Showing posts with label swargoshthi 181. Show all posts
Showing posts with label swargoshthi 181. Show all posts

Sunday, August 17, 2014

कजरी गीतों का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान : SWARGOSHTHI – 181 : KAJARI



स्वरगोष्ठी – 181 में आज

वर्षा ऋतु के राग और रंग – 7 : कजरी गीतों का लोक स्वरूप


कजरी का लोक रंग : ‘कैसे खेले जइबू सावन में कजरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी...’







‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के राग और रंग’ की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः आप सभी संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम वर्षा ऋतु के राग, रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत का आनन्द प्राप्त कर रहे हैं। हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले गीत, संगीत, रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं का रसास्वादन कर रहे हैं। इसके साथ ही सम्बन्धित राग और धुन के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी सुन रहे हैं। पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में जहाँ मल्हार अंग के राग समर्थ हैं, वहीं लोक संगीत की रसपूर्ण विधा कजरी अथवा कजली भी पूर्ण समर्थ होती है। इस श्रृंखला की पिछली कड़ियों में हम आपसे मल्हार अंग के कुछ रागों पर और कजरी गीतों के आभिजात्य स्वरूप पर चर्चा कर चुके हैं। आज के अंक से हम कजरी गीतों के पारम्परिक लोक स्वरूप पर चर्चा करेंगे। 
 


डॉ. वनमाला पर्वतकर
जरी की उत्पत्ति कब और कैसे हुई, यह कहना कठिन है, परन्तु यह तो निश्चित है कि मानव को जब स्वर और शब्द मिले होंगे और जब लोकजीवन को प्रकृति का कोमल स्पर्श मिला होगा, उसी समय से ये सब लोकगीत हमारे बीच हैं। प्राचीन काल से ही उत्तर प्रदेश का मीरजापुर जनपद माँ विन्ध्यवासिनी के शक्तिपीठ के रूप में आस्था का केन्द्र रहा है। अधिसंख्य प्राचीन कजरियों में शक्तिस्वरूपा देवी का ही गुणगान मिलता है। आज कजरी के वर्ण्य विषय काफी विस्तृत हैं, परन्तु कजरी गीतों के गायन का आरम्भ देवी गीत से ही होता है। हम भी अपनी आज की इस गोष्ठी का आरम्भ एक पारम्परिक देवी गीत से ही करते हैं। ऐसे गीतों में शक्तिस्वरूपा देवी माँ का लौकिक रूप में प्रस्तुतीकरण होता है। कजरी गीतों का गायन वर्षा ऋतु में अधिकतर महिलाएँ करतीं हैं। इसे एकल और समूह में प्रस्तुत किया जाता है। समूह में प्रस्तुत की जाने वाली कजरी को ‘ढुनमुनियाँ कजरी’ कहते हैं। पुरुष वर्ग भी कजरी गायन करते हैं, किन्तु इनके मंच अलग होते हैं। वर्षा ऋतु में पूर्वाञ्चल के अनेक स्थानों पर कजरी के दंगल आयोजित होते है, जिनमें कजरी के विभिन्न अखाड़े दल के रूप में भाग लेते है। ऐसे आयोजनों में पुरुष गायक-वादकों के दो दल परस्पर सवाल-जवाब के रूप में कजरी गीत प्रस्तुत करते हैं। लोक-जीवन में प्रस्तुत की जाने वाली कजरियों के विषय वैविध्यपूर्ण होते हैं, परन्तु वर्षाकालीन परिवेश का चित्रण सभी कजरियों में अनिवार्य रूप से मिलता है। परम्परागत रूप से कजरी गीतों का आरम्भ देवी गीत से ही किया जाता है। इस प्रकार के कजरी गीतों में शक्तिस्वरूपा माँ विन्ध्यवासिनी की वन्दना की जाती है। आज हम आपको जो देवी गीत सुनवा रहे हैं उसका संकलन और संगीत, वाराणसी की संगीत परम्परा के विद्वान पण्डित शिवकुमार शास्त्री ने किया है। शास्त्री जी के अनुसार इस देवी गीत का प्रचलन लगभग आठ दशक पूर्व भी रहा है। गीत के अन्तिम अन्तरे में ‘नारायण’ नाम का उल्लेख हुआ है। सम्भवतः यह कजरी गीत के रचनाकार का नाम है। गीत का गायन डॉ. वनमाला पर्वतकर और साथियों के स्वरों में किया गया है। इस कजरी गीत के बोल हैं- ‘संकट दूर करो महारानी संकटा आदि भवानी ना...’


पारम्परिक कजरी : देवी गीत : ‘संकट दूर करो महारानी संकटा आदि भवानी ना...’ : डॉ. वनमाला पर्वतकर और साथी




तृप्ति शाक्य
पारम्परिक कजरियों की धुनें और उनके टेक निर्धारित होते हैं। आमतौर पर कजरियाँ जैतसार, ढुनमुनियाँ, खेमटा, बनारसी और मीरजापुरी धुनों के नाम से पहचानी जाती हैं। कजरियों की पहचान उनके टेक के शब्दों से भी होती है। कजरी के टेक होते हैं- 'रामा', 'रे हरि', 'बलमू', 'साँवर गोरिया', 'ललना', 'ननदी' आदि। कजरी गीतों के विषय पारम्परिक भी होते हैं और अपने समकालीन लोकजीवन का दर्शन कराने वाले भी। ब्रिटिश शासनकाल में अनेक लोकगीतकारों ने ऐसी राष्ट्रवादी कजरियों की रचना की, जिनसे तत्कालीन ब्रिटिश सरकार भी भयभीत हुई थी। इस प्रकार के अनेक लोकगीतों को प्रतिबन्धित कर दिया गया था। इन लोकगीतों के रचनाकारों और गायकों को ब्रिटिश सरकार ने कठोर यातनाएँ भी दीं। परन्तु प्रतिबन्ध के बावजूद लोक-परम्पराएँ जन-जन तक पहुँचती रहीं। दो दिन पहले हमने 68वाँ स्वतंत्रता दिवस मनाया है। इस उपलक्ष्य में आज हम एक विशेष कजरी गीत को रेखांकित कर रहे हैं। इन विषयों पर रची गईं अनेक कजरियों में बलिदानियों को नमन और महात्मा गाँधी के सिद्धांतों को रेखांकित किया गया। ऐसी ही एक कजरी की पंक्तियाँ देखें- "चरखा कातो, मानो गाँधी जी की बतियाँ, विपतिया कटि जइहें ननदी...”। कुछ कजरियों में अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों पर प्रहार भी किया गया। ऐसी ही एक पारम्परिक कजरी की स्थायी की पंक्तियाँ हैं- “कैसे खेले जइबू सावन में कजरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी...”। इन पंक्तियों में काले बादलों का घिरना, गुलामी के प्रतीक रूप में चित्रित हुआ है। इसके एक अन्तरे की पंक्तियाँ हैं- “केतनो लाठी गोली खइलें, केतनो डामन (अण्डमान का अपभ्रंस) फाँसी चढ़िले, केतनों पीसत होइहें जेहल (जेल) में चकरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी...”। आजादी के बाद कजरी-गायकों ने इस अन्तरे को परिवर्तित कर दिया। अब हम आपको परिवर्तित अन्तरे के साथ वही कजरी सुनवाते हैं। इस गीत को गायिका तृप्ति शाक्य और उनके साथियों ने स्वर दिया है।


पारम्परिक कजरी : ‘कैसे खेले जइबू सावन में कजरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी...’ : तृप्ति शाक्य और साथी




उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ
वर्षा ऋतु के परिवेश और इस मौसम में उपजने वाली मानवीय संवेदनाओं की अभियक्ति में कजरी गीत पूर्ण समर्थ लोक-शैली है। शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत के कलासाधकों द्वारा इस लोक-शैली को अपना लिये जाने से कजरी गीत आज राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर सुशोभित हो चुकी है। कजरी गीतों के आकर्षण से शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम और लोक संगीत विधाओं के कलासाधक स्वयं को मुक्त नहीं कर सके। कजरी गीतों के सौन्दर्य से केवल गायक ही नहीं, वादक कलाकार भी प्रभावित रहे हैं। अनेक वादक कलाकार आज भी वर्षा ऋतु में अपनी रागदारी संगीत-प्रस्तुतियों का समापन कजरी धुन से करते हैं। सुषिर वाद्यों पर तो कजरी की धुन इतनी कर्णप्रिय होती है कि श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई पर तो कजरी ऐसी बजती थी, मानो कजरी की उत्पत्ति ही शहनाई के लिए हुई हो। लोक संगीत में कजरी के दो स्वरूप मिलते हैं, जिन्हें हम मीरजापुरी और बनारसी कजरी के रूप में पहचानते हैं। भारतीय संगीत जगत में उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ एक ऐसे अनूठे कलासाधक रहे हैं, जिनकी शहनाई पर समूचा विश्व झूम चुका है। अब हम आपको उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ द्वारा शहनाई पर प्रस्तुत बनारसी कजरी का रसास्वादन कराते हैं। यह मनमोहक कजरी दादरा और कहरवा ताल में बँधी है।


पारम्परिक कजरी : शहनाई वादन : दादरा और कहरवा ताल में निबद्ध कजरी धुन : उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और साथी






आज की पहेली



‘स्वरगोष्ठी’ के 181वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत की एक प्राचीन रेकार्डिंग का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 190वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – कण्ठ संगीत की इस रचना के अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमे राग का नाम बताइए।

2 – यह भारतीय संगीत के किस महान गायक की आवाज़ है? एक संकेत सूत्र है- ‘पण्डित भीमसेन जोशी इस गायक की आवाज़ से इतने अधिक प्रभावित हुए थे कि अच्छे गुरु की तलाश में घर छोड़ कर निकल पड़े थे’

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 183वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 179वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में प्रस्तुत कजरी गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका विदुषी गिरिजा देवी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- उपशास्त्रीय संगीत शैली में कजरी अथवा कजली। इस अंक की पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम ऋतु के अनुकूल रागों अर्थात वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले संगीत पर चर्चा कर रहे हैं। यह इस लघु श्रृंखला का समापन अंक था। अगले अंक से हम एक नई श्रृंखला की शुरुआत करेंगे। हमारे पिछले अंक पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पेंसिलवानिया, अमेरिका की सुश्री विजया राजकोटिया लिखती हैं-

Dear Krishnamohanji, 

You have made this topic so interesting by giving beautiful descriptions of subtle Rachana under the Light classical music - Thumri. I can feel the depth of our music in your lines for which I am thankful to you. 
The beautiful piece you included in this Paheli is by Ustad Bismillah Khanji whom I have heard personally in the concerts since my childhood. So coming to the answers: 1 (a) The instrument is called Shehnai which is a wind instrument. (b) It is a kind of Kajari meaning Kajari ka Lok-Swaroop. In other words it is a Lok Geet generally played during auspicious occasions like marriage etc. Shehnai is popular in such occasions. 2. This composition is set initially in Dadra taal and then is changed to Kehrava taal.

With regards, 

Vijaya Rajkotia 
Chalfont, Pennsylvania 
USA 

विजया जी का हार्दिक आभार प्रकट करते हुए आपको सूचित करना चाहूँगा कि ‘स्वरगोष्ठी’ की अगली श्रृंखला उपशास्त्रीय संगीत शैली ठुमरी पर केन्द्रित होगी। इस लघु श्रृंखला में हम एक नया प्रयोग भी कर रहे हैं। आप भी यदि भारतीय संगीत के किसी विषय में कोई जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पर भेज दें। अपने पाठको/श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित/प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ