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Wednesday, May 26, 2010

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, वहशत-ए-दिल क्या करूँ...मजाज़ के मिजाज को समझने की कोशिश की तलत महमूद ने

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #८५

कुछ शायर ऐसे होते है, जो पहली मर्तबा में हीं आपके दिल-औ-दिमाग को झंकझोर कर रख देते हैं। इन्हें पढना या सुनना किसी रोमांच से कम नहीं होता। आज हम जिन शायर की नज़्म लेकर इस महफ़िल में दाखिल हुए है, उनका असर भी कुछ ऐसा हीं है। मैंने जब इनको पहली बार सुना, तब हीं समझ गया था कि ये मेरे दिमाग से जल्द नहीं उतरने वाले। दर-असल हुआ यूँ कि एक-दिन मैं यू-ट्युब पर ऐसे हीं घूमते-घूमते अली सरदार ज़ाफ़री साहब के "कहकशां" तक पहुँच गया। वहाँ पर कुछ नामीगिरामी शायरों की गज़लें "जगजीत सिंह" जी की आवाज़ में सुनने को मिलीं। फिर मालूम चला कि "कहकशां" बस गज़लों का एक एलबम या जमावड़ा नहीं है, बल्कि यह तो एक धारावाहिक है जिसमें छह जानेमाने शायरों की ज़िंदगियाँ समेटी गई हैं। इन शायरों में से जिनपर मेरी सबसे पहले नज़र गई, वो थे "मजाज़ लखनवी"। इनपर सात या आठ कड़ियाँ मौजूद थीं(हैं)..मैं एक हीं बार में सब के सब देख गया.. और फिर आगे जो हुआ.... आज का आलेख, आज की महफ़िल-ए-गज़ल उसी का एक प्रमाण-मात्र है। मजाज़ के बारे में मैं खुद कुछ कहूँ, इससे अच्छा मैं यह समझता हूँ कि प्रकाश पंडित जी(जो कि मजाज़ को निजी तौर पे जानते थे) के शब्दों का सहारा ले लिया जाए (अब तक मजाज़ के बारे में मैं इतना कुछ जान चुका हूँ कि मैं खुद हीं कुछ कहना चाहता हूँ, लेकिन यह छोटी मुँह बड़ी बात होगी):

" ‘मजाज़’ उर्दू शायरी का कीट्स है।"
" ‘मजाज़’ शराबी है।"
" ‘मजाज़’ बड़ा रसिक और चुटकुलेबाज़ है।"
" ‘मजाज़’ के नाम पर गर्ल्स कालिज अलीगढ़ में लाटरियां डाली जाती थीं कि ‘मजाज़’ किसके हिस्से में पड़ता है। उसकी कविताएं तकियों के नीचे छुपाकर आंसुओं से सींची जाती थीं और कुंवारियां अपने भावी बेटों का नाम उसके नाम पर रखने की क़समें खाती थीं।" (उर्दू की मशहूर अफ़साना निगार इस्मत चुगताई ने भी अपनी आत्मकथा में इस बात का ज़िक्र किया है)

" ‘मजाज़’ के जीवन की सबसे बड़ी ट्रेजिडी औरत है।"

‘मजाज़’ से मिलने से पूर्व मैं ‘मजाज़’ के बारे में तरह-तरह की बातें सुना और पढ़ा करता था और उसका रंगारंग चित्र मैंने उसकी रचनाओं में भी देखा था, विशेष रूप से उसकी नज़्म ‘आवारा’ (आज की नज़्म) में तो मैंने उसे साक्षात् रूप से देख लिया था। लेकिन उससे मिलने का मुझे मौका तब मिला जब मैं और साहिर लाहौर छोड़ने के बाद दिल्ली में घर लेने की जुगत में थे। तो एक रात की बात है। मैं और साहिर रात के १०-११ बजे एक गली से गुजर रहे थे तभी एक दुबला-पतला व्यक्ति अपने शरीर की हड्डियों के ढांचे पर शेरवानी मढ़े बुरी तरह लड़खड़ाता और बड़बड़ाता मेरे सामने आ खड़ा हुआ।

"अख़्तर शीरानी मर गया-हाय अख़्तर! तू उर्दू का बहुत बड़ा शायर था-बहुत बड़ा !"

वह बार-बार यही वाक्य दोहरा रहा था। हाथों से शून्य में उल्टी-सीधी रेखाएं बना रहा था और साथ-साथ अपने मेज़बान को कोसे जा रहा था जिसने घर में शराब होने पर भी से और शराब पीने को न दी थी और अपनी मोटर में बिठाकर रेलवे पुल के पास छोड़ दिया था। ज़ाहिर है कि इस ऊटपटांग-सी मुसीबत से मैं एकदम बौखला गया। मैं नहीं कह सकता कि उस समय उस व्यक्ति से मैं किस तरह पेश आता कि ठीक उसी समय कहीं से ‘जोश’ मलीहाबादी निकल आए और मुझे पहचानकर बोले, "इसे संभालो, प्रकाश ! ‘मजाज़’ है।"

‘मजाज़’ को संभालने की बजाय उस समय आवश्यकता यद्यपि अपने-आपको संभालने की थी लेकिन ‘मजाज़’ का नाम सुनते ही मैं एकदम चौंक पड़ा और दूसरे ही क्षण सब कुछ भुलाते हुए मैं इस प्रकार उससे लिपट गया मानो वर्षों पुरानी मुलाक़ात हो। उस समय तो मेरी ’मजाज़’ से पहचान न थी, लेकिन आगे चलकर हमारी अच्छी दोस्ती हो गई। उन दिनों ’मजाज़’ लगभग एक महीने हमारे साथ रहा। शराब छुड़ाने की हमने बहुत कोशिश की, लेकिन उसके शराबी दोस्तों ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा। ’मजाज़’ को खाने की कोई चिंता न थी, कपड़े फट गए हैं या मटमैले हैं, इसकी भी उसे कोई परवाह न थी। यदि कोई धुन थी तो बस यही कि कहां से, कब और कितनी मात्रा में शराब मिल सकती है ! दिन-रात निरन्तर शराबनोशी का परिणाम नर्वस ब्रेकडाउन के सिवा और क्या हो सकता था जो हुआ। किसी प्रकार पकड़-धकड़ कर रांची मैण्टल हस्पताल में पहुंचाया, लेकिन स्वस्थ होते ही यह सिलसिला फिर से शुरू हो गया; और यह सिलसिला ६ दिसम्बर, १९५५ ई. को बलरामपुर हस्पताल, लखनऊ में उस समय समाप्त हुआ जब कुछ मित्रों के साथ ‘मजाज़’ ने नियमानुसार बुरी तरह शराब पी। मित्र तो अपने-अपने घरों को सिधार गए लेकिन ‘मजाज़’ रात-भर की नस फट गई।

‘मजाज़’ की ज़िन्दगी के हालात बड़े दुःखद थे। कभी पूरी अलीगढ़ यूनिवर्सिटी, जहां से उसने बी.ए. किया था, उस पर जान देती थी। गर्ल्स कालिज में हर ज़बान पर उसका नाम था। लेकिन लड़कियों का वही चहेता शायर जब १९३६ ई. में रेडियो की ओर से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ’आवाज़’ का सम्पादक बनकर दिल्ली आया तो एक लड़की (मजाज़ जिस लड़की को चाहते थे वो शादीशुदा थी) के ही कारण उसने दिल पर ऐसा घाव खाया जो जीवन-भर अच्छा न हो सका। एक वर्ष बाद ही नौकरी छोड़कर जब वह अपने शहर लखनऊ को लौटा तो उसके सम्बन्धियों के कथनानुसार वह प्रेम की ज्वाला में बुरी तरह फुंक रहा था और उसने बेतहाशा, पीनी शुरू कर कर दी थी। इसी सिलसिले में १९४० ई. में उस पर नर्वस ब्रेकडाउन का पहला आक्रमण हुआ। १९५४ ई. में उस पर पागलपन का दूसरा हमला हुआ। अब वह स्वयं ही अपनी महानता के राग अलापता था। शायरों के नामों की सूची तैयार करता था और ‘ग़ालिब’ और इक़बाल’ के नाम के बाद अपना नाम लिखकर सूची समाप्त कर देता था।

आधुनिक उर्दू शायरी का यह प्रिय दयनीय शायर सन् १९०९ ई. में अवध के एक प्रसिद्ध क़सबे रदौली में पैदा हुआ। पिता सिराजुलहक़ रदौली के पहले व्यक्ति थे ‘जिन्होंने ज़मींदार होते हुए भी उच्च शिक्षा प्राप्त की और ज़मींदारी पर सरकारी नौकरी को प्राथमिकता दी। यों असरारुल हक़ ’मजाज़’ का पालन-पोषण उस उभरते हुए घराने में हुआ जो एक ओर जीवन के पुराने मूल्यों को छाती से लगाए हुए था और दूसरी ओर नए मूल्यों को भी अपना रहा था। बचपन में, जैसाकि उसकी बहन ‘हमीदा’ ने एक जगह लिखा है, ‘मजाज़’ बड़े सरल स्वभाव तथा विमल हृदय का व्यक्ति था। जागीरी वातावरण में स्वामित्व की भावना बच्चे को मां के दूध के साथ मिलती है लेकिन वह हमेशा निर्लिप्त तथा निःस्वार्थ रहा। दूसरों की चीज़ को अपने प्रयोग में लाना और अपनी चीज़ दूसरों को दे देना उसकी आदत रही। इसके अतिरिक्त वह शुरू से ही सौन्दर्य-प्रिय भी था। कुटुम्ब में कोई सुन्दर स्त्री देख लेता तो घंटों उसके पास बैठा रहता। खेल-कूद, खाने-पीने किसी चींज़ की सुध न रहती। प्रारम्भिक शिक्षा लखनऊ के अमीनाबाद हाई स्कूल में प्राप्त कर जब वह आगरा के सेंट जोन्स कालिज में दाखिल हुआ तो कालिज में मुईन अहसन ‘जज़्बी’ और पड़ोस में ‘फ़ानी’ ऐसे शायरों की संगत मिली और यहीं से ‘मजाज़’ की उस ज्योतिर्मय शायरी का प्रादुर्भाव हुआ जिसकी चमक आगरा, अलीगढ़ और दिल्ली से होती हुई समस्त भारत में फैल गई। ‘मजाज़’ की शायरी का आरम्भ बिलकुल परम्परागत ढंग से हुआ और उसने उर्दू शायरी के मिजाज़ का सदैव ख़याल रखा।

"मजाज़ को शामिल किए बग़ैर पिछले ६० सालों का उर्दू शायरी का कोई भी संचयन पूरा नहीं हो सकता। उर्दू साहित्य में योगदान के लिए २०वीं सदी में जिन दो शायरों को सबसे ज़्यादा शोहरत मिली उनमें भारत से मजाज़ हैं और पाकिस्तान से फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ हैं।" - ये कथन हैं श्री गोपीचंद नारंग के.... तो उर्दू के सुप्रसिद्ध शायर स्वर्गीय "असर" लखनवी ने एक बार लिखा था: "उर्दू में एक कीट्स पैदा हुआ था लेकिन इन्क़िलाबी भेड़िए उसे उठा ले गए।" जानकारी के लिए बता दूँ कि मजाज़ का एक हीं कविता-संग्रह प्रकाशित हुआ है - "आहंग" और बस इसी संग्रह के दम पर मजाज़ को उर्दू का कीट्स कहा जाता है। इस बात से जान पड़ता है कि मजाज़ की लेखनी में कितना दम था। प्रमाण के लिए यह शेर मौजूद है:

अपने दिल को दोनों आलम से उठा सकता हूँ मैं
क्या समझती हो कि तुमको भी भुला सकता हूँ मैं


मजाज़ के बारे में कहने को अभी बहुत कुछ बाकी है, लेकिन एक हीं आलेख में सब कुछ समेटा नहीं जा सकता। इसलिए आज बस इतना हीं। वैसे क्या आपको यह मालूम है कि मजाज़ की बहन का निकाह जांनिसार अख्तर से हुआ था, यानि कि मजाज़ "जावेद अख्तर" के मामा थे। नहीं मालूम था ना आपको? खैर कोई बात नहीं.. हम किस मर्ज़ की दवा हैं। चलिए तो अब आज की नज़्म की ओर रूख करते हैं। आज की नज़्म "ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ"/"आवारा" को अपनी आवाज़ से सजाया है तलत महमूद साहब ने। हम नज़्म तो आपको सुनवा हीं देंगे, लेकिन आपके लिए दो प्रश्न हैं:
१) तलत साहब की आवाज़ में यह नज़्म हमने किस फिल्म से ली है?
२) आज से सात साल पहले आई एक फिल्म में पूरा का पूरा एक गाना मजाज़ को समर्पित था। उस गाने में "आवारा" नज़्म की ये पंक्तियाँ थीं: "जी में आता है मुर्दा सितारे नोंच लूँ.."। हम किस गाने की बात कर रहे हैं और वह फिल्म कौन-सी थी?
सही जवाब देने वा्लों को भविष्य में जरूर फायदा होगा, मैं इसका विश्वास दिलाता हूँ। खैर, अभी तो यह नज़्म पेश-ए-खिदमत है:

शहर की रात और मैं, नाशाद-ओ-नाकारा फिरूँ
जगमगाती जागती, सड़कों पे आवारा फिरूँ
ग़ैर की बस्ती है, कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

ये रुपहली छाँव, ये आकाश पर तारों का जाल
जैसे ___ का तसव्वुर, जैसे आशिक़ का ख़याल
आह लेकिन कौन समझे, कौन जाने जी का हाल
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

रास्ते में रुक के दम लूँ, ये मेरी आदत नहीं
लौट कर वापस चला जाऊँ, मेरी फ़ितरत नहीं
और कोई हमनवा मिल जाये, ये क़िस्मत नहीं
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "जुगनू" और शेर कुछ यूँ था-

सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं

जुगनू की चमक के साथ महफ़िल में सबसे पहले हाज़िर हुईं सीमा जी। आपने इन शेरों से महफ़िल को रौशन कर दिया:

यही अंदाज़ है मेरा समन्दर फ़तह करने का
मेरी काग़ज़ की कश्ती में कई जुगनू भी होते हैं (बशीर बद्र)

बाहर सहन में पेड़ों पर कुछ जलते-बुझते जुगनू थे
हैरत है फिर घर के अन्दर किसने आग लगाई है (क़तील शिफ़ाई)

शाहनवाज़ जी! वाह.. क्या बात कही आपने। अपनी आमद महफ़िल में ऐसे हीं बनाए रखिएगा:

देख के मेरे घर का रस्ता "जुगनू" भी छुप जाता है.
आसमान का हर तारा घर झांक के तेरे आता है.

शन्नो जी, आप हमेशा हीं यही सोच बैठती हैं कि कोई न कोई(ज्यादातर मैं हीं) आपसे नाराज़ हैं। जबकि ऐसा कभी नहीं होता। अंतर्जाल की इस दुनिया में लोग पल भर को मिलते हैं और अगर इस दौरान कोई नाराज़ हीं हो जाए, तो फिर मिलने-मिलाने का मज़ा तो जाता रहेगा। इसलिए आगे से अपने दिमाग में यह वहम पैदा मत होने दीजिएगा। और खुलकर शेर शेयर करते रहिएगा, जैसे कि आज किया है:

फूलों और पातों में आकर छिप जाते हैं
ये जुगनू रोशनी देकर खुद जल जाते हैं.

शरद जी, इस बार आपका शेर कुछ ढीला रह गया। मुझे आपसे एक जबर्दस्त शेर की उम्मीद थी। खैर फिर कभी:

अंधेरा जब भी गहराता है जुगनू याद आते है
चमक दिखला के वो हमको पता अपना बताते हैं । (स्वरचित)

हमें शौक जुगनू पकड़ने का था,
अंधेरों के यूँ हीं सफ़र कट गए। (शकूर अनवर)

अवध जी, आपका किन लफ़्ज़ों में शुक्रिया अदा करूँ। दर-असल गलती मेरी हीं थी, मुझे कुछ और शोध कर लेना चाहिए था, फिर मैं "चचा-जान" की जगह "रिश्तेदार" नहीं लिखता। आप जैसे सुधि-पाठक हों तो लिखने का मज़ा दूना हो जाता है।

अवनींद्र जी, आपने तो पूरी की पूरी गज़ल हीं लिख डालीं। अब मैं तो उस गज़ल से अपने काम का हीं शेर लूँगा :)

ये चांदनी पत्तों पे ढल रही है या
तेरी याद का जुगनू चमक रहा है !

सुमित जी, फिर से वही जल्दी-बाजी। शायर का नाम तो डालते जाते:

मैं ना जुगनू हूँ, दिया हूँ , ना कोई तारा हूँ,
रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यूँ हैं।

मस्त-कलंदर जी, महफ़िल में खाली हाथ नहीं आते :) अगली बार, आपसे एक शेर की उम्मीद रहेगी।

नीलम जी, वल्लाह! आपके इस शेर के क्या कहने। वैसे शायर कौन है? :)

मेरी झोली में जुगनुओं कि वो सौगात लाता
यूँ ही नहीं उसकी किस्मत में अहबाब आता

मंजु जी, यादों के जुगनू आपने भी पकड़े हैं शायद.... तभी तो ये खयाल हैं:

तेरे यादों के जुगनू ने रूला दिया,
बिन सावन के बरसात को बुला लिया।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Friday, June 19, 2009

एक दो तीन आजा मौसम है रंगीन....रंगीन मौसम को और रंगीन किया शमशाद बेगम ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 116

मारी फ़िल्मों में कुछ चरित्र ऐसे होते हैं जो मूल कहानी के पात्र तो नहीं होते लेकिन जिनकी उपस्तिथि फ़िल्म को और ज़्यादा मनोरंजक बना देती है। इस तरह के चरित्र को निभाने में फ़िल्म जगत के कई छोटे बड़े कलाकारों का हमेशा से हाथ रहा है। इनमें से कुछ हास्य कलाकार हैं तो कुछ नृत्यांगनायें, और कुछ सामान्य चरित्र अभिनेतायें। आज हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में पहली बार ज़िक्र कर रहे हैं एक ऐसी ही चरित्र अभिनेत्री का जिन्होने अपनी नृत्य कला के ज़रिये, ख़ासकर ४० और ५० के दशकों में, दर्शकों के दिलों पर राज किया। हम बात कर रहे हैं अभिनेत्री कुक्कू (Cuckoo) की। आज सुनिये इन्ही पर फ़िल्माया हुआ राज कपूर की फ़िल्म 'आवारा' का गीत "एक दो तीन आजा मौसम है रंगीन"। आज जब मौका हाथ लगा है तो क्यों न आपको इस अभिनेत्री और नर्तकी के बारे में थोड़ी विस्तार से बताया जाये! कुक्कू का ३० सितम्बर १९८१ को केवल ५२ वर्ष की आयु में फ़ेफ़ड़े के केन्सर के कारण निधन हो गया था। वो अविवाहित 'प्रोटेस्टेण्ट' थीं। सन् १९४६ की 'अरब का सितारा' एवं 'सर्कस किंग' फ़िल्मों से अपना फ़िल्मी जीवन शुरु करने के बाद सन् १९४७ की 'मिर्ज़ा साहिबाँ' के गीत "सामने गली में मेरा घर है" पर नृत्य करके उनकी ख्याती चारों ओर फैल गयी। और उसके बाद तो कुक्कू ने अनगिनत फ़िल्मों में नृत्य किये। एक समय ऐसा भी था जब उनके नृत्य के बग़ैर बनने वाली फ़िल्म अधूरी समझी जाती थी। सन्‍ '४८ से '५२ तक उन्होने फ़िल्मों में अपने नृत्य की धूम मचा दी थी जिनमें अनोखी अदा, अंदाज़, चांदनी रात, शायर, आरज़ू, परदेस, अफ़साना, आवारा, हलचल, आन, साक़ी तथा अनेकों फ़िल्में शामिल हैं। कुल मिलाकार कुक्कू ने लगभग ११८ फ़िल्मों में अभिनय किया। दोस्तों, ये जानकारियाँ मैने खोज निकाली 'लिस्नर्स बुलेटिन' पत्रिका के एक बहुत ही पुरानी अंक से जो प्रकाशित हुई थी सन् १९८१ में और यह लेख कुक्कू पर छपा था उन्हें श्रद्धांजली स्वरूप।

फ़िल्म 'आवारा' का प्रस्तुत गीत गाया है शमशाद बेग़म ने। शमशाद बेग़म और राज कपूर के साथ की अगर बात करें तो सन्‍ १९४७ मे जब राज कपूर ने आर.के. फ़िल्म्स की स्थापना की और १९४८ में अपनी पहली फ़िल्म 'आग' बनाने की सोची, तो वो शमशादजी के पास गए और अपना परिचय देते हुए उनसे अपनी फ़िल्म में गाने का अनुरोश किया। शमशादजी राज़ी हो गयीं और संगीतकार राम गांगुली के संगीत में वह मशहूर गीत बनी - "काहे कोयल शोर मचाये रे, मोहे अपना कोई याद आये रे"। यह गीत मशहूर हुआ था और आज भी विविध भारती के 'भूले बिसरे गीत' में अक्सर सुनाई दे जाता है। राज कपूर और शमशाद बेग़म का साथ ज़्यादा दूर तक नहीं चल पाया क्योंकि बहुत जल्द ही राज साहब ने अपनी नयी टीम बना ली और उसमें मुख्य गायिका के रूप में लताजी को उन्होने अपना लिया। यहाँ पे यह बताना भी ज़रूरी है कि नरगिस के लिए शुरु शुरु में शमशादजी की ही आवाज़ ली जाती थी, लेकिन लताजी के आने के बाद लताजी बन गयीं नरगिस की पार्श्व-आवाज़। फ़िल्म 'आवारा' में शमशाद बेग़म ने केवल एक गीत गाया था जिसे जैसा कि हमने बताया, चरित्र अभिनेत्री कुक्कू पर फ़िल्माया गया था। शैलेन्द्र का लिखा यह गीत "एक दो तीन आजा मौसम है रंगीन" अपने आप में एक अनोखा गीत है क्योंकि शैलेन्द्र ने इस तरह के गाने बहुत कम लिखे हैं, लेकिन शमशाद बेग़म ने इस तरह के गाने ख़ूब गाये हैं। इस गीत का संगीत और बीट्स पाश्चात्य हैं जो आपके पैरों को थिरकने पर मजबूर कर देता है। सुनिए और झूमिए।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. इस फिल्म के संगीतकार ने पहली बार इस फिल्म में स्वतंत्र संगीत निर्देशन किया था.
२. रफी और गीता दत्त की युगल आवाजों में है ये गीत.
३. जॉनी वाकर और गीता बाली पर फिल्माए इस गीत में मुखड़े में शब्द है -"गली".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
कल तो कमाल हो गया. शरद जी और स्वप्न मंजूषा जी ने लगभग एक ही साथ बज्ज़र हिट किया और दोनों ने ही सही जवाब दिया. कुछ सेकंडों के फर्क को दरकिनार करते हुए कल की पहेली के लिए दोनों को विजेता मान कर हम २-२ अंक दे रहे हैं. इस तरह शरद का स्कोर हो गया १६ और मंजूषा जी का ८. आधे अंकों का फर्क रह गया है :). सुमित जी, रचना जी, पराग जी, नीलम जी, राज भाटिया जी, शामिक फ़राज़ जी, आप सब का भी आभार. राज सिंह जी हमें भी उम्मीद है कि शरद जी के पसंदीदा गीत हम सब जल्द ही सुनेंगें.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Friday, June 5, 2009

आवारा हूँ...या गर्दिश में हूँ आसमान का तारा हूँ....कभी कहा था खुद राज कपूर ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 102

'ओल्ड इज़ गोल्ड' मे चल रहा है 'राज कपूर विशेष'। कल के अंक मे राज कपूर के शुरूआती दिनों का ज़िक्र करते हुए हम आ पहुँचे थे सन् १९४९ की फ़िल्म 'बरसात' तक। 'बरसात' के गीतों से शंकर जयकिशन, शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी के गीतों की ऐसी बरसात शुरु हुई जो अगले तीन दशकों तक लगातार चलती रही और उस बरसात का हर एक बूँद जैसे एक अनमोल मोती बनकर बरसी। उधर चारली चैपलिन की छाप राज कपूर के 'मैनरिज़्म' पर पड़ी और वो कहलाये 'इंडियन चैपलिन'। उनके इस अंदाज़ की पहली फ़िल्म थी सन् १९५१ की 'आवारा'। उनकी यही 'इमेज' आज भी हमारी आँखों में बसी हुईं हैं। और उनके इसी चैपलिन वाले अंदाज़ को इस फ़िल्म के शीर्षक गीत मे भी उभारा गया और यही गीत आज सुनिए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' मे गायक मुकेश की आवाज़ मे। 'आवारा' पहली फ़िल्म थी जिसमें राज कपूर और उनके पिता पृथ्वीराज कपूर साथ साथ परदे पर नज़र आये थे। और दोस्तों यही वह फ़िल्म थी जिसने राज कपूर और नरगिस की जोड़ी को घर घर में लोकप्रिय बना दिया था और फ़िल्म इतिहास की पहली लोकप्रिय 'ऑन-स्क्रीन' जोड़ी के रूप में सामने आयी। 'बरसात' के बाद 'आवारा' में शैलेन्द्र, हसरत जयपुरी, शंकर जयकिशन, मुकेश और लता मंगेशकर एक बार फिर इकट्ठे हुए और एक बार फिर से वही संगीतमय कामियाबी की कहानी दोहरायी गयी।

राज कपूर और मुकेश के साथ के बारे मे शायद मुझे कुछ कहने की ज़रूरत नही है। बस इतना ही कहूँगा कि अगर राज कपूर काया थे तो मुकेश उनकी छाया। अमीन सायानी द्वारा प्रस्तुत 'संगीत के सितारों की महफ़िल' शृंखला मे मुकेश पर केन्द्रित कार्यक्रम मे अमीन भाई ने उनके किसी पुराने साक्षात्कार की झलकियाँ पेश की थी जिसमे मुकेश ने राज कपूर के बारे मे कुछ बातें कहे थे, वही मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ - "जिस मोती के बारे मे मै आज ज़िक्र कर रहा हूँ अमीन भाई, उस मोती का नाम है राज कपूर। और मैं राज के ज़िंदगी से ही तीन हिस्से पेश करूँगा। बिल्कुल साफ़ है अमीन भाई, पहले हिस्से को कहूँगा 'आग', दूसरे को 'बरसात से संगम', और तीसरे को 'जोकर से बॉबी'। मैं उस ज़माने की बात कर रहा हूँ जब रणजीत स्टूडियो के अंदर हम लोग 'ट्रेनिंग‍' किया करते थे। राज कपूर को लेकर चंदुलालजी के पास आये पापाजी। पापाजी यानी कि पृथ्वीराज साहब। और कहने लगे कि 'देखिये, यह मेरे साहबज़ादे हैं, यह फ़िल्म मे जाना चाहता है, और मै चाहूँगा कि यह 'फ़िल्म-मेकिंग‍' के हर एक 'ब्रांच' को सीखे और कुली के काम से शुरु करे'। अमीन भाई, ऐसा है कि पापाजी ने राज मे कुछ गुण तो देख ही लिये थे पृथ्वी थियटर्स मे काम करते वक़्त, तो वो चाहते थे कि जब यह फ़िल्म मे जा ही रहा है तो पूरी पूरी तरह से सारा काम सीखे। तो वो बन गये वहाँ किदार शर्मा साहब के सहायक। वह क्या था कि शर्मा जी ने सहायक के अंदर 'हीरो' भी देख लिया, और शर्माजी ने उन्हे 'नीलकमल' मे 'हीरो' बना दिया।" दोस्तों, मुकेश की बातें अभी ख़त्म नही हुईं हैं, आगे का हिस्सा जारी रहेगा कल के अंक मे। लीजिए अब आज का गीत सुनिए, मुकेश की आवाज़, शैलेन्द्र के बोल, और एक बार फिर राग भैरवी का इस्तेमाल शंकर जयकिशन के संगीत में।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. राज कपूर की इस फिल्म में शंकर जयकिशन का संगीत नहीं था.
२. इस फिल्म के लेखक थे ख्वाजा अहमद अब्बास.
३. मुखड़े में शब्द है -"झूठ".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी बहुत अच्छे. ४ अंकों के साथ आपने बढ़त बना ली है. नीलम जी, रचना जी, मनु जी और फ़राज़ जी जवाब तो सही है पर शरद जी सी फुर्ती भी दिखाईये ज़रा.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


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