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Saturday, December 25, 2010

ई मेल के बहाने यादों के खजाने (२२), सभी श्रोताओं को क्रिसमस की शुभकामनाएँ

नमस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' शनिवार विशेष की २२ वीं कड़ी में आप सभी का स्वागत है। आप सभी को क्रिस्मस की बहुत बहुत शुभकामनाएँ। इस साप्ताहिक विशेषांक में अधिकतर समय हमने 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' पेश किया, जिसमें आप ही के भेजे हुए ईमेल शामिल हुए और कई बार हमने नामचीन फ़नकारों से संपर्क स्थापित कर फ़िल्म संगीत के किसी ना किसी पहलु का ज़िक्र किया। आज हम आ पहुँचे हैं इस साप्ताहिक शृंखला की २०१० वर्ष की अंतिम कड़ी पर। तो आज हम अपने जिस दोस्त के ईमेल से इस शृंखला में शामिल कर रहे हैं, वो हैं ख़ानसाब ख़ान। हर बार की तरह इस बार भी उन्होंने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की तारीफ़ की है और हमारा हौसला अफ़ज़ाई की है। लीजिए ख़ानसाब का ईमेल पढ़िए...

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आदाब,

नौ रसों की 'रस माधुरी' शृंखला बहुत पसंद आई। आपने केवल इन रसों का बखान फ़िल्मी गीतों के लिए ही नहीं किया, बल्कि हमारी ज़िंदगी से जोड़ कर भी आप ने इनको पूरे विस्तार से बताया, जिससे हमें हमारी ज़िंदगी से जुड़े पहलुओं को भी जानने को मिला। और हमें ज्ञात हुआ कि हमारे मन की इन मुद्राओं को भी फ़िल्मी गीतों में किस तरह से अभिव्यक्ति मिली है। आपके इन अथक प्रयासों के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। और आपकी बात बिल्कुल सही है। मैं भी यह सोच रहा था कि "फिर छिड़ी रात बात फूलों की" ग़ज़ल और "फूल आहिस्ता फेंको" गीत के बोलों में, बड़े ही सुंदर तरीक़े से "फूल" शब्द का इस्तेमाल किया गया, जिसको सुनकर दिलों में भी फूलों की तरह नर्मोनाज़ुक अहसास पैदा हो जाते हैं। इससे ज़्यादा और किसी गीत की कामयाबी क्या होगी!

'ओल्ड इज़ गोल्ड - सफ़र अब तक' पढ़कर मज़ा आ गया। और हमारे जो साथी बाद में जुड़े थे, जिनमें मैं भी शामिल हूँ, सब को मालूम हो गया कि पिछे का भी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का सफ़र कितना शानदार रहा है। मैं एक दिन ऐसा सोच ही रहा था कि 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का पिछला सफ़र कैसा रहा होगा, इसमें किस तरह के और कौन कौन से गीत बजे होंगे, और आपने शायद मेरे मन की आवाज़ को सुन ली। क्योंकि हमारे इस महफ़िल का नाम भी तो आवाज़ ही है, जो कि पीछे की, आगे की, अभी की सारी आवाज़ों को अपने में शामिल किए हुए है। इसके लिए मैं आपका तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ। इसकी वजह से हम भी अब आवाज़ की इस महफ़िल से किसी भी तरह से अंजान नहीं रहे हैं।

धन्यवाद।

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वाह ख़ानसाब, और आपका बहुत बहुत शुक्रिया भी। आइए आज एक ऐसा गीत सुनते हैं जो आज के दिन के लिए बहुत ही सटीक है। आज क्रिसमस है और इस अवसर पर बनने वाले फ़िल्मी गीतों की बात करें तो सबसे पहले जिस गीत की याद आती है वह है फ़िल्म 'ज़ख़्मी' का "जिंगल बेल जिंगल बेल.... आओ तुम्हे चाँद पे ले जाएँ"। गौहर कानपुरी का लिखा और बप्पी लाहिड़ी का संगीतबद्ध किया हुआ यह गीत है जिसे लता मंगेशकर और सुषमा श्रेष्ठ ने गाया है। गीत फ़िल्माया गया है आशा पारेख और बेबी पिंकी पर। कहानी के सिचुएशन के मुताबिक़ गीत का फ़िल्मांकन दर्दीला है। गीत "जिंगल बेल्स" से शुरु होकर मुखड़ा "आओ तुम्हे चांद पे ले जाएँ, प्यार भरे सपने सजाएँ" पे ख़त्म होता है। अंतरों में भी एक सपनों की सुखद दुनिया का चित्रण है। गीत के फ़िल्मांकन से अगर बोलों की तुलना की जाये तो एक तरह से विरोधाभास ही झलकता है। राजा ठाकुर निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे सुनिल दत्त, आशा पारेख, राकेश रोशन और रीना रॊय। तो आइए सुनते हैं यह गीत और आप सभी को एक बार फिर से किरस्मस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

गीत - जिंगल बेल्स... आओ तुम्हे चाँद पे (ज़ख़्मी)


तो ये था आज का 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने'। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नियमित कड़ी के साथ आपसे कल फिर मुलाक़ात होगी, तब तक के लिए इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

Saturday, November 21, 2009

तेरी है ज़मीन तेरा आसमां...तू बड़ा मेहरबान....कहते हैं बच्चों की दुआएं खुदा अवश्य सुनता है...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 269

बी. आर. चोपड़ा कैम्प के गीत संगीत के मुख्य रूप से कर्णधार हुआ करते थे साहिर लुधियानवी और रवि। लेकिन १९८० में इस कैम्प की एक फ़िल्म आई जिसमें गानें तो लिखे साहिर साहब ने, लेकिन संगीत के लिए चुना गया राहुल देव बर्मन को। शायद एक बहुत ही अलग सबजेक्ट की फ़िल्म और फ़िल्म में नई पीढ़ियों के किरदारों की भरमार होने की वजह से बी. आर. चोपड़ा (निर्माता) और रवि चोपड़ा (निर्देशक) ने यह निर्णय लिया होगा। जिस फ़िल्म की हम बात कर रहे हैं वह है 'दि बर्निंग् ट्रेन'। जब यह फ़िल्म बनी थी तो लोगों में बहुत ज़्यादा कौतुहल था क्योंकि फ़िल्म का शीर्षक ही बता रहा था कि फ़िल्म की कहानी बहुत अलग होगी, और थी भी। एक बहुत बड़ी स्टार कास्ट नज़र आई इस फ़िल्म में। धर्मेन्द्र, हेमा मालिनी, जीतेन्द्र, नीतू सिंह, परवीन बाबी, विनोद खन्ना और विनोद मेहरा जैसे स्टार्स तो थे ही, साथ में बहुत से बड़े बड़े चरित्र अभिनेता भी इस फ़िल्म के तमाम किरदारों में नज़र आए। फ़िल्म की कहानी बताने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि यह एक ऐसी फ़िल्म है जिसे लगभग सभी ने देखी है और अब भी अक्सर टी.वी. पर दिखाई जाती है। इस फ़िल्म में बच्चों का एक बहुत ही ख़ूबसूरत 'प्रेयर सॊंग्' है जो बहुत ज़्यादा लोकप्रिय हुआ था। उस जलते हुए ट्रेन में स्कूल टीचर बनी सिम्मी गरेवाल भी थीं जो स्कूली बच्चों की पूरे टीम को लेकर सफ़र कर रहीं थीं। ट्रेन में आग लग जाने और ब्रेक फ़ेल हो जाने के बाद जब दूसरे लोग ट्रेन को किसी भी तरीके से रुकवाने की कोशिश में जुटे हैं, वहीं उन बच्चों के साथ उनकी टीचर ईश्वर की प्रार्थना में जुटी हैं और तभी फ़िल्म में आता है यह गीत "तेरी है ज़मीं तेरा आसमाँ तू बड़ा मेहरबान तू बख़शीष कर, सभी का है तू सभी तेरे ख़ुदा मेरे तू बख़शीष कर"। आज सुनिए इसी प्रार्थना को।

इस गीत को गाया था सुषमा श्रेष्ठ, पद्मिनी कोल्हापुरी और साथियों ने। बाल गायिकाओं में सुषमा और पद्मिनी बहुत सक्रीय रहीं हैं। एक ज़माना था जब सुषमा श्रेष्ठ ने बहुत सारे बच्चों वाले गीत गाए थे। किशोर कुमार के साथ 'आ गले लग जा' फ़िल्म में "तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई", लता जी के साथ 'ज़ख़्मी' फ़िल्म में "आओ तुम्हे चाँद पे ले जाएँ", और रफ़ी साहब के साथ 'हम किसी से कम नहीं' फ़िल्म में "क्या हुआ तेरा वादा" और 'अंदाज़' में "है ना बोलो बोलो" जैसे हिट गानें सुषमा ने जब गाए तब उनकी उम्र बहुत कम थी। यह तो आप जानते ही हैं कि आगे चलकर पूर्णिमा के नाम से वो प्लेबैक सिंगर बनीं ताकि बाल-गायिका का टैग हट जाए। लेकिन फिर भी चंद गीतों को छोड़कर उन्हे बहुत ज़्यादा कामयाबी हासिल नहीं हुई। और दूसरी गायिका पद्मिनी कोल्हापुरी, जो आगे चलकर एक हीरोइन बनीं, इन्होने भी कई बच्चों वाले गीत गाए थे। एक तो इसी शृंखला में आप सुन चुके हैं। याद है ना "मास्टर जी की आ गई चिट्ठी"? लता जी के साथ फ़िल्म 'यादों की बारात' में पद्मिनी और उनकी बहन शिवांगी ने ही तो आवाज़ मिलाई थी "यादों की बारात निकली है आज दिल के द्वारे" गीत में, जिसमें पर्दे पर एक बच्चा आमिर ख़ान भी था। ख़ैर, देखिए ना हम कहाँ से किस बात पर आ गए! ज़िक्र हो रहा है "तेरी है ज़मीं" गीत का। एक क्रीश्चन मिशनरी स्कूल के बच्चे जिस तरह का भक्ति गीत गाएँगे, बिल्कुल वैसा ही मिज़ाज बरकरार रखा है साहिर साहब ने। दोस्तों, मै बचपन से रेडियो सुनता आया हूँ, तो शायद ही कोई ऐसा साल रहा होगा जिस बार २५ दिसंबर के दिन इस गीत को क्रिस्मस के विशेष कार्यक्रम में ना बजाया गया हो! पंचम ने जिस तरह का मीटर इस गीत में रखा है, सुन कर बिल्कुल ऐसा लगता है कि जैसे हम कोई 'क्रिस्मस कैरल' सुन रहें हों। तो दोस्तों, आइए आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर हम ईश्वर की आराधना में लीन हो जाते हैं और सुनते हैं इस पाक़ और मासूम गीत को!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस फिल्म में जिस नन्हें बालक ने प्रमुख भूमिका की थी, वह आगे चलकर एक एक्टर/निर्दशक बना.
२. एक चर्चित अभिनेत्री ने भी इसी फिल्म से बतौर बाल कलाकार शुरुआत की.
३. पार्श्व गायन करने वाली एक नन्ही गायिका ने भी आगे चलकर सेलिना जेठ्ली के लिए पार्श्वगायन किया.

पिछली पहेली का परिणाम -

रोहित जी, आपका जवाब हमने बाद में देखा पर आपके २ अंक सुरक्षित हैं और कल के जवाब को मिला कर आपका स्कोर हुआ ४१. बधाई

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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