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Monday, August 9, 2010

तू नहीं तो ज़िंदगी में और क्या रह जाएगा...इफ़्तिख़ार साहब का दर्द और चित्र सिंह की सशक्त अभिव्यक्ति

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 457/2010/157

'सेहरा में रात फूलों की' इस शृंखला की आज है सातवीं कड़ी। कल की कड़ी में आपने जगजीत सिंह की आवाज़ सुनी थी। दोस्तों, जिस तरह से बहुत सारे संगीतकार जोड़ी के रूप में फ़िल्म जगत के मैदान पर उतरे हैं और आज भी उतर रहे हैं, वैसे ही ग़ज़लों की दुनिया में भी कुछ गायक अपने पार्टनर के साथ सामने आए हैं। दो ऐसी जोड़ियाँ जो सब से ज़्यादा लोकप्रिय रही हैं, वो हैं भूपेन्द्र और मिताली की जोड़ी, और जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की जोड़ी। इन दोनों जोड़ियों के जोड़ीदार व्यक्तिगत ज़िंदगी में पति-पत्नी भी हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि मैं ये सब यहाँ लेकर क्यों बैठ गया। भई हम बस इतना कहना चाहते हैं कि जब कल जगजीत जी की आवाज़ शामिल हो ही चुकी है, तो क्यों ना आज उनकी पत्नी और सुप्रसिद्ध ग़ज़ल गायिका चित्रा सिंह की भी आवाज़ सुन ली जाए। चित्रा सिंह ने जहाँ एक तरफ़ जगजीत जी के साथ बहुत सी युगल ग़ज़लें गायी हैं, उनकी एकल ग़ज़लों की फ़ेहरिस्त भी छोटी नहीं है। फ़िल्मों की बात करें तो 'साथ साथ' और 'अर्थ' चित्रा जी के करीयर की दो महत्वपूर्ण फ़िल्में रही हैं। 'साथ साथ' की ग़ज़ल तो हमने कल ही सुनी थी, तो आज क्यों ना फ़िल्म 'अर्थ' की एक बेहद ख़ूबसूरत ग़ज़ल हो जाए चित्रा जी की एकल आवाज़ में। वैसे अगर कल आपने ग़ौर फ़रमाया होगा तो कल की ग़ज़ल के शुरुआती लाइनों के आलाप में चित्रा जी की आवाज़ को ज़रूर पहचान लिया होगा। ख़ैर, आज की ग़ज़ल है "तू नहीं तो ज़िंदगी में और क्या रह जाएगा, दूर तक तन्हाइयों का सिलसिला रह जाएगा"। कल की तरह आज भी मौसीकार हैं कुलदीप सिंह। 'अर्थ' महेश भट्ट निर्देशित फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे शबाना आज़्मी, कुलभूषण खरबंदा, स्मिता पाटिल, राज किरण, रोहिणी हत्तंगड़ी प्रमुख। अपनी आत्मकथा पर आधारित इस फ़िल्म की कहानी लिखी थी ख़ुद महेश भट्ट ने (उनके परवीन बाबी के साथ अविवाहिक संबंध को लेकर)। इस फ़िल्म को बहुत सारे पुरस्कार मिले। फ़िल्मफ़ेयर के अंतर्गत सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री (शबाना आज़्मी), सर्बश्रेष्ठ स्कीनप्ले (महेश भट्ट) और सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री (रोहिणी हत्तंगड़ी)। शबाना आज़्मी को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार (सिल्वर लोटस) भी मिला था इसी फ़िल्म के लिए।

और अब हम आते हैं इस ग़ज़ल के शायर पर। यह ग़ज़ल किसी फ़िल्मी गीतकार ने नहीं लिखी है, बल्कि यह कलाम है इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दिक़ी का। सिद्दिक़ी साहब को उर्दू साहित्य के एक सशक्त स्तंभ माना जाता है। उर्दू मासिक पत्रिका 'शायर' के सम्पादक के रूप में उन्होने इस भाषा की जो सेवा की है, वो उल्लेखनीय है। उनको ये शेर-ओ-शायरी विरासत में ही मिली थी। उनके दादा अल्लामा सीमब अकबराबादी और पिता इजाज़ सिद्दिक़ी जाने माने शायर रहे। सन् २००१ में इफ़्तिख़ार साहब एक ट्रेन हादसे का शिकार होने के बाद बिस्तर ले लिया है। यह हादसा एक भयानक हादसा था उनके जीवन का। हुआ युं था कि वो एक मुशायरे में भाग लेकर वापस घर लौट रहे थे मुंबई के लोकल ट्रेन में। वो अपनी माँ से मोबाइल पर बात करना चाहते थे, लेकिन क्योंकि ट्रेन के कमरे में सिगनल नहीं मिल रहा था, तो वो प्लैटफ़ॊर्म पर उतरे और बात करने लगे, इस बात से बिलकुल बेख़बर कि पीछे ट्रेन चल पड़ी है। जब उन्हे इस बात का अहसास हुआ तो दौड़ कर ट्रेन में चढ़ने की कोशिश की लेकिन फ़िसल कर ट्रेन के नीचे आ गए। ऐसे में ९९% मौकों पर इंसान का बच पाना संभव नहीं होता, लेकिन इफ़्तिख़ार साहब पर ख़ुदा की नेमत थी कि वो बच गए। लेकिन सर पर घातक चोट लगने की वजह से उनका पूरा शरीर लकवाग्रस्त हो गया। अभी हाल ही में, २४ मई २०१० के दिन उनकी माँ मनज़ूर फ़ातिमा का निधन हो गया जो ९१ वर्ष की थीं। दोस्तों, अगर आप इफ़्तिख़ार साहब से सम्पर्क करना चाहते हैं तो यह रहा पता:

'शायर' पत्रिका, पोस्ट बॊक्स नं: ३७७०, गिरगाम पोस्ट ऒफ़िस, मुंबई-४००००४.

दोस्तों, 'आवाज़' परिवार की तरफ़ से इफ़्तिख़ार साहब के लिए यही दुआ करते हुए कि वो जल्द से जल्द ठीक हो जाएँ, स्वस्थ हो जाएँ, आपको सुनवा रहे हैं चित्रा सिंह की गायी यह ग़ज़ल फ़िल्म 'अर्थ' से। इस ग़ज़ल के चार शेर ये रहे...

तू नहीं तो ज़िंदगी में और क्या रह जाएगा,
दूर तक तन्हाइयों का सिलसिला रह जाएगा।

दर्द की सारी तहें और सारे गुज़रे हादसे,
सब धुआँ हो जाएँगे एक वाक़िया रह जाएगा।

युं भी होगा वो मुझे दिल से भुला देगा मगर,
ये भी होगा ख़ुद से उसी में एक ख़ला रह जाएगा।

दायरे इंकार के इकरार की सरग़ोशियाँ,
ये अगर टूटे कभी तो फ़ासला रह जाएगा।



क्या आप जानते हैं...
कि चित्रा सिंह और जगजीत सिंह ने साथ मिलकर अपना पहला ऐल्बम सन् १९७६ में जारी किया था जिसका शीर्षक था 'दि अनफ़ॊरगेटेबलस'।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. एक बार फिर खय्याम साहब हैं सगीतकार, शायर बताएं - ३ अंक.
२. गायक बताएं - २ अंक.
३. वास्तविक जीवन में ये पति पत्नी है और ऑन स्क्रीन भी इस जोड़ी ने कमाल किया है, कौन दो स्टार है इस फिल्म के प्रमुख अभिनेता अभिनेत्री - १ अंक.
४. एतिहासिक पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म के निर्देशक कौन हैं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
पवन जी और अवध जी दोनों ही चूक गए इस बार, बस एक गोस्त बस्टर जी हैं जिनका जवाब सही रहा.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, August 8, 2010

तुमको देखा तो ये ख्याल आया....कि इतनी सुरीली गज़ल पर क्यों न हम कुर्बान जाए

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 456/2010/156

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के एक नए सप्ताह के साथ हम हाज़िर हैं। इससे पहले कि हम आज की प्रस्तुति की शुरुआत करें, आपको हम यह याद दिलाना चाहेंगे कि 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आप अपने फ़रमाइश के गीत सुन सकते हैं अपने नाम के साथ। आपको बस इतना करना है कि अपने पसंद का गीत और अगर कोई याद उस गीत से जुड़ी हुई है तो उसे एक ई-मेल में लिख कर हमें oig@hindyugm.com के पते पर भेज दीजिए। साथ ही अगर आप कोई सुझाव देना चाहें तो भी इसी पते पर आप हमे लिख सकते हैं। हमें आपके ई-मेल का इंतेज़ार रहेगा। दोस्तों, इन दिनों आप 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आनंद ले रहे हैं ८० के दशक के कुछ चुनिंदा फ़िल्मी ग़ज़लों का लघु शृंखला 'सेहरा में रात फूलों की' के अंतर्गत। इस दौर के ग़ज़ल गायकों की जब बात चलती है तो जो एक नाम सब के ज़ुबान पर सब से पहले आता है, वो नाम है जगजीत सिंह का। युं तो मेहदी हसन और ग़ुलाम अली ग़ज़लों के बादशाह माने जाते हैं, लेकिन जगजीत सिंह की गायकी कुछ इस तरह से आयी कि छोटे, बड़े, जवान, बूढ़े, सभी को उन्होने अपनी ओर आकर्षित किया और आज भी वो सब से लोकप्रिय ग़ज़ल गायक बने हुए हैं। जगजीत सिंह ने ना केवल ग़ैर फ़िल्मी ग़ज़लों की लड़ी लगा दी, बल्कि फ़िल्मों के लिए भी ग़ज़लों को थोड़े हल्के फुल्के अंदाज़ में पेश कर ख़ूब ख़ूब तारीफ़ें बटोरी। ऐसे में इस शृंखला में बेहद ज़रूरी हो जाता है कि उनकी गायी कोई फ़िल्मी ग़ज़ल आप तक पहुँचायी जाए। तो हमने फ़िल्म 'साथ साथ' की एक ग़ज़ल चुनी है, और इसे इसलिए चुना क्योंकि इस फ़िल्म के जो संगीतकार हैं उनका नाम भी ग़ैर फ़िल्मी ग़ज़लों को कॊम्पोज़ करने के लिए काफ़ी जाना जाता है। कुलदीप सिंह। जी हाँ, फ़िल्म 'साथ साथ' में कुलदीप सिंह का संगीत था और इस फ़िल्म के जिस ग़ज़ल को हमने चुना है वह है "तुमको देखा तो ये ख़याल आया, ज़िंदगी धूप तुम घना साया"। दोस्तों, ग़ज़ल एक शायर के जज़्बाती दिल बयान करती है। और जगजीत सिंह का भी हमेशा यही मक़सद रहता है कि उनके गाए ग़ज़लों में जज़्बात पूरी तरह से बाहर निकल सामने आए। जगजीत सिंह का पहला एल.पी रेकॊर्ड सन् १९७६ में बना जो लोगों के दिलों में घर कर गई थी। एक ग़ज़ल गायक होने के साथ साथ वो एक संगीतकार भी हैं। उन्होने पाश्चात्य संगीत को शास्त्रीय संगीत के साथ ब्लेण्ड करके ग़ज़ल को ख़ास-ओ-आम बनाया है।

फ़िल्म 'साथ साथ' में गानें लिखे थे जावेद अख़्तर साहब ने। उनकी ही ज़ुबानी पढ़ते हैं इस ग़ज़ल के बनने की कहानी के रूप में - "तुमको देखा तो ये ख़याल आया, ज़िंदगी धूप तुम घना साया, कई दिनों से इस ग़ज़ल के लिए रमण साहब मेरे पीछे पड़े हुए थे, और मैं आज नहीं कल, कल नहीं परसों कर रहा था। एक रात, दो बजे, उन्होने मुझसे पूछा कि आज भी नहीं हुआ? मैंने कहा, लाओ क़ाग़ज़ कलम दो, और मैंने ८/९ मिनट में ग़ज़ल लिख दिया और लोगों को पसंद भी आया। फ़िल्म में वो पोएट का करेक्टर था जिस पर यह ग़ज़ल लिखना था, इसलिए मुझे काफ़ी लिबर्टी मिल गई। और रमण कुमार को भी ज़बान का सेन्स था, इससे मेरा काम आसान हो गया। जिनको ज़बान की अकल होती है, उनके साथ काम करना आसान हो जाता है।" दोस्तों, फ़िल्म 'साथ साथ' सन् १९८२ की फ़िल्म थी जो ४ मार्च को प्रदर्शित हुई थी। निर्देशक का नाम तो आप जावेद साहब से सुन ही चुके हैं; फ़िल्म का निर्माण किया था दिलीप धवन ने। डेविड धवन ने एडिटिंग् का पक्ष संभाला था। फ़िल्म की कहानी रमण साहब ने ही लिखी थी और मुख्य कलाकारों में शामिल थे राकेश बेदी, सुधा चोपड़ा, फ़ारुख़ शेख़, नीना गुप्ता, ए.के. हंगल, अवतार गिल, दीप्ती नवल, जावेद ख़ान, सतीश शाह, यूनुस परवेज़, गीता सिद्धार्थ, अंजन श्रीवास्तव प्रमुख। तो आइए सुना जाए यह कालजयी ग़ज़ल जिसके चार शेर इस तरह से हैं...

तुमको देखा तो ये ख़याल आया,
ज़िंदगी धूप तुम घना साया।

आज फिर दिल ने एक तमन्ना की,
आज फिर दिल को हमने समझाया।

तुम चले जाओगे तो सोचेंगे,
हमने क्या खोया हमने क्या पाया।

हम जिसे गुनगुना नहीं सकते,
वक़्त ने ऐसा गीत क्यों गाया।



क्या आप जानते हैं...
कि जगजीत सिंह को ग़ज़लों में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए भारत सरकार ने सन् २००३ में राष्ट्र के द्वितीय सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मविभूषण से सम्मानित किया था।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. एक हादसे के बाद इन्होने गाना छोड़ दिया था, हम किस गायिका की बात कर रहे हैं जिन्होंने इस गज़ल को गाया है - २ अंक.
२. इस गमजदा गज़ल के शायर कौन हैं - ३ अंक.
३. महेश भट्ट निर्देशित इस फिल्म में किन दो अभिनेत्रियों की अहम भूमिकाएं थी - १ अंक.
४. संगीतकार कौन है इस गज़ल के - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
पवन जी एक बार फिर ३ अंक ले गए, प्रतिभा जी, इंदु जी और किश जी को भी बधाई.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, March 21, 2010

इतनी शक्ति हमें देना दाता....एक प्रार्थना जो हर दिल को सकून देती है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 380/2010/80

'१० गीत समानांतर सिनेमा के' शृंखला में ये सुमधुर गानें इन दिनों आप सुन रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर। आज इस शृंखला की अंतिम कड़ी में प्रस्तुत है एक प्रार्थना गीत। १९८६ में एक फ़िल्म आई थी 'अंकुष' और इस फ़िल्म के लिए एक ऐसा प्रार्थना गीत रचा गया कि जिसे सुन कर लगता है कि किसी स्कूल का ऐंथेम है। "इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमज़ोर हो ना, हम चले नेक रस्ते पे हमसे भूल कर भी कोई भूल हो ना"। फ़िल्म 'गुड्डी' में "हम को मन की शक्ति देना" गीत की तरह इस गीत ने भी अपना अमिट छाप छोड़ा है। फ़िल्म तो थी ही असाधारण, लेकिन आज इसफ़िल्म के ज़िक्र से सब से पहले इस गीत की ही याद आती है। सुष्मा श्रेष्ठ और पुष्पा पगधरे की आवाज़ों में यह गीत है जिसे लिखा है अभिलाश ने और स्वरबद्ध किया है कुलदीप सिंह ने। जी हाँ, कल और आज मिलाकर हमने लगातार दो गीत सुनवाए कुलदीप सिंह के संगीत में। कल के गीत की तरह आज का यह गीत भी कुलदीप सिंह के गिने चुने फ़िल्मी गीतों में एक बेहद ख़ास मुकाम रखता है। 'अंकुष' का निर्माण एन. चन्द्रा ने किया था और उन्होने ही फ़िल्म को निर्देशित भी किया था। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे नाना पाटेकर, रबिया अमीन, अर्जुन चक्रबर्ती, मदन जैन, और निशा पालसीकर प्रमुख। यह एक ऒफ़बीट फ़िल्म थी और जिसकी कहानी कुछ युवाओं की कहानी थी जो बेमक़सद दिन भर गलियों, सड़कों पर घूमा करते हैं, एक दूसरे से मार पीट करते हैं, लोगों को तंग करते हैं। उनकी ज़िदगी में दो औरतों का पदर्पण होता है , एक वृद्ध महिला हैं और उनकी युवती बेटी अनीता जो एक स्कूल टीचर है। अनीता को उन गुंडे लड़कों का चाल चलन बिल्कुल पसंद नहीं, लेकिन बाद वह धीरे धीरे महसूस करती है कि ये युवक दरसल इस करप्ट समाज के सताए हुए हैं और सही दिशा मिले तो ये ज़िंदगी के सही मार्ग पर चल सकते हैं। बहुए ही अच्छी फ़िल्म है और सभी को यह फ़िल्म देखनी चाहिए। और इस पूरी कहानी का निचोड़ मौजूद है इस प्रार्थना गीत में। क्या ख़ूब कहा गया है इसमें कि "हम ना सोचें हमे क्या मिला है, हम यह सोचें किया क्या है अर्पण, फूल ख़ुशियों की बाटें सभी को, सब का जीवन ही बन जाए मधुवन"। वैसे इस गीत के दो वर्ज़न है, पुरुष वर्ज़न को अशोक खोसला, मुरलीधर, घनश्याम वास्वानी, शेखर शंकर और उनके साथियों ने गाया था। लेकिन आज हम आपको इसका फ़ीमेल वर्ज़न सुनवा रहे हैं।

हम शुक्रगुज़ार हैं विविध भारती के कि जिसने अपने समय के चर्चित और कमचर्चित कलाकारों को आमंत्रित किया, उनसे मुलाक़तें की, और एक ऐसे धरोहर का निर्माण किया कि जिससे हम सभी लाभांवित हो रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे। संगीतकार कुलदीप सिंह को विविध भारती ने आमंत्रित किया था। २९ जून २००५ को 'इनसे मिलिए' कार्यक्रम में प्रसारित इस मुलाक़ात में कुलदीप जी ने बताया कि वो फ़िल्म जगत में कैसे आए, और आज के इस गीत का भी उल्लेख किया था। आइए जानें उन्ही के शब्दों में। "मैं थिएटर प्लेज़ के म्युज़िक कॊम्पोज़ किया करता था, वहाँ रमण कुमार साहब मुझे सब से बड़ा म्युज़िक डिरेक्टर मानते थे। तो उन्होने जब अपनी फ़िल्म 'साथ साथ' प्लैन की तो बिना किसी दोराय के उन्होने मुझे चुन लिया और इस तरह से मैं फ़िल्म लाइन में आ गया।" और अब फ़िल्म 'अंकुष' के बारे में कुलदीप जी बताते हैं - "चन्द्रा साहब आए मेरे पास और कहने लगे कि हम सब एक टीम बना कर काम कर रहे हैं, सारे नए लोग हैं, लो बजट की एक फ़िल्म बना रहे हैं, आप साथ देंगे क्या? मेरे लिए ख़ुशकिस्मती थी और मैं राज़ी हो गया।" और दोस्तों, इस तरह से इतना ख़ूबसूरत गीत हम सब की नज़र किया कुलदीप सिंह ने। इस गीत को एक बार सुन कर दिल नहीं भरता। एक अजीब सी शांति मिलती है इस गीत को सुनते हुए। आज की तनाव भरी ज़िंदगी में, दफ़्तर से घर लौटने के बाद अगर इस गीत को सुनें तो यक़ीनन पूरे दिन भर की थकान दूर हो जाती है। दिन भर अगर हमारा मन यहाँ वहाँ की बातों में भटक जाता है तो यह गीत फिर से एक बार हमें जीवन का सही मार्ग दिखा जाता है। बड़ी शक्ति है इस गीत में। '१० गीत समानांतर सिनेमा के' शृंखला की अंतिम कड़ी में यह गीत सुन कर आपको भी ज़रूर अच्छा लग रहा होगा। अब यह शृंखला समाप्त करने की हमें दीजिए इजाज़त, 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के बारे में अपनी राय, सुझाव और फ़रमाइशें हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। धन्यवाद!



क्या आप जानते हैं...
कि गायिका पुष्पा पगधरे ने ओ. पी. नय्यर के संगीत में फ़िल्म 'बिन माँ के बच्चे' में गीत गाया था- "अपनी भी एक दिन ऐसी मोटर कार होगी" और "जो रात को जल्दी सोये और सुबह को जल्दी जागे"।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. रफ़ी साहब की मधुर आवाज़ में है ये गीत, गीत बताएं-३ अंक.
2. जन्म रावलपिण्डी में २१ जुलाई १९३० को जन्मे गीतकार को समर्पित है ये श्रृखला, कौन हैं ये गीतकार- २ अंक.
3. एक प्रेम कहानी है इस गीत में बयां, कौन हैं सगीतकार -२ अंक.
4. शशि कपूर नायक हैं फिल्म के, नायिका बताएं -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
एक बार फिर सभी को बहुत बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Saturday, March 20, 2010

कोई ये कैसे बताये कि वो तन्हा क्यों है....कैफी साहब और जगजीत सिंह जैसे चीर देते है दिल

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 379/2010/79

ल हमने १९८२ की फ़िल्म 'बाज़ार' का ज़िक्र किया था। आज भी हम १९८२ पर ही कायम हैं और आज की फ़िल्म है 'अर्थ'। 'अर्थ' महेश भट्ट निर्देशित फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे शबाना आज़्मी, कुलभूषण खरबंदा, स्मिता पाटिल, राज किरण, रोहिणी हत्तंगड़ी। यानी कि फिर एक बार समानांतर सिनेमा के चोटी के कलाकारों का संगम। अपनी आत्मकथा पर आधारित इस फ़िल्म की कहानी लिखी थी ख़ुद महेश भट्ट ने (उनके परवीन बाबी के साथ अविवाहिक संबंध को लेकर)। इस फ़िल्म को बहुत सारे पुरस्कार मिले। फ़िल्मफ़ेयर के अंतर्गत सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री (शबाना आज़्मी), सर्बश्रेष्ठ स्कीनप्ले (महेश भट्ट) और सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री (रोहिणी हत्तंगड़ी)। शबाना आज़्मी को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार (सिल्वर लोटस) भी मिला था इसी फ़िल्म के लिए। इस फ़िल्म का साउंडट्रैक भी कमाल का है जिसमें आवाज़ें हैं ग़ज़ल गायकी के दो सिद्धहस्थ फ़नकारों के - जगजीत सिंह और चित्रा सिंह। "झुकी झुकी सी नज़र", "तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो", "तेरे ख़ुशबू में बसे", "तू नहीं तो ज़िंदगी में" और "कोई यह कैसे बताए" जैसे गीतों/ग़ज़लों ने एक अलग ही समा बांध दिया था। और क्योंकि उस दौर में ग़ज़लों का भी ख़ूब शबाब चढ़ा हुआ था, इस वजह से ग़ज़लों के अंदाज़ के इन गीतों ने ख़ूब वाह वाही बटोरी। आज हमने इस फ़िल्म से चुना है "कोई यह कैसे बताए कि वह तन्हा क्यों है"। दरअसल ये एक नज़्म है, इसमें हम मुखड़ा और अंतरा अलग नहीं कर सकते। आम फ़िल्मी गीतों की तरह यहाँ अंतरा घूम कर वापस मुखड़े पर नहीं आता। इसलिए इस गीत के पूरे बोल हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं। कमाल की नज़्म है जिसे लिखा है कैफ़ी आज़्मी साहब ने। मौसिक़ी जिस शख़्स की है, उन पर भी हम चर्चा करेंगे अभी थोड़ी देर में, पहले आप कैफ़ी साहब के ये अल्फ़ाज़ पढ़िए।

कोई यह कैसे बताए कि वह तन्हा क्यों है,
वह जो अपना था वही और किसी का क्यों है,
यही दुनिया है तो फिर ऐसी यह दुनिया क्यों है,
यही होता है तो आख़िर यही होता क्यों है।

एक ज़रा हाथ बढ़ा दे तो पकड़ लें दामन,
उसके सीने में समा जाए हमारी धड़कन,
इतनी क़ुर्बत है तो फिर फ़ासला इतना क्यों है।

दिल-ए-बरबाद से निकला नहीं अब तक कोई,
एक लुटे घर पे दिया करता है दस्तक कोई,
आस जो टूट गई फिर से बंधाता क्यों है।

तुम मसर्रत का कहो या इसे ग़म का रिश्ता,
कहते हैं प्यार का रिश्ता है जनम का रिश्ता,
है जनम का जो यह रिश्ता तो बदलता क्यों है।


हाँ, अब हम आते हैं इस गीत के संगीतकार पर। कुलदीप सिंह ने फ़िल्म 'अर्थ' में संगीत दिया था। कुलदीप सिंह ग़ैर फ़िल्मी ग़ज़लों में संगीत देने के लिए बेहतर जाने जाते हैं, पर कुछ फ़िल्मों में भी उन्होने यादगार संगीत दिया है और 'अर्थ' उनके संगीत से सजा एक ऐसा ही फ़िल्म है। विविध भारती पर एक मुलाक़ात में कुलदीप साहब कहते हैं कि "संगीत की तरफ़ रुझान बचपन से ही था, मैं अपनी कम्युनिटी में, गुरुद्वारा में गाया करता था, एस एस सी तक स्कूल में ही अपने गुरु से सीखता रहा, फिर उसके बाद विशारद की। कालेज के दिनों में भी कई प्रतियोगिता खेले, कुछ हारे, कुछ जीते। मैंने एम ए किया है साइकोलोजी मे, पर प्रोफ़ेशन संगीत ही बन गया।" कुलदीप सिंह का रुझान शुरु शुरु में भले ही गायकी की तरफ़ था, पर उन्हे ऐसा लगने लगा था कि शायद गायन के क्षेत्र में ज़्यादा कुछ ना कर पाएँ, इसलिए उन्होने संगीतकार बनने की सोची। शास्त्रीय संगीत जगत के महान फ़नकार उस्ताद अमीर ख़ान साहब, उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ान साहब और पंडित भीमसेन जोशी उनके प्रेरणा स्त्रोत हैं जब कि फ़िल्म संगीत जगत मे सचिन देव बर्मन का संगीत सब से ज़्यादा उन्हे प्रभावित किया है। उन्होने अपने करीयर की शुरुआत कॊलेजों के लिए कोरल सॊंग्स और ग़ज़लें कॊम्पोज़ करने से किया था। दोस्तों, कुलदीप सिंह से जुड़ी कुछ बातें बहुत जल्द ही होंगी, फ़िल्हाल आइए सुनते हैं आज का गीत जगजीत सिंह की गम्भीर लेकिन मख़मली आवाज़ में।



क्या आप जानते हैं...
कि जगजीत सिंह का पहला एल.पी रिकार्ड सन् १९७६ में जारी हुआ था।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. एक अंतरे में शब्द आता है -"अर्पण", गीत बताएं-३ अंक.
2. गीतकार अभिलाष ने लिखा था ये अनमोल भजन, संगीतकार बताएं - २ अंक.
3. किन दो गायिकाओं की आवाजें हैं इसमें -२ अंक.
4. सीमित बजेट की ये फिल्म ८० के दशक में कामियाब रही थी, फिल्म का नाम बताएं-२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी, अनुपम जी, इंदु जी और पदम जी अंकों में बढ़ोतरी के लिए बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, July 24, 2008

सीखिए गायकी के गुर

गाना आए या न आए,गाना चाहिए...जनाब बाथरूम सिंगिंग छोडिये, और महफिलों की जान बनिए, आवाज़ पर संजय पटेल लेकर आए हैं, नए गायकारों के लिए मशहूर संगीतकार कुलदीप सिंह के सुझाये कुछ नायाब टिप्स...

दोस्तो,
एक संगीत प्रतियोगिता के संचालन के दौरान, मैंने बतौर निर्णायक उपस्थित, जाने माने संगीतकार कुलदीप सिंह (फ़िल्म साथ-साथ और अंकुश से मशहूर), जिन पर ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह को पहली बार पार्श्व गायन में उतारने का श्रेय भी है, से जानना चाहा कुछ ऐसे मशवरे, जो उभरते हुए नए गायकों, विशेषकर जो सुगम संगीत (गीत, ग़ज़ल,और भजन आदि ) गा रहे हैं या फ़िर इस क्षेत्र में अपनी किस्मत आजमाना चाहते हैं. कुलदीप जी ने जो बातें बतायीं वो आपके साथ बाँट रहा हूँ, एक बार फ़िर "आवाज़" के मध्यम से, तो गायक दोस्तो, नोट कर लीजिये कुछ अनमोल टिप्स :

- ज़्यादातर बाल कलाकार अपने गुरू का रटवाया हुआ गाते हैं.गुरूजनों का दायित्व है कि वे इस बात का ख़ास ख़याल रखें कि क्या जो बच्चे को सिखाया जा रहा है, वह उसकी उम्र पर फ़बता है.

- कविता/शायरी की समझ सबसे बड़ी चीज़ है.जब गा रहे हैं 'रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिये आ’ तो ये जानना ज़रूरी है कि एहमद फ़राज़ ने इस ग़ज़ल में क्या कहा है. यदि कबीर गा रहे हैं तो जानें कि ’जो भजे हरि को सदा; वही परम-पद पाएगा', ये परम-पद क्या बला है. रचना का तत्व जानें बिना गायकी में भाव पैदा करना मुमकिन नहीं.

- वह गाइये जा आपकी आवाज़ को सूट हो , इसलिये कोई ग़ज़ल,गीत या भजन न गाएँ कि वह बहुत सुना जाता है. क्या आपकी आवाज़ से वह बात जाएगी जो कविता/शायरी में कही गई है.आपकी आवाज़ और रचना की जुगलबंदी अनिवार्य है.

- तलफ़्फ़ुज़...उच्चारण ...सुगम संगीत की जान हैं. भजन,ग़ज़ल और गीत ..ये सब शब्द प्रधान गायकी के हिस्से हैं . यदि शब्द ही साफ़ नहीं सुनाई दिया तो आपके गाने का मक़सद पूरा नहीं होगा.सुगम संगीत में रचना की पहली पंक्ति सुनते ही श्रोता तय कर लेता है कि उसे ये रचना या इस गायक को पूरा सुनना है या नहीं.संगीत गुरू यदि भाषा की सफ़ाई का जानकार न हो तो ऐसे किसे व्यक्ति से संपर्क बनाए रखना चाहिये जो उच्चारण की नज़ाकत को जानता हो.(इस मामले में मैं रफ़ी साहब और लता जी को उच्चारण का शब्दकोश मानता हूँ; नई आवाज़ों को चाहिये कि वे इन दो गायको के गाए गीतों के शब्दों को बहुत ध्यान से सुनें)

- सरल गाना ज़्यादा कठिन है. बड़े और नामचीन गायकों को सुनिये ज़रूर, लेकिन फ़िज़ूल में उनकी आवाज़ की हरक़तों की नक़ल न करें. बात को सीधे सीधे कहिये .ज़्यादा घुमाव फ़िराव से शब्द प्रदूषित हो जाता है. जगजीतसिंह को सुनिये...कितना सादा गाते हैं .वे क्लासिकल पृष्ठभूमि से आए हैं, लेकिन जानते हैं कि ग़ज़ल गायकी की क्या ख़ूबी है.वे अपनी आवाज़ को बहुत लाजवाब तरीक़े से घुमाना जानते हैं (यक़ीन न हो तो फ़िल्म आविष्कार में उनका और चित्रा सिंह का गाया 'बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जा' ...सुनिये)लेकिन वे शब्द और सिर्फ़ शब्द का दामन ही नहीं छोड़ते.

- शास्त्रीय संगीत आधार है...यदि गाने के क्षेत्र में वाक़ई गंभीरता से आना चाहते हैं तो शास्त्रीय संगीत सीखे बिना क़ामयाबी संभव नहीं.

- देहभाषा (बॉडी लैंग्वेज), सहज रखिये...गले या शरीर के दीगर भागों पर गाने का तनाव मत लाईये...तसल्ली गाने की सबसे बड़ी चीज़ है. देखिये तो कभी मेहंदी हसन साहब को गाते हुए...कितनी शांति से सुर छेड़ते हैं...बल्कि उससे खेलते हैं...उसमें रम जाते हैं....गाते वक़्त गाने वाला ख़ुद अपने भीतर बैठे कवि को प्रकट कर दे यानी किसी रचना को ऐसे गाए जैसे वह उसी की लिखी है और यहाँ फ़िर वही बात लागू हो जाती कि कविता/शायरी की समझ के बिना ये संभव नहीं.

- सुनना और सुनना ...नई आवाज़ों को अपने क्षेत्र की (जिस भी विधा आप गाते हैं)पूर्ववर्ती वरिष्ठ कलाकारों की रेकॉर्डिंग्स सुनिये.अपने पसंदीदा गुलूकार का कलेक्शन सहेजिये..समझिये कैसे गाते रहे हैं ये बड़े कलाकार..सुनिये...गुनिये...और फ़िर गाइये.
विभिन्न विधाओं में इन आवाज़ों ज़रूर सुनें:

- नक़ल बड़ी ख़तरनाक़ चीज़ है...मत पड़िये इस उलझन में ..जब जब भी आप किसी अन्य गायक को दोहराएंगे..वही कलाकार याद आएंगे (जिसको आप दोहरा रहे हैं या नक़ल कर रहे हैं) आप स्थापित नहीं हो पाएंगे. भगवान ने आपके गले में जो दिया है उसे निखारिये.

- अच्छा कलाकार बनने से पहले अच्छा इंसान बनिये,और शऊर पैदा कीजिये ज़िन्दगी की अच्छी बातों को अपनाने का. गाते हैं तो साहित्य पढ़ने में कविता/शायरी सुनने,चित्रकला में रूचि लेने,अभिनय में, यानी दूसरी विधाओं से राब्ता रखने से आप बेहतर कलाकार बन सकते हैं.

ये बातें नई आवाज़ों के लिये निश्चित ही काम की हैं .इन बातों में मैंने कुलदीप सिंह जी के अलावा अपनी थोड़ी बहुत अक़्ल का इस्तेमाल भी किया है.

उम्मीद है इन बातों में दी गई नसीहतें और मशवरे,भजन,गीत और ग़ज़ल गाने वाले नए कलाकारों के लिये बहुमूल्य साबित होंगीं, शुभकामनाओं सहित.

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