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Sunday, November 22, 2015

आफताब-ए-मौसिकी फ़ैयाज़ खाँ : SWARGOSHTHI – 245 : USTAD FAIYAZ KHAN



स्वरगोष्ठी – 245 में आज

संगीत के शिखर पर – 6 : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ

संगीत जगत के आकाश पर चमकते सूर्य – उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ




रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरमयी श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की छठीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की छठीं कड़ी में हम आज ‘आफताब-ए-मौसिकी’ अर्थात संगीत जगत के सूर्य के नाम से विख्यात, आगरा रँगीला घराने के सिरमौर गायक उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के व्यक्तित्व और कृतित्व की संक्षिप्त चर्चा कर रहे हैं। आज हम आपको उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वरों में पहले राग तिलंग में नोम-तोम का आलाप, राग ललित में एक द्रुत खयाल और राग भैरवी का एक दादरा सुनवाएँगे।


भारतीय संगीत के प्रचलित घरानों में जब भी आगरा घराने की चर्चा होगी तत्काल एक नाम जो उभर कर हमारे सामने आता है, वह है- आफताब-ए-मौसिकी उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ का। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हम इन्हीं महान गायक कलासाधक को स्मरण कर रहे हैं। पिछली शताब्दी के पूर्वार्द्ध के जिन संगीतज्ञों की गणना हम शिखर-पुरुष के रूप में करते हैं उस्ताद फ़ैयाज़ खान उन्ही में से एक थे। ध्रुवपद-धमार, खयाल-तराना, ठुमरी-दादरा, सभी शैलियों की गायकी पर उन्हें कुशलता प्राप्त थी। प्रकृति ने उन्हें घन, मन्द्र और गम्भीर कण्ठ का उपहार तो दिया ही था, उनके शहद से मधुर स्वर श्रोताओं पर रस-वर्षा कर देते थे। फ़ैयाज़ खाँ का जन्म ‘आगरा रँगीले घराना’ के नाम से विख्यात ध्रुवपद गायकों के परिवार में हुआ था। दुर्भाग्य से फ़ैयाज़ खाँ के जन्म से लगभग तीन मास पूर्व ही उनके पिता सफदर हुसैन खाँ का इन्तकाल हो गया। जन्म से ही पितृ-विहीन बालक को उनके नाना ग़ुलाम अब्बास खाँ ने अपना दत्तक पुत्र बनाया और पालन-पोषण के साथ-साथ संगीत-शिक्षा की व्यवस्था भी की। यही बालक आगे चल कर आगरा घराने का प्रतिनिधि बना और भारतीय संगीत के अर्श पर आफताब बन कर चमका। फ़ैयाज़ खाँ की विधिवत संगीत शिक्षा उस्ताद ग़ुलाम अब्बास खाँ से आरम्भ हुई, जो फ़ैयाज़ खाँ के गुरु और नाना तो थे ही, गोद लेने के कारण पिता के पद पर भी प्रतिष्ठित हो चुके थे। फ़ैयाज़ खाँ के पिता का घराना ध्रुपदियों का था, अतः ध्रुवपद अंग की गायकी इन्हें संस्कारगत प्राप्त हुई। आगे चल कर फ़ैयाज़ खाँ ध्रुवपद के ‘नोम-तोम’ के आलाप में इतने दक्ष हो गए थे कि संगीत समारोहों में उनके समृद्ध आलाप की फरमाइश हुआ करती थी। आइए आपको भी उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वर में राग ‘तिलंग’ में नोम-तोम का आलाप सुनवाते हैं।


राग तिलंग : नोम-तोम आलाप : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ




फ़ैयाज़ खाँ के नाना का घराना खयाल गायकों का था। नाना ने बचपन से ही कठोर रियाज़ कराया। संगीत के घरानों में संगीत-शिक्षा के लिए एक कठोर व्रत का पालन शिष्य से कराया जाता है, जिसे ‘चिल्ला’ कहा जाता है। इस व्रत के अनुसार शिष्य को निरन्तर बारह वर्षों तक प्रतिदिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक संगीत का अभ्यास करना होता है। प्रशिक्षण की इस अवधि में फ़ैयाज़ खाँ ने स्वर-साधना, ध्रुवपद और होरी गायन का कठिन अभ्यास किया। 25 वर्ष की आयु तक वे लोकप्रिय होने लगे थे। उनकी गायकी पर अपने नाना ग़ुलाम अब्बास खाँ के अतिरिक्त तत्कालीन महान गायक नत्थन खाँ, जयपुर के अब्दुल खाँ और सेनिया घराने के अमीर खाँ का भी प्रभाव था। आइए अब हम आपको उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वरों में राग ललित में द्रुत तीनताल का एक खयाल सुनवाते हैं, जिसके बोल हैं –“तड़पत हूँ जैसे जल बिन मीन...”।


राग ललित : ‘तड़पत हूँ जैसे जल बिन मीन...’ : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ




पिछली शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक के चार दशकों तक उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ देश में आयोजित होने वाले संगीत समारोहों के प्राण हुआ करते थे। संगीत-प्रेमियों को सम्मोहित कर लेने की अद्भुत क्षमता उनकी गायकी में थी। उस दौर में उन्हें जनसामान्य की ओर से ‘महफिल के बादशाह’ के नाम से पुकारा जाता था। 1930 के आसपास उस्ताद ने कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर के निवास स्थान जोरासांकों ठाकुरबाड़ी में आयोजित संगीत समारोह में भाग लिया था। समारोह के दौरान वे रवीन्द्रनाथ ठाकुर से अत्यन्त प्रभावित हुए और उन्हें “हिंदुस्तान का सबसे बड़ा शायर” की उपाधि दे दी। अपने प्रभावशाली संगीत से उन्होने देश के सभी संगीत केन्द्रों में खूब यश अर्जित किया। उनकी ख्याति के कारण बड़ौदा राज-दरबार में संगीतज्ञ के रूप में उनकी नियुक्ति हुई। 1938 में उन्हे मैसूर दरबार से “आफताब-ए-मौसिकी” (संगीत के सूर्य) की उपाधि से नवाजा गया। उस्ताद की गायकी में जवारीदार स्वर, राग दरबारी का गान्धार, राग श्री का ऋषभ और अनूठी लयकारी श्रोताओं को सम्मोहित करती थी। बोलतान में गीत की पंक्तियों का चमत्कारिक प्रदर्शन किया करते थे। वे स्वर, भाषा, अर्थ, भाव, लय सभी का भरपूर आनन्द लेकर गाते थे। ध्रुवपद और खयाल गायकी में दक्ष होने के साथ-साथ ठुमरी-दादरा गायन में भी वे अत्यन्त कुशल थे। फ़ैयाज़ खाँ ने कलकत्ता (अब कोलकाता) में भैया गनपत राव और मौजुद्दीन खाँ से ठुमरी-दादरा सुना था और संगीत की इस विधा से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। ठुमरी के दोनों दिग्गजों से प्रेरणा पाकर फ़ैयाज़ खाँ ने इस विधा में भी दक्षता प्राप्त की। खाँ साहब ठुमरी और दादरा के बीच उर्दू के शे’र जोड़ कर चार चाँद लगा देते थे। इसके साथ ही टप्पे की तानों को भी वे ठुमरी गाते समय जोड़ लिया करते थे। उनके द्वारा गायी गई उपशास्त्रीय रचनाओं में- “ना बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी....”, “पानी भरे री कौन अलबेली...” आदि आज भी संगीत प्रेमियों का बीच अत्यन्त लोकप्रिय है। इस आलेख को विराम देने से पहले आइए आपको सुनवाते हैं, उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वर में राग भैरवी में निबद्ध अत्यन्त लोकप्रिय दादरा। खाँ साहब का निधन 5 नवम्बर, 1950 को हुआ था। इसी माह उनकी पुण्यतिथि भी थी, इस अवसर पर हम उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ को समस्त संगीत-प्रेमियों की ओर से श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुए आज यहीं विराम लेते हैं।


राग भैरवी दादरा : ना बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...’ : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ





 संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 245वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक तंत्र-वाद्य संगीत रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इस संगीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 250 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) के विजेताओं के साथ ही वार्षिक विजेताओं की घोषणा भी की जाएगी।


1 – वाद्ययंत्र पर कौन सा राग बजाया जा रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – यह किस वाद्ययंत्र की आवाज़ है? वाद्य का नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 28 नवम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 247वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


 पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 243वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुविख्यात वायलिन-वादिका डॉ. एन. राजम् का वायलिन पर बजाया राग जोग का एक अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – जोग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – द्रुत तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य – वायलिन या बेला।

इस बार की पहेली के प्रश्नों का सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


 अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ के आज के अंक में हमने आपसे ध्रुपद, खयाल, ठुमरी, दादरा आदि सभी गान-शैली के शिखर पर प्रतिष्ठित उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के व्यक्तित्व और कृतित्व पर संक्षिप्त चर्चा की है। अगले अंक में एक अन्य विधा के शिखर पर प्रतिष्ठित व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला को हमारे अनेक पाठकों ने पसन्द किया है। हम उन सबके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  





Sunday, August 31, 2014

‘बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...’ : SWARGOSHTHI – 183 : DADARA BHAIRAVI


स्वरगोष्ठी – 183 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी - 2 : भैरवी दादरा


उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ का गाया दादरा जब मन्ना डे ने दुहराया- ‘बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...’






‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के दूसरे अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। यह पूर्व में प्रकाशित / प्रसारित श्रृंखला का परिमार्जित रूप है। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के कुछ स्तम्भ केवल श्रव्य माध्यम से प्रस्तुत किये जाते हैं तो कुछ स्तम्भ आलेख, चित्र दृश्य माध्यम और गीत-संगीत श्रव्य माध्यम के मिले-जुले रूप में प्रस्तुत होते हैं। इस श्रृंखला से हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। श्रृंखला के अंक हम प्रायोगिक रूप से दोनों माध्यमों में प्रस्तुत कर रहे हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की प्रमुख सहयोगी संज्ञा टण्डन की आवाज़ में पूरा आलेख और गीत-संगीत श्रव्य माध्यम से भी प्रस्तुत किया जा रहा है। हमारे इस प्रयोग पर आप अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजिएगा। 

‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ श्रृंखला में हम कुछ ऐसी ठुमरियों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनके पारम्परिक रूप को बरकरार रखते हुए अथवा आंशिक परिवर्तन के साथ फिल्म में भी इस्तेमाल किया गया है। पिछले अंक में हमने आपको राग झिंझोटी में निबद्ध एक परम्परागत ठुमरी उस्ताद अब्दुल करीम खाँ और कुन्दनलाल सहगल की आवाज़ में सुनवाया था। आज के अंक में हम ‘आफ़ताब-ए-मौसिकी’ के खिताब से नवाज़े गए उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे। साथ ही उनका गाया भैरवी का एक दादरा- “बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...” और इसी ठुमरी का फिल्म ‘दूज का चाँद’ में किये गए रोचक उपयोग की चर्चा करेंगे।




न्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक से लेकर पिछली शताब्दी के मध्यकाल तक के जिन संगीतज्ञों की गणना हम शिखर-पुरुष के रूप में करते हैं, उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ उन्ही में से एक थे। ध्रुवपद-धमार, खयाल-तराना, ठुमरी-दादरा, सभी शैलियों की गायकी पर उन्हें सिद्धि प्राप्त थी। प्रकृति ने उन्हें घन, मन्द्र और गम्भीर कण्ठ का उपहार तो दिया ही था, उनके शहद से मधुर स्वर श्रोताओं पर रस-वर्षा कर देते थे। फ़ैयाज़ खाँ का जन्म ‘आगरा घराना’ के ध्रुवपद गायकों के परिवार में हुआ था। दुर्भाग्य से फ़ैयाज़ खाँ के जन्म से लगभग तीन मास पूर्व ही उनके पिता सफदर हुसैन खाँ का इन्तकाल हो गया। जन्म से ही पितृ-विहीन बालक को उनके नाना ग़ुलाम अब्बास खाँ ने अपना दत्तक पुत्र बनाया और पालन-पोषण के साथ-साथ संगीत-शिक्षा की व्यवस्था भी की। यही बालक आगे चल कर आगरा घराने का प्रतिनिधि बना और भारतीय संगीत के अर्श पर आफताब बन कर चमका। फ़ैयाज़ खाँ की विधिवत संगीत शिक्षा उस्ताद ग़ुलाम अब्बास खाँ से आरम्भ हुई, जो फ़ैयाज़ खाँ के गुरु और नाना तो थे ही, गोद लेने के कारण पिता के पद पर भी प्रतिष्ठित थे। फ़ैयाज़ खाँ के पिता का घराना ध्रुपदियों का था, अतः ध्रुवपद अंग की गायकी इन्हें संस्कारगत प्राप्त हुई।

आगे चल कर फ़ैयाज़ खाँ ध्रुवपद के ‘नोम-तोम’ के आलाप में इतने दक्ष हो गए थे कि संगीत समारोहों में उनके समृद्ध आलाप की फरमाइश हुआ करती थी। उनकी ख्याति के कारण बड़ौदा राज-दरबार में संगीतज्ञ के रूप में उनकी नियुक्ति हुई। 1938 में उन्हे मैसूर दरबार से “आफताब-ए-मौसिकी” (संगीत के सूर्य) की उपाधि से नवाजा गया। ध्रुवपद और खयाल गायकी में दक्ष होने के साथ-साथ ठुमरी-दादरा गायन में भी वे अत्यन्त कुशल थे। फ़ैयाज़ खाँ ने कलकत्ता (अब कोलकाता) में भैया गनपत राव और मौजुद्दीन खाँ से ठुमरी-दादरा सुना था और संगीत की इस विधा से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। ठुमरी के दोनों दिग्गजों से प्रेरणा पाकर उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ ने इस विधा में भी दक्षता प्राप्त की। खाँ साहब ठुमरी और दादरा के बीच उर्दू के शे’र जोड़ कर गीत में चार-चाँद लगा देते थे। इसके साथ ही टप्पे की तानों को भी वे ठुमरी गाते समय जोड़ लिया करते थे। आज हम आपको उनका गाया भैरवी का बेहद लोकप्रिय दादरा- ‘बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...’ सुनवाते हैं।


भैरवी दादरा : ‘बनाओ बतियाँ चलो काहे को झूठी...’ : उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ






 
उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ के स्वर में प्रस्तुत भैरवी का यह दादरा श्रृंगार-रस प्रधान है। नायिका, नायक से सौतन के घर न जाने की मान-मनुहार करती है, और यही इस दादरा का प्रमुख भाव है। यह दादरा 1960 में प्रदर्शित, देव आनन्द, नूतन और महमूद अभिनीत फिल्म ‘मंज़िल’ में संगीतकार सचिनदेव बर्मन ने प्रयोग किया था। यद्यपि इस फिल्म के प्रायः सभी गीत लोकप्रिय हुए थे, किन्तु पार्श्वगायक मन्ना डे के स्वर में प्रस्तुत यह दादरा सदाबहार गीतों की श्रेणी में शामिल हो गया था। फिल्म में यह दादरा हास्य अभिनेता महमूद के लिए मन्ना डे ने पार्श्वगायन किया था। गीत चूँकि महमूद पर फिल्माना था इसलिए बर्मन दादा और मन्ना डे ने इस श्रृंगार प्रधान गीत को अपने कौशल से हास्य गीत के रूप में ढाल दिया। मूल दादरा की पहचान को बनाए रखते हुए गीत को फिल्म में शामिल किया गया था। हाँ, स्थायी के शब्दों में ‘चलो’ के स्थान पर ‘हटो’ अवश्य जोड़ा गया और गीत के अन्तिम भाग में तीनताल जोड़ा गया। लीजिए अब आप इस दादरा का फिल्मी संस्करण सुनिए-


भैरवी दादरा : फिल्म – मंज़िल : ‘बनाओ बतियाँ हटो काहे को झूठी...’ : मन्ना डे : संगीत – सचिनदेव बर्मन







'स्वरगोष्ठी' की इस श्रृंखला में अब हम आपको आज के इस आलेख और गीतों का समन्वित श्रव्य रूप प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' परिवार की सक्रिय सदस्य संज्ञा टण्डन ने अपनी आवाज़ से सजाया है। आप इस प्रस्तुति का आनन्द लीजिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।



भैरवी दादरा : ‘बनाओ बतियाँ हटो काहे को झूठी...’ : फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी : वाचक स्वर – संज्ञा टण्डन 






आज की पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 183वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक फिल्मी ठुमरी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 190वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा। 
 



1 – कण्ठ संगीत की इस रचना के अंश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – क्या आप गायक की आवाज़ को पहचान रहे है? यदि हाँ, तो हमें गायक का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 185वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 181वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की गायी झिंझोटी की ठुमरी का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग झिंझोटी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ। इस अंक की पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर एक लम्बे अन्तराल के बाद मिन्नेसोटा, अमेरिका से दिनेश कृष्णजोइस के साथ ही हमारी नियमित प्रतिभागी जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस बार हमारे एक नए प्रतिभागी गोविन्द मकवाना ने भी पहेली में हिस्सा लिया है। हम उनका हार्दिक स्वागत करते हैं।


अपनी बात 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी प्रयोग पर चर्चा कर रहे हैं। इस लघु श्रृंखला में हम एक नया प्रयोग भी कर रहे हैं। आपको ‘स्वरगोष्ठी’ का यह स्वरूप कैसा लगा? हमें अवश्य बताइएगा। आप भी यदि भारतीय संगीत के किसी विषय में कोई जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पर भेज दें। अपने पाठको/श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित/प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन  
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Sunday, September 1, 2013

राग भैरवी में एक और प्रार्थना गीत

  
स्वरगोष्ठी – 135 में आज

रागों में भक्तिरस – 3

‘तुम ही हो माता पिता तुम ही हो...’


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सब संगीत-प्रेमियों का स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान रागों और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। श्रृंखला के पहले अंक में हमने आपसे राग भैरवी में भक्तिरस पर चर्चा की थी। आज पुनः हम आपसे राग भैरवी के भक्ति-पक्ष पर चर्चा करेंगे। दरअसल भारतीय संगीत का राग भैरवी भक्तिरस की निष्पत्ति के लिए सर्वाधिक उपयुक्त राग है। आज हम आपको सातवें दशक की चर्चित फिल्म ‘मैं चुप रहूँगी’ से राग भैरवी के स्वरों पर आधारित एक लोकप्रिय प्रार्थना गीत सुनवाएँगे। इसके साथ ही हम आपको विश्वविख्यात संगीत-विदुषी एन. राजम् की वायलिन पर राग भैरवी में अवतरित पूरब अंग का आकर्षक दादरा भी सुनवाएँगे। 

श्रृंखला के पिछले अंक में हम यह चर्चा कर चुके हैं कि वैदिक काल ईसा से लगभग 2000 से 1000 पूर्व का माना जाता है। इस काल में संगीत का सर्वाधिक विकास हुआ था। इस काल में प्रचलित संगीत का ज्ञान विभिन्न संहिताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों, प्रतिसाख्यों, व्याकरण और पुराणों के द्वारा प्राप्त होता है। संगीत को शास्त्रबद्ध करने का कार्य इसी युग में हुआ। इस युग में शास्त्रगत और लोक, दोनों प्रकार का संगीत प्रचलन में था। विभिन्न ग्रन्थों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि इस युग में गायन, वादन और नर्तन, तीनों विधाओं के साधक थे। उमेश जोशी की पुस्तक ‘भारतीय संगीत का इतिहास’ में उस युग के विकसित संगीत की विस्तृत चर्चा की गई है। श्री जोशी ने लिखा है कि तब संगीतज्ञों को समाज में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियाँ भी संगीत के क्षेत्र में विदुषी होती थीं। इस काल में संगीत का उपयोग ईश्वर की आराधना के लिए ही किया जाता था। जॉर्ज बुलर्स ने ‘दी ऑरिजिन ऑफ यूनिवर्सल डिवोशन’ नामक पुस्तक में लिखा है- ‘संगीत के द्वारा ईश्वर की आराधना का स्वरूप वैदिक युग से ही भारत द्वारा सम्पूर्ण विश्व में फैला...’। यूनान के विद्वान ओवगीसा ने ‘दी ओल्डेस्ट म्यूजिक ऑफ दी वर्ल्ड’ नामक अपनी पुस्तक में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है कि इस काल के संगीत का शास्त्रीय रूप इतना पवित्र और शुद्ध था कि उसकी तुलना में विश्व के किसी भी देश के संगीत में वैसा उत्तम रूप नहीं मिलता। भक्ति संगीत की यह धारा परम्परागत रूप से वर्तमान संगीत में उपस्थित है। फिल्मों में राग भैरवी पर आधारित गीतों की सर्वाधिक संख्या है। इनमें कुछ प्रार्थना गीत तो आज आधी शताब्दी के बाद भी लोकप्रिय हैं। अब हम आपको 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘मैं चुप रहूँगी’ से एक प्रार्थना गीत ‘तुम ही हो माता, पिता तुम ही हो...’ सुनवाते हैं। संगीतकार चित्रगुप्त ने इस गीत को राग भैरवी के सुरों का आधार दिया था। दरअसल यह गीत मूल संस्कृत की एक पारम्परिक प्रार्थना का रूपान्तरण है, जिसे लता मंगेशकर ने अपने मधुर स्वरों से अभिसिंचित कर भक्तिभाव से भर दिया। गीत की सरलता और सहजता के कारण यह आज देश के अनेकानेक शिक्षण संस्थाओं में प्रातःकालीन प्रार्थना के रूप में प्रयोग किया जाता है। कहरवा ताल में निबद्ध और राग भैरवी पर आधारित यह प्रार्थना गीत अब आप भी सुनिए।


राग भैरवी : ‘तुम ही हो माता, पिता तुम ही हो...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – मैं चुप रहूँगी



स्वरों के माध्यम से भक्तिरस का सृजन करने में राग भैरवी सर्वाधिक उपयुक्त राग है। कुछ संगीतज्ञ इसे सदा सुहागिन राग तो कुछ इसे सदाबहार राग के विशेषण से अलंकृत करते हैं। सम्पूर्ण जाति का यह राग भैरवी थाट का ही आश्रय राग माना जाता है। राग भैरवी में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद सभी कोमल स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। भैरवी के विभिन्न स्वरों के प्रभाव की चर्चा करते हुए सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने एक चर्चा के दौरान बताया कि कोमल ऋषभ स्वर करुणा, दया और संवेदनशीलता का भाव सृजन करने में समर्थ है। कोमल गान्धार स्वर आशा का भाव, कोमल धैवत जागृति भाव और कोमल निषाद स्फूर्ति का सृजन करने में सक्षम होता है। भैरवी का शुद्ध मध्यम इन सभी भावों को गाम्भीर्य प्रदान करता है। धैवत की जागृति को पंचम स्वर सबल बनाता है। इस राग के गायन-वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। इस प्रकार एक भक्तिगीत में जितने भी गुण होने चाहिए, भैरवी के स्वर, उन सभी गुणों की अभिव्यक्ति करते हैं। भैरवी के स्वरों की सार्थक अनुभूति कराने के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, वायलिन पर इस राग का भावपूर्ण वादन। विश्वविख्यात वायलिन-साधिका विदुषी एन. राजम् प्रस्तुत कर रही हैं, गायकी अंग में एक भावपूर्ण दादरा। आप इस दादरा के माध्यम से भक्तिरस का अनुभव कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भैरवी : वायलिन पर गायकी अंग में दादरा : विदुषी डॉ. एन. राजम्




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ की 135वीं संगीत पहेली में हम आपको एक भक्ति रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 140वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह किस राग में निबद्ध है?

2 – यह रचना किस गायक कलासाधक की आवाज़ में प्रस्तुत की गई है? नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 137वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ के 133वीं संगीत पहेली में हमने आपको विदुषी परवीन सुल्ताना के स्वरों में एक सादरा का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल झपताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के उत्तर जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी और लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है, लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’, जिसके अन्तर्गत हमने आज की कड़ी में आपको राग भैरवी की दो रचनाओं का रसास्वादन कराया। अगले अंक में हम आपको एक ऐसे राग में गूँथी रचनाएँ सुनवाएँगे जिनमें भक्ति और श्रृंगार, दोनों रसों की रचनाएँ भली लगतीं हैं। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Sunday, February 13, 2011

सुर संगम में आज - बेगम अख्तर की आवाज़ में ठुमरी और दादरा का सुरूर

सुर संगम - 07

कुछ लोगों का यह सोचना है कि मॊडर्ण ज़माने में क्लासिकल म्युज़िक ख़त्म हो जाएगी; उसे कोई तवज्जु नहीं देगा, पर मैं कहती हूँ कि यह ग़लत बात है। ग़ज़ल भी क्लासिकल बेस्ड है। अगर सही ढंग से पेश किया जाये तो इसका जादू भी सर चढ़ के बोलता है।


"आप सभी को मेरा सलाम, मुझे आप से बातें करते हुए बेहद ख़ुशनसीबी महसूस हो रही है। मुझे ख़ुशी है कि मैंने ऐसे वतन में जनम लिया जहाँ पे फ़न और फ़नकार से प्यार किया जाता है, और मैंने आप सब का शुक्रिया अपनी गायकी से अदा किया है"। मलिका-ए-ग़ज़ल बेगम अख़्तर जी के इन शब्दों से, जो उन्होंने कभी विविध भारती के किसी कार्यक्रम में श्रोताओं के लिए कहे थे, आज के 'सुर-संगम' का हम आगाज़ करते हैं। बेगम अख़्तर एक ऐसा नाम है जो किसी तारुफ़ की मोहताज नहीं। उन्हें मलिका-ए-ग़ज़ल कहा जाता है, लेकिन ग़ज़ल गायकी के साथ साथ ठुमरी और दादरा में भी उन्हें उतनी ही महारथ हासिल है। ३० अक्तुबर १९७४ को वो इस दुनिया-ए-फ़ानी से किनारा तो कर लिया, लेकिन उनकी आवाज़ का जादू आज भी सर चढ़ कर बोलता है। आज के संगीत में जब चारों तरफ़ शोर-शराबे का माहौल है, ऐसे में बेगम अख्तर जैसे फ़नकारों की गाई रचनाओं को सुन कर मन को कितनी शांति, कितना सुकून मिलता है, वह केवल अच्छे संगीत-रसिक ही महसूस कर सकता है। और बेगम अख़्तर जी ने भी तो उसी कार्यक्रम में कहा था, "कुछ लोगों का यह सोचना है कि मॊडर्ण ज़माने में क्लासिकल म्युज़िक ख़त्म हो जाएगी; उसे कोई तवज्जु नहीं देगा, पर मैं कहती हूँ कि यह ग़लत बात है। ग़ज़ल भी क्लासिकल बेस्ड है। अगर सही ढंग से पेश किया जाये तो इसका जादू भी सर चढ़ के बोलता है।" दोस्तों, बेगम अख़्तर की गाई हुई एक बेहद मशहूर ग़ज़ल हम आपको थोड़ी देर में सुनवाएँगे, पहले आइए सुनते हैं एक दादरा "हमरी अटरिया प आओ सांवरिया"।

दादरा - हमरी अटरिया प आओ सांवरिया (बेगम अख़्तर)


बेगम अख़्तर का असली नाम अख़्तरीबाई फ़ैज़ाबादी है। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद में ७ अक्तुबर १९१४ को हुआ था। उनके पिता अस्ग़र हुसैन, जो पेशे से एक वकील थे, ने मुश्तरी नामक महिला से अपनी दूसरी शादी की, लेकिन बाद में उन्हे तलाक़ दे दिया और इस तरह से मुश्तरी की दो बेटियाँ ज़ोहरा और बिब्बी (अख़्तरीबाई) भी पितृप्रेम से वंचित रह गए। पिता के अभाव को अख़्तरीबाई ने रास्ते का काँटा नहीं बनने दिया और स्वल्पायु से ही संगीत में गहरी रुचि लेने लगीं। जब वो मात्र सात वर्ष की थीं, तभी वो चंद्राबाई नामक थिएटर आर्टिस्ट के संगीत से प्रभावित हुईं। पटना के प्रसिद्ध सारंगी वादक उस्ताद इम्दाद ख़ान से उन्हें बाक़ायदा संगीत सीखने का मौका मिला; उसके बाद पटियाला के अता मोहम्मद ख़ान ने भी उन्हें संगीत की बारीकियाँ सिखाई। तत्पश्चात् अख़्तरीबाई अपनी वालिदा के साथ कलकत्ते का रुख़ किया और वहाँ जाकर संगीत के कई दिग्गजों जैसे कि मोहम्मद ख़ान, अब्दुल वाहीद ख़ान और सुताद झंडे ख़ान से संगीत की तालीम ली। १५ वर्ष की आयु में उन्होंने अपना पहला पब्लिक पर्फ़ॊमैन्स दिया। १९३४ में बिहार के भूकम्प प्रभावित लोगों की मदद के लिए आयोजित एक जल्से में उन्होंने अपना गायन प्रस्तुत किया जिसकी तारीफ़ ख़ुद सरोजिनी नायडू ने की थी। इस तारीफ़ का यह असर हुआ कि अख़्तरीबाई ने ग़ज़ल गायकी को बहुत गंभीरता से लिया और एक के बाद एक उनके गाये ग़ज़लों, दादरा और ठुमरी के रेकोर्ड्स जारी होते गए। तो क्यों न हम भी इन्हीं रेकॊर्ड्स में से एक यहाँ बजाएँ! ग़ज़ल तो हम सुन चुके हैं, आइए एक ठुमरी का आनंद लिया जाए।

ठुमरी - ना जा बलम परदेस (बेगम अख़्तर)


अख़्तरीबाई का ताल्लुख़ फ़िल्मी गीतों से भी रहा है। इस क्षेत्र में उनकी योगदान को हम फिर किसी दिन आप तक पहूँचाएँगे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के ज़रिए, यह हमारा आप से वादा है। १९४५ में अख़्तरीबाई ने बैरिस्टर इश्तिआक़ अहमद अब्बासी से विवाह किया और वो बन गईं बेगम अख़्तर। लेकिन विवाह के बाद पति की सख़्ती की वजह से बेगम अख़्तर लगभग पाँच वर्षों के लिए गा नहीं सकीं और आख़िरकार बीमार पड़ गईं। उनकी बिगड़ती हालत को देखकर चिकित्सक ने उन्हें दोबारा गाने का सलाह दी. और इस तरह से १९४९ को बेगम अख़्तर वापस रेकॊर्डिंग् स्टुडिओ पहुँचीं और लखनऊ रेडिओ स्टेशन के लिए तीन ग़ज़लें गाईं और जल्द ही स्वस्थ हो उठीं। फिर उन्होंने स्टेज पर गाने का सिलसिला जारी रखा और आजीवन यह सिलसिला जारी रहा। उम्र के साथ साथ उनकी आवाज़ भी और ज़्यादा मचियोर और पुर-असर होती चली गई, जिसमें गहराई और ज़्यदा होती गई। अपनी ख़ास अंदाज़ में वो ग़ज़लें और उप-शास्त्रीय संगीत की रचनाएँ गाया करतीं। जो भी ग़ज़लें वो गातीं, उनकी धुनें भी वो ख़ुद ही बनातीं, जो राग प्रधान हुआ करती थी. वैसे दूसरे संगीतकारों के लिए भी गाया, और ऐसे ही एक संगीतकार थे हमारे ख़य्याम साहब जिन्हें यह सुनहरा मौका मिला बेगम साहिबा से गवाने का। सुनिए ख़य्याम साहब के शब्दों में (सौजन्य: संगीत सरिता, विविध भारती):

"जब मैं छोटा था, उस वक़्त बेगम अख़्तर जी की गायी हुई ग़ज़लें सुना करता था। तो आप समझ सकते हैं कि जब मुझे उनके लिए ग़ज़लें कम्पोज़ करने का मौका मिला तो कैस लगा होगा! एक बार वो मुझे मिलीं तो कहने लगीं कि 'ख़य्याम साहब, मैं चाहती हूँ कि आप मेरे लिए ग़ज़लें कम्पोज़ करें, मैं आपके लिए गाना चाहती हूँ। तो पहले तो मैंने उनसे कहा कि मैं क्या आपके लिए ग़ज़लें बनाऊँगा, आप ने इतने अच्छे अच्छे ग़ज़लें गायी हैं। लेकिन उन्होंने कहा कि 'नहीं, आप कम्पोज़ कीजिए, मैं ६ ग़ज़लों का एक पूरा ऐल्बम करना चाहती हूँ, आप बताइए कि जल्द से जल्द कब हम रिकोर्ड कर सकते हैं?'। मैंने कहा कि देखिए मुझे एक ग़ज़ल के लिए एक महीना चाहिए, ऐसे ६ ग़ज़लों के लिए ६ महीने लग जाएँगे। उन्होंने कहा 'ठीक है'। फिर मैंने ग़ज़लें कम्पोज़ करनी शुरु की। अब रिहर्सल का वक़्त आया, उस वक़्त उनकी उम्र भी हो गई थी, तो उनके गले से वो आवाज़, वो काम नहीं निकल के आ रहा था जैसा कि मैं चाह रहा था। लेकिन क्योंकि वो इतती बड़ी फ़नकारा हैं, मैं उनसे नहीं कह सकता था कि आप यहाँ ग़लत गा रही हैं, या आप से नहीं हो पा रहा है। लेकिन वो इतनी बड़ी कलाकार हैं कि वो इस बात को समझ गयीं कि उनसे ठीक से नहीं गाया जा रहा है। उन्होंने मुझसे कहा कि 'ख़य्याम साहब, मैं ठीक से गा नहीं पा रही हूँ'। हमने फिर मिल कर वो ग़ज़लें तैयार की, और ग़ज़लें रेकॊर्ड हो जाने के बाद बेग़म अख़्तर जी मुझसे कहने लगीं कि 'ख़य्याम साहब, आप ने मुझसे यह काम कैसे करवा लिया? मुझे तो लग ही नहीं रहा कि इतना अच्छा मैंने गाया है!' यह उनका बड़प्पन था।"

तो लीजिए दोस्तों, वादे के मुताबिक़ बेगम अख़्तर जी की आवाज़ में अब एक ऐसी ग़ज़ल की बारी जिसकी तर्ज़ ख़य्याम साहब ने ही बनाई है, "मेरे हमनफ़स मेरे हमनवा...", पेश-ए-ख़िदमत है।

ग़ज़ल: मेरे हमनफ़स मेरे हमनवा (बेगम अख़्तर)


अहमदाबाद में बेगम अख़्तर ने अपना अंतिम कॊन्सर्ट प्रस्तुत करते वक़्त उनकी तबियत ख़राब होने लगी और उन्हें उसी वक़्त अस्पताल पहुँचाया गया। ३० अक्तुबर १९७४ को ६० वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी सहेली नीलम गमादिया की बाहों में दम तोड़ा, जिनकी निमंत्रण से ही बेगम अख़्तर अहमदाबाद आई थीं अपने जीवन का अंतिम पर्फ़ॊर्मैन्स देने के लिए। बेगम अख़्तर को लोगों का इतना प्यार मिला है कि वह प्यार आज भी क़ायम है, उनके जाने के चार दशक बाद भी उनकी गायकी के कायम आज भी करोड़ों में मौजूद हैं। पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी और मरणोपरांत पद्मभूषण से सम्मानित बेगम अख़्तर संगीताकाश की एक चमकता सितारा हैं जिनकी चमक युगों युगों तक बरकरार रहेगी।

तो दोस्तों, यह था आज का 'सुर-संगम', हमें आशा है आपको पसंद आया होगा। इस स्तंभ के लिए आप अपने विचार, सुझाव और आलेख हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेज सकते हैं। शाम ६:३० बजे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के साथ हम फिर हाज़िर होंगे, तब तक के लिए इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

प्रस्तुति-सुजॉय चटर्जी



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

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