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रविवार, 1 मई 2016

राग रागेश्री : SWARGOSHTHI – 268 : RAG RAGESHRI





स्वरगोष्ठी – 268 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन -1 : मन्ना डे को जन्मदिन पर स्मरण

‘कौन आया मेरे मन के द्वारे पायल की झंकार लिये...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हमारी नई श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ का शुभारम्भ हो रहा है। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का भी सहयोग लिया है। आप सब संगीत-प्रेमियों का मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ श्रृंखला के प्रवेशांक में हार्दिक स्वागत करता हूँ। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर आधारित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हम मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की और फिर उस राग की जानकारी देंगे। श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हमने राग रागेश्री में उनका स्वरबद्ध किया, फिल्म ‘देख कबीरा रोया’ का एक गीत चुना है। इस गीत को पार्श्वगायक मन्ना डे ने स्वर दिया था। इस गीत को चुनने का एक कारण यह भी है कि आज के ही दिन वर्ष 1919 में मन्ना डे का जन्म हुआ था। आज मन्ना डे के 98वें जन्मदिन पर हम उन्हीं के गाये गीत से उनको स्वरांजलि अर्पित कर रहे हैं। राग रागेश्री पर आधारित फिल्म ‘देख कबीरा रोया’ के गीत के साथ राग का स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम उस्ताद शाहिद परवेज का सितार पर बजाया राग रागेश्री भी प्रस्तुत कर रहे हैं। 


"बहारें हमको ढूंढेंगी न जाने हम कहाँ होंगे...", संगीतकार मदन मोहन द्वारा स्वरबद्ध इस गीत के बोल उन्हीं पर किस शिद्दत से लागू होती है, यह बताने की ज़रूरत नहीं। आज उनके गाये हुए इतने दशक बीत जाने के बाद भी उनके गीतों के ज़रिए उनके अफ़साने बयाँ होते रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे। मदन मोहन के फ़िल्मी गीतों की ख़ासियत यह रही है कि फ़िल्म संगीत को शास्त्रीय संगीत के रंग से ऐसे सजाया है कि एक एक रचना को सुन कर जैसे आत्मा तृप्त हो जाती है। इसी उद्देश्य से हम ’स्वरगोष्ठी’ में आज से शुरु कर रहे हैं संगीतकार मदन मोहन द्वारा स्वरबद्ध शास्त्रीय संगीत आधारित गीतों की एक श्रृंखला। शुरुआत किस गीत से की जाए? आज 1 मई है, सुविख्यात गायक मन्ना डे का जन्मदिवस। तो क्यों ना मदन मोहन और मन्ना डे के सुरीले संगम से उत्पन्न एक अनमोल मोती प्रस्तुत किया जाए। हिन्दी फ़िल्मी गीतों में शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीत गाने वाले पुरुष गायकों में मन्ना डे का कोई सानी नहीं। ना उस ज़माने में कोई था, और इस ज़माने में तो सवाल ही नहीं। जब भी कभी शास्त्रीय राग आधारित रचना की सिचुएशन किसी फ़िल्म में आती, तब मन्ना डे ही संगीतकारों की पहली पसन्द होते। मदन मोहन ने भी उनसे कई गीत गवाए हैं। 1957 में एक फ़िल्म बनी थी ’देख कबीरा रोया’ जिसमें लगभग सभी गीत शास्त्रीय रागों पर आधारित थे। तीन गीत तो एक के बाद एक फ़िल्म में आते हैं, पहला "मेरी वीणा तुम बिन रोये" (लता), दूसरा "अश्कों से तेरी हमने तसवीर बनायी है" (आशा) और तीसरा गीत है "तू प्यार करे या ठुकराये" (लता)। ये तीन गीत क्रम से राग अहीर भैरव, पहाड़ी और भैरवी पर आधारित थे, और ये फ़िल्माये गये, क्रम से, अमिता, अनीता गुहा और शुभा खोटे पर। लता की आवाज़ में फ़िल्म का एक अन्य गीत "लगन तोसे लगी बलमा" भी एक सुन्दर रचना थी राग तिलंग पर आधारित। मदन मोहन के शुरुआती सफ़र में उन पर यह आरोप लगा था कि वो हमेशा गायिका-प्रधान गीतों की रचना करते हैं। सारे इलज़ामों को शान्त करते हुए जब उन्होंने ’देख कबीरा रोया’ में "कौन आया मेरे मन के द्वारे" (मन्ना डे) और "हमसे आया ना गया" (तलत महमूद) जैसे गीतों की रचना की तब सभी आलोचकों ने चुप्पी साध ली।

"कौन आया मेरे मन के द्वारे" गीत तो बेहद लोकप्रिय हुआ था जिसे मन्ना डे के श्रेष्ठ गीतों में भी माना जाता है। एक साक्षात्कार में मन्ना दा ने राग रागेश्री पर आधारित इस गीत के बारे में कहा था कि मदन मोहन ने उनसे इस गीत को गाते समय विशेष ध्यान रखने को कहा था क्योंकि यह रचना उनके दिल के बहुत क़रीब थी। मन्ना डे की आवाज़ में इसी फ़िल्म में एक और उल्लेखनीय रचना थी "बैरन हो गई रैना" जो राग जयजयवन्ती का एक बहुत उत्कृष्ट उदाहरण है। इस गीत को सुनते हुए ऐसा लगता है कि यह कोई फ़िल्मी गीत ना होकर शास्त्रीय संगीत की कोई रचना हो। मदन मोहन की मृत्यु के बाद उनको समर्पित एक कार्यक्रम में उन्हें याद करते हुए मन्ना डे ने कहा था - एक महान संगीतकार, मदन साहब, मदन मोहन। मदन मोहन गाने तो लाजवाब बनाते ही थे, साथ ही साथ खाना भी बहुत अच्छा पका लेते थे। और ख़ास कर के एक चीज़ जो बनाते थे, लाजवाब, वह शायद आप भी खाये होंगे, वह है भिंडी-मटन। यानी कि भिंडी और मटन, दोनों को मिला कर मदन साहब बनाते थे। एक मरतबा मुझे टेलीफ़ोन करके कहा कि मन्ना, क्या कर रहा है? मैंने कहा कि कुछ भी नहीं कर रहा हूँ, बैठा हूँ। कहने लगे, क्या बैठा है, चल आजा मेरे घर। उन दिनों मैं रहता था बान्द्रे में, मदन मोहन साहब रहते थे पेडर रोड पे। तो गाड़ी निकाल कर मैं चला गया मदन साहब के पास। और मदन साहब बना रहे थे मटन के साथ भिंडी। मैंने बोला कि यह क्या कम्बिनेशन है भई, मटन के साथ भिंडी? कहा कि खा के तो देख, फिर मालूम पड़ेगा! वाक़ई, बहुत बहुत बढ़िया भिंडी-मटन खिलाया उन्होंने। साथ ही साथ उन्होंने कहा कि एक गाना है। और वह गाना था "कौन आया मेरे मन के द्वारे...”। मदन मोहन का भिंडी-मटन जितना स्वादिष्ट बना था, उतना ही मधुर बना था ’देख कबीरा रोया’ का यह गीत। लीजिए, अब आप यह गीत सुनिए।


राग रागेश्री : ‘कौन आया मेरे मन के द्वारे...’ : मन्ना डे : फिल्म – देख कबीरा रोया



फिल्म ‘देख कबीरा रोया’ के इस गीत के बारे में सुप्रसिद्ध संगीत विदुषी अलका देव मारुलकर ने कहा था- ’देख कबीरा रोया’ में रागेश्री राग पर आधारित एक गीत है जिसमें switch-overs भी नाट्यपूर्ण तरीके से आया है। रागेश्री और बागेश्री दोनों बहने हैं, जिनमें थोड़ा फ़र्क है। फ़र्क यह है कि बागेश्री में कोमल गान्धार के साथ पंचम लगता है और रागेश्री में कोमल गान्धार तो होता है लेकिन पंचम वर्जित होता है, कोई कोई इसमें शुद्ध निषाद भी लगाते हैं। मन्ना डे के गाए इस गीत के दूसरे अन्तरे में तीव्र मध्यम का सुन्दर प्रयोग मन्ना दा ने किया है, जिसमें मिश्र गारा की छाया भी दिखाई पड़ती है।

यह गीत राग रागेश्री पर आधारित है। भारतीय संगीत में राग रागेश्री को खमाज थाट के अन्तर्गत माना जाता है। राग की जाति औड़व-षाड़व होती है, अर्थात, आरोह में पाँच और अवरोह में छः स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग में निषाद स्वर कोमल होता है। पंचम स्वर वर्जित होता है। आरोह में पंचम के साथ ऋषभ स्वर भी वर्जित होता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। इसमें गान्धार स्वर वादी और निषाद स्वर संवादी होता है। राग रागेश्री के गायन-वादन का समय रात्रि का दूसरा प्रहर माना गया है। राग रागेश्री का एक दूसरा प्रकार भी प्रचलित है। इस प्रकार के आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। परन्तु मन्द्र सप्तक में हमेशा कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। कोमल निषाद की रागेश्री अधिक प्रचलित है। अब हम आपको उस्ताद शाहिद परवेज़ से सितार पर राग रागेश्री की तीनताल में निबद्ध एक गत सुनवाते है। आप इसे सुनिए और फिल्म ‘देख कबीरा रोया’ के गीत के स्वरों को इस सितार की रचना में पहचानने का प्रयास कीजिए। साथ ही इसी प्रस्तुति के साथ हमें आज के इस अंक को यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।


राग रागेश्री : सितार पर तीनताल में निबद्ध गत : उस्ताद शाहिद परवेज़




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 268वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको संगीतकार मदन मोहन के संगीत से सजे एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 270वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को ध्यान से सुनिए और बताइए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका को पहचान सकते हैं? इस गायिका का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 7 मई, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 270वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 266 की संगीत पहेली में हमने आपको 1964 में प्रदर्शित भोजपुरी फिल्म ‘बिदेशिया’ से चैती शैली पर आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – दीपचन्दी और कहरवा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- मात्राएं – 14 और 8 या 4 तथा तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायिका – सुमन कल्याणपुर

लगता है इस बार की पहेली हमारे प्रतिभागियों के लिए कुछ कठिन थी। इस बार मात्र तीन प्रतिभागियों ने उत्तर दिया है। इनमे से दो प्रतिभागियों ने केवल पहले और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर दिया है। तीसरी प्रतिभागी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने ही गायिका सुमन कल्याणपुर की आवाज़ को पहचाना है, किन्तु पहले और दूसरे प्रश्नों का अधूरा जवाब दिया है। इस प्रकार हरिणा जी को दो अंक दिये जाते हैं। दो अंक पाकर हमारे अन्य विजेता हैं- पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आज से हमारी नई श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ का शुभारम्भ हो रहा है। इस श्रृंखला में हम फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। श्रृंखला के इस अंक में हमने आपसे राग रागेश्री पर चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को श्रृंखला के नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



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