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Saturday, August 14, 2010

जिसे अंधी गंदी खाईयों से लाए हम बचा के, उस आजादी को हरगिज़ न मिटने देंगें- ये प्रण लिया वी डी, बिस्वजीत और सुभोजीत ने

Season 3 of new Music, Song # 16

६३ वर्ष बीत चुके हैं हमें आजाद हुए. मगर अब समय है सचमुच की आजादी का. तन मन और सोच की आजादी का. अभी बहुत से काम बाकी है, क्योंकि जंग अभी भी जारी है. आतंकवाद, नक्सलवाद, भ्रष्टाचार, जाने कितने अन्दुरुनी दुश्मन हैं जो हमारे इस देश की जड़ों को अंदर से खोखला कर रहे हैं. आज समय आ गया है कि हम स्मरण करें उन देशभक्तों की कुर्बानियों का जिनके बदौलत आज हम खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं. आज समय है एक बार फिर उस सोयी हुई देशभक्ति को जगाने का जिसके अभाव में हम ईमानदारी, इंसानियत और इन्साफ के कायदों को भूल ही चुके हैं. आज समय है उस राष्ट्रप्रेम में सरोबोर हो जाने का जो त्याग और कुर्बानी मांगती है, जो एक होकर चलने की रवानी मांगती है. कुछ यही सोच यही विचार हम पिरो कर लाये हैं अपने इस नए स्वतंत्रता दिवस विशेष गीत में, जिसे लिखा है विश्व दीपक तन्हा ने, सुरों से सजाया है सुभोजित ने और गाया है बिस्वजीत ने. जी हाँ इस तिकड़ी का कमाल आप बहुत से पिछले गीतों में भी सुन ही चुके है, जाहिर है इस गीत में भी इन तीनों ने जम कर मेहनत की है. तो आईये सुनते है आज का ये ताज़ा अपलोड और इस स्वतंत्र दिवस को महज एक छुट्टी का दिन न रहने दें बल्कि इसे एक नए शुरूआत का शुभ मुहूर्त बन जाने दें, क्योंकि एक छोटी सी कोशिश ही एक बड़े आन्दोलन की शुरूआत होती है.

गीत के बोल -

हिन्दोस्तां.. मेरी खुशी
हिन्दोस्तां.. मेरी हँसी
हिन्दोस्तां.. मेरे आँसू
हिन्दोस्तां.. मेरा लहू..

इसे अंधी गंदी खाईयों से लाए हम बचा के,
इसे गोरी गाली गोलियों से लाए सर भिड़ा के,
इसे हमने अपने माथे रखा सरपंच बना के...

इसे अंधी गंदी खाईयों से लाए हम बचा के,
इसे गोरी गाली गोलियों से लाए सर भिड़ा के,
इसे हमने अपने माथे रखा सरपंच बना के...


हिम्मत जब जागे,
कुदरत भी पग लागे,
भारत के आगे
दहशत फिर काहे...

आ जा हर डर
को कर दें
ज़र्रा..
स्वाहा..

हाँ दिखला दें
इस हिन्द पर
कुर्बां.....
है जां...

गर चाहें हम
थर्रा दें..
अंबर..
भूतल..

यूँ चुप हैं
पर दम लें
बनकर
शंकर..

ये तो नीली काली आँखों तले सुनामी उछाले
ये तो खौली खौली साँसों में सौ तूफ़ानें उबाले
ये तो सोए सोए सीनों में भी हड़कंप मचा दे....

ये तो नीली काली आँखों तले सुनामी उछाले
ये तो खौली खौली साँसों में सौ तूफ़ानें उबाले
ये तो सोए सोए सीनों में भी हड़कंप मचा दे....



मेकिंग ऑफ़ "हिन्दोस्तां" - गीत की टीम द्वारा

बिस्वजीत: माँ और मातृभूमि दोनों के लिए गाना गाना एक सौभाग्य की बात होती है। मैं चाहे कितनी भी दूर रहूँ, जब भी राष्ट्रगान सुनता हूँ, रौंगटे खड़े हो जाते हैं। सुभो ने जब ये गाना भेजा, मैं बहुत खुश हुआ था। इसलिए नहीं कि मुझे एक गाना मिला, बल्कि इसलिए कि मेरी मातृभूमि के लिए एक गाना मैं गा पाऊँगा। और उन सबके लिए एक संदेश दे पाऊँगा जो हमारी धरती को बाँटने की कोशिश में जुड़े हैं। लेकिन उनको नहीं पता कि जिस धरती को वो तोड़ना चाहते हैं वो धरती नानक, वीर भगत सिंह और राम जी की है। हम अगर एक बार जग गए तो मिट जाएँगे वो लोग। आज मेरा जन्मदिन भी है। जन्मदिन पे इससे बड़ा तोहफ़ा और क्या मिल सकता है। वीडी भाई के बारे में आजकल बोलना हीं मैंने बंद कर दिया है। भाई, जो गगन को छूए, उसकी ऊँचाई की क्या तारीफ़ की जाए। सुभो का संगीत भी दिल को छू लेने वाला है। कुल-मिलाकर यह कह सकता हूँ कि यह गाना मेरे लिए बहुत हीं खास है और मैंने इसके लिए बहुत मेहनत की है। गाना रिकार्ड करने के लिए मुझे कितने पापड़ बेलने पड़े, यह मैं हीं जानता हूँ, लेकिन देश के लिए अगर इतना भी न किया तो फिर गायकी का क्या फ़ायदा। हाँ, रिकार्डिंग स्टुडियो के चक्कर लगा-लगाकर थक जाने के बाद मैंने यह निर्णय ले लिया है कि जल्द हीं अपना "होम स्टुडियो" सेट-अप करूँगा। उसके बाद तो दोस्तों की यह शिकायत भी दूर हो जाएगी कि मैं हमेशा गायब हो जाता हूँ। फिर मेरे गाने नियमित अंतराल पर आने लगेंगे। मुझे बस उसी दिन का इंतज़ार है।

सुभोजित: "उड़न-छूं" गाने पर काम करते वक़्त हमें यह ख्याल आया था कि इसी तरह का जोश भरा एक और गाना किया जाए। विषय कौन-सा हो, यह प्रश्न था, लेकिन हमारी यह मुश्किल भी आसान हो गई, जब बिस्वजीत ने स्वतंत्रता दिवस के नज़दीक होने की बात उठा दी। हम सबने मिलकर यही निर्णय लिया कि देश-भक्ति से ओत-प्रोत एक गाना तैयार किया जाए। "उडन-छूं" के खत्म होने की देर थी कि हमारी तिकड़ी "हिन्दोस्तां" की ओर चल पड़ी। मैंने कुछ महिनों पहले दो-चार देश-भक्ति गानों की धुन बनाई थी, लेकिन वे गाने धुन तक हीं सीमित थे। जब "हिन्दोस्तां" की बात चली तो मैंने उन्हीं में से एक धुन विश्व दीपक के पास भेज दी। कम्पोजिशन और अरेंज़मेंट हो जाने के बाद बिस्वजीत भाई गाने का हिस्सा बन गए। जिस वक्त गाना तैयार हुआ, उस वक्त बिस्वजीत भारत आए हुए थे, इसलिए हमें डर था कि यह गाना १५ अगस्त से पहले हो पाएगा या नहीं। लेकिन मैं बिस्वजीत की तारीफ़ करूँगा जो भारत से लौटने के बाद बड़े हीं कम वक़्त में उन्होंने गाना रिकार्ड कर लिया। अभी तक मैंने बिस्वजीत और विश्व दीपक के साथ कई सारे गाने किये हैं, मेरा अनुभव इनके साथ बहुत हीं अच्छा रहा है, इसलिए उम्मीद करता हूँ कि आगे भी हमारी यह तिकड़ी कायम रहेगी और इसी तरह नए-नए गानों पर काम करती रहेगी।

विश्व दीपक:अब इसे विडंबना कहिए या फिर हमारा दुर्भाग्य कि हमारी देश-भक्ति साल के बस दो या तीन दिनों के आसपास हीं सिमट कर रह गई है। १५ अगस्त पास हो या २६ जनवरी आने वाली हो, तो यकायक लोगों को हिन्दुस्तान की याद हो जाती है। बातों में कहीं से छुपते-छुपाते देश-प्रेम के दो बोल उभर आते हैं या फिर देश के लिए कोई चिंता हीं ज़ाहिर कर दी जाती है। जहाँ हमें साल के ३६५ दिन हिन्द का ख्याल रखना चाहिए था, वहाँ बस दो-तीन दिन यह जोश-ओ-जुनून देखकर बुरा लगता है। अगर हम इस स्थिति को सुधारना चाहते हैं और चाहते हैं कि लोग अपने देश को पूरी तरह से न भूल जाएँ तो हमें अपने भाईयों को यह याद दिलाना होगा कि यह हिन्द क्या है, क्या था, क्या हो सकता है और क्या कर सकता है। बस यही प्रयास लेकर हम इस गाने के साथ हाज़िर हुए हैं.. गाना बनाने का विचार कहाँ से आया? तो "उड़न छूं" की सफ़लता के बाद बिस्वजीत भाई उसी जोश को दुहराना चाहते थे। उन्होंने हीं सुझाया कि एक देशभक्ति गाना किया जाए। सुभोजित ने अपनी तिजोड़ी से एक धुन निकालकर मेरे हवाले कर दिया। मैं चाहता था कि मुखरे का पहला शब्द हीं देश को समर्पित हो। मेरा सौभाग्य देखिए कि "हिन्दोस्तां" शब्द ट्युन पर फिट बैठ गया। "हिन्दोस्तां" शब्द इस्तेमाल करने के पीछे मेरा एक और मक़सद था। एक दोस्त के साथ झड़प हो गई थी कि "हिन्दोस्तां" और "हिन्दी" में कोई संबंध है या नहीं। उसने "हिन्दोस्तां" को सांप्रदायिक बनाने के लिए इसे "हिन्दु" से जोड़ दिया और कहा कि अपना देश "भारत" कहा जाना चाहिए। मुझे यह दिखाना था कि चाहे कोई कुछ भी कहे "हिन्दोस्तां" शब्द सांप्रदायिक नहीं और अपने देश को इस नाम से पुकारने में कोई बुराई नहीं। बस इसी वज़ह से मैंने गाने में अपने देश को "हिन्दोस्तां" से संबोधित किया है.. हाँ अंतरा में एक जगह भारत भी है.. और वह इसलिए कि मुझे अपने देश के हर नाम से प्यार है। आपको भी होगा.. है ना?


बिस्वजीत
बिस्वजीत युग्म पर पिछले 1 साल से सक्रिय हैं। हिन्द-युग्म के दूसरे सत्र में इनके 5 गीत (जीत के गीत, मेरे सरकार, ओ साहिबा, रूबरू और वन अर्थ-हमारी एक सभ्यता) ज़ारी हो चुके हैं। ओडिसा की मिट्टी में जन्मे बिस्वजीत शौकिया तौर पर गाने में दिलचस्पी रखते हैं। वर्तमान में लंदन (यूके) में सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी कर रहे हैं। इनका एक और गीत जो माँ को समर्पित है, उसे हमने विश्व माँ दिवस पर रीलिज किया था।

सुभोजित
संगीतकार सुभोजित स्नातक के प्रथम वर्ष के छात्र हैं, युग्म के दूसरे सत्र में इनका धमाकेदार आगमन हुआ था हिट गीत "आवारा दिल" के साथ, जब मात्र १८ वर्षीय सुभोजित ने अपने उत्कृष्ट संगीत संयोजन से संबको हैरान कर दिया था. उसके बाद "ओ साहिबा" भी आया इनका और बिस्वजीत के साथ ही "मेरे सरकार" वर्ष २००९ में दूसरा सबसे लोकप्रिय गीत बना. अपनी बारहवीं की परीक्षाओं के बाद कोलकत्ता का ये हुनरमंद संगीतकार
तीसरे सत्र में उड़न छूं के साथ लौटा। विश्व दीपक के लिखे और बिस्वजीत के गाए उस गीत को भी खूब पसंद किया गया था।

विश्व दीपक 'तन्हा'
विश्व दीपक हिन्द-युग्म की शुरूआत से ही हिन्द-युग्म से जुड़े हैं। आई आई टी, खड़गपुर से कम्प्यूटर साइंस में बी॰टेक॰ विश्व दीपक इन दिनों पुणे स्थित एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। अपनी विशेष कहन शैली के लिए हिन्द-युग्म के कविताप्रेमियों के बीच लोकप्रिय विश्व दीपक आवाज़ का चर्चित स्तम्भ 'महफिल-ए-ग़ज़ल' के स्तम्भकार हैं। विश्व दीपक ने दूसरे संगीतबद्ध सत्र में दो गीतों की रचना की। इसके अलावा दुनिया भर की माँओं के लिए एक गीत को लिखा जो काफी पसंद किया गया।

Song - Hindostaan
Voice - Biswajith Nanda
Music - Subhojit
Lyrics - Vishwa Deepak
Graphics - Prashen's media


Song # 16, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

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