Showing posts with label bade shaayar. Show all posts
Showing posts with label bade shaayar. Show all posts

Wednesday, May 19, 2010

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं.. मेहदी साहब के सुपुत्र ने कुछ इस तरह उभारा फ़राज़ की ख्वाहिशों को

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #८४

पाकिस्तान से खबर है कि अस्वस्थ होने के बावजूद मेहदी हसन एक बार फिर अपनी जन्मभूमि पर आना चाहते हैं। राजस्थान के शेखावटी अंचल में झुंझुनूं जिले के लूणा गांव की हवा में आज भी मेहदी हसन की खुशबू तैरती है। देश विभाजन के बाद लगभग २० वर्ष की उम्र में वे लूणा गांव से उखड़ कर पाकिस्तान चले गये थे, लेकिन इस गांव की यादें आज तक उनका पीछा करती हैं। वक्त के साथ उनके ज्यादातर संगी-साथी भी अब इस दुनिया को छोड़कर जा चुके हैं, लेकिन गांव के दरख्तों, कुओं की मुंडेरों और खेतों में उनकी महक आज भी महसूस की जा सकती है।

छूटी हुई जन्मस्थली की मिट्टी से किसी इंसान को कितना प्यार हो सकता है, इसे १९७७ के उन दिनों में झांक कर देखा जा सकता है, जब मेहदी हसन पाकिस्तान जाने के बाद पहली बार लूणा आये और यहां की मिट्टी में लोट-पोट हो कर रोने लगे। उस समय जयपुर में गजलों के एक कार्यक्रम के लिए वे सरकारी मेहमान बन कर जयपुर आये थे और उनकी इच्छा पर उन्हें लूणा गांव ले जाया गया था। कारों का काफिला जब गांव की ओर बढ़ रहा था, तो रास्ते में उन्होंने अपनी गाड़ी रुकवा दी। काफिला थम गया। सड़क किनारे एक टीले पर छोटा-सा मंदिर था, जहां रेत में लोटपोट हो कर वे पलटियां खाने लगे और रोना शुरू कर दिया। कोई सोच नहीं सकता था कि धरती माता से ऐसे मिला जा सकता है। ऐसा लग रहा था, जैसे वे मां की गोद में लिपट कर रो रहे हों।इस दृश्य के गवाह रहे कवि कृष्ण कल्पित बताते हैं, ‘वह भावुक कर देने वाला अदभुत दृश्य था। मेहदी हसन का बेटा भी उस समय उनके साथ था। वह घबरा गया कि वालिद साहब को यह क्या हो गया? हमने उनसे कहा कि धैर्य रखें, कुछ नहीं होगा। धीरे-धीरे वह शांत हो गये। बाद में उन्होंने बताया कि यहां बैठ कर वे भजन गया करते थे।’ मेहदी हसन ने तब यह भी बताया था कि पाकिस्तान में अब भी उनके परिवार में सब लोग शेखावटी में बोलते हैं। शेखावटी की धरती उन्हें अपनी ओर खींचती है।

मेहदी हसन के साथ इस यात्रा में आये उनके बेटे आसिफ मेहदी भी अब पाकिस्तान में गजल गाते हैं और बाप-बेटे का एक साझा अलबम भी है – “दिल जो रोता है’।


उपरोक्त पंक्तियाँ हमने "ईश मधु तलवार" से उधार ली हैं। ऐसा करने के हमारे पास दो कारण थे। पहला यह कि उम्र के जिस पड़ाव पर मेहदी साहब आज खड़े हैं, वहाँ से वापस लौटना या फिर पीछे मुड़कर देखना अब नामुमकिन-सा दिख पड़ता है, इसलिए हमारा कर्त्तव्य बनता है कि किसी भी बहाने मेहदी साहब को याद किया जाए और याद रखा जाए। रही बात दूसरे कारण की तो हमारी आज की महफ़िल जिस गज़ल के सहारे बन-संवरकर तैयार हुई है, उसे अपनी आवाज़ से तरोताज़ा करने वाले और कोई नहीं इन्हीं मेहदी साहब के सुपुत्र आसिफ मेहदी हैं(इनका ज़िक्र ऊपर भी आया है)। मुझे पक्का यकीन है कि आसिफ मेहदी के बारे में बहुत हीं कम लोगों को जानकारी होगी। तो हम हीं कुछ बताए देते हैं। आसिफ ने अपने अब्बाजान और अपने एक रिश्तेदार ग़ुलाम क़ादिर की देखरेख में महज १३ साल की उम्र में गाने की शुरूआत कर दी थी। इन्होंने अपना पहला कार्यक्रम १९८३ में लास एंजिल्स में दिया था, जहाँ पर इनके साथ मेहदी साहब भी थे। कहते हैं कि मेहदी साहब ने इन्हें बीच में हीं रोककर गाने से मना कर दिया था और कहा था कि इनकी आवाज़ औरतों जैसी जान पड़ रही है, इसलिए जब तक ये मर्दाना आवाज़ में नहीं गाते, तब तक इन्हें सर-ए-महफ़िल गाना नहीं चाहिए। अब्बाजान की डाँट का आसिफ की गायिकी पर क्या असर हुआ, यह कहने की कोई ज़रूरत नहीं। १९९९ में मिला "निगार अवार्ड" उनकी प्रतिभा का जीता-जागता नमूना है। पाकिस्तान की ६० से भी ज्यादा फिल्मों में गा चुके आसिफ अब हिन्दुस्तानी फिल्मों में अपनी किस्मत आजमाना चाहते हैं। साथ हीं साथ आसिफ आजकल के युवाओं के बीच गज़लों की घटती लोकप्रियता से भी खासे चिंतित प्रतीत होते हैं। इन दोनों मुद्दों पर उनके विचार कुछ इस प्रकार हैं:

पाकिस्तानी गजल गायक आसिफ मेहदी कहते हैं कि युवा श्रोताओं के गजलों से दूर होने के लिए मीडिया जिम्मेदार है। प्रख्यात गजल गायक मेहदी हसन के बेटे मेहदी ने एस साक्षात्कार में आईएएनएस से कहा, "मीडिया जोर-शोर से पॉप संगीत को प्रोत्साहित कर रही है और इसे वह कुछ ऐसे रूप में प्रस्तुत कर रही है कि युवा इसे सुनने के अलावा और कुछ महसूस ही न कर सकें।" मेहदी ने कहा, "मैं अपनी ओर से गजलों को उनके शुद्ध रूप में प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रहा हूं। मैं गजल समारोहों में युवा श्रोताओं की संख्या बढ़ाने के लिए पाकिस्तान और भारत में विभिन्न मंचों पर बात कर रहा हूं। 'रूट्स 2 रूट्स'(एक प्रकार का गज़ल समारोह) के साथ मेरा सहयोग महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने मेरे वालिद (मेहदी हसन) और उनके प्रसिद्ध साथियों गुलाम अली, फरीदा खानम और इकबाल बानो जैसे गजल गायकों के अमर संगीत को प्रोत्साहित करने में मेरी मदद की है।" अपने पिता जैसी ही आवाज के मालिक मेहदी अब बॉलीवुड में अपनी शुरुआत करने को तैयार हैं। मेहदी कहते हैं कि उनके पास बॉलीवुड की कई फिल्मों में गाने के प्रस्ताव हैं। वह कहते हैं कि वह लंबे समय से हिंदी फिल्मों में गाना चाहते थे। उन्हें उम्मीद है कि वह जल्दी ही यह शुरुआत कर सकेंगे।

हम दुआ करते हैं कि हिन्दुस्तानी फिल्में जल्द हीं आसिफ साहब की आवाज़ से नवाजी जाएँ। यह तो हुई गायक की बात, अब बारी है इस गज़ल के गज़लगो की, तो यह गज़ल जिनकी लेखनी की उपज है, उनके बारे में कुछ भी कहना पहाड़ को जर्रा कहने के जैसा होगा। इसलिए खुद कुछ न कहके प्रख्यात लेखक "शैलेश जैदी" को हम यह काम सौंपते हैं।

नौशेरा में जन्मे अहमद फ़राज़ जो पैदाइश से हिन्दुस्तानी और विभाजन की त्रासदी से पाकिस्तानी थे उर्दू के उन कवियों में थे जिन्हें फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के बाद सब से अधिक लोकप्रियता मिली।पेशावर विश्वविद्यालय से उर्दू तथा फ़ारसी में एम0ए0 करने के बाद पाकिस्तान रेडियो से लेकर पाकिस्तान नैशनल सेन्टर के डाइरेक्टर,पाकिस्तान नैशनल बुक फ़ाउन्डेशन के चेयरमैन और फ़ोक हेरिटेज आफ़ पाकिस्तान तथा अकादमी आफ़ लेटर्स के भी चेयरमैन रहे।भारतीय जनमानस ने उन्हें अपूर्व सम्मान दिया,पलकों पर बिठाया और उनकी ग़ज़लों के जादुई प्रभाव से झूम-झूम उठा। मेरे स्वर्गीय मित्र मख़मूर सईदी ने, जो स्वयं भी एक प्रख्यात शायर थे,अपने एक लेख में लिखा था -"मेरे एक मित्र सैय्यद मुअज़्ज़म अली का फ़ोन आया कि उदयपूर की पहाड़ियों पर मुरारी बापू अपने आश्रम में एक मुशायरा करना चाहते हैं और उनकी इच्छा है कि उसमें अहमद फ़राज़ शरीक हों।मैं ने अहमद फ़राज़ को पाकिस्तान फ़ोन किया और उन्होंने सहर्ष स्वीकृति दे दी।शान्दार मुशायरा हुआ और सुबह चर बजे तक चला। मुरारी बापू श्रोताओं की प्रथम पक्ति में बैठे उसका आनन्द लेते रहे।"

"फ़िराक़", "फ़ैज़" और "फ़राज़" लोक मानस में भी और साहित्य के पार्खियों के बीच भी अपनी गहरी साख रखते हैं।इश्क़ और इन्क़लाब का शायद एक दूसरे से गहरा रिश्ता है। इसलिए इन शायरों के यहां यह रिश्ता संगम की तरह पवित्र और अक्षयवट की तरह शाख़-दर-शाख़ फैला हुआ है। रघुपति सहाय फ़िराक़ ने अहमद फ़राज़ के लिए कहा था-"अहमद फ़राज़ की शायरी में उनकी आवाज़ एक नयी दिशा की पहचान है जिसमें सौन्दर्यबोध और आह्लाद की दिलकश सरसराहटें महसूस की जा सकती हैं" फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को फ़राज़ की रचनाओं में विचार और भावनाओं की घुलनशीलता से निर्मित सुरों की गूंज का एहसास हुआ और लगा कि फ़राज़ ने इश्क़ और म'आशरे को एक दूसरे के साथ पेवस्त कर दिया है।और मजरूह सुल्तानपूरी ने तो फ़राज़ को एक अलग हि कोण से पहचाना । उनका ख़याल है कि "फ़राज़ अपनी मतृभूमि के पीड़ितों के साथी हैं।उन्ही की तरह तड़पते हैं मगर रोते नहीं।बल्कि उन ज़ंजीरों को तोड़ने में सक्रिय दिखायी देते हैं जो उनके समाज के शरीर को जकड़े हुए हैं।"फ़राज़ ने स्वय भी कहा था -

मेरा क़लम तो अमानत है मेरे लोगों की।
मेरा क़लम तो ज़मानत मेरे ज़मीर की है॥

देशभक्त की भावना से ओत-प्रोत इस शेर को सुनने के बाद लाज़िमी हो जाता है कि हम एक प्यार-भरा शेर देख लें क्योंकि आज की की गज़ल बड़ी हीं रूमानी है और रूमानियत को रौ में लाने के लिए माहौल में मिसरी तो घोलनी हीं पड़ेगी:

जिस सिम्त भी देखूँ नज़र आता है के तुम हो
ऐ जान-ए-जहाँ ये कोई तुम सा है के तुम हो


और अब वह समय आ गया है, जिसका हमें बेसब्री से इंतज़ार था। तो ज़रा भी देर न करते हुए हम सुनते हैं फिल्म "जन्नत की तलाश" से ज़ुल्फ़िकार अली के द्वारा संगीतबद्ध की गई यह गज़ल:

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं

सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को ____ ठहर के देखते हैं

सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं

सुना है उसके बदन की तराश ऐसी है
के फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "बूटा" और शेर कुछ यूँ था-

इस दुनिया के बाग में
शूली जैसा हर बूटा है।

इस शब्द के साथ महफ़िल में हाज़िर हुए "रोमेंद्र" जी। हुजूर, आपने इस शब्द को पहचाना तो ज़रूर, लेकिन हमें आपसे शेर की भी दरकार थी। खैर कोई बात नहीं.. पहली मर्तबा था, इसलिए हम आपको माफ़ करते हैं ;) अगली बार से इस बात का भी ध्यान रखिएगा।

अवनींद्र जी, कमाल है..... इस बार आप शेर से हटकर नज़्म पर आ गए। वैसे रचना है बड़ी प्यारी:

अपने मंदिर की खातिर
नौचती रही
तुम मेरे
बाग़ का हर बूटा
और मैं
परेशां रहा
कि भूले से
कोई शूल
तेरे हाथो न चुभ जाये

शरद जी, सच कहूँ तो मैंने इसी शेर के कारण बूटा शब्द को गायब किया था। और वाह! आपने मेरे दिल की बात जान ली:

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग तो सारा जाने है। (आपने यहाँ तू लिखा है.. यानि कि सही शब्द को हीं गुल कर दिया :) )

शन्नो जी, मंजु जी और नीलम जी, आपने "बूटा" को साड़ी पर जड़े "बूटे" की तरह लिया है, जबकि इस नज़्म में बूटा का अर्थ था फूल.. इसलिए मैं आप लोगों के शेर यहाँ पेश नहीं कर रहा। इस बार मुझे माफ़ कीजिएगा। और अगली बार से यह ध्यान दीजिएगा कि कौन-सा शब्द किस अर्थ में इस्तेमाल हुआ है। या फिर फूल की तरह, मुझे समझ नहीं आ रहा। फिर भी मैं आप तीनों के शेर यहाँ रख रहा हूँ। अब महफ़िल के सुधि श्रोतागण हीं इन शेरों का फ़ैसला करेंगे:

स्याह चादर पे चाँद संग आ मुस्कुराते हैं
खामोश आलम में झांक कर टिमटिमाते हैं
आसमा में टंके सितारे लगते हैं जैसे बूटा
रात के अलविदा कहते ही गुम हो जाते हैं. (शन्नो जी)

जब लाल साड़ी पर उकेरा था बूटा,
दिलवर !तब हर साँस ने तेरा नाम जपा . (मंजु जी)

बूटा बूटा जो नोचा उस जालिम ने आसमानों से
लहू लहू वो हुआ उस कातिल के अरमानों से. (नीलम जी)

सीमा जी, आपने बूटा पर कई सारे शेर पेश किए। मुझे उन सारे शेरों में से यह शेर (पंक्तियाँ) सबसे ज्यादा पसंद आया:

मेरी मुहब्बत का ख़्वाब, चमेली का बूटा
जिसके नीचे हकीकत का 'काला नाग' रहता है। (कमल )

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ