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Saturday, November 8, 2014

इसकी टोपी उसके सर - प्रसिद्ध ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड कलेक्टर वी. एस. दत्ता बता रहे हैं पुराने ज़माने के कुछ इन्स्पायर्ड गीतों के बारे में




स्मृतियों के स्वर - 12

प्रसिद्ध ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड कलेक्टर वी. एस. दत्ता बता रहे हैं पुराने ज़माने के कुछ इन्स्पायर्ड गीतों के बारे में

इसकी टोपी उसके सर





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार करवाये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत के इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकिया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ कुछ अनमोल मोतियाँ हमारे इस स्तम्भ में, जिसका शीर्षक है - स्मृतियों के स्वर। इस स्तम्भ के अन्तर्गत हम और आप साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। आज हम आपकी मुलाक़ात करवा रहे हैं प्रसिद्ध ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड कलेक्टर वी. एस. दत्ता से। दत्ता साहब बता रहे हैं गुज़रे ज़माने के कुछ ऐसे मशहूर गीतों के बारे में जो प्रेरित थे अन्य फ़िल्मी गीतों से ही। यानी कि इसकी टोपी उसके सर। आनन्द लीजिये, ऐसे गीतों के साथ।





सूत्र: जुबिली झंकार, विविध भारती, 3 सितंबर 2008


1. "लेके पहला पहला प्यार, भरके आँखों में ख़ुमार..." (सी.आई.डी. 1956)

देखिये, यह तो नौशाद साहब ने आपको 'विविध भारती' में ही बताया था कि वो जो गाना है "जादू नगरी से आया है कोई जादूगर", उसकी ट्यून मेरे गीत से नकल की हुई है। वह जो एक उनकी फ़िल्म आयी थी 'नमस्ते', शायद 1943 में, उसमें एक गाना था "दिल ना लगे मोरा, जिया ना लगे, मन ना लगे, नेक-टाई वाले बाबू को बुलाते कोई रे..."। इस गीत की धुन हू-ब-हू "जादू नगरी से आया है कोई जादूगर" जैसा है। तो यह 'नमस्ते' फ़िल्म आई थी 1942-43 में, और 'CID' आयी थी 1956 में, यानी इसके 13 साल बाद। तो नय्यर साहब ने नौशाद की धुन को उठा लिया। लीजिए, पहले आप फिल्म सी. आई. डी. का और फिर फिल्म 'नमस्ते' का गाना सुनिए। 


फिल्म - सी. आई. डी. : 'लेके पहला पहला प्यार भरके आँखों में खुमार...' : शमशाद बेगम और मोहम्मद रफी : संगीत - ओ. पी. नैयर




फिल्म - नमस्ते : 'दिल न लगे मोरा जिया न लगे...' : संगीत - नौशाद : गीत - दीनानाथ मधोक




2. "आये भी अकेला जाये भी अकेला" (दोस्त, 1954)

तलत महमूद साहब का फ़िल्म 'दोस्त' का गीत "आये भी अकेला जाये भी अकेला, दो दिन की ज़िन्दगी है दो दिन का मेला" एक बहुत मशहूर गीत है, आपने सुना होगा। हंसराज बहल का संगीत था। इसका जो है पंजाबी फ़िल्म 'लच्छी' (1949) से लिफ़्ट किया गया था। सिर्फ़ धुन ही नहीं बल्कि बोल भी। और 'लच्छी' में जो है इसको मोहम्मद रफ़ी साहब ने गाया था, और बेहतरीन गाना था, "जगवाला मेला यारों थोड़ी देर दा, हँस दे या रात लंगी पता नहीं सवेर दा..."। यह गाना पीछे रह गया और वह गाना आगे निकल गया। यह संगीतकार शार्दूल क्वात्रा के करीयर का शुरुआती गीत था; उस समय वो हंसराज बहल साहब के सहायक हुआ करते थे। मतलब बहल साहब ने अपने सहायक की धुन को बाद में इस्तेमाल किया अपने गीत में। कहा जाता है कि एक बार हंसराज बहल बम्बई से बाहर गये थे, तब गीतकार नाज़िम पानीपती ने क्वात्रा को एक गीत की धुन बनाने को कहा, और तभी उन्होंने इस गीत की धुन बनाई थी। अब आप इन इन दोनों गीतों को सुनिए।


फिल्म - दोस्त : 'आए भी अकेला जाए भी अकेला...' : तलत महमूद : संगीत - हंसराज बहल




फिल्म - लच्छी (पंजाबी) : 'जगवाला मेला यारों थोड़ी देर दा...' : मोहम्मद रफी : संगीत शार्दूल क्वात्रा 


 
3. "ख़ुशी का ज़माना गया रोने से अब काम है" (छोटी भाभी, 1950)

इसी तरह से और भी गाने थे जो पंजाबी में थे। एक गाना था जिसे नूरजहाँ ने गाया था, "हूक मेरी क़िस्मत सो गई जागो हुज़ूर रे...", इसे फिर फ़िल्म 'छोटी भाभी' में हुस्नलाल-भगतराम ने लिफ़्ट किया और बना दिया "ख़ुशी का ज़माना गया रोने से अब काम है, प्यार इसका नाम था जुदाई इसका नाम है..." जिसे रफ़ी साहब और लता जी ने गाया। तो ऐसे लोग धुन एक दूसरे की लिफ़्ट करते आये हैं और यह परम्परा आज भी जारी है। नूरजहाँ का गाया गीत उपलब्ध नहीं पाया है, फ़िल्म 'छोटी भाभी' का गीत अब आप सुनें।


फिल्म - छोटी भाभी : 'खुशी का जमाना गया रोने से अब काम है...' : मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर : संगीत - हुस्नलाल भगतराम 



4. "तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा" (आख़िरी दाव, 1958)

आज इसको लेकर काफ़ी चर्चा होती है, कानून तक में जाने की भी बात भी होती रहती है, लेकिन उस वक़्त तो कितना अनायास होता था और इस बात को लेकर कोई किसी से कुछ कहता तक नहीं था। पर एक गाना था जिसके लिफ़्ट करने पर सज्जाद हुसैन काफ़ी बिगड गये थे मदन मोहन पर। तलत महमूद का जो गाना था ना "ये हवा ये रात ये चांदनी", फ़िल्म 'संगदिल' का, इसके आधार पर मदन मोहन साहब ने गाना बना दिया "तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा...", इसमें क्या हुआ कि सज्जाद साहब जिन्होंने "ये हवा ये रात" बनाया था, वो बिगड़ गये थे मदन मोहन पे, "तुमने कैसे मेरे गाने से लिफ़्ट किया?" मदन मोहन ने कहा कि हुज़ूर, मैंने सोचा कि उसी धुन को थोड़ा सा बदलकर देखें तो कैसा लगेगा। पर उसके बाद मदन मोहन ने कहा कि मैंने ऐसी गुस्ताख़ी फिर कभी नहीं की।


फिल्म - आखिरी दाव : 'तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा...' मोहम्मद रफी : संगीत - मदन मोहन : गीत मजरूह सुल्तानपुरी




फिल्म - संगदिल : 'ये हवा ये रात ये चाँदनी...' : तलत महमूद : संगीत - सज्जाद हुसैन



5. "हमारी गली आना" (मेमसाहिब, 1956)

एक 'शुक्रिया' फ़िल्म आयी थी, जिसमें एक गाना था "हमारी गली आना अच्छा जी, हमें ना भुलाना अच्छा जी...", जिसे बाद में 'मेमसाहिब' फ़िल्म में तलत महमूद और आशा भोसले ने गाया। इसको 'मेमसाहिब' में बिल्कुल सेम टू सेम लिफ़्ट किया गया है संगीतकार मदन मोहन ने। लेकिन ऑरिजिनल 'शुक्रिया' फ़िल्म का गाना था, पुराना, 1944 की फ़िल्म, जिसमें रमोला हीरोइन थीं, पर वह वाला गाना हिट नहीं हो पाया। इसके संगीतकार थे जी. ए. चिश्ती। इन दोनों गीतों को आप सुनिए और अन्तर खोजिए।


फिल्म - मेमसाहिब : 'हमारी गली आना अच्छा जी...' : तलत महमूद और आशा भोसले : संगीत - मदन मोहन 




फिल्म - शुक्रिया : 'हमारी गली आना अच्छा जी...' : नसीम अख्तर और अमर : संगीत - जी.ए. चिश्ती 




कॉपीराइट: विविध भारती



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।


प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





Sunday, May 23, 2010

संगीतकारों के अग्रणी नामों के पीछे कुछ ऐसे दिग्गज भी थे जिन्हें वो सब नहीं मिल पाया जिसके वो हक़दार थे

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # ३३

ज 'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' में एक बड़ा ही ख़ूबसूरत और दुर्लभ गीत। दुर्लभ इसलिए कि इस गीत के संगीतकार ने अपने करीयर में केवल १४ फ़िल्मों में संगीत दिया। जी हाँ, सज्जाद हुसैन। आज सुनिए उनकी धुन में फ़िल्म 'रुस्तम सोहराब' का गीत "ऐ दिलरुबा नज़रें मिला"। सज्जाद साहब अपने उसूलों पर चलने वाले इंसान थे। उन्होने कभी किसी से कोई समझौता नहीं किया और इस वजह से उन्हे भी बहुत ज़्यादा फ़िल्में नहीं मिली। लेकिन जितने भी फ़िल्मों में उन्होने संगीत दिया वो सभी उच्च कोटी के थे जो उस ज़माने के सभी संगीतकार मानते थे। मैंडोलीन को फ़िल्म संगीत मे लाने का श्रेय भी सज्जाद साहब को ही जाता है। इस साज़ पर उन्होने बहुत शोध किये और उनके बजाये इस साज़ के कई रिकार्ड्स भी निकले और आज उनके तीनों बेटे इस क्षेत्र में अपने पिता के काम को आगे बढ़ा रहे हैं। अपने अलग स्वभाव, अलग 'मूड' और कम काम करने के बावजूद सज्जाद साहब एक बेहतरीन संगीतकार माने गये। अपनी ७९ वर्ष की आयु मे उन्होने अपनी संगीत यात्रा के दौरान अनेक बेशकीमती गीतों की धरोहर तैयार किये हैं जिसे आनेवाली पीढ़ी को सम्भालकर रखना है और उनसे यह शिक्षा भी लेनी है कि मौलिकता ही किसी कलाकार की राह होनी चाहिए। सज्जाद साहब ने अपने पूरे जीवन में केवल १४ फ़िल्मों में संगीत दिया है, लेकिन इन १४ फ़िल्मों में उन्होने कुछ ऐसा काम कर दिखाया है कि आज ५० साल बाद भी वो ज़िंदा हैं अपने रचे उन तमाम कालजयी संगीत की वजह से। आज सज्जाद साहब के बारे में बता रहे हैं उनके प्रिय दोस्त और अभिनेता जगदीप (सौजन्य: अमीन सायानी द्वारा प्रस्तुत 'संगीत के सितारों की महफ़िल') - "बहुत ख़ुद्दार आदमी थी। क्या है कि कभी अगर कोई उनकी धुन पर उंगली उठाता था तो वो कहते थे 'ये उंगली क्या उठाई आपने, आप क्या जानते हैं मौसिक़ी के बारे में? उठके चले जाते थे, फ़िल्म छोड़ देते थे। तो नए नए जो म्युज़िक डिरेक्टर्स आए थे उन दिनों में, उनमें बहुत कॊम्प्लेक्स था, तो उनको बदनाम भी बहुत किया गया, कि ये ग़ुस्सेवाले हैं, ये है वो है। बिल्कुल ऐसे नहीं थे, इबादतवाले थे, इबादतवाला आदमी ग़ुस्सेवाला कैसे हो सकता है! तो उनको बदनाम किया गया और वो पीछे हटते चले गए, हटते चले गए।"

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत -ओ दिलरुबा...
कवर गायन -डाक्टर पारसमणी आचार्य




ये कवर संस्करण आपको कैसा लगा ? अपनी राय टिप्पणियों के माध्यम से हम तक और इस युवा कलाकार तक अवश्य पहुंचाएं


डाक्टर पारसमणी आचार्य
मैं पारसमणी राजकोट गुजरात से हूँ, पापा पुलिस में थे और बहुत से वाध्य बजा लेते थे, उनमें से सितार मेरा पसंदीदा था. माँ भी HMV और AIR के लिए क्षेत्रीय भाषा में पार्श्वगायन करती थी, रेडियो पर मेरा गायन काफी छोटी उम्र से शुरू हो गया था. मैं खुशकिस्मत हूँ कि उस्ताद सुलतान खान साहब, बेगम अख्तर, रफ़ी साहब और पंडित रवि शंकर जी जैसे दिग्गजों को मैंने करीब से देखा और उनका आशीर्वाद पाया. गायन मेरा शौक तब भी था और अब भी है, रफ़ी साहब, लता मंगेशकर, सहगल साहब, बड़े गुलाम अली खान साहब और आशा भोसले मेरी सबसे पसंदीदा हैं


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

Thursday, November 26, 2009

दर्शन प्यासी आई दासी...मधुबाला की विनती को स्वर दिए गीता दत्त ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 274

'गीतांजली' में आज बारी है हिंदी फ़िल्म जगत की सब से ख़ूबसूरत अभिनेत्री मधुबाला पर फ़िल्माए गए गीता रॉय के गाए एक गीत की। गीत का ज़िक्र हम थोड़ी देर में करेंगे, पहले मधुबाला से जुड़ी कुछ बातें हो जाए! मधुबाला का असली नाम था मुमताज़ जहाँ बेग़म दहल्वी। उनका जन्म दिल्ली में एक रूढ़ी वादी पश्तून मुस्लिम परिवार में हुआ था। ११ बच्चों वाले परिवार की वो पाँचवीं औलाद थीं। अपने समकालीन नरगिस और मीना कुमारी की तरह वो भी हिंदी सिनेमा की एक बेहतरीन अभिनेत्री के रूप में जानी गईं। अपने नाम की तरह ही उन्होने चारों तरफ़ अपनी की शहद घोली जिसकी मिठास आज की पीढ़ी के लोग भी चखते हैं। मधुबाला की पहली फ़िल्म थी 'बसंत' जो बनी थी सन् '४२ में। इस फ़िल्म में उन्होने नायिका मुमताज़ शांति की बेटी का किरदार निभाया था। उन्हे पहला बड़ा ब्रेक मिला किदार शर्मा की फ़िल्म 'नीलकमल' में जिसमें उनके नायक थे राज कपूर, जिनकी भी बतौर नायक वह पहली फ़िल्म थी। 'नीलकमल' आई थी सन् '४७ में और इसी फ़िल्म से मुमताज़ बन गईं मधुबाला। उस समय उनकी आयु केवल १४ वर्ष ही थी। इसी फ़िल्म में गायिका गीता रॉय ने राजकुमारी और मुकेश के साथ साथ कई गीत गाए लेकिन इनमें से गीता जी का गाया हुआ कोई भी गीत मधुबाला के होठों पर नहीं सजे। अपने परिवार की आर्थिक अवस्था को बेहतर बनाने के लिए मधुबाला ने पहले ४ सालों में लगभग २४ फ़िल्मो में अभिनय किया था। यह सिलसिला जारी रहा और बाद में उन्हे इस बात का अफ़सोस भी रहा कि मजबूरी में उन्हे बहुत सारी ऐसी फ़िल्में भी करनी पड़ी जो उन्हे नहीं करनी चाहिए थी। क्वांटिटी की ख़ातिर उन्हे क्वालिटी के साथ समझौता करना पड़ा था। आज गीता रॉय की आवाज़ में मधुबाला पर फ़िल्माया हुआ जो गीत हम आप तक पहुँचा रहे हैं पराग सांकला जी के सौजन्य से वह है फ़िल्म 'संगदिल' का गीत "दर्शन प्यासी आई दासी जगमग दीप जलाए"।

भारतीय आदर्श नारी के किरदार में मधुबाला का अभिनय 'संगदिल' में सराहनीय था। 'संगदिल' Charlotte Bronte की क्लासिक Jane Eyre पर आधारित थी। कहानी कुछ इस तरह की थी कि बचपन के दो साथी बिछड़ जाते हैं और अलग अलग दुनिया में बड़े होते हैं। नायिका बनती है एक पुजारन और नायक जायदाद से बेदखल हुआ ठाकुर। क़िस्मत दोनों को फिर से पास लाती है। सब कुछ ठीक होने लगता है लेकिन क्या होता है जब नायिका को पता चलता है नायक के काले गहरे राज़, यही है इस फ़िल्म की कहानी। इस फ़िल्म का निर्देशन किया था राय चंद तलवार ने और संगीत दिया सज्जाद हुसैन साहब ने। इस फ़िल्म से तलत साहब का गाया "ये हवा ये रात ये चांदनी" आप इस महफ़िल में सुन चुके हैं। गीता रॉय ने सज्जाद साहब के लिए १९४७ की फ़िल्म 'मेरे भगवान' में दो गीत और उसी साल 'क़सम' फ़िल्म में कुल ५ एकल गीत गाये। फ़िल्म 'क़सम' की रिलीज़ को लेकर थोड़ा सा संशय रहा है। १९५० की फ़िल्म 'खेल' में सज्जाद साहब ने गीता जी से गवाया था "साजन दिन बहुरे हमारे"। 'संगदिल' में आख़िरी बार गीता जी और सज्जाद साहब का साथ हुआ। इस फ़िल्म में आशा भोसले के साथ गीता रॊय ने गाया था "धरती से दूर गोरे बादलों के पार आजा, आजा बसा लें नया संसार"। लेकिन जो गीत सज्जाद साहब और गीता जी की सब से उत्कृष्ट कृति मानी जा सकती है, वह है इस फ़िल्म का आज का प्रस्तुत भजन "दर्शन प्यासी आई दासी जगमग दीप जलाए, प्रभु चरण की धूल मिले तो जीवन में सुख आए"। राजेन्द्र कृष्ण के लिखे इस भजन में एक अजीब सी कैफियत है, ऐसा लगता है कि जैसे बिल्कुल गिड़गिड़ाकर भगवान से दर्शन माँग रही है। बहुत ही सच्चा मालूम होता है भगवान से यह निवेदन, आइए सुनते हैं।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. ये गीत उस अभिनेत्री पर फिल्माया गया है जिन्हें सबसे अधिक बार फिल्म फेयर पुरस्कार पाने का गौरव प्राप्त है.
२. गीतकार हैं मजरूह साहब.
३. मुखड़े की पहली पंक्ति में है शब्द -"नज़र".इस पहेली को बूझने के आपको मिलेंगें २ की बजाय ३ अंक. यानी कि एक अंक का बोनस...पराग जी इस प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सकेंगें.

पिछली पहेली का परिणाम -
इंदु जी, चार दिन पहले आपका स्कोर ० था, और आज आप हैं १२ अंकों पर, जबरदस्त प्रदर्शन...बधाई....अब शरद जी को कोई टक्कर का मिला है :)

खोज - पराग सांकला
आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, July 23, 2009

ये हवा ये रात ये चांदनी...सज्जाद हुसैन का संगीतबद्ध एक नायाब गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 150

'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल दिन-ब-दिन, कड़ी दर कड़ी आगे बढ़ती चली जा रही है दोस्तों। यह आप सब का प्यार और पुराने फ़िल्म संगीत में आप की दिलचस्पी ही है कि इस शृंखला की रोचकता में ज़रा सी भी कमी नहीं आयी है। आज इस शृंखला ने पूरे किए पूरे १५० दिन! आप सब का प्यार युंही बना रहे, तो हम आगे भी आप के पसंदीदा गीतों के इस महफ़िल को युंही रोशन करते रहेंगे। दरअसल यह महफ़िल रोशन है गुज़रे ज़माने के उन लाजवाब कलाकारों की अपार मेहनत और लगन की वजह से जिन्होने फ़िल्म संगीत के धरोहर को समृद्ध किया, उसमें बेशुमार मोतियाँ जड़ें। आज यह धरोहर एक विशाल अनमोल ख़ज़ाने का रूप ले चुकी है, और इसी ख़ज़ाने से चुन चुन कर हम मोतियाँ निकाल कर ला रहे हैं हर रोज़ आप के लिए। आज इस शृंखला की १५० वीं कड़ी के लिए हमने जो गीत चुना है वो फ़िल्म संगीत का एक सदाबहार नग़मा है। इसके संगीतकार ने अपने पूरे जीवन में केवल १४ फ़िल्मों में संगीत दिया है, लेकिन इन १४ फ़िल्मों में उन्होने कुछ ऐसा काम कर दिखाया है कि आज ५० साल बाद भी वो ज़िंदा हैं अपने रचे उन तमाम कालजयी संगीत की वजह से। हम बात कर रहे हैं संगीतकार सज्जाद हुसैन की, और आज आप को सुनवा रहे हैं उन्ही के संगीत निर्देशन में तलत महमूद का गाया १९५२ की फ़िल्म 'संगदिल' का गाना "ये हवा ये रात ये चांदनी, तेरी इक अदा पे निसार है, मुझे क्यों न हो तेरी आरज़ू तेरी जुस्तजू में बहार है"। फ़िल्म 'संगदिल' के इस गीत को सज्जाद साहब के सब से ज़्यादा लोकप्रिय गीतों में से माना जाता है। आज कोई फ़िल्म 'संगदिल' की बात करे, या फिर सज्जाद साहब की बात करें, एक ही बात है।

दिलीप कुमार और मधुबाला अभिनीत फ़िल्म 'संगदिल' एक अद्‍भुत प्रेम कहानी थी, जिसका निर्माण और निर्देशन आर. सी. तलवार ने किया था। आज के इस प्रस्तुत गीत को याद करते हुए सज्जाद साहब के दोस्त और हास्य अभिनेता जगदीप ने अमीन सायानी को दिये एक साक्षात्कार में कहा था - "सज्जाद साहब का यह मानना था कि ये अंग्रेज़ी साज़ जो है ना, बहुत ज़्यादा ज़रूरी नहीं है, उनको अपने साज़ों पर बड़ा ऐतबार था, हिंदुस्तानी साज़ों पर, मैंडोलीन को उन्होने वीणा बना दिया था। तो उन्होने 'संगदिल' फ़िल्म में, कहा, "बेटा मैने क्या किया, दो सारंगियाँ ली और दो 'माइक्स' रखे, और दोनों को उनके सामने बजा दिया, ऐसी धमक पैदा हुई जो हज़ारों वायलीन में भी नहीं पैदा हो सकती"।" दोस्तों, यह गीत तलत साहब का भी पसंदीदा नग़मा है। इस गीत को गाये बग़ैर वो अपना कोई भी शो ख़तम नहीं कर सकते थे। सज्जाद साहब के बारे में यह बात मशहूर थी कि वो किसी गीत की रिकॉर्डिंग में तब तक री-टेक करते रहते थे जब तक कि हर एक साज़िंदा या गायक पूरे 'पर्फ़ेक्शन' से साथ बजा या गा न लें। 'संगदिल' फ़िल्म के प्रस्तुत गीत के लिए कुल १७ री-टेक हुए थे। इस गीत के साथ सज्जाद साहब की बातें कुछ इस क़दर जुड़ी हुई हैं कि हम अक्सर इसके गीतकार को याद करना भूल जाते हैं। गीतकार राजेन्द्र कृष्ण ने इस गीत को लिखा था और क्या ख़ूब लिखा था साहब! इसमें कोई दोराय नहीं होनी चाहिये कि सज्जाद और तलत साहब के साथ साथ राजेन्द्र जी का भी इस गीत की कामयाबी में पूरा पूरा हक़ बनता है। तो सुनिये यह गीत और एक बार फिर से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की १५०-वीं कड़ी के मौके पर इस शृंखला से जुड़े सभी श्रोताओं और पाठकों को हमारी तरफ़ से हार्दिक धन्यवाद!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा दूसरा (पहले गेस्ट होस्ट हमें मिल चुके हैं शरद तैलंग जी के रूप में)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. ओल्ड इस गोल्ड के १५१ वें एपिसोड से शुरू हो रही है रफी साहब पर विशेष शृंखला जो आधारित होगी अलग अलग अदाकारों के लिए किये उनके पार्श्वगायन पर.
2. इस कड़ी में हमारे पहले अदाकार होंगे - "शम्मी कपूर".
3. इस गीत के पहले चार शब्दों से प्रेरित होकर एक नयी फिल्म का नाम रखा गया था, जिसमें आमिर और माधुरी दिक्षित ने काम किया था.

इससे पहले कि हम कल के परिणाम बताएं एक ज़रूरी सूचना देना चाहेंगे, इस पहेली के जवाब वाला गीत कल के स्थान पर परसों यानी २५ तारिख को पेश होगा. कल के लिए हमें कुछ विशेष योजना बनायीं है, सुजोय जी हमें १५० शामों से लगातार गीत सुनवा रहे हैं, तो खुश होकर हमारे कुछ श्रोताओं ने सोचा कि १५० एपिसोड पूरे होने की ख़ुशी में कल सुजोय जी को कुछ ख़ास सुनाया जाए. अब ये कौन से श्रोता हैं और वो क्या सुनाएगें ये तो हम कल ही बतायेंगें. सुजोय जी को दी जा रही इस "सरप्राईस" पार्टी में आप सब भी सादर आमंत्रित हैं.

पिछली पहेली का परिणाम -
स्वप्न जी ४० का आंकडा छू लिया है आपने, निर्विरोध एकदम, बधाई...दिलीप जी, शरद जी, मनु जी, पराग जी, राज जी, दिशा जी, सुमित जी और अन्य सभी श्रोताओं से अनुरोध है कि आप सब कल की ख़ास महफिल में जरूर आयें.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, June 2, 2009

ये कैसी अजब दास्ताँ हो गयी है...छुपाते छुपाते बयाँ हो गयी है...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 99

ल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में हमने सुनी थी नूरजहाँ की आवाज़। आज के 'ओल्ड इज़ गोल्ड' मे भी कल जैसी ही बात है क्यूंकि आज भी हम एक ऐसी 'सिंगिंग स्टार' की आवाज़ आप तक पहुँचा रहे हैं जो अपने ज़माने की सबसे महँगी अभिनेत्री हुआ करती थीं। ४० के दशक की इस मशहूर अदाकारा और गायिका का असर कुछ यूँ था कि उनकी एक झलक पाने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती थी। एक बार इस अदाकारा की एक फ़िल्म का 'प्रिमीयर' का मौका था, सिनेमाघर के बाहर लोगों की ख़ासी भीड़ जमा हो गयी थी। तो जब ये अदाकारा अंदर जाने लगीं तो लोग उनसे हाथ मिलाने के लिए बेताब हो उठे। हालात बिगड़ते देख वहाँ पुलिस बुलायी गयी। भीड़ को सम्भालने के लिए लाठी-चार्ज भी करना पड़ा। इसके बाद से इस अदाकारा ने फ़िल्मों के 'प्रिमीयर' में जाना ही बंद कर दिया। इसी से इस अदाकारा के चाहनेवालों की दीवानगी का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। अपनी ख़ूबसूरती, लाजवाब अभिनय और बेहद सुरीली आवाज़ वाली इस 'सिंगिंग स्टार' को हम और आप सुरैय्या के नाम से जानते हैं। ४० के दशक की इस लाजवाब 'सिंगिंग स्टार' ने दूसरी अभिनेत्रियों के लिए पार्श्व गायन करना गवारा नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि ५० के दशक में एक से एक प्रतिभाशाली पार्श्वगायिकाओं के आ जाने से बहुत कम ऐसे फ़िल्मकार रह गये जो उनकी अदाकारी और आवाज़ को एक साथ प्रस्तुत करने में राज़ी होते। अगर सुरैय्या दूसरी अभिनेत्रियों के लिए गातीं तो उन्हे बहुत से गीत गाने के मौके मिलते, लेकिन उन्होने यह राह नहीं चुनी। और इस तरह से उनकी फ़िल्में और उनके गाने आने कम हो गये। अंतिम फ़िल्म जिसमें उनकी अदाकारी और गायिकी के जलवे उनके चाहनेवालों को देखने और सुनने को मिले वह फ़िल्म थी १९६३ की 'रुस्तम सोहराब'। प्रेम नाथ और मुमताज़ मुख्य भूमिकाओं में थे। फ़िल्म तो असफल रही लेकिन संगीतकार सज्जाद हुसैन के स्वरब्द्ध गीतों ने भूरी भूरी प्रसंशा बटोरी। इस फ़िल्म से आज सुनिए सुरैय्या का गाया और क़मर जलालाबादी का लिखा गीत "ये कैसी अजब दास्ताँ हो गयी है, छुपाते छुपाते बयाँ हो गयी है"।

सज्जाद साहब भी अपने उसूलों पर चलने वाले इंसान थे। उन्होने भी कभी किसी से कोई समझौता नहीं किया और इस वजह से उन्हे भी बहुत ज़्यादा फ़िल्में नहीं मिली। लेकिन जितने भी फ़िल्मों में उन्होने संगीत दिया वो सभी उच्च कोटी के थे जो उस ज़माने के सभी संगीतकार मानते थे। मैंडोलीन को फ़िल्म संगीत मे लाने का श्रेय भी सज्जाद साहब को ही जाता है। इस साज़ पर उन्होने बहुत से शोध किये और उनके बजाये इस साज़ के कई रिकार्ड्स भी निकले और आज उनके तीनों बेटे इस क्षेत्र में अपने पिता के काम को आगे बढ़ा रहे हैं। अपने अलग स्वभाव, अलग 'मूड' और कम काम करने के बावजूद सज्जाद साहब एक बेहतरीन संगीतकार माने गये। अपनी ७९ वर्ष की आयु मे उन्होने अपनी संगीत यात्रा के दौरान अनेक बेशकीमती गीतों के धरोहर तैयार किये जिसे आनेवाली पीढ़ी को सम्भालकर रखनी है और उनसे यह शिक्षा भी लेनी है कि मौलिकता ही किसी कलाकार की राह होनी चाहिए। आज क्यूंकि सुरैय्या और सज्जाद हुसैन दोनो का ज़िक्र चला है तो क्यों ना गीत सुनने से पहले आप यह भी जान लें कि सुरैय्या ने १९७१ में रिकार्ड की हुई विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में सज्जाद साहब के बारे में क्या कहा था! "संगीतकार सज्जाद हुसैन के तर्ज़ पर पहली बार मैने फ़िल्म '1857' में गाया था। मेरी ख़्वाहीश थी कि सज्जाद साहब के गीतों को गाने का और मौका मिले, इसी इंतज़ार मे एक ज़माना गुज़र गया, तब जाके फ़िल्म 'रुस्तम सोहराब' बनी और इसी मे है मेरा यह नग़मा।" तो दोस्तों, अब इस जानकारी के साथ कि इस गीत में मैंडोलीन' बजाया था सज्जाद साहब के बेटों ने, सुनिए यह दिल को छू लेनेवाला गीत जिसका असर आज भी वैसा ही बरक़रार है।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. ओल्ड इस गोल्ड का १०० वां एपिसोड समर्पित होगा नौशाद साहब, शकील बदायुनीं साहब और स्वर कोकिला लता मंगेशकर को.
२. चूँकि ये एक ग्रैंड एपिसोड है तो हमने फिल्म भी एक एतिहासिक चुनी है, जिसके जिक्र बिना हिंदी फिल्म का इतिहास भी अधूरा रहेगा.
३. एक अंतरा इस शब्द से शुरू होता है -"आज".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
स्वप्ना मंजूषा जी शरद जी, मनु जी और रचना जी से पहले आकर बाज़ी मार गयी. बधाई. दोस्तों जैसा कि आप जानते हैं कि कल हमारा एतिहासिक १०० वां एपिसोड होने वाला है. कल से पहेली का स्तर थोडा मुश्किल करेंगे, और जो सबसे पहले सही जवाब देगा उसे हर सही जवाब के २ अंक मिलेंगें. हर हफ्ते के अंत में हम स्कोरकार्ड देखते रहेंगे. जो विजेता सबसे पहले ५० अंकों का आंकडा छू लेगा, उसे हम मौका देंगे अपनी पसंद के ५ गीतों को ओल्ड इस गोल्ड में प्रस्तुत करने का और वो उन ५ एपिसोडों के लिए होंगें हमारे "गेस्ट होस्ट", प्रमुख होस्ट सुजॉय के साथ. तो तैयार हैं न आप सब ?

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


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