मंगलवार, 29 सितंबर 2020

ऑडियो: पूजाघर (कन्हैयालाल पाण्डेय)

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने कन्हैयालाल पाण्डेय के स्वर में उन्हीं की कहानी माँ का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं कन्हैयालाल पाण्डेय की लघुकथा "पूजाघर", जिसे स्वर दिया है, कन्हैयालाल पाण्डेय ने।

इस रचना का कुल प्रसारण समय 3 मिनट 51 सेकण्ड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानी, उपन्यास, नाटक, धारावाहिक, प्रहसन, झलकी, एकांकी, या लघुकथा को स्वर देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

कन्हैयालाल पाण्डेय
4 नवम्बर, 1954 को हरदोई में जन्म। भारतीय रेल यातायात सेवा (सेवानिवृत्त)। हिन्दी में छह साहित्यिक तथा दो संगीत पुस्तकों का लेखन। साहित्य व संगीत के क्षेत्र में अनेक पुरस्कारों से सम्मानित

हर सप्ताह यहीं पर सुनिए एक नयी कहानी

"मैं आपकी स्थिति समझ रहा हूँ।"
(कन्हैयालाल पाण्डेय की "पूजाघर" से एक अंश)

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पूजाघर mp3

#Ninteenth Story: Pujaghar; Author: Kanhayalal Pandey; Voice: Kanhayalal Pandey; Hindi Audio Book/2020/19.

रविवार, 27 सितंबर 2020

राग जौनपुरी : SWARGOSHTHI – 481 : RAG JAUNPURI





स्वरगोष्ठी – 481 में आज 

आसावरी थाट के राग – 3 : राग जौनपुरी

विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती से राग जौनपुरी में खयाल-रचना और आशा भोसले से फिल्मी गीत सुनिए 





आशा भोसले 


कौशिकी चक्रवर्ती 

“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “आसावरी थाट के राग” की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच स्वरों का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से आठवाँ थाट आसावरी है। इस श्रृंखला में हम आसावरी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम आसावरी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की तीसरी कड़ी में आज हमने आसावरी थाट के जन्य राग जौनपुरी का चयन किया है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम आपके लिए षाड़व-सम्पूर्ण जाति के राग जौनपुरी का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही पटियाला गायकी में दक्ष सुविख्यात संगीत विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती के स्वरों में राग जौनपुरी में निबद्ध एक शास्त्रीय रचना का वीडियो प्रस्तुत कर रहे हैं। इस राग के स्वरों का कई फिल्मी गीतों में उपयोग किया गया है। राग अड़ाना के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का भी हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1968 में प्रदर्शित फिल्म "दो कलियाँ" से साहिर लुधियानवी का लिखा और रवि का स्वरबद्ध किया नृत्य-गीत "चितनन्दन आगे नाचूँगी..." सुनवा रहे हैं, जिसे सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका आशा भोसले ने स्वर दिया है। 



राग जौनपुरी आसावरी थाट का जन्य राग माना जाता है। इस राग में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल लगाए जाते हैं। आरोह में गान्धार वर्जित होता है और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इसीलिए राग जौनपुरी की जाति षाड़व-सम्पूर्ण होती है। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। राग जौनपुरी के गायन अथवा वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय दिन का दूसरा प्रहर माना जाता है। इस राग के आरोह में कभी-कभी कुछ विद्वान शुद्ध निषाद का प्रयोग करते हैं। परन्तु प्रचार में कोमल निषाद ही है। आरोह में कोमल निषाद के प्रयोग के कारण राग जौनपुरी, राग आसावरी से भिन्न हो जाता है। राग आसावरी से बचाने के लिए ऋषभ, मध्यम और पंचम स्वरों का प्रयोग बार-बार किया जाता है। यह उत्तरांगवादी राग है। अतः इसका चलन अधिकतर सप्तक के उत्तर अंग में और तार सप्तक में होती है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम आपको विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती के स्वर में एक खयाल रचना सुनवा रहे हैं, जिसके बोल हैं; "प्रभु मोहें भरोसा एक तिहारो..."। 

राग जौनपुरी : "प्रभु मोहें भरोसा एक तिहारो..." : विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती 



राग जौनपुरी के बारे में कुछ विद्वानों की धारणा है कि उत्तर प्रदेश के जौनपुर जनपद के सुल्तान हुसैन शर्क़ी ने राग की रचना की थी। इसीलिए राग का नामकरण जौनपुरी हुआ। राग जौनपुरी का समप्रकृति राग आसावरी होता है। इसीलिए कभी-कभी दोनों रागों को पहचानने में भ्रम हो जाता है। दोनों रागों में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल लगते हैं, दोनों रागों में वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है और दोनों रागों को दिन के दूसरे प्रहर में गाया या बजाया जाता है। अन्तर इन रागों की जाति में होता है। राग जौनपुरी षाड़व-सम्पूर्ण जाति का होता है, जबकि राग आसावरी औड़व-सम्पूर्ण जाति का होता है। कई फिल्मी गीत राग जौनपुरी पर आधारित रचे गए हैं। राग जौनपुरी पर आधारित इन गीतों में से एक गीत हमने चुना है। यह गीत 1968 में प्रदर्शित फिल्म "दो कलियाँ" से है। गीतकार साहिर लुधियानवी और संगीतकार रवि हैं। दरअसल यह गीत एक नृत्य-गीत है, जिसे तीनताल और कहरवाताल में निबद्ध किया गया है और इसे आशा भोसले ने स्वर दिया है। आप यह गीत सुनिए और हमें आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेना न भूलिए। 

राग जौनपुरी : "चितनन्दन आगे नाचूँगी..." : आशा भोसले : फिल्म - दो कलियाँ 




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 481वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1968 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के चौथे सत्र अर्थात अंक संख्या 490 की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें इस वर्ष के चतुर्थ सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 3 अक्तूबर, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 483 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 479 वें अंक में हमने आपको 1955 में प्रदर्शित फिल्म "झनक झनक पायल बाजे" के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। इस गीत के आधार राग को पहचानने में हमारे अधिकतर प्रतिभागी सफल रहे। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - अड़ाना, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – उस्ताद अमीर खाँ। 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब तक हम काफी हद तक हम सफल भी हुए हैं। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “आसावरी थाट के राग” की तीसरी कड़ी में आज आपने आसावरी थाट के जन्य राग जौनपुरी का परिचय प्राप्त किया। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती के स्वरों में राग जौनपुरी की एक रागदारी रचना प्रस्तुत की। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार आज की कड़ी में हमने आपको 1968 में प्रदर्शित फिल्म "दो कलियाँ" से आशा भोसले के स्वर में रवि का संगीतबद्ध किया और साहिर लुधियानवी का लिखा एक गीत "चितनन्दन आगे नाचूँगी..." प्रस्तुत किया। 

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया
 राग जौनपुरी : SWARGOSHTHI – 481 : RAG JAUNPURI : 27 सितम्बर, 2020 




मंगलवार, 22 सितंबर 2020

ऑडियो: माँ (कन्हैयालाल पाण्डेय)

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने कन्हैयालाल पाण्डेय के स्वर में उन्हीं की कहानी धनी का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं कन्हैयालाल पाण्डेय की लघुकथा "माँ", जिसे स्वर दिया है, कन्हैयालाल पाण्डेय ने।

इस रचना का कुल प्रसारण समय 3 मिनट 51 सेकण्ड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानी, उपन्यास, नाटक, धारावाहिक, प्रहसन, झलकी, एकांकी, या लघुकथा को स्वर देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

कन्हैयालाल पाण्डेय
4 नवम्बर, 1954 को हरदोई में जन्म। भारतीय रेल यातायात सेवा (सेवानिवृत्त)। हिन्दी में छह साहित्यिक तथा दो संगीत पुस्तकों का लेखन। साहित्य व संगीत के क्षेत्र में अनेक पुरस्कारों से सम्मानित

हर सप्ताह यहीं पर सुनिए एक नयी कहानी

"वहाँ नहीं जाना, अगर गये तो खैर नहीं।"
(कन्हैयालाल पाण्डेय की "माँ" से एक अंश)

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माँ mp3

#Eighteenth Story: Maan; Author: Kanhayalal Pandey; Voice: Kanhayalal Pandey; Hindi Audio Book/2020/18.

सोमवार, 21 सितंबर 2020

फ़िल्मी प्रसंग - 1: धारावाहिक 'रामायण’ और फ़िल्म ’हिना’ का सम्बन्ध

 

फ़िल्मी प्रसंग - 1

रामायण... रामानन्द सागर... रवीन्द्र जैन... राज कपूर

धारावाहिक 'रामायण’ और फ़िल्म ’हिना’ का सम्बन्ध 



रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के नए साप्ताहिक स्तंभ ’फ़िल्मी प्रसंग’ में आप सभी का स्वागत है।  फ़िल्म एवम् फ़िल्म-संगीत निर्माण प्रक्रिया के दौरान घटने वाली रोचक घटनाओं व अन्य पहलुओं से सम्बन्धित दिलचस्प प्रसंग जिनके बारे में जान कर आश्चर्य भी होता है और रोमांच भी। फ़िल्म इतिहासकारों, रेडियो व टेलीविज़न कार्यक्रमों, कलाकारों व कलाकारों के परिवारजनों के सोशल मीडिया पोस्ट्स व उनसे साक्षात्कारों, विभिन्न फ़िल्मी पत्र-पत्रिकाओं जैसे विश्वसनीय माध्यमों से संकलित जानकारियों से सुसज्जित प्रसंग - फ़िल्मी प्रसंग!


इन दिनों दूरदर्शन पर ’रामायण’, ’महाभारत’, ’श्रीकृष्ण’ जैसे पुराने धारावाहिक अन्य सभी चैनलों को TRP में कांटे का टक्कर दे रहा है। ’रामायण' धारावाहिक के लिए रामानन्द सागर और अभिनेताओं की जितनी तारीफ़ें होती रही हैं, इसके गीतकार - संगीतकार रवीन्द्र जैन जी की तरफ़ शायद दर्शकों का उतना ध्यान नहीं गया। ’रामायण’ देखते हुए यह महसूस किया जा सकता है कि हर दृश्य या प्रसंग के लिए रवीन्द्र जैन जी ने गीत लिखे हैं। यह कोई आसान काम नहीं। पौराणिक विषयवस्तु पर गीत लिखने के लिए विषय पर गहन शोध आवश्यक है। इतने सारे गीतों की रचना करना पर्वत समान कार्य है। यह कोई विद्वान व्यक्ति ही कर सकता है। और इस कार्य को उन्होंने सिर्फ़ औपचारिकता के रूप में पूरा नहीं किया, बल्कि एक एक गीत सच में दिल को छू लेता है। यह कहना तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि किसी भी दृश्य के इम्पैक्ट को बढ़ाने में, अर्थात् दृश्य को और अधिक भावुक और प्रभावशाली बनाने में पार्श्व में चल रहे गीत का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।


जहाँ ’रामायण’ के ढेर सारे गीतों की रचना करना रवीन्द्र जैन जी के संगीत सफ़र का एक मील का पत्थर था, वहीं इस वजह से राज कपूर की तत्कालीन निर्माणाधीन फ़िल्म ’हिना’ का ऑफ़र उनके हाथ से जाते-जाते बचा। इस रोचक संस्मरण का उल्लेख रवीन्द्र जैन जी ने विविध भारती के ’उजाले उनकी यादों के’ कार्यक्रम में किया था। वरिष्ठ उद्घोषक अमरकान्त दुबे जी से लम्बी बातचीत के दौरान 27 दिसम्बर 2007 को प्रसारित इस श्रृंखला की नौवी कड़ी में रवीन्द्र जैन जी ने कहा - "फ़िल्म 'हिना' के साथ भी बड़ा मज़ेदार किस्सा हुआ। वो किस्सा आपको बयान करने से पहले मैं सागर साहब को प्रणाम करता हूँ, कल तक हमारे साथ थे, ’रामायण’ जो हमारा महाकाव्य, जिसको उन्होंने घर घर पहुँचाया, अपने नाम के अनुरूप, राम का आनन्द रामानन्द और उसका सागर, आनन्द का सागर, है ना! राम के आनन्द का सागर बहाने वाले, घर घर पहुँचाने वाले रामानन्द सागर, उनका यह धारावाहिक मैं कर रहा था। तो उनका एक गाना रिकॉर्ड करके उसी दिन फिर मैंने वो गाना सुनाया राज कपूर साहब को। और वो गाना था, सिचुएशन बहुत अजीब थी कि कैकेयी और भरत के बीच में था, भरत ने फिर कभी माँ नहीं बुलाया उनको, तो उनकी आपस में बातचीत हो रही थी कहीं, एक फ़कीर को हमने यह गाना दिया, बैकग्राउन्ड से गा रहा था, गाने का पहला मुखड़ा सुनाता हूँ... ओ मैया तैने का ठानी मन में, राम सिया भेज दे री बन में... ऐसा मैंने सुनाया राज साहब को और कहा कि आज मैंने यह गाना रिकॉर्ड किया है ’रामायण’ के लिए। तो उन्होंने कहा कि देख देख देख, तूने यह गाना सुनाया ना, मेरे रोंगटे खड़े हो गए, देख देख देख! यह तो मुझे बड़ा अच्छा लगा लेकिन अगले ही पल उन्होंने क्या कहा कि तू अब ’हिना’ नहीं कर सकता। मैंने सोचा कि मर गए, यह क्या हो गया! मेरे बड़ा मन में था कि ये इतना बड़ा प्रोजेक्ट मेरे हाथ से चला जाएगा। तो एक दिन मुझे इनका फ़ोन आया, जो राज साहब के यहाँ प्रोडक्शन देखते थे, उन्होंने कहा कि राज साहब ने कहा है कि उनके साथ श्रीनगर चलना है। तो फिर तबलेवाला मेरा, दिव्य, और मैं, दोनों गए श्रीनगर। कुछ नहीं साहब, कोई ज़िक्र नहीं फ़िल्म का। चलो आज यहाँ शिकारे में घूमो, यहाँ खाना खाओ, चलो ये करो वो करो, ये ही सब करते रहे। तो बाद में मुझे पता चला कि ये सारा काम राज साहब ने इसलिए किया ताकि मेरे दिमाग से ’रामायण’ को निकाल दे और ’हिना’ डाल दे। इसके लिए इन्होंने इतनी कोशिशें की, इतना खर्च किया कि मुझे कश्मीर ले गए, लोगों से मिलवाया, कास्ट के जो लोग थे, बनजारे, उनको बुलाया। तो ये सब प्रयत्न था उनका ’हिना’ के लिए।"

इससे साफ़ पता चलता है कि रवीन्द्र जैन जी जितने उद्यमी और ईमानदार गीतकार-संगीतकार थे, उतने ही ईमानदार राज कपूर भी थे अपनी फ़िल्म के प्रति। इन दोनों महान कलाकारों ने अपने अपने काम से ज़रा सा भी समझौता नहीं किया। और ’रामायण’ में रवीन्द्र जैन जी का जो अनमोल योगदान है, उतना ही लोकप्रिय रहा ’हिना’ फ़िल्म का गीत-संगीत भी। इन दोनों अद्भुत कलाकारों को सलाम!



आपकी राय

’फ़िल्मी प्रसंग’ स्तंभ का आज का यह अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। 


शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

रविवार, 20 सितंबर 2020

राग अड़ाना : SWARGOSHTHI – 480 : RAG ADANA





स्वरगोष्ठी – 480 में आज 

आसावरी थाट के राग – 2 : राग अड़ाना 

पण्डित जसराज से राग अड़ाना में एक रागदारी भक्ति-रचना और उस्ताद अमीर खाँ से फिल्मी गीत सुनिए 




पण्डित जसराज 

उस्ताद अमीर खाँ 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “आसावरी थाट के राग” की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच स्वरों का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से आठवाँ थाट आसावरी है। इस श्रृंखला में हम आसावरी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम आसावरी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की दूसरी कड़ी में आज हमने आसावरी थाट के जन्य राग अड़ाना का चयन किया है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम आपके लिए षाड़व-सम्पूर्ण जाति के राग अड़ाना का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित जसराज के स्वरों में राग अड़ाना में निबद्ध एक शास्त्रीय रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। इस राग के स्वरों का कई फिल्मी गीतों में उपयोग किया गया है। राग अड़ाना के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का भी हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1955 में प्रदर्शित फिल्म "झनक झनक पायल बाजे" से हसरत जयपुरी का लिखा और वसन्त देसाई का स्वरबद्ध किया शीर्षक गीत "झनक झनक पायल बाजे..." सुनवा रहे हैं, जिसे सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ ने स्वर दिया है। 



राग अड़ाना, आसावरी थाट का जन्य राग है। सातवें प्रहर अर्थात रात्रि के तीसरे प्रहर में यह राग खूब खिलता है। यह आसावरी थाट और कान्हड़ा अंग का राग है। इस राग में गान्धार और धैवत स्वर कोमल और दोनों निषाद स्वरों का प्रयोग किया जाता है। षाड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में गान्धार वर्जित और अवरोह में वक्र प्रयोग किया जाता है। चंचल प्रकृति के इस राग से विनयपूर्ण और प्रबल पुकार के भाव की सार्थक अभिव्यक्ति सम्भव है। वीर रस के गीतों के लिए यह एक आदर्श राग है। यह राग, दरबारी से काफी मिलता-जुलता है। परन्तु अड़ाना में दरबारी की तरह अतिकोमल गान्धार स्वर का आन्दोलनयुक्त प्रयोग नहीं होता। इसके अलावा राग अड़ाना उत्तरांग प्रधान है, अर्थात इस राग के स्वर अधिकतर मध्य और तार सप्तक में चलते हैं। जबकि दरबारी पूर्वांग प्रधान राग होता है। राग अड़ाना का वादी स्वर तार सप्तक का षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। प्राचीन सिद्धान्तों के अनुसार राग अड़ाना, राग दीपक के आठ पुत्रों में से एक माना जाता है। इसे ‘रात की सारंग’ भी कहा जाता है। राग दरबारी कान्हड़ा और नायकी कान्हड़ा इसके समप्रकृति राग हैं। कान्हड़ा के अट्ठारह प्रकारों में यह भी एक प्रकार है, जिसका प्रचार अन्य प्रकारों की अपेक्षा अधिक है। राग अड़ाना के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम आपको पण्डित जसराज के स्वरों में राग अड़ाना में निबद्ध एक भक्ति रचना; "माता कालिका..." यूट्यूब के सौजन्य से प्रस्तुत कर रहे हैं। 

राग अड़ाना : "माता कालिका महाकाल..." : पण्डित जसराज 


राग अड़ाना पर आधारित अनेक फिल्मी गीतों में से आज हमने एक ऐतिहासिक गीत का चयन किया है। भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्मों की गणना ‘मील के पत्थर’ के रूप में की जाती है। ऐसी ही एक उल्लेखनीय फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ थी जिसका प्रदर्शन 1955 में हुआ था। इस फिल्म में कथक नृत्य शैली का और राग आधारित गीत-संगीत का कलात्मक उपयोग किया गया था। फिल्म का निर्देशन वी. शान्ताराम ने और संगीत निर्देशन वसन्त देसाई ने किया था। वी. शान्ताराम के फिल्मों की सदैव यह विशेषता रही है कि उसके विषय नैतिक मूल्यों रक्षा करते प्रतीत होते है। साथ ही उनकी फिल्मों में रूढ़ियों का विरोध भी नज़र आता है। फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ में उन्होने भारतीय शास्त्रीय नृत्य और संगीत की महत्ता को रेखांकित किया था। फिल्म को इस लक्ष्य तक ले जाने में संगीतकार वसन्त देसाई का उल्लेखनीय योगदान रहा। जाने-माने कथक नर्तक गोपीकृष्ण फिल्म की प्रमुख भूमिका में थे। इसके अलावा संगीत के ताल पक्ष में निखारने के लिए सुप्रसिद्ध तबलावादक गुदई महाराज (पण्डित सामता प्रसाद) का उल्लेखनीय योगदान था। वसन्त देसाई ने सारंगीनवाज़ पण्डित रामनारायन और संतूरवादक पण्डित शिवकुमार शर्मा का सहयोग भी प्राप्त किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक बसन्त देसाई ने इस फिल्म में कई राग आधारित स्तरीय गीतों की रचना की थी। फिल्म का तीनताल में निबद्ध शीर्षक गीत "झनक झनक पायल बाजे..." राग अड़ाना का एक मोहक उदाहरण है। हसरत जयपुरी के इस गीत को सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ ने स्वर दिया है। आइए, सुनते हैं, राग अड़ाना पर आधारित यह गीत। आप यह रचना सुनिए और मुझे आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग अड़ाना : "झनक झनक पायल बाजे..." : उस्ताद अमीर खाँ और साथी : फिल्म - झनक झनक पायल बाजे 




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 480वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1968 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के तीसरे सत्र अर्थात इस अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें इस वर्ष के तृतीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किस विख्यात पार्श्वगायिका के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 26 सितम्बर, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 482 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 478वें अंक में हमने आपको 1956 में प्रदर्शित फिल्म "इंस्पेक्टर" के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। इस गीत के आधार राग को पहचानने में हमारे अधिकतर प्रतिभागी भ्रमित रहे। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - आसावरी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – हेमन्त कुमार 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब हम काफी हद तक हम सफल भी हुए हैं। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “आसावरी थाट के राग” की दूसरी कड़ी में आज आपने आसावरी थाट के जन्य राग अड़ाना का परिचय प्राप्त किया। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए पण्डित जसराज के स्वरों में राग अड़ाना की एक रागदारी भक्ति-रचना प्रस्तुत की। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार आज की कड़ी में हमने आपको 1955 में प्रदर्शित फिल्म "झनक झनक पायल बाजे" से उस्ताद अमीर खाँ और साथियों के स्वर में वसन्त देसाई का संगीतबद्ध किया और हसरत जयपुरी का लिखा एक गीत "झनक झनक पायल बाजे..." प्रस्तुत किया। 

"स्वरगोष्ठी" के सहयोगी, फिल्मी गीतों में राग विषयक शोधकर्ता कन्हैयालाल पाण्डेय का पिछले दिनों दूरदर्शन की सेवानिवृत्त उपनिदेशक नीलम चतुर्वेदी ने साक्षात्कार  "मन की बात" किया था। इस अंक में हम वही साक्षात्कार आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। 


कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया
 राग अड़ाना : SWARGOSHTHI – 480 : RAG ADANA : 20 सितम्बर, 2020 



मंगलवार, 15 सितंबर 2020

ऑडियो: धनी (कन्हैयालाल पाण्डेय)

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने कन्हैयालाल पाण्डेय के स्वर में उन्हीं की कहानी सम्वेदनाएँ का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं कन्हैयालाल पाण्डेय की लघुकथा "धनी", जिसे स्वर दिया है, कन्हैयालाल पाण्डेय ने।

इस रचना का कुल प्रसारण समय 3 मिनट 51 सेकण्ड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानी, उपन्यास, नाटक, धारावाहिक, प्रहसन, झलकी, एकांकी, या लघुकथा को स्वर देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

कन्हैयालाल पाण्डेय
4 नवम्बर, 1954 को हरदोई में जन्म। भारतीय रेल यातायात सेवा (सेवानिवृत्त)। हिन्दी में छह साहित्यिक तथा दो संगीत पुस्तकों का लेखन। साहित्य व संगीत के क्षेत्र में अनेक पुरस्कारों से सम्मानित

हर सप्ताह यहीं पर सुनिए एक नयी कहानी

"पता नहीं क्यों उसकी बुद्धि में यह बात कभी नहीं आती।"
(कन्हैयालाल पाण्डेय की "धनी" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाउनलोड कर लें:
धनी mp3

#Seventeenth Story: Dhani; Author: Kanhayalal Pandey; Voice: Kanhayalal Pandey; Hindi Audio Book/2020/17.

रविवार, 13 सितंबर 2020

थाट व राग आसावरी : SWARGOSHTHI – 479 : THAT & RAG ASAVARI




स्वरगोष्ठी – 479 में आज

आसावरी थाट के राग – 1 : राग आसावरी 

पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर से राग आसावरी में एक रागदारी रचना और हेमन्त कुमार से फिल्मी गीत सुनिए 






हेमन्त कुमार 

पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई श्रृंखला “आसावरी थाट के राग” की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच स्वरों का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से आठवाँ थाट आसावरी है। इस श्रृंखला में हम आसावरी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम आसावरी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हमने आसावरी थाट के आश्रय अथवा जनक राग आसावरी का चयन किया है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम आपके लिए औडव-सम्पूर्ण जाति के राग आसावरी का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात संगीतज्ञ संगीतमार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के स्वरों में राग आसावरी में निबद्ध एक शास्त्रीय रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। इस राग के स्वरों का कई फिल्मी गीतों में उपयोग किया गया है। राग आसावरी के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का भी हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1956 में प्रदर्शित फिल्म "इंस्पेक्टर" से एस.एच. बिहारी का लिखा और हेमन्त कुमार का स्वरबद्ध किया एक गीत "दिल छेड़ कोई ऐसा नगमा..." सुनवा रहे हैं, जिसे स्वयं हेमन्त कुमार ने ही स्वर दिया है। 



थाट और राग आसावरी आज हमारी चर्चा का विषय है। इस थाट के स्वर होते हैं- सा, रे, ग॒(कोमल), म, प ध॒,(कोमल), नि॒(कोमल) अर्थात आसावरी थाट में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। आसावरी थाट का जनक अथवा आश्रय राग आसावरी ही कहलाता है। राग आसावरी के आरोह में पाँच स्वर और अवरोह में सात स्वरों का उपयोग किया जाता है। अर्थात यह औडव-सम्पूर्ण जाति का राग है। इस राग के आरोह में सा, रे, म, प, ध(कोमल), सां तथा अवरोह में; सां,नि(कोमल),ध(कोमल),म, प, ध(कोमल), म, प, ग(कोमल), रे, सा, स्वरों का प्रयोग किया जाता है। अर्थात आरोह में गान्धार और निषाद स्वर वर्जित होता है। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। दिन के दूसरे प्रहर में इस राग का गायन-वादन सार्थक अनुभूति कराता है। परम्परागत रूप से सूर्योदय के बाद गाये-बजाए जाने वाले इस राग में तीन कोमल स्वर, गान्धार, धैवत और निषाद का प्रयोग किया जाता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। अब हम आपके लिए संगीतमार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर का गाया राग आसावरी प्रस्तुत करते हैं। तीनताल में निबद्ध इस बन्दिश में आपको पण्डित बलवन्त राव भट्ट के कण्ठ–स्वर और विदुषी एन. राजम् की वायलिन संगति का आनन्द भी मिलेगा। 

राग आसावरी : "सजन घर लागे..." : पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर 


राग आसावरी अपने थाट का आश्रय अथवा जनक राग है। इसका वादी स्वर धैवत है, जो सप्तक के उत्तर अंग में आता है। साथ ही इसका गायन समय दिन का दूसरा प्रहर है। यह भी दिन के उत्तरांग में आता है, फिर भी इसका चलन सप्तक के पूर्वांग में तथा मन्द्र सप्तक में अच्छी तरह से होता है। जब कोई संगीतज्ञ इस राग में शुद्ध ऋषभ के स्थान पर कोमल ऋषभ प्रयोग करते हैं तो इसे राग कोमल ऋषभ आसावरी कहा जाता है। राग आसावरी से मिलता-जुलता राग जौनपुरी है, जिसकी चर्चा हम अगले किसी अंक में करेंगे। अब हम आपको राग आसावरी पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवाते है। यह गीत "हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया" के लेखक और शोधकर्त्ता श्री के.एल. पाण्डेय के सौजन्य से हम प्रस्तुत कर रहे हैं। गीत 1956 में प्रदर्शित फिल्म "इंस्पेक्टर" से लिया गया है। गीतकार एस.एच. बिहारी हैं और संगीतकार हेमन्त कुमार हैं। कहरवा ताल में निबद्ध इस गीत में हेमन्त कुमार का ही स्वर है। इस गीत का दूसरा संस्करण लता मंगेशकर के स्वर में है। आप यह गीत सुनिए और हमें आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग आसावरी : "दिल छेड़ कोई ऐसा नगमा..." : हेमन्त कुमार : फिल्म - इंस्पेक्टर




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 479वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1955 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के तीसरे सत्र अर्थात 480वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें इस वर्ष के तृतीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किस विख्यात उस्ताद गायक के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 19 सितम्बर, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 481 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 477वें अंक में हमने आपको 1969 में प्रदर्शित फिल्म "तलाश" के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - बरवा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर। 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया और शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब हम काफी हद तक हम सफल भी हुए हैं। इस संक्रमण से स्वस्थ होने वाले लोगों के प्रतिशत में आशातीत वृद्धि हो रही है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “आसावरी थाट के राग” की पहली कड़ी में आज आपने आसावरी थाट के जनक अथवा आश्रय राग आसावरी का परिचय प्राप्त किया। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए संगीतमार्तण्ड ओंकारनाथ ठाकुर के स्वरों में राग आसावरी की एक रागदारी रचना प्रस्तुत की। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार आज की कड़ी में हमने आपको 1956 में प्रदर्शित फिल्म "इंस्पेक्टर" से हेमन्त कुमार का संगीतबद्ध किया और एस.एच. बिहारी का लिखा एक गीत "दिल छेड़ कोई ऐसा नगमा..." प्रस्तुत कर रहे हैं। गीत के स्वर स्वयं हेमन्त कुमार के हैं। कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
थाट व राग आसावरी : SWARGOSHTHI – 479 : THAT & RAG ASAVARI : 13 सितम्बर, 2020 


रविवार, 6 सितंबर 2020

राग बरवा : SWARGOSHTHI – 478 : RAG BARAWA



स्वरगोष्ठी – 478 में आज 

काफी थाट के राग – 22 : राग बरवा 

उस्ताद राशिद खाँ से राग बरवा में एक रागदारी रचना और लता मंगेशकर से फिल्मी गीत सुनिए 



उस्ताद राशिद खाँ 
लता मंगेशकर 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “काफी थाट के राग” की बाईसवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच स्वरों का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की बाइसवीं कड़ी में आज हमने काफी थाट के राग बरवा का चयन किया है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम आपके लिए षाड़व-सम्पूर्ण जाति के राग बरवा का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात संगीतज्ञ उस्ताद राशिद खाँ के स्वरों में राग बरवा में निबद्ध एक शास्त्रीय रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। इस राग के स्वरों का फिल्मी गीतों में नहीं के बराबर उपयोग किया गया है। राग बरवा के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का भी हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1969 में प्रदर्शित फिल्म "तलाश" से मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा और सचिनदेव बर्मन का स्वरबद्ध किया एक गीत "खाई है रे हमने कसम..." सुनवा रहे हैं, जिसे लता मंगेशकर ने स्वर दिया है। 


राग बरवा काफी थाट का जन्य राग माना जाता है। इस राग में कोमल गान्धार तथा दोनों निषाद (शुद्ध और कोमल) का प्रयोग किया जाता है। आरोह में गान्धार वर्जित होता है और अवरोह में सातो स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इस प्रकार इस राग की जाति षाड़व-सम्पूर्ण होती है। राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम माना जाता है। यह राग क्षुद्र प्रकृति का राग माना जाता है। राग में काफी, सिंदूरा और देशी का मिश्रण भी पाया जाता है। इस राग के गायन और वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय दिन का तृतीय प्रहर होता है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम आपको यूट्यूब के सौजन्य से रामपुर-सहसवान गायकी के विशेषज्ञ उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में राग बरवा में निबद्ध एक रचना सुनवा रहे हैं, जिसके बोल है; "बाजे मोरी पायलिया..."। 

राग बरवा : "बाजे मोरी पायलिया..." : उस्ताद राशिद खाँ 


राग बरवा प्रातःकालीन राग देशी का सायंकालीन संस्करण माना जाता है। इस राग में विलम्बित खयाल नहीं सुनाई देता। यह धुन के उपयुक्त राग है। अधिकतर गायक और वादक छोटा खयाल गाते अथवा बजाते हैं। इस राग के पुर्वांग में राग देशी की छाया परिलक्षित होती है। राग बरवा में छोटा खयाल के अलावा ठुमरी या दादरा भी प्रस्तुत किये जाते हैं। फिल्मी गीतों में भी इस राग का प्रयोग लगभग नहीं के बराबर किया गया है। "स्वरगोष्ठी" के नियमित पाठक और श्रोता वोरहीज, न्यूजर्सी के डॉ. किरीट छाया ने पिछली पहेली का उत्तर देते हुए लिखा है कि 'मेरी जानकारी में राग बरवा पर आधारित शायद यह एकमात्र गीत है'। फिल्मी गीतों में राग-तत्व विषयक शोधकर्त्ता श्री के.एल. पाण्डेय ने भी हमें वर्ष 1969 में प्रदर्शित फिल्म "तलाश" के इसी गीत को सुनवाने का अनुरोध किया है। आप राग बरवा पर आधारित यह गीत सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग बरवा : "खाई है रे हमने कसम..." : लता मंगेशकर : फिल्म - तलाश 




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 478वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1956 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के तीसरे सत्र अर्थात 480वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें इस वर्ष के तृतीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किस विख्यात पार्श्वगायक के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 12 सितम्बर, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 480 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 476वें अंक में हमने आपको 1964 में प्रदर्शित फिल्म "चाँदी की दीवार" के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - शुद्ध सारंग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – तलत महमूद और आशा भोसले। 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब हम काफी हद तक हम सफल भी हुए हैं। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “काफी थाट के राग” की बाईसवीं कड़ी में आज आपने काफी थाट के जन्य राग बरवा का परिचय प्राप्त किया। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए रामपुर, सहसवान घराने की गायकी में दक्ष उस्ताद राशिद खाँ के स्वरों में राग बरवा की एक रचना प्रस्तुत की। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार आज की कड़ी में हमने आपको 1969 में प्रदर्शित फिल्म "तलाश" से सचिनदेव बर्मन का संगीतबद्ध किया और मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा एक गीत "खाई है रे हमने कसम..." प्रस्तुत कर रहे हैं। गीत के स्वर लता मंगेशकर के हैं। कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

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राग बरवा : SWARGOSHTHI – 478 : RAG BARAWA : 6 सितम्बर, 2020
 


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