलन अनुसार इस गीत के लिए मिका को चुनते. मगर यही तो बात है संजय में जो उन्हें सब से अलग करती है. उन्होंने आदित्य पर अपना विश्वास कायम रखा और आदित्य ने कहीं भी गीत की ऊर्जा को कम नहीं होने दिया. और तो और उनके भाव, ताव सब उत्कृष्ट माहौल को रचने में जमकर कामियाब हुए हैं यहाँ. एक धमाल से भरा गीत है ये जिसमें दशहरे का जोश और उत्सव तो झलकता ही है किरदारों के बीच की आँख मिचौलो भी उभरकर सामने आती है.       

कोई बेमतलब के रीमिक्स नहीं. बेवजह की तोड़ मरोड़ नहीं गीतों में. सीधे मगर जटिल संयोजन वाले, मधुर मगर सुरों में घुमाव वाले, मिटटी से जुड़े १० गीतों की लड़ी लेकर आये हैं संजय अपने इस दूसरे प्रयास में. जब उम्मीदें अधिक होती है यो संभावना निराशा की अधिक होती है पर खुशी की बात है कि बतौर संगीतकार संजय लीला बंसाली में वही सूझ बूझ, वही आत्मीयता, वही समर्पण नज़र आता है जो एक निर्देशक के रूप में वो बखूबी साबित कर चुके हैं. ये एक ऐसी एल्बम है जिस पर फिल्म की सफलता असफलता असर नहीं डाल सकती. रामलीला सभी संगीत प्रेमियों के लिए इस वर्ष के सर्वोत्तम तोहफों में से एक है. अवश्य सुनें और सुनाएँ. गीतकार सिद्धार्थ गरिमा को भी हमारी टीम की विशेष बधाई. 

एल्बम के बहतरीन गीत - राम जी की चाल, राम चाहे लीला,  पूरे चाँद की आधी रात है, लहू मुँह लग गया, लाल इश्क, अंग लगा दे, धूप से छनके 

हमारी रेटिंग - ४.९/५ 

    


शुक्रवार, 4 अक्तूबर 2013

सुरों की मशाल लाया सुपर हीरो "क्रिश 3"

कोई मिल गया और क्रिश की कामियाबी ने भारतीय फिल्म परदे को दिया है, सुपरमैन स्पाईडरमैन सरीखा एक सुपर हीरो जो दर्शकों में, विशेषकर बच्चों में ख़ासा लोकप्रिय है, इसी लोकप्रियता को अपने अगले मुकाम तक ले जाने के लिए निर्देशक राकेश रोशन लेकर आये हैं क्रिश ३. राकेश की अब तक की सभी फिल्मों में उनके भाई राजेश रोशन का ही संगीत रहा है और इस परंपरा का निर्वाह क्रिश ३ में भी हुआ है. इससे पहले कि फिल्म, वर्ष २०१३ में आपकी दिवाली को जगमगाए आईये देखें फिल्म का संगीत क्या ऐसा है जिसे आप चाहें कि गुनगुनाएं. 

देसी सुपर हीरो क्रिश को अपने पहले संस्करण में कोई थीम गीत नहीं मिला था, तो चलिए इस कमी को पूरा कर दिया है इस एल्बम में. क्रिश का शीर्षक गीत ममता शर्मा की आवाज़ में है जिसमें खुद राजेश रोशन और अनिरुद्ध भोला ने बैक अप स्वरों का रंग मिलाया है. आखिरकार लगभग दो सालों तक मात्र आईटम गीतों की अपनी आवाज़ देने के बाद किसी बॉलीवुड संगीतकार ने ममता से कुछ अलग गवाया है, और उम्मीद के अनुरूप ममता ने गीत के साथ पूरा न्याय किया है. हाँ क्रिश जैसे सुपर हीरो के लिए कुछ इससे बेहतर गीत भी हो सकता था. 

शांति  के मसीहा, यानी हमारे बापू महात्मा गांधी जी का जन्म मास है ये, और इसे इत्तेफाक ही कहिये कि उनके प्रिय भजन रघुपति राघव वर्ष का २०१३ में बॉलीवुड ने जम कर इस्तेमाल किया, कभी फिल्म के प्रमुख गीत के रूप में (सत्याग्रह) तो कभी पार्श्व संगीत के रूप में (जंजीर). क्रिश ३ में भी इस भजन को एक कदम थिरकाने वाले गीत में तब्दील कर पेश किया गया है. यहाँ मैं गीतकार संगीतकार को विशेष बधाई देना चाहूँगा जिन्होंने भजन के प्रमुख शब्द युग्म को बेहद सफाई से अपने गीत में ढाला है. धुन जुबाँ पे चढ़ने वाली है और नीरज श्रीधर तो ऐसे गीतों के उस्ताद माने जाते हैं, यूँ बीते कुछ दिनों से वो अपने मेंटर प्रीतम के संगीत निर्देशन में सुनाई नहीं पड़े हैं. पर इस झुमाने वाले गीत के रूप में उन्हें साल का एक हिट गीत तो मिल ही गया है. 

एल्बम  की एक और बड़ी खासियत है कि इसके दो गीतों में अलीशा चिनॉय की नशीली आवाज़ का इस्तेमाल हुआ है. अलीशा देश की पहली पोप डी'वा हैं और उनकी आवाज़ में वही कशिश, वही कसक आज भी बरकरार है. गीत दिल तू ही बता में उनके साथ हैं और एक जबरदस्त गायक जुबीन गर्ग. गीत की रिदम और इंटरल्यूड गजब के हैं. अच्छा और पैशनेट गीत है जो एक दो बार सुनने के बाद ही शायद आपको पसंद आये, पर गीत की मिठास लंबे समय तक आपके साथ रहेगी. 

अलीशा  की आवाज़ में दूसरा गीत यू माई लव भी एक युगल गीत है जिसमें उन्हें साथ मिला है आज के सबसे सफल गायकों में से एक मोहित चौहान का. गीत कैची है और पति पत्नी की नोक झोंक में बुने शब्द माहौल को हल्का फुल्का बनाते हैं. अलीशा की आवाज़ एक बार फिर गीत की जान है. गीत का फिल्मांकन अगर अच्छा हुआ तो ये गीत जल्दी ही टॉप चार्ट पे होगा. 

सोनू निगम और श्रेया के युगल स्वरों में है क्रिश का दूसरा थीम गीत जो अधिक पारंपरिक है शब्द और संगीत दोनों लिहाज में. गोड अल्लाह और भगवान में देश के सच्चे हीरो की कल्पना की गयी है. उद्देश्य अच्छा है पर गीत में कोई नयापन नहीं मिलता. कुल मिलाकर क्रिश में ५ गीत हैं दो गीतों को अलीशा से संभाल लिया है. एक गीत में गाँधी जी का मंत्र काम कर गया और दो थीम गीत भी बच्चों को पसंद आयेंगें. यूँ भी फिल्म संगीत से अधिक अपने स्पेशल एफ्फेक्ट्स पर अधिक केंद्रित है. ऐसे में एक औसत एल्बम भी फिल्म के लिए काफी होगी जो राजेश रोशन की एल्बम निश्चित ही है. 

एल्बम के सर्वश्रेष्ठ गीत - रघुपति राघव, यू माई लव, दिल तू ही बता 
हमारी रेटिंग - ३.५

संगीत समीक्षा - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी 
 
   

शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

पूरी रात पार्टी का इंतजाम लेकर आया है 'बॉस'

क्षय कुमार अपने खिलाड़ी रूप में फिर से लौट रहे हैं फिल्म बॉस के साथ. लगता है उन्हें हनी सिंह का साथ खूब रास आ रहा है. तभी तो पूरी एल्बम का जिम्मा उन्होंने हनी सिंह के साथ मीत ब्रोस अनजान को सौंपा है. फिल्म हिट मलयालम फिल्म पोखिरी राजा का रिमेक है, यहाँ अक्षय हरियाणा के पोखिरी यानी टपोरी बने हैं. आईये देखें इस बॉस को कैसे कैसे गीत दिए हैं हनी सिंह ने.

शीर्षक गीत बॉस को बखूबी परिभाषित करता है. हनी सिंह का हरियाणवी तडका अच्छा जमा है. गीत में पर्याप्त ऊर्जा और जोश है. शब्द एवें ही है पर शायद जानकार ऐसा रखा गया है.

दक्षिण के जाने माने संगीतकार पी ए दीपक के मूल गीत अपदी पोडे पोडे का हिंदी संस्करण है अगला गीत हम न छोड़े तोड़े, जिसे पूरे दम ख़म से गाया है विशाल ददलानी ने. शब्द अच्छे बिठाए गए है, पर मूल गीत इतनी बार सुना जा चुका है कि गीत कुछ नया सुनने का एहसास नहीं देता. दूसरे अंतरे से पहले अक्षय से बुलवाए गए संवाद बढ़िया लगते हैं.

सोनू निगम इन दिनों बेहद कम गीत गा रहे हैं ऐसे में किसी अच्छे गीत में उन्हें सुनना वाकई सुखद लगता है. एल्बम के तीसरे गीत पिता से है नाम तेरा एक भाव प्रधान गीत है जिसमें क्लास्सिकल और सूफी अंदाज़ को भी घोला गया है.

एल्बम का सबसे तारो ताज़ा और कदम थिरकाने वाला गीत है पार्टी ऑल नाईट. हालंकि शब्द खासे आपत्तिजनक हैं पर ठेठ हरियाणवी अंदाज़ का ये गीत हनी सिंह के मशहूर स्टाइल का है. कौन कहता है कि जट्टां दी भाषा लट्टमार होती है. सुरों में पिरो दो सब कुछ सुरीला ही सुनाई देता है. बेशक हनी सिंह के नाम से बहुत से लोग नाक भौ चढा लेते हैं, पर उनके ऐसे गीत सुनकर वाकई शरीर को थिरकने से रोक पाना बेहद मुश्किल है. आने वाले त्योहारों और शादियों के मौसम में ये गीत जम कर बजने वाला है ये तय है.

नब्बे के दशक के हिट गीत हर किसी को नहीं मिलता को एक नए रूप में पेश किया गया है एल्बम में. दो संस्करण है क्रमशः निखिल और अरिजीत की आवाजों में. एक बेहद यादगार गीत को कुछ अलग अंदाज़ में पेश कर आज की पीढ़ी के लिए भी इसे जिंदा किया गया है. अरिजीत वाले संस्करण में नीति मोहन की आवाज़ बेहद दिलचस्प लगी है.

बॉस का संगीत खालिस मस्ती और नाचने गाने के लिए ही है. जाहिर है लंबे समय तक इन्हें याद नहीं रखा जायेगा.

एल्बम के बेहतरीन गीत : पार्टी ऑल नाईट, हर किसी को नहीं मिलता

हमारी रेटिंग : ३.४   

संगीत समीक्षा - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी   

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

भरपूर नाच गाना और धमाल है 'फटा पोस्टर निकला हीरो' में

राज कुमार संतोषी के निर्देशन में आ रहे हैं शहीद कपूर और इलियाना डी'क्रूस लेकर फिल्म फटा पोस्टर निकला हीरो . फिल्म में संगीत का जिम्मा संभाला है प्रीतम और अमिताभ भट्टाचार्य की सफल जोड़ी ने जिनके हौसले ये जवानी है दीवानी  के बाद बुलंदी पर होंगें.

आईये तफ्तीश करें इस ताज़ा एल्बम के संगीत की और देखें कि क्या कुछ है नया इस पेशकश में. 

मिका कभी भी प्रीतम के साथ दगा नहीं करते, जब भी प्रीतम ऐसे गीत बनाते हैं जहाँ सब कुछ गायक की क्षमता पर निर्भर हो वो मिका को चुनते हैं और हर बार की तरह मिका ने पहले गीत तू मेरे अगल बगल है में अपना चिर परिचित मस्तानगी भरी है, धुन बहुत ही कैची है. शब्द भी उपयुक्त ही हैं, पर अंगेजी शब्दों की भरमार है. 

मैं रंग शरबतों का  प्रीतम मार्का गीत है. जिसके दो संस्करण हैं. एक आतिफ असलम तो एक अरिजीत की आवाज़ में. मधुर रोमांटिक गीत है. कोरस का इस्तेमाल सुन्दर है. 

बेनी दयाल और और शेफाली की आवाजों में हे मिस्टर डी जे  एक ताज़ा हवा के झोंके जैसा है, जहाँ शेफाली की आवाज़ कमाल का समां रचती है. प्रीतम दा यहाँ पूरी तरह फॉर्म में है. नई ऊर्जा, नई ध्वनियाँ इस गीत को खास बना देती है. 

एक और डांसिंग गीत है दत्तिंग नाच , ऊर्जा से भरपूर कदम थिरकाने में पूरी तरह से सक्षम है ये गीत. देसी बीट्स का तडका और अमिताभ के रचनात्मक शब्द इसे और भी दिलचस्प बना देते हैं. 

माँ बेटे के प्यार भरे रिश्ते को स्वर देता गीत है जनम जनम , सुरीला और भावप्रधान इस गीत के भी दो मुक्तलिफ़ संस्करणों में हमें सुनिधि और आतिफ की आवाजें सुनने को मिलती है. आतिफ ने डूब कर गाया है इसे. सुनिधि ने अपनी आवाज़ देकर इसे बेटियों के लिए भी स्वर दे दिया. 

मेरे बिना तू  में राहत साहब और हर्षदीप की आवाजें हैं. कुछ अधिक प्रभावी नहीं बन पाया ये गीत हालाँकि शब्द अच्छे हैं 

प्रीतम ने अपनी तरकश के सभी तीर आजमाए हैं एल्बम में. और हर बार की तरह वो इस बार भी आम श्रोताओं को मनोरंजन देने में कामियाब हुए हैं. एक और हिट एल्बम उनकी फेहरिश्त में जुड़ती हुई प्रतीत हो रही है. 

सबसे बेहतरीन  गीत - दत्तिंग नाच, हे मिस्टर डी जे, तू मेरे अगल बगल है

हमारी रेटिंग - ४.३/५ 

संगीत समीक्षा - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी

        

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

रोक्किंग जनता का आक्रोश और प्यार समेटे है सत्याग्रह का संगीत

लंबे समय तक समानांतर सिनेमा में सक्रिय रहे प्रकाश झा ने कुछ सालों पहले महसूस किया कि वास्तविकता और व्यावसायिकता के बीच का भी एक रास्ता है जिसके माध्यम से वो अपने सशक्त सन्देश मनोरंजकता में घोलकर दर्शकों के एक बहुत बड़े वर्ग तक आसानी से पहुँच सकते हैं. मृत्यदंड, गंगाजल  आरक्षण  और राजनीति  जैसी सफल और सशक्त फिल्मों के बाद अब प्रकाश झा लाये हैं एक और सोच को प्रभावित करने वाली फिल्म सत्याग्रह . आज चर्चा करगें इसी फिल्म के संगीत की, हम ताज़ा सुर ताल के नए अंक में. एल्बम में संगीत है सलीम सुलेमान, मीत ब्रोस अनजान, आदेश श्रीवास्तव और इंडियन ओशन का, गीत लिखे हैं प्रसून जोशी ने. 

पहला गीत सत्याग्रह  बापू के प्रिय भजन रघुपति राघव राजा राम  का आधुनिक संस्करण है. गीत के अधिकतर अंश भजन स्वरुप ही हैं पर बीच बीच में कुछ सुलगते सवाल हैं...घायल है भोला इंसान ....के बाद गीत की करवट बदलती है. इस दबे इन्कलाब को आवाज़ दी है राजीव सुंदरेशन, शिवम पाठक और श्वेता पंडित ने. सलीम सुलेमान का संगीत संयोजन कबीले तारीफ है. श्रोताओं को एक नई ऊर्जा से भरने में सक्षम है ये गीत.

प्रकाश झा की फिल्मों में शास्त्रीय रंग के गीत होते ही है. इस कड़ी में है अगला गीत आयो जी, आधुनिक अंदाज़ की ठुमरी है ये...जिसे श्रद्धा पंडित ने आवाज़ दी है, सलीम मर्चेंट के साथ. अच्छे शब्द हैं, श्रद्धा की आवाज़ में कसाव है और कशिश भी, बस संयोजन में टेक्नो का तडका कुछ जरुरत से अधिक महसूस हुआ, जो इस सुरीले गीत में अवरोध सा लगता है.

ठुमरी  की बात चली है तो याद आती है गौहर जान....जिनके लिए कहा जाता है कि पहला भारतीय रिकॉर्ड एल्बम उन्हीं की आवाज़ में जारी हुआ था. उनकी सबसे मशहूर ठुमरी रस के भरे तोरे नैन  को जाने कितने गायकों ने अपने अपने अंदाज़ में गाया है. आज भी इसके रस में वही मिठास है. सत्यग्रह  का अगला गीत भी यही ठुमरी है. शुक्र इस बात का है कि यहाँ टेक्नो ध्वनियाँ अपनी सीमा में है और गायक शफकत अमानत अली की आवाज़ का बदस्तूर नशा खुल कर बिखर पाता है. बहुत बढ़िया गीत जिसे सुकून के क्षणों में बैठकर चैन से बारोबार सुना जा सकता है. 

अगला गीत फिर से फिल्म के थीम में वापस ले आता है जनता रोक्क्स  जिसमें आवाज़ है मीत ब्रोस अनजान की. सिचुएशनल गीत है और प्रसून ने व्यंग का सुन्दर तडका लगाया है. आज के दौर का आईना है गीत. सबसे सुन्दर हिस्सा है गीत के दूसरे हिस्से में चलती घोटाला कमेंट्री और विज्ञापन सरीखा टैग लाईन...

अगले गीत में भी आक्रोश है मगर अंदाज़ है इंडियन ओशन वाला. इन्टेंस और उबाल से भरपूर मगर शांत ज्वालामुखी जैसा. राहुल राम और साथियों का ये अंदाज़ भी फिल्म के मूड को बेहद अच्छे से सप्पोर्ट करता है. रस के भरे तोरे नैन  का एक और संस्करण भी है खुद आदेश श्रीवास्तव की आवाज़ में, जो शफकत वाले संस्करण से उन्नीस ही कहा जायेगा पर आदेश का भी अपना ही एक अलग रंग है जो उनके चाहने वालों को निराश नहीं करेगा. 

सत्याग्रह से उम्मीद है कि ये एक ऐसी फिल्म होगी जो बहुत व्यापक चोट कर सकती है हमारे सामाजिक और राजनितिक ढाँचे में ...संगीत फिल्म के अनुरूप है और रस के भरे तोरे नैन  जैसा खूबसूरत गीत भी इस एल्बम की खास पहचान है. हमारी रेटिंग है ४.१  की, आप बताएं अपनी राय....

संगीत समीक्षा - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी

 

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

आम फ़िल्मी संगीत के बेहद अलग है मद्रास कैफे का संगीत

फिल्म का नाम मद्रास कैफे  क्यों रखा गया है, जब ये सवाल फिल्म के निर्देशक सुजीत सिरकर से पुछा गया तो उनका कहना था कि फिल्म  में इस कैफे को भी एक किरदार की तरह इस्तेमाल किया गया है, हालाँकि ये कैफे कहाँ पर है ये फिल्म में साफ़ नहीं है पर मद्रास कैफे  एक ऐसा कोमन एड्रेस है जो देश के या कहें लगभग पूरे विश्व के सभी बड़े शहरों में आपको मौजूद मिलेगा. विक्की डोनर  की सफलता के बाद सुजीत उस मुद्दे को अपनी फिल्म में लेकर आये हैं जिस पर वो विक्की डोनर से पहले काम करना चाह रहे थे, वो जॉन को फिल्म में चाहते थे और उन्हें ही लेकर फिल्म बनाने का उनका सपना आखिर पूरा हो ही गया. फिल्म की संगीत एल्बम को सजाया है शांतनु मोइत्रा ने. बेहद 'लो प्रोफाइल' रखने वाले शांतनु कम मगर उत्कृष्ट काम करने के लिए जाने जाते हैं, गीतकार हैं अली हया..आईये एक नज़र डालें मद्रास कैफे   के संगीत पर.

युवा गायकों की एक पूरी फ़ौज इन दिनों उफान पर है. इनमें से पोपोन एक ऐसे गायक बनकर उभरे हैं जिनकी आवाज़ और अंदाज़ सबसे मुक्तलिफ़ है. बर्फी  में उनका गाया क्यों न हम तुम  भला कौन भूल सकता है. पोपोन के चाहने वालों के लिए ये एल्बम निश्चित ही खास होने वाली है. क्योंकि उनकी आवाज़ में २ गीत हैं यहाँ. पहला गीत सुन ले रे  एक सौंधी सी प्रार्थना है जो दूसरे अंतरे तक आते आते फिल्म के महत्वपूर्ण मुद्दों पर आ जाता है. संयोजन बेहद सोफ्ट रखा गया है ताकि शब्द खुल कर सामने आ सके और इस कारण गायक को भी अधिक आजादी से गाने का मौका मिला है. कहना गलत नहीं होगा कि पोपोन ने गीत के साथ  भरपूर न्याय किया है. गीत का एक रेप्रयिस संस्करण भी है जो उतना ही प्रभावी है. 

अगला गीत है अजनबी  एक और नई आवाज़ में, जेबुनिसा बंगेश की आवाज़ में जबरदस्त ताजगी है. नर्मो नाज़ुक मिजाज़ का सुरीला सा गीत है ये. इंटरल्यूड में माउथ ओरगन जैसा एक वाध्य खूब जमा है. एक छोटा सा गीत जो बेहद कर्णप्रिय है पर आम श्रोताओं को शायद अधिक न रिझा सकेगा ये नगमा.

शांतनु  की खासियत है कि वो हर गीत को बेहद प्यार से सजाते संवारते हैं, यही खूबी झलकती है पोपोन के गाए दूसरे गीत खुद से  में. किसी बुरे हादसे से गुजरने के बाद जैसी भावनाएं उमडती है उनका बेहद सशक्त बयाँ है गीत में. एक बार फिर संयोजन और पोपोन के स्वर गीत की जान है. अली हया के शब्द बेहद सटीक है. एल्बम का सबसे बहतरीन गीत. 

मद्रास कैफे थीम  में पार्श्व स्वर है मोनाली ठाकुर के, सितार के सहमे सहमे तारों को हलकी हलकी थाप देकर जगाया गया है, जैसे जैसे पीस आगे बढ़ता है माहौल में भारीपन सा भरता जाता है. दहशत के आलम में भी उम्मीद जैसे जगमगाती हो. फिल्म के थीम को इतने सशक्त तरीके से प्रस्तुत करने वाला कोई पीस शायद ही कोई हाल के दिनों में बना हो. शांतनु को सलाम....बहतरीन काम. 

एल्बम  में तीन और इंस्ट्रूमेंटल पीस हैं, वास्तव में ये इतने जबरदस्त हैं कि मात्र इन्हीं के लिए एल्बम को सुना जा सकता है. हम अंदाजा लगा सकते हैं कि फिल्म का पार्श्व संगीत "धाँसू" होने वाला है. बिना गायक और गीतकार के ऐसा समां बाँध पाना कोई सहज काम नहीं है. शांतनु जैसा कोई गुणी और अत्यंत प्रतिभाशाली संगीतकार ही ये कर सकता है. कह सकते हैं कि सुजीत ने उन्हें चुन कर एक ज़ंग तो निश्चित ही जीत ली है. 

मद्रास कैफे  एल्बम को हम एक व्यवसायिक कोण से नहीं आँक सकते. ये एक एकदम अल्हदा सा काम है, जिसे अच्छे संगीत के कद्रदान अवश्य सराहेंगें. एल्बम को हमारी रेटिंग ४.२ की....बाकी राय श्रोताओं की...

संगीत समीक्षा - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी


शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

सुरीला है ये आग का दरिया - 'इस्सक' तेरा

प्रेम कहानियां और वो भी कालजयी प्रेम कथाएं फिल्मकारों को सदा से ही प्रेरित करती आईं है. हीर राँझा हो सोहनी महिवाल या फिर रोमियो जूलियट, इन अमर प्रेम कहानियों में कुछ तो ऐसा है जो दर्शक बार बार इन्हें देखने के लिए लालायित रहते हैं. रोमियो जूलियट शेक्सपियर की अमर कृति है, जिस पर अब तक ढेरों फ़िल्मी कहानियां आधारित रहीं है. एक बार फिर इस रचना का भारतीयकरण हुआ है मनीष तिवारी निर्देशित इस्सक  में जहाँ राँझना  के बाद एक बार फिर दर्शकों के देखने को मिलेगी बनारस की पृष्ठभूमि. खैर देखने की बात होगी बाद में फिलहाल जान लें कि इस इस्सक  में सुनने लायक क्या क्या है...

मोहित  चौहान की सुरीली आवाज़ ऐसे लगती है जैसे पहाड़ों में गूंजती हवा हो, और अगर गीत रोमानी हो तो कहना ही क्या, एल्बम की शुरुआत इसी रेशमी आवाज़ से होती है इस्सक तेरा  एक खूबसूरत प्रेम गीत है. जितने सुन्दर शब्द है मयूर पूरी के, सचिन जिगर की जोड़ी ने इसे उतने ही नर्मो नाज़ुक अंदाज़ में स्वरबद्ध किया है. एल्बम को एक दिलकश शुरुआत देता है ये गीत. 

अगले  गीत में रशीद खान की आवाज़ है, गहरी और मर्म को भेदती, झीनी रे झीनी  गीत के शब्दकार हैं निलेश मिश्रा और इस गीत को संगीत का जामा पहनाया है संगीतकार कृष्णा ने. तानु वेड्स मनु  में यादगार संगीत देने के बावजूद कृष्णा को बहुत अधिक काम मिल नहीं पाया है जो वाकई ताज्जुब की बात है. अब इस गीत को ही देखिये, ठेठ देसी स्वरों से इस प्रतिभाशाली संगीतकार ने इस गीत को यादगार बना दिया है. गीत में प्रतिभा भगेल की आवाज़ का सुन्दर इस्तेमाल हुआ है, पर फिर भी रशीद की आवाज़ गीत की जान है. 

बरसों  पहले एक गीत आया था शिवजी ब्याहने चले . शिव के महाविवाह पर इसके बाद शायद कोई गीत कम से कम बॉलीवुड में तो नहीं आया. इसी कमी को पूरा करता है अगला गीत भोले चले, हालाँकि ये गीत उस पुराने गीत की टक्कर का तो कहीं से भी नहीं है, पर आज की पीढ़ी के लिए इस महाआयोजन को गीत स्वरुप में पेशकर टीम ने कुछ अनूठा करने की कोशिश तो की ही है जिसकी तारीफ होनी चाहिए. इंडियन ओशन  के राहुल राम की आवाज़ में खासी ताजगी है और इस गीत के लिए शायद उनसे बेहतर कोई नहीं हो सकता था. गीत के संगीतकार है सचिन गुप्ता. 

रोक्क् गायकी में सबसे ताज़ा सनसनी बनकर उभरे हैं अंकित तिवारी आशिकी २   के बाद. अगला गीत आग का दरिया  हालाँकि उनकें पहले गीत जितना प्रभावी नहीं बन पाया है. अच्छे पंच के बावजूद गीत अपनी छाप छोड़ने में असफल रहा है. अगले गीत एन्ने उन्ने  में पोपोन की जबरदस्त आवाज़ है जिन्हें साथ मिला है कीर्ति सगाथिया और ममता शर्मा का. गीत में पर्याप्त विविधता है, गायकों ने भी जम कर अपने काम को अंजाम दिया है. एक बार फिर कृष्णा ने अच्छा संयोजन किया है.  

अगला  गीत भागन की रेखा  एक विदाई गीत है, बिना लाग लपेट के ये गीत शुद्ध भारतीय है. रघुबीर यादव और मालिनी अवस्थी की दमदार आवाज़ में ये गीत सुनने लायक है. बहुत दिनों बाद किसी बॉलीवुड फिल्म में इतना मार्मिक गीत सुनने को मिला है. शायद आज की पीढ़ी को ये कुछ अटपटा लगे पर यही तो है हमारी अपनी मिटटी के गीत.  पूरी टीम इस गीत के लिए बधाई की हकदार है. इसके आलावा एल्बम में इस्सक तेरा  और आग का दरिया  के कुछ अलग से संस्करण हैं. वास्तव में आग का दरिया  अपने अल्प्लगड संस्करण में कुछ हद तक बेहतर है. 

एल्बम से सबसे अच्छे गीत - इस्सक तेरा, झीनी रे झीनी  और भागन की रेखा
हमारी रेटिंग - ४.२/५

संगीत समीक्षा - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी 

यदि आप इस समीक्षा को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:


सोमवार, 6 मई 2013

'पाकीज़ा' गीतों में पाश्चात्य स्वरों के मेल भी और देसी मिटटी की महक भी


प्लेबैक वाणी -44 - संगीत समीक्षा - पाकीजा (जुबीन गर्ग)


जोहाट, आसाम से निकली इस बेमिसाल आवाज़ ने देश भर के संगीत प्रेमियों पर अपना जादू चलाया है. बेहद प्रतिभाशाली जुबीन गर्ग ढोल, गिटार, मेंडोलिन जैसे ढेरों साजों पर भी अपनी पकड़ रखते हैं. हिंदी फ़िल्मी गीतों के शौकीनों ने उन्हें सुना था फिल्म कांटे के दमदार जाने क्या होगा रामा रे में, मगर गैंगस्टर के या अली के बाद तो वो घर घर पहचाने जाने लगे थे. ये खुशी की बात है कि आज के दौर में जब सोलो एलबम्स के लिए बाजार में बहुत अधिक संभावनाएं नज़र नहीं आती, टाईम्स संगीत जैसी बड़ी कंपनी जुबीन की गैर फ़िल्मी एल्बम को ज़ारी करने का साहस करती है. संगीत प्रेमियों के लिए बाजारू चलन से हट कर कुछ सुनने की तड़प और जुबीन का आवाज़ की कशिश ही है ये जो इस तरह के प्रयोगों को ज़मीन देती है.


एल्बम का शीर्षक गीत बहुत ही जबरदस्त है, संगीत संयोजन कुछ हैरत करने वाला है. पर शब्द, धुन और जुबीन की आवाज़ का नशा गीत को एक अलग ही आसमाँ दे देता है. एक रोक्क् सोलिड गीत जो संगीत प्रेमियों जम कर रास आएगा. मीना कुमारी अभिनीत क्लास्सिक फिल्म पाकीज़ा जो कि जुबीन की सबसे पसंदीदा फिल्म भी है, वही इस गीत की प्रेरणा है   


अगला गीत न बीते न को सुनते हुए आप एक अलग ही दुनिया में पहुँच जाते हैं. शब्दों का खेल सुरीला है, गीत के थीम अनुरूप जुबीन की आवाज़ का समर्पण एकदम सटीक सुनाई देता है. यहाँ संगीत संयोजन भी अपेक्षानुरूप है.


मुझमें तू ही तू, मुझमें मैं नहीं....सुनने में एक प्रेम गीत बेशक लगता है पर वास्तव में ये एक सूफी रोक्क् गीत अधिक है जहाँ अंग्रेजी शब्दों का भी सुन्दर इस्तेमाल किया है जुबीन ने.


बाँसुरी की मधुर तान से उठता है काफूर. रिदम परफेक्ट है. काफूर शब्द का पहली बार किसी गीत के मुखड़े में इस तरह प्रयोग हुआ होगा. मधुरता, अपनापन, सादगी और बेफिक्री की लाजवाब लयकारी है ये गीत. अंतरे की धुन बेहद प्यारी सुनाई देती है..शब्द भी बढ़िया हैं, बस व्याकरण में कहीं कहीं हल्की कमी महसूस होती है.


असामी लोक संगीत की झलक यूँ तो लगभग हर गीत में ही है, कहकशा में इसका मिलन है अरेबिक रिदम के साथ. एक सुन्दर तजुर्बा, एक बार फिर जुबीन यहाँ या अली वाले फ्लेवर में मिलेगें श्रोताओं से.


अगला गीत पिया मोरे कुछ दर्द भरा है, जुबीन की आवाज़ में दर्द की एक टीस यूँ भी महसूस की जा सकती है. धुन बेहद डूबो देने वाली है, और संयोजन में गजब की विविधता भरी है, एक एक स्वर एक नई अनुभूति है. एक और सुरीला गीत.


पाश्चात्य ताल पर भी जुबीन के गीतों में मिटटी की मदभरी महक है. और अगले गीत चलते चलो रे एक क्लास्सिक मांझी गीत जैसा लगता है. जीवन को एक नई दृष्टि से सराबोर करते शब्द गीत की जान हैं.


अंतिम गीत रामा रामा एक मुक्तलिफ़ फ्लेवर का गीत है. ये गायक के सामाजिक दायित्व का निर्वाह भी करता है. देश में इन दिनों जो हालात हैं उस पर एक तीखी टिपण्णी है ये गीत जो हमारी दोहरी मानसिकता की पोल खोल के रख देता है. जुबीन के ये स्वर नितांत ही अनसुना है. शब्द रचेता को विशेष बधाई.


एल्बम के इस ढलते दौर में जुबीन का ये एल्बम एक नई उम्मीद जगाता है. संगीत प्रेमियों को ये अनूठा प्रयोग यक़ीनन पसंद आना चाहिए. रेडियो प्लेबैक दे रहा है इसे ४.३ की रेटिंग. अवश्य सुनें.

संगीत समीक्षा
 - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी
यदि आप इस समीक्षा को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
 


     

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ