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Wednesday, February 22, 2012

"हम चुप हैं कि दिल सुन रहे हैं..." - पर हमेशा के लिए चुप हो गए शहरयार!

१३ फ़रवरी २०१२ को जानेमाने शायर शहरयार का इन्तकाल हो गया। कुछ फ़िल्मों के लिए उन्होंने गीत व ग़ज़लें भी लिखे जिनका स्तर आम फ़िल्मी रचनाओं से बहुत उपर है। 'उमरावजान', 'गमन', 'फ़ासले', 'अंजुमन' जैसी फ़िल्मों की ग़ज़लों और गीतों को सुनने का एक अलग ही मज़ा है। उन्हें श्रद्धांजली स्वरूप फ़िल्म 'फ़ासले' के एक लोकप्रिय युगल गीत की चर्चा आज 'एक गीत सौ कहानियाँ' की आठवीं कड़ी में, सुजॉय चटर्जी के साथ...

एक गीत सौ कहानियाँ # 8

यूं तो फ़िल्मी गीतकारों की अपनी अलग टोली है, पर समय समय पर साहित्य जगत के जानेमाने कवियों और शायरों ने फ़िल्मों में अपना स्तरीय योगदान दिया है, जिनके लिए फ़िल्म जगत उनका आभारी हैं। ऐसे अज़ीम कवियों और शायरों के लिखे गीतों व ग़ज़लों ने फ़िल्म संगीत को न केवल समृद्ध किया, बल्कि सुनने वालों को अमूल्य उपहार दिया। ऐसे ही एक मशहूर शायर रहे शहरयार, जिनका हाल ही में देहान्त हो गया। अख़लक़ मुहम्मद ख़ान के नाम से जन्मे शहरयार को भारत का सर्वोच्च साहित्य सम्मान 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' से साल २००८ में सम्मानित किया गया था। ७५-वर्षीय इस अज़ीम शायर को एक लेखक और शिक्षक के रूप में बहुत इज़्ज़त तो मिली ही, इन्होंने मुज़फ़्फ़र अली की तमाम फ़िल्मों के लिए गानें भी लिखे। 'उमरावजान' की ग़ज़लें आज इतिहास बन चुकी हैं। "ये क्या जगह है दोस्तों", "इन आँखों की मस्ती के", "दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए", "ज़िन्दगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें" जैसी कालजयी ग़ज़लें हों या फ़िल्म 'गमन' की "सीने में जलन" या "अजीब सनीहा मुझ पर गुज़र गया" हो, शहरयार की हर रचना अपने आप में बेमिसाल है, लाजवाब है। फ़िल्म 'अंजुमन' की ग़ज़लें लोगों में ज़्यादा चर्चित न रही हों, पर कुछ लोगों को शबाना आज़मी की गाई इस फ़िल्म की "गुलाब जिस्म का" आज भी अच्छी तरह याद है।

फ़िल्म जगत में शहरयार का नाम भले मुज़फ़्फ़र अली की फ़िल्मों के साथ जोड़ा जाता हो, पर यश चोपड़ा ने ८० के दशक की अपनी फ़िल्म 'फ़ासले' के गीतकार के रूप में इन्हीं को चुना था। यश चोपड़ा की अन्य फ़िल्मों की तरह इस फ़िल्म ने कामयाबी के झंडे तो नहीं गाढ़े, पर इसके गीतों ने काफ़ी लोकप्रियता हासिल की। शिव-हरि का सुरीला संगीत पाकर शहरयार के नग़में जैसे खिल उठे। आशा भोसले की गाई ग़ज़ल "यूं तो मिलने तो हम मिले हैं बहुत, दरमियाँ फिर भी फ़ासले हैं बहुत" मेरी इस फ़िल्म की पसंदीदा ग़ज़ल है। पर सर्वसाधारण में फ़िल्म का जो गीत सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ था, वह था लता मंगेशकर और किशोर कुमार का गाया "हम चुप हैं कि दिल सुन रहे हैं, धड़कनों को, आहटों को, सांसें रुक सी गई हैं"। और शहरयार की सांसें रुक गईं अलीगढ़ में इस १३ फ़रवरी की शाम ८:३० बजे। उनके छोटे बेटे फ़रिदून, जो मुंबई में रहते हैं, ने बताया कि पिछले साल चिकित्सा के लिए उनके पिता मुंबई आए थे और उन्होंने यश चोपड़ा से मुलाक़ात भी की थी। शायद 'फ़ासले' के दिनों की यादें ही उन्हें खींच ले गई होंगी यश जी के पास।

फ़िल्म 'फ़ासले' का यह रोमांटिक डुएट "हम चुप हैं..." फ़िल्माया गया था रोहन कपूर और फ़रहा पर। इस लेख के लिए जब मैंने रोहन कपूर से सम्पर्क किया और उनसे शहरयार साहब और ख़ास कर इस गीत से जुड़ी उनकी यादों के बारे में पूछा तो उन्होंने कुछ इन शब्दों में जवाब दिया - "शहरयार साहब के गुज़र जाने की ख़बर सुन कर मुझे बहुत दुख हुआ। भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को 'quantity' में नहीं बल्कि 'quality' में तोली जानी चाहिए। वो सूक्ष्म और सच्चे लेखकों में से थे और मैं भगवान का आभारी हूँ कि मुझे उनके साथ काम करने का मौका मिला। एक रूमानी शायर... उन्होंने यश जी के लिए लिखा। यश जी, जो उस समय साहिर लुधियानवी से गीत लिखवाते थे, शहरयार साहब को बतौर गीतकार चुनना ही शहरयार साहब के लिए किसी जीत से कम नहीं थी। "हुम चुप हैं" शहरयार साहब ने लिखा और किशोर दा व लता जी नें बेहद ख़ूबसूरती के साथ गाया। यह फ़िल्म का पिक्चराइज़ होने वाला पहला गाना था। पूरा गीत स्विट्‍ज़रलैण्ड की पहाड़ों में फ़िल्माया गया था। कड़ाके की ठण्ड थी और मुझे व फ़रहा को इस गीत में रोमांटिक लिप-सिंक करना था, और वह भी टाइट कोज़-अप में। बहुत मुश्किल काम था। पर शिव-हरि की मेलडीयस धुन ने गीत को इतना सुंदर बना दिया कि हम दोनों ने गीत का हर छोटे से छोटा अंश को फ़िल्माने का भरपूर आनन्द लिया। ८० के दशक का यह एक सदाबहार गीत साबित हुआ था। इस गीत की यादें मेरे दिल में हमेशा ताज़ी रहेंगी।"

२७ सितंबर १९८५ को प्रदर्शित इस फ़िल्म में रोहन कपूर और फ़रहा के अतिरिक्त मुख्य भूमिकाओं में थे सुनिल दत्त, रेखा, दीप्ति नवल, राज किरण और फ़ारूक़ शेख़। शहरयार साहब के जाने की ख़बर सुन कर फ़ारूक़ शेख़ ने कहा - "उर्दू साहित्य जगत के लिए यह एक बहुत बड़ी क्षति है। शहरयार साहब ने मेरी फ़िल्मों - 'गमन', 'उमराव जान', 'अंजुमन' और 'फ़ासले' - के गीतों को लिखा था और हर एक गीत अपने आप में मास्टरपीस साबित हुए। ८० के दशक में मेरी उनसे कई बार मुलाक़ातें हुई हैं, और हाल में उनके बेटे के घर पर मीरा रोड में मुलाक़ात हुई थी जब वो अपनी कैन्सर की चिकित्सा के लिए आए थे। शहरयार साहब एक बहुत ही पढ़े हुए शायर थे जिन्होंने हमेशा इस बात का ख़याल रखा कि उनके लिखे शेर समाज को कुछ न कुछ संदेश ज़रूर दें। एक सच्चे कलाकार की तरह वो पब्लिसिटी से दूर रहना पसन्द करते थे। पर उनकी लेखनी ही उनकी ज़ुबान थी।"

शहरयार का जन्म १६ जून, १९३६ को बरेली के एक गाँव में हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा उन्होंने बुलन्दशहर में प्राप्त की और फिर उसके बाद वो जुड़े अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से। १९८६ में इसी यूनिवर्सिटी में उर्दू लेक्चरर की नौकरी मिल गई जहाँ से उन्होंने १९९६ में उर्दू डिपार्टमेण्ट के चेयरमैन के रूप में रिटायर किया। वो साहित्यिक पत्रिका 'शेर-ओ-हिकमत' के सम्पादक रहे, और १९८७ में अपनी काव्य संकलन 'ख़्वाब का दर बन्द है' के लिए उर्दू का 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' भी अर्जित किया। आज शहरयार इस फ़ानी दुनिया से बहुत दूर निकल चुके हैं पर उर्दू साहित्य जगत और सिने-संगीत जगत को जो भेंटें उन्होंने दी हैं, उनकी वजह से वो हमेशा के लिए अमर हो गए हैं। जिस तरह के इस गीत के बोल हैं कि "सांसें रुक सी गई हैं", ठीक वैसे ही उनके जाने के बाद वक़्त रुक गया है, यानी उनके लिखे गीत कालजयी हो गए हैं, उनकी ग़ज़लों पर वक़्त का कोई असर नहीं रहा।

लता-किशोर के गाए, शहरयार के लिखे व शिव-हरि के स्वरबद्ध किए फ़िल्म 'फ़ासले' के इस गीत को सुनने के लिए नीचे प्लेयर पर क्लिक करें...



तो दोस्तों, यह था आज का 'एक गीत सौ कहानियाँ'। आज बस इतना ही, अगले बुधवार फिर किसी गीत से जुड़ी बातें लेकर मैं फिर हाज़िर हो‍ऊंगा, तब तक के लिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

Monday, August 2, 2010

ये क्या जगह है दोस्तों.....शहरयार, खय्याम और आशा की तिकड़ी और उस पर रेखा की अदाकारी - बेमिसाल

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 452/2010/152

'सेहरा में रात फूलों की' - ८० के दशक की कुछ यादगार ग़ज़लों की इस लघु शृंखला की दूसरी कड़ी में आप सभी का स्वागत है। जैसा कि कल हमने कहा था कि इस शृंखला में हम दस अलग अलग शायरों के क़लाम पेश करेंगे। कल हसरत साहब की लिखी ग़ज़ल आपने सुनी, आज हम एक बार फिर से सन् १९८१ की ही एक बेहद मक़बूल और कालजयी फ़िल्म की ग़ज़ल सुनने जा रहे हैं। यह वह फ़िल्म है दोस्तों जो अभिनेत्री रेखा के करीयर की सब से महत्वपूर्ण फ़िल्म साबित हुई। और सिर्फ़ रेखा ही क्यों, इस फ़िल्म से जुड़े सभी कलाकारों के लिए यह एक माइलस्टोन फ़िल्म रही। अब आपको फ़िल्म 'उमरावजान' के बारे में नई बात और क्या बताएँ! इस फ़िल्म के सभी पक्षों से आप भली भाँति वाक़ीफ़ हैं। और इस फ़िल्म में शामिल होने वाले मुजरों और ग़ज़लों के तो कहने ही क्या! आशा भोसले की गाई हुई ग़ज़लों में किसे किससे उपर रखें समझ नहीं आता। "दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए" या फिर "इन आँखों की मस्ती के", या "जुस्तजू जिसकी थी उसको तो ना पाया हमने" या फिर "ये क्या जगह है दोस्तों"। एक से एक लाजवाब! उधर तलत अज़ीज़ के गाए "ज़िंदगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें" भी तो हमें एक अलग ही दुनिया में लिए जाते हैं जिसे सुन कर यह ज़मीं चांद से बेहतर हमें भी नज़र आने लगती हैं। मौसीकार ख़य्याम साहब ने इस फ़िल्म के लिए १९८२ का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीता था और राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित हुए थे। निर्देशक मुज़फ़्फ़र अली को भी सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था। आशा भोसले फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से अपना नाम वापस ले चुकीं थीं, इसलिए उनका नाम नॊमिनेशन में नहीं आया, और इस साल यह पुरस्कार चला गया परवीन सुल्ताना की झोली में फ़िल्म 'कुद्रत' के गीत "हमें तुम से प्यार कितना" के लिए। लेकिन आशा जी को इस फ़िल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से ज़रूर सम्मानित किया गया। दोस्तों, यह इतनी महत्वपूर्ण फ़िल्म रही ग़ज़लों की दृष्टि से कि इस शृंखला में इस फ़िल्म को नज़रंदाज़ करना बेहद ग़लत बात होती। तभी तो आज के लिए हमने चुना है "ये क्या जगह है दोस्तों"।

फ़िल्म 'उमरावजान' की कहानी और इस फ़िल्म के बारे में तो लगभग सभी कुछ आपको मालूम होगा, तो आइए आज ख़ास इस ग़ज़ल की ही चर्चा की जाए। चर्चा क्या साहब, ख़ुद ख़य्याम साहब से ही पूछ लेते हैं इसके बारे में, क्या ख़याल है? विविध भारती के 'संगीत सरिता' कार्यक्रम के सौजन्य से ये अंश हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं - "एक और नग़मा आपने सुना होगा, फ़िल्म में ऒलमोस्ट क्लाइमैक्स है, लड़की, शरीफ़ज़ादी अपने घर में, अपने मोहल्ले में, अपने शहर में, किस तरह से एडुकेशन लेती थी, रहते थे सब, उसके माँ-बाप, और वो लड़की किसी कारण बहुत बड़ी तवायफ़ बन गई। उस मकाम पर, अपने ही घर के सामने उसे मुजरा करना है। और मुजरे का मतलब है लोगों की दिलजोयी। जो तवायफ़ है वो लोगों का दिल लुभाए, दिलजोयी करे, और अब यह सिचुएशन है कि जब मुजरा शुरु हुआ, उसने देखा कि मैं तो वहीं हूँ, घर सामने है, और मेरी बूढ़ी माँ, उस चिलमन के पीछे, इसका डबल मीनिंग् हो गया कि लोगों को, जिनके सामने मुजरा कर रही है वो, उनका दिल लुभा रही है, और उसके इनर में एक तूफ़ान चल रहा है, जो उसकी माँ, कि मैं अपनी माँ को मिल सकूँगी या नहीं, और मैं मुजरा कर रही हूँ। मुजरे वाली वो थी नहीं, लेकिन हालात ने बना दिया। तो वो इस नग़मे में, 'ये क्या जगह है दोस्तों, ये कौन सा दयार है", तो इसमें देखिए आशा जी ने किस अंदाज़ में, उसी अंदाज़ को पकड़ा, जो मैंने कहा, उसी तरह से गाया है, और शहरयार साहब ने उम्दा, बहुत अच्छा लिखा है। मुज़फ़्फ़र अली साहब ने भी हक़ अदा किया। उसका पिक्चराइज़ेशन इतना अच्छा किया है कि लोगों को बाक़ायदा रोते हुए सुना है।" सचमुच दोस्तों, यह ग़ज़ल इतना दिल को छू जाती है कि जितनी भी बार सुनी जाए, जैसे दिल ही नहीं भरता। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर पहली बार 'उमरावजान' की ग़ज़ल, सुनिए, लेकिन उससे पहले ये रहे इस ग़ज़ल के तमाम शेर...

ये क्या जगह है दोस्तों, ये कौन सा दयार है,
हद-ए-निगाह तक जहाँ ग़ुबार ही ग़ुबार है।

ये किस मक़ाम पर हयात मुझको लेके आ गई,
ना बस ख़ुशी पे है जहाँ, ना ग़म पे इख़्तियार है।

तमाम उम्र का हिसाब माँगती है ज़िंदगी,
ये मेरा दिल कहे तो क्या, के ख़ुद से शर्मसार है।

बुला रहा है कौन मुझको चिलमनों के उस तरफ़,
मेरे लिए भी क्या कोई उदासो बेक़रार है।

दोस्तों, यह जो अंतिम शेर है, उसमें उमरावजान की माँ को चिलमन की ओट से अपनी बेटी को देखती हुई दिखाई जाती है। इतना मर्मस्पर्शी सीन था कि शायद ही ऐसा कोई होगा जिसकी आँखें नम ना हुईं होंगी। जैसे अल्फ़ाज़, वैसा संगीत, वैसी ही गायकी, और रेखा की वैसी ही अदायगी। अभी हाल में ख़य्याम साहब को जब 'लाइफ़टाइम अचीवमेण्ट अवार्ड' से नवाज़ा गया था और उन्हे पुरस्कार प्रदान किया था आशा जी ने, और सामने की पंक्ति पर रेखा बैठी हुईं थीं। ख़य्याम साहब ने तब कहा था कि 'उमरावजान' के लिए सब से ज़्यादा श्रेय आशा जी और रेखा को ही जाता है। अकस्मात इतनी बड़ी ऒडिएन्स में इस तरह से ख़य्याम साहब की ज़ुबान से अपनी तारीफ़ सुन कर रेखा अपने जज्बात पर क़ाबू न रख सकीं और उनकी आँखों से टप टप आँसू बहने लग पड़े। ठीक वैसे ही जैसे इस ग़ज़ल को सुनते हुए हम सब के बहते हैं। तो आइए फिर एक बार इस क्लासिक ग़ज़ल को सुने और फिर एक बार अपनी आँखें नम करें। पता नहीं क्यों इस ग़ज़ल के बहाने आँखें नम करने को जी चाहता है!



क्या आप जानते हैं...
'उमरावजान' में ख़य्याम साहब ने लता जी के बजाय आशा जी से गानें इसलिए गवाए क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि 'पाक़ीज़ा' के हैंग्-ओवर से 'उमरावजान' ज़रा सा भी प्रभावित हो। उस पर उन्हे यह भी लगा कि रेखा के लिए आशा जी की कशिश भरी आवाज़ ही ज़्यादा मेल खाती है।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. ग़ज़ल के मतले में फिल्म का शीर्षक है, शायर बताएं - ३ अंक.
२. खय्याम साहब का है संगीत, गायिका बताएं - २ अंक.
३. इस गज़ल का एक पुरुष संस्करण भी है उसमें किसकी आवाज़ है बताएं - २ अंक.
४. अम्ब्रीश संगल निर्देशित फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
पवन जी ने ३ अंकों के सवाल का सही जवाब दिया, तो शरद जी, अवध जी और इंदु जी भी कमर कसे मिले, बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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