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Friday, August 7, 2009

दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई..... महफ़िल-ए-बेइख्तियार और "गुलज़ार"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३६

दिशा जी की नाराज़गी को दूर करने के लिए लीजिए हम लेकर हाज़िर हैं उनकी पसंद की पहली गज़ल। इस गज़ल की खासियत यह है कि जहाँ एक तरह इसे आवाज़ दिया है गज़लों के उस्ताद "गज़लजीत" जगजीत सिंह जी ने तो वहीं इसे लिखा है कोमल भावनाओं को अपने कोमल लफ़्जों में लपेटने वाले शायर "गुलज़ार" ने। जगजीत सिंह जी की गज़लों और नज़्मों को लेकर न जाने कितनी बार हम इस महफ़िल में हाज़िर हो चुके हैं और यकीन है कि इसी तरह आगे भी उनकी आवाज़ से हमारी यह बज़्म रौशन होती रहेगी। अब चूँकि जगजीत सिंह जी हमारी इस महफ़िल के नियमित फ़नकार हैं इसलिए हर बार उनका परिचय देना गैर-ज़रूरी मालूम होता है। वैसे भी जगजीत सिंह और गुलज़ार ऐसे दो शख्स हैं जिनकी ज़िंदगी के पन्ने अकेले हीं खुलने चाहिए, उस दौरान किसी और की आमद बने बनाए माहौल को बिगाड़ सकती है। इसलिए हमने यह फ़ैसला किया है कि आज की महफ़िल को "गुलज़ार" की शायरी की पुरकशिश अदाओं के हवाले करते हैं। जगजीत सिंह जी तो हमारे साथ हीं हैं, उनकी बातें अगली बार कभी कर लेंगे। "गुलज़ार" की बात अगर शुरू करनी हो तो इस काम के लिए अमृता प्रीतम से अच्छा कौन हो सकता है। अमृता प्रीतम कहती हैं: गुलज़ार एक बहुत प्यारे शायर हैं- जो अक्षरों के अंतराल में बसी हुई ख़ामोशी की अज़मत को जानते हैं, उनकी एक नज़्म सामने रखती हूँ-

रात भर सर्द हवा चलती रही...
...रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हमने

इन अक्षरों से गुजरते हुए- एक जलते और बुझते हुए रिश्ते का कंपन हमारी रगों में उतरने लगता है, इतना कि आँखें उस कागज़ की ओर देखने लगती हैं जो इन अक्षरों के आगे खाली हैं और लगता है- एक कंपन है, जो उस खाली कागज़ पर बिछा हुआ है। गुलज़ार ने उस रिश्ते के शक्ति-कण भी पहचाने हैं, जो कुछ एक बरसों में लिपटा हुआ है और उस रिश्ते के शक्ति-कण भी झेले हैं, जो जाने कितनी सदियों की छाती में बसा है...कह सकती हूँ कि आज के हालात पर गुलज़ार ने जो लिखा है, हालात के दर्द को अपने सीने में पनाह देते हुए, और अपने खून के कतरे उसके बदन में उतारते हुए-वह उस शायरी की दस्तावेज है, जो बहुत सूक्ष्म तरंगों से बुनी जाती है। ताज्जुब नहीं होता, जब अपने खाकी बदन को लिए, उफ़क़ से भी परे, इन सूक्ष्म तरंगों में उतर जाने वाला गुलज़ार कहता है-

वह जो शायर था चुप-सा रहता था,
बहकी-बहकी-सी बातें करता था....

फ़ना के मुकाम का दीदार जिसने पाया हो, उसके लिए बहुत मुश्किल है उन तल्ख घटनाओं को पकड़ पाना, जिनमें किसी रिश्ते के धागे बिखर-बिखर जाते हैं। गुलज़ार ने सूक्ष्म तरंगों का रहस्य पाया है, इसलिए मानना मुश्किल है कि ये धागे जुड़ नहीं सकते। इस अवस्था में लिखी हुई गुलज़ार की एक बहुत प्यारी नज़्म है, जिसमें वह कबीर जैसे जुलाहे को पुकारता है-

मैने तो इक बार बुना था एक हीं रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिरहें
साफ नज़र आती हैं मेरे यार जुलाहे..

लगता है- गुलज़ार और कबीर ने एक साथ कई नज़्मों में प्रवेश किया है- और ख़ाकी बदन को पानी का बुलबुला मानते हुए- यह रहस्य पाया है कि वक्त की हथेली पर बहता यह वह बुलबुला है, जिसे कभी न तो समंदर निगल सका, न कोई इतिहास तोड़ पाया!


गुलज़ार ने अपने जिस मित्र "मंसूरा अहमद" के लिए ये पंक्तियाँ लिखीं थी:

आज तेरी एक नज़्म पढी थी,
पढते-पढते लफ़्ज़ों के कुछ रंग लबों पर छूट गए...
....सारा दिन पेशानी पर,
अफ़शाँ के ज़र्रे झिलमिल-झिलमिल करते रहे।

उन्होंने गुलज़ार का परिचय कुछ यूँ दिया है:

कहीं पहले मिले हैं हम
धनक के सात रंगों से बने पुल पर मिले होंगे
जहाँ परियाँ तुम्हारे सुर के कोमल तेवरों पर रक़्स
करती थीं
परिन्दे और नीला आसमां
झुक झुक के उनको देखते थे
कभी ऐसा भी होता है हमारी ज़िंदगी में
कि सब सुर हार जाते हैं
फ़्रक़त एक चीख़ बचती है
तुम ऐसे में बशारत बन के आते हो
और अपनी लय के जादू से
हमारी टूटती साँसों से इक नग़मा बनाते हो
कि जैसे रात की बंजर स्याही से सहर फूटे
तुम्हारे लफ़्ज़ छू कर तो हमारे ज़ख़्म लौ देने लगे हैं...!


अब चलिए जनाब विनोद खेतान से रूबरु हो लेते हैं जो गुलज़ार साहब के बारे में ये विचार रखते हैं: ज़िन्दगी के अनगिन आयामों की तरह उनकी कविता में एक ही उपादान, एक ही बिम्ब कहीं उदासी का प्रतीक होता है और कहीं उल्लास का। गुलज़ार की कविता बिम्बों की इन तहों को खोलती है। कभी भिखारिन रात चाँद कटोरा लिये आती है और कभी शाम को चाँद का चिराग़ जलता है; कभी चाँद की तरह टपकी ज़िन्दगी होती है और कभी रातों में चाँदनी उगाई जाती है। कभी फुटपाथ से चाँद रात-भर रोटी नजर आता है और कभी ख़ाली कासे में रात चाँद की कौड़ी डाल जाती है। शायद चाँद को भी नहीं पता होगा कि ज़मीन पर एक गुलज़ार नाम का शख़्स है, जो उसे इतनी तरह से देखता है। कभी डोरियों से बाँध-बाँध के चाँद तोड़ता है और कभी चौक से चाँद पर किसी का नाम लिखता है, कभी उसे गोरा-चिट्टा-सा चाँद का पलंग नज़र आता है जहाँ कोई मुग्ध होकर सो सकता है और कभी चाँद से कूदकर डूबने की कोशिश करता है। गुलज़ार के गीतों में ये अद्भुत प्रयोग बार-बार दीखते हैं और हर बार आकर्षित करते हैं। कभी आँखों से खुलते हैं सबेरों के उफ़ुक़ और कभी आँखों से बन्द होती है सीप की रात; और यदि नींद नहीं आती तो फिर होता है आँखोंमें करवट लेना। कभी उनकी ख़ामोशी का हासिल एक लम्बी ख़ामोशी होता है और कभी दिन में शाम के अंदाज होते हैं या फिर जब कोई हँसता नहीं तो मौसम फीके लगते हैं। जब गुलज़ार की कविता में आँखें चाँद की ओर दिल से मुख़ातिब होती हैं तो लगता है इस शायर का ज़मीन से कोई वास्ता नहीं। पर यथार्थ की ज़मीन पर गुलज़ार का वक्त रुकता नहीं कहीं टिककर (क्योंकि) इसकी आदत भी आदमी-सी है, या फिर घिसते-घिसटते फट जाते हैं जूते जैसे लोग बिचारे। शायर ज़िन्दगी के फ़लसफ़े को मुक़म्मल देखना चाहता है और आगाह करता है कि वक़्त की शाख से लम्हे नहीं तोड़ा करते; या फिर वक़्त की विडंबना पर हँसता है कि वो उम्र कम कर रहा था मेरी, मैं साल अपने बढ़ा रहा था। कभी वह ख़्वाबों की दुनिया में सोए रहना चाहता है क्योंकि उसे लगता है कि जाग जाएगा ख़्वाब तो मर जाएगा और कभी वह बिल्कुल चौकन्ना हो जाता है क्योंकि उसे पता है कि समय बराबर कर देता है समय के हाथ में आरी है, वक्त से पंजा मत लेना वक्त का पंजा भारी है। पर फिर भी उम्मीद इतनी कि उसने तिनके उठाए हुए हैं परों पर।

गुलज़ार साहब के बारे में कहने को और भी कई सारी बाते हैं, लेकिन आज बस इतना हीं। अब चलिए हम "मरासिम" से आज की गज़ल का लुत्फ़ उठाते हैं। जगजीत सिंह की मखमली आवाज़ के बीच गुलज़ार जब "तुम्हारे ग़म की..." लेकर आते हैं तो मानो वक्त भी बगले झांकने लगता है। यकीन न हो तो खुद हीं देख लीजिए:

दिन कुछ ऐसे ग़ुज़ारता है कोई
जैसे एहसाँ उतारता है कोई

आईना देख कर तसल्ली हुई
हमको इस घर मे जानता है कोई

पक गया है शजर पे फल शायद
फिर से पत्थर उछालता है कोई

तुम्हारे ग़म की डली उठाकर
जबां पर रख ली देखो मैने,
ये कतरा-कतरा पिघल रही है,
मैं कतरा-कतरा हीं जी रहा हूँ।

देर से गूँजते हैं सन्नाटे
जैसे हमको पुकारता है कोई




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

___ लाजिम है मगर दुःख है क़यामत का फ़राज़,
जालिम अब के भी न रोयेगा तू तो मर जायेगा...


आपके विकल्प हैं -
a) सब्र, b) जब्त, c) दर्द, d) शेखी

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "ग़म" और शेर कुछ यूं था -

अपनी तबाहियों का मुझे कोई ग़म नहीं,
तुमने किसी के साथ मोहब्बत निभा तो दी।

इस शब्द के साथ सबसे पहला जवाब आया शरद जी का। शरद जी ने दो शेर भी पेश किए:

आप तो जब अपने ही ग़म देखते है
किसलिए फ़िर मुझमें हमदम देखते हैं (स्वरचित)

दिल गया तुमने लिया हम क्या करें
जाने वाली चीज़ का ग़म क्या करें । (दाग़ देहलवी)

शरद जी के बाद कुलदीप जी हाज़िर हुए और उन्होंने तो जैसे शेरों की बाढ हीं ला दी। एक के बाद १७-१८ टिप्पणियाँ करना इतना आसान भी नहीं है। मुझे लगता है कि कुलदीप जी शामिख साहब को पीछे करने पर तुले हैं और यह देखिए आज शामिख साहब हमारी महफ़िल में आए हीं नहीं। कुलदीप जी ने घोषणा हीं कर दी कि चूँकि "ग़म" उनका प्रिय शब्द है, इसलिए आज उन्हें कोई नहीं रोक सकता :) अब उनके सारे शेरों को तो पेश नहीं किया जा सकता। इसलिए उन शेरों का यहाँ ज़िक्र किए देता हूँ जिनमें ग़म शब्द आता है:

अब तो हटा दो मेरे सर से गमो की चादर को
आज हर दर्द मुझपे इतना निगेहबान सा क्यूँ है

नीचे पेश हैं खुमार साहब के शेर, जिन्हें कुलदीप जी ने कई सारी गज़लों के माध्यम से हमारे बीच रखा:

हाले गम उन को सुनते जाइये
शर्त ये है के मुस्कुराते जाईये

हाले-गम कह कह के गम बढा बैठे
तीर मारे थे तीर खा बैठे

कभी जो मैं ने मसर्रत का एहतमाम किया
बड़े तपाक से गम ने मुझे सलाम किया

सुकून ही सुकून है खुशी ही खुशी है
तेरा गम सलामत मुझे क्या कमी है

कुलदीप जी के बाद मंजु जी का हमारी महफ़िल में आना हुआ। यह रहा उनका स्वरचित शेर:

उनका आना है ऐसा जैसे हो हसीन रात ,
उनका जाना है ऐसे जैसे गम की हो बरसात

अदा जी भी अपने आप को एक पूरी गज़ल पेश करने से रोक नहीं पाईं। यह रहा वह शेर जिसमें ’ग़म’ शब्द की आमद है:

गम है या ख़ुशी है तू
मेरी ज़िन्दगी है तू

मनु जी ने अपना वह शेर पेश किया जिसे कुछ दिनों पहले ’हिन्द-युग्म’ पर पोस्ट किया गया था:

मिला जो दर्द तेरा और लाजवाब हुई
मेरी तड़प थी जो खींचकर गम-ए-शराब हुई

रचना जी की प्रस्तुति भी काबिल-ए-तारीफ़ रही। यह रहा उनका शेर:

मेरी सोच का कोई किनारा न होता
ग़म न होता तो कोई हमारा न होता

शरद जी की बात से एक हद तक मैं भी इत्तेफ़ाक रखता हूँ। हमारी पहेली का नियम यह है कि जो शब्द सही हो उसे लेकर या तो अपना कोई शेर डालें या फिर किसी जानीमानी हस्ती का, लेकिन बस शेर हीं। पूरी गज़ल डालने से मज़ा चला जाता है। लेकिन अगर पूरी गज़ल डालने का आपने मन बना हीं लिया है तो इस बात का यकीन कर लें कि उस गज़ल में वह शब्द ज़रूर आता है, रवानी में इस कदर भी न बह जाएँ कि किसी शायर की सारी गज़लें डालने लगें।

चलिए इतनी सारी बातों के बाद आप लोगों को अलविदा कहने का वक्त आ गया है। अगली महफ़िल तक के लिए खुदा हाफ़िज़!
प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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