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शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

संगीत में उफान और शब्दों में कुछ उबलते सवाल

ताज़ा सुर ताल -2014 - 13

दोस्तों देश भर में चुनावी माहौल गरम है. हर नेता अपने लोकलुभावन नारों से मतदाताओं के दिल जीतने की जुगत में लगा है. गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई, मुद्दे सभी वही पुराने हैं, बहुत कुछ बदला पर सोचो तो कुछ भी नहीं बदला, इतने विशाल और समृद्ध देश की संपत्ति पर आज भी बस चंद पूंजीपति फन जमाये बैठे हैं. समाज आज भी भेद भाव, छूत छात जैसी बीमारियों में कैद है. बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा से खिलवाड़ है तो न्याय और सच्चाई की आवाज़ भी कहीं राख तले दबी सुनाई देती है. कितने गर्व से हम गाते आये हैं सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा... मगर वो सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान आज है कहाँ ? यही वो खौलता सा सवाल है जो गीतकार इरशद कामिल ने फिल्म कांची  के गीत में उठाया है. आज ताज़ा सुर ताल में है इसी गीत की बारी. एकदम नए कलाकारों को लेकर आये हैं दिग्गज निर्माता निर्देशक सुभाष घई. घई साहब अपनी फिल्मों में संगीत पक्ष पर ख़ास पकड़ रखते हैं, लम्बे समय तक उनके चेहेते रहे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और आनंद बक्शी. बख्शी साहब के साथ तो उनका काफी लम्बा साथ रहा, और उन्होंने रहमान से भी उनके लिखे गीतों को स्वरबद्ध करवाया. कांची  में उन्होंने लम्बे समय से नदारद इस्माईल दरबार को मौका दिया है. साथ ही चार गीत सलीम सुलेमान ने भी दिए हैं और सबसे दिलचस्प बात तो ये है की एक गीत खुद घई साहब ने भी स्वरबद्ध किया है एल्बम के लिए. प्रस्तुत गीत को सलीम सुलेमान ने रचा है और आवाजें हैं सुखविंदर, मोहित चौहान और राज पंडित की. तो चलिए मिलकर ढूंढते हैं अपने 'सारे जहाँ से अच्छे' हिंदुस्तान को. 


बात देश की समस्याओं पर हो रही है तो जिक्र आता है एक ऐसी समस्या का जो केवल भारत में ही नहीं बल्कि विश्व भर के देशों के लिए चिंता का कारण है. पानी यानी जल के भरपूर स्रोत्र हमें कुदरत ने दिए हैं, पर इंसानों ने इन सोत्रों का जरुरत से अधिक दोहन कर इन अनमोल खजानों की थाली में छेद कर दिया है. अब समय चेतने का है. पानी के गहराते संकट की तरफ हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए फिल्मकार भी अपने अपने तरीकों से जुड़े हुए हैं. कुछ समय पहले आई जलपरी  आपने अवश्य देखी होगी. इसी कड़ी में जल्दी ही आपके सामने होगी गिरीश मलिक की फिल्म जल. फिल्म का संगीत रचा है सोनू निगम ने, सोनू ने बतौर संगीतकार अभी कुछ दिनों पहले ही सिंह साहब दा ग्रेट  से अपने सफ़र की शुरुआत की थी, पर जल  के लिए उन्होंने साथ थामा है मशहूर तबला वादक बिक्रम घोष का. फिल्म की एल्बम में अधिकतर वाध्य रचनाएं हैं जो बेहद अनूठी है. पर आज हम आपके लिए लाये हैं शुभा मुदगल का गाया शीर्षक गीत, जिसे लिखा भी है सोनू निगम ने संजीव तिवारी के साथ मिलकर. शास्त्रीय सरंचना में बुने ऐसे गीत इन दिनों फिल्मों में बेहद कम ही सुनने को मिलते हैं. पर जाहिर है रेडियो प्लेबैक पर आप ऐसे अनमोल नगीनों को अवश्य ही सुन पायेगें. लीजिये सुनिए ये सुन्दर सुरीला नगमा.. 
     

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

सुजॉय जी को शादी का तोहफ़ा देने आ गए हैं सलीम-सुलेमान और अमिताभ भट्टाचार्य "बैंड बाजा बारात" के साथ

अभी वक़्त है अपने नियमित ताज़ा सुर ताल का.. ताज़ा सुर ताल यानि कि टी एस टी, जिसके मेजबान मुख्य रूप से सुजॉय जी हुआ करते हैं। मुख्य रूप से इसलिए कहा क्योंकि हर मंगलवार के दिन समीक्षा के दौरान उनसे बातचीत होती है, अब ये बातचीत मैं करूँ या फिर सजीव जी करें... पिछली मर्तबा ये बागडोर सजीव जी ने संभाली थी और उसके पहले कई हफ़्तों तक बातचीत का वो सिरा मेरे हाथ में था.. लेकिन दूसरा सिरा हमेशा हीं सुजॉय जी थामे रहते हैं। आज के दिन और आज के बाद दो-तीन और हफ़्तों तक स्थिति अलग-सी रहने वाली है। ऐसा इसलिए है क्योंकि सुजॉय जी घर गए हुए हैं.. अपनी ज़िंदगी के उस सिरे को संभालने जिसका दूसरा सिरा उनकी अर्धांगिनी के हाथों में है। जी हाँ, कल हीं सुजॉय जी की शादी थी। शादी बड़ी धूमधाम से हुई और होती भी क्यों नहीं, जब हम सब दोस्तों और शुभचिंतकों की दुआएँ उनके साथ थीं। हम सब तक की तरफ़ से सुजॉय जी को शादी की शुभकामनाएँ, बधाईयाँ एवं बहुत-बहुत प्यार .. (बड़ों की तरफ़ से आशीर्वाद भी).. हम नहीं चाहते थे कि इन मंगल घड़ियों में उन्हें थोड़ा भी तंग किया जाए, इसलिए कुछ हफ़्तों तक ताज़ा सुर ताल मैं अकेले हीं (या फिर कभी-कभार सजीव जी के साथ) हीं संभालने वाला हूँ। आपसे उसी प्रोत्साहन की उम्मीद रहेगी, जो सुजॉय जी को हासिल होती है। धन्यवाद! चलिए तो इन्हीं बातों के साथ आज की समीक्षा का शुभारंभ करते हैं।

इसे इत्तेफ़ाक़ हीं कहेंगे कि शादी की बातें करते-करते हम जिस फिल्म की समीक्षा करने जा रहे हैं, वह फिल्म भी शादियों को हीं ध्यान में रख कर बनी है। यशराज बैनर्स के तहत आने वाली इस फिल्म का निर्देशन किया है मनीष शर्मा ने, कहानी भी उन्हीं की है, जबकि पटकथा लिखी है हबीब फैजल ने। फिल्म के मुख्य कलाकार हैं अनुष्का शर्मा और रणवीर सिंह। फिल्म १० दिसम्बर २०१० को रीलिज होने वाली है। इस फिल्म में संगीत है पार्श्व-संगीत के दम पर हिन्दी-फिल्मों में अपनी पहचान बनाने वाले "सलीम-सुलेमान" बंधुओं का और गीत लिखे हैं "अमित त्रिवेदी" के खासम-खास "अमिताभ भट्टाचार्य" ने (देव-डी, उड़ान)।

फिल्म का पहला गाना है "ऐं वैं.. ऐं वैं".. आवाज़ें हैं सलीम मर्चैंट और सुनिधि चौहान की। गाने की धुन ऐसी है कि पहली बार में हीं आपके मन पर छा जाए और संयोजन भी कमाल का है। गीत सुनकर डान्स-फ्लोर पर उतरने को जी करने लगता है। चूंकि गाने के माध्य्म से पंजाबी माहौल तैयार किया गया है, इसलिए पार्श्व में बैंजो और बांसुरी को आराम से महसूस किया जा सकता है। अमिताभ के बोल बाकी नियमित पंजाबी गानों (भांगड़ा) से काफी अलग हैं। "चाय में डुबोया बिस्किट हो गया" या फिर "गुड़ देखा, मक्खी वहीं फिट हो गया".. जैसी पंक्तियाँ विरले हीं सुनने को मिलती है। मुझे यह गाना बेहद भाया। इस गाने का एक "दिल्ली क्लब मिक्स" भी है, जिसमें मास्टर सलीम ने सलीम मर्चैंट का स्थान लिया है। मास्टर सलीम के आने से "माँ दा लाडला" वाली फिलिंग आ जाती है। थोड़ी कोशिश करने पर आप आवाज़ में इस परिवर्तन को महसूस कर सकते हैं। दोनों हीं गाने अच्छे हैं।

गीत - ऐं वैं


गीत - ऐं वैं (दिल्ली क्लब मिक्स)


अब बढते हैं अगले गाने की ओर। यह गाना है "तरकीबें", जिसे गाया है बेन्नी दयाल ने और उनका बेहतरीन तरीके साथ दिया है सलीम मर्चैंट ने। सलीम-सुलेमान और बेन्नी दयाल की जोड़ी "पॉकेट में रॉकेट" के बाद एक बार फिर साथ आई है। कहीं कहीं यह गाना उसी गाने का एक्सटेंशन लगता है। बेन्नी दयाल एक बार फिर सफल हुए हैं, अपनी आवाज़ का जादू चलाने में। लेकिन मेरे हिसाब से इस गाने की सबसे खूबसूरत बात है, इसके बोल। "अनकन्वेशनल राईटिंग" की अगर बात आएगी, तो इस गाने को उसमें जरूर शुमार किया जाएगा। "कंघी हैं तरकीबें" या फिर "हौसलें सेंक ले" जैसे विचार आपको सोचने पर और सोचकर खुश होने पर मजबूर करते हैं।

गीत - तरकीबें


अगला गाना है "श्रेया घोषाल" की आवाज़ में "आधा इश्क़"। आजकल यह कहावत चल पड़ी है कि श्रेया कभी गलत नहीं हो सकती और श्रेया का गाया गाना कभी बुरा नहीं हो सकता। तो फिर "आधा इश्क़" को खूबसूरत होना हीं है। कुछ लोग इसलिए परेशान हैं कि "आधा इश्क़" भी कुछ होता है क्या?.. उन लोगों को शायद यह पता नहीं कि एकतरफ़ा इश्क़ तो आधा हीं हुआ ना.. यह मेरा ख्याल है, लेकिन ख्याल कोई भी हो.. जब ज़िंदगी "दस ग्राम" की हो सकती है तो इश्क़ "आधा" क्यों नहीं हो सकता। क्या कहते हैं आप लोग?

गीत - आधा इश्क़


चलिए तो बात को आगे बढागे हुए एलबम के चौथे गाने की ओर आते हैं। यह गाना है बेन्नी दयाल और हिमानी कपूर की आवाज़ो में "दम-दम"। इस गाने को सुनने के बाद मुझे यही लगा कि सलीम-सुलेमान ने "दम" भरे गाने के लिए बेन्नी को चुनकर गलती कर दी। गाने में जब तक अंतरा नहीं आता, तब तक दम जैसी कोई बात हीं नज़र नहीं आती। अब जबकि इस गाने को एक आईटम सॉंग जैसा होना है तो आवाज़ से भी वो जोश झलकना चाहिए ना। अंतरे के पहले (यानि कि मुखरे में) धुन भी थोड़ी सुस्त है। अंतरे में यह गाना जोर पकड़ता है, लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है। "दम-दम" में दम नहीं है मेरे भाई!! "दम-दम" का एक सूफ़ी-मिक्स है जिसे सुखविंदर ने गाया है.. सभी जानते हैं कि "जोश" का दूसरा नाम है "सुखविंदर" और ऊपर से मिक्स यानि कि "पेसी ट्युन" तो सूफ़ी-मिक्स हर मामले में बढिया है "दम-दम" से। मेरी यही चाहत है कि फिल्म में "सूफ़ी-मिक्स" हो, तभी मज़ा आएगा।

गीत - दम दम


गीत - दम दम (सूफ़ी मिक्स)


अगले गाने "मितरा" में गायकी की कमान संभाली है खुद अमिताभ भट्टाचार्य ने और उनका साथ दिया है सलीम मर्चैंट ने। यह गाना हर मामले में बेहतरीन है। इस गाने में "अमित त्रिवेदी" की झलक मिलती है, शायद इसीलिए अमिताभ भी माईक के पीछे आने को राजी हुए हैं। सलीम की आवाज़ हर तरह के गाने में काम करती है, इसलिए वे यहाँ भी अपना असर छोड़ जाते हैं। मितरा के बाद बारी है एक नियमित भांगड़े की, जो हर पंजाबी शादी के लिए एक रस्म-सा माना जाता है। लेकिन यह भांगड़ा दूसरे पंजाबी भांगड़ों से थोड़ा अलग है। इस भांगड़े का नाम यूँ तो "बारी बरसी" हीं है, लेकिन इसमें "खट के" कोई हीर या रांझा नहीं लाते, बल्कि "पिज़्ज़ा" , "गोंद" और "खजूर" लाते हैं। इस गाने को सुनकर आप अपने पेट और मुँह पर हाथ रखकर "हँसी" रोकने की कोशिश करेंगे तो वहीं अपनी कदमों को काबू में रखकर यह कोशिश करेंगे कि कहीं "नाच न निकल जाए"। चूँकि यह गाना मस्ती के लिए बना है और एक नियमित पैटर्न पर बना है, इसलिए इसे अच्छा या खराब निर्धारित करने का कोई तुक नहीं बनता। चलिए तो अब सुनते हैं "मितरा" और "बारी बरसी"।

गीत - मितरा


गीत - बारी बरसी


कुल मिलाकर मुझे "सलीम-सुलेमान" की यह पेशकश अच्छी लगी। आप इस समीक्षा से कितना इत्तेफ़ाक़ रखते हैं, यह ज़रूर बताईयेगा। अगली बार मिलने के वादे के साथ आपका यह दोस्त आपसे विदा लेता है। चलते-चलते इस फिल्म का "थीम सॉंग" सुन लेते हैं, जिसे गाया है सलीम मर्चैंट और श्रद्धा पंडित ने। छोटा-सा गाना है, लेकिन चूँकि यह थीम है तो मेरे हिसाब से फिल्म में एक से ज्यादा बार बजेगा जरूर।



आवाज़ की राय में

चुस्त-दुरुस्त गीत: तरकीबें और मितरा

लुंज-पुंज गीत: दम-दम

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

सलीम-सुलेमान की आशाएँ ढल गई हैं धीमी गति के प्रेरक गीतों में.. साथ हैं प्रीतम और शिराज़ भी

ताज़ा सुर ताल ३०/२०१०

सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' के सभी श्रोताओं व पाठकों को हमारा प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, इसे इत्तेफ़ाक़ ही कहिए या कुछ और, हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री में कुछ नायक ऐसे हुए हैं जिनकी फ़िल्मों के गानें हमेशा ही सुपरहिट हुआ करते हैं। जैसे कि राजेश खन्ना की शायद ही कोई फ़िल्म ऐसी होगी जिसके गानें चले ना हों। नए दौर में सलमान ख़ान ऐसे नायक बनें जिनकी फ़िल्मों के गानें बेहद लोकप्रिय होते आए हैं और आज भी होते हैं। ऐसे ही एक और अभिनेता हैं जॊन एब्राहम जिनकी फ़िल्मों का संगीत भी चलता आया है, फिर चाहे फ़िल्म चले या ना चले।

विश्व दीपक - 'जिस्म', 'साया', 'धूम', 'सलाम-ए-इश्क़', 'काल', 'गरम मसाला', 'दोस्ताना', 'गोल', 'न्यू यार्क', 'पाप', 'टैक्सी नंबर ९ २ ११', ये सारी जॉन की फ़िल्में संगीत के लिहाज़ से सफल ही मानी जाएंगी। आज हम जॉन की नई फ़िल्म 'आशाएँ' के गानें लेकर उपस्थित हुए हैं, और इन गीतों को सुनने के बाद हमें और आपको मिलकर यह निर्णय लेना है कि क्या जॉन की पिछली सारी फ़िल्मों के संगीत की तरह इस फ़िल्म के संगीत पर भी 'हिट सुपरहिट' की मोहर लगाई जा सकती है या नहीं।

सुजॊय - सब से पहले तो फ़िल्म के शीर्षक की बात करेंगे। परसेप्ट पिक्चर कंपनी के बैनर तले बनी इस फ़िल्म को लिखा व निर्देशित किया है नागेश कुकुनूर ने। अब आप समझ गए होंगे कि हमने फ़िल्म के शीर्षक का ज़िक्र क्यों किया। जी हाँ, नागेश की मशहूर फ़िल्म 'इक़बाल' के मशहूर गीत "आशाएँ खिले दिल की" से इस फ़िल्म का शीर्षक प्रेरित है।

विश्व दीपक - जॉन एब्राहम के अलावा इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं नवोदित अभिनेत्री सोनल सहगल (जो हिमेश भाई के साथ उनकी फ़िल्म रेडियो में भी दिखी थीं), गिरिश कारनाड, फ़रीदा जलाल, आश्विन चितले, अनिता नायर प्रमुख। श्रेयस तलपडे का भी एक गेस्ट अपीयरेन्स है फ़िल्म में। पॉण्डिचेरी और हैदराबाद के लोकेशन्स पर फ़िल्माये गये इस फ़िल्म के लिए जॉन को १६ किलो का वज़न कम करना पड़ा है ऐसा सुनने में आया है। ये तो थे फ़िल्म से जुड़े कुछ तथ्य, आइए अब गीतों का सिलसिला शुरु किया जाए। फ़िल्म में कुल ८ गीत हैं और ५ रीमिक्स ट्रैक्स।

सुजॊय - 'स्ट्राइकर' और 'राजनीति' की तरह 'आशाएँ' में भी एकाधिक संगीतकार हैं, मुख्य संगीतकार हैं सलीम-सुलेमान, जिन्होंने फ़िल्म का पार्श्व संगीत भी तय्यार किया है। और जो दूसरे संगीतकार हैं, वो हैं प्रीतम (२ गीत) और शिराज़ उप्पल (१ गीत)। गीतकार हैं मीर अली हुसैन, समीर, कुमार और शक़ील सोहैल। तो आइए सुनते हैं पहला गीत नीरज श्रीधर की आवाज़ में। नीरज का नाम देख कर आप समझ ही गए होंगे कि इसके संगीतकार हैं प्रीतम। इस गीत को समीर ने लिखा है।

गीत - मेरा जीना है क्या


विश्व दीपक - नीरज श्रीधर और प्रीतम की जोड़ी जिस तरह के गानें हमें देती आई है आज तक (हरे राम हरे राम, प्रेम की नैय्या, तुम मिले, वगेरह), उससे कुछ अलग हट के है यह गीत। गीत शुरु होता है नर्मोनाज़ुक अंदाज़ में, लेकिन बाद में रॉक शैली आ जाती है। नीरज की आवाज़ अच्छी बैठी है इस गीत में लेकिन यह गीत तो के.के वाला गीत है बिल्कुल। आजकल इस गीत को ख़ूब टीवी पर दिखाया जा रहा है फ़िल्म के प्रोमो में। और नीरज और उस प्रोमो में प्रीतम भी नज़र आ रहे हैं रॉक सिंगर्स की तरह।

सुजॊय - मुझे यह गीत अच्छा ही लगा, लेकिन मेरा भी ख़याल है कि के.के की आवाज़ में गीत और ज़्यादा खुल कर सामने आता। ख़ैर, नीरज ने भी अच्छा निभाया है। आगे बढ़ते हैं दूसरे गीत की तरफ़, और अब की बार गीतकार कुमार के बोल, प्रीतम का ही संगीत, और इसे गाया है शान और तुलसी कुमार ने। एक सुरीले मेलोडियस युगल गीत की उम्मीद हम ज़रूर रख सकते हैं, क्यों? आइए ख़ुद सुनते हैं और फिर निर्णय लेते हैं।

गीत - दिलकश दिलदार दुनिया


सुजॊय - अनुप्रास अलंकार!!! लेकिन जिस तरह के मेलोडियस नर्मोनाज़ुक रोमांटिक युगल गीत की कल्पना मैंने की थी, वैसा नहीं पाया। मैंने तो सोचा था कि "तेरी ओर" और "ख़ुदा जाने" जैसा कुछ सुनने को मिलेगा। लेकिन इस गीत का अंदाज़ कुछ अलग सा है। शान की आवाज़ भी कुछ बदली हुई-सी लगी। तुल्सी कुमार की आवाज़ में तो मुझे कभी कोई ख़ास बात नज़र नहीं आई। ग़लत अर्थ ना निकालें तो मैं यही कहूँगा कि तुलसी कुमार जैसी आवाज़ और गायकी तो हर रियल्टी शो में सुनने को मिल जाती है। इस आवाज़ में ख़ास बात क्या है कोई मुझे समझाए ज़रा!

विश्व दीपक - इस गीत के बारे में इतना ही कहूँगा कि कम्पोजिशन अच्छा है, बीट बेस्ड सॉंग है, ठीक ठाक गीत है। लेकिन प्रीतम से हम कुछ और बेहतर उम्मीद रखते हैं, ख़ास कर रोमांटिक नर्मोनाज़ुक गीतों में। चलिए अब बढ़ते हैं तीसरे गीत की ओर। प्रीतम के बाद अब है शिराज़ उप्पल की बारी। उन्होंने ना केवल इस गीत को स्वरबद्ध किया है, बल्कि शक़ील सोहैल के लिखे इस गीत को ख़ुद गाया भी है। सुनते हैं "रब्बा"।

गीत - रब्बा


विश्व दीपक - गायक-संगीतकार शिराज़ उप्पल पाक़िस्तान से ताल्लुक़ रखते हैं। गाना तो अच्छा ही बना है, धुन भी अच्छी है, गाया भी ठीक-ठाक है, लेकिन पता नहीं क्यों इस गीत ने कोई आस असर नहीं छोड़ा। बस यही कह सकता हूँ कि "रब्बा ये क्या हुआ"।

सुजॊय - यह शायद इसलिए भी हो सकता है कि शिराज़ की आवाज़ में ऊँचे नोट्स वाले गीत ज़्यादा अच्छे लगते हैं। नीचे सुर के गीतों में उनकी आवाज़ खुल के बाहर नहीं आती। इस गीत के बारे में यही कहूँगा कि शक़ील सोहैल ने अच्छा कलम चलाया है।

विश्व दीपक - अच्छा, हमने तीन गीत सुनें, अब से अगले पाँच गीतों में संगीत सलीम सुलेमान का है और गीतकार हैं मीर अली हुसैन। सुनते हैं इस गीतकार-संगीतकार जोड़ी की पहली रचना ज़ुबीन की आवाज़ में।

गीत - अब मुझको जीना


सुजॊय - यह आशावादी और प्रेरणादायक गीत था। ज़ुबीन आसाम से ताल्लुक़ रखते हैं और वहाँ पर ख़ूब लोकप्रिय हैं। हिंदी में प्रीतम ने उनसे फ़िल्म 'गैंगस्टर' में "या अली रहम अली" गवाया था जो बहुत लोकप्रिय हुआ था। इस गीत को भी उन्होंने पूरे जोश के साथ गाया है। ज़ोरदार ऑरकेस्ट्रेशन और क़दमों को थिरकाने वाला गीत है। पिछले तीन गीत भी अच्छे थे लेकिन कुछ ना कुछ कमी लग रही थी उनमें। इस गीत को सुन कर एक ताज़गी जैसी आ गई, बहुत ही खुल कर यह गीत आया है और सही में गीत अच्छा है।

विश्व दीपक - इस गीत की शुरुआत में कुछ कुछ 'Summer of 69' जैसा लगा, फिर गीत ने तेज़ गति पकड़ ली और अपनी अलग राह पकड़ कर अपने मुक़ाम तक पहुँच गई। ज़ुबीन गर्ग की आवाज़ में एक अलग कशिश है और भीड़ से अलग सुनाई देती है। उनसे और भी ज़्यादा गानें संगीतकार गवा सकते हैं। 'आशाएँ' फ़िल्म का पाँचवा गीत है शफ़ाक़त अमानत अली की आवाज़ में, "शुक्रिया ज़िंदगी"। आइए गीत सुनते हैं, फिर बात करते हैं।

गीत - शुक्रिया ज़िंदगी


सुजॊय - ज़िंदगी का शुक्रिया अदा करता हुआ यह गीत सुन कर हम सलीम सुलेमान, मीर अली हुसैन और शफ़ाक़त अमानत अली का शुक्रिया अदा ही कर सकते हैं। "छन के आई तो क्या चांदनी तो मिली" जैसे अन्योक्ति अलंकार में सजकर यह गीत ज़िंदगी के प्रति आशावादी होने की प्रेरणा देती है। मुझे तो यह गीत सुनते हुए फ़िल्म 'सदमा' का वो मशहूर याद गया कि "ऐ ज़िंदगी गले लगा ले, हमने भी तेरे हर एक ग़म को गले से लगाया है, है न"।

विश्व दीपक - बेहद ख़ूबसूरत बोल लिखे हैं मीर अली हुसैन ने। मुझे तो लग रहा है कि अच्छे गीतकारों और अच्छे बोल वाले गीतों का ज़माना वापस आ गया है। पिछले कुछ समय से निम्न स्तर के बोल वाले गानें बहुत ही कम हो गए हैं। क्या फ़िल्म संगीत एक बार फिर से करवट ले रहा है?

सुजॊय - काश ऐसा हो जाए, और फ़िल्म संगीत का एक और सुनहरा दौर आ जाए तो मज़ा आ जाए! शफ़ाक़त अमानत अली के बाद अब बारी है श्रेया घोषाल की सुरीली आवाज़ की। "पल में मिला जहाँ" श्रेया की मधुर आवाज़ में ढलकर बेहद सुरीला सुनाई देता है, आइए सुनते हैं।

गीत - पल में मिला जहां (श्रेया)


विश्व दीपक - श्रेया की नर्म आवाज़ में बिना किसी साज़ के जैसे ही "पल में मिला जहां" शुरु होता है, गीतकार किस ख़ूबसूरती से हर पंक्ति की शुरुआत "पल में" से करके "पल में" पर ही ख़त्म करते हैं, गीत को सुन कर महसूस किया जा सकता है।

पल में मिला जहां, है धुआँ पल में,
पल में यक़ीन था, अब गुमां पल में,
पल में उम्मीद थी, अरमां पल में,
पल में बहार थी, अब ख़िज़ाँ पल में।

सुजॊय - गीत में कम से कम साज़ों का इस्तेमाल हुआ है, जिस वजह से श्रेया को काफ़ी मेहनत करनी पड़ी होगी क्योंकि पूरा दायित्व उनकी गायकी पर आ गया है। गीत तो निस्संदेह उत्कृष्ठ है, लेकिन देखना यह है कि आज के जेनरेशन के कितने लोगों को इस गीत को पूरा सुनने का धैर्य रहेगा। इसी गीत का एक पुरुष संस्करण भी है शंकर महादेवन की आवाज़ में, आइए लगे हाथ इसे भी सुन लिया जाए।

गीत - पल में मिला जहां (शंकर)


विश्व दीपक - इन दोनों संस्करणों को सुन कर कह पाना मुश्किल है कि कौन सा बेहतर है। शंकर ने ज़्यादा ज़ोर डाल कर गाया है। शंकर एक ऐसे गायक और संगीतकार हैं जिन्हे हर संगीतकार पसंद करते हैं, उनकी गायकी के साथ साथ उनके मीठे स्वभाव के कारण भी। तभी तो दूसरे संगीतकार उनसे समय समय पर गवाते रहते हैं। हाल ही में फ़िल्म 'राजनीति' में "धन धन धरती रे" उन्होंने गाया था।

सुजॊय - और आठवें और अंतिम गीत की बारी जिसे गाया है मोहित चौहान ने। एक और धीमी गति वाला गीत जिसमें है रोमांस, लेकिन गभीरता के साथ। "चला आया प्यार" में परक्युशन का सुंदर इस्तेमाल हुआ है।

विश्व दीपक - तबले का भी सुंदर इस्तेमाल सुनाई देता है। आम तौर पर फ़्युज़न गीतों में गीत देसी होता है, सुर देसी होते हैं और बीट्स विदेशी होते हैं; लेकिन इस गीत में गायकी और गीत की धुन आधुनिक है, लेकिन जो रीदम है उसे तबले की थापों पर शास्त्रीय अंदाज़ में तय्यार किया गया है जिससे एक नवीनता आई है गाने में। सुना जाए...

गीत - चला आया प्यार


इन आठ गीतों को सुन कर हमारी तरफ़ से तो थम्प्स अप है। हाँ, गानें ज़रा धीमी लय के और गहरे शब्दों वाले हैं। आख़िर नागेश कुकुनूर की फ़िल्म है, उसमें कुछ गहरी बातें तो होंगी। अभी हाल ही में इस फ़िल्म की टीम (जॉन, सोनल सहगल और नागेश कुकुनूर) इण्डियन आइडल में गेस्ट बन कर आए थे अपनी इस फ़िल्म को प्रोमोट करने के लिए। उसमें इन लोगों ने कहा कि यह फ़िल्म लीक से हट कर है और कम बजट की फ़िल्म है। लेकिन यह लोगों के दिलों को ज़रूर छूएगी। फ़िल्म के गीतों ने तो हमारे दिल को छुआ है, देखना है कि फ़िल्म किस तरह का कमाल दिखाती है। हमारी तरफ़ से इस फिल्म को लाखों दुआएँ!

ढर्रे के अनुसार हमें यह भी तो बताना होगा कि अगली बार हम किस फिल्म की समीक्षा लेकर हाज़िर होने वाले हैं। तो दोस्तों, अभी हमारे सामने दो फिल्में हैं - "वी और फ़ैमिली" और "दबंग"। अब कौन सी फिल्म किस्मत वाली साबित होगी, यह तो वक़्त हीं बताएगा। हाँ, अगर आप इन दोनों में से किसी एक को खासा-पसंद करते हैं तो टिप्पणी में इसका ज़िक्र जरूर कर दें। हम आपकी राय का पूरा ख्याल रखेंगे। वैसे अंतिम निर्णय तो हमारा है काहे कि हम तो ठहरे दबंग :)

आवाज़ रेटिंग्स: आशाएँ: ***१/२

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ८८- ये गुलशन कुमार की सुपुत्री हैं और इस कारण भी संगीत की दुनिया में इनका नाम है। पिछले दिनों आई फिल्म "वन्स अपॉन ए टाईम इन मुंबई" में भी इन्होंने एक गाना गाया था। २००९ में रीलिज हुई इनके डेब्यु एलबम का नाम बताईये।

TST ट्रिविया # ८९- नागेश कुकुनूर की उस फ़िल्म का नाम बताएँ जिसमें दोस्ती को समर्पित एक गाना था। वह गाना किसने गाया था?

TST ट्रिविया # ९०- "फ़ना" के गीत "चाँद सिफ़ारिश" की प्रोग्रामिंग किस संगीतकार (संगीतकार बंधुओं) ने की थी? इसी (इन्हीं) की सलाह पर इस गाने में "शुभान-अल्लाह" डाला गया था।


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. "चरके बोदन चिरबी चकर" का इस्तेमाल हुआ है जो किशोर कुमार ने फ़िल्म 'पड़ोसन' के मशहूर गीत "एक चतुर नार" में किया था।
२. शैल हाडा।
३. "एक तीखी तीखी सी उफ़ करारी से लड़की" (लागा चुनरी में दाग)।

सोमवार, 14 दिसंबर 2009

पंखों को हवा जरा सी लगने दो....जयदीप सहानी जगाते हैं एक उम्मीद अपनी हर फिल्म, हर रचना से

ताजा सुर ताल TST (39)

दोस्तो, ताजा सुर ताल यानी TST पर आपके लिए है एक ख़ास मौका और एक नयी चुनौती भी. TST के हर एपिसोड में आपके लिए होंगें तीन नए गीत. और हर गीत के बाद हम आपको देंगें एक ट्रिविया यानी हर एपिसोड में होंगें ३ ट्रिविया, हर ट्रिविया के सही जवाब देने वाले हर पहले श्रोता की मिलेंगें २ अंक. ये प्रतियोगिता दिसम्बर माह के दूसरे सप्ताह तक चलेगी, यानी 5 अक्टूबर से १४ दिसम्बर तक, यानी TST के ४० वें एपिसोड तक. जिसके समापन पर जिस श्रोता के होंगें सबसे अधिक अंक, वो चुनेगा आवाज़ की वार्षिक गीतमाला के 60 गीतों में से पहली 10 पायदानों पर बजने वाले गीत. इसके अलावा आवाज़ पर उस विजेता का एक ख़ास इंटरव्यू भी होगा जिसमें उनके संगीत और उनकी पसंद आदि पर विस्तार से चर्चा होगी. तो दोस्तों कमर कस लीजिये खेलने के लिए ये नया खेल- "कौन बनेगा TST ट्रिविया का सिकंदर"

TST ट्रिविया प्रतियोगिता में अब तक-

पिछले एपिसोड में,वैसे तो आज की कड़ी में भी ३ सवाल हैं आपके जेहन की कसरत के लिए. पर फैसला तो आ ही चुका है. सीमा जी अपने सबसे नजदीकी प्रतिद्वंदी से भी कोसों आगे हैं, बहुत बहुत बधाई आपको...आपके सर है TST ट्रिविया के सिकंदर का ताज. सीमा जी अपनी पसंद के १० गीत लेकर आपके लिए हाज़िर होंगी, इस वर्ष यानी २००९ की सबसे अंतिम पेशकश के रूप में....श्रोताओं तैयार रहिये....

सजीव - आज 'ताज़ा सुर ताल' में हम पाँच के बदले सिर्फ़ तीन गीत सुनेंगे।

सुजॉय - वह क्यों भला? ऐसी ज्यादती क्यों?

सजीव - दरअसल बात ऐसी है कि आज हम जिस फ़िल्म की बातें करने जा रहे हैं उस फ़िल्म में हैं ही केवल तीन गीत।

सुजॉय - मैं समझ गया, आप Rocket Singh - Salesman of the Year फ़िल्म की बात कर रहे हैं ना?

सजीव - बिल्कुल ठीक समझे। आज हम इसी फ़िल्म के तीनों गानें सुनेंगे।

सुजॉय - लेकिन सजीव, इस फ़िल्म में भले ही तीन गानें हों, लेकिन इस फ़िल्म के साउड ट्रैक में यश राज बैनर की पुरानी फ़िल्मों के कुछ गीतों को भी शामिल किया गया है। तो क्यों ना हम उनमें से दो गानें सुन लें।

सजीव - आइडिया तो अच्छा है, इससे पाँच के पाँच गानें भी हो जाएँगे और दो हिट गानें भी अपने श्रोताओं को एक बार फिर से सुनने का मौका मिल जाएगा! उन दो गीतों की बात हम बाद में करेंगे, चलो जल्दी से सुनते हैं इस फ़िल्म का पहला गीत, उसके बाद बातचीत आगे बढ़ाएँगे।

गीत - पॉकेट में रॉकेट...pocket men rocket


सुजॉय - फ़िल्म का शीर्षक गीत हमने सुना, बेनी दयाल और साथियों की आवाज़ें थीं। इन दिनों इसी गीत के ज़रिए इस फ़िल्म के प्रोमोज़ चलाए जा रहे हैं हर टीवी चैनल पर। सजीव, क्या ख़याल है इस गीत के बारे में आपका?

सजीव - देखो इस फ़िल्म के तीनों गीतों की अच्छी बात यह है कि बहुत ही अलग हट के है और ताज़े सुनाई देते हैं। इन दिनों सलीम सुलेमान अपना एक स्टाइल डेवलोप करने की कोशिश कर रहे हैं। क़ुर्बान के गानें भी पसंद किए गए और इस फ़िल्म के गानें भी अच्छे हैं।

सुजॉय - इस फ़िल्म में गानें लिखे हैं जयदीप साहनी ने और जयदीप ने इस फ़िल्म की कहानी भी लिखी है। पिछले साल अक्षय कुमार 'सिंह इज़ किंग्' में तथा सलमान ख़ान 'हीरोज़' फ़िल्म में सरदार की भूमिका निभाने के बाद बॊलीवुड में सरदार हीरो की एक ट्रेंड चल पड़ी है, और इस बार रणबीर कपूर बने हैं सरदार रॊकेट सिंह। और उनकी नायिका बनी हैं शज़ान पदमसी।

सजीव - इस फ़िल्म का दूसरा गीत अब सुना जाए विशाल दादलानी की आवाज़ में, जिसके बोल हैं "गड़बड़ी हड़बड़ी"। विशाल दादलानी जहाँ एक तरफ़ विशाल-शेखर की जोड़ी में हिट म्युज़िक देते है, वहीं वो दूसरे संगीतकारों के लिए बहुत से गानें भी गाते हैं। यह एक बहुत ही हेल्दी ऐप्रोच है आज के कलाकारों में, वर्ना एक समय ऐसा भी था कि अगर कोई संगीतकार बन जाए तो फिर दूसरे संगीतकार उससे अपने गानें नहीं गवाया करते थे।

सुजॉय - सही कहा आप ने कुछ हद तक। चलिए अब गीत सुनते हैं।

गीत - गड़बड़ी हड़बड़ी...hadbadi gadbadi


सजीव - तीसरा गीत इन दोनों गीतों से बिल्कुल अलग है, बड़ा ही नर्मोनाज़ुक है और जयदीप साहनी ने अच्छे गीतकारी का मिसाल पेश किया है। यह गीत है "पंखों को हवा ज़रा सी लगने दो"।

सुजॉय - हाँ, सलीम मर्चैंट की आवाज़ है इस गीत में और सलीम भी आजकल कई गानों में अपनी आवाज़ मिला रहे हैं। 'कुर्बान' के मशहूर गीत "अली मौला" में भी उन्ही की आवाज़ थी।

गीत - पंखों को हवा ज़रा सी...pankhon ko


सजीव - यश चोपड़ा और आदित्य चोपड़ा ने इस फ़िल्म को प्रोड्युस किया है और निर्देशक हैं शिमित अमीन। शिमित ने बहुत ज़्यादा फ़िल्में तो नहीं की हैं लेकिन उनका निर्देशन ज़रा हट के होता है। 'चक दे इडिया' उन्होंने हीं निर्देशित की थी और वह क्या फ़िल्म थी!’अब तक छप्पन’ उनकी पहली फिल्म थी और उसमें भी उनके काम को काफी सराहा गया था। 'भूत' और 'अब तक छप्पन' में उन्होने एडिटर की भूमिका निभाई।

सुजॉय - और सजीव, जैसा कि हमने शुरु में कहा था कि इस फ़िल्म के तीन ऒरिजिनल गीतों के बाद हम यश राज की पुरानी फ़िल्मों के दो ऐसे गानें सुनवाएँगे जिन्हे 'रॊकेट सिह' के साउंड ट्रैक में शामिल किया गया है, तो सब से पहले तो मैं उन सभी गीतों के नाम बताना चाहूँगा जिन्हे फ़िल्म में शामिल किया गया है। ये गानें हैं "चक दे चक दे इंडिया" (चक दे इंडिया), "छलिया छलिया" और "दिल हारा" (टशन), "डैन्स पे चांस मार ले" और "हौले हौले से" (रब ने बना दी जोड़ी), "ख़ुदा जाने के", "जोगी माही" और "लकी बॊय" (बचना ऐ हसीनों)।

सजीव - तो इनमें से कौन से दो गीत सुनवाना चाहोगे?

सुजॉय - एक तो निस्संदेह "ख़ुदा जाने के मैं फ़िदा हूँ" और दूसरा आप बताइए अपनी पसंद का।

सजीव - चलो "चक दे इंडिया" यादें भी ताज़ा कर लिया जाए। वैसे भी भारत हॊकी में ना सही पर क्रिकेट में इन दिनों चर्चा में है ICC Ranking में नंबर-१ आने के लिए। चलो ये दोनों गानें सुनते हैं एक के बाद एक बैक टू बैक, वैसे ये गीत सुनवाने का मौका भी एकदम सटीक है. दोस्तों ये TST की अंतिम कड़ी है २००९ के लिए. जाहिर है नए गीतों की महफ़िल हम नए साल में फिर से सजायेंगें. इस साल के गीतों पर हमारा पूरा का पूरा पैनल अपनी अपनी राय लेकर उपस्थित होगा २५ दिसंबर से ३० दिसम्बर तक, और ३१ तारीख़ को हम सुनेंगें हमारी विजेता सीमा जी की पसंद के १० सुपर हिट गीत, तो एक बार फिर TST की तरफ से नव वर्ष की शुभकामनाएं, आईये २००९ को विदा कहें एक अच्छी सोच के साथ. नए साल में हम अपने देश को हर स्तर पर और अधिक समृद्ध करने में अपना योगदान दे सके, तो एक बार फिर जयदीप सहानी के साथ हम सब भी मिल कर कहें -"चक दे इंडिया..."

गीत - ख़ुदा जाने के मैं फ़िदा हूँ (बचना ऐ हसीनों)


गीत - चक दे इंडिया (चक दे इंडिया)


और अब बारी साल के अंतिम ट्रिविया की

TST ट्रिविया 39- निर्देशक शिमित अमीन का जन्म अफ़्रीका महाद्वीप के किस देश में हुआ था?

TST ट्रिविया 40- आज ज़िक्र हो रही है यश राज के फ़िल्म की। तो बताइए यश चोपड़ा के किस फ़िल्म का निर्देशन अर्जुन सबलोक ने किया था?

TST ट्रिविया 41- इस फ़िल्म के किसी एक अभिनेता/अभिनेत्री को आप किस तरह से १९८५ की फ़िल्म 'भवानी जंकशन' के गीत "आए बाहों में" से जोड़ सकते हैं?

"रॉकेट सिंह" एल्बम को आवाज़ रेटिंग ***

चूँकि फिल्म एक अच्छी सोच के साथ बनायीं गयी है और कहानी को अधिक अहमियत दी गयी है, व्यवहारिक दृष्टि से गीतों की संख्या कम रखी गयी है. पर शीर्षक गीत देखने में और "पंखों को" सुनने में बहुत अच्छा है. इस के आलावा एल्बम में यश राज बैनर के कुछ सुपर डुपर हिट गीतों को एक साथ सुनने का मौका भी है....तो ऑल इन ऑल इस अल्बम पर पैसा लगाया जा सकता है, वैसे भी नववर्ष करीब है और भारतीय क्रिकेट टीम भी पूरे जोश में है तो झूमने और नाचने के पर्याप्त मौके हैं आपकेपास.

आवाज़ की टीम ने इस अल्बम को दी है अपनी रेटिंग. अब आप बताएं आपको ये गीत कैसे लगे? यदि आप समीक्षक होते तो प्रस्तुत अल्बम को 5 में से कितने अंक देते. कृपया ज़रूर बताएं आपकी वोटिंग हमारे सालाना संगीत चार्ट के निर्माण में बेहद मददगार साबित होगी.

शुभकामनाएँ....


अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं. "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है. आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रुरत है उन्हें ज़रा खंगालने की. हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं. क्या आप को भी आजकल कोई ऐसा गीत भा रहा है, जो आपको लगता है इस आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए तो हमें लिखे.

गुरुवार, 1 जनवरी 2009

सरताज गीत 2008 - आवाज़ की वार्षिक गीतमाला में

वर्ष 2008 के श्रेष्ट 50 फिल्मी गीत (हिंद युग्म के संगीत प्रेमियों द्वारा चुने हुए),पायदान संख्या 10 से 01 तक

पिछले अंक में हम आपको 20वें पायदान से 11वें पायदान तक के गीतों से रूबरू करा चुके हैं। उन गीतों का दुबारा आनंद लेने के लिए यहाँ जाएँ।

10वें पायदान - है गुजारिश - फ़िल्म गजिनी

अगर इस गीत को आप ध्यान से सुनें तो तो शुरू में और बीच बीच में एक गुनगुनाहट (हम्मिंग) सुनाई देती है, जो सोनू निगम की याद दिलाते हैं, जी हाँ ये हिस्सा सोनू ने ही गाया है, दरअसल इस धुन पर रहमान ने एक गीत बनाया था जिसे सोनू की आवाज़ में रिकॉर्ड किया गया था, पर अफ़सोस वो फ़िल्म नही बन पायी, जब फ़िल्म गजिनी के लिए इसी धुन पर जब प्रसून ने नए शब्द बिठाये, तब सोनू को फ़िर तलब किया गया, पर निगम उन दिनों विदेश में होने के कारण रिकॉर्डिंग के लिए उपलब्ध नही हो पाये तो रहमान ने जावेद अली से गीत को मुक्कमल करवाया पर हम्मिंग सोनू वाली (जो मूल गाने में थी) ही उन्होंने रहने दी. यकीं न हो गीत दुबारा सुनें.



9वें पायदान - इन लम्हों के दामन में - फ़िल्म -जोधा अकबर
एक बार रहमान का जादू है यहाँ, कितना खूबसूरत है ये गाना ये आप सुनकर ही जान पाएंगे. गीत में विविध भाव हैं, उतार चढाव हैं, जिसे मधु श्री और सोनू निगम ने अपनी आवाजों से बखूबी पेश किया है, शब्दों से कमाल किया है एक बार जावेद साहब ने. जावेद साहब ने एक तरफ़ इस पीरीअड फ़िल्म के लिए बोल लिखे वहीँ रॉक ऑन के लिए नए ज़माने के गीत लिखे. वाकई उनकी रैंज कमाल की है


8वें पायदान - डांस पे चांस- फ़िल्म- रब ने बना दी जोड़ी

अब अगर आपको नाचना नही आता तो फ़िक्र करने कि कोई जरुरत नही. बस ये मदमस्त गीत सुनिए और 5 मिनट में नाचना सीख जाईये, गीत की खासियत इसके अलहदा से सुनिए देते बोल ही हैं और सुनिधि की झूमा देने वाली आवाज़ भी, उस पर बीच बीच में देसी ठसका लिए आते हैं लाभ जंजुआ. सलीम सुलेमान ने इस फ़िल्म एक लम्बी छलांग लगायी है...आप भी सीखिए नाचने के गुर इस गीत को सुन.


7वें पायदान - तू मुस्कुरा - फ़िल्म - युवराज
शुक्र है सुनने को मिली हमारी अलका की भी आवाज़ टॉप १० में आकर, दरअसल नए कलाकारों की भीड़ में पुराने गायक गायिकाओं की आवाज़ कहीं सुनने को मिले अचानक तो बेहद सुखद लगता है, और इसी गीत के साथ पहली बार इस गीतमाला में शामिल हुए हैं हमारे गुलज़ार साहब भी. सुंदर बोल पर रहमान का मधुर संगीत और जावेद अली के साथ अलका याग्निक की मन को छूती ये आवाज़ यही है फ़िल्म युवराज के "तू मुस्कुरा" गीत की खूबियाँ.


6वें पायदान - मर जावां- फ़िल्म- फैशन

इरफान सिद्दीक का जिक्र हम पहले भी कर चुके हैं, उनके लिखे इस गीत में और सलीम सुलेमान के रचे इस संगीत में मिटटी की खुशबू है. स्क्रीन पर इसे एक फैशन शो का हिस्सा दिखाया गया है. जाहिर सी बात, दृश्य प्राथमिक थे और गीत को सिर्फ़ उसे सहयोग देना था पर श्रुति पाठक के गाये इस गीत ने संगीत प्रेमियों पर ऐसा जादू किया कि ये फ़िल्म का सबसे लोकप्रिय गीत बन कर उभर कर सामने आया. निश्चित ही इस गीत लंबे समय तक संगीत के चाहने वालों के दिल में अपनी जगह बनाये रखने की समर्थता है.....मर जावां ...


5वें पायदान - कहीं तो कहीं तो - फ़िल्म - जाने तू या जाने न

इस फ़िल्म की और इसके संगीत की हम पहले भी इस गीतमाला में खूब चर्चा कर चुके हैं, ये पांचवां गीत है इस फ़िल्म का जो हमारे टॉप 50 का हिस्सा है, और किसी फ़िल्म को ये सम्मान नही मिला जोधा अकबर के हालाँकि 4 गीत हैं. पर फ़िर भी जाने तू या जाने न के हर गीत युवा प्रेमियों के दिल की बात कहता प्रतीत होता है. पांचवीं पायदान पर इस फ़िल्म का सबसे मीठा और सबसे खूबसूरत गीत है. ज़रा सुनिए रशीद अली और वसुंधरा दास ने कितना डूब कर गाया है इसे. "कहीं तो कोई तो है नशा तेरी मेरी हर मुलाकात में...." जैसे बोल लिखकर अब्बास टायरवाला ने साबित किया है वो सिर्फ़ चालू किस्म के नही ज़ज्बाती गीत भी बखूबी लिख सकते हैं....सुनिए....और डूब जाईये ...


चौथे पायदान - आज वे हवाओं में - फ़िल्म - युवराज

आवाज़ का दरिया हूँ, बहता हूँ मैं नीली रातों में, मैं जागता रहता हूँ नींद भरी झील सी आँखों में....बताईये ज़रा ऐसे बोल किसकी निशानी है, जी हाँ गुलज़ार साहब के कलम की बूँद बूँद छाप है इस शानदार गीत में, शुरू का अलाप लिया है ख़ुद रहमान ने बाद का मोर्चा संभाला है बेन्नी दयाल और श्रेया घोषाल ने पर ये गुलज़ार साहब के शब्द ही हैं जो इस गीत को बरसों बाद भी हमें गुनगुनाने के लिए मजबूर करेगा. ये रहमान का अन्तिम गीत है इस गीतमाला में तो पेश हैं ये नग्मा उसी संगीत सम्राट के नाम... आजा वे हवाओं में...


तीसरे पायदान - तेरी और - फ़िल्म - सिंग इस किंग
राहत साहब की उडानों वाली आवाज़ को कहीं कहीं थाम कर रोकती श्रेया की मधुर पुकार..."एक हीर थी और एक राँझा...कहते हैं मेरे गाँव में...", गीत में प्रीतम ने बेहद भारतीय वाद्यों से कमाल का समां बांधा है, ये सच है चोरी के आरोपों ने प्रीतम की छवि ख़राब की है पर इस संगीतकार में गजब की प्रतिभा भी है ख़ास कर जब ये देसी अंदाज़ के गीत बनाते हैं तो ऐसा मौहौल रच देते हैं की सुनने वाला बस खो सा जाता है याद कीजिये फ़िल्म जब वी मेट का "नगाडा" गीत, ये गीत भी बेहद खूबसूरत है. मयूर पुरी ने लिखे हैं इसके बोल, और यकीनन बहुत कमाल के शब्द चुने हैं उन्होंने. ऑंखें बंद कर सुनें राहत फतह अली खान को गाते हुए...तेरी ओर...


दूसरे पायदान - रॉक ऑन - फ़िल्म -रॉक ऑन

कहते हैं मात्र 5 दिन साथ रह कर शंकर, एहसान, लोय, फरहान, और जावेद साहब ने मिलकर इस फ़िल्म 9 ट्रेक रच डाले. जिसमें से 8 ही एल्बम में शामिल हो पाये. 6 गीतों को स्वर दिया ख़ुद फरहान ने. दरअसल रॉक संगीत को भारत में स्थापित करने की कोशिश इससे पहले भी कई बार हुई है, पर ख़ुद के रचे गानों में दम न होने के जब रॉक बैंड नाकाम होकर कवर वर्जन गाने लगे तो कहा जाने लगा कि हिंदुस्तान में रॉक का कोई भविष्य नही. पर इस फ़िल्म के गीतों ने हिन्दी रॉक संगीत को एकदम से रोक्किंग बना दिया है. दरअसल रॉक संगीत में कविता का बहुत बढ़िया इस्तेमाल हो सकता है, जैसा कि इस फ़िल्म के कई गीतों में देखने को मिला है तो आगे भी इस तरह के प्रयोग होते रहें तो अच्छा है. ये गीत मन में एक नई आशा भरता है. अपने ख्वाबों को दबाना छोड़ दें और खुल कर पंख फैलाएं ऊंची उडानों के लिए.....शायद नए साल पर रॉक ऑन आपको यही संदेश देना चाहता है....आपके सपनें है आपके अपने..रॉक ऑन .



सरताज गीत २००८ - हौले हौले - फ़िल्म -रब ने बना दी जोड़ी

आम आदमी की जीवनचर्या और उसकी सोच को परिभाषित करता है ये हमारा नम्बर 1 गीत "हौले हौले सब कुछ होता है...तू सब्र तो कर सब्र का फल मीठा होता है". अब आप कहेंगे ये तो पुरानी सीख है, पर दोस्तों दरअसल इस गीत के माध्यम से ये गीत सही समय पर आया है, अंधी दौड़ में भागते हर मध्यम वर्गीय आदमी ने अचानक जल्द से जल्द अमीर बनने का सपना देखा. बाज़ार बदला बहुत से दिल बैठ गए....सेंसेक्स की मार से घायल आम आदमी जो अपने मेहनत की जमा पूँजी को डूबता देख रहा था उसके लिए राहत और सबक बन कर आया जयदीप सहानी का लिखा ये गीत. "चक दे" के बाद जयदीप का ये एक और बड़ा गीत है जो शीर्ष स्थान तक पहुँचा है. संगीत सलीम सुलेमान का और आवाज़ है सुखविंदर सिंह जिन्होंने इस गीत को गाकर अपने सभी आलोचकों के मुँह बंद कर दिए हैं....सरताज गीत 2008 ...हौले हौले से सुनिए ज़रा....






साल 2008 के 5 गैर फिल्मी गीत -

5. आसमान - के के
4. आवेगी या नही - रब्बी शेरगिल
3. दौलत शोहरत - कैलाश खेर
2. सोचता हूँ मैं - सोनू निगम
1. सांवरे - रूप कुमार राठोड


सुनिए इन गीतों को भी -



वर्ष २००९ भी इसी प्रकार संगीतमय गुजरे इसी कमाना के साथ हम विदा लेते हैं, नव वर्ष की शुभकामनाओं के साथ. यदि आपने आज की हमारी विशेष प्रस्तुति नही सुनी तो यहाँ सुनिए.


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