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Wednesday, January 27, 2010

दुखाए दिल जो किसी का वो आदमी क्या है.. मुज़फ़्फ़र वारसी के शब्दों के सहारे पूछ रही हैं मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहां

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #६८

पिछली दो कड़ियों से न जाने क्यों वह बात बन नहीं पा रही थी, जिसकी दरकार थी। वैसे कारण तो हमें भी पता है और आपको भी। हम इसलिए नहीं बताना चाहते कि खुद की क्या टाँग खींची जाए और आप तो आप ठहरे.. भला आप किसी का दिल क्यों दुखाने लगे। चलिए हम हीं बताए देते हैं... कारण था आलस्य। जैसा कि हमने पिछली कड़ी में यह वादा किया था कि अगली बार चाहे कितनी भी ठंढ क्यों न हो, चाहे कुहरा कितना भी घना क्यों न हो, हम अपनी महफ़िल को पर्याप्त समय देंगे.. बस ४५ मिनट में हीं इति-श्री नहीं कर देंगे और यह तो सभी जानते हैं कि जो वादा न निभाए वो प्यादा कैसा... माफ़ कीजिएगा शहजादा कैसा तो हमें वादा निभाना हीं था, आखिर हम भी तो कहीं के शहजादे हैं.... हैं ना, कहीं और के नहीं तो आपके दिलों के.... मानते हैं ना आप? हमें लगता है कि बातें ज्यादा हो गईं, इसलिए अब काम पर लग जाना चाहिए। काम से याद आया, हमने इन बातों को शुरू करने से पहले कुछ कहा था.. हाँ, यह कहा था कि आप किसी का दिल नहीं दुखाना चाहेंगे। तो हमारी आज की महफ़िल का संदेश भी यही है.. और आज की नज़्म इसी संदेश को पुख्ता करती है। शायर के लफ़्ज़ों में कहें तो "दुखाए दिल जो किसी का वो आदमी क्या है, किसी के काम न आए तो ज़िंदगी क्या है।" आदमी और ज़िंदगी की सही परिभाषा इससे बढकर क्या हो सकती है! कभी-कभी सोचता हूँ कि अगर शायर न होते तो इन बातों को हम तक पहुँचाता कौन। अब शायर की बात जो चल हीं निकली है तो लगे हाथों शायर से रूबरू भी हो लेते हैं। इस बेहतरीन नज़्म को लिखने वाले शायर का नाम है "मुज़फ़्फ़र वारसी"। अपनी पुस्तक "दर्द चमकता है- मुज़फ़्फ़र वारसी की गज़ले" के प्राक्कथन में सुरेश कुमार लिखते हैं: पाकिस्तानी शायरी में मुज़फ़्फ़र वारसी का नाम एक जगमगाते हुए नक्षत्र की तरह है। उन्होंने यद्यपि उर्दू शायरी की प्रायः सभी विधाओं में अपने विचारों को अभिव्यक्ति दी है। किन्तु उनकी लोकप्रियता एक ग़ज़लगों शायर के रूप में ही अधिक है।

मिरी जिंदगी किसी और की, मिरे नाम का कोई और है,
मिरा अक्स है सर-ए-आईना,पस-ए-आईना कोई और है।

जैसा दिलकश और लोकप्रिय शे’र कहने वाले मुज़फ़्फ़र वारसी ने साधारण बोलचाल के शब्दों को अपनी ग़ज़लों में प्रयोग करके उन्हें सोच-विचार की जो गहराइयाँ प्रदान की हैं, इसके लिए उन्हें विशेष रूप से उर्दू अदब में एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। मुज़फ़्फ़र वारसी पाकिस्तान के उन चन्द शायरों में से एक हैं, जिनकी ख्याति सरहदों को लाँघ कर तमाम उर्दू संसार में प्रेम और मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा के लिए खुशबू की तरह बिखरी हुई है। भारत और पाकिस्तान के अनेक विख्यात ग़ज़ल गायकों ने उनकी ग़ज़लों को अपना स्वर देकर उन्हें हिन्दी और उर्दू काव्य-प्रेमियों के बीच प्रतिष्ठित किया है। भारत से प्रकाशित होने वाली प्रायः सभी उर्दू पत्रिकाओं में कई दशकों से उनकी शायरी प्रकाशित हो रही है और वे भारत में भी उतने ही लोकप्रिय हैं, जितने कि पाकिस्तान में। ‘बर्फ़ की नाव’, ‘खुले दरीचे बन्द हवा’, ‘कमन्द’ मुज़फ़्फ़र वारसी की ग़ज़लों के प्रसिद्ध उर्दू संग्रह हैं। दर्द चमकता है देवनागरी में उनका पहला ग़ज़ल संग्रह है।
मुज़फ़्फ़र वारसी एक ऐसे शख्सियत हैं जिनकी उपलब्धियों को बस एक पैराग्राफ़ में नहीं समेटा जा सकता। हमारी मजबूरी है कि हम इनके बारे में आज इससे ज्यादा नहीं लिख सकते, लेकिन वादा करते हैं कि अगली बार जब भी इनकी कोई गज़ल या कोई नज़्म हमारी महफ़िल में शामिल होगी, हम पूरी की पूरी महफ़िल इनके हवाले कर देंगे।

शायर के बाद अब हम इस्तेकबाल करते हैं आज की नज़्म को अपनी आवाज़ से सजाने वाली फ़नकारा का। इन फ़नकारा के बारे में यह कहना हीं काफ़ी होगा कि हर उदीयमान गायक की प्रेरणास्रोत स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने भी जब अपने कैरियर का आगाज किया तो उनपर इनकी गायकी का प्रभाव था। जन्म से अल्ला वसई और प्यार से नूरजहां कही जाने वाली इन फ़नकारा का जन्म २१ सितंबर १९२६ को अविभाजित भारत भारत के कसूर(पंजाब का एक छोटा-सा शहर) नामक स्थान पर हुआ था। (सौजन्य: जागरण): नूरजहां का जन्म पेशेवर संगीतकार मदद अली और फतेह बीबी के परिवार में हुआ था। वह अपने माता-पिता की ११ संतानों में एक थीं। संगीतकारों के परिवार में जन्मीं नूरजहां का बचपन से ही संगीत के प्रति गहरा लगाव था। नूरजहां ने पांच-छह साल की उम्र से ही गायन शुरू कर दिया था। उनकी बहन आइदान पहले से ही नृत्य और गायन का प्रशिक्षण ले रही थीं। उन दिनों कलकत्ता थिएटर का गढ़ हुआ करता था। वहां परफार्मिंग आर्टिस्टों, पटकथा लेखकों आदि की काफी मांग थी। इसी को ध्यान में रखकर नूरजहां का परिवार १९३० के दशक के मध्य में कलकत्ता चला आया। जल्द ही नूरजहां और उनकी बहन को वहां नृत्य और गायन का अवसर मिल गया। उनकी गायकी से प्रभावित होकर संगीतकार गुलाम हैदर ने उन्हें के डी मेहरा की पहली पंजाबी फिल्म शीला उर्फ पिंड दी कुड़ी में बाल कलाकार की संक्षिप्त भूमिका दिलाई। १९३० के दशक के उत्तरा‌र्द्ध तक लाहौर में कई स्टूडियो अस्तित्व में आ गए। गायकों की बढ़ती मांग को देखते हुए नूरजहां का परिवार १९३७ में लाहौर आ गया। डलसुख एल पंचोली ने बेबी नूरजहां को गुल-ए-बकवाली फिल्म में भूमिका दी। इसके बाद उनकी यमला जट (१९४०), चौधरी फिल्म प्रदर्शित हुई। इनके गाने काफी लोकप्रिय हुए। वर्ष १९४२ में नूरजहां ने अपने नाम से बेबी शब्द हटा दिया। इसी साल उनकी फिल्म खानदान आई जिसमें पहली बार उन्होंने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इसी फिल्म के निर्देशक शौकत हुसैन रिजवी के साथ उन्होंने शादी की। वर्ष १९४३ में नूरजहां बंबई चली आईं। महज चार साल की संक्षिप्त अवधि के भीतर वह अपने सभी समकालीनों से काफी आगे निकल गईं। भारत और पाकिस्तान दोनों जगह के पुरानी पीढ़ी के लोग उनकी क्लासिक फिल्मों के आज भी दीवाने हैं। अनमोल घड़ी (१९४६) और जुगनू (१९४७) उनकी सबसे बड़ी हिट फिल्म है। अनमोल घड़ी का संगीत नौशाद ने दिया था। उसके गीत आवाज दे कहां है, जवां है मोहब्बत, और मेरे बचपन के साथी जैसे गीत आज भी लोगों की जुबां पर हैं। नूरजहां विभाजन के बाद अपने पति के साथ बंबई छोड़कर लाहौर चली गईं।

रिजवी ने एक स्टूडियो का अधिग्रहण किया और उन्होंने शाहनूर स्टूडियो शुरू किया। शाहनूर प्रोडक्शन ने फिल्म चन्न वे (१९५०) का निर्माण किया जिसका निर्देशन नूरजहां ने किया। यह फिल्म बेहद सफल रही। इसमें तेरे मुखड़े पे काला तिल वे जैसे लोकप्रिय गाने थे। उनकी पहली उर्दू फिल्म दुपट्टा थी। इसके गीत चांदनी रातें...चांदनी रातें आज भी लोगों की जुबां पर हैं। जुगनू और चन्ना वे की ही तरह इसका भी संगीत फिरोज निजामी ने दिया था। नूरजहां की आखिरी फिल्म बतौर अभिनेत्री बाजी थी जो १९६३ में प्रदर्शित हुई। उन्होंने पाकिस्तान में १४ फिल्में बनाईं जिसमें १० उर्दू फिल्में थीं। उन्होंने अपने से नौ साल छोटे एजाज दुर्रानी से दूसरी शादी की। पारिवारिक दायित्वों के कारण उन्हें अभिनय को अलविदा करना पड़ा। हालांकि, उन्होंने गायन जारी रखा। पाकिस्तान में पा‌र्श्व गायक के तौर पर उनकी पहली फिल्म जान-ए-बहार (१९५८) थी। उन्होंने अपने आधी शताब्दी से अधिक के फिल्मी कैरियर में उर्दू, पंजाबी और सिंधी आदि भाषाओं में १० हजार गाने गाए। उन्हें मनोरंजन के क्षेत्र में पाकिस्तान के सर्वोच्च सम्मान तमगा-ए-इम्तियाज से सम्मानित किया गया था। दिल का दौरा पड़ने से नूरजहां का २३ दिसंबर २००० को निधन हो गया।
यह थी नूरजहां की संक्षिप्त जीवनी। वैसे क्या आपको पता है कि महज ४ सालों में हीं नूरजहां ने हिन्दी-फिल्मी संगीत के आसमान में अपनी स्थिति एक खुर्शीद-सी कर ली थी और इसी कारण इन्हें मल्लिका-ए-तरन्नुम कहा जाने लगा था और यकीन मानिए आज तक यह उपाधि उनसे कोई छीन नहीं पाया है। कहते हैं कि १९४७ में जब नूरजहां ने पाकिस्तान जाने का फैसला लिया था तो खुद युसूफ़ साहब यानि कि दिलीप कुमार ने इनसे हिन्दुस्तान में बने रहने का आग्रह किया था.. अलग बात है कि नूरजहां ने उनकी यह पेशकश यह कहकर ठुकरा दी थी कि "मैं जहां पैदा हुई हूं वहीं जाउंगी।" उनका निर्णय सही था या गलत यह तो वही जानें लेकिन शायद उनके इसी स्वाभिमान को कभी-कभार कुछ लोग उनका घमंड मान बैठते थे। उदाहरण के लिए: कथा-साहित्य के किंवदंती पुरुष सआदत हसन मंटो की नजर में वह मल्लिका-ए-तरन्नुम तो थीं, पर उन्हें वह बददिमाग और नखरेबाज मानते थे। ऐसा क्यों..अगर आप यह जानना चाहते हों तो नूरजहां के अगले गाने का इंतज़ार करें, तभी इस राज़ पर से परदा उठाया जाएगा। कहते हैं ना कि इंतज़ार का फल मीठा होता है, इसलिए "थोड़ा इंतज़ार का मज़ा लीजिए"।

इन बातों के बाद अब वक्त है आज की नज़्म का, जिसे हमने १९६८ में रीलिज हुई फिल्म अदालत से लिया है। नज़्म में संगीत है जनाब तस्सादक हुसैन का। बोल हैं....आप तो जानते हैं कि इस नज़्म में बोल किसके हैं। इस गीत में बड़े हीं तफ्शील से यह बताया गया है कि सही आदमी की पहचान कैसे की जाए। आपको भी जानना हो तो लीजिए पेश-ए-खिदमत है आज की प्रस्तुति:

दुखाए दिल जो किसी का वो आदमी क्या है,
किसी के काम न आए तो ज़िंदगी क्या है।

किसी को तुझ से गिला तेरी बेरूखी का न हो,
जो हो चुका है तेरा तू अगर उसी का न हो,
फिर उसके वास्ते ये क़ायनात भी क्या है,
किसी के काम न आए तो ज़िंदगी क्या है।

किसी के दिल की तू _____ है क़रार नहीं,
खिलाए फूल जो ज़ख्मों के वो बहार नहीं,
जो दूसरों के लिए ग़म हो वो खुशी क्या है,
किसी के काम न आए तो ज़िंदगी क्या है।

ये क्या कि आग किसी की हो और कोई जले,
बने शरीक-ए-सफ़र जिसका उससे बचके चले,
जो फ़ासले न मिटा दे वो प्यार हीं क्या है,
किसी के काम न आए तो ज़िंदगी क्या है।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "सूरत" और पंक्तियाँ कुछ इस तरह थीं -

जो भी देखे उनकी सूरत
झुकी झुकी अंखियों से प्यार करे

नज़्म को सुनकर इस शब्द की सबसे पहले सही पहचान की सीमा जी ने। हमारी महफ़िल की शोभा बनना सीमा जी आपकी आदत हो चली है। बड़ी हीं भली आदत है..इसे कभी बिगड़ने मत दीजियेगा। ये रही आपकी पेशकश:

ऐ बादशाह्-ए-ख़बाँ-ए-जहाँ तेरी मोहिनी सुरत पे क़ुर्बाँ
की मैं ने जो तेरी जबीं पे नज़र मेरा चैन गया मेरी नींद गई (बहादुर शाह ज़फ़र)

ऊषा के सँग, पहिन अरुणिमा
मेरी सुरत बावली बोली-
...मेरा कौन कसाला झेले? (माखनलाल चतुर्वेदी)

तुम्हारी सुरत पे आईना ठहरता नही
इस सुरत से जमाना गुजरता नही (अजय निदान)

शरद जी ने खुद के लिखे शेर के साथ महफ़िल में हाज़िरी लगाई। साथ-साथ आपने दूसरे शायरों के शेर भी कहे:

जब से मेघों से मुहब्बत हो गई है, सूर्य की धुंधली सी सूरत हो गई है,
झूमता है चन्द्र मुख को देख सागर, आदमी सी इसकी आदत हो गई है। (स्वरचित)

हालाते जिस्म सूरते जाँ और भी खराब, चारों तरफ़ खराब यहाँ और भी खराब,
सोचा था उनके देश में मंहगी है ज़िन्दगी, पर ज़िन्दगी का भाव वहाँ और भी खराब। (दुष्यन्त कुमार)

अजीब सूरते हालात होने वाली है, सुना है, अब के उसे मात होने वाली है,
मैं थक के गिरने ही वाला था उसके कदमों में, मेरी नफ़ी मेरा इसबात होने वाली है। (अमीर क़ज़लबाश)

अवध जी, आपने हबीब वली साहब की बेहतरीन गज़लों/नज़्मों का जो लेखाजोखा हमारे सामने रखा है, हम कोशिश करेंगे कि आने वाले दिनों में ये सारी हीं महफ़िल की रौनक बन जाएँ। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। ये रहे आपकी तरकश के तीर:

कोई उम्मीद बर नहीं आती, कोई सूरत नज़र नहीं आती.
मौत का एक दिन मुअय्यन है, नींद क्यों रात भर नहीं आती. (मिर्ज़ा ग़ालिब)

या कोई जान बूझ कर अनजान बन गया
या फिर यही हुआ मेरी सूरत बदल गयी। (अदम)

आगे की महफ़िल को हर बार की तरह हीं शामिख जी ने अकेले संभाला। आपने कई सारे शेर पेश किए। हम उनमें से कुछ मोती चुनकर लाए हैं:

जब भी चाहें एक नई सूरत बना लेते हैं लोग
एक चेहरे पर कई चेहरे सजा लेते हैं लोग (क़तील शिफ़ाई)

कोई सूरत भी मुझे पूरी नज़र आती नहीं
आँख के शीशे मेरे चुटख़े हुये हैं कब से
टुकड़ों टुकड़ों में सभी लोग मिले हैं मुझ को (गुलज़ार)

देखा था जिसे मैंने कोई और था शायद
वो कौन है जिससे तेरी सूरत नहीं मिलती (निदा फ़ाज़ली)

वो प्यारी प्यारी सूरत, वो कामिनी सी मूरत
आबाद जिस के दम से था मेरा आशियाना (इक़बाल)

मंजु जी , बड़ी देर कर दी आपने आने में। हमारी महफ़िल का पता भूल गई थीं क्या? कुछ और देर करतीं तो अगली महफ़िल में आपसे मिलना होता। यह रहा आपकी स्वरचित पंक्तियाँ:

जब -जब तुम मुझ से बिछुड़ते हो ,
तब -तब तेरी मोहिनी सूरत सूरज -चाँद -सी साथ निभाती है .

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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