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Thursday, December 20, 2012

रफी ने जब नौशाद का पहला गीत गाया : नौशाद के 94वें जन्मदिन पर विशेष


स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल – 28

नौशाद की बारात में जब बैंड पर उन्हीं के रचे गीतों की धुन बजी



भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘स्मृतियों के झरोखे से’ में आप सभी सिनेमा प्रेमियों का मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, लगभग आधी शताब्दी तक सिने-संगीत पर एकछत्र राज करने वाले चर्चित संगीतकार नौशाद अली का 25 दिसम्बर को 94वाँ जन्मदिवस है। इस अवसर के लिए आज का यह अंक हम उनकी स्मृतियों को समर्पित कर रहे हैं। फिल्मों में नौशाद का पदार्पण चौथे दशक में ही हो गया था, किन्तु उन्हे स्वतंत्र रूप से पहचान मिली पाँचवें दशक के आरम्भिक वर्षों में। उनके संगीत से सजी, 1944 में प्रदर्शित फिल्म ‘रतन’ को आशातीत सफलता मिली थी। आज के अंक में फिल्म ‘रतन’ और इसी वर्ष बनी तीन अन्य फिल्मों में नौशाद के रचनात्मक योगदान की  चर्चा करेंगे।



1944 का साल संगीतकार नौशाद के करीयर का ‘टर्निंग पॉयण्ट ईयर’ साबित हुआ। गीतकार के रूप में ख्याति अर्जित करने के बाद दीनानाथ मधोक ने ख़ुद फ़िल्म बनाने की सोची। पर युद्धकाल होने की वजह से फ़िल्म-निर्माण लाइसेन्स नियंत्रित हो गया था जिसका नियंत्रण ब्रिटिश सरकार के हाथ में था। ऐसे में मधोक ने जेमिनी दीवान से सम्पर्क किया जिनके पास फ़िल्म-निर्माण का लाइसेन्स था। इस तरह से ‘जेमिनी पिक्चर्स’ के बैनर तले मधोक ने बनाई ‘रतन’ जिसके प्रदर्शित होते ही चारों तरफ़ धूम मच गई और नौशाद प्रथम श्रेणी के संगीतकारों में शामिल हो गए। नौशाद ने इस फ़िल्म में ज़ोहराबाई अम्बालेवाली से “अखियाँ मिलाके जिया भरमाके चले नहीं जाना...” गवाकर चारों तरफ़ तहलका मचा दिया। यह गीत न केवल ज़ोहराबाई का सबसे चर्चित गीत साबित हुआ बल्कि यह अब तक का सबसे पुराना ऐसा गीत है जिसका रीमिक्स बना है। एम. सादिक़ निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे करण दीवान और स्वर्णलता। फ़िल्म के अन्य चर्चित गीतों में ज़ोहराबाई और करण दीवान का गाया “सावन के बादलों, उनसे ये जा कहो, तक़दीर में यही था, साजन मेरे ना रो...” गीत भी अपने ज़माने का मशहूर गीत रहा। डी.एन. मधोक के लिखे इन गीतों में ज़ोहराबाई के एकल स्वर में “परदेसी बालम आ बादल आए, तेरे बिना कछु न भाए आ...”, “रुमझुम बरसे बादरवा, मस्त हवाएँ आईं...” और “आई दीवाली, आई दीवाली, दीपक संग नाचे पतंगा...” जैसे गीतों का भी अपना अलग स्वाद था। ये सभी गीत उत्तर भारत के लोक-संगीत पर आधारित थे। “आई दीवाली...” तो राग भैरवी पर भी आधारित था। अमीरबाई और श्याम कुमार का गाया युगल गीत “ओ जानेवाले बालमवा लौट के आ, लौट के आ...” अपने आप में एक ट्रेण्डसेटर गीत था क्योंकि इसमें नायिका जिस तरह से नायक से अपने प्रेम के लिए राज़ी कर रही हैं, मना रही हैं, पर नायक जवाब में कहते हैं “जा मैं ना तेरा बालमवा, बेवफ़ा बेवफ़ा”। फ़िल्मी गीत का यह फ़ॉरमूला बाद के वर्षों में अनेक गीतों में सुनने को मिला। अमीरबाई के एकल स्वर में “मिलके बिछड़ गईं अखियाँ हाय रामा...” भी एक सुन्दर रचना थी जिसमें भी लोक-संगीत और ऑरकेस्ट्रेशन का सुरीला संगम था। ‘रतन’ में मंजू नामक अभिनेत्री ने करण दीवान के बहन की भूमिका निभाई थी और उनका गाया इस फ़िल्म का गीत “अंगड़ाई तेरी है बहाना, साफ़ कह दो हमें कि जाना जाना...” बेहद मशहूर हुआ था। मंजू का गाया फ़िल्म का एक और गीत रहा “झूठे हैं सब सपन सुहाने, मूरख मन सच जाने...”। इसी फ़िल्म के सेट पर करण दीवान और मंजू का पहला परिचय हुआ था और इन दोनों ने बाद में एक दूजे से शादी कर ली। अमीरबाई, ज़ोहराबाई और मंजू की अलग अलग आवाज़ें फ़िल्म के गीतों में विविधता ले आई और एक दूसरे से बढ़कर सुनने में लगे। करण दीवान की आवाज़ सहमी हुई आवाज़ थी, इसलिए उनसे ज़्यादा गाने गवाए नहीं गए। उनके एकल स्वर में ‘रतन’ का एक गीत था “जब तुम ही चले परदेस, लगा कर ठेस, ओ प्रीतम प्यारा...”। ‘रतन’ में कुल दस गीत थे, जिन्हें मधोक ने लिखे, और मधोक ने ही फ़िल्म के संवाद भी लिखे। एक ब्लॉकबस्टर फ़िल्म होने के साथ साथ ‘रतन’ विवाद में भी फँसी क्योंकि फ़िल्म विधवा-पुनर्विवाह की कहानी पर केन्द्रित थी। अगर ग़ुलाम हैदर पंजाबी लोक धुनों को फ़िल्म-संगीत में लोकप्रिय बनाने के लिए जाने गए, तो नौशाद ने उत्तर प्रदेश के लोक-संगीत पर प्रयोग किए और फ़िल्मी गीतों में इन्हें ऐसे घोल दिया कि फिर कभी यह इससे अलग ही नहीं हो पाया। आइए यहाँ थोड़ा विराम लेकर आपको सुनवाते है, फिल्म ‘रतन’ का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत-


फिल्म ‘रतन’ : ‘अँखियाँ मिलाके जिया भरमाके...’ : ज़ोहराबाई अम्बालेवाली



उत्तर प्रदेश की लोक धुनें, मधुर ऑरकेस्ट्रेशन, और ग़ुलाम मोहम्मद की थिरकन भरी तबले और ढोलक के ठेके, कुल मिलाकर एक ऐसी स्टाइल का जन्म हुआ जिसे लोगों ने हाथोंहाथ ग्रहण किया। कहा जाता है कि ‘रतन’ का निर्माण 80,000 रुपये में हुआ था, जबकि निर्माता को केवल ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड की रॉयल्टी से ही 3,50,000 रुपये की आमदनी हुई थी। नौशाद अपने परिवार के ख़िलाफ़ जाकर फिल्म संगीत में अपनी क़िस्मत आज़माने बम्बई आ गए थे। उनके संगीतकार बन जाने के बाद और सफलता हासिल कर लेने के बाद भी उनके परिवार में इस कामयाबी को अच्छी निगाहों से नहीं देखा गया। उन्हीं के शब्दों में एक मज़ेदार क़िस्से का आनन्द लीजिए यहाँ पर – “ख़ैर, माँ का पैग़ाम आया कि शादी के लिए लड़की तय हो गई है, मैं घर आ जाऊँ। उस वक़्त मैं नौशाद बन चुका था। माँ ने कहा कि लड़की वाले सूफ़ी लोग हैं, इसलिए उनसे उन्होंने (नौशाद के पिता ने) यह नहीं कहा कि तुम संगीत का काम करते हो, बल्कि तुम दर्ज़ी का काम करते हो। मैंने सोचा कि संगीतकार से दर्ज़ी की इज़्ज़त ज़्यादा हो गई है! तो शादी में शामियाना लगाया गया, और बैण्ड वाले मेरे ही गाने बजाए जा रहे हैं और मैं दर्ज़ी बना बैठा हूँ। किसी ने फिर कहीं से कहा कि कौन ये सब बजा रहा है, सबको ख़राब कर रहा है?

‘कारदार प्रोडक्शन्स’ की १९४४ की सभी तीन फ़िल्मों में नौशाद का संगीत और डी.एन. मधोक व माहर-उल-क़ादरी के गीत थे। ये फ़िल्में थीं ‘गीत’, ‘जीवन’ और ‘पहले आप’। ‘गीत’ में निर्मला, अमीरबाई, ज़ोहराबाई और शाहू मोडक के गाए गीत थे। अब हम आपको फिल्म ‘गीत’ से नौशाद का संगीतबद्ध किया और निर्मला देवी का गाया एक मधुर गीत सुनवाते हैं।


फिल्म ‘गीत’ : ‘मैं तो पिया की जोगिनियाँ हूँ...’ : निर्मला देवी



नौशाद की ही संगीतबद्ध फिल्म ‘जीवन’ में ज़ोहराबाई और निर्मला देवी के साथ साथ हमीदा ने भी अपनी आवाज़ दी थी। ‘जीवन’ में ज़ोहराबाई का गाया “नैनों में नैना मत डालो जी ओ बलम...” लोकप्रिय हुआ था। अंग्रेज़ी शब्दों के प्रयोग वाला ज़ोहरा का ही गाया एक गीत भी फिल्म में था “My dear my dear, I love you, मोरा जिया न लगे... ”। इस फ़िल्म का नाम पहले ‘बहार’ रखा गया था। ‘रतन’ और इन तमाम फ़िल्मों में गीत गाकर ज़ोहराबाई उस दौर में शीर्ष की पार्श्वगायिकाओं में अपना नाम दर्ज करवा चुकी थीं। इन्हीं ज़ोहराबाई की आवाज़ में अब हम आपको फिल्म ‘जीवन’ का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत सुनवाते है।


फिल्म ‘जीवन’ : ‘नैनों में नैना मत डारो...’ : ज़ोहराबाई अम्बालेवाली




नौशाद के संगीत निर्देशन में 1944 में बनी फिल्म ‘पहले आप’ में भी ज़ोहराबाई के गाये कम से कम दो चर्चित गीत रहे “मोरे सैंयाजी ने भेजी चुनरी रंगूँ मैं इसे प्यार के रंग दा...” और “चले गए चले गए दिल में आग लगाने वाले...”। परन्तु ‘पहले आप’ फ़िल्म को आज लोग जिस वजह से याद करते हैं, उसका कारण कुछ और है। यही वह फ़िल्म थी जिसके ज़रिए नौशाद ने हिन्दी सिने-संगीत जगत को एक नई आवाज़ दी। यह वह शख़्स की आवाज़ थी जिसे आज गायकों का शहंशाह कहा जाता है, जिनका नाम फ़िल्म-संगीत के इतिहास के सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायकों की फ़ेहरिस्त में सबसे उपर आता है। यह नाम है मोहम्मद रफ़ी का जिन्होंने फ़िल्म-संगीत जगत में अपने समकालीन कुछ और चर्चित पार्श्वगायकों के साथ करीब करीब ३५ वर्षों तक राज किया। नौशाद से रफ़ी को मिलवाने का श्रेय हमीद भाई को ही जाता है। उन्होंने ही लखनऊ जाकर नौशाद के पिता से मिल कर, उनसे एक सिफ़ारिशनामा लेकर रफ़ी को दे दिया कि बम्बई जाकर इसे नौशाद को दिखाए। बम्बई जाकर नौशाद से रफ़ी की पहली मुलाक़ात का वर्णन विविध भारती पर नौशाद के साक्षात्कार में मिलता है– “जब मोहम्मद रफ़ी मेरे पास आए, तब वर्ल्ड वार ख़त्म हुआ चाहता था। मुझे साल याद नहीं। उस वक़्त फ़िल्म प्रोड्यूसर्स को कम से कम एक वार-प्रोपागण्डा फ़िल्म ज़रूर बनाना पड़ता था। रफ़ी साहब लखनऊ से मेरे पास मेरे वालिद साहब का एक सिफ़ारिशी ख़त लेकर आए। छोटा सा तम्बूरा हाथ में लिए खड़े थे मेरे सामने। मैंने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने संगीत सीखा है, तो बोले कि उस्ताद बरकत अली ख़ाँ से सीखा है, जो उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब के छोटे भाई थे। मैंने उनको कहा कि इस वक़्त मेरे पास कोई गीत नहीं है जो मैं उनसे गवा सकता हूँ, पर एक कोरस ज़रूर है जिसमें अगर वो चाहें तो कुछ लाइनें गा सकते हैं। और वह गाना था “हिन्दुस्तान के हम हैं हिन्दुस्तान हमारा, हिन्दू मुस्लिम दोनों की आँखों का तारा...”। इस गीत में रफ़ी साहब ने दो लाइन गायीं जिसके लिए उन्हें दस रुपये दिए गए। श्याम, दुर्रानी और कुछ अन्य गायकों ने भी कुछ-कुछ पंक्तियाँ गायीं।” और इस तरह से मोहम्मद रफ़ी का गाया पहला हिन्दी फ़िल्मी गीत बाहर आया। पर रेकॉर्ड पर इस गीत को “समूह गीत” लिखा गया। यह गीत न केवल रफ़ी साहब के करियर का एक महत्वपूर्ण गीत बना, बल्कि इसके गीतकार डी.एन. मधोक के लिए भी यह उतना ही महत्वपूर्ण गीत बना क्योंकि इस गीत में उनके धर्मनिरपेक्षता के शब्दों के प्रयोग के लिए उन्हें “महाकवि” के शीर्षक से सम्मानित किया गया था। ब्रिटिश राज ने इस गीत का मार्च-पास्ट गीत के रूप में विश्वयुद्ध में इस्तेमाल किया। भले ही “हिन्दुस्तान के हम हैं...” गीत के लिए रफ़ी का नाम रेकॉर्ड पर नहीं छपा, पर इसी फ़िल्म में नौशाद ने उनसे दो और गीत भी गवाए, जो श्याम के साथ गाए हुए युगल गीत थे – “तुम दिल्ली में आगरे, मेरे दिल से निकले हाय...” और “एक बार उन्हें मिला दे, फिर मेरी तौबा मौला...”। एक गीत ज़ोहराबाई के साथ भी उनका गाया हुआ बताया जाता है- “मोरे सैंयाजी ने भेजी चुनरी...”, पर रेकॉर्ड पर ‘ज़ोहराबाई और साथी’ के नाम श्रेय दिया गया है। जो भी है, ‘पहले आप’ फिल्म से नौशाद और रफ़ी की जो जोड़ी बनी थी, वह अन्त तक क़ायम रही। फिल्म ‘पहले आप’ में नौशाद के संगीत निर्देशन में रफी के गाये पहले गीत का आप आनन्द लीजिए और आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


फिल्म ‘पहले आप’ : ‘हिन्दुस्तान के हम हैं हिन्दुस्तान हमारा...’ : मोहम्मद रफी और साथी




आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल’ के आगामी अंक में आपके लिए हम एक रोचक संस्मरण लेकर उपस्थित होंगे। आप अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव हमें radioplaybackindia@live.com पर अवश्य भेजें। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Monday, May 10, 2010

बेहतर तालमेल के चलते इंडस्ट्री में बनी गीतकार -संगीतकारों की ढेरों सफल जोडियाँ, और इन जोड़ियों ने खेली लंबी पारियाँ

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # २०

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आज रिवाइवल उमा देवी की गाई उस शानदार यादगार गाने की जिसे आपने इसी महफ़िल में कमचर्चित गायिकाओं पर केन्द्रित शृंखला 'हमारी याद आएगी' में कड़ी नं ३३२ में सुना था। उत्तर प्रदेश के एक खत्री परिवार में जन्मीं उमा देवी को अभिनय से ज़्यादा गायकी का शौक था। लेकिन एक रूढ़ीवादी पंजाबी परिवार में होने की वजह से उनको अपने परिवार से कोई बढ़ावा ना मिल सका। उन्होने अपनी मेहनत से हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी में शिक्षा प्राप्त की और महज़ १३ वर्ष की उम्र में ही बम्बई आ पहुँचीं। सन् १९४७ में उमा देवी को अपना पहला एकल गीत गाने का मौका मिला जिसके लिए उन्हे २०० रुपय का मेहनताना मिला। उन्हे नौशाद साहब का संगीत इतना पसंद था कि उनके बार बार अनुरोध करने पर आख़िरकार नौशाद साहब ऒडिशन के लिए तैयार हो ही गए। और उनकी गायन से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। और फ़िल्म 'दर्द' में पहली बार उमा देवी ने गानें गाए और पहला गीत ही सुपर डुपर हिट। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इसी गीत की बारी। नौशाद साहब उन दिनों जिन जिन फ़िल्मों में संगीत दे रहे थे, उन सब में उन्होने उमा देवी को कम से कम एक गीत गाने का मौका ज़रूर दिया। पर यह सिलसिला बहुत ज़्यादा दिनों तक नहीं चला. धीरे धीरे उन्हे गानें मिलने बंद हो गए। इसका एक कारण था दूसरी गायिकाओं का और ज़्यादा प्रतिभाशाली होना जो ऊँची आवाज़ में गा सकते थे। उमा देवी को अपनी सीमाओं का पूरा अहसास था। दूसरे, उनका मोटापा भी उन्हे चुभ रहा था जो उनकी गायकी पर असर डाल रहा था। ऐसे में उनके राखी भाई नौशाद साहब ने उन्हे फ़िल्मों में हास्य चरित्रों के रूप में काम करने का सुझाव दिया, और इस प्रकार आरंभ हुई उमा देवी की दूसरी पारी, जिन्हे हम टुनटुन के नाम से जानते हैं। उनकी यह दूसरी पारी सब को इतना पसंद आया कि उमा देवी सब के दिल में आज तक टुनटुन के नाम से ही बसी हुईं हैं और हमेशा रहेंगी। दोस्तों, आज उमा जी को श्रद्धांजली अर्पित करते हुए हमने उनका गाया सब से हिट गीत चुना है, १९४७ की फ़िल्म 'दर्द' का - "अफ़साना लिख रही हूँ दिल-ए-बेक़रार का, आँखो में रंग भर के तेरे इंतज़ार का"। दोस्तों, फ़िल्म 'दर्द' का यह गीत एक और दृष्टि से भी बेहद ख़ास है कि इस गीत से ही शुरु हुआ था गीतकार शक़ील बदायूनी और संगीतकार नौशाद का साथ, जिस जोड़ी ने इतिहास कायम किया सदाबहार नग़मों की दुनिया में। शक़ील बदायूनी पर केन्द्रित विविध भारती के एक कार्यक्रम में यूनुस ख़ास कहते हैं कि "दिलचस्प बात यह है कि शायरी की दुनिया से आने के बावजूद शक़ील ने फ़िल्मी गीतों के व्याकरण को फ़ौरन समझ लिया था। उनकी पहली ही फ़िल्म के गाने एक तरफ़ सरल और सीधे सादे हैं तो दूसरी तरफ़ उनमें शायरी की ऊँचाई भी है। इसी गाने में शक़ील साहब ने लिखा है कि "आजा के अब तो आँख में आँसू भी आ गए, सागर छलक उठा है मेरे सब्र-ओ-क़रार का, अफ़साना लिख रही हूँ दिल-ए-बेक़रार का"। किसी के इंतज़ार को जितने शिद्दत भरे अलफ़ाज़ शक़ील ने दिए, शायद किसी और गीतकार ने नहीं दिए।"

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत - अफसाना लिख रही हूँ...
कवर गायन - डाक्टर पारसमणी आचार्य




ये कवर संस्करण आपको कैसा लगा ? अपनी राय टिप्पणियों के माध्यम से हम तक और इस युवा कलाकार तक अवश्य पहुंचाएं


डाक्टर पारसमणी आचार्य
मैं पारसमणी राजकोट गुजरात से हूँ, पापा पुलिस में थे और बहुत से वाध्य बजा लेते थे, उनमें से सितार मेरा पसंदीदा था. माँ भी HMV और AIR के लिए क्षेत्रीय भाषा में पार्श्वगायन करती थी, रेडियो पर मेरा गायन काफी छोटी उम्र से शुरू हो गया था. मैं खुशकिस्मत हूँ कि उस्ताद सुलतान खान साहब, बेगम अख्तर, रफ़ी साहब और पंडित रवि शंकर जी जैसे दिग्गजों को मैंने करीब से देखा और उनका आशीर्वाद पाया. गायन मेरा शौक तब भी था और अब भी है, रफ़ी साहब, लता मंगेशकर, सहगल साहब, बड़े गुलाम अली खान साहब और आशा भोसले मेरी सबसे पसंदीदा हैं


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

Friday, April 2, 2010

बेताब है दिल दर्द-ए-मोहब्बत के असर से...सुरैया और उमा देवी के युगल स्वरों में ये गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 392/2010/92

'सखी सहेली' की दूसरी कड़ी में आप सभी का एक बार फिर स्वागत है। महिला युगल गीतों की इस शृंखला में कल आप ने ज़ोहराबाई अम्बालेवाली और शमशाद बेग़म का गाया एक बच्चों वाला गाना सुना था। आज हमने जिन दो गायिकाओं को चुना है वे हैं सुरैय्या और उमा देवी। बहुत ही दुर्लभ जोड़ी है, और इस जोड़ी की याद आते ही हमें झट से याद आती है १९४७ की फ़िल्म 'दर्द' का वही सुरीला गीत, याद है ना "बेताब है दिल दर्द-ए-मोहब्बत के असर से, जिस दिन से मेरा चांद छुपा मेरी नज़र से"। बहुत दिनों से आपने यह गीत नहीं सुना होगा, है ना? तो चलिए आज उन पुरानी यादों को एक बार फिर से ताज़ा कीजिए शक़ील बदायूनी के लिखे इस गीत से जिसकी तर्ज़ बनाई थी नौशाद अली ने। फ़िल्म 'दर्द' का निर्माण व निर्देशन किया था अब्दुल रशीद कारदार ने, जिन्हे हम ए. आर. कारदार के नाम से बेहतर जानते हैं। श्याम, नुसरत, मुअव्वर सुल्ताना, सुरैय्या, बद्री प्रसाद, हुस्न बानो, प्रतिमा देवी प्रमुख अभिनीत इस फ़िल्म से ही शक़ील और नौशाद की जोड़ी शुरु हुई थी। इस फ़िल्म के कुछ गीत उमा देवी ने गाए, कुछ सुरैय्या ने, और शमशाद बेग़म की भी आवाज़ थी इस फ़िल्म में। मैं पूरी यक़ीन के साथ तो नहीं कह सकता, लेकिन जितना मैंने जाना है कि इस फ़िल्म में किसी पुरुष गायक की आवाज़ नहीं थी। इस फ़िल्म की जब भी बात चलती है तो सब से पहले उमा देवी का गाया "अफ़साना लिख रही हूँ" गीत ज़हन में आता है। इस गीत को हमने कमचर्चित पार्श्वगायिकाओं पर केन्द्रित शृंखला 'हमारी याद आएगी' में हमने सुनवाया था। इस गीत का फ़िल्मांकन मुनव्वर सुल्तना पर हुआ था। अब क्योंकि इस फ़िल्म में सुरैय्या भी थीं, तो ज़ाहिर है कि उन पर फ़िल्माए गीत उन्होने ही गाए होंगे। आज का प्रस्तुत युगल गीत मुनव्वर सुल्ताना और सुरैय्या पर फ़िल्माया हुआ है, और ऐसा लगता है कि प्रेम त्रिकोण की कहानी रही होगी यह फ़िल्म, और ये दोनों नायिकाएँ अपने अपने दिल की बातें गीत के शक्ल में बयाँ कर रही हैं, लेकिन एक ही पुरुष के लिए। पहला और तीसरा अंतरा उमा देवी ने गाया है जब कि दूसरा अंतरा सुरैय्या की आवाज़ में है। हैरत की बात है कि इन दोनों की आवाज़ों में बहुत ज़्यादा कंट्रास्ट सुनाई नहीं देता इस गीत में। इस गीत की अदायगी जितनी प्यारी है, उतने ही सुंदर हैं शक़ील साहब के बोल, और नौशाद साहब ने भी क्या धुन बनाई है। गाने का जो मूल रीदम है, वह बंगाल के कीर्तन शैली की तरह सुनाई देता है।

१९९१ में उमा देवी विविध भारती पर तशरीफ़ लाई थीं और सुरैय्या के साथ उनके गाए हुए इस गीत को बजाया भी था और इसके बारे में बताया भी था। पेश है उस कार्यक्रम का वह अंश: "मेरे सज्जनों, मैं तुम्हे थोड़ी सी आप बीती सुनाती हूँ। मशहूर हीरोइन सुरैय्या, फ़िल्म स्टार सुरैय्या, हाय हाय हाय हाय, सुरैय्या के साथ मैंने फ़िल्म 'दर्द' का यह गाना गाया था। आप लोग ख़ूब सुनते हैं यह गाना। उसमें मैं भी उनके साथ खड़ी होकर, बिल्कुल उनसे लिपटी खड़ी गा रही थी, "बेताब है दिल दर्द-ए-मोहब्बत के असर से"। इसमे हम दोनों ने अपने अपने गाने की अदायगी की थी, ज़रा सुनिए तो..." और इस गीत के ख़त्म होते ही उमा जी कहती हैं, "क्यों, अच्छा लगा ना? मैं आपको अच्छी लगती हूँ ना? आप भी मुझे बड़े अच्छे लगते हैं। अरे, अगर आप यहीं सामने खड़े होते तो तुम्हे गले से चिपड चिपड कर जाने ही नहीं देती।" दोस्तों, क्योंकि उमा देवी उसके बाद टुनटुन बन चुकी थीं, इसलिए विविध भारती के उस 'जयमाला' कार्यक्रम में उनकी बातों का अंदाज़ टुनटुन जैसा था और जो गानें उन्होने सुनवाए, वो उमा देवी ने सुनवाए। बहुत ही प्रतिभाशाली अदाकारा थीं वो। भली ही गायन में बहुत दूर तक नहीं पहुँचीं, लेकिन अपने हास्य अभिनय से न जाने कितने हज़ारों लाखों लोगों की होठों पर मुस्कान बिखेरा है उन्होने। और किसी के चेहरे पर मुस्कान खिलाने से बेहतर और कोई दूसरी इबादत नहीं हो सकती। दोस्तों, आप सोच रहे होंगे कि हमने केवल उमा देवी के बारे में ही बातें कीं, और सुरैय्या को भूल गए। हम वादा करते हैं कि इसके बाद जिस किसी भी दिन सुरैय्या जी का गाया हुआ कोई गीत सुनवाएँगे, उस दिन उनके जीवन से जुड़ी कुछ और बातें आप तक ज़रूर पहुँचाएँगे, वैसे उनसे जुड़ी बहुत सारी बातें हम पहले भी बता चुके हैं। और क्यों कि आज अभी आप बेताब होंगे इस बेताबी भरे गीत को सुनने के लिए, इसलिए हम आज यहीं रुक जाते हैं, सुनिए यह प्यारा सा गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि युं तो लोग यही जानते हैं कि उमा देवी को पहली बार नौशाद साहब ने फ़िल्म 'दर्द' में गवाया था, लेकिन हक़ीक़त यह है कि १९४६ में उमा देवी ने 'वामिक़ अज़रा' नामक एक फ़िल्म में गीत गाया था जिसके संगीतकर थे ए.आर. क़ुरेशी।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े में शब्द है -"दुनिया", गीत बताएं -३ अंक.
2. दो गायिका बहनों ने गाया है इसे, एक लता है दूसरी का नाम बताएं- २ अंक.
3. निर्माता एस. एम. एस. नायडू की इस फिल्म के संगीतकार बताएं -२ अंक.
4. इस नटखट मस्ती भरी गीत के गीतकार कौन हैं-२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
क्या बात सब के सब चूके इस बार, पर शरद जी ने फिल्म का नाम सही बताया है, २ अंक जरूर मिलेंगें

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, February 1, 2010

अफसाना लिख रही हूँ....उमा देवी की आवाज़ में एक खनकता नगमा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 332/2010/32

मारी याद आएगी' शृंखला की दूसरी कड़ी में आपका स्वागत है। दोस्तों, यह शृंखला समर्पित है उन कमचर्चित पार्श्वगायिकाओं के नाम जिन्होने फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर में कुछ बेहद सुरीले और मशहूर गीत गाए हैं, लेकिन उनका बहुत ज़्यादा नाम न हो सका। आज एक ऐसी गायिका का ज़िक्र जिन्होने दो दो पारियाँ खेली हैं इस फ़िल्म जगत में। जी हाँ, पार्श्व गायिका के रूप में अपना करीयर शुरु करने के बाद जब उन्हे लगा कि इस क्षेत्र में वो बहुत ज़्यादा कामयाब नहीं हो पाएँगी, तो उन्होने अपनी प्रतिभा को अभिनय के क्षेत्र में आज़माया। और एक ऐसी हास्य अभिनेत्री बनीं कि वो जिस किसी फ़िल्म में भी आतीं लोगों को हँसा हँसा कर लोट पोट कर देतीं। गायन के क्षेत्र में तो उनका बहुत ज़्यादा नाम नहीं हुआ लेकिन उनके हास्य अभिनय से सजे अनगिनत फ़िल्में और फ़िल्म जगत की बेहतरीन कॊमेडियन के रूप में उनका नाम आज भी सम्मान से लिया जाता है। आप समझ ही चुके होंगे कि आज हम बात कर रहे हैं गायिका उमा देवी, यानी कि हम सब की चहेती टुनटुन की। उत्तर प्रदेश के एक खत्री परिवार में जन्मे उमा देवी को अभिनय से ज़्यादा गायकी का शौक था। लेकिन एक रूढ़ीवादी पंजाबी परिवार में होने की वजह से उनको अपने परिवार से कोई बढ़ावा ना मिल सका। उन्होने अपनी मेहनत से हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी में शिक्षा प्रात की और महज़ १३ वर्ष की उम्र में ही बम्बई आ पहुँचीं। सन्‍ १९४७ में उमा देवी को अपना पहला एकल गीत गाने का मौका मिला जिसके लिए उन्हे २०० रुपय की मेहनताना मिली। उन्हे नौशाद आहब का संगीत इतना पसंद था कि उनके बार बार अनुरोध करने पर आख़िरकार नौशाद साहब ऒडिशन के लिए तैयार हो गए। और उनकी गायन से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। और फ़िल्म 'दर्द' में पहली बार उमा देवी ने गानें गाए और पहला गीत ही सुपर डुपर हिट। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इसी गीत की बारी।

नौशाद साहब उन दिनों जिन जिन फ़िल्मों में संगीत दे रहे थे, उन सब में उन्होने उमा देवी को कम से कम एक गीत गाने का मौका ज़रूर दिया। पर यह सिलसिला बहुत ज़्यादा दिनों तक नहीं चली। धीरे धीरे उन्हे गानें मिलने बंद हो गए। इसका एक कारण था दूसरी गायिकाओं का और ज़्यादा प्रतिभाशाली होना जो ऊँची आवाज़ में गा सकते थे। उमा देवी को अपनी सीमाओं का पूरा अहसास था। दूसरे, उनका मोटापा भी उन्हे चुभ रही थी जो उनकी गायकी पर असर डाल रहा था। ऐसे उनके राखी भाई नौशाद साहब ने उन्हे फ़िल्मों में हास्य चरित्रों के रूप में काम करने का सुझाव दिया, और इस प्रकार आरंभ हुई उमा देवी की दूसरी पारी, जिन्हे हम टुनटुन के नाम से जानते हैं। उनकी यह दूसरी पारी सब को इतनी पसंद आई कि उमा देवी सब के दिल में आज तक टुनटुन के नाम से ही बसी हुईं हैं और हमेशा रहेंगी। दोस्तों, आज उमा जी को श्रद्धांजली अर्पित करते हुए हमने उनका गाया सब से हिट गीत चुना है, १९४७ की फ़िल्म 'दर्द' का - "अफ़साना लिख रही हूँ दिल-ए-बेक़रार का, आँखो में रंग भर के तेरे इंतज़ार का"। दोस्तों, फ़िल्म 'दर्द' का यह गीत एक और दृष्टि से भी बेहद ख़ास है कि इस गेत से ही शुरु हुआ था गीतकार शक़ील बदायूनी और संगीतकार नौशाद का साथ, जिस जोड़ी ने इतिहास कायम किया सदाबहार नगमों की दुनिया में। शक़ील बदायूनी पर केन्द्रित विविध भारती के एक कार्यक्रम में यूनुस ख़ास कहते हैं कि "दिलचस्प बात यह है कि शायरी की दुनिया से आने के बावजूद शक़ील ने फ़िल्मी गीतों के व्याकरण को फ़ौरन समझ लिया था। उनकी पहली ही फ़िल्म के गाने एक तरफ़ सरल और सीधे सादे हैं तो दूसरी तरफ़ उनमें शायरी की ऊँचाई भी है। इसी गाने में शक़ील साहब ने लिखा है कि "आजा के अब तो आँख में आँसू भी आ गए, सागर छलक उठा है मेरे सब्र-ओ-क़रार का, अफ़साना लिख रही हूँ दिल-ए-बेक़रार का"। किसी के इंतज़ार को जितने शिद्दत भरे अलफ़ाज़ शक़ील ने दिए, शायद किसी और गीतकार ने नहीं दिए।" तो आइए दोस्तों, उमा देवी की शिद्दत भरी आवाज़ में सुनते हैं फ़िल्म 'दर्द' का यह नग़मा।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

लोक लाज तज दिया मैंने,
मन को तुझ संग बाँध के,
जागते हैं बस याद में तेरी,
रात रात हम संग चाँद के

अतिरिक्त सूत्र- एक मशहूर संगीतकार की पत्नी भी हैं ये कम्चार्चित सुरीली गायिका

पिछली पहेली का परिणाम-
अवध जी बधाई एकदम सही है जवाब
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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