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Wednesday, November 11, 2009

मन धीरे धीरे गाए रे, मालूम नहीं क्यों ...तलत और सुरैया का रेशमी अंदाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 259

१९५८ में गायक तलत महमूद कुल तीन फ़िल्मों में बतौर अभिनेता नज़र आए थे। ये फ़िल्में थीं 'सोने की चिड़िया', 'लाला रुख़' और 'मालिक'। जहाँ पहली दो फ़िल्में 'फ़िल्म इंडिया कॊर्पोरेशन' की प्रस्तुति थीं, 'मालिक' फ़िल्म का निर्माण किया था एस. एम युसूफ़ ने अपनी 'सनी आर्ट प्रोडक्शन्स' के बैनर तले। फ़िल्म की नायिका थीं सुरैया। दोस्तों, १९५८ तक पार्श्वगायन पूरी तरह से अपनी शबाब पर था। ३० और ४० के दशकों के 'सिंगिंग्‍ स्टार्स' फ़िल्म जगत के आसमान से ग़ायब हो चुके थे, कुछ देश विभाजन की वजह से, कुछ बदलते दौर और तकनीक की वजह से। लेकिन कुछ ऐसे कलाकार जिनकी गायन प्रतिभा उनके अभिनय की तरह ही पुख़्ता थी, वो ५० के दशक में भी लोकप्रिय बने रहे। इसका सीधा सीधा उदाहरण है तलत महमूद और सुरैया। ये सच है कि तलत साहब एक गायक के रूप में ही जाने जाते हैं, लेकिन अभिनय में रुचि और नायक जैसे दिखने की वजह से वो चंद फ़िल्मों में बतौर नायक काम किया था। और सुरैया के तो क्या कहने! अभिनय और गायन, दोनों में लाजवाब! लेकिन दूसरी अभिनेत्रियों के लिए पार्श्वगायन ना करने की सोच ने उन्हे पीछे धकेल दिया था ५० के दशक में। ज़्यादातर फ़िल्मकार उनसे गीत गवाना चाहते थे लेकिन दूसरी अभिनेत्रियों के लिए, जो उन्हे कतई मंज़ूर नहीं था। १९५८ की फ़िल्म 'मालिक' में ये दोनों कलाकार एक साथ नज़र आए और इस तरह से इस फ़िल्म को मिले दो 'सिंगिंग्‍ स्टार्स'। अब ज़ाहिर सी बात है कि इन दोनों ने ही इस फ़िल्म के गाने गाए होंगे। आज हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनवा रहे हैं इस फ़िल्म से एक बहुत ही प्यारा युगल गीत "मन धीरे धीरे गाए रे, मालूम नहीं क्यों"। फ़िल्म तो बहुत ज़्यादा मशहूर नहीं हुई लेकिन तलत साहब और सुरैया के गाए और गीतकार शक़ील बदायूनी के लिखे इस गीत को ख़ूब सुना गया।

'मालिक' के संगीतकार थे ग़ुलाम मोहम्मद। ऐए आज ग़ुलाम साहब की कुछ बातें की जाए। उन्हे संगीत विरासत में ही मिली थी। उनके पिता नवीबक्श एक तबला वादक थे। अपने पिता के साथ वो भी जलसों में जाया करते थे। ऐल्बर्ट थियटर में ये जलसे हुआ करते थे। तबले के साथ साथ ग़ुलाम मोहम्मद का अभिनय में भी रुचि थी। २५ रुपय प्रति माह के वेतन पर वे ऐल्बर्ट थियटर में शामिल हो गए। कुछ समय तक वहाँ रहे, लेकिन जब थियटर की माली हालात ख़राब हो गई तो उन्हे दूसरे दरवाज़ों पर दस्तक देनी पड़ी। काफ़ी जद्दोजहद के बाद एक कंपनी में उन्हे ४ आने प्रति रोज़ के वेतन पर रख लिया गया। वह कंपनी घूमते घामते जब जुनागढ़ पहुँची तो वहाँ जलसे में एक नामी मंत्री महोदय भी दर्शकों में शामिल थे। ग़ुलाम साहब की कला से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्हे एक रत्न जड़ित तलवार भेंट में दे दी। १९२४ में वे बंबई आए और ८ सालों तक संघर्ष करते रहे। १९३२ में सरोज मूवीटोन में उन्हे बतौर तबला वादक रख लिया गया। 'राजा भार्थहरि' फ़िल्म में उनके तबले की बहुत तारीफ़ हुई। उसके बाद उन्होने संगीतकार अनिल बिस्वास और नौशाद के साथ काम किया। नौशाद साहब के साथ उनकी अच्छी ट्युनिंग्‍ जमती थी। फिर तो नौशाद साहब के गीतों में उनके तबले और ढोलक के ठेके एक ख़ासीयत बन गई। स्वतंत्र संगीतकार बनने के बाद भी ग़ुलाम साहब के ठेके बरक़रार रहे जिसका एक अच्छा उदाहरण है आज का प्रस्तुत गीत। इस गीत का रीदम मुख्य तौर पर मटके के ठेकों पर ही आधारित है। आइए सुनते हैं गुज़रे ज़माने के इस अनमोल गीत को।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी, स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. ये उन संगीतकार का गीत है जिन्होंने ने सहगल से सूरदास के भजन गवा कर इतिहास रचा था.
२. इस युगल गीत में पुरुष स्वर है जी एम् दुर्रानी का.
३. मुखड़े की पहली पंक्ति में शब्द है -"कसम".

पिछली पहेली का परिणाम -

शरद जी आपका क्या कहना.....बस कमाल है, दूसरी बार भी आप ४० के अन्कदें तक पहुच गए हैं, लगता है बाकी सब लोग हथियार डाल चुके हैं, रोहित राजपूत और दिलीप जी सब कहाँ है भाई.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, June 2, 2009

ये कैसी अजब दास्ताँ हो गयी है...छुपाते छुपाते बयाँ हो गयी है...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 99

ल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में हमने सुनी थी नूरजहाँ की आवाज़। आज के 'ओल्ड इज़ गोल्ड' मे भी कल जैसी ही बात है क्यूंकि आज भी हम एक ऐसी 'सिंगिंग स्टार' की आवाज़ आप तक पहुँचा रहे हैं जो अपने ज़माने की सबसे महँगी अभिनेत्री हुआ करती थीं। ४० के दशक की इस मशहूर अदाकारा और गायिका का असर कुछ यूँ था कि उनकी एक झलक पाने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती थी। एक बार इस अदाकारा की एक फ़िल्म का 'प्रिमीयर' का मौका था, सिनेमाघर के बाहर लोगों की ख़ासी भीड़ जमा हो गयी थी। तो जब ये अदाकारा अंदर जाने लगीं तो लोग उनसे हाथ मिलाने के लिए बेताब हो उठे। हालात बिगड़ते देख वहाँ पुलिस बुलायी गयी। भीड़ को सम्भालने के लिए लाठी-चार्ज भी करना पड़ा। इसके बाद से इस अदाकारा ने फ़िल्मों के 'प्रिमीयर' में जाना ही बंद कर दिया। इसी से इस अदाकारा के चाहनेवालों की दीवानगी का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। अपनी ख़ूबसूरती, लाजवाब अभिनय और बेहद सुरीली आवाज़ वाली इस 'सिंगिंग स्टार' को हम और आप सुरैय्या के नाम से जानते हैं। ४० के दशक की इस लाजवाब 'सिंगिंग स्टार' ने दूसरी अभिनेत्रियों के लिए पार्श्व गायन करना गवारा नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि ५० के दशक में एक से एक प्रतिभाशाली पार्श्वगायिकाओं के आ जाने से बहुत कम ऐसे फ़िल्मकार रह गये जो उनकी अदाकारी और आवाज़ को एक साथ प्रस्तुत करने में राज़ी होते। अगर सुरैय्या दूसरी अभिनेत्रियों के लिए गातीं तो उन्हे बहुत से गीत गाने के मौके मिलते, लेकिन उन्होने यह राह नहीं चुनी। और इस तरह से उनकी फ़िल्में और उनके गाने आने कम हो गये। अंतिम फ़िल्म जिसमें उनकी अदाकारी और गायिकी के जलवे उनके चाहनेवालों को देखने और सुनने को मिले वह फ़िल्म थी १९६३ की 'रुस्तम सोहराब'। प्रेम नाथ और मुमताज़ मुख्य भूमिकाओं में थे। फ़िल्म तो असफल रही लेकिन संगीतकार सज्जाद हुसैन के स्वरब्द्ध गीतों ने भूरी भूरी प्रसंशा बटोरी। इस फ़िल्म से आज सुनिए सुरैय्या का गाया और क़मर जलालाबादी का लिखा गीत "ये कैसी अजब दास्ताँ हो गयी है, छुपाते छुपाते बयाँ हो गयी है"।

सज्जाद साहब भी अपने उसूलों पर चलने वाले इंसान थे। उन्होने भी कभी किसी से कोई समझौता नहीं किया और इस वजह से उन्हे भी बहुत ज़्यादा फ़िल्में नहीं मिली। लेकिन जितने भी फ़िल्मों में उन्होने संगीत दिया वो सभी उच्च कोटी के थे जो उस ज़माने के सभी संगीतकार मानते थे। मैंडोलीन को फ़िल्म संगीत मे लाने का श्रेय भी सज्जाद साहब को ही जाता है। इस साज़ पर उन्होने बहुत से शोध किये और उनके बजाये इस साज़ के कई रिकार्ड्स भी निकले और आज उनके तीनों बेटे इस क्षेत्र में अपने पिता के काम को आगे बढ़ा रहे हैं। अपने अलग स्वभाव, अलग 'मूड' और कम काम करने के बावजूद सज्जाद साहब एक बेहतरीन संगीतकार माने गये। अपनी ७९ वर्ष की आयु मे उन्होने अपनी संगीत यात्रा के दौरान अनेक बेशकीमती गीतों के धरोहर तैयार किये जिसे आनेवाली पीढ़ी को सम्भालकर रखनी है और उनसे यह शिक्षा भी लेनी है कि मौलिकता ही किसी कलाकार की राह होनी चाहिए। आज क्यूंकि सुरैय्या और सज्जाद हुसैन दोनो का ज़िक्र चला है तो क्यों ना गीत सुनने से पहले आप यह भी जान लें कि सुरैय्या ने १९७१ में रिकार्ड की हुई विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में सज्जाद साहब के बारे में क्या कहा था! "संगीतकार सज्जाद हुसैन के तर्ज़ पर पहली बार मैने फ़िल्म '1857' में गाया था। मेरी ख़्वाहीश थी कि सज्जाद साहब के गीतों को गाने का और मौका मिले, इसी इंतज़ार मे एक ज़माना गुज़र गया, तब जाके फ़िल्म 'रुस्तम सोहराब' बनी और इसी मे है मेरा यह नग़मा।" तो दोस्तों, अब इस जानकारी के साथ कि इस गीत में मैंडोलीन' बजाया था सज्जाद साहब के बेटों ने, सुनिए यह दिल को छू लेनेवाला गीत जिसका असर आज भी वैसा ही बरक़रार है।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. ओल्ड इस गोल्ड का १०० वां एपिसोड समर्पित होगा नौशाद साहब, शकील बदायुनीं साहब और स्वर कोकिला लता मंगेशकर को.
२. चूँकि ये एक ग्रैंड एपिसोड है तो हमने फिल्म भी एक एतिहासिक चुनी है, जिसके जिक्र बिना हिंदी फिल्म का इतिहास भी अधूरा रहेगा.
३. एक अंतरा इस शब्द से शुरू होता है -"आज".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
स्वप्ना मंजूषा जी शरद जी, मनु जी और रचना जी से पहले आकर बाज़ी मार गयी. बधाई. दोस्तों जैसा कि आप जानते हैं कि कल हमारा एतिहासिक १०० वां एपिसोड होने वाला है. कल से पहेली का स्तर थोडा मुश्किल करेंगे, और जो सबसे पहले सही जवाब देगा उसे हर सही जवाब के २ अंक मिलेंगें. हर हफ्ते के अंत में हम स्कोरकार्ड देखते रहेंगे. जो विजेता सबसे पहले ५० अंकों का आंकडा छू लेगा, उसे हम मौका देंगे अपनी पसंद के ५ गीतों को ओल्ड इस गोल्ड में प्रस्तुत करने का और वो उन ५ एपिसोडों के लिए होंगें हमारे "गेस्ट होस्ट", प्रमुख होस्ट सुजॉय के साथ. तो तैयार हैं न आप सब ?

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


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