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Sunday, May 6, 2018

राग काफी और बागेश्री : SWARGOSHTHI – 368 : RAG KAFI & BAGESHRI




स्वरगोष्ठी – 368 में आज


दस थाट, बीस राग और बीस गीत – 7 : काफी थाट

पण्डित भीमसेन जोशी से राग काफी में खयाल और उस्ताद अमीर खाँ से फिल्मी गीत की रचना सुनिए





उस्ताद अमीर खाँ
पण्डित  भीमसेन जोशी
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला ‘दस थाट, बीस राग और बीस गीत’ की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रचलन लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। दस थाटों की आधुनिक प्रणाली का सूत्रपात भातखण्डे जी ने ही किया था। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे काफी थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग काफी में निबद्ध खयाल रचना पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। साथ ही काफी थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत जन्य राग बागेश्री के स्वरों में पिरोया एक फिल्मी गीत का उदाहरण उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।



आधुनिक भारतीय संगीत में प्रचलित थाटों की श्रृंखला ‘दस थाट, बीस राग और बीस गीत’ की आज की कड़ी में हम ‘काफी’ थाट का परिचय प्राप्त करेंगे और इस थाट के आश्रय राग ‘काफी’ और इसी थाट के अन्तर्गत आने वाले राग बागेश्री में एक फिल्मी गीत का आनन्द भी लेंगे। परन्तु उससे पहले प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों में की गई थाट विषयक चर्चा की कुछ जानकारी आपसे बाँटेंगे। थाट को संस्कृत ग्रन्थों में मेल अर्थात स्वरों का मिलाना या इकट्ठा करना कहते हैं। इन ग्रन्थों में थाट अथवा मेल के विषय में जो व्याख्या की गई है, उसके अनुसार ‘वह स्वर-समूह थाट कहलाता है, जो राग-निर्मिति में सक्षम हो’। पण्डित सोमनाथ अपने ‘राग-विवोध’ के तीसरे अध्याय में मेलों को परिभाषित करते हुए लिखते हैं- ‘थाट इति भाषायाम’ अर्थात, मेल को भाषा में थाट कहते हैं। ‘राग-विवोध’ आज से लगभग चार सौ वर्ष पूर्व की रचना है। यह ग्रन्थ ‘थाट’ का प्राचीन आधार भी है। वर्तमान में प्रचलित दस थाटों का निर्धारण पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने किया है। आज हम आपसे थाट ‘काफी’ के विषय में कुछ चर्चा करेंगे। काफी थाट के स्वर हैं- सा, रे, ग॒, म, प, ध, नि॒। इस थाट में गान्धार और निषाद कोमल और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। काफी थाट का आश्रय राग ‘काफी’ होता है। राग ‘काफी’ में गान्धार और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। इसके आरोह के स्वर हैं- सारे, म, प, धनिसां तथा अवरोह के स्वर हैं- सां नि ध, प, म, रे, सा । इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है और इसका गायन-वादन समय मध्यरात्रि होता है। राग काफी में होली और रंगोत्सव अर्थात होली से सम्बन्धित रचनाएँ खूब निखरती हैं। आइए, सुप्रसिद्ध गायक पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में राग काफी की एक बन्दिश सुनते हैं।

राग काफी : ‘बावरे गम दे गयो री...’ : पण्डित भीमसेन जोशी


इस थाट के अन्तर्गत आने वाले कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- भीमपलासी, पीलू, बागेश्री, आभोगी, चन्द्रकौंस, जोग, धानी, नीलाम्बरी, बहार, नायकी कान्हड़ा, गौड़ मल्हार आदि। राग बागेश्री भारतीय संगीत का अत्यन्त मोहक राग है। कुछ विद्वान इस राग को बागेश्वरी नाम से भी पुकारते हैं, किन्तु सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी गंगूबाई हंगल के मतानुसार इस राग का नाम बागेश्री अधिक उपयुक्त होना चाहिए। इस राग को काफी थाट से अन्तर्गत माना जाता है। राग का एक प्रचलित स्वरूप भी है, जिसके आरोह में ऋषभ स्वर वर्जित होता है और पंचम स्वर का अल्पत्व प्रयोग किया जाता है। अवरोह में सातों स्वर प्रयोग होते हैं। इस प्रकार यह राग षाड़व-सम्पूर्ण जाति का हो जाता है। कुछ विद्वान आरोह में ऋषभ के साथ पंचम स्वर भी वर्जित करते हैं। इस राग में गान्धार और निषाद स्वर कोमल तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। कर्नाटक पद्धति में इस राग के समतुल्य राग नटकुरंजी है, जिसमें पंचम स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। राग बागेश्री में यदि पंचम और कोमल निषाद का प्रयोग न किया जाए तो यह राग आभोगी की अनुभूति कराता है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। रात्रि के दूसरे प्रहर, विशेष रूप से मध्यरात्रि में इस राग का सौन्दर्य खूब निखरता है। इस राग में भक्ति और श्रृंगार रस की रचनाएँ भली लगती है। अब हम आपको राग बागेश्री में बँधी एक मोहक फिल्मी गीत का रसास्वादन कराते हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद अमीर खाँ। 1960 में प्रदर्शित बाँग्ला फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ से यह गीत हमने लिया है। कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कथा पर विख्यात फिल्म-शिल्पी तपन सिन्हा के निर्देशन में फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ का निर्माण किया गया था। फिल्म की मुख्य भूमिका में सौमित्र चटर्जी और अरुन्धति देवी ने अभिनय किया था। फिल्म की कहानी के केन्द्र में एक शापित हवेली है, जिसमें एक सरकारी कारिन्दा उलझ जाता है। इस फिल्म का सर्वाधिक उललीखनीय पक्ष इसका संगीत है। मैहर परम्परा के उस्ताद अली अकबर खाँ फिल्म के संगीतकार थे। फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ में उन्होने एक गीत एक छोटा खयाल के रूप में शामिल किया था, जिसे उस्ताद अमीर खाँ और प्रतिमा बनर्जी ने राग बागेश्री में गाया था। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग बागेश्री : ‘कैसे कटे रजनी...’ : उस्ताद अमीर खाँ और प्रतिमा बनर्जी : फिल्म - क्षुधित पाषाण



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 367वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक पुरानी फिल्म से रागबद्ध हिन्दी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 370वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस उस्ताद गायक के मुख्य स्वर है।?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 12 मई, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 370वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 366वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1960 में प्रदर्शित ऐतिहासिक फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा गया था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग - सोहनी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल - दीपचन्दी और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, गायक - उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया कोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला “दस थाट, बीस राग और बीस गीत” की सातवीं कड़ी में आपने काफी थाट का परिचय प्राप्त किया और इस थाट के आश्रय राग काफी में पिरोया एक खयाल सुविख्यात गायक पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में रसास्वादन किया। इसके साथ ही काफी थाट के जन्य राग बागेश्री में निबद्ध बाँग्ला फिल्म “क्षुधित पाषाण” का एक फिल्मी गीत उस्ताद अमीर खाँ और प्रतिमा बनर्जी के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी अगली श्रृंखला में आपको विभिन्न रागों से रोगों के उपचार का तरीका बताया जाएगा। हमारी नई श्रृंखला अथवा आगामी श्रृंखलाओं के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग काफी और बागेश्री : SWARGOSHTHI – 368 : RAG KAFI & BAGESHRI : 6 मई, 2018 


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