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Wednesday, January 29, 2014

‘बाँसुरी बाज रही धुन मधुर...’ : रागमाला गीत – 3


प्लेबैक इण्डिया ब्रोडकास्ट





रागों के रंग, रागमाला गीत के संग – 3




राग रामकली, तोड़ी, शुद्ध सारंग, भीमपलासी, यमन कल्याण, मालकौंस और भैरवी के इन्द्रधनुषी रंग


‘बाँसुरी बाज रही धुन मधुर...’

शिष्याओं को संगीत की तालीम देते उस्ताद गुलाम मुस्तफा खाँ


फिल्म : उमराव जान (1981)

गायक : उस्ताद गुलाम मुस्तफा खाँ, शाहिदा खाँ और रूना प्रसाद

संगीतकार : ख़ैयाम

आलेख : कृष्णमोहन मिश्र

स्वर एवं प्रस्तुति : संज्ञा टण्डन





आपको यह प्रस्तुति कैसी लगी? अपनी प्रतिक्रिया और अपने सुझाव हमें radioplaybackindia@live.com पर भेजें।  




Sunday, April 7, 2013

एक गीत और सात रागों की इन्द्रधनुषी छटा



स्वरगोष्ठी – 115 में आज

रागों के रंग रागमाला गीत के संग – 3

राग रामकली, तोड़ी, शुद्ध सारंग, भीमपलासी, यमन कल्याण, मालकौंस और भैरवी के इन्द्रधनुषी रंग



दो सप्ताह के अन्तराल के बाद लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग, रागमाला गीत के संग’ की तीसरी कड़ी लेकर मैं, कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों की इस गोष्ठी में उपस्थित हूँ। इस लघु श्रृंखला की तीसरी कड़ी में आज हम जो रागमाला गीत प्रस्तुत कर रहे हैं, उसे हमने 1981 में प्रदर्शित फिल्म ‘उमराव जान’ से लिया है। भारतीय फिल्मों में शामिल रागमाला गीतों में यह उच्चस्तर का गीत है, जिसमें क्रमशः राग रामकली, तोड़ी, शुद्ध सारंग, भीमपलासी, यमन कल्याण, मालकौंस और भैरवी का समिश्रण किया गया है। वास्तव में फिल्म का यह रागमाला गीत इन रागों की पारम्परिक बन्दिशों की स्थायी पंक्तियों का मोहक संकलन है। गीत में रागों का क्रम प्रहर के क्रमानुसार है। 
 

भारतीय संगीत की परम्परा में जब किसी एक गीत में कई रागों का क्रमशः प्रयोग हो और सभी राग अपने स्वतंत्र अस्तित्व में उपस्थित हों तो उस रचना को रागमाला कहते हैं। रागमाला की परम्परा के विषय में संगीत के ग्रन्थों में कोई विवरण नहीं मिलता। ऐसा प्रतीत होता है कि जब संगीत की आमद दरबारों में हुई होगी, उसी समय से इसका चलन हुआ होगा। अपने आश्रयदाता को राग परिवर्तन के चमत्कार से प्रसन्न करने के लिए इस प्रकार के प्रयोग किये जाते रहे होंगे। आज भी संगीत सभाओं में इस प्रकार के प्रयोग श्रोताओं को मुग्ध अवश्य करते हैं। फिल्म संगीत के क्षेत्र में भी रागमाला गीतों के कई आकर्षक प्रयोग किये गए हैं। ऐसे ही कुछ चुने हुए रागमाला गीत हम लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग, रागमाला गीत के संग’ के अन्तर्गत प्रस्तुत कर रहे हैं। आज का रागमाला गीत हमने 1981 में प्रदर्शित फिल्म ‘उमराव जान’ से लिया है।

संगीतकार ख़ैयाम
सुप्रसिद्ध फ़िल्मकार मुजफ्फर अली ने 1981 में उन्नीसवीं शताब्दी के अवध की संस्कृति पर एक पुरस्कृत और प्रशंसित फिल्म ‘उमराव जान’ का निर्माण किया था। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यकाल में अवध के नवाब के संरक्षण में शास्त्रीय संगीत और नृत्य विकासशील अवस्था में था। फिल्म ‘उमराव जान’ इसी काल की मशहूर गायिका, नृत्यांगना और शायरा उमराव जान पर केन्द्रित है। जिस रागमाला गीत का ज़िक्र हम करने जा रहे हैं वह बालिका उमराव की संगीत-शिक्षा के प्रसंग से जुड़ा हुआ है। उस्ताद (भारतभूषण) 10-11 वर्ष आयु की उमराव को गण्डा बाँध कर सूर्योदय के राग से संगीत-शिक्षा आरम्भ करते हैं। चढ़ते प्रहर के क्रम से राग बदलते रहते हैं और उमराव की आयु भी विकसित होती जाती है। गीत के अन्तिम राग भैरवी के दौरान बालिका उमराव, वयस्क उमराव जान (रेखा) संगीत-नृत्य में प्रवीण हो जाती है। फिल्म में संगीत-शिक्षक के लिए सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद गुलाम मुस्तफा खाँ ने तथा शिष्याओ के लिए शाहिदा खाँ और रूना प्रसाद ने पार्श्वगायन किया है। फिल्म के संगीतकार ख़ैयाम हैं।

उस्ताद गुलाम मुस्तफा खाँ
फिल्म ‘उमराव जान’ के इस रागमाला गीत का आरम्भ प्रातःकाल के राग रामकली की एक बन्दिश- ‘प्रथम धर ध्यान दिनेश...’ से होता है। प्रथम प्रहर के बाद उस्ताद गुलाम मुस्तफा खाँ अपनी शिष्याओं को द्वितीय प्रहर के राग तोड़ी- ‘अब मोरी नैया पार करो तुम...’ और उसके बाद तीसरे प्रहर के राग शुद्ध सारंग की बन्दिश का स्थायी- ‘सगुन विचारो बम्हना...’ का गायन सिखाते हैं। इन शिष्याओं को गायन के साथ-साथ नृत्य का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। चौथे प्रहर के राग भीमपलासी में निबद्ध एक होली रचना- ‘बिरज में धूम मचायो कान्हा...’ रागमाला गीत की अगली प्रस्तुति है। पाँचवें प्रहर के राग यमन कल्याण में पगी रचना- ‘दरशन दो शंकर महादेव...’ की प्रस्तुति के दौरान उमराव बालिका से वयस्क (रेखा) हो जाती है। इस रचना के दौरान उमराव को नृत्य का अभ्यास करते भी दिखाया गया है। राग मालकौंस मध्यरात्रि का राग है, जिसमें निबद्ध रचना- ‘पकरत बैयाँ मोरी बनवारी...’ इस गीत की अगली राग-प्रस्तुति है। अन्त में राग भैरवी की एक बन्दिश- ‘बाँसुरी बाज रही धुन मधुर...’ से इस रागमाला गीत को विराम दिया गया है। अब आप सात रागों से युक्त इस रागमाला गीत का आनन्द लीजिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।



रागमाला गीत : फिल्म उमराव जान : उस्ताद गुलाम मुस्तफा खाँ, शाहिदा खाँ और रूना प्रसाद



आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ की 115वीं संगीत पहेली में हम आपको एक ऋतु विशेष के गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 120वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस संगीत शैली का नाम क्या है?

2 – गीत के संगीतकार का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 117वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 113वें अंक में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायक पण्डित कुमार गन्धर्व के स्वर में राग सोहनी के एक द्रुत खयाल का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग सोहनी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक पण्डित कुमार गन्धर्व। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर की क्षिति तिवारी, मिनिसोटा (अमेरिका) से दिनेश कृष्णजोइस, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग रागमाला गीत के संग’ के इस अंक में हमने आपको एक ऐसा गीत सुनवाया, जिसमे सात भिन्न रागों की बन्दिशों का मेल था। अगले अंक में हम रागमाला गीतों की इस श्रृंखला को एक बार फिर विराम देंगे और आपके साथ ऋतु के अनुकूल एक संगीत शैली के गीतों पर चर्चा करेंगे। यह एक ऐसी विधा है जिसका प्रयोग लोक और उप-शास्त्रीय, दोनों रूप में किया जाता है। आप भी हमारे आगामी अंकों के लिए भारतीय शास्त्रीय, लोक अथवा फिल्म संगीत से जुड़े नये विषयों, रागों और अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

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