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Sunday, February 19, 2017

सायंकालीन राग : SWARGOSHTHI – 305 : EVENING RAGAS




स्वरगोष्ठी – 305 में आज

राग और गाने-बजाने का समय – 5 : रात के प्रथम प्रहर के राग

राग भूपाली की बन्दिश - ‘जब से तुम संग लागली प्रीत...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला- “राग और गाने-बजाने का समय” की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। है। उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर को दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर को रात्रि के प्रहर कहे जाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में आज हम आपसे दिन के पाँचवें प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के एक प्रमुख राग भूपाली की बन्दिश सुविख्यात गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘नरसी भगत’ से राग केदार पर आधारित एक गीत भी सुनवा रहे हैं।



विदुषी किशोरी  अमोनकर
भारतीय संगीत के रागों के गाने-बजाने का समय निर्धारण करने के लिए शास्त्रकारों ने कुछ सिद्धान्त बनाए हैं। इस श्रृंखला के पिछले अंकों में हमने आपसे ‘अध्वदर्शक स्वर’ और ‘वादी संवादी स्वर’ सिद्धान्तों पर चर्चा की थी। आज के अंक में हम पूर्वांग और उत्तरांग के सिद्धान्त पर आपसे चर्चा कर रहे हैं। एक सप्तक के दो भाग किये जाते हैं। षडज से पंचम तक के स्वरों को पूर्वांग के स्वर और मध्यम से अगले सप्तक के षडज तक के स्वरों को उत्तरांग के स्वर कहे जाते हैं। जिस राग का पूर्वांग अधिक प्रधान होता है, वह मध्याह्न 12 बजे से मध्यरात्रि 12 के बीच की अवधि में तथा जिस राग का उत्तर अंग अधिक प्रबल होता है, वह मध्यरात्रि 12 बजे से लेकर मध्याह्न 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाता है। राग केदार, भूपाली, दरबारी कान्हड़ा, भीमपलासी आदि पूर्वांग प्रधान राग दिन के 12 बजे से रात्रि 12 बजे से पूर्व गाये-बजाए जाते हैं। इसी प्रकार सोहनी, बसन्त, हिंडोल, बहार, जौनपुरी आदि उत्तरांग प्रधान राग मध्यरात्रि 12 बजे से मध्याह्न 12 बजे तक गाये-बजाए जाते हैं। इन्हें क्रमशः पूर्व राग और उत्तर राग कहा जाता है। पूर्व राग का वादी स्वर सप्तक के पूर्व अंग से तथा संवादी स्वर उत्तर अंग से लिया जाता है। रात्रि के प्रथम प्रहर अर्थात गोधूलि बेला से रात्रि 9 बजे तक ऐसे रागों को गाया-बजाया जाता है जिसमे ऋषभ और गान्धार स्वर शुद्ध होते हैं। राग भूपाली और केदार दो ऐसे राग हैं, जिनमें उपरोक्त दोनों सिद्धान्तों का पालन किया जाता है। यह दोनों राग रात्रि के प्रथम प्रहर में खूब प्रचलित हैं। आज पहले हम आपको राग भूपाली और फिर राग केदार के उदाहरण सुनवाते हैं। राग भूपाली कल्याण थाट का राग माना जाता है। इसकी जाति औड़व-औड़व होती है, अर्थात राग के आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वर प्रयोग होते हैं। इस राग में मध्यम और निषाद स्वर वर्जित होता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। इसका वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। रात्रि का प्रथम प्रहर इस राग का आदर्श गायन-वादन समय होता है। यह राग पूर्वांग प्रधान है, अर्थात इसका चलन अधिकतर मन्द्र और मध्य सप्तक के पूर्वांग में होता है। यदि भूपाली के स्वरों को उत्तरांग प्रधान कर दिया जाए तो यह राग देशकार हो जाता है। इन्हीं स्वरों वाले राग को दक्षिण भारतीय संगीत में राग मोहनम् कहा जाता है। अब हम आपको राग भूपाली की एक लोकप्रिय बन्दिश सुविख्यात गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर के स्वरों में सुनवा रहे हैं। तीनताल में निबद्ध इस रचना के बोल हैं- ‘जब से तुम संग लागली प्रीत...’

राग भूपाली : “जब से तुम संग लागली प्रीत...” : विदुषी किशोरी अमोनकर




हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा 
रात्रि के पहले प्रहर में गाये-बजाये जाने वाले राग भूपाली के अलावा इस प्रहर के कुछ अन्य राग हैं, कामोद, चन्द्रकान्त, छायानट, देशकार, नटविहाग, पटविहाग, जैतकल्याण, बिहागड़ा, यमन, श्यामकल्याण, शुद्धकल्याण, श्रीकल्याण, हमीर, हंसध्वनि, केदार आदि। अब हम आपको राग केदार में पिरोया एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। राग केदार भी कल्याण थाट का राग है। इसकी जाति औड़व-षाड़व होती है; अर्थात आरोह में ऋषभ और गान्धार और अवरोह में केवल गान्धार स्वर वर्जित होता है। इस राग में दोनों मध्यम और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। दोनों मध्यम के कारण ही कुछ विद्वान इस राग को बिलावल थाट तो कुछ कल्याण थाट का मानते हैं। प्राचीन शास्त्रकारों ने इसे बिलावल थाट का राग माना है। परन्तु अधिकांश आधुनिक गायक इसे कल्याण थाट का राग मानते हैं। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। 1957 में प्रदर्शित फिल्म “नरसी भगत” का एक गीत राग केदार का अच्छा उदाहरण है। तीनताल में निबद्ध इस गीत की धुन संगीतकार रवि ने बनाई थी। इस गीत में तीन पार्श्वगायकों की आवाज़ है: हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा। हिन्दी के यशस्वी गीतकार गोपाल सिंह नेपाली ने इस गीत को लिखा है। इस गीत से जुड़ा एक उल्लेखनीय प्रसंग श्री नेपाली के निधन के चार दशक बाद सामने आया जब ब्रिटिश फिल्म निर्माता डेनी बोयेल ने फिल्म 'स्लमडॉग मिलियोनार' का निर्माण किया था। ऑस्कर पुरस्कार प्राप्त इस फिल्म में नेपाली जी के गीत का इस्तेमाल किया गया था, किन्तु फिल्म में इस गीत का श्रेय भक्तकवि सूरदास को दिया गया था। गोपाल सिंह नेपाली के सुपुत्र नकुल सिंह ने मुम्बई उच्च न्यायालय में फिल्म के निर्माता के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का दावा भी पेश किया था। कैसा दुर्भाग्य है कि एक स्वाभिमानी गीतकार को मृत्यु के बाद भी अन्याय का शिकार होना पड़ा। संगीतकार रवि का स्वरबद्ध किया यही गीत हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा की आवाज़ में अब आप यह गीत सुनिए।

राग केदार : ‘दर्शन दो घनश्याम...’ : हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा : फिल्म नरसी भगत



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 305वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1955 में प्रदर्शित फिल्म के राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 310वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पहले सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – गीतांश में गायिका के स्वरों को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 25 फरवरी, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 307वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 303 की संगीत पहेली में हमने 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘सेहरा’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मारू बिहाग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका लता मंगेशकर और गायक मुहम्मद रफी

इस बार की पहेली में हमारे नियमित प्रतिभागी पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने भी सही उत्तर दिये हैं। पाँचो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला “राग और गाने-बजाने का समय” का यह पाँचवाँ अंक था। अगले अंक में हम रात के दूसरे प्रहर के रागों पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। पिछले सप्ताह कुछ अपरिहार्य कारणों से हम ‘स्वरगोष्ठी’ का अंक प्रकाशित नहीं कर सके, जिसके लिए हमे खेद है। हमारे पिछले अंक के बारे में पेंसिलवानिया, अमेरिका से हमारी एक नियमित पाठक विजया राजकोटिया ने एक टिप्पणी की है –

Krishnamohan Ji, Ustad Rashid Khan has presented superb composition in Raag Marwa. The same composition is sung by Ustad Amir Khan. I just have a suggestion that it would have been appropriate to post Marwa by Amir Khan Ji as it was his death anniversary recently.

इस सुझाव के लिए विजया जी का हार्दिक आभार। यदि आप भी किसी राग, गीत, श्रृंखला अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 


Sunday, September 20, 2015

सायंकालीन राग : SWARGOSHTHI – 236 : EVENING RAGAS




स्वरगोष्ठी – 236 में आज

रागों का समय प्रबन्धन – 5 : रात के प्रथम प्रहर के राग

राग भूपाली की बन्दिश - ‘जब से तुम संग लागली प्रीत...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला- ‘रागों का समय प्रबन्धन’ की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। है। उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर को दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर को रात्रि के प्रहर कहे जाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में आज हम आपसे दिन के पाँचवें प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के एक प्रमुख राग भूपाली की बन्दिश सुविख्यात गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘नरसी भगत’ से राग केदार पर आधारित एक गीत भी सुनवा रहे हैं।


किशोरी अमोनकर
भारतीय संगीत के रागों के गाने-बजाने का समय निर्धारण करने के लिए शास्त्रकारों ने कुछ सिद्धान्त बनाए हैं। इस श्रृंखला के पिछले अंकों में हमने आपसे ‘अध्वदर्शक स्वर’ और ‘वादी संवादी स्वर’ सिद्धान्तों पर चर्चा की थी। आज के अंक में हम पूर्वांग और उत्तरांग के सिद्धान्त पर आपसे चर्चा कर रहे हैं। एक सप्तक के दो भाग किये जाते हैं। षडज से पंचम तक के स्वरों को पूर्वांग के स्वर और मध्यम से अगले सप्तक के षडज तक के स्वरों को उत्तरांग के स्वर कहे जाते हैं। जिस राग का पूर्वांग अधिक प्रधान होता है, वह मध्याह्न 12 बजे से मध्यरात्रि 12 के बीच की अवधि में तथा जिस राग का उत्तर अंग अधिक प्रबल होता है, वह मध्यरात्रि 12 बजे से लेकर मध्याह्न 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाता है। राग केदार, भूपाली, दरबारी कान्हड़ा, भीमपलासी आदि पूर्वांग प्रधान राग दिन के 12 बजे से रात्रि 12 बजे से पूर्व गाये-बजाए जाते हैं। इसी प्रकार सोहनी, बसन्त, हिंडोल, बहार, जौनपुरी आदि उत्तरांग प्रधान राग मध्यरात्रि 12 बजे से मध्याह्न 12 बजे तक गाये-बजाए जाते हैं। इन्हें क्रमशः पूर्व राग और उत्तर राग कहा जाता है। पूर्व राग का वादी स्वर सप्तक के पूर्व अंग से तथा संवादी स्वर उत्तर अंग से लिया जाता है। रात्रि के प्रथम प्रहर अर्थात गोधूलि बेला से रात्रि 9 बजे तक ऐसे रागों को गाया-बजाया जाता है जिसमे ऋषभ और गान्धार स्वर शुद्ध होते हैं। राग भूपाली और केदार दो ऐसे राग हैं, जिनमें उपरोक्त दोनों सिद्धान्तों का पालन किया जाता है। यह दोनों राग रात्रि के प्रथम प्रहर में खूब प्रचलित हैं। आज पहले हम आपको राग भूपाली और फिर राग केदार के उदाहरण सुनवाते हैं।

राग भूपाली कल्याण थाट का राग माना जाता है। इसकी जाति औड़व-औड़व होती है, अर्थात राग के आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वर प्रयोग होते हैं। इस राग में मध्यम और निषाद स्वर वर्जित होता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। इसका वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। रात्रि का प्रथम प्रहर इस राग का आदर्श गायन-वादन समय होता है। यह राग पूर्वांग प्रधान है, अर्थात इसका चलन अधिकतर मन्द्र और मध्य सप्तक के पूर्वांग में होता है। यदि भूपाली के स्वरों को उत्तरांग प्रधान कर दिया जाए तो यह राग देशकार हो जाता है। इन्हीं स्वरों वाले राग को दक्षिण भारतीय संगीत में राग मोहनम् कहा जाता है। अब हम आपको राग भूपाली की एक लोकप्रिय बन्दिश सुविख्यात गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर के स्वरों में सुनवा रहे हैं। तीनताल में निबद्ध इस रचना के बोल हैं- ‘जब से तुम संग लागली प्रीत...’


राग भूपाली : “जब से तुम संग लागली प्रीत...” : विदुषी किशोरी अमोनकर




गोपाल सिंह नेपाली 
रात्रि के पहले प्रहर में गाये-बजाए जाने वाले राग भूपाली के अलावा इस प्रहर के कुछ अन्य राग हैं- कामोद, चन्द्रकान्त, छायानट, देशकार, नटविहाग, पटविहाग, जैतकल्याण, बिहागड़ा, यमन, श्यामकल्याण, शुद्धकल्याण, श्रीकल्याण, हमीर, हंसध्वनि, केदार आदि। अब हम आपको राग केदार में पिरोया एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। राग केदार भी कल्याण थाट का राग है। इसकी जाति औड़व-षाड़व होती है, अर्थात आरोह में ऋषभ और गान्धार और अवरोह में केवल गान्धार स्वर वर्जित होता है। इस राग में दोनों मध्यम और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। दोनों मध्यम के कारण ही कुछ विद्वान इस राग को बिलावल थाट तो कुछ कल्याण थाट का मानते हैं। प्राचीन शास्त्रकारों ने इसे बिलावल थाट का राग माना है। परन्तु अधिकांश आधुनिक गायक इसे कल्याण थाट का राग मानते हैं। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘नरसी भगत’ का एक गीत- 'दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी रे...' राग केदार का अच्छा उदाहरण है। तीनताल में निबद्ध इस गीत की धुन संगीतकार रवि ने बनाई थी। इस गीत में तीन पार्श्वगायकों की आवाज़ है- हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा। हिन्दी के यशस्वी गीतकार गोपाल सिंह नेपाली ने इस गीत को लिखा था। इस गीत से जुड़ा एक उल्लेखनीय प्रसंग श्री नेपाली के निधन के चार दशक बाद सामने आया जब ब्रिटिश फिल्म निर्माता डेनी बोयेल ने फिल्म 'स्लमडॉग मिलियोनार' का निर्माण किया था। आस्कर पुरस्कार प्राप्त इस फिल्म में नेपाली जी के गीत का इस्तेमाल किया गया था, किन्तु फिल्म में इस गीत का श्रेय भक्तकवि सूरदास को दिया गया था। गोपाल सिंह नेपाली के सुपुत्र नकुल सिंह ने मुम्बई उच्च न्यायालय में फिल्म के निर्माता के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का दावा भी पेश किया था। कैसा दुर्भाग्य है कि एक स्वाभिमानी गीतकार को मृत्यु के बाद भी अन्याय का शिकार होना पड़ा। संगीतकार रवि का स्वरबद्ध किया यही गीत हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा की आवाज़ में अब आप सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 


राग केदार : ‘दर्शन दो घनश्याम...’ : हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा : फिल्म नरसी भगत




संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 236वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक छः दशक पुरानी फिल्म के राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 240वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – गीतांश में गायिका के स्वरों को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार,  26 सितम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 238वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 234 की संगीत पहेली में हमने 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘सेहरा’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मारू बिहाग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका लता मंगेशकर और गायक मुहम्मद रफी। इस बार की पहेली में हमारे दो नये पाठक / श्रोता शामिल हुए हैं। बठिण्डा, पंजाब से सोनू बामराह और किसी अज्ञात स्थान से देवेन श्रोफ। इन दोनों प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों के सही उत्तर दिये है। परन्तु देवेन जी ने अपना उत्तर फेसबुक पर सार्वजनिक रूप से दिया था, जिसे हमने तत्काल हटा दिया था। पहेली का उत्तर फेसबुक पर भी दिया जा सकता है, किन्तु व्यक्तिगत संदेश के रूप में ही, सार्वजनिक नहीं। इनके अलावा हमारी नियमित प्रतिभागी जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने भी सही उत्तर दिये हैं। पाँचो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘रागों का समय प्रबन्धन’ का यह पाँचवाँ अंक था। अगले अंक में हम रात के दूसरे प्रहर के रागों पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Sunday, November 17, 2013

‘दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी रे...’ : राग केदार में भक्तिरस

 

स्वरगोष्ठी – 144 में आज

रागों में भक्तिरस – 12

राग केदार के स्वरों से अभिसिंचित एक कालजयी भक्तिगीत


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की बारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीतानुरागियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, जारी श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस राग पर आधारित फिल्म संगीत के उदाहरण भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे राग केदार में उपस्थित भक्तिरस पर चर्चा करेंगे। आपके समक्ष इस राग के भक्तिरस-पक्ष को स्पष्ट करने के लिए हम तीन भक्तिरस से पगी रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। सबसे पहले हम 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘नरसी भगत’ का राग केदार पर आधारित एक प्रार्थना गीत और इसके बाद पण्डित जसराज के गायन और पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया के बाँसुरी वादन की आकर्षक जुगलबन्दी में एक भजन भी आप सुनेगे। 


न्द्रहवीं शताब्दी के वैष्णव भक्त कवि नरसी मेहता के जीवन पर हिन्दी में दो फिल्मों का निर्माण हुआ था। पहली फिल्म 1940 में बनी थी, जिसमें गायक-अभिनेता विष्णुपन्त पगणीस और अभिनेत्री दुर्गा खोटे ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई थी। इस फिल्म के संगीत निर्देशक शंकरराव व्यास थे। दूसरी फिल्म 1957 में बनी थी। राग केदार पर आधारित जो भजन हम आज आपको सुनवा रहे हैं वह इसी फिल्म से है। गीत के बोल हैं- ‘दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी रे...’। इस गीत का एक उल्लेखनीय पक्ष यह है कि इसके गीतकार सुप्रसिद्ध कवि और साहित्यकार गोपाल सिंह नेपाली थे।

गोपाल सिंह नेपाली का जितना योगदान साहित्य जगत में रहा है, फिल्मों के गीतकार के रूप में भी उनका योगदान अतुलनीय रहा है। पाँचवें से सातवें दशक तक वे फिल्मों में सफल गीतकार के रूप में सक्रिय रहे। नेपाली जी ने फिल्मों में लगभग 400 गीतों की रचना की थी। उन्होने अधिकतर धार्मिक और सामाजिक फिल्मों में गीत लिखे। अपने फिल्मी गीतों में भी उन्होने साहित्यिक स्तर में कभी समझौता नहीं किया। 1946 में सचिनदेव बर्मन के संगीत निर्देशन में बनी फिल्म 'आठ दिन', 1953 में प्रदर्शित फिल्म 'नाग पंचमी', 1955 की फिल्म 'शिवभक्त', 1959 की फिल्म 'नई राह' तथा 1961 में प्रदर्शित फिल्म 'जय भवानी' के गीत गोपाल सिंह नेपाली की बहुआयामी प्रतिभा के उदाहरण हैं। फिल्म के इन गीतों के बीच 1957 में श्री नेपाली रचित एक ऐसा गीत फिल्म 'नरसी भगत' में शामिल हुआ जिसने लोकप्रियता के सारे कीर्तिमानों को ध्वस्त कर दिया। संगीतकार रवि द्वारा स्वरबद्ध तथा हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा के स्वरों में वह गीत है। इस गीत से जुड़ा एक उल्लेखनीय प्रसंग श्री नेपाली के निधन के चार दशक बाद सामने आया। ब्रिटिश फिल्म निर्माता डेनी बोयेल ने 'स्लमडॉग मिलियोनर' का निर्माण किया था। आस्कर पुरस्कार प्राप्त इस फिल्म में नेपाली जी के गीत का इस्तेमाल किया गया था, किन्तु फिल्म में इस गीत का श्रेय भक्तकवि सूरदास को दिया गया था। गोपाल सिंह नेपाली के सुपुत्र नकुल सिंह ने मुम्बई उच्च न्यायालय में फिल्म के निर्माता के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का दावा भी पेश किया था। कैसा दुर्भाग्य है कि एक स्वाभिमानी गीतकार को मृत्यु के बाद भी अन्याय का शिकार होना पड़ा। संगीतकार रवि का स्वरबद्ध किया और हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा की आवाज़ में अब आप यही गीत सुनिए।



राग केदार : ‘दर्शन दो घनश्याम नाथ...’ : हेमन्त कुमार, मन्ना डे और सुधा मल्होत्रा : फिल्म नरसी भगत




भक्तिरस की अभिव्यक्ति के लिए केदार एक समर्थ राग है। कर्नाटक संगीत पद्यति में राग हमीर कल्याणी, राग केदार के समतुल्य है। षाड़व-षाड़व जाति, अर्थात आरोह और अवरोह दोनों में छह-छह स्वरों का प्रयोग होने वाला यह राग कल्याण थाट के अन्तर्गत माना जाता है। प्राचीन ग्रन्थकार राग केदार को बिलावल थाट के अन्तर्गत मानते थे, आजकल अधिकतर गुणिजन इसे कल्याण थाट के अन्तर्गत मानते हैं। इस राग में दोनों मध्यम का प्रयोग होता है। शुद्ध मध्यम का प्रयोग आरोह और अवरोह दोनों में तथा तीव्र मध्यम का प्रयोग केवल आरोह में किया जाता है। आरोह में ऋषभ स्वर और अवरोह में गान्धार स्वर वर्जित होता है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के पहले प्रहर में किया जाता है। राग केदार में भक्तिरस के तत्त्व का अनुभव करने के लिए अब हम आपको इस राग के स्वरों से अभिसिंचित एक भक्तिपूर्ण रचना जुगलबन्दी रूप में सुनवाते हैं। गायन और बाँसुरी वादन की यह जुगलबन्दी प्रस्तुत कर रहे हैं, विश्वविख्यात संगीतज्ञ, पण्डित जसराज और पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया। इस भक्ति-रचना के बोल हैं, ‘गोकुल में बाजत कहाँ बधाई...’। आप राग केदार की इस भक्ति-रचना का रसास्वादन करें और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।



राग केदार : भजन जुगलबन्दी : ‘गोकुल में बाजत कहाँ बधाई...’ : पं. जसराज और पं. हरिप्रसाद चौरसिया




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 144वें अंक की पहेली में आज हम आपको वाद्य संगीत की एक रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यह पाँचवें सेगमेंट की चौथी पहेली है। 150वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – इस संगीत रचना के अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमे राग का नाम लिख भेजिए।

2 – यह कौन सा संगीत वाद्य है? वाद्य का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 146वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 142वीं कड़ी में हमने आपको पण्डित विश्वमोहन भट्ट द्वारा तंत्रवाद्य मोहन वीणा पर बजाए राग मियाँ की मल्हार का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मियाँ की मल्हार और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- तंत्र वाद्य मोहन वीणा। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हमारे एकमात्र प्रतिभागी जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने ही दिया है। डॉ. त्रिपाठी को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने आपसे राग केदार के भक्तिरस के पक्ष पर चर्चा की। आगामी अंक में हम एक और भक्तिरस प्रधान राग में गूँथी रचनाएँ लेकर उपस्थित होंगे। अगले अंक में इस लघु श्रृंखला की तेरहवीं कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों की प्रतीक्षा करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Monday, June 27, 2011

"कासे कहूँ मन की बात..." - रंगमंच पर आने को आतुर ठुमरी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 687/2011/127

फिल्मों में ठुमरी विषयक श्रृंखला "रस के भरे तोरे नैन" में इन दिनों हम ठुमरी शैली के विकास- क्रम पर चर्चा कर रहे हैं| बनारस में ठुमरी पर चटक लोक-रंग चढ़ा| यह वह समय था जब अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम विफल हो गया था और एक-एक कर देशी रियासतें ब्रिटिश शासन के कब्जे में आते जा रहे थे| कलाकारों से राजाश्रय छिनता जा रहा था| भारतीय कलाविधाओं को अंग्रेजों ने हमेशा उपेक्षित किया| ऐसे कठिन समय में तवायफों ने, भारतीय संगीत; विशेष रूप से ठुमरी शैली को जीवित रखने में अमूल्य योगदान किया| भारतीय फिल्मों के प्रारम्भिक तीन-चार दशकों में अधिकतर ठुमरियाँ तवायफों के कोठे पर ही फिल्माई गई|

पिछले अंक में अवध के जाने-माने संगीतज्ञ उस्ताद सादिक अली खां का जिक्र हुआ था| अवध की सत्ता नवाब वाजिद अली शाह के हाथ से निकल जाने के बाद सादिक अली ने ही "ठुमरी" का प्रचार देश के अनेक भागों में किया था| सादिक अली खां के एक परम शिष्य थे भैयासाहब गणपत राव; जो हारमोनियम वादन में दक्ष थे| सादिक अली से प्रेरित होकर गणपत राव हारमोनियम जैसे विदेशी वाद्य पर ठुमरी और दादरा के बोल इतनी सफाई से बजाते थे कि श्रोता चकित रह जाते थे| भैयासाहब ने भी बनारस, गया, कलकत्ता आदि केन्द्रों में ठुमरी का प्रचार-प्रसार किया था| भैया गणपत राव ग्वालियर के थे और इनकी माँ का नाम चन्द्रभागा बाई था| महाराजा ग्वालियर की वह प्रेयसी थीं और एक कुशल गायिका भी थीं| भैया जी अपने समय के संगीतज्ञों में अद्वितीय थे| उनका पालन-पोषण संगीत के प्रमुख केन्द्र ग्वालियर में हुआ था, परन्तु उनकी स्वाभाविक अभिरुचि लोकप्रिय संगीत की ओर थी| सादिक अली की ठुमरियों पर दीवाने होकर उन्होंने लखनऊ की ठुमरी को अपनाया|

उन दिनों हारमोनियम भारतीय शास्त्रीय संगीत में उपेक्षित था| गायन संगति के लिए सारंगी का ही प्रयोग मान्य था| यह उचित भी था; क्योंकि सारंगी ही एक ऐसा वाद्य है जो मानव-कंठ के सर्वाधिक निकट है| ऐसे माहौल में गणपत राव ने हारमोनियम जैसे विदेशी वाद्य को अपनाया और उस साज़ पर वह ठुमरी के बोलों को इतनी कुशलता से बजाते थे कि बड़े-बड़े सारंगी वादक भी यह कार्य नहीं कर पाते थे| यह भैया गणपत राव के साहसिक कदम का ही प्रतिफल है कि आज हारमोनियम केवल ठुमरी में ही नहीं बल्कि हर प्रकार के संगीत में धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है| यहाँ तक कि आजादी के बाद तक "आकाशवाणी" में प्रतिबन्धित हारमोनियम आज स्टूडियो की शोभा बढ़ा रहा है| ठुमरी की विकास-यात्रा में नये-नये प्रयोग हुए तो कुछ भ्रान्तियाँ और रूढ़ियाँ भी टूटीं| ठीक इसी प्रकार फिल्मों में भी ठुमरी के कई नए प्रयोग किये गए| राज-दरबारों से लेकर तवायफ के कोठे तक ठुमरियों का फिल्मांकन हुआ| बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में ब्रिटिश अधिकारियों की देखा-देखी शेक्सपीयर के नाटकों के मंचन और ओपेरा आदि के लिए बने रंगमंच पर ठुमरियों और कथक नृत्य की प्रस्तुतियाँ होने लगी थीं| ठुमरी दरबार की ऊँची दीवार से बाहर तो निकल आई, लेकिन जनसामान्य से उसकी दूरी अभी भी बनी हुई थी| ऐसे आयोजन विशिष्ठ लोगों के लिए ही होते थे|

आज जो ठुमरी गीत आपके लिए हम प्रस्तुत करने जा रहें हैं, वह भी ब्रिटिश शैली के रंगमंच पर, कुछ ख़ास लोगों के बीच फिल्माई गई है| 1959 में प्रदर्शित फिल्म "धूल का फूल" में शामिल इस ठुमरी के बोल हैं "कासे कहूँ मन की बात..."| गीत में श्रृंगार का वियोग पक्ष ही रेखांकित हुआ है, परन्तु एक अलग अंदाज़ में| नायिका अपने प्रेमी के प्रति शिकवे-शिकायत व्यक्त करती है| गीत का मुखड़ा एक परम्परागत ठुमरी पर आधारित है| राग "काफी", तीन ताल और कहरवा में निबद्ध इस ठुमरी का गायन सुधा मल्होत्रा ने किया है| परदे पर इसे नृत्य की संगति में गाया गया है| गायिका गायन के साथ-साथ सितार वादन भी करती है| गीत के प्रारम्भ में सितार पर बेहद आकर्षक आलाप और उसके बाद सरगम प्रस्तुत किया गया है| फिल्म "धूल का फूल" के इस ठुमरी गीत के प्रसंग में अशोक कुमार, नन्दा, राजेन्द्र कुमार और माला सिन्हा दर्शक के रूप मौजूद हैं| फिल्म में गीत साहिर लुधियानवी का और संगीत एन. दत्ता का है| आइए राग "काफी" में निबद्ध फिल्म "धूल का फूल" की यह ठुमरी सुधा मल्होत्रा की आवाज़ में सुनते हैं|



क्या आप जानते हैं...
कि थोड़े फेर-बदल के साथ "कासे कहूँ मन की बात" के स्थायी की यही पंक्तियाँ कुछ अन्य फ़िल्मों में भी प्रयोग हुए हैं। 1954 की फिल्म "सुबह का तारा" और 1979 में बनी फिल्म "भलामानुष" में इस ठुमरी की स्थायी पंक्तियाँ प्रयोग की गई हैं|

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 08/शृंखला 19
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - आवाज़ है बेग़म अख्तर की.
सवाल १ - किस राग आधारित है ये ठुमरी - ३ अंक
सवाल २ - फिल्म के निर्देशक कौन थे - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी, अविनाश जी और क्षिति जी को बधाई, क्षिति जी अगर शृंखला जीतनी है तो थोड़ी और तेज़ी दिखानी पड़ेगी :)

खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, September 2, 2010

न तो कारवाँ की तलाश है न तो हमसफ़र की क्योंकि ये इश्क इश्क है....कहा रोशन और मजरूह के साथ गायक गायिकाओं की एक पूरी टीम ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 475/2010/175

ज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है। इस पवित्र पर्व पर हम अपने सभी श्रोताओं व पाठकों को अपनी शुभकामनाएँ देते हैं। दोस्तों, आप समझ रहे होंगे कि क्योंकि क़व्वालियों की शृंखला चल रही है, तो जन्माष्टमी पर श्री कृष्ण का कोई गीत तो हम सुनवा नहीं पाएँगे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में, है न? लेकिन ज़रा ठहरिए, कम से कम एक क़व्वाली ऐसी ज़रूर है जिसमें श्री कृष्ण का भी ज़िक्र है, और साथ ही राधा और मीरा का भी। क्यों चौंक गए न? जी हाँ, यह सच है, इस राज़ पर से अभी पर्दा उठने वाला है। फ़िल्म संगीत में क़व्वालियों को लोकप्रिय बनाने में संगीतकार रोशन का योगदान बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसा नहीं कि उनसे पहले किसी ने मशहूर क़व्वाली फ़िल्मों के लिए नहीं बनाई, लेकिन रोशन साहब ने पारम्परिक क़व्वालियों का जिस तरह से फ़िल्मीकरण किया और जन जन में लोकप्रिय बनाया, ऐसा करने का श्रेय उन्हें ही दिया जाता रहा है। आज 'मजलिस-ए-क़व्वाली' में रोशन साहब की बनाई हुई सब से लोकप्रिय क़व्वाली की बारी, और बहुत लोगों के अनुसार यह हिंदी फ़िल्म संगीत की सब से यादगार क़व्वाली है। दरअसल ये दो क़व्वालियाँ हैं जो ग्रामोफ़ोन रेकॊर पर अलग अलग आती है, लेकिन फ़िल्म के पर्दे पर एक के बाद एक आपस में जुड़ी हुई है। इसलिए हम भी यहाँ आपको ये दोनों क़व्वालियाँ इकट्ठे सुनवा रहे हैं। फ़िल्म 'बरसात की रात' की यह क़व्वाली जोड़ी है "न तो कारवाँ की तलाश है" और "ये इश्क़ इश्क़ है"। मन्ना डे, मोहम्मद रफ़ी, आशा भोसले, सुधा मल्होत्रा, बातिश और साथियों की आवाज़ें, तथा साहिर लुधियानवी के कलम की जादूगरी है यह क़व्वाली। दरअसल रोशन साहब ने पाक़िस्तान में एक बार एक क़व्वाली सुनी "ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़" जो उन्हें इतनी पसंद आई कि अनुमति लेकर उन्होंने उस क़व्वाली को ऐसा फ़िल्मी जामा पहनाया कि ना केवल यह क़व्वाली सुपर डुपर हिट साबित हुई, बल्कि अगली फ़िल्म 'दिल ही तो है' में निर्माता ने उनसे एक और क़व्वाली ("निगाहें मिलाने को जी चाहता है") की माँग कर बैठे। पंकज राग अपनी किताब 'धुनों की यात्रा' में लिखते हैं - "'बरसात की रात' का संगीत व्यावसायिक दृष्टि से रोशन का सफलतम संगीत था। "ना तो कारवाँ की तलाश है" का अंजाम हुअ "ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़" में और फ़तेह अली ख़ाँ से अनुमति उपरान्त ली गई उनकी धुन पर रोशन ने फ़िल्म संगीत के इतिहास की सब से हिट क़व्वाली बना डाली। यह एक तरह का समझौता तो अवश्य था जिसके लिए ख़य्याम तैय्यार नहीं हुए थे, पर ऐसे समझौते रोशन ने भी कम ही किए। इस क़व्वाली का तरन्नुम, बहाव, बिलकुल अभिभूत कर देने वाला है। इसकी रेकॊर्डिंग् २९ घंटे में सम्पन्न हुई औत तब जाकर वह ऐतिहासिक प्रभाव उत्पन्न हुआ, जैसा रोशन चाहते थे। भले ही धुन की प्रेरणा कहीं और से मिली हो, पर उसका विस्तार इस क़व्वाली की सुंदर विशेषताएँ बनकर आज तक लोगों के ज़हन में ताज़ा है। 'बरसात' में क़व्वालियों की धूम रही। "निगाहें नाज़ के मारों का" और "जी चाहता है चूम लूँ" जैसी क़व्वालियाँ भी अच्छी चली।"

सन् १९९८ में गायक मन्ना डे विविध भारती पर तशरीफ़ लाए थे और कई संगीतकारों की चर्चा हुई थी, जिनमें एक नाम रोशन साहब का भी उन्होंने लिया था, और ख़ास तौर से इस क़व्वाली का ज़िक्र छिड़ा था उद्‍घोषक कमल शर्मा द्वारा ली गई उस इंटरव्यु में। रोशन साहब को याद करते हुए मन्ना दा ने कहा था "रोशन साहब, he was a strict student of good music, यानी वो ख़याल, ठुमरी, ग़ज़लें, फ़ोक, ये सब मिलाके जो एक चीज़ वो लाते थे न, वो अनोखे ढंग से नोट्स का कॊम्बिनेशन करते थे। हम तो पागल थे उनके गानों के लिए। उस्ताद आदमी थे वो और बहुत मेहनती आदमी थे। "ना तो कारवाँ की तलाश है" के लिए मुझे याद है, रामपुर के तरफ़ से क़व्वाल लोगों को बुलाये थे। उनके प्रोग्राम सुना करते थे, नोट कर कर के कर कर के फिर उन्होंने बनाना शुरु किया। और साहिर साहब ने लिखा, और उन्होंने बनाया। और वो जो तकरारें जो हैं ना बीच में, कितने मेहनत किए वो, ओ हो हो, माइ गॊड, और फिर जब हम लोगों को सुनाते थे, बोलते थे 'देखो मज़ा आना चाहिए', वो जैसे क़व्वाल लोग करते थे। वो सब तो हमें मालूम नहीं था, रफ़ी को भी मालूम नहीं था, आशा को भी मालूम नहीं था, लेकिन उन्होंने सब करवाया हमसे। और एक एक कर के ८-१० दिन रिहर्सल करके करवाया।" दोस्तों, ऐसे ऐसे ही वह फ़िल्म संगीत का सुनहरा दौर नहीं हुआ। सुनहरा उसे बनाया उस दौर के फ़नकारों की लगन ने, उनके अथक परिश्रम ने, उनके डेडिकेशन ने। साहिर साहब ने इस क़व्वाली में ऐसे अल्फ़ाज़ लिखे हैं कि इसे सुनते हुए हम ट्रान्स में चले जाते हैं और जैसे उस परम शक्ति के साथ एक कनेक्शन बनने लगता है। बड़ी धर्म निरपेक्ष क़व्वाली है जिसमें साहिर साहब लिखते हैं कि "इश्क़ आज़ाद है, हिंदु ना मुसलमान है इश्क़, आप ही धर्म है और आप ही इमान है इश्क़"। इश्क़ को केन्द्रबिंदु बनाकर चलने वाली इस क़व्वाली में बहुत से विषय शामिल किए गए हैं। यहाँ तक कि श्री कृष्ण, राधा, मीरा, सीता, भगवान बुद्ध, मसीह का भी उल्लेख है, भजन और श्री कृष्ण लीला के साथ साथ लोक-संगीत का भी अंग है। "जब जब कृष्ण की बंसी बाजी, निकली राधा सज के, जान अजान का ध्यान भुला के, लोक लाज को तज के, है बन बन डोली जनक दुलारी, पहन के प्रेम की माला, दर्शन जल की प्यासी मीरा पी गई विष का प्याला"। तो दोस्तों, अब आपको अहसास हो गया ना कि क्यों हमने यह क़व्वाली आज के लिए चुनी है! तो आइए सुना जाए कुल १२ मिनट की यह क़व्वाली। श्री कृष्ण जन्माष्टमी और रमज़ान के मुबारक़ मौक़े पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का एक और सुरीला नज़राना क़बूल कीजिए।



क्या आप जानते हैं...
कि साल १९६० के अमीन सायानी द्वारा प्रस्तुत बिनाका गीत माला के वार्षिक कार्यक्रम में 'मुग़ल-ए-आज़म', 'चौदहवीं का चांद', 'दिल अपना और प्रीत पराई', 'धूल का फूल', 'छलिया' और 'काला बाज़ार' जैसे फ़िल्मों को पछाड़ते हुए 'बरसात की रात' फ़िल्म का शीर्षक गीत ही बना था उस वर्ष का सरताज गीत।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. एक मल्टी स्टारर फिल्म की है ये कव्वाली, फिल्म बताएं - १ अंक.
२. किस अदाकार पर फिलमाया गयी है ये कव्वाली - २ अंक.
३. गायक बताएं - २ अंक.
४ रवि का है संगीत, फिल्म के निर्देशक बताएं - ३ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
लगता है हमारे प्रोत्साहन का नतीजा निकल, अवध जी ३ अंक चुरा गए. इंदु जी, आपको नाराज़ कर मरना है क्या?, पर ये बात समझ नहीं आती कि आप एक अंक वाले सवालों का ही जवाब क्यों देती हैं. पवन जी सही जवाब के साथ वापसी की बधाई. कनाडा टीम कहाँ गायब रही...खैर अब तक के स्कोर जान लेते हैं - अवध जी ७४, इंदु जी ४०, प्रतिभा जी २८, किशोर जी २६, पवन जी २४, और नवीन जी २२ पर हैं.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, June 23, 2010

मोहब्बत तर्क की मैंने गरेबाँ सी लिया मैंने.. दिल पर पत्थर रखकर खुद को तोड़ रहे हैं साहिर और तलत

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #८९

"सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं?" - मुमकिन है कि आपने यह पंक्ति पढी या सुनी ना हो, लेकिन इस पंक्ति के इर्द-गिर्द जो नज़्म बुनी गई थी, उससे नावाकिफ़ होने का तो कोई प्रश्न हीं नहीं उठता। यह वही नज़्म है, जिसने लोगों को गुरूदत्त की अदायगी के दर्शन करवाएँ, जिसने बर्मन दा के संगीत को अमर कर दिया, जिसने एक शायर की मजबूरियों का हवाला देकर लोगों की आँखों में आँसू तक उतरवा दिए और जिसने बड़े हीं सीधे-सपाट शब्दों में "चकला-घरों" की हक़ीकत बयान कर मुल्क की सच्चाई पर पड़े लाखों पर्दों को नेस्तनाबूत कर दिया... अभी तक अगर आपको इस नज़्म की याद न आई हो तो जरा इस पंक्ति पर गौर फरमा लें- "जिसे नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं?" पूरी की पूरी नज़्म वही है, बस एक पंक्ति बदली गई है और वो भी इसलिए क्योंकि फिल्म और साहित्य में थोड़ा फर्क होता है.. फिल्म में हमें अपनी बात खुलकर रखनी होती है। जहाँ तक मतलब का सवाल है तो "सना-ख़्वाने..." में पूरे पूरब का जिक्र है, वहीं "जिसे नाज़ है..." में अपने "हिन्दुस्तान" का बस। लेकिन इससे लफ़्ज़ों में छुपा दर्द घट नहीं जाता.... और इस दर्द को उकेरने वाला शायर तब भी घावों की उतनी हीं गहरी कालकोठरी में जब्त रहता है। इस शायर के बारे में और क्या कहना जबकि इसने खुद कहा है कि "ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?" ... जिसे दुनिया का मोह नहीं ,उससे ज़ीस्त और मौत के सवाल-जवाब करने से क्या लाभ! इस शायर को तो अपने होने का भी कोई दंभ, कोई घमंड, कोई अना नहीं है.. वो तो सरे-आम कहता है "मैं पल-दो पल का शायर हूँ..... मुझसे पहले कितने शायर आए और आ कर चले गए....

कल और आएंगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले,
मुझसे बेहतर कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले ।
कल कोई मुझ को याद करे, क्यों कोई मुझ को याद करे
मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यों वक़्त अपना बरबाद करे ॥


इस शायर से मेरा लगाव क्या है, यह मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता। मुझे लिखने का शौक़ है और आज-कल थोड़े गाने भी लिख लेता हूँ... गाना लिखने वालों के बारे में लोग यही ख्याल पालते हैं (लोग क्या... खुद गीतकार भी यही मानते हैं) कि गानों में मतलब का कुछ लिखने के लिए ज्यादा स्कोप, ज्यादा मौके नहीं होते.. लेकिन जब भी मैं इन शायर को पढता हूँ तो मुझे ये सारे ख्याल बस बहाने हीं लगते हैं... लगता है कि कोई अपनी लेखनी से बोझ हटाने के लिए दूसरों के सर पर झूठ का पुलिंदा डाल रहा है। अब अगर कोई शायर अपने गाने में यह तक लिख दे कि

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है

कि ज़िन्दगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव में
गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
ये तीरगी जो मेरी ज़ीस्त का मुक़द्दर है
तेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी


और लोग उसके कहे हरेक लफ़्ज़ को तहे-दिल से स्वीकार कर लें तो इससे यह साबित हो जाता है कि मतलब का लिखने के लिए मौकों की जरूरत नहीं होती बल्कि यह कहिए कि बेमतलब लिखने के लिए मौके निकालने होते हैं। यह शायर मौके नहीं ढूँढता, बल्कि आपको मौके देता है अपनी अलसाई-सी दुनिया में ताकने का.. उसे निखरने का, उसे निखारने का। आप पशेमान होते हो तो आपसे कहता है

तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले
अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले


ना मुंह छिपा के जियो और ना सर झुका के जियो
गमों का दौर भी आए तो मुस्कुरा के जियो ।


फिर आप संभल जाते हो... लेकिन अगले हीं पल आप इस बात का रोना रोते हो कि आपको वह प्यार नहीं मिला जिसके आप हक़दार थे। यह आपको समझाता है, आप फिर भी नहीं समझते तो ये आपके हीं सुर में सुर मिला लेता है ताकि आपके ग़मों को मलहम मिल सके

जाने वो कैसे लोग थे, जिनके प्यार को प्यार मिला ?
हमने तो जब कलियाँ मांगीं, काँटों का हार मिला ॥


आपको प्यार हासिल होता है, लेकिन आप "बेवफ़ाईयो" का शिकार हो जाते हैं। आपको उदासियों के गर्त्त में धँसता देख यह आपको ज़िंदगी के पाठ पढा जाता है:

तारुफ़ रोग हो जाए तो उसको भूलना बेहतर,
ताल्लुक बोझ बन जाए तो उसको तोड़ना अच्छा ।
वो अफ़साना जिसे अन्जाम तक लाना न हो मुमकिन,
उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा ॥


इतना सब करने के बावजूद यह आपसे अपना हक़ नहीं माँगता.. यह नहीं कहता कि मैंने तुम्हें अपनी शायरी के हज़ार शेर दिए, तुम्हें तुम्हारी ज़िंदगी के लाखों लम्हें नसीब कराए... यह तो उल्टे सारा श्रेय आपको हीं दे डालता है:

दुनिया ने तजुर्बातो हवादिस की शक्ल में
जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूं मैं


यह शायर, जिसके एक-एक हर्फ़ में तसव्वुरात की परछाईयाँ उभरती हैं.. अपने चाहने वालों के बीच "साहिर" के नाम से जाना जाता है। इनके बारे में और कुछ जानने के लिए चलिए हम "विकिपीडिया" और "प्रकाश पंडित" के दरवाजे खटखटाते हैं।

साहिर लुधियानवी का असली नाम अब्दुल हयी साहिर है। उनका जन्म ८ मार्च १९२१ में लुधियाना के एक जागीरदार घराने में हुआ था। माता के अतिरिक्त उनके पिता की कई पत्नियाँ और भी थीं। किन्तु एकमात्र सन्तान होने के कारण उसका पालन-पोषण बड़े लाड़-प्यार में हुआ। मगर अभी वे बच्चा हीं थे कि पति की ऐय्याशियों से तंग आकर उनकी माता पति से अलग हो गई और चूँकि ‘साहिर’ ने कचहरी में पिता पर माता को प्रधानता दी थी, इसलिए उनके बाद पिता से और उसकी जागीर से उनका कोई सम्बन्ध न रहा और उन्हें गरीबी में गुजर करना पड़ा। साहिर की शिक्षा लुधियाना के खालसा हाई स्कूल में हुई। सन् १९३९ में जब वे गव्हर्नमेंट कालेज के विद्यार्थी थे अमृता प्रीतम से उनका प्रेम हुआ जो कि असफल रहा । कॉलेज़ के दिनों में वे अपने शेरों के लिए ख्यात हो गए थे और अमृता उनकी प्रशंसक । लेकिन अमृता के घरवालों को ये रास नहीं आया क्योंकि एक तो साहिर मुस्लिम थे और दूसरे गरीब । बाद में अमृता के पिता के कहने पर उन्हें कालेज से निकाल दिया गया।

सन् १९४३ में साहिर लाहौर आ गये और उसी वर्ष उन्होंने अपनी पहली कविता संग्रह ’तल्खियाँ’ छपवायी। सन् १९४५ में वे प्रसिद्ध उर्दू पत्र अदब-ए-लतीफ़ और शाहकार (लाहौर) के सम्पादक बने। बाद में वे द्वैमासिक पत्रिका सवेरा के भी सम्पादक बने और इस पत्रिका में उनकी किसी रचना को सरकार के विरुद्ध समझे जाने के कारण पाकिस्तान सरकार ने उनके खिलाफ वारण्ट जारी कर दिया। १९४९ में वे दिल्ली आ गये। कुछ दिनों दिल्ली में रहकर वे बंबई आ गये जहाँ पर व उर्दू पत्रिका शाहराह और प्रीतलड़ी के सम्पादक बने। फिल्म आजादी की राह पर (१९४९) के लिये उन्होंने पहली बार गीत लिखे किन्तु प्रसिद्धि उन्हें फिल्म नौजवान, जिसके संगीतकार सचिनदेव बर्मन थे, के लिये लिखे गीतों से मिली।

शायर की हैसियत से ‘साहिर’ ने उस समय आँख खोली जब ‘इक़बाल’ और ‘जोश’ के बाद ‘फ़िराक़’, ‘फ़ैज़’, ‘मज़ाज़’ आदि के नग़्मों से न केवल लोग परिचित हो चुके थे बल्कि शायरी के मैदान में उनकी तूती बोलती थी। कोई भी नया शायर अपने इन सिद्धहस्त समकालीनों से प्रभावित हुए बिना न रह सकता था। अतएव ‘साहिर’ पर भी ‘मजाज़’ और ’फ़ैंज़’ का ख़ासा प्रभाव पड़ा। लेकिन उनका व्यक्तिगत अनुभव जो कि उनके पिता और उनकी प्रेमिका के पिता के प्रति घृणा और विद्रोह की भावनाओं से ओत-प्रोत था, उनके लिए कामगर साबित हुआ। लोगों ने देखा कि फ़ैज़’ या ‘मजाज़’ का अनुकरण करने के बजाय ‘साहिर’ की रचनाओं पर उसके व्यक्तिगत अनुभवों की छाप है और उसका अपना एक अलग रंग भी है।

‘साहिर’ मौलिक रूप से रोमाण्टिक शायर है। प्रेम की असफलता ने उसके दिलो-दिमाग़ पर इतनी कड़ी चोट लगाई कि जीवन की अन्य चिन्ताएँ पीछे जा पड़ी। बस एक प्रेम की बात हो तो कोई सह भी ले, लेकिन उन्हें तो जीवन में दो प्रेम असफलता मिली - पहला कॉलेज के दिनों में अमृता प्रीतम के साथ और दूसरी सुधा मल्होत्रा से। वे आजीवन अविवाहित रहे तथा उनसठ वर्ष की उम्र में २५ अक्टूबर १९८० को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया ।

’साहिर’ की ग़ज़लें बहुत कुछ ऐसा कह जाती हैं, जिसे आप अपनी आँखों में रोककर रखे होते हैं.. न चाहते हुए भी, मन मसोसकर आप उन जज्बातों को पीते रहते हैं। आपको बस एक ऐसे आधार की जरूरत होती है, जहाँ आप अपने मनोभावों को टिका सकें। यकीन मानिए.. बस इसी कारण से, बस यही उद्देश्य लेकर हम आज की गज़ल के साथ हाज़िर हुए हैं। ’साहिर’ के लफ़्ज़ और क्या करने में सक्षम हैं, यह तो आपको गज़ल सुनने के बाद हीं मालूम पड़ेगा.... सोने पे सुहागा यह है कि आपके अंदर घर कर बैठी कड़वाहटों को मिटाने के लिए "तलत महमूद" साहब की आवाज़ की "मिश्री" भी मौजूद है। तो देर किस बात की... पेश-ए-खिदमत है आज की गज़ल:

मोहब्बत तर्क की मैंने गरेबाँ सी लिया मैंने
ज़माने अब तो ख़ुश हो ज़हर ये भी पी लिया मैंने

अभी ज़िंदा हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ ये दिल में
कि अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैंने

तुझे अपना नहीं सकता मगर इतना भी क्या कम है
कि कुछ घड़ियाँ तेरे ख़्वाबों में खो कर जी लिया मैंने

बस अब तो मेरा _____ छोड़ दो बेकार उम्मीदो
बहुत दुख सह लिये मैंने बहुत दिन जी लिया मैंने




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "सितम" और शेर कुछ यूँ था-

भूल जाता हूँ मैं सितम उस के
वो कुछ इस सादगी से मिलता है

पिछली महफ़िल की शान बने "नीरज रोहिल्ला" जी। एक-एक करके महफ़िल में और भी कई सारे मेहमान (मेरे हिसाब से तो आप स्ब घर के हीं है.. मेहमान कहकर मैं महफ़िल की रस्म-अदायगी कर रहा हूँ..बस) शामिल हुए। जहाँ शन्नो जी ने हमारी गलती सुधारी वहीं सुमित जी हर बार की तरह बाद में आऊँगा कहकर निकल लिए। जहाँ सीमा जी ने पहली मर्तबा अपने शेरों के अलावा कुछ शब्द कहे (भले हीं उन शेरों का मतलब बताने के लिए उन्हें अतिरिक्त शब्द महफ़िल पर डालने पड़े, लेकिन उनकी तरफ़ से कुछ अलग पढकर सुखद आश्चर्य हुआ :) ) ,वहीं अवनींद्र जी के शेर अबाध गति से दौड़ते रहें। मंजु जी और नीलम जी ने महफ़िल के अंतिम दो शेर कहे... इन दोनों में एक समानता यह थी कि जहाँ मंजु जी अपनी हीं धुन में मग्न थीं तो वहीं नीलम जी शन्नो जी की धुन में।

इस तरह से एक सप्ताह तक हमारी महफ़िल रंग-बिरंगे लोगों से सजती-संवरती रही। इस दरम्यान ये सारे शेर पेश किए गए:

दुनिया के सितम याद ना अपनी हि वफ़ा याद
अब मुझ को नहीं कुछ भी मुहब्बत के सिवा याद । (जिगर मुरादाबादी)

तकदीर के सितम सहते जिन्दगी गुजर जाती है
ना हम उसे रास आते हैं ना वो हमें रास आती है. (शन्नो जी)

तुम्हारी तर्ज़-ओ-रविश, जानते हैं हम क्या है
रक़ीब पर है अगर लुत्फ़, तो सितम क्या है? (ग़ालिब)

भरम तेरे सितम का खुल चुका है
मैं तुझसे आज क्यों शर्मा रहा हूँ (फ़िराक़ गोरखपुरी)

कितनी शिद्दत से ढाये थे सितम उसने
अब मैं रोया तो ये इश्क मैं रुसवाई है (अवनींद्र जी)

फूल से दिल पे उसका ये सितम देखो
तोड़ के अपनी किताबों मैं सजाया उसने (अवनींद्र जी)

शफा देता है ज़ख्मो को तुम्हारा मरहमी लहजा ,
मगर दिल को सताते हैं वो सितम भी तुम्हारे हैं (अवनींद्र जी)

जिंदगी को याद आ रहे तेरे सितम ,
धड़कने भुलाने की दे रही हैं कसम . (मंजु जी)

सितम ये है कि उनके ग़म नहीं,
ग़म ये है कि उनके हम नहीं (नीलम जी)

और अब एक महत्वपूर्ण सूचना:

हम टिप्पणियों पे नियंत्रण (टिप्पणियों का "मोडरेशन") नहीं करना चाहते, इसलिए हम आपसे अपील करते हैं कि महफ़िल-ए-ग़ज़ल पर शायराना माहौल बनाए रखने में हमारी मदद करें। दर-असल कुछ कड़ियों से महफ़िल पे ऐसी भी टिप्पणियाँ आ रही हैं, जिनका इस आलेख से कोई लेना-देना नहीं होता। उन्हें पढकर लगता है कि लिखने वाले ने बिना ग़ज़ल सुने, बिना आलेख पढे हीं अपनी बातें कह दी हैं। हमारे कुछ मित्रों ने महफ़िल की इस बिगड़ी स्थिति पर आपत्ति व्यक्त की है। इसलिए हम आप सबसे यह दरख्वास्त करते हैं कि अपनी टिप्पणियों को यथा-संभव इस आलेख/गज़ल/शायर/संगीतकार/गुलूकार/शेर तक हीं सीमित रखें। इसका अर्थ यह नहीं है कि आप टिप्पणी देना या फिर महफ़िल में आना हीं बंद कर दें.. तब तो दूसरे मित्र आराम से जान जाएँगे कि हम किनकी बात कर रहे थे :)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Sunday, June 13, 2010

"कहीं भी अपना नहीं ठिकाना" - ऐसे भूले बिसरे गीत का ठिकाना केवल 'आवाज़' ही है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 416/2010/116

'दिल-ए-नादान' सन् १९५३ की एक ऐसी फ़िल्म थी जिसमें तलत महमूद के गाए कुछ गानें बेहद लोकप्रिय हुए थे, जैसे कि "ज़िंदगी देनेवाले सुन तेरी दुनिया से जी भर गया", "जो ख़ुशी से चोट खाए, वो जिगर कहाँ से लाऊँ", "ये रात सुहानी रात नहीं, ऐ चांद सितारों सो जाओ" आदि। दरअसल 'दिल-ए-नादान' वह फ़िल्म थी जिसमें ए. आर. कारदार ने तलत साहब को बतौर नायक लौंच किया था। तलत साहब की नायिका बनीं श्यामा। उन दिनों कारदार साहब अपनी फ़िल्मों के लिए नौशाद साहब को संगीतकार लिया करते थे। लेकिन इस फ़िल्म में नौशाद साहब के उस ज़माने के सहायक ग़ुलाम मोहम्मद ने संगीत दिया। 'आन' और 'बैजु बावरा' के निर्माण के दौरान नौशाद साहब मानसिक रूप से बीमार हो गए थे। शायद यही वजह रही होगी उनके इस फ़िल्म में अनुपस्थिति की। ख़ैर, यह फ़िल्म तो पिट गई थी, लेकिन फ़िल्म का संगीत चल पड़ा था। तलत साहब के गाए कुछ महत्वपूर्ण गीतों का ज़िक्र हमने उपर किया। लेकिन ऐसे चर्चित गीतों के बीच इस फ़िल्म में एक ऐसा गीत भी है जिसे लोगों ने बहुत कम सुना है, और आज तो यह गीत कहीं से भी सुनाई नहीं देता। आप अंदाज़ा लगा सकते हैं हम किस गीत की बात कर रहे हैं? हम बात कर रहे हैं उस गीत की जिसे सुधा मल्होत्रा ने गाया था - "कहीं भी अपना नहीं ठिकाना"। आपने यह गीत एक लम्बे अरसे से नहीं सुना न? चलिए आज 'दुर्लभ दस' में याद करते हैं इसी गीत को!

'दिल-ए-नादान' के गानें लिखे थे शक़ील बदायूनी ने। उनके कलम का जादू सर चढ़ कर बोला इस फ़िल्म के गीतों में भी। तलत साहब के गाए हिट गीतों के अलावा तीन गायिकाओं ने इस फ़िल्म में अपनी आवाज़ें दीं, जिनमें एक सुधा मल्होत्रा के गीत का ज़िक्र तो हम कर ही चुके हैं; दूसरी हैं आशा भोसले जिन्होने गाया "लीजो बाबुल मेरा सलाम रे", तथा जगजीत कौर की आवाज़ में "ख़ामोश ज़िंदगी को एक अफ़साना मिल गया" और "चंदा गाए रागिनी छम छम बरसे चांदनी" गीत भी उस ज़माने में चले थे। इसी फ़िल्म में एक अनोखा गीत भी है "मोहब्बत की धुन बेक़रारों से पूछो"। हमने अनोखा इसलिए कहा क्योंकि शायद यह एकमात्र ऐसा गीत है जिसे तलत महमूद, सुधा मल्होत्रा और जगजीत कौर ने साथ में मिल कर गाया है। सुधा मल्होत्रा और जगजीत कौर, दोनों ही फ़िल्म जगत की कमचर्चित गायिकाएँ रहीं हैं, और इन दोनों गायिकाओं का ज़िक्र हमने अपनी लघु शृंखला 'हमारी याद आएगी' में की थी। आज वही बात हम दोहरा रहे हैं कि सुधा जी ने जिस वक़्त फ़िल्म जगत में क़दम रखा था, उस वक़्त लता, आशा, गीता, शम्शाद जैसे नाम चोटी पर विराजमान थे। ऐसे में किसी भी नई गायिका को मौका मिल पाना आसाम काम नहीं था। फिर अपनी प्रतिभा, लगन और कोशिश के बलबूते पर कुछ गायिकाएँ फ़िल्म जगत में दाख़िल हुईं और कुछ ऐसे यादगार गीत गा कर चली गईं जो भुलाए नहीं भूलते। सुधा मल्होत्रा भी उन्ही में से एक हैं। कोई कैसे भुला सकता है उनका गाया और उन्ही का संगीतबद्ध किया हुआ "तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक़ है तुमको"! सुधा जी के गाए गीतों में कुछ उल्लेखनीय फ़िल्मों के नाम हैं - आरज़ू, अब दिल्ली दूर नहीं, धूल का फूल, गर्ल फ़्रेंड, बरसात की रात, दीदी, काला पानी, देख कबीरा रोया, गौहर, दिल-ए-नादान, बाबर, और प्रेम रोग। तो दोस्तों, आइए सुधा जी की आवाज़ में फ़िल्म 'दिल-ए-नादान' का नग़मा पेश हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि ग़ुलाम मोहम्मद १९३२ में सरोज मूवीटोन में शामिल हो गए थे और इस बैनर की फ़िल्म 'राजा भारथरी' में उनके बजाए तबले की बहुत तारीफ़ें हुईं थीं।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. इस गीत को एक ऐसे गायक ने गाया है जिनकी आवाज़ कुंदन लाल सहगल से दूसरों के मुकाबले सब से ज़्यादा मिलती जुलती थी। गायक का नाम बताएँ। २ अंक।

२. यह एक श्रीकृष्ण भजन है जिसे कीर्तन शैली में स्वरबद्ध किया गया है। मुखड़े मे शब्द आता है "प्यारे"। भजन के बोल बताएँ। ३ अंक।

३. इस फ़िल्म की नायिका हैं सुरैय्या और यह १९५४ की फ़िल्म है। क्या आप फ़िल्म के नाम का अंदाज़ा लगा सकते हैं? २ अंक।

४. इस फ़िल्म के निर्देशक और गीतकार एक ही हैं, और ये वो शख़्स हैं जिन्होने पहला फ़िल्मी समूह गीत लिखा था १९४० में - "घर आजा बलमवा रुत बसंत की आई"। कौन हैं ये निर्देशक व गीतकार? ३ अंक।

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम -

अवध जी और शरद जी के खाते में २-२ अंक और जुड़े हैं. इंदु जी जल्दी से भारमुक्त होकर लौटिये

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, April 4, 2010

न मैं धन चाहूँ, न रतन चहुँ....मन को पावन धारा में बहा ले जाता एक मधुर भजन....

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 394/2010/94

दोस्तों, इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर आप सुन रहे हैं पार्श्वगायिकाओं के गाए युगल गीतों पर आधारित हमारी लघु शृंखला 'सखी सहेली'। आज इस शृंखला की चौथी कड़ी में प्रस्तुत है गीता दत्त और सुधा मल्होत्रा की आवाज़ों में एक भक्ति रचना - "ना मैं धन चाहूँ ना रतन चाहूँ, तेरे चरणों की धूल मिल जाए"। फ़िल्म 'काला बाज़ार' की इस भजन को लिखा है शैलेन्द्र ने और सगीतबद्ध किया है सचिन देव बर्मन ने। जैसा कि हम पहले भी ज़िक्र कर चुके हैं और सब को मालूम भी है कि गीता जी की आवाज़ में कुछ ऐसी खासियत थी कि जब भी उनके गाए भक्ति गीतों को हम सुनते हैं, ऐसा लगता है कि जैसे भगवान से गिड़गिड़ाकर विनती की जा रही है बहुत ही सच्चाई व इमानदारी के साथ। और ऐसी रचनाओं को सुनते हुए जैसे मन पावन हो जाता है, ईश्वर की आराधना में लीन हो जाता है। फ़िल्म 'काला बाज़ार' के इस भजन में भी वही अंदाज़ गीता जी का रहा है। और साथ में सुधा मल्होत्रा जी की आवाज़ भी क्या ख़ूब प्यारी लगती है। इन दोनों की आवाज़ों से जो कॊन्ट्रस्ट पैदा हुआ है गीत में, वही गीत को और भी ज़्यादा कर्णप्रिय बना देता है। इस भजन में वह शक्ति है कि आज ५० साल बाद भी इसका शुमार कालजयी फ़िल्मी भक्ति रचनाओं में होता है और अनेक धार्मिक अनुष्ठानों में इसे बजाया या गाया जाता है। फ़िल्म में यह भजन फ़िल्माया गया था लीला चिटनिस और नंदा पर। गीता दत्त ने लीला जी का प्लेबैक दिया जब कि सुधा मल्होत्रा ने नंदा का। वैसे सुधा मल्होत्रा के साथ अक्सर ऐसा हुआ कि उन्हे बहुत ज़्यादा बड़े बैनर की फ़िल्मों में नायिका के लिए गाने के अवसर नहीं मिले। अगर मिले तो बच्चों पर या वयस्क भूमिकाओं पर उनके गाए गीत फ़िल्माए गए। इससे वो जल्दी ही टाइप कास्ट हो गईं, लेकिन जो भी मौके उन्हे मिले, उन्होने हर बार यह साबित किया कि वो एक वर्सेटाइल सिंगर हैं और हर तरह के गीत वो गा सकती हैं अगर मौका दिया जाए तो। आज का यह गीत इसी बात का प्रमाण है।

'काला बाज़ार' १९५९-६० की फ़िल्म थी जिसका निर्माण देव आनंद ने किया था। फ़िल्म की कहानी व निर्देशन विजय आनंद का था। देव आनंद, वहीदा रहमान, नंदा, विजय आनंद, चेतन आनंद, लीला चिटनिस अभिनीत इस फ़िल्म के गीत संगीत का पक्ष भी काफ़ी मज़बूत था। रफ़ी साहब का गाया "खोया खोया चांद खुला आसमान", "अपनी तो हर आह एक तूफ़ान है", "तेरी धूम हर कहीं"; रफ़ी-गीता का गाया "रिमझिम के तराने लेके आई बरसात"; आशा-मन्ना का गाया "सांझ ढली दिल की लगी थक चली पुकार के"; आशा भोसले का गाया "सच हुए सपने तेरे", तथा आज का प्रस्तुत गीत, सभी गानें बेहद कामयाब रहे और आज भी उतने ही प्यार से सुने जाते हैं। दोस्तों, क्योंकि आज का गीत अभिनेत्री व गायिका लीला चिटनिस पर फ़िल्माया गया है, तो क्यों ना आज उनके बारे में थोड़ी सी बातें की जाए! सन् २००३ के १५ जुलाई को लीला जी का देहांत हो जाने के बाद 'लिस्नर्स बुलेटिन' में उन पर एक छोटा सा लेख प्रकाशित हुआ था, उसी लेख से कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। ३० सितंबर १९१२ को धारवाड़ (कर्नाटक) में जन्मीं लीला नागरकर ने डॊ जी. पी. चिटनिस से बी.ए की पढ़ाई के दौरान ही विवाह कर लिया। ४-५ वर्षों बाद ही उनसे तलाक़ हो गया और जीवोकोपार्जन के लिए उन्होने फ़िल्म क्षेत्र में प्रवेश किया। सागर मूवीटोन निर्मित फ़िल्मों में एक्स्ट्रा के रूप में अभिनय के बाद सन् १९३५ में निर्मित 'धुआंधार' में नायिका बनीं। उन्होने कुल ११० हिंदी एवं १० मराठी फ़िल्मों में अभिनय किया। ३० और ४० के दशकों में प्लेबैक तकनीक के अभाव या कम प्रचलन के समय ख़ुद ही अपने पर फ़िल्माए बहुत से गीत गाए। उन्होने अन्तिम बार 'दिल तुझको दिया' (१९८५) में अभिनय किया हालाँकि उनके अभिनय की अन्तिम फ़िल्म 'रामू तो दीवाना है' २००१ में प्रदर्शित हुई थी। छठे दशक में उन्होने ममता मयी मां का अभिनय करना शुरु कर दिया था। उनकी अत्मकथा 'चन्देरी दुनियेत' १९८१ में प्रकाशित हुई थी। तो ये थी कुछ बातें लीला चिटनिस के बारे में जो हमने प्राप्त की 'लिस्नर्स बुलेटिन' अंक १२३ से जो सितंबर २००३ में प्रकाशित हुई थी। और आइए अब मन को पावन कर देने वाली इस भजन का आनंद उठाया जाए गीता दत्त व सुधा मल्होत्रा की आवाज़ों के साथ।



क्या आप जानते हैं...
कि लीला चिटनिस ने ३ फ़िल्मों ('कंचन' (१९४१), 'किसी से ना कहना' (१९४२), 'आज की बात' (१९५५)) का निर्माण भी किया था।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. इस गीत की जो आरंभिक धुन है वो विविध भारती पर प्रसारित होने वाले शास्त्रीय संगीत आधारित एक कार्यक्रम की सिग्नेचर धुन हुआ करती थी, गीत बताएं -३ अंक.
2. कमल बारोट और ______ ने इस गीत को गाया है, कौन है ये दूसरी गायिका- २ अंक.
3. गीत के संगीतकार बताएं-२ अंक.
4. गीतकार भी उस्ताद शायर हैं इस सवानी गीत के, नाम बताएं -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी, आप जल्दबाजी बहुत करती हैं, ३ अंक गँवा दिए न ?, शरद जी चतुर निकले, और पाबला जी भी आये और जो पुछा नहीं गया उसका जवाब दे गए...दोनों भाई बहिन एक जैसे....क्या बात है. पदम और अनीता जी की जोड़ी बढ़िया रही. दिलीप जी ने प्रस्तुत गीत पर टिपण्णी कर जो जानकारी दी वो कमाल की लगी

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, February 3, 2010

सलामे हसरत कबूल कर लो...इस गीत में सुधा मल्होत्रा की आवाज़ का कोई सानी नहीं

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 334/2010/34

फ़िल्म संगीत के कमचर्चित पार्श्वगायिकाओं को याद करने का सिलसिला जारी है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की विशेष लघु शृंखला 'हमारी याद आएगी' के तहत। ये कमचर्चित गायिकाएँ फ़िल्म संगीत के मैदान के वो खिलाड़ी हैं जिन्होने बहुत ज़्यादा लम्बी पारी तो नहीं खेली, पर अपनी छोटी सी पारी में ही कुछ ऐसे सदाबहार गानें हमें दे गए हैं कि जिन्हे हम आज भी याद करते हैं, गुनगुनाते हैं, हमारे सुख दुख के साथी बने हुए हैं। यह हमारी बदकिस्मती ही है कि अत्यंत प्रतिभा सम्पन्न होते हुए भी ये कलाकार चर्चा में कम ही रहे, प्रसिद्धी इन्हे कम ही मिली, और आज की पीढ़ी के लिए तो इनकी यादें दिन ब दिन धुंधली होती जा रही हैं। पर अपने कुछ चुनिंदा गीतों से अपनी अमिट छाप छोड़ जाने वाली ये गायिकाएँ सुधी श्रोताओं के दिलों पर हमेशा राज करती रहेंगी। आज एक ऐसी ही प्रतिभा संपन्न गायिका का ज़िक्र इस मंच पर। आप हैं सुधा मल्होत्रा। जी हाँ, वही सुधा मल्होत्रा जिन्होने 'नरसी भगत' में "दर्शन दो घनश्याम", 'दीदी' में "तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक़ है तुमको", 'काला पानी' में "ना मैं धन चाहूँ", 'बरसात की रात' में "ना तो कारवाँ की तलाश है" और 'प्रेम रोग' में "ये प्यार था कि कुछ और था" जैसे हिट गीत गाए हैं। लेकिन ज़्यादातर उन्हे कम बजट वाली फ़िल्मों में ही गाने के अवसर मिलते रहे। 'अब दिल्ली दूर नहीं' फ़िल्म में बच्चे के किरदार का प्लेबैक करने के बाद तो जैसे वो टाइप कास्ट से हो गईं और बच्चों वाले कई गीत उनसे गवाए गए। आज के लिए हमने जिस गीत को चुना है वह है १९६० की फ़िल्म 'बाबर' का। साहिर लुधियानवी का लिखा और रोशन का स्वरबद्ध किया यह गीत सुधा जी की करीयर का एक बेहद महत्वपूर्ण गीत रहा है, "सलाम-ए-हसरत क़ुबूल कर लो"। हेमेन गुप्ता निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे गजानन जागिरदार, आज़रा, सुलोचना चौधरी और शुभा खोटे। प्रस्तुत गीत शुभा खोटे पर फ़िल्माया गया है।

आइए आज सुधा जी के बारे में आपको कुछ जानकारी दी जाए। सुधा मल्होत्रा का जन्म नई दिल्ली में ३० नवंबर १९३६ में हुआ था। उनका बचपन कुल तीन शहरों में बीता - लाहौर, भोपाल और फ़िरोज़पुर। आगरा विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और भारतीय शास्त्रीय संगीत में पारदर्शी बनीं उस्ताद अब्दुल रहमान ख़ान और पंडित लक्ष्मण प्रसाद जयपुरवाले जैसे गुरुओं से तालीम हासिल कर। उनकी यह लगन और संगीत के प्रति उनका प्यार उनके गीतों और उनकी गायकी में साफ़ झलकता है। जहाँ तक करीयर का सवाल है, सुधा जी ने ५ साल की उम्र से गाना शुरु किया। उनकी प्रतिभा को पूरी दुनिया के सामने लाने का पहला श्रेय जाता है उस ज़माने के मशहूर संगीतकार मास्टर ग़ुलाम हैदर को, जिन्होने सुधा जी को फ़िरोज़पुर में रेड क्रॊस के एक जलसे में गाते हुए सुना था। सुधा जी की शारीरिक सुंदरता और मधुर आवाज़ की वजह से वो ऒल इंडिया रेडियो लाहौर में एक सफ़ल बाल कलाकार बन गईं। और सही मायने में यहीं से शुरु हुआ उनका संगीत सफ़र। उसके बाद उनका आगमन हुआ फ़िल्म संगीत में। इस क्षेत्र में उन्हे पहला ब्रेक दिया अनिल बिस्वास ने। साल था १९५० और फ़िल्म थी 'आरज़ू'। जी हाँ, इसी फ़िल्म में अनिल दा ने तलत महमूद को भी पहला ब्रेक दिया था। इस फ़िल्म में सुधा जी से एक गीत गवाया गया जिसे ख़ूब पसंद किया गया। गाना था "मिला गए नैन"। और दोस्तों, यहीं से शुरुआत हुई सुधा जी के फ़िल्मी गायन की। आगे की दास्तान हम फिर कभी सुनाएँगे, फिलहाल सुनवा रहे हैं सुधा जी का गाया 'बाबर' फ़िल्म का यह नायाब गीत, आप भी हमारा सलाम-ए-हसरत क़बूल फ़रमाएँ।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

नींद की बाहों में टूटती निगाहों को क्या मालूम,
है इन्तेज़ार में उसके कोई ख्वाब हैरानी से भरा,
या फिर छुपा खंजर हाथ लिए कोई बुरा सपना,
सिर्फ भुला दिए जाने के काबिल बेचैनी से सना...

अतिरिक्त सूत्र- खय्याम ने संगीत से संवारा है इस गीत को

पिछली पहेली का परिणाम-
बहुत बढ़िया चल रहे हैं अवध जी, लगता है शरद जी को तगड़ी टक्कर मिलेगी...१३ अंक हुए आपके बधाई
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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