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Sunday, August 17, 2008

समीक्षा के महासंग्राम में, पहले चरण की आखिरी टक्कर

आज हम समीक्षा के पहले चरण के अन्तिम पड़ाव पर हैं, तीसरे समीक्षक की रेटिंग के साथ जुलाई के जादूगरों को प्राप्त अब तक के कुल अंकों को लेकर ये गीत आगे बढेंगें अन्तिम चरण की समीक्षा के लिए, जो होगा सत्र के अंत में यानी जनवरी २००९ में, जिसके बाद हमें मिलेगा, हमारे इस सत्र का सरताज गीत. तो दोस्तों चलते हैं पहले चरण की समीक्षा में, अपने तीसरे और अन्तिम समीक्षक के पास और जानते हैं उनसे, कि उन्होंने कैसे आँका हमारे जुलाई के जादूगर गीतों को -
(पहले दो समीक्षकों के राय आप यहाँ और यहाँ पढ़ सकते हैं)

गीत समीक्षा Stage 01, Third review

संगीत दिलों का उत्सव है ....

पहला गीत है - संगीत दिलों का उत्सव है...
इस गाने की उपलब्धि है मुखड़ा --'संगीत दिलों का उत्सव है-
बहुत सुंदर है ये गीत ।
हालांकि मुझे लगता है कि इस गीत में भी गेय तत्व मुश्किल हो गए हैं । रचना के दौरान कई पंक्तियां लंबी और कठिन
बन गयी हैं । पर कुल मिलाकर इन कमियों को इसकी धुन और गायकी में ढक लिया गया है ।
गायकों की आवाज़ें बढि़या लगीं । और धुन भी ।
आलाप सुंदर जगह पर रखे गए हैं ।
गाने का इंट्रोडक्‍शन म्यूजिक बहुत लंबा है पर मधुर है । गिटार और ग्रुप वायलिन की तरंगें बारिश का असर देती हैं ।
ये प्रयोग वाकई शाबाशी के लायक़ है ।
लगता है कि संगीतकारों ने सलिल चौधरी से खूब प्रेरणा ली है ।
इंट्रो में गायक की आमद से पहले का सिग्‍नेचर बहुत शानदार है ।
बस एक ही कमी लगी और वो थी मिक्सिंग ।
कई जगहों पर आवाज़ डूब गयी है ।
गायकी में जो समस्याएं हैं उन पर एक नज़र 'सुर खनकते हैं' में 'ते' को डुबा दिया गया है । ऐसा लगता है कि
इसे धुन पर फिट करने के लिए 'खनक हैं' की ध्‍वनि रखी गयी है । खनकते हैं पूरा सुनाई नहीं देता ।
आलाप में जिस तरह मॉडर्न बीट्स हटकर तबला आ जाता है वो कमाल का है ।
इस गाने में संगीतकारों की प्रतिभा की बहुत झलक नज़र आती है ।
बेहद संभावनाशील कलाकार हैं संगीतकार । कहना ना होगा कि इन तमाम गानों में संगीत के मामले में ये गाना
सबसे ज्यादा परिपक्व है ।
दस में से दस अंक ।

संगीत दिलों का उत्सव है... को तीसरे निर्णायक द्वारा मिले 10 /10 अंक, कुल अंक अब तक 24 /30

बढे चलो.

दूसरा गीत है "बढ़े चलो…", मुझे ये गीत बाकी तमाम गीतों से ज्यादा भव्य लगा ।
संवाद के साथ ओपनिंग और ढोल ढमाका कमाल का है ।
पर जैसे ही गाना एस्‍टेब्लिश होता है । गाने की मिक्सिंग की पोल खुलने लगती है ।
मुझे बार बार लग रहा है कि इस गाने की मिक्सिंग दोबारा करनी चाहिए ।
ताकि आवाज़ें प्रॉपर तरीक़े से उभर कर आएं ।
महिला स्वर ओपनिंग में तो एकदम साफ़ है ।
पर पुरूष स्वर काफी खोखला/ हॉलो लग रहा है ।
'बदल रहा है हिंद' के बाद जब 'बढ़े चलो' आता है तब भी महिला स्वर चमकदार है पर पुरूष स्वर गड़बड़ है । डूबा डूबा
सा लग रहा है । फिर महिला स्वर का आलाप संभवत: रीवर्ब/ प्रतिध्‍वनि डालने की वजह से पूरी तरह अस्पष्ट हो गया है ।
हम आज फ़लक पर बिछी हुई से लेकर सूरज पिघलाने वाले हैं तक आवाजें हॉलो लगती हैं ।
'बदल रहा है हिंद' से गाना फिर से चमक जाता है ।
गाने की बीट्स बढिया हैं । पर दूसरे अंतरे के बाद बीट्स इतनी प्रोमिनेन्‍ट हो गयी हैं
कि आवाजें दब रही हैं । अगर आप वाकई इस गाने को दोबारा मिक्‍स करें और इसे चमका दें तो
इस रचना के साथ न्याय हो जायेगा ।
पुरूष गायकों को उच्चारण पर मेहनत करनी होगी । 'भावना' को 'बावना' गाया गया है ।
इसे सुधारा जा सकता है ।
लेकिन इस गाने को इन तमाम बातों के बावजूद मैं दस में से सात अंक दे रहा हूं । तो इसकी वजह है गाने की रचनाशीलता और
धुन की प्रयोगधर्मिता ।
इस गाने में अपार संभावनाएं हैं । रचना का पक्ष तो वाक़ई कमाल है । इसे आप हिंद युग्म का परिचय गीत
कहते हैं । ये भारत के तमाम युवाओं का परिचय गीत बनने का हक़ रखता है ।
बढे चलो, को तीसरे निर्णयक से अंक मिले 7 /10, कुल अंक अब तक 20 /30.

आवारा दिल.

तीसरा गीत है, “आवारा दिल…”। इस गाने को पॉप गाने की शैली में बनाया गया है ।
गायक की आवाज़ में थोड़ी नर्मी है । पर एक लोच भी है । सुबोध ने इस गाने को बहुत बढिया गाया है ।
धुन बढिया है ।
मुझे लगता है कि इस गाने को थोड़े और जोश के साथ गाया जाना चाहिए था । धुन में एक उछाल होता तो अच्‍छा लगता ।
इस गाने में हर बार इंटरल्‍यूड म्‍यूजिक को 'सम' पर ठहराकर फिर गायक की आवाज़ को इंट्रोड्यूस करना अच्छा लगता है ।
दूसरा अंतरा मुझे सबसे अच्छा लगा ।
आवारा दिल को मैं दस में से नौ नंबर दूंगा ।
सुंदर काम किया है ।
आवारा दिल, को तीसरे निर्णायक से मिले 9 / 10, कुल अंक अब तक 24 /30.


तेरे चेहरे पे ...

आखिरी गीत एक गज़ल है “तेरे चेहरे पे…”। जैसे ही मैंने इस ग़ज़ल को सुनना शुरू किया तो सबसे पहले ‘आवाज़’ के पन्ने पर दोबारा जाना पड़ा और देखना पड़ा कि ये गायक कौन है । निशांत अक्षर एक अनूठा नाम लगा । आवाज़ के अनुरूप अनूठा । संगीतकार अनुरूप में मुझे संभावनाएं नज़र आ रही हैं । मेरा मानना है कि गजल कंपोज़ करना आसान काम नहीं है । संगीतकार को इस ‘झमाझम’ दौर में खुद को बहुत संयत और संवेदनशील रखना पड़ता है । और ‘अनुरूप’ को इस मामले में सौ में से दो सौ नंबर देने चाहिए ।
अनुरूप में वाक़ई समझदारी है । गजल की धुन बहुत प्यारी है । सादा है । जिस तरह से ‘और’ को लहराके गवाया है वो मन को लुभा जाता है । रिदम सेक्‍शन बढिया है । अच्छी बात ये है कि गजल के सुनहरे दौर के किसी भी कंपोजर की छाया नहीं है कंपोजीशन में । इसमें आधुनिकता भी है और परंपरा भी ।
तकनीकी द़ृष्टि से भी मैं इस मिक्सिंग से पूरी तरह संतुष्ट हूं । मुझे नहीं पता कि इसे भी आप सभी ने अपने अपने शहरों में अलग अलग रहकर तैयार किया या सिटिंग कर सके । पर कुल मिलाकर जो रचना तैयार हुई वो अच्छी है । बल्कि उत्कृष्ट है ।
अब एक तल्ख़ बात कहूंगा । शायर के लिए । ये जरूरी भी है । मनुज मेहता की शायरी बहुत साधारण है । बेहतर होता कि इतने अच्छे गायक और संगीतकार की तरह शायर से कुछ बेहतर लिखवाया जाता । ग़ज़ल सचमुच बहुत ही साधारण है । अगर इस छोटी सी गजल के हर शेर में गहराई होती तो यकीन मानिए ये रचना डाउनलोड होकर कई दिनों तक मेरे कंप्‍यूटर पर बज रही होती । गायक और संगीतकार को बधाईयां, लटके झटकों से बचने के लिए ।
8/10
तेरे चेहरे पे..., को तीसरे निर्णायक ने मिले 8 /10, कुल अंक अब तक 21 /30

चलते चलते...

पहले चरण के बाद जुलाई के जादूगर ४ गीतों की पोजीशन इस प्रकार है -

आवारा दिल २४ / ३०
संगीत दिलों का उत्सव है २४ / ३०
तेरे चेहरे पे २१ / ३०
बढे चलो २० / ३०


हम आपको याद दिला दें कि कुल अंक ५० में से दिए जायेंगे, यानी अन्तिम दो निर्णायकों के पास २० अंक हैं, अन्तिम चरण की रेंकिंग जनवरी में होगी, जिसके बाद ही अन्तिम फैसला होगा, सरताज गीत का और टॉप १० का भी, फिलहाल हम मिलेंगे अगले महीने के पहले रविवार को, अगस्त के अश्वरोही गीतों की पहली समीक्षा लेकर.

हिंद युग्म, आवाज़ द्वारा संगीत के क्षेत्र में हो रहे इस महाप्रयास के लिए अपना बेशकीमती समय निकल कर, युवा कलाकारों को प्रोत्साहन/ मार्गदर्शन देने के उद्देश्य से आगे आए हमारे समीक्षकों के प्रति हिंद युग्म की पूरी टीम अपना आभार व्यक्त करती है.

Sunday, August 3, 2008

जुलाई के जादूगरों की पहली भिडंत

जैसा की आवाज़ के श्रोता वाकिफ हैं, कि संगीत का ये दूसरा सत्र जुलाई महीने के पहले शुक्रवार से आरंभ हुआ था और दिसम्बर के अन्तिम शुक्रवार तक चलेगा, इस दौरान रीलीस होने वाले तमाम गीतों में से एक गीत को चुना जाएगा "सत्र का सरताज गीत", लेकिन सरताज गीत बनने के लिए हर गीत को पहले पेश होना पड़ेगा जनता की अदालत में, और फ़िर गुजरना पड़ेगा समीक्षा की परीक्षा से भी, ये समीक्षा करेंगे हिंद युग्म, आवाज़ के लिए संगीत / मीडिया और ब्लॉग्गिंग से जुड़े हमारे वरिष्ट और अनुभवी समीक्षक. हम आपको बता दें, कि समीक्षा के दो चरण होंगे, पहले चरण में ३ निर्णायकों द्वारा, बीते महीने में जनता के सामने आए गीतों की परख होगी और उन्हें अंक दिए जायेंगे, हर निर्णायक के द्वारा दिए गए अंक गीत के खाते में जुड़ते जायेंगे. दूसरे और अन्तिम चरण में, २ निर्णायक होंगे जो जनता के रुझान को भी ध्यान में रख कर अंक देंगे, दूसरे चरण की समीक्षा सत्र के खत्म होने के बाद यानि की जनवरी के महीने में आरंभ होगी, हर गीत को प्राप्त हुए कुल अंकों का गणित लेकर हम चुनेगें अपना - सरताज गीत.

तो "जुलाई के जादूगर" गीतों की पहले चरण की समीक्षा आज से शुरू हो रही है, आईये जानते हैं कि जुलाई के इन जादूगरों को हमारे पहले समीक्षक ने अपनी कसौटी पर आंक कर क्या कहा और कितने अंक दिए हर गीत को.

निर्णायक की नज़र में हिंद युग्म का ये प्रयास -

हिन्द-युग्म” के एक उत्कृष्ट प्रयास के तौर पर युवा गायकों और संगीतकारों को मौका देने के पवित्र उद्देश्य से शुरु हुआ “आवाज़” का सफ़र प्रारम्भ हो चुका है। युग्म ने मुझसे गीतों की समीक्षा का आग्रह किया जिसे मैं टाल नहीं सका। असल में मेरे जैसे “कानसेन” (एक होता है तानसेन, जो अच्छा गाता है और एक होता है कानसेन जो सिर्फ़ अच्छा सुनता है) से गीतों की समीक्षा करवाना कुछ ऐसा ही है जैसे किसी लुहार से नाक में पहनने का काँटा बनवाना.

जुलाई माह के दौरान चार नये गीत “रिलीज़” हुए। चारों गीत युवाओं की टीम ने आपसी सामंजस्य और तकनीकी मदद से बनाये हैं और तकनीकी तौर पर कुछ गलतियाँ नज़र-अंदाज़ कर दी जायें (क्योंकि ये लोग अभी प्रोफ़ेशनल नहीं हैं और साधन भी होम स्टूडियो के अपनाये हैं) तो इन युवाओं की मेहनत बेहद प्रभावशाली लगती है।


गीत समीक्षा

संगीत दिलों का उत्सव है ....

पहला गीत है “संगीत दिलों का उत्सव है…” इसे सजीव सारथी ने लिखा है और निखिल-चार्ल्स की जोड़ी ने इसकी धुन बनाई है। गीत की धुन कहीं धीमी, कहीं तेज लगती है, खासकर शुरुआत में जब मुखड़ा शुरु होने से पहले के वाद्य तो बेहतरीन बजते हैं, लेकिन “बेजान” शब्द ऐसा लगता है कि जल्दी-जल्दी में गा दिया गया हो, “बेजान” शब्द में यदि थोड़ा भी आलाप दिया जाता या उसे थोड़ा सा और लम्बा खींचा जाता तो और भी प्रभावशाली होता, इसी प्रकार दूसरी पंक्ति का अन्तिम शब्द “जब” यह भी जल्दी से समाप्त हुआ सा लगता है और अस्पष्ट सा सुनाई देता है। चूंकि यह अन्तिम शब्द है, जहाँ गीत की एक पंक्ति “लैण्ड” कर रही है और कई बार कर रही है, वह शब्द एकदम साफ़ होना चाहिये। गीत को पहली बार सुनते ही समझ में आ जाता है कि यह किसी दक्षिण भारतीय ने गाया है, क्योंकि हिन्दी उच्चारण का दोष तुरन्त सुनाई दे जाता है, यह नहीं होना चाहिये। कई जगह इस प्रकार की छोटी-छोटी गलतियाँ हैं, लेकिन पहली कोशिश के तौर पर इसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। मिथिला जी का स्वर भी काफ़ी दबा हुआ सा लगता है, जैसे कि हिचकिचाते हुए गाया गया हो, आवाज में जो खुलापन होना चाहिये वह फ़िलहाल नदारद है। गीत की धुन अच्छी बन पड़ी है और हमें केरल के बैकवाटर में ले जाती है। गीत पर “येसुदास इफ़ेक्ट” को भी साफ़ महसूस किया जा सकता है। कुल मिलाकर देखा जाये तो कुछ बिन्दुओं को छोड़कर गीत को दस में से छः अंक दिये जा सकते हैं।

संगीत दिलों का उत्सव है... को पहले निर्णायक द्वारा मिले 6 /10 अंक, कुल अंक अब तक 6 /10

बढे चलो.

दूसरा गीत है “बढ़े चलो…”, यह गीत अपेक्षाकृत बेहतर बन पड़ा है। संगीतकार ॠषि ने इस पर काफ़ी मेहनत की है, धुन जोशीली है और खासकर ढोल का आभास देती कोरस आवाजें एक उत्साह सा जगाती हैं। गीत में पुरुष आवाज कुछ बनावटीपन लिये हुए है, शायद संगीतकार ने अधिक जोश भरने के लिये गायक की आवाज में परिवर्तन करवाया है, ऐसा प्रतीत होता है। बताया गया है कि यह गीत कुछ छः माह में तैयार हुआ है, जो कि स्वाभाविक भी है, इतने लोगों को विभिन्न जगहों से नेट पर एकत्रित करके इस प्रकार का उम्दा काम निकलवाना अपने आप में एक जोरदार प्रयास है और इसमें पूरी टीम सफ़ल भी हुई है और हमें एक बेहतरीन गाना दिया है। गीत के बोल तो युवाओं का प्रतिनिधित्व करते ही हैं, बीच-बीच में दी गई “बीट्स” भी उत्तेजना पैदा करने में सक्षम हैं। इस गीत को मैं दस में सात अंक दे सकता हूँ।

बढे चलो, को पहले निर्णयक से अंक मिले 7 / 10, कुल अंक अब तक 7 /10.

आवारा दिल.

तीसरा गीत है, “आवारा दिल…”। समीक्षा के लिये प्रस्तुत चारों गीतों में से यह सर्वश्रेष्ठ है। संगीतकार सुभोजित ने इसमें जमकर मेहनत की है। युवाओं को पसन्द आने वाली सिसकारियों सहित, तेज धुन बेहद “कैची” (Catchy) बन पड़ी है। “आवारा दिल” में “ल्ल्ल्ल्ल” कहने का अन्दाज बहुत ही अलहदा है, इसी प्रकार की वेरियेशन अन्य गायकों और संगीतकारों से अपेक्षित है, इस गीत में रोमांस छलकता है, एक साफ़ झरने सा बहता हुआ। सारथी के शब्द भी अच्छे हैं, और गायक की आवाज और उच्चारण एकदम स्पष्ट हैं। हालांकि कई जगह दो लाइनों और दो शब्दों के बीच में साँस लेने की आवाज आ जाती है, लेकिन कुल मिलाकर इस गीत को मैं दस में से आठ अंक देता हूँ।

आवारा दिल, को पहले निर्णायक से मिले 8 / 10, कुल अंक अब तक 8 / 10.


तेरे चेहरे पे ...

आखिरी गीत एक गज़ल है “तेरे चेहरे पे…”। यह गज़ल पूर्णरूप से गज़ल के “मूड” में गाई गई है, निशांत की आवाज़ में एक विशिष्ट रवानगी है, उनका उर्दू तलफ़्फ़ुज़ भी काफ़ी अच्छा है। उनकी आवाज़ को परखने के लिये अभी उनका और काम देखना होगा, लेकिन गज़ल के “मीटर” पर उनकी आवाज़ फ़िट बैठती लगती है। गज़ल के बोलों की बात करें तो यह काफ़ी छोटी सी लगती है, ऐसा लगता है कि शुरु होते ही खत्म हो गई। काफ़िया कहीं-कहीं नहीं मिल रहा, लेकिन इसे नज़र-अंदाज़ किया जा सकता है क्योंकि यह आजकल का “ट्रेंड” है। गज़ल की धुन ठीक बन पड़ी है, हालांकि यह एक “रूटीन” सी धुन लगती है और “कुछ हट के” चाहने वालों को निराश करती है। फ़िर भी यह एक अच्छा प्रयास कहा जा सकता है। इसे मैं दस में से छः अंक देता हूँ।

तेरे चेहरे पे..., को पहले निर्णायक ने मिले 6 /10, कुल अंक अब तक 6 /10

चलते चलते...

जुलाई माह का स्टार सुभोजित / साठे की जोड़ी को घोषित किया जा सकता है, जिन्होंने सर्वाधिक प्रभावित किया है। प्रस्तुत समीक्षा युवाओं को प्रोत्साहित करने के लिये है, जो छोटी-छोटी गलतियाँ गिनाई हैं उन्हें आलोचना नहीं, बल्कि एक स्वस्थ सुझाव माना जाये। युवाओं में जोश है और यही लोग नई तकनीक के पुरोधा हैं सो अगली बार इनसे और बेहतर की उम्मीद रहेगी। जाहिर है कि यह प्राथमिक प्रयास हैं, जैसे-जैसे संगीतकारों में अनुभव आयेगा वे और भी निखरते जायेंगे…

तो दोस्तों पहले निर्णायक के फैसले के बाद सुभोजित / सुबोध के गीत आवारा दिल है अब तक सबसे आगे, लेकिन बाकि दो निर्णायकों के निर्णय आने अभी बाकी हैं, पहले चरण के बाद कौन बाजी मारेगा, अभी कहना मुश्किल है, दूसरे समीक्षक की पारखी समीक्षा लेकर हम उपस्थित होंगे अगले रविवार को. हिंद युग्म, आवाज़ द्वारा संगीत के क्षेत्र में हो रहे इस महाप्रयास के लिए अपना बेशकीमती समय निकल कर, युवा कलाकारों को प्रोत्साहन/ मार्गदर्शन देने के उद्देश्य से आगे आए हमारे समीक्षकों के प्रति हिंद युग्म की पूरी टीम अपना आभार व्यक्त करती है.

Wednesday, July 30, 2008

तेज़ बारिश में कबड्डी खेलना अच्छा लगता है ...

दिल्ली के अनुरूप कुकरेजा हैं, आवाज़ पर इस हफ्ते का उभरता सितारा.

इस बेहद प्रतिभाशाली संगीतकार की ताज़ा स्वरबद्ध ग़ज़ल "तेरे चेहरे पे" बीते शुक्रवार आवाज़ पर आयी और बहुत अधिक सराही गयी. ग़ज़लों को धुन में पिरोना इनका जनून है, और संगीत को ये अपना जीवन समर्पित करना चाहते हैं. फरीदा खानम, मुन्नी बेगम और जगजीत सिंह इन्हे बेहद पसंद हैं, अपने भाई निशांत अक्षर, जो ख़ुद एक उभरते हुए ग़ज़ल गायक हैं, के साथ मिलकर एक एल्बम भी कर चुके हैं. संगीत के आलावा अनुरूप को दोस्तों के साथ घूमना, बेड़मिन्टन, लॉन टेनिस, बास्केट बोंल और क्रिकेट खेलना अच्छा लगता है, मगर सबसे ज्यादा भाता है, तेज़ बारिश ( जो हालाँकि दिल्ली में कम ही नसीब होती है ) में कबड्डी खेलना. जिंदगी को अनुरूप कुछ इन शब्दों में बयां करते हैं -

Life always creates new and BIG troubles through which i pass learning new and BIGGER things.
Even A failure is a success if analyzed from the other side of it.


हमने अनुरूप से गुजारिश की, कि वो हिंद युग्म के साथ उनके पहले संगीत अनुभव के बारे में, यूनि कोड का प्रयोग कर हिन्दी में लिखें, तो उन्होंने कोशिश की, और इस तरह उन्होंने हिन्दी टंकण का ज्ञान भी ले लिया, अब हो सकता है जल्द ही वो अपना ख़ुद का हिन्दी ब्लॉग भी बना लें.....तो लीजिये पढिये, क्या कहते हैं अनुरूप, अपने और अपने संगीत के बारे में -

नमस्कार दोस्तों, सबसे पहले तो में हिंद युग्म का शुक्रिया अदा करना चाहूँगा कि मुझे अपना संगीत प्रस्तुत करने का मौका दिया. उन सभी श्रोतागणों का आभार, जिन्होंने इस ग़ज़ल को सुना और अपने विचार प्रकट किए.

मेरा संगीत का सफर बचपन से ही शुरू हुआ, पिताजी को तबला व् हारमोनियम बजाते देख मैं भी इसी ओर खिंचा चला आया. शुरू से ही मुझे गाने का शौक नही रहा बल्कि संगीत का शौक रहा, जैसे जैसे उम्र बढ़ी, मेरी रूचि संगीत में बढती गई और मैंने गिटर बजाना शुरू किया. ११ वि कक्षा में मुझे एक होम स्टूडियो सेट अप करने का मौका मिला जिसको मैंने पलक झपकते ही पूरा किया. १२वि कक्षा के अंत तक मेरे भाई (निशांत अक्षर) और मैंने मिलकर एक ग़ज़ल एल्बम को पूरा किया जिसका नाम है "चुप की आवाज़ ", जिसका उदघाटन समारोह दिल्ली के हिन्दी भवन में किया गया, और जिसके बोल लिखे विज्ञान व्रत ने.

सफर आगे बढ़ा और मैं दिल्ली विश्व विद्यालय के रेडियो से जुड़ा.

रेडियो पर एक दिन इंटरव्यू देते वक्त मैंने हिंद युग्म के बारे में सुना, जो मुझे बेहद अच्छा लगा. सजीव जी से मेरी मुलाक़ात डी यू रेडियो के मैनेजर के द्वारा हुई, जो कि उस वक्त इंटरव्यू ले रहे थे. बात करने के कुछ हफ्तों बाद ही उन्होंने मुझे कुछ कवियों से ऑनलाइन मिलवाया जिन्होंने मुझे अपनी रचनायें भेजी. काफ़ी समय बाद, मनुज जी की रचना मुझे और मेरे भाई, निशांत अक्षर, को पसंद आयी और हमने इस पर काम शुरू कर दिया, और उसके बाद कि कहानी आपके सामने है.

अंत में एक बार फ़िर से सभी श्रोतागणों, मनुज जी,सजीव जी और हिंद युग्म की पूरी टीम का धन्येवाद, आगे भी आप सब मेरी कोशिशों को युहीं प्रोत्साहित करते रहेंगे इस आशा के साथ -

अनुरूप

मुझसे संपर्क करें -

Web : http://anuroop.in

iLike : http://ilike.com/artist/anuroop

Blog : http://www.anuroopsmusic.blogspot.com

अनुरूप को, आवाज़ और हिंद युग्म की ढेरों शुभकामनायें...अगर आप ने, अब तक नही सुना तो अब सुनिए, इस युवा संगीतकार की स्वरबद्ध की ये खूबसूरत ग़ज़ल, और अपना प्रोत्साहन/मार्गदर्शन दें.

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