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Sunday, August 13, 2017

राग मीरा और रामदासी मल्हार : SWARGOSHTHI – 330 : RAG MIRA & RAMDASI MALHAR




स्वरगोष्ठी – 330 में आज

पावस ऋतु के राग – 5 : राग मीरा और रामदासी मल्हार

उस्ताद अमीर खाँ से रामदासी और वाणी जयराम से मीरा मल्हार की रचनाएँ सुनिए




उस्ताद अमीर  खाँ
वाणी जयराम
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पावस ऋतु के राग” की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हम अपने सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन की रिकार्ड किये आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में हम मल्हार अंग के दो रागों मीरा मल्हार अथवा मीराबाई की मल्हार और रामदासी मल्हार पर चर्चा करेंगे। कुछ राग अपने युग के महान संगीतज्ञों, कवियों के नाम पर प्रचलित है। ऐसे ही दो उल्लेखनीय राग है- भक्त कवयित्री मीराबाई द्वारा रचित राग मीरा मल्हार और संगीत-नायक रामदास द्वारा रचित राग रामदासी मल्हार। इन ऋतु प्रधान रागों में निबद्ध रचनाओं में पावस ऋतु के सजीव चित्रण का गुण तो होता ही है, श्रृंगार, विरह और भक्तिरस के भावों को सम्प्रेषित करने की क्षमता भी होती है। आज हम आपको सबसे पहले राग मीरा मल्हार के स्वरों में निबद्ध 1979 में प्रदर्शित फिल्म “मीरा” से गायिका वाणी जयराम की आवाज़ में कवयित्री मीराबाई का ही एक पद प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग रामदासी मल्हार का शास्त्रीय स्वरूप उपस्थित करने के लिए सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में एक खयाल रचना प्रस्तुत कर रहे हैं।



राग मीरा मल्हार : ‘बादल देख डरी...’ : वाणी जयराम : संगीत – पं. रविशंकर : फिल्म – मीरा
राग रामदासी मल्हार : ‘छाए बदरा कारे कारे...’ : उस्ताद अमीर खाँ 



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 330वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1976 में प्रदर्शित एक हिन्दी फिल्म से लिये गए एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह मल्हार अंग का कौन सा राग है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 19 अगस्त, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 332वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 328वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1967 में प्रदर्शित फिल्म ‘रामराज्य’ से राग आधारित गीत का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – सूर मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – लता मंगेशकर

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में तीन में से दो प्रश्नों का सही उत्तर देकर लखनऊ की विनुषी कारीढाल ने पूरे दो अंक अर्जित किये हैं। पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे अन्य नियमित प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला “पावस ऋतु के राग” जारी है। इस श्रृंखला ऋतु प्रधान गीतो को प्रस्तुत किया जा रहा है। आज की इस कड़ी में हमने आपके लिए राग मीरा मल्हार और रामदासी मल्हार पर चर्चा की। आगामी अंक में हम मल्हार अंग के किसी और राग पर चर्चा करेंगे और इस राग में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी जारी श्रृंखला और आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 


Sunday, August 23, 2015

राग आसावरी और तोडी : SWARGOSHTHI – 233 : RAG ASAVARI & TODI




स्वरगोष्ठी – 233 में आज

रागों का समय प्रबन्धन – 2 : दिन के दूसरे प्रहर के राग

‘ए री मैं तो प्रेम दीवानी मेरो दरद न जाने कोय...’





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारे नई श्रृंखला- ‘रागों का समय प्रबन्धन’ की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। है। उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर को दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर को रात्रि के प्रहर कहे जाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा करेंगे। श्रृंखला की दूसरी कड़ी में आज हम आपसे दिन के द्वितीय प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के प्रमुख राग आसावरी की एक बन्दिश सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही राग तोड़ी पर आधारित, फिल्म ‘मीरा’ का एक गीत वाणी जयराम की आवाज़ में सुनवा रहे हैं।

 
भारतीय संगीत की एक प्रमुख विशेषता यह है कि प्रत्येक राग के गाने-बजाने का एक निश्चित समय माना गया है। शास्त्रकारों ने विभिन्न स्वर-समूहों से उपजने वाले भावों, अपने अनुभव, और मनोवैज्ञानिक आधार पर विभिन्न रागों के प्रयोग का समय निर्धारित किया है। राग के समय निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त बनाए गए है। इस समय-चक्र सिद्धान्त के अनुसार ही रागों का गायन-वादन किया जाता है। कुछ राग इस सिद्धान्त के अपवाद भी हैं तो कुछ राग सार्वकालिक भी हैं। इसी प्रकार कुछ राग सन्धिप्रकाश बेला में ही गाये-बजाए जाते हैं तो कुछ राग केवल ऋतु विशेष पर ही भले लगते हैं। समय के अनुसार रागों को दिन और रात के कुल आठ प्रहरों में बाँटे गए हैं। पिछले अंक में हमने दिन के प्रथम प्रहर के रागों पर चर्चा की थी और आपको सुबह के दो राग, भैरव और बिलावल का रसास्वादन कराया था। आज हम आपको दिन के दूसरे प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे। दिन का दूसरा प्रहर प्रातः 9 से मध्याह्न 12 बजे तक माना जाता है।

शास्त्रकारों ने रागों के समय-निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त निश्चित किये हैं। इन्हीं में से एक सिद्धान्त है, “अध्वदर्शक स्वर”। इस सिद्धान्त के अनुसार राग का मध्यम स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार राग में यदि तीव्र मध्यम स्वर की उपस्थिति हो तो वह राग दिन और रात्रि के पूर्वार्द्ध में गाया-बजाया जाएगा। अर्थात, तीव्र मध्यम स्वर वाले राग 12 बजे दिन से रात्रि 12 बजे के बीच ही गाये-बजाए जा सकते हैं। इसी प्रकार राग में यदि शुद्ध मध्यम स्वर हो तो वह राग रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच का अर्थात उत्तरार्द्ध का राग माना गया। कुछ राग इस सिद्धान्त के अपवाद भी होते हैं, जैसे- बसन्त, तोड़ी, भीमपलासी, देस आदि। दिन के दूसरे प्रहार का एक अत्यन्त लोकप्रिय राग आसावरी है। इस राग में तीन कोमल स्वर, गान्धार, धैवत और निषाद का प्रयोग किया जाता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। राग आसावरी में शुद्ध मध्यम स्वर की उपस्थिति होने से अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार यह राग मध्याह्न 12 बजे से पूर्व गाया-बजाया जा सकता है। यह औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है, जिसका वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। अब हम आपके लिए संगीत-मार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर का गाया राग आसावरी प्रस्तुत करते हैं। तीनताल में निबद्ध इस बन्दिश में आपको पण्डित बलवन्त राव भट्ट के कण्ठ–स्वर और विदुषी एन. राजम् की वायलिन संगति का आनन्द भी मिलेगा।


राग आसावरी : ‘सजन घर लागे...’ : पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर




राग आसावरी के अलावा दिन के दूसरे प्रहर के कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- कोमल देसी, खट, गानधारी, गारा, गौड़ सारंग, जौनपुरी, देव गान्धार, देसी, बरवा, बिलासखानी तोड़ी, गुर्जरी तोड़ी, तोड़ी, मध्यमात सारंग, मियाँ की सारंग, शुद्ध सारंग, सामन्त सारंग, वृन्दावनी सारंग, सुघराई आदि। आज के अंक में दूसरे प्रहर के रागों में से हमने राग तोड़ी का चयन इसलिए किया है कि इस राग में तीव्र मध्यम स्वर का प्रयोग होता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार तीव्र मध्यम स्वर वाले राग मध्याह्न 12 बजे से मध्यरात्रि 12 के बीच प्रयोग किये जाने चाहिए। परन्तु यह राग इस सिद्धान्त का अपवाद है। राग तोड़ी में तीन कोमल स्वरों- ऋषभ, गान्धार, और धैवत की उपस्थिति के कारण दिन के दूसरे प्रहर मे गाने-बजाने कि परम्परा है। राग तोड़ी सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इस राग में मध्यम स्वर तीव्र तथा ऋषभ, गान्धार और धैवत स्वर कोमल प्रयोग होते हैं। अन्य सभी स्वर शुद्ध लगते हैं। राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। यह तोड़ी थाट का आश्रय राग है। राग तोड़ी की झलक पाने के लिए अब हम आपको फिल्म ‘मीरा’ से मीराबाई का एक भक्तिपद सुनवा रहे हैं।

मीराबाई का जन्म 1498ई. में माना जाता है। मीरा राजस्थान के मेड़ता राज परिवार की राजकुमारी थीं। सात वर्ष की आयु में एक महात्मा ने उन्हें श्रीकृष्ण की एक मूर्ति दी। कृष्ण के उस स्वरूप पर वे इतनी मुग्ध हो गईं कि उन्हें अपना आराध्य और पति मान लिया। 1516ई. में मीरा का विवाह चित्तौड़ के शासक राणा सांगा के पुत्र भोजराज के साथ हुआ। परन्तु कृष्णभक्ति के प्रति समर्पित रहने और साधु-संतों के बीच समय व्यतीत करने के कारण उनका गृहस्थ जीवन कभी भी सफल नहीं रहा। मीरा वैष्णव भक्तिधारा की प्रमुख कवयित्री मानी जाती है। उनके रचे हुए लगभग 1300 पद हमारे बीच आज भी उपलब्ध हैं। उनके पदों में राजस्थानी बोली के साथ ब्रज भाषा का मिश्रण है। कुछ विद्वान मानते हैं कि मीरा के भक्तिकाव्य पर उनके समकालीन संगीत सम्राट तानसेन, चित्तौड़ के गुरु रविदास और गोस्वामी तुलसीदास का प्रभाव है। उनके रचे असंख्य पदों में से आज के अंक के लिए हमने जो पद चुना है, वह है- ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय...’। गीतकार गुलज़ार द्वारा 1979 में निर्मित फिल्म ‘मीरा’ में शामिल यह भक्ति रचना है। फिल्म का संगीत निर्देशन विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित रविशंकर ने किया था। पण्डित जी ने मीरा के इस पद में निहित करुणा मिश्रित भक्तिभाव की अभिव्यक्ति के लिए राग तोड़ी के स्वरों का चयन किया था। आप यह पद गायिका वाणी जयराम की आवाज़ में सुनिए और करुण और भक्तिरस के मिश्रण की अनुभूति कीजिए। रचना रूपक ताल में निबद्ध है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग तोड़ी : ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी...’ : वाणी जयराम ; फिल्म मीरा





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 233वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इस गीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 240 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि आपको किस राग की झलक मिलती है?

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गायिका की आवाज़ को पहचान सकते हैं? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 29 अगस्त, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 235वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 231वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1956 में प्रदर्शित फिल्म ‘जागते रहो’ के एक गीत का अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग - भैरव, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका – लता मंगेशकर

इस बार की पहेली में पहली बार तीनों प्रश्नों के सही उत्तर देने वाली प्रतिभागी हैं, नई दिल्ली की अनुपमा त्रिपाठी। अनुपमा जी, ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आपका हार्दिक स्वागत है। तीनों प्रश्नों के सही उत्तर देने वाली हमारी नियमित प्रतिभागी हैं, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और जबलपुर से क्षिति तिवारी। पाँचो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी लघु श्रृंखला ‘रागों का समय प्रबन्धन’ जारी है। अगले अंक में हम दिन के तीसरे प्रहर के कुछ रागों पर चर्चा करेंगे और आपको कुछ रागबद्ध रचनाएँ भी सुनवाएँगे। इस श्रृंखला के लिए आप अपने पसन्द के गीत, संगीत और राग की फरमाइश कर सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


 

Sunday, July 19, 2015

रामदासी और मीरा मल्हार : SWARGOSHTHI – 228 : RAMDASI AND MEERA MALHAR



स्वरगोष्ठी – 228 में आज


रंग मल्हार के – 5 : राग रामदासी और मीराबाई की मल्हार

‘छाए बदरा कारे कारे...’ और ‘बादल देख डरी...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’। श्रृंखला की पाँचवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा कर रहे हैं। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत कर रहे हैं। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। श्रृंखला की इस पाँचवीं कड़ी में आज हम आपसे राग रामदासी और मीराबाई की मल्हार के बारे में चर्चा करेंगे। आज के अंक में हम आपके लिए सुविख्यात गायक उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में राग रामदासी मल्हार में एक आकर्षक रचना प्रस्तुत करेंगे, जिसके बोल हैं- ‘छाए बदरा कारे कारे...’। इसके साथ ही आपको 1979 में प्रदर्शित गुलज़ार की फिल्म ‘मीरा’ का एक गीत सुनवा रहे है, जिसे संगीतकार पण्डित रविशंकर ने राग मीरा मल्हार अथवा मीराबाई की मल्हार में निबद्ध किया था। 



बाहर पावस की रिमझिम फुहार और आपकी ‘स्वरगोष्ठी’ में मल्हार अंग के रागों की स्वर-वर्षा जारी है। ऐसे ही सुहाने परिवेश में ‘वर्षा ऋतु के राग और रंग’ श्रृंखला के अन्तर्गत आज प्रस्तुत है, मल्हार अंग के दो रागों- रामदासी और मीराबाई की मल्हार के स्वरों से अनुगूँजित कुछ चुनी हुई संगीत-रचनाएँ। दोनों रागों के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि इनका नामकरण संगीत और भक्ति संगीत के मनीषियों के नामों पर हुआ है। पहले हम राग रामदासी मल्हार के बारे में आपसे चर्चा करेंगे। काफी थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला राग रामदासी मल्हार, दोनों गान्धार तथा दोनों निषाद से युक्त होता है। इसकी जाति वक्र सम्पूर्ण होती है। अवरोह में दोनों गान्धार का प्रयोग वक्र रूप से करने पर राग का सौन्दर्य निखरता है। शुद्ध गान्धार के प्रयोग से यह राग मल्हार के अन्य प्रकारों से अलग हो जाता है। इसका वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यह राग वर्षा ऋतु के परिवेश का सजीव चित्रण करने में समर्थ होता है, इसलिए इस ऋतु में रामदासी मल्हार का गायन-वादन किसी भी समय किया जा सकता है। 

राग रामदासी मल्हार का सृजन ग्वालियर के विद्वान नायक रामदास ने की थी। इस तथ्य का समर्थन विख्यात संगीतज्ञ मल्लिकार्जुन मंसूर द्वारा किया गया है। उनके मतानुसार नायक रामदास मुगल बादशाह अकबर से भी पूर्व काल में थे। सुप्रसिद्ध विद्वान और ग्रन्थकार हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक ‘राग परिचय’ के चौथे भाग में इस राग के सृजन के लिए काशी के सुप्रसिद्ध संगीतविद बड़े रामदास को श्रेय दिया है। राग रामदासी मल्हार में शुद्ध गान्धार के उपयोग से उसका स्वरूप मल्हार अंग से अलग व्यक्त होता है। राग का प्रस्तार वक्र गति से किया जाता है, जैसे- सा रे प ग म, प ध नि ध प, म प ग म, प ग(कोमल) म रे सा...। आजकल यह राग अधिक प्रचलन में नहीं है। इस राग का स्वरूप अत्यन्त मधुर होता है। मल्हार के म रे और रे प का स्वरविन्यास इस राग में बहुत लिया जाता है। इस राग के गायन-वादन में राग शहाना और गौड़ की झलक भी मिलती है। आइए, अब हम आपको किराना घराने के सुविख्यात गायक उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में राग रामदासी मल्हार का तीनताल में निबद्ध एक खयाल सुनवाते हैं।


राग रामदासी मल्हार : 'छाए बदरा कारे कारे...' : उस्ताद अमीर खाँ 




आज का द्दूसरा राग है, मीरा मल्हार अथवा मीराबाई की मल्हार। यह भी मल्हार अंग का राग है। यह माना जाता है कि इस राग की रचना सुप्रसिद्ध भक्त कवयित्री मीराबाई ने की थी। यह काफी थाट का सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इस राग के आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। राग मीरा मल्हार में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर के दोनों रूप (शुद्ध और कोमल) प्रयोग किये जाते हैं। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इससे पूर्व आपने राग रामदासी मल्हार के जिस रचना का रसास्वादन किया है, उसमें और राग मीरा मल्हार के थाट, जाति, वादी और संवादी समान होते हैं। आरोह और अवरोह के स्वर भी लगभग समान होते हैं। केवल कोमल धैवत स्वर का अन्तर होता है। राग रामदासी मल्हार में केवल शुद्ध धैवत का प्रयोग होता है, जबकि राग मीरा मल्हार में दोनों धैवत का प्रयोग किया जाता है। आमतौर पर राग मीरा मल्हार के गायन-वादन का समय मध्यरात्रि माना जाता है, किन्तु वर्षा ऋतु में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। राग के स्वरूप का अनुभव करने के लिए अब हम आपको 1979 में प्रदर्शित गुलज़ार की फिल्म ‘मीरा’ से एक गीत सुनवा रहे हैं। यह गीत ही नहीं, बल्कि इस राग की संरचना भी स्वयं भक्त कवयित्री मीराबाई की है। फिल्म ‘मीरा’ के संगीत पर मैं अपने प्रिय मित्र और फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार सुजॉय चटर्जी के आलेख का एक अंश उद्धृत कर रहा हूँ।

जाने-माने गीतकार गुलज़ार को मीरा के जीवन पर एक फिल्म बनाने का प्रस्ताव मिला। मीराबाई की मुख्य भूमिका में अभिनेत्री हेमामालिनी का और संगीत निर्देशन के लिए लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल का चुनाव पहले ही हो चुका था। फ़िल्म की स्क्रिप्ट तैयार हो जाने के बाद गुलज़ार ने सिटिंग रखी फ़िल्म के संगीतकार लक्ष्मी-प्यारे के साथ। मीराबाई द्वारा लिखी बेशुमार भजनों की चर्चा करते हुए अन्त में कुल 12 भजन छाँट लिए गये जो फ़िल्म में रखे जाने थे। फ़िल्म के निर्माता ने व्यावसायिक पत्रिकाओं में विज्ञापन प्रकाशित कर दिया - 'आज की मीरा' (लता मंगेशकर) 'मीरा' की मुहूर्त शॉट में क्लैप करेंगी। गुलज़ार ने पहला भजन "मेरे तो गिरिधर गोपाल..." को सबसे पहले फ़िल्माने की तैयारी भी कर ली। लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने भजन कम्पोज़ किया और लता जी से सम्पर्क किया रेकॉर्डिंग के लिए। लक्ष्मी-प्यारे जानते थे कि लता जी ना नहीं करेंगी। पर उनके सर पे बिजली आ गिरी जब लता जी ने इसे गाने से इनकार कर दिया। लता जी के अनुसार अभी हाल ही में उन्होंने अपने भाई हृदयनाथ मंगेशकर के लिए मीरा भजनों का एक ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम रेकॉर्ड किया है, इसलिए दोबारा किसी कमर्शियल फ़िल्म के लिए वही भजन नहीं गा सकती। लता जी किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहती थीं। मसला इतना नाज़ुक था कि ना तो गुलज़ार लता जी से इस पर बहस कर सकते थे और एल.पी. का तो सवाल ही नहीं था। हुआ यूँ कि लता जी के ना कहने पर एल. पी ने भी फ़िल्म में संगीत देने से मना कर दिया। उन्हे लगा कि कहीं लता जी उनसे नाराज़ हो गईं और भविष्य में उनके गीत गाने से मना कर देंगी तो वो बरबाद हो जायेंगे। ख़ैर, लता जी के पीछे हट जाने के बाद गुलज़ार ने आशा भोसले से अनुरोध किया। पर आशा जी ने भी यह कहते हुए मना कर दिया कि जहाँ देवता ने पाँव रखे हों, वहाँ फिर मनुष्य पाँव नहीं रखते। अब 'मीरा' की टीम डर गई। न लता है, न आशा, न एल.पी.। गुलज़ार अगर चाहते तो पंचम को संगीतकार बनने के लिए अनुरोध कर सकते थे, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। लता और आशा के गुलज़ार को मना करने पर पंचम वैसे ही शर्मिन्दा थे, गुलज़ार उन्हें और ज़्यादा शर्मिन्दा नहीं करना चाहते थे। और इस तरह से लता, आशा, एल.पी, पंचम - ये दिग्गज इस फ़िल्म से बहुत दूर हो गये।

गुलज़ार ने हार नहीं मानी और सोचने लगे कि ऐसा कौन संगीतकार है जो अपने संगीत के दम पर लता और आशा के बिना भी फ़िल्म के गीतों को सही न्याय और स्तर दिला सकता है! और तभी उन्हें पण्डित रविशंकर का नाम याद आया। पण्डित जी उस समय न्यूयॉर्क में थे; उनसे फोन पर सम्पर्क करने पर उन्होंने बताया कि वो सितम्बर-अक्तूबर में भारत आएँगे और आने के बाद स्क्रिप्ट पढ़ कर अपना फ़ैसला सुनायेंगे। वह जून का महीना था और गुलज़ार इतने दिनों तक इन्तज़ार नहीं कर सकते थे। इसलिए उन्होंने अमरीका का टिकट कटवाया और पहुँच गये पण्डित जी के पास। यह गुलज़ार साहब की पहली अमरीका यात्रा थी। पण्डित जी को स्क्रिप्ट पसन्द आई, पर उस पर काम वो सितम्बर से ही शुरू कर पायेंगे, ऐसा उन्होंने कहा। लेकिन गुलज़ार साहब के फिर से अनुरोध करने पर वो अमरीका में रहते हुए ही धुनों पर काम करने को तैयार हो गये। अभी भी पण्डित जी को थोड़ी सी हिचकिचाहट थी क्योंकि उन्होंने भी लता मंगेशकर वाले विवाद की चर्चा सुनी थी। संयोग से जब गुलज़ार पण्डित जी से मिलने अमरीका गये, उन दिनों लता जी भी वहीं थीं। गुलज़ार साहब और पण्डित जी ने लता जी को फ़ोन किया और उन्हें सब कुछ बताया तो लता जी ने उनसे कहा कि उन्हें फ़िल्म 'मीरा' के बनने से कोई परेशानी नहीं है, बस वो ख़ुद इसमें शामिल नहीं होना चाहती। अब इसके बाद पण्डित जी के सामने अगला सवाल था कि कौन सी गायिका इन भजनों को गाने वाली हैं? गुलज़ार के मन में वाणी जयराम का नाम था, पर वो पण्डित जी से यह कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे, यह सोच कर कि वो कैसे रिऐक्ट करेंगे वाणी जयराम का नाम सुन कर। इसलिए गुलज़ार साहब ने ही पण्डित जी से गायिका चुनने को कहा। और पण्डित जी का जवाब था, "वाणी जयराम कैसी रहेगी?"

पण्डित रविशंकर ने "बाला मैं बैरागन हो‍ऊँगी..." को सबसे पहले कम्पोज़ किया। गुलज़ार साहब के अनुसार यह इस फिल्म का सबसे बेहतरीन भजन है। कहते हैं कि "एरी मैं तो प्रेम दीवानी..." कम्पोज़ करते समय पण्डित जी ने कहा था - "जो ट्यून रोशन साहब ने बनायी है 'नौबहार' में, वह दिमाग़ से नहीं जाती। लेकिन मैं अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करूँगा कि कुछ अलग हट कर बनाऊँ"। पर जिस भजन के लिए वाणी जयराम को पुरस्कार मिला, वह था "मेरे तो गिरिधर गोपाल..."। सितम्बर में भारत वापस आने के बाद 'मीरा' के सभी 12 भजन एक के बाद एक 9 दिनों के अन्दर रेकॉर्ड किये गये वाणी जयराम की आवाज़ में। पण्डित जी ने सुबह 9 से रात 9 बजे तक काम करते हुए पूरे अनुशासन के साथ कार्य को समय पर सम्पन्न किया। एक दिन ऐसा हुआ कि पण्डित जी बहुत ही थके हुए से दिख रहे थे। गुलज़ार साहब के पूछने पर उन्होंने बताया कि अगले दिन वो दोपहर 2 बजे से काम शुरू करेंगे। यह कह कर वो निकल गये। अगले दिन पण्डित जी 2 बजे आये, बिल्कुल तरो-ताज़ा दिख रहे थे। जब गुलज़ार साहब ने उनसे इसका ज़िक्र किया तो उन्होंने कहा कि अब वो बहुत ज़्यादा बेहतर महसूस कर रहे हैं क्योंकि उन्होंने लगातार 8 घंटे अपना सितार बजाया है सुबह 4 बजे से बैठ कर; वो इसलिए थके हुए से लग रहे थे क्योंकि कई दिनों से उन्हे अपने सितार को छूने का मौका नहीं मिल पाया था। इस तरह से 'मीरा' के गानें बने। आइए, अब हम आपको इसी फिल्म का एक गीत (मीराबाई का पद) सुनवाते हैं, राग मीरा मल्हार के स्वरों में पिरोया हुआ। अन्य गीतों की तरह इसे वाणी जयराम ने स्वर दिया है और संगीत पण्डित रविशंकर का है। आप मीरा के इस पद का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।


राग मीरा मल्हार : 'बादल देख डरी...' : वाणी जयराम : संगीत - पं. रविशंकर : फिल्म - मीरा  





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 228वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको भारतीय संगीत के सुप्रसिद्ध विद्वान की आवाज़ में दो रागों के मेल से बने एक राग में निबद्ध खयाल का एक अंश सुनवा रहे हैं। इस गीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 230वें अंक के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस अंश में किस राग की झलक है?

2 – गीत के अंश में प्रयोग किये गए ताल को ध्यान से सुनिए और हमें ताल का नाम बताइए।

3 – इस गीत के गायक को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल  swargoshthi@gmail.com  या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 25 जुलाई, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 230वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 226 की संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित भीमसेन जोशी की आवाज़ में प्रस्तुत राग सूर मल्हार की एक बन्दिश का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग सूर मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल द्रुत तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक पण्डित भीमसेन जोशी। इस बार पहेली में हमारी नियमित प्रतिभागियों में वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने तीनों प्रश्नों के सही उत्तर दिये हैं। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘रंग मल्हार के’ जारी है। आज के अंक में आपने राग रामदासी मल्हार और मीरा मल्हार का रसास्वादन किया। श्रृंखला के आगामी अंक में हम आपको मल्हार अंग के कुछ मिश्र रागों को सुनवाएँगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Saturday, August 16, 2014

"मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरो न कोय", जनमाष्टमी पर फ़िल्म 'मीरा' के संगीत से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें


एक गीत सौ कहानियाँ - 38
 

‘मेरे तो गिरिधर गोपाल...’



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 38वीं कड़ी में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पवित्र अवसर पर आज जानिये फ़िल्म 'मीरा' में वाणी जयराम का गाया भजन "मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोय..."।




क्तिरस की फ़िल्मों के इतिहास में 1979 में बनी गुलज़ार की फ़िल्म 'मीरा' का महत्वपूर्ण स्थान है। भले इस फ़िल्म ने बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाबी के झण्डे नहीं गाड़े, पर उत्कृष्ट भक्ति फ़िल्मों की जब जब बात चलेगी, इस फ़िल्म का उल्लेख ज़रूर होगा। इस फ़िल्म के गीतों की गायिका वाणी जयराम की आवाज़ में कुल 12 मीरा भजन हैं -

वाणी जयराम
1. एरी मैं तो प्रेम दीवानी...
2. बाला मैं बैरागन हो‍ऊँगी...
3. बादल देख डरी...
4. जागो बंसीवाले...
5. जो तुम तोड़ो पिया मैं नाही तोड़ूँ रे...
6. करना फ़कीरी फिर क्या दिलगिरी...
7. करुणा सुनो श्याम मेरे...
8. मैं सांवरे के रंग रची...
9. मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोय...
10. प्यारे दर्शन दीजो आज...
11. राणाजी मैं तो गोविन्द के गुन गाऊँ...
12. श्याम माने चाकर राखो जी...


इन सभी भजनों को इस फ़िल्म के लिए स्वरबद्ध किया था सुप्रसिद्ध सितार वादक पण्डित रविशंकर ने। "मेरे तो गिरिधर गोपाल..." के लिए गायिका वाणी जयराम को उस वर्ष फ़िल्मफ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका का पुरस्कार मिला था। वाणी जयराम का गाया एक और भजन "एरी मैं तो प्रेम दीवानी..." भी इस पुरस्कार के लिए नामांकित हुई थी। उस वर्ष अन्य नामांकित गायिकायें थीं, छाया गांगुली (आपकी याद आती रही रात भर - गमन), उषा मंगेशकर (हमसे नज़र तो मिलाओ - इकरार), और हेमलता (मेघा ओ मेघा - सुनैना)।

जिस प्रकार मीराबाई का जीवन मुश्किलों से घिरा रहा, उसी प्रकार फ़िल्म 'मीरा' के निर्माण में भी तरह-तरह की कठिनाइयाँ आती रहीं। पर हर कठिनाई का सामना किया गुलज़ार की पूरी टीम ने और आख़िर में बन कर तैयार हुई 'मीरा'। जब फ़िल्म के निर्माता प्रेमजी और जे. एन. मनचन्दा ने गुलज़ार को इस फ़िल्म को लिखने व निर्देशित करने का निमंत्रण दिया, तब दो कलाकार जो गुलज़ार को पूर्व-निर्धारित मिले वो थे हेमामालिनी और लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल। बाकी कलाकारों का चयन होना बाक़ी था, जो काम गुलज़ार को करना था। गुलज़ार को पता था कि उनकी जो ट्युनिंग पंचम के साथ जमती है, वह एल.पी के साथ नहीं हो सकती, फिर भी प्रेमजी का यह 'मीरा' का प्रस्ताव इतना आकर्षक था कि वो ना नहीं कह सके। वैसे एल.पी के साथ गुलज़ार इससे पहले 'पलकों की छाँव में' फ़िल्म में काम कर चुके थे। गुलज़ार के अनुसार यह फ़िल्म स्वीकार करने का सबसे मुख्य कारण यह था कि 1981 के वर्ष को 'महिला मुक्ति वर्ष' (Women's Liberation Year) के रूप में मनाया जाना था और वो मीराबाई को इस देश की प्रथम मुक्त महिला मानते हैं क्योंकि मीराबाई के अपने उसूल थे, वो अच्छी जानकार थीं, वो बुद्धिमती थीं, वो एक कवयित्री थी, और उन्होंने अपने पति के धर्म को स्वीकार नहीं किया। गुलज़ार मीराबाई के जीवन के आध्यात्मिक अंग को फ़िल्म में रखना तो चाहते थे पर यह भी नहीं चाहते थे कि फ़िल्म केवल उनकी पौराणिक (mythological) छवि को ही दर्शाये। वो तो फ़िल्म को एक ऐतिहासिक फ़िल्म बनाना चाहते थे।

फ़िल्म की स्क्रिप्ट तैयार हो जाने के बाद गुलज़ार ने सिटिंग रखी फ़िल्म के संगीतकार लक्ष्मी-प्यारे के साथ। मीराबाई द्वारा लिखी बेशुमार भजनों की चर्चा करते हुए अन्त में कुल 12 भजन छाँट लिए गये जो फ़िल्म में रखे जाने थे। फ़िल्म के निर्माता ने व्यावसायिक पत्रिकाओं में विज्ञापन प्रकाशित कर दिया - 'आज की मीरा' (लता मंगेशकर) 'मीरा' की मुहूर्त शॉट में क्लैप करेंगी। गुलज़ार ने पहला भजन "मेरे तो गिरिधर गोपाल..." को सबसे पहले फ़िल्माने की तैयारी भी कर ली। एल.पी ने भजन कम्पोज़ किया और लता जी से सम्पर्क किया रेकॉर्डिंग के लिए। लक्ष्मी-प्यारे जानते थे कि लता जी ना नहीं करेंगी। पर उनके सर पे बिजली आ गिरी जब लता जी ने इसे गाने से इनकार कर दिया। लता जी के अनुसार अभी हाल ही में उन्होंने अपने भाई हृदयनाथ मंगेशकर के लिए मीरा भजनों का एक ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम रेकॉर्ड किया है, इसलिए दोबारा किसी कमर्शियल फ़िल्म के लिए वही भजन नहीं गा सकती। लता जी किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहती थीं। मसला इतना नाज़ुक था कि ना तो गुलज़ार लता जी से इस पर बहस कर सकते थे और एल.पी. का तो सवाल ही नहीं था। हुआ यूँ कि लता जी के ना कहने पर एल. पी ने भी फ़िल्म में संगीत देने से मना कर दिया। उन्हे लगा कि कहीं लता जी उनसे नाराज़ हो गईं और भविष्य में उनके गीत गाने से मना कर देंगी तो वो बरबाद हो जायेंगे। ख़ैर, लता जी के पीछे हट जाने के बाद गुलज़ार ने आशा भोसले से अनुरोध किया। पर आशा जी ने भी यह कहते हुए मना कर दिया कि जहाँ देवता ने पाँव रखे हों, वहाँ फिर मनुष्य पाँव नहीं रखते। अब 'मीरा' की टीम डर गई। न लता है, न आशा, न एल. पी। गुलज़ार अगर चाहते तो पंचम को संगीतकार बनने के लिए अनुरोध कर सकते थे, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। लता और आशा के गुलज़ार को मना करने पर पंचम वैसे ही शर्मिन्दा थे, गुलज़ार उन्हें और ज़्यादा शर्मिन्दा नहीं करना चाहते थे। और इस तरह से लता, आशा, एल.पी, पंचम - ये दिग्गज इस फ़िल्म से बहुत दूर हो गये।

गुलज़ार हार नहीं माने, और सोचने लगे कि ऐसा कौन संगीतकार है जो अपने संगीत के दम पर लता और आशा के बिना भी फ़िल्म के गीतों को सही न्याय और स्तर दिला सकता है! और तभी उन्हें पण्डित रविशंकर का नाम याद आया। पंडित जी उस समय न्यूयॉर्क में थे; उनसे फोन पर सम्पर्क करने पर उन्होंने बताया कि वो सितम्बर-अक्तूबर में भारत वापस आने के बाद स्क्रिप्ट पढ़ेंगे और उसके बाद ही अपना फ़ैसला सुनायेंगे। वह जून का महीना था और गुलज़ार इतने दिनों तक इन्तज़ार नहीं कर सकते थे। इसलिए उन्होंने अमरीका का टिकट कटवाया और पहुँच गये पण्डित जी के पास। यह गुलज़ार साहब की पहली अमरीका यात्रा थी। पण्डित जी को स्क्रिप्ट पसन्द आई, पर उस पर काम वो सितम्बर से ही शुरू कर पायेंगे, ऐसा उन्होंने कहा। लेकिन गुलज़ार साहब के फिर से अनुरोध करने पर वो अमरीका में रहते हुए ही धुनों पर काम करने को तैयार हो गये। अभी भी पण्डित जी को थोड़ी सी हिचकिचाहट थी क्योंकि उन्होंने भी लता मंगेशकर वाले विवाद की चर्चा सुनी थी। संयोग से जब गुलज़ार पण्डित जी से मिलने अमरीका गये, उन दिनों लता जी भी वहीं थीं। गुलज़ार साहब और पण्डित जी ने लता जी को फ़ोन किया और उन्हें सब कुछ बताया तो लता जी ने उनसे कहा कि उन्हें फ़िल्म 'मीरा' के बनने से कोई परेशानी नहीं है, बस वो ख़ुद इसमें शामिल नहीं होना चाहती। अब इसके बाद पण्डित जी का अगला सवाल था कि कौन सी गायिका इन भजनों को गाने वाली हैं? गुलज़ार के मन में वाणी जयराम का नाम था, पर वो पण्डित जी से यह कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे, यह सोच कर कि वो कैसे रिऐक्ट करेंगे वाणी जयराम का नाम सुन कर। इसलिए गुलज़ार साहब ने ही पण्डित जी से गायिका चुनने को कहा। और पण्डित जी का जवाब था, "वाणी जयराम कैसी रहेगी?"


पण्डित रविशंकर ने "बाला मैं बैरागन हो‍ऊँगी..." को सबसे पहले कम्पोज़ किया। गुलज़ार साहब के अनुसार यह इस ऐल्बम का सबसे बेहतरीन भजन है। कहते हैं कि "एरी मैं तो प्रेम दीवानी..." कम्पोज़ करते समय पण्डित जी ने कहा था - "जो ट्यून रोशन साहब ने बनायी है 'नौबहार' में, वह दिमाग़ से नहीं जाती। लेकिन मैं अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करूँगा कि कुछ अलग हट कर बनाऊँ"। पर जिस भजन के लिए वाणी जयराम को पुरस्कार मिला, वह था "मेरे तो गिरिधर गोपाल..."। सितम्बर में भारत वापस आने के बाद 'मीरा' के सभी 12 भजन एक के बाद एक 9 दिनों के अन्दर रेकॉर्ड किये गये वाणी जयराम की आवाज़ में। पण्डित जी सुबह 9 से रात 9 बजे तक काम करते हुए पूरे अनुशासन के साथ कार्य को समय पर सम्पन्न किया। एक दिन ऐसा हुआ कि पण्डित जी बहुत ही थके हुए से दिख रहे थे। गुलज़ार साहब के पूछने पर उन्होंने बताया कि अगले दिन वो दोपहर 2 बजे से काम शुरू करेंगे। यह कह कर वो निकल गये। अगले दिन पंडित जी 2 बजे आये, बिल्कुल तरो-ताज़ा दिख रहे थे। जब गुलज़ार साहब ने उनसे इसका ज़िक्र किया तो उन्होंने कहा कि अब वो बहुत ज़्यादा बेहतर महसूस कर रहे हैं क्योंकि उन्होंने लगातार 8 घंटे अपना सितार बजाया है सुबह 4 बजे से बैठ कर; वो इसलिये थके हुए से लग रहे थे क्योंकि कई दिनों से उन्हे अपने सितार को छूने का मौका नहीं मिल पाया था। इस तरह से 'मीरा' के गानें बने। यह सच है कि फ़िल्म के ना चलने पर इन भजनों के तरफ़ ज़्यादा लोगों का ध्यान नहीं गया और ना ही रेडियो पर ये भजन लोकप्रिय कार्यक्रमों में सुनाई पड़े। पर लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल और लता मंगेशकर अगर इस फ़िल्म से जुड़ते तो क्या इस फ़िल्म का व्यावसायिक अंजाम कुछ और होता, यह अब कह पाना बहुत मुश्किल है।

आइए, अब हम मीरा का यही पद सुनते हैं। फिल्म में यह भक्तिगीत दो बार प्रस्तुत हुआ है। पहली बार महल में यह गीत रचते हुए दिखाया गया है और दूसरी बार मन्दिर में भक्तों के बीच मीरा इसे गातीं हैं। किंवदन्तियों के अनुसार बादशाह अकबर, तानसेन के साथ वेश बदल कर इस मन्दिर में मीरा का भजन सुनने आते हैं। तानसेन खुद को रोक नहीं पाते और गीत की अंतिम पंक्ति पहले एकल और फिर मीरा के साथ युगल रूप में गाने लगते हैं। तानसेन के लिए यह पुरुष कण्ठ-स्वर सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पण्डित दिनकर कैंकणी ने दिया है। पण्डित रविशंकर ने मीरा का यह पद राग खमाज के स्वरों में बाँधा है।

फिल्म - मीरा : 'मेरे तो गिरिधर गोपाल...' : वाणी जयराम और पण्डित दिनकर कैंकणी : संगीत - पण्डित रविशंकर 

  

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खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

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