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Sunday, July 17, 2016

राग अल्हैया बिलावल : SWARGOSHTHI – 279 : RAG ALHAIYA BILAWAL




स्वरगोष्ठी – 279 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 12 : समापन कड़ी में खुशहाली का माहौल

“भोर आई गया अँधियारा सारे जग में हुआ उजियारा...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच जारी हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की यह समापन कड़ी है। श्रृंखला की बारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का एक बार फिर हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हमने मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा की और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी भी दी। श्रृंखला की बारहवीं कड़ी में आज हम आपको राग अल्हैया बिलावल के स्वरों में पिरोये गए 1972 में प्रदर्शित फिल्म ‘बावर्ची’ से एक सुमधुर, उल्लास से परिपूर्ण गीत का रसास्वादन कराएँगे। इस राग आधारित गीत को स्वर दिया है, मन्ना डे, लक्ष्मी शंकर, निर्मला देवी, किशोर कुमार और हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने। संगीतकार मदन मोहन द्वारा राग अल्हैया बिलावल के स्वरों पर आधारित इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर और उनकी शिष्याओ के स्वरों में राग अल्हैया बिलावल में निबद्ध एक सुमधुर रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं।


दन मोहन उन गिने-चुने संगीतकारों में से थे जो नए-नए प्रयोग करने से नहीं कतराते थे। शास्त्रीय रागों को लेकर तरह-तरह के प्रयोग मदन मोहन ने किए जो उनके गीतों में साफ़ झलकता है। उदाहरण के तौर पर फ़िल्म ’बावर्ची’ का गीत ही ले लीजिए "भोर आई गया अँधियारा..."। यह गीत आधारित है राग अल्हैया बिलावल पर। इस फ़िल्म के बनते समय तक शायद ऐसा कोई भी हिन्दी फ़िल्मी गीत नहीं था जो इस राग पर आधारित हो। अल्हैया बिलावल एक प्रात:कालीन राग (सुबह 6 से 9 बजे तक गाया जाने वाला राग) होने की वजह से मुमकिन था कि इसका प्रयोग संगीतकार अपने गीतों में करते क्योंकि प्रात:काल के बहुत से गीत फ़िल्मों में आ चुके थे। पर शायद किसी ने भी इस राग को नहीं अपनाया, या फिर यूँ कहें कि अपना नहीं सके। मदन मोहन ने इस ओर पहल किया और अल्हैया बिलावल को गले लगाया। ’बावर्ची’ फ़िल्म में एक सिचुएशन ऐसी थी कि सुबह के वक़्त संयुक्त परिवार में चहल-पहल शुरु हुई है, पिताजी के चरण-स्पर्ष हो रहे हैं, सुबह की चाय पी जा रही है, बावर्ची अपने काम पे लगा है, संगीतकार बेटा अपने सुर लगा रहा है, घर की बेटियाँ घर के काम-काज में लगी हैं। इस सिचुएशन के लिए गीत बनाना आसान काम नहीं था। पर मदन मोहन ने एक ऐसे गीत की रचना कर दी कि इस तरह का यह आजतक का एकमात्र गीत बन कर रह गया है। बावर्ची बने फ़िल्म के नायक राजेश खन्ना के लिए मन्ना डे की आवाज़ ली गई जो इस गीत के मुख्य गायक हैं, जो बिखरते हुए उस परिवार को एक डोर में बाँधे रखने के लिए इस गीत में सबको शामिल कर लेते हैं। पिता हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय का पार्श्वगायन उन्होंने ख़ुद ही किया, संगीतकार बेटे (असरानी) को आवाज़ दी किशोर कुमार ने, और घर की दो बेटियों (जया भादुड़ी और उषा किरण) के लिए आवाज़ें दीं शास्त्रीय-संगीत की शीर्ष की दो गायिकाओं ने। ये हैं लक्ष्मी शंकर और निर्मला देवी। कैफ़ी आजमी ने गीत लिखा और नृत्य निर्देशन के लिए चुना गया गोपीकृष्ण को। कलाकारों के इस अद्वितीय आयोजन ने इस गीत को अमर बना दिया। और मदन मोहन ने केवल अल्हैया बिलावल ही नहीं, इस गीत के अलग-अलग अंश के लिए अलग-अलग रागों का प्रयोग किया। "भोर आई गया अंधियारा" का मूल स्थायी और अन्तरा राग अल्हैया बिलावल है। परन्तु अलग-अलग अन्तरों में राग मारु विहाग, नट भैरव, धनाश्री और हंसध्वनि की झलक भी मिलती है। हर बदले हुए राग के अन्तरे के बाद राग अल्हैया बिलावल में निबद्ध स्थायी की पंक्तियाँ वापस आती हैं।

अपने उसूलों पर चलने की वजह से 70 के दशक में मदन मोहन के साथ कई फ़िल्मकारों ने काम करना बन्द कर दिया था। हालाँकि उनके अन्तिम कुछ वर्षों में उन्होंने ॠषीकेश मुखर्जी (बावर्ची), गुलज़ार (कोशिश, मौसम), चेतन आनन्द (हँसते ज़ख़्म) और एच. एस. रवैल (लैला मजनूं) के साथ काम किया, पर उनके लिए रेकॉर्डिंग् स्टुडियो में तारीख़ मिलना भी मुश्किल हो रहा था। नए संगीतकारों की फ़ौज 60 के दशक के अन्तिम भाग से आ चुकी थी जिनके पास बहुत सी फ़िल्में थीं और वो महीनों तक अच्छे रेकॉर्डिंग् स्टुडियोज़ (जैसे कि तारदेव, फ़िल्म सेन्टर, महबूब) को बुक करवा लेते थे जिस वजह से जब मदन जी को ज़रूरत पड़ती स्टुडियो की, तो उन्हें नहीं मिल पाता। इस तरह से उनकी रेकॉर्डिंग् कई महीनों के लिए टल जाती और इस तरह से वो पिछड़ते जा रहे थे। ख़ैर, वापस आते हैं ’बावर्ची’ पर। इस फ़िल्म में कुल छह गीत थे। एक गीत की हमने चर्चा की, अन्य पाँच गीत भी रागों अथवा लोक संगीत पर आधारित थे। मन्ना डे की एकल आवाज़ में "तुम बिन जीवन कैसा जीवन..." के पहले अन्तरे में राग हेमन्त की झलक है। इसी प्रकार लक्ष्मी शंकर की आवाज़ में "काहे कान्हा करत बरजोरी...", में भी राग का स्पर्श है। कुमारी फ़ैयाज़ की आवाज़ में "पहले चोरी फिर सीनाज़ोरी..." में मराठी लोक संगीत लावणी का रंग है। मदन मोहन की फ़िल्म हो और लता मंगेशकर का कोई गीत ना हो कैसे हो सकता है भला। इस फ़िल्म में दो गीत लता जी से गवाये गए - "मोरे नैना बहाये नीर...", और दूसरा गीत है "मस्त पवन डोले रे..."। इस दूसरे गीत को फ़िल्म में नहीं शामिल किया गया, इसका मदन मोहन को अफ़सोस रहा। उनके साथ ऐसा कई बार हुआ। एडिटिंग् की कैंची उनके कई सुन्दर गीतों पर चल गई और गीत फ़िल्म से बाहर हो गया। कुछ उदाहरण - "खेलो ना मेरे दिल से..." (हक़ीक़त), "चिराग़ दिल का जलाओ बहुत अन्धेरा है..." (चिराग़), "दुनिया बनाने वाले..." (हिन्दुस्तान की क़सम), "मस्त पवन डोले रे..." (बावर्ची)। ’हीर रांझा’ में "मेरी दुनिया में तुम आयी..." शुरु-शुरु में फ़िल्म में नहीं था, कुछ सप्ताह बाद इसे जोड़ा गया था, पर साथ ही "तेरे कूचे में..." को हटा दिया गया। ’हँसते ज़ख़्म’ में "आज सोचा तो आँसू भर आए..." गीत को बहुत सप्ताह बीत जाने के बाद जोड़ा गया था। इन सारी जानकारियों के बाद अब समय है फ़िल्म ’बावर्ची’ के "भोर आई गया अँधियारा..." गीत को सुनने के साथ-साथ देखने का।


राग अल्हैया बिलावल : "भोर आई गया अँधियारा..." : मन्ना डे और साथी : फिल्म – बावर्ची


राग अल्हैया बिलावल का सम्बन्ध बिलावल थाट से माना गया है और इस थाट के आश्रय राग बिलावल का ही एक प्रकार है। इस राग के आरोह में मध्यम स्वर वर्जित होता है और अवरोह में सातो स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इस कारण इस राग की जाति षाड़व-सम्पूर्ण होती है। आरोह में शुद्ध और अवरोह में दोनों निषाद प्रयोग किये जाते है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। राग अल्हैया बिलावल के गायन-वादन का समय दिन का प्रथम प्रहर होता है। राग के आरोह में ऋषभ और अवरोह में गान्धार स्वर का अधिकतर वक्र प्रयोग किया जाता है। शुद्ध निषाद स्वर का प्रयोग आरोह में और कोमल निषाद का अल्प प्रयोग केवल अवरोह में दो धैवत के बीच में किया जाता है। राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। यह उत्तरांग प्रधान राग है, अर्थात इसका वादी स्वर सप्तक के उत्तरांग में आता है। इस राग का चलन भी सप्तक के उत्तरांग में और तार सप्तक में अधिक किया जाता है। आजकल राग अल्हैया बिलावल का प्रचार इतना अधिक बढ़ गया है केवल बिलावल कह देने से लोग अल्हैया बिलावल ही समझते हैं, जबकि राग बिलावल और अल्हैया बिलावल दो अलग-अलग राग हैं। राग अल्हैया बिलावल के वास्तविक स्वरूप का अनुभव करने के लिए अब हम आपको 16 मात्रा में निबद्ध एक खयाल सुनवा रहे हैं। इसे प्रस्तुत कर रही हैं, जयपुर अतरौली घराने के गायकी में दक्ष विदुषी किशोरी अमोनकर। इस गायन में उनकी शिष्याओं का योगदान भी है। राग अल्हैया बिलावल की इस बन्दिश के बोल हैं – ‘कवन बतरिया गैलो माई...’। आप यह रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक के साथ जारी श्रृंखला को भी यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग अल्हैया बिलावल : ‘कवन बतरिया गैलो माई...’ विदुषी किशोरी अमोनकर




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 279वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको सात दशक पुरानी फिल्म से लिये गए एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – ताल के लिए गीत में किस तालवाद्य का प्रयोग किया गया है? हमें उस तालवाद्य का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 23 जुलाई, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 281वें अंक में प्रकाशित किया जाएगा। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 277 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1973 में प्रदर्शित फिल्म ‘दिल की राहें’ से राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – मधुवन्ती, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- पार्श्वगायिका – लता मंगेशकर

इस बार की संगीत पहेली में पाँच प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों का सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। ये विजेता हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। सभी पाँच विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में जारी हमारी श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की आज यह समापन कड़ी है। आज की कड़ी में आपने राग अल्हैया बिलावल का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए हमने प्रस्तुत किया। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी, हमें लिखिए। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। हमारी अगली श्रृंखला “वर्षा ऋतु के राग” विषय पर आधारित होगी। इस श्रृंखला के लिए आप अपने सुझाव या फरमाइश ऊपर दिये गए ई-मेल पते पर शीघ्र भेजिए। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख  : सुजॉय चटर्जी  
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




Sunday, October 25, 2015

बेगम अख्तर की ठुमरी और ग़ज़ल : SWARGOSHTHI – 241 : THUMARI & GAZAL OF BEGAM AKHTAR




स्वरगोष्ठी – 241 में आज 

संगीत के शिखर पर – 2 : बेगम अख्तर की ठुमरी और ग़ज़ल

विदुषी बेगम अख्तर को उनकी जन्मशती वर्ष-पूर्ति पर सुरीला स्मरण 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीतानुरागियों का एक बार फिर स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनकी प्रस्तुतियों की चर्चा करेंगे। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व और उनकी कृतियों को प्रस्तुत करेंगे। आज श्रृंखला की दूसरी कड़ी में हमारा विषय है, उपशास्त्रीय संगीत और इस विधा में अत्यन्त लोकप्रिय गायिका विदुषी बेगम अख्तर के व्यक्तित्व तथा कृतित्व की संक्षिप्त चर्चा करेंगे और उनकी गायी राग मिश्र खमाज और काफी की ठुमरी तथा एक ग़ज़ल सुनवाएँगे।


श्रृंगार और भक्तिरस से सराबोर ठुमरी और गजल शैली की अप्रतिम गायिका बेगम अख्तर का जन्म 7 अक्तूबर, 1914 को उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद नामक एक छोटे से नगर (तत्कालीन अवध) में एक कट्टर मुस्लिम परिवार में हुआ था। परिवार में किसी भी सदस्य को न तो संगीत से अभिरुचि थी और न किसी को संगीत सीखना-सिखाना पसन्द था। परन्तु अख्तरी (बचपन में उन्हें इसी नाम से पुकारा जाता था) को तो मधुर कण्ठ और संगीत के प्रति अनुराग जन्मजात उपहार के रूप में प्राप्त था। एक बार सुविख्यात सरोदवादक उस्ताद सखावत हुसेन खाँ के कानों में अख्तरी के गुनगुनाने की आवाज़ पड़ी। उन्होने परिवार में ऐलान कर दिया कि आगे चल कर यह नन्ही बच्ची असाधारण गायिका बनेगी, और देश-विदेश में अपना व परिवार का नाम रोशन करेगी। उस्ताद ने अख्तरी के माता-पिता से संगीत की तालीम दिलाने का आग्रह किया। पहले तो परिवार का कोई भी सदस्य इसके लिए राजी नहीं हुआ किन्तु अख्तरी की माँ ने सबको समझा-बुझा कर अन्ततः मना लिया। उस्ताद सखावत हुसेन ने अपने मित्र, पटियाला के प्रसिद्ध गायक उस्ताद अता मुहम्मद खाँ से अख्तरी को तालीम देने का आग्रह किया। वे मान गए और अख्तरी उस्ताद के पास भेज दी गईं। मात्र सात वर्ष की आयु में उन्हें उस्ताद के कठोर अनुशासन में रियाज़ करना पड़ा। तालीम के दिनों में ही उनका पहला रिकार्ड- ‘वह असीरे दम बला हूँ...’ बना और वे अख्तरी बाई फैजाबादी बन गईं। उस्ताद अता मुहम्मद खाँ के बाद उन्हें पटना के उस्ताद अहमद खाँ से रागों की विधिवत शिक्षा मिली। इसके अलावा बेगम अख्तर को उस्ताद अब्दुल वहीद खाँ और हारमोनियम वादन में सिद्ध उस्ताद गुलाम मुहम्मद खाँ का मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। 1934 में कलकत्ता (अब कोलकाता) के अल्फ्रेड थियेटर हॉल में बिहार के भूकम्प-पीड़ितों के सहायतार्थ एक संगीत समारोह का आयोजन किया गया था। इस समारोह में कई दिग्गज कलाकारों के बीच नवोदित अख्तरी बाई को पहली बार गाने का अवसर मिला। मंचीय कार्यक्रमों की भाषा में कहा जाए तो “अख्तरी बाई ने मंच लूट लिया”। बेगम अख्तर की गायकी का एक अलग ही अंदाज रहा है। उनकी भावपूर्ण गायकी का सहज अनुभव कराने के लिए अब हम प्रस्तुत करते हैं, एक ठुमरी। यह ठुमरी राग मिश्र खमाज में निबद्ध है, जिसके बोल हैं –“अँखियन नींद न आए...”। 


ठुमरी मिश्र खमाज : ‘अँखियन नींद न आए...’ : बेगम अख्तर




पण्डित जसराज
बेगम विदुषी बेगम अख्तर का उदय जिस काल में हुआ था, भारतीय संगीत का पुनर्जागरण काल था। ब्रिटिश शासनकाल में भारतीय संगीत जिस प्रकार उपेक्षित हुआ था, उससे जनजीवन से संगीत की दूरी बढ़ गई थी। ऐसी स्थिति में 1878 में जन्में पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर और 1896 में जन्में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने अपने अनथक प्रयत्नों से पूरी शुचिता के साथ संगीत को न केवल पुनर्प्रतिष्ठित किया बल्कि जन-जन के लिए संगीत-शिक्षा सुलभ कराया। इस दोनों संगीत-ऋषियों के प्रयत्नों के परिणाम बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दशकों में परिलक्षित होने लगे थे। बेगम अख्तर इसी पुनर्जागरण काल की देन थीं। उनकी गायकी में शुचिता थी और श्रोताओं के हृदय को छूने की क्षमता भी थी। अब हम आपके लिए बेगम अख्तर के स्वर में एक होरी ठुमरी प्रस्तुत करते हैं। सुविख्यात गायक पण्डित जसराज ने बेगम साहिबा और उनकी गायकी पर एक सार्थक टिप्पणी की थी, जिसे ठुमरी से पूर्व आप भी सुनेंगे। 


होरी ठुमरी : ‘कैसी ये धूम मचाई...’ : बेगम अख्तर




बेगम अख्तर यद्यपि खयाल गायकी में अत्यन्त कुशल थीं किन्तु उन्हें ठुमरी और गज़ल गायन में सर्वाधिक ख्याति मिली। स्पष्ट उच्चारण और भावपूर्ण गायकी के कारण उन्हे चौथे और पाँचवें दशक की फिल्मों में भी अवसर मिला। उन्होने ईस्टर्न इण्डिया कम्पनी की फिल्मों- एक दिन का बादशाह, नल-दमयंती, नसीब का चक्कर आदि फिल्मों में काम किया। 1940 में बनी महबूब प्रोडक्शन की फिल्म ‘रोटी’ में उनके गाये गीतों ने तो पूरे देश में धूम मचा दिया था। विश्वविख्यात फ़िल्मकार सत्यजीत रे ने 1959 में फिल्म ‘जलसाघर’ का निर्माण किया था। यह फिल्म उन्नीसवीं शताब्दी की सामन्तवादी परम्परा और भारतीय संगीत की दशा-दिशा पर केन्द्रित थी। फिल्म ‘जलसाघर’ में गायन, वादन और नर्तन के तत्कालीन उत्कृष्ट कलाकारों को प्रत्यक्ष रूप में प्रस्तुत किया गया था। फिल्म में बिस्मिल्लाह खाँ (शहनाई), उस्ताद वहीद खाँ (सुरबहार), रोशन कुमारी (कथक), उस्ताद सलामत अली खाँ (खयाल गायन) के साथ बेगम अख्तर का गायन भी प्रस्तुत किया गया था। 

कैफी आज़मी
बेगम अख्तर ने अपने जीवन में ठुमरी, दादरा और गज़ल गायकी को ही लक्ष्य बनाया। खयाल गायकी में भी वे दक्ष थीं, किन्तु उनका रुझान उप-शास्त्रीय गायकी की ओर ही केन्द्रित रहा। उनकी गायकी में अनावश्यक अलंकरण नहीं होता था। उनके सुर सच्चे होते थे। बड़ी सहजता और सरलता से रचना के भावों को श्रोताओं तक सम्प्रेषित कर देती थीं। अब हम आपके लिए बेगम साहिबा की गज़ल गायकी का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। उनके जीवनकाल में आयोजित एक कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध शायर कैफी आज़मी और बेगम अख्तर की एक अनूठी जुगलबन्दी हुई थी। पहले कैफी आज़मी ने अपनी एक गज़ल पढ़ी। बाद में बेगम साहिबा ने उसी गज़ का सस्वर गायन प्रस्तुत किया था। शायर और गायिका की एक ही मंच पर हुई इस अनूठी जुगलबन्दी का आप आनन्द लीजिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हम विदुषी बेगम अख्तर की स्मृतियों को नमन अर्पित है। 


गजल : ‘सुना करो मेरे जाँ इनसे उनसे अफसाने...’ : बेगम अख्तर




संगीत पहेली 

‘स्वरगोष्ठी’ के 241वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत रचना का एक अंश सुनवा रहे हैं। इस संगीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 250 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) के विजेताओं के साथ ही वार्षिक विजेताओं की घोषणा भी की जाएगी। 


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि रचना के इस अंश में किस राग का स्पर्श है? 

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए। 

3 – यह किस गायक की आवाज़ है? गायक का नाम बताइए। 

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 31 अक्टूबर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 243वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 239वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद अमजद अली खाँ द्वारा सरोद पर प्रस्तुत एक रचना का अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – कामोद, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – दीपचंदी या चाँचर और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य – सरोद। 

इस बार की पहेली के प्रश्नों का सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर से क्षिति तिवारी। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। 


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ के आज के अंक में हमने आपसे ठुमरी, दादरा और गजल गायकी के शिखर पर प्रतिष्ठित बेगम अख्तर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर संक्षिप्त चर्चा की है। अगले अंक में एक अन्य विधा के शिखर पर प्रतिष्ठित व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला को हमारे अनेक पाठकों ने पसन्द किया है। हम उन सबके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Saturday, January 31, 2015

"महलों का राजा मिला..." - इस गीत के माध्यम से श्रद्धांजलि दी रोशन साहब की पत्नी ने उन्हें



एक गीत सौ कहानियाँ - 51
 

महलों का राजा मिला कि रानी बेटी राज करेगी...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 51वीं कड़ी में आज जानिए फ़िल्म 'अनोखी रात' के मशहूर गीत "महलों का राजा मिला कि रानी बेटी राज करेगी..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर ने गाया था। 



हिन्दी फ़िल्म संगीत जगत में कई संगीतकार ऐसे हुए हैं जो अपनी अप्रतिम प्रतिभा के बावजूद बहुत ज़्यादा अन्डर-रेटेड रहे। एक से एक बेहतरीन रचना देने के बावजूद इंडस्ट्री और पब्लिक ने उनकी तरफ़ उतना ध्यान नहीं दिया जितना कुछ गिने-चुने और "सफल" संगीतकारों की तरफ़ दिया करते थे। ऐसे एक अन्डर-रेटेड संगीतकार थे रोशन। 40 के दशक में रोशन साहब की प्रतिभा और कला से प्रभावित होकर निर्माता-निर्देशक और संगीतकार ख़्वाजा ख़ुर्शीद अनवर, जो बाद में देश-विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गये थे, उन्होंने रोशन को All India Radio Delhi में नौकरी दिलवा दी बतौर इन्स्ट्रूमेण्टलिस्ट। और वहीं रोशन साहब की मुलाक़ात हुई कलकत्ता की इरा मोइत्रा से। इरा जी उनके साथ ही काम करने लगीं। दोनों ही कला और संगीत के प्रेमी थे। ऐसे में दोनो का एक दूसरे के निकट आना, प्रेम का पुष्प खिलना बहुत ही प्राकृतिक और सामान्य बात थी। रोशन और इरा के बीच प्यार हो गया और दोनो ने विवाह कर लिया। विवाह के बाद रोशन साहब मुम्बई (तब बम्बई) आ गये और ख़्वाजा ख़ुर्शीद अनवर के साथ म्युज़िक ऐसिस्टैन्ट के रूप में काम करने लगे। एक लम्बे संघर्ष और कई चुनौतियों को पार करने के बाद उन्हें स्वतंत्र फ़िल्में मिलने लगी। जिन फ़िल्मों में संगीत देकर उन्होंने हिन्दी फ़िल्म संगीत संसार में अपने नाम की छाप छोड़ दी, वो फ़िल्में थीं 'बावरे नैन', 'बरसात की रात', 'आरती', 'ताज महल', 'ममता', 'बहू बेग़म', 'दिल ही तो है', 'दूज का चाँद', 'चित्रलेखा', 'भीगी रात', 'देवर' और 'अनोखी रात'। रोशन ने लगभग 94 फ़िल्मों में स्वतंत्र रूप से संगीत दिया और उसके अलावा भी कई ऐसी फ़िल्में की जिनमें उन्होंने दो या तीन गीतों का संगीत तैयार किया जब कि उन फ़िल्मों में कोई और मुख्य संगीतकार थे।


रोशन दम्पति
1968 में रोशन साहब जब 'अनोखी रात' फ़िल्म का संगीत बना रहे थे, उसी दौरान उनकी तबीयत नासाज़ हो गई। हार्ट की प्रॉबलेम हो गई थी। फिर भी उन्होंने ऐसी हालत में भी 'अनोखी रात के लगभग सभी गीत रेकॉर्ड कर लिये, पर एक गाना रेकॉर्ड होना अभी बाक़ी था। और दुर्भाग्यवश दिल का दौरा पड़ने से रोशन साहब चले गये 16 नवम्बर के दिन। उनके इस आकस्मिक निधन से इस फ़िल्म का संगीत अधूरा ही रह गया। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के कुछ समय बाद 'अनोखी रात' फ़िल्म के निर्देशक असित सेन ने यह फ़ैसला किया वो बचा हुआ जो एक गीत है इस फ़िल्म का, उसे सलिल चौधरी से कम्पोज़ और रेकॉर्ड करवायेंगे। यहाँ पर यह बताना ज़रूरी है कि किसी किसी जगह इस बात का उल्लेख है कि 'अनोखी रात' फ़िल्म के इस अन्तिम गीत को रोशन साहब के गुज़र जाने के बाद उनके मुख्य सहायक श्याम राज और सोनिक (संगीतकार जोड़ी सोनिक-ओमी के) ने रेकॉर्ड करवाया था। पर शायद यह सच्चाई नहीं है। तो साहब, जब रोशन साहब की पत्नी इरा जी को इस बात का पता चला कि असित दा सलिल दा से वह आख़िरी गाना बनवाना चाह रहे हैं, तो उनके मन में कुछ और ही बात चल रही थी।   वो उस मातम के दौर में भी असित सेन के पास गईं और उनसे कहा कि फ़िल्म का यह जो एक बचा हुआ गाना है, उसे वो अपनी देख रेख में रेकॉर्ड करवाना चाहती हैं। यह गीत एक श्रद्धांजलि होगी एक वियोगी पत्नी की अपने स्वर्गीय पति के लिए। यह सुन कर असित सेन चौंक उठे। उन्हें यह तो मालूम था कि इरा जी एक गायिका हैं, पर इसका ज़रा सा भी अंदाज़ा नहीं था कि वो इस तरह का संगीत संयोजन और पूरे रेकॉर्डिंग का संचालन कर कर पायेंगी। उन्होंने इरा जी से पूछा कि आप ये सब कुछ कर पायेंगी? जवाब था "हाँ"। और तब दादा असित सेन ने इरा जी की भावनाओं का सम्मान करते हुए इस बचे हुए गीत की रेकॉर्डिंग की ज़िम्मेदारी उनको दे दी।


राजेश रोशन
"महलों का राजा मिला, हमारी बेटी राज करेगी, ख़ुशी ख़ुशी कर दो विदा, हमारी बेटी राज करेगी...", यह था वह गीत। गीत की धुन रोशन साहब ने पहले से ही तैयार की हुई थी। इरा जी ने पूरे गाने को अरेंज करके, इस धुन को फ़ाइन ट्यून करके, रेकॉर्ड करवाया, और इस तरह से यह मास्टरपीस कम्पोज़िशन बनी एक श्रद्धांजलि, एक वियोगी पत्नी की तरफ़ से अपने स्वर्गवासी पति के लिए। और क्या लिखा है कैफ़ी साहब ने कि गीत सुनते ही आँखें भर आती हैं! और सिचुएशन भी क्या थी, मुसाफ़िरों का एक दल एक रात के लिए एक रेस्ट-हाउस में आसरा लेता है। एक व्यापारी पिता (तरुन बोस) और उनकी पुत्री (ज़हिदा) उस दल का हिस्सा हैं। यह सामने आता है कि पिता अपनी पुत्री का किसी से विवाह करवाना चाहते हैं पर पुत्री इस रिश्ते से ख़ुश नहीं हैं। तभी बारिश शुरू होती है और एक डाकू (संजीव कुमार) भी उसी बिल्डिंग में शरण लेने घुस आते हैं। वो उस लड़की की तरफ़ जब एक दृष्टि से देखने लगता है तो लड़की इसका कारण पूछती है। और वो कहता है कि उनकी शक्ल बिल्कुल उसके स्वर्गवासी पत्नी से मिलती है, और इस तरह से अपनी पूरी कहानी बताता है। इस गीत में दर्द है एक बेटी का। पर आश्चर्य की बात है कि इसी धुन का इस्तेमाल रोशन साहब के बेटे और अगले दौर के संगीतकार राजेश रोशन ने फ़िल्म 'ख़ुदगर्ज़' में किया और बना डाला एक ख़ुशी का गीत। शत्रुघ्न सिन्हा और अमिता सिंह पर फ़िल्माया हुआ तथा नितिन मुकेश व साधना सरगम का गाया वह गीत था "यहीं कहीं जियरा हमार, ए गोरिया गुम होई गवा रे..."। यह गीत भी अपने समय में काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। राजेश रोशन ने कई बार दूसरों की धुनों से प्रेरित होकर अपने गीत बनाये हैं और उन पर धुन चुराने के आरोप भी जनता ने लगाये हैं, पर इस गीत के लिए यही कहा जा सकता है कि उन्होंने अपने पिता की धुन का सहारा लिया है। क्या पिता की सम्पत्ति पुत्र की सम्पत्ति नहीं है? क्या इसे भी चोरी ही कहेंगे आप?

फिल्म - अनोखी रात : 'महलों का राजा मिला कि रानी बेटी राज करेगी...' : लता मंगेशकर : संगीत - रोशन : गीत - कैफी आज़मी



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

Saturday, August 9, 2014

स्वतंत्रता दिवस के इस सप्ताह में पढ़िये कुछ गीतकारों के संदेश हमारे फ़ौजी जवानों के नाम



स्मृतियों के स्वर - 07

स्वतंत्रता दिवस सप्ताह में विशेष

'उन सरहदों की बात कभी नहीं करता जो दिलों में पैदा हो जाती हैं...'




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों के साक्षात्कार प्रस्तुत किये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत के इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकिया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ कुछ अनमोल मोतियाँ, हमारे इस स्तम्भ में, जिसका शीर्षक है - स्मृतियों के स्वर, जिसमें हम और आप साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। अगस्त महीने का यह सप्ताह हमारे लिये बहुत मायने रखता है क्योंकि इस सप्ताह में है भारत का स्वतंत्रता दिवस। इसलिए आज के 'स्मृतियों के स्वर' में पढ़िये कुछ सन्देश हमारे फ़िल्मी गीतकारों की ओर से देश के वीर जवानों के नाम जो तैनात हैं सरहदों पर, दूर-दराज़ के इलाकों में।



सूत्र : विविध भारती

कार्य्रक्रम : 'विशेष जयमाला' के अलग-अलग कार्यक्रमों से संकलित




पण्डित नरेन्द्र शर्मा

भारतीय गणतन्त्र के वीर रक्षक, प्रहरी, अपने सैनिकों को सादर नमस्कार! आप के मनोरंजन के लिए 'जयमाला' में गूँथे हुए कुछ गीत-पुष्प आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ। मैं एक कवि, वीर सैनिकों से अपने आप को सम्बोधित कर रहा हूँ, और यह बोध प्राप्त कर रहा हूँ मन ही मन कि हम सब चाहे कवि हों, चाहे श्रमिक हों, चाहे कृषक हों, चाहे मनीषी हों, चाहे शिल्पी हों, हम सब एक हैं, हमारा देश एक है, इस देश का संविधान एक है। और हम सब पर इस बात की ज़िम्मेदारी है कि हम सब की एक निधि है, उसके हम अच्छे प्रतिनिधि बन सके। तो आपसे हम प्रेरणा ग्रहण करते हैं इस निधि के अच्छे प्रतिनिधि बनने के लिए। तो आपको सब से पहले जो गीत सुनवाना चाहता हूँ, उस गीत में इस महान देश की प्रीति की रीति का वर्णन किया गया है।


फिल्म - पूरब और पश्चिम : 'है प्रीत जहाँ की रीत सदा...' : महेन्द्र कपूर : कल्याण जी, आनन्द जी : इन्दीवर 





जाँनिसार अख़्तर (1974)

फ़ौजी भाइयों, आप जो इस मुल्क और क़ौम के बाग़बाँ हैं, जो देश की सरहदों की हिफ़ाज़त और निगरानी करते हैं, हमारी माताओं, बहनों और बेटियों की इस्मत के मुहाफ़िज़ हैं, हमारे लिए दुश्मनों के हमलों का सामना करते हैं, एक कड़ी और आज़माइशी ज़िन्दगी बसर करते हैं, मैं यह चन्द गीत जो आपको सुनाने जा रहा हूँ, इस ग़रज़ से है कि ज़िहानी और रूहानी ख़ुशी से आपके चन्द लम्हे भर सके। ये गीत मुख़्तलिब फ़िल्मों से लिए गये हैं। हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री अपनी कमज़ोरियों के बावजूद बड़ी अहम सड़क है, हम गीतनिगार दूसरों के जज़्बात की तर्जुमानी करते हैं। ये गीत फ़िल्म की ज़रूरत के लिहाज़ से लिखे जाते हैं, फिर भी ये मुख़्तलिब इंसान के जज़्बात का बयान होते हैं। मैं सबसे पहले जो गीत आपको सुना रहा हूँ यह मैंने एक फ़िल्म 'हमारी कहानी' के लिए कहा है, यह देश के मुतालिक है और आपके हमारे हौसलों की नुमाइन्दगी करता है, मौसिक़ी सी. अर्जुन की है। सुनिये यह गीत।



फिल्म - हमारी कहानी : 'देश हमारा एक है...' : मोहम्मद रफी और साथी : सी. अर्जुन : जाँनिसार अख्तर 





प्रेम धवन

मेरे फ़ौजी भाइयों, आप सब को मेरा नमस्कार! आज मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है इस प्रोग्राम में आपके लिए कुछ गीत पेश करते हुए। बहुत दूर से 'विविध भारती' के ज़रिये आप से मुलाक़ात हो रही है। आप लोग कैसी परिस्थितियों में रहते हैं, मैंने पर्सोनली नज़दीकी से देखा है जब हम लोग इंडो-पाक और इंडो-चाइनीज़ वार के समय आपकी सेवा में गये थे। इंडो-पाक वार के समय मैं सुनिल दत्त और नरगिस जी के साथ गया था। जब लदाख की राजधानी लेह पर पहुँचने के लिए हम मिलिटरी हेलिकॉप्टर पर बैठे तो देखा कि पिछले हिस्से में राशन की बोरियाँ और भेड़-बकरियाँ लदी हुई हैं। फिर भेड़-बकरियों को पैराशूट की मदद से उतारा जा रहा था। नरगिस जी के भाई अनवर हुसैन ने कहा कि शायद हमें भी भेड़-बकरियों की तरह पैराशूट में बांधकर उतार देंगे। जब हम लेह पहुँचे तो हमें यह बताया गया कि काफ़ी ऊँचाई पे होने की वजह से ऑक्सीज़न लेवल काफ़ी लो है, इसलिए हम जो भी करे आहिस्ता-आहिस्ता करे नहीं तो सर चकरा जायेगा। जब हमारा प्रोग्राम शुरू हुआ तो शहनाई वादक ने ऐसी तान उपर को लगाई कि तान उपर की उपर ही रह गई। हम लोगों ने ज़्यादातर छोटे-छोटे स्किट्स किए जो इन जवानों को सबसे ज़्यादा पसन्द आये। आइये अब एक गीत सुनते हैं फ़िल्म 'काबुलीवाला' से, "ऐ मेरे प्यारे वतन, तुझपे दिल क़ुर्बान..."।

फिल्म काबुलीवाला : 'ऐ मेरे प्यारे वतन तुझपे दिल कुर्बान...' : मन्ना डे : सलिल चौधरी : प्रेम धवन 





एम. जी. हशमत 

मेरे प्यारे फ़ौजी भाइयों, आप लोग उम्र में शायद मुझसे काफ़ी छोटे होंगे पर आप बहुत बड़ा काम कर रहे हैं, एक अज़ीम काम कर रहे हैं। अपने देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करना बड़ा काम नहीं तो फिर क्या है? वैसे देखा जाये तो हर आदमी एक फ़ौजी है। अपनी ज़िन्दगी की लड़ाई लड़ता रहता है आदमी। पर फ़ौजी भाइयों, आपकी लड़ाई को देख कर हम आपके सामने सर झुका कर आपको सलाम करते हैं। मैंने 'फ़ौजी' फ़िल्म में आप लोगों पर एक गीत लिखा था - "फ़ौजी रब का है दूसरा नाम", जो मैं समझता हूँ कि बिल्कुल सच बात है।

फिल्म फौजी : फौजी रब दा ऐ दूजा नाम...' : मोहम्मद रफी, मन्ना डे, मीनू पुरुषोत्तम और साथी : सोनिक - ओमी : एम.जी. हशमत  





गुलशन बावरा

 
फ़ौजी भाइयों, आपको गुल्शन बावरा का नमस्कार कुबूल हो। कहते हैं तलवार का और कलम का सदियों पुराना रिश्ता है। जब जब आप लोग मैदान-ए-जंग से जीत का झंडा लहराते हुए आते हैं, तब मेरे जैसे तुच्छ गीतकार के कलम से भी निकल आता है...




फिल्म उपकार : 'मेरे देश की धरती...' महेन्द्र कपूर और साथी : कल्याण जी, आनन्द जी : गुलशन बावरा 





कैफ़ी आज़मी (1988)


प्यारे फ़ौजी भाइयों, पूरे मुल्क की तरफ़ से मैं आपका शुक्रगुज़ार हूँ। आपका शुक्रिया इसलिए कि हम भारत में कोई भी त्योहार सिर्फ़ इसलिए मना सकते हैं और अपने घरों में सिर्फ़ इसलिए चादर तान के सो सकते हैं कि मुल्क की सरहदों पर आप जागते रहते हैं। हमारी आँखों में आप ही की नींदें हैं। इस ख़ुशी के मौके पर मैंने आप सब के लिए फ़िल्मी गीतों की एक 'जयमाला' गूँथी है, चाहता हूँ कि आप उसे कुबूल करें और हमारी मोहब्बत की निशानी समझ के उसको अपने गलों में डाल लें। मैं और मेरे हमकलम साथी फ़िल्मों के लिए गाने लिखते हैं, वो ऐसे सिपाही हैं जिनके हर हथियार छीन लिए जाते हैं, हाथ बाँध दिये जाते हैं, फिर उनको मैदान में उतारा जाता है। इन जकड़बन्दियों में अगर कभी कोई ऐसा गीत हो जाये जिसमें फेरियाँ भी हो और कोई पैग़ाम भी तो उसको दोहराते हुए किसी नग़मानिगार को शर्म आने की ज़रूरत नहीं। इस 'जयमाला' में पहला गीत मैंने ऐसा ही गूंथा है। बोल मेरे हैं, धुन एस. डी. बर्मन साहब की, और आवाज़ मन्ना डे की है। गीत सुनिये, "न तेल और न बाती, न काबू हवा पर, दीये क्यों जलाये चला जा रहा है..."।


फिल्म एक के बाद एक : 'न तेल और न बाती न काबू हवा पर दिये क्यों जलाए चला जा रहा है...' मन्ना डे : सचिनदेव बर्मन : कैफी आज़मी  





मजरूह सुल्तानपुरी (1985)

भाइयों, वैसे तो हम जानते हैं कि तोप के गोले से खेलना आप के लिए एक मामूली अमल है, आप तो जाँबाज़ वीर सिपाही हैं जिन्हे कोई ग़म छू ही नहीं सकता, लेकिन आप इंसान भी तो हैं, आप के दिल में भी जज्वे हैं, कभी कोई तो वक़्त आया होगा जब आप उदास होते होंगे, दुखी होते होंगे, तो यह उदासी बड़ा वक़्ती हो। मैंने और लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने और मरहूम रफ़ी ने मिल के काम की बात बतानी चाही है इस गीत में। अगर ऐसा कोई वक़्त हो तो इसे याद रखियेगा, इसमें काम की बातें हैं।

फिल्म दोस्ती : 'राही मनवा दुख की चिन्ता क्यों सताती है...' : मोहम्मद रफी : लक्ष्मीकान्त, प्यारेलाल : मजरूह सुल्तानपुरी





गुलज़ार

फ़ौजी भाइयों, आदाब! बहुत दिन बाद फिर आप की महफ़िल में शामिल हो रहा हूँ। इससे पहले जब भी आपके पास आया तो कोई ना कोई नई तरकीब लेकर, कोई न कोई नई आग़ाश लेकर गानो की, जिसमें मैंने कई तरह के गाने आप को सुनाये, जैसे रेल की पटरी पर चलते हुए गाने सुनाये थे एक बार, वो तमाम गाने जिनमें रेल की पटरी की आवाज़ भी सुनाई देती है। और एक बार आम आदमी के मसलों पर गाने आपको सुनाये जो लक्ष्मण के कार्टूनों जैसे लगते हैं। लेकिन मज़ाक के पीछे कहीं बहुत गहरे, बहुत संजीदे दर्द भरे हुए हैं इन गानो में। बच्चों के साथ गाये गाने भी आपको सुनाये, खेलते कूदते हुए गाने, लोरियाँ सुनाई आपको, और बहुत से दोस्तों की चिट्ठियाँ जब आयी, चाहनेवालों की चिट्ठियाँ आयी जिनमें शिकायतें भी, गिले भी, शिकवे भी, उनमें एक बात बहुत से दोस्तों ने कही कि हर बार आप कुछ मज़ाक करके, हँस-हँसाकर रेडियो से चले जाते हैं, जितनी बार आप आते हैं, हर बार हम आप से कुछ संजीदा बातें सुनना चाहते हैं, कि संजीदा सिचुएशनों पर आप कैसे लिखते हैं, क्या लिखते हैं, और हाँ, यह किसी ने नहीं कहा कि क्यों लिखते हैं? फ़ौजी भाइयों, आप तो वतन की सरहदों पर बैठे हैं, और मैं आपको बहलाते हुए आपके परिवारों को भी बहलाने की कोशिश करता रहता हूँ। हाँ, उन सरहदों की बात कभी नहीं करता जो दिलों में पैदा हो जाती हैं' कभी जुड़ती हुई, कभी टूटती हुई, कभी बनती हुई, गुम होती हुई सरहदें, या सिर्फ़ हदें। इस तरह के रिश्ते सभी के ज़िन्दगी से गुज़रते हैं, वो ज़िन्दगी जिसे एक सुबह एक मोड़ पर देखा था तो कहा था कि हाथ मिला ऐ ज़िन्दगी, आँख मिला कर बात कर।

फिल्म - हिप हिप हुर्रे : 'एक सुबह एक मोड पर...' : वनराज भाटिया : गुलजार 





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ज़रूरी सूचना:: उपर्युक्त लेख 'विविध भारती' के कार्यक्रम का अंश है। इसके सभी अधिकार 'विविध भारती' के पास सुरक्षित हैं। किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा इस प्रस्तुति का इस्तेमाल व्यावसायिक रूप में करना कॉपीराइट कानून के ख़िलाफ़ होगा, जिसके लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ज़िम्मेदार नहीं होगा।



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।


प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

Wednesday, August 17, 2011

कर चले हम फ़िदा...कैफी आज़मी के इन बोलों ने चीर कर रख दिया था हर हिन्दुस्तानी कलेजा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 724/2011/164



‘वतन के तराने’ श्रृंखला की चौथी कड़ी में आपका स्वागत है। इस श्रृंखला की पिछली दो कड़ियों मे आप नारी शक्ति की प्रतीक, झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई के त्याग और बलिदान की अमर गाथा के कुछ चुने हुए प्रसंगों के भागीदार हुए हैं। आज के अंक में भी इस गाथा को जारी रखते हुए आगे के कुछ प्रसंग आपके लिए प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही बलिदानियों द्वारा अपने से आगे की पीढ़ी के लिए दिये गए सन्देश से परिपूर्ण गीत भी आपको सुनवाएँगे। पिछले अंक में आपने पढ़ा कि झाँसी के उत्तराधिकारी की असमय मृत्यु से महाराज गंगाधर राव अवसादग्रस्त होकर राजकीय कार्यों से विमुख हो गए। ऐसी परिस्थिति में लक्ष्मीबाई ने समस्त शासन-सूत्र अपने हाथों में ले लिये।



कुछ समय बाद शोकग्रस्त गंगाधर राव का भी निधन हो गया। यह 1853 का वर्ष था। पूरे देश में अंग्रेजों के अत्याचार से जनता त्रस्त थी। उस समय झाँसी में अंग्रेज़ अधिकारी मेजर मालकम तैनात था। उसने दामोदर राव को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इन्कार कर दिया। धीरे-धीरे संघर्ष की स्थिति बनती जा रही थी। लक्ष्मीबाई तो पहले से ही तैयार थीं। उधर तात्याटोपे राष्ट्रभक्त शक्तियों को एकजुट कर अंग्रेजों के विरुद्ध महासंग्राम की तैयारी के लिए गुप्त रूप से भ्रमण कर रहे थे। अचानक एक दिन तात्या झाँसी आकर लक्ष्मीबाई से भी मिले। अन्ततः 1857 भी आ पहुँचा। देश के अलग-अलग हिस्सों में अन्दर ही अन्दर चिंगारी ज्वाला बनने के लिए धधक रही थी, किन्तु अंग्रेज़ इससे अनभिज्ञ थे। क्रान्ति की ज्वाला धधकने का दिन 31 मई, 1857 का दिन निश्चित था, किन्तु 29 मार्च को ही बंगाल में बैरकपुर छावनी में मंगल पाण्डेय ने समय से पहले क्रान्ति का शंखनाद कर दिया। लक्ष्मीबाई की चौकस दृष्टि क्रान्ति पर जमी हुई थी। अचानक एक दिन रानी को सूचना मिली कि झाँसी में तैनात अंगेजों की 12वीं पैदल सेना और घुड़सवार सेना की टुकड़ी ने विद्रोह कर दिया है।



सेनाधिकारी डनलप और कुछ अन्य अंग्रेज़ परिवार झाँसी किले में छिप गए और क्रान्तिकारियों ने किले को घेर लिया।लक्ष्मीबाई ने किले में कैद अंग्रेज़ महिलाओं और बच्चों को क्रान्तिकारियों से मुक्त कराने का प्रयास किया किन्तु डनलप की जिद के सामने ऐसा न हो सका। अन्ततः क्रान्तिकारियों ने हमला कर किले पर कब्जा कर लिया और किला रानी को सौंप दिया।



भारतीय सैनिको द्वारा अँग्रेजी सेना से विद्रोह कर देने से गोरों के डगमगाए कदम धीरे-धीरे सहज हो रहे थे। स्थिति कुछ सामान्य होते ही गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग की आँख में अब झाँसी खटकने लगी। उसने जनरल ह्यूरोज को एक बड़ी सेना के साथ झाँसीविजय के लिए भेजा। तेरह दिनों तक रानी ने हयूरोज से भीषण युद्ध किया, किन्तुमुट्ठीभर देशभक्तों की सेना के साथ वह अधिक प्रतिरोध न कर सकी। झाँसी के नागरिकों और सैनिकों को रक्तपात से बचाने के लिए रानी ने युद्धभूमि से हट कर कर कालपी जाने का निर्णय लिया। कालपी पहुँच कर लक्ष्मीबाई ने नानासाहब और तात्या टोपे के साथ विचार-विमर्श किया और कानपुर की ओर बढ़ते ह्यूरोज के रोकने के लिए भीषण युद्ध किया। रानी ने घोड़े की लगाम को अपने मुख से पकड़ा और दोनों हाथों में तलवार लेकर लड़ते हुए अंग्रेजों के तोपखाने पर कब्जा कर लिया। अंग्रेज़ सेनापति ह्यूरोज से रानी का तीसरा और निर्णायक युद्ध ग्वालियर में हुआ। इससे पूर्व रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे ने ग्वालियर नरेश की अंग्रेज़-भक्ति का सबक सिखाते हुए ग्वालियर और मुरार किले पर नियंत्रण कर लिया। एक विशाल सेना लेकर ह्यूरोज फिर ग्वालियर को रानी से मुक्त कराने पहुँच गया। रानी ने उस विशाल सेना से भीषण युद्ध किया। युद्ध करते-करते रानी एक ऐसे स्थान पर पहुँच गईं जहाँ सामने एक बड़ी खाईं थी और पीछे गोरों की एक बड़ी फौज थी। रानी के घोड़े के लिए उस खाईं को पार करना असम्भव था। रानी क्रुद्ध बाघिन सी अँग्रेजी सेना पर टूट पड़ी। उस दिन उसने अपने प्राणोत्सर्ग करने का निश्चय कर लिया था। रानी चारो ओर से घिर गई थी। अचानक एक सैनिक के वार से बचने के लिए रानी घूमी ही थी कि दूसरी ओर से कई सैनिकों ने एक साथ वार किया। यह वार घातक था। मृत्यु की गोद मे जाने से पहले लक्ष्मीबाई ने वार करने वाले सैनिक को स्वर्ग पहुँचा दिया था। आसमान को चीर कर रानी लक्ष्मीबाई स्वर्ग की ओर कूच कर गईं। उनके मृत शरीर को रघुनाथ अंग्रेजों के व्यूह से निकाल कर निकट के एक साधु के आश्रम ले गए और वहीं उनका अन्तिम संस्कार कर दिया। इस प्रकार भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का त्याग और बलिदान से परिपूर्ण एक अध्याय पूरा हुआ।



बलिदानी लक्ष्मीबाई के अन्तिम क्षणों में सम्भवतः यही भाव प्रस्फुटित हुए होंगे जो भाव आज के इस गीत में व्यक्त है। आज हम आपको 1965 में प्रदर्शित फिल्म ‘हक़ीक़त’ का गीत सुनवा रहे हैं। कैफी आज़मी के गीत को मदनमोहन ने संगीतबद्ध किया है और इसे मुहम्मद रफी ने गाया है। फिल्म ‘हक़ीक़त’ भारत-चीन युद्ध पर बनी थी। देशभक्ति भावों से भरे इस फिल्म के गीत आज भी प्रेरक बने हुए हैं। लीजिए प्रस्तुत है एक बलिदानी के अन्तिम मनोभावों की अभिव्यक्ति करता यह गीत-



फिल्म हक़ीक़त : ‘कर चले हम फिदा जान-ओ-तन साथियों....’ – गीतकार : कैफी आज़मी





(समय के अभाव के चलते कुछ दिनों तक हम ऑडियो प्लेयर के स्थान पर यूट्यूब लिंक लगा रहे हैं, आपका सहयोग अपेक्षित है)



और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-



सूत्र १ - एक महान क्रांतिकारी के नाम पर था फिल्म का नाम भी.

सूत्र २ - दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित ये कवि अपने राष्ट्रीय प्रेम से भरे गीतों के लिए अधिक जाने गए .

सूत्र ३ - मुखड़े में शब्द है - "आज़ाद".



अब बताएं -

इस महान स्वतंत्रता सेनानी का मशहूर नारा क्या था - ३ अंक

संगीतकार कौन हैं - २ अंक

गीतकार बताएं - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

अमित जी एक बार फिर सही जवाब के साथ सबसे पहले आये, हिन्दुस्तानी जी और सत्यजीत जी को भी बधाई



खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, February 17, 2011

धीरे धीरे मचल ए दिले बेकरार कोई आता है....सन्देश दे रही हैं नायिका को पियानो की स्वरलहरियां

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 595/2010/295

पियानो के निरंतर विकास की दास्तान पिछले चार दिनों से आप पढ़ते आये हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में। यह दास्तान इतनी लम्बी है कि अगर हम इसके हर पहलु पर नज़र डालने जायें तो पूरे पूरे दस अंक इसी में निकल जाएँगे। इसलिए आज से हम पियानो संबंधित कुच अन्य बातें बताएँगे। दोस्तों नमस्कार, 'पियानो साज़ पर फ़िल्मी परवाज़' लघु शृंखला में आप सभी का फिर एक बार बहुत बहुत स्वागत है। आइए आज बात करें पियानो के प्रकारों की। मूलत: पियानो के दो प्रकार हैं - ग्रैण्ड पियानो तथा अप-राइट पियानो। ग्रैण्ड पियानो में फ़्रेम और स्ट्रिंग्स होरिज़ोण्टल होते हैं और स्ट्रिंग्स की-बोर्ड से बाहर की तरफ़ निकलते हुए नज़र आते हैं। ध्वनि जो उत्पन्न होती है, वह कार्य स्ट्रिंग्स के नीचे होता है और मध्याकर्षण की तकनीक से स्ट्रिंग्स अपने रेस्ट पोज़िशन पर वापस आते हैं। उधर दूसरी तरफ़ अप-राइट पियानो, जिन्हें वर्टिकल पियानो भी कहते हैं, आकार में छोटे होते हैं क्योंकि फ़्रेम और स्ट्रिंग्स वर्टिकल होते हैं। हैमर्स होरिज़ोण्टली अपनी जगह से हिलते हैं और स्प्रिंग्स के ज़रिए अपने रेस्ट पोज़िशन पर वापस आते हैं। १९-वीं सदी में पियानो में कई और अन्य प्रकार के पियानो भी बनें, जिनमे टॊय पियानो (toy piano) उल्लेखनीय है। १८६३ में हेनरी फ़ूरनेउ ने 'प्लेयर पियानो' का आविष्कार किया, जो बिना किसी पियानिस्ट के एक पियानो रोल के ज़रिए ख़ुद ब ख़ुद बज सकता है। 'साइलेण्ट पियानो' एक तरह का ऐकोस्टिक पियानो है जिसमें व्यवस्था है स्ट्रिंग्स को साइलेण्ट करने की एक इण्टरपोज़िंग हैमर बार के द्वारा। एडवार्ड राइली ने १८०१ में 'ट्रांसपोज़िंग पियानो' का आविष्कार किया, जिसके की-बोर्ड के नीचे एक लीवर है जो की-बोर्ड को अपनी जगह से हिला सकता है ताकि पियानिस्ट एक परिचित 'की' को प्ले कर उस ध्वनि को उत्पन्न कर सके जो दरअसल किसी और 'की' द्वारा उत्पन्न होती है। एक और प्रकार का पियानो है 'प्रिपेयर्ड पियानो' जिसके अंदर कुछ ऐसे सामान रखे जाते हैं जो उत्पन्न होने वाली ध्वनियों को बदल सके। रबर, कागज़, धातु या फिर वाशर के इस्तमाल से अलग अलग किस्म की ध्वनियाँ उत्पन्न की जा सकती है इस पियानो में। 'ईलेकट्रिक पियानो' में 'Electro-magnetic Pick-up' के माध्यम से स्ट्रिंग्स में उत्पन्न ध्वनियों को ऐम्प्लिफ़ाई किया जा सकता है। हाल ही में 'डिजिटल पियानो' भी आ गये हैं और आजकल तो पियानो में भी कम्प्युटर और सॊफ़्टवेयर तकनीक इस्तमाल की जाने लगी है। सी.डी और MP3 प्लेयर्स भी पियानो में जोड़ा गया है। पियानो डिस्क की मदद से पियानो ख़ुद ब ख़ुद बज सकता है। जिस तरह से औद्योगिकी के हर क्षेत्र में तकनीकी उन्नति हुई है, पियानो का इतिहास भी उतना ही दिलचस्प और उल्लेखनीय रहा है।

और अब बारी आज के गाने की। आज हम क़दम रख रहे हैं ६० के दशक में। इस दशक में बहुत सारे पियानो गीत बनें और हम सोच में पड़ गये कि किस गीत को चुनें और किसे छोड़ दें। कई दिनों तक इस असमंजस में रहने के बाद हमने इस दशक से दो गीत चुनें, जिन्हें अब हम दो अंकों में सुनवाएँगे। आज का गीत प्रस्तुत कर रही हैं लता मंगेशकर, फ़िल्म 'अनुपमा' का गीत, कैफ़ी आज़्मी के बोल, हेमन्त कुमार का संगीत, और गीत के बोल - "धीरे-धीरे मचल ऐ दिल-ए-बेक़रार, कोई आता है"। 'अनुपमा' फ़िल्म के मुख्य किरदार हैं धर्मेन्द्र और शर्मिला टैगोर। अब तक मैं यही समझता रहा कि यह गीत ज़रूर शर्मीला जी पर ही फ़िल्माया गया होगा, लेकिन आज ही इस गीत को य़ु-ट्युब में देखा तो पाया कि दरसल यह तो सुरेखा पर फ़िल्माया हुआ गाना है। इस फ़िल्म का अन्य गीत "कुछ दिल ने कहा, कुछ भी नहीं" शर्मीला जी पर फ़िल्माया गया है, जबकि दो अन्य गीत "भीगी भीगी फ़ज़ां" और "क्यों मुझे इतनी ख़ुशी दे दी" शशिकला जी पर फ़िल्माया गया है। "धीरे धीरे मचल" गीत बड़ा ही दिलचस्प गीत है अगर हम इसके एक अंतरे के बोलों पर जाएँ तो। इस गीत का एक अंतरा कुछ इस तरह का है -

"उसके दामन की ख़ुशबू हवाओं में है,
उसके क़दमों की आहट फ़ज़ाओं में है,
मुझको करने दे करने दे सोलह सिंगार, कोई आता है।"

'अनुपमा' १९६६ की फ़िल्म थी और १९५५ में आयी थी एक फ़िल्म 'मुनिमजी', जिसमें लता जी का ही गाया हुआ एक कमसुना सा गीत था "आँख खुलते ही तुम छुप गये हो कहाँ, तुम अभी थे यहाँ"। इस गीत का एक अंतरा कुछ इस तरह का था -

"अभी सांसों की ख़ुशबू हवाओं में है,
अभी क़दमों की आहट फ़िज़ाओं में है,
अभी शाख़ों में है उंगलियों के निशाँ, तुम अभी थे यहाँ।"

अब इन दोनों गीतों के इन दो अंतरों में कितनी समानता है, है न? क्या कैफ़ी साहब ने शैलेन्द्र जी के लिखे गीत से इन्स्पायर् होकर ही 'अनुपमा' के इस गीत का वह अंतरा लिखा था? ख़ैर, यह तो बस एक ऒबज़र्वेशन थी, हक़ीक़त तो यही है कि ये दोनों गीत ही अपनी अपनी जगह लाजवाब हैं। तो आइए पियानो पर रचा फ़िल्म 'अनुपमा' का यह सदाबहार गीत सुनते हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि अमेरीकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकॊन व्हाइट हाउस में "चिकरिंग् ग्रैण्ड पियानो" का इसतमाल करते थे।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 06/शृंखला 10
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.

सवाल १ - किस अभिनेता पर है ये गीत फिल्माया - २ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - ३ अंक
सवाल ३ - संगीतकार कौन हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शृंखला का आधा पड़ाव आ चुका है और अमित जी २ अंकों से आगे हैं अंजना जी से, कल हमारे अंजाना जी जाने कैसे चुका गए, खैर विजय जी भी जमे हैं हिन्दुस्तानी जी और शरद जी से साथ मैदान में...

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
विशेष सहयोग: सुमित चक्रवर्ती


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, February 8, 2011

धडकते दिल की तम्मना हो मेरा प्यार हो तुम....कितने कम हुए है इतने मासूम और मुकम्मल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 588/2010/288

सुरैया के गाये सुमधुर गीतों से सजी लघु शृंखला 'तेरा ख़याल दिल से भुलाया ना जाएगा' की आठवीं कड़ी के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आप सभी हम हार्दिक स्वागत करते हैं। आज की कड़ी के लिए हमने जो गीत चुना है वह ना केवल सुरैया जी के संगीत सफ़र का एक अहम अध्याय रहा है, बल्कि इस गीत के संगीतकार के लिए भी एक मीलस्तंभ गीत सिद्ध हुआ था। ये कमचर्चित और अण्डर-रेटेड म्युज़िक डिरेक्टर थे ग़ुलाम मोहम्मद। १९६१ की फ़िल्म 'शमा' का बेहद मशहूर और ख़ूबसूरत गीत "धड़कते दिल की तमन्ना हो मेरा प्यार हो तुम, मुझे क़रार नहीं जब से बेक़रार हो तुम"। गीत नहीं, बल्कि ग़ज़ल कहें तो बेहतर होगा। कैफ़ी आज़्मी साहब ने क्या ख़ूब लफ़्ज़ पिरोये हैं इस ग़ज़ल में। ग़ुलाम मोहम्मद की तरह क़ैफ़ी साहब भी अण्डर-रेटेड रहे हैं, और उनकी लेखन प्रतिभा का फ़िल्म जगत उस हद तक लाभ नहीं उठा सका जितना उठा सकता था। आगे बढ़ने से पहले आइए इस ग़ज़ल के बाक़ी के शेर यहाँ लिखें...

धड़कते दिल की तमन्ना हो मेरा प्यार हो तुम,
मुझे क़रार नहीं जब से बेक़रार हो तुम।

खिलाओ फूल किसी के किसी चमन में रहो,
जो दिल की राह से गुज़री है वो बहार हो तुम।

ज़ह-ए-नसीब अता कि जो दर्द की सौग़ात,
वो ग़म हसीन है जिस ग़म के ज़िम्मेदार हो तुम।

चढ़ाऊँ फूल या आँसू तुम्हारे क़दमों में,
मेरी वफ़ाओं की उल्फ़त की यादगार हो तुम।

जितने सुंदर बोल, उतनी ही प्यारी धुन, और उतनी ही सुरीली आवाज़, कुल मिलाकर फ़िल्म संगीत के धरोहर का एक अनमोल नगीना है यह ग़ज़ल। ग़ुलाम मोहम्मद की बात करें तो १९२४ में वे बम्बई आये थे और ८ सालों तक संघर्ष करने के बाद उन्हें सरोज मूवीटोन में बतौर तबला वादक नियुक्ति मिली थी। उसके बाद अनिल बिस्वास और नौशाद के सहायक और वादक के रूप में काम किया। नौशाद साहब के साथ उनकी युनिंग् ख़ूब जमी और नौशाद साहब की रचनाओं में ढोलक और तबले के ठेकों का जो रंग निखर कर आता था, वो ग़ुलाम मोहम्मद साहब की ही देन थी। फ़िल्म 'आन' के बाद ग़ुलाम मोहम्मद एक स्वतंत्र संगीतकार बन गये। 'हूर-ए-अरब', 'पगड़ी', 'पारस', और 'परदेस' जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया। जहाँ तक ग़ुलाम मोहम्मद और सुरैया के साथ की बात है, १९४९ की फ़िल्म 'शायर' में एक उल्लेखनीय गीत था सुरैया का गाया हुआ "हमें तुम भूल बैठे हो, तुम्हें हम याद करते हैं"। उस ज़माने में ग़ुलाम साहब ज़्यादातर लता और शम्शाद बेगम को गवा रहे थे। १९५३ में 'दिल-ए-नादान' फ़िल्म से ग़ुलाम मोहम्मद ग़ज़लनुमा गीतों में भी महारथ हासिल कर ली, जिसकी परछाई अगले ही साल 'मिर्ज़ा ग़ालिब' में दिखाई दी। आशा भोसले, सुधा मल्होत्रा और जगजीत कौर को भी गवा लेने के बाद 'मिर्ज़ा ग़ालिब' में सुरैया के साथ उनका उत्कृष्ट काम हुआ। फिर आगे चलकर १९५८ की फ़िल्म 'मालिक' में "मन धीरे धीरे गाये रे मालूम नहीं कौन" एक सदाबहार सुरैया-तलत डुएट रहा है। और इसके बाद १९६१ की फ़िल्म 'शमा' के गानें तो हैं ही। यानी कि कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि भले ग़ुलाम मोहम्मद ने सुरैया को ज़्यादा नहीं गवाया, या युं कहें कि ज़्यादा गवाने का अवसर उन्हें नहीं मिला, लेकिन इस जोड़ी का स्कोर १००% रहा है। जितना भी काम हुआ उत्कृष्ट ही हुआ। तो आइए इस जोड़ी के नाम आज की यह शाम करते हुए फ़िल्म 'शमा' की यह सदाबहार ग़ज़ल सुनते हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि मुशायरे के रूप में ढाल कर उर्दू शायरी को ग़ुलाम मोहम्मद ने एक और फ़िल्म 'पाक दमन' (१९५७) में संगीत से सजाया था और रफ़ी, चाँदबाला, मुबारक़ बेगम और शक़ील बदायूनी की आवाज़ों का इस्तेमाल किया था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 09/शृंखला 09
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -बेहद मशहूर गीत.

सवाल १ - फिल्म के निर्देशक बताएं - १ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - गीतकार कौन हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह क्या बात है....फिर एक बार वही कहानी, अमित जी २ अंकों से आगे जरूर हैं, पर अंजाना जी जिस तरह की टक्कर उन्हें दे रहे हैं कमाल है...विजय जी और इंदु जी धन्येवाद

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, January 18, 2011

झूम झूम ढलती रात....सिहरन सी उठा जाती है लता की आवाज़ और कमाल है हेमन्त दा का संगीत संयोजन भी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 573/2010/273

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, आप सभी को हमारा नमस्कार! पिछली दो कड़ियों में हमने आपको भारत के दो ऐसे जगहों के बारे में बताया जिनके बारे में लोगों की यह धारणा बनी हुई है कि वहाँ पर भूत-प्रेत का निवास है। हालाँकि वैज्ञानिक तौर पर कुछ भी प्रमाणित नहीं हो पाया है, लेकिन इस तरह की बातें एक बार फैल जाये तो ऐसी जगहों से लोग ज़रा दूर दूर रहना ही पसंद करते हैं। और हमने आपको दो ऐसी ही सस्पेन्स थ्रिलर फ़िल्मों की कहानियां भी बताई - 'महल' और 'बीस साल बाद', और इन फ़िल्मों से लता मंगेशकर के गाये दो हौण्टिंग् नंबर्स भी सुनवाये। दोस्तों, आज हम अपने देश की सीमाओं को लांघ कर ज़रा विदेश में जा निकलते हैं। यकीन मानिए, भूत प्रेत की जितनी कहानियाँ हमारे यहाँ मशहूर हैं, उतनी ही कहानियाँ हर देश में पायी जाती है। आइए अलग अलग देशों के कुछ ऐसी ही जगहों के बारे में आज आपको बतायी जाये। ऒस्ट्रेलिया के विक्टोरिया शहर में एक असाइलम है, जिसका नाम है 'बीचवर्थ लुनाटिक असाइलम'। कहते हैं कि यहाँ पर कई मरीज़ों की आत्माएँ निवास करती हैं। यह असाइलम १८६७ में बनी थी और १९९५ में इसे बंद कर दिया गया। उसके बाद अब वहाँ कोई नहीं रहता लेकिन अजीब-ओ-ग़रीब आवाज़ें अब भी सुनने को मिलती है रातों में। ब्राज़िल के साओ-पाओलो में जोल्मा बिल्डिंग् में १ फ़रवरी १९७४ को भीषण आग लगी थी। उस अग्निकाण्ड में १३ लोगों की लिफ़्ट के अंदर जलकर मौत हो गई थी। सुनने में आता है कि अब भी उनकी आत्माएँ उस बिल्डिंग् में भटकती हैं। वह बिल्डिंग् अब भी "Mystery of the Thirteen Souls" के नाम से मशहूर है। इण्डोनेशिया में एक जगह है पेलाबुहन रातु। पौराणिक कहानी के अनुसार राजा प्रभु सिलिवांगी की बेटी रोरो किदुल, जिन्हें Queen of the South Sea कहा जाता था, ने उसी दक्षिणी समुद्र (South Sea) में कूदकर आत्महत्या की थी। अब लोग कहते हैं कि आज भी अगर कोई उस समुद्र में हरे रंग की पोशाक पहनकर तैरने जाता या जाती है, तो रोरो की आत्मा उसे समुंदर के गहरे में खींच ले जाती है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि 'समुद्र बीच होटल' का कमरा नं-३०८ आज भी आरक्षित है रानी के लिए। ताइवान के ताइपेइ में हयात होटल में भूतों का निवास है, और तभी तो उसकी लॊबी में चीनी भाषा में भूत-निवारण का इंतज़ाम देखा जा सकता है। सिंगापुर में 'The Old Changi Hospital' में भूतों का वास है ऐसा कहा जाता है। ३० के दशक में इस अस्पताल का निर्माण हुआ था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान युद्धबंधियों को अस्पताल में बंदी बनाकर रखा जाता था और बाद में मौत के घाट उतार दिया जाता था। कहा जाता है कि विभिन्न जाति और देशों के युद्दबंधियों की आत्माएँ महसूस की जा सकती है आज भी। और दोस्तों, सब से ज़्यादा भूत-प्रेत की कहानियाँ जिस देश में सुनी जाती है, वह है इंगलैण्ड। इसलिए हमने सोचा कि इस देश की प्रचलित भूतिया क़िस्सों को हम आगे चलकर एक अंक में अलग से पेश करेंगे। ये सब तो थे ऐसे क़िस्से जो सालों से, दशकों से, युगों से लोगों की ज़ुबाँ से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है, लेकिन वैज्ञानिक तौर पर किसी की भी पुष्टि नहीं हो पायी है। लेकिन हम बस इन घटनाओं और क़िस्सों को बताकर ही इस शृंखला का समापन नहीं करेंगे। आगे चलकर इस शृंखला में एक ऐसा भी अंक पेश होगा जिसमें हम भूत-प्रेत और आत्माओं के अस्तित्व को लेकर वैज्ञानिक चर्चा भी करेंगे।

आइए आज सुनते हैं हेमंत कुमार की ही एक और सस्पेन्स थ्रिलर 'कोहरा' का एक डरावना गीत - "झूम झूम ढलती रात, लेके चली मुझे अपने साथ"। फिर एक बार लता जी की आवाज़, हेमंत दा का संगीत, कैफी आज़मी के बोल, और फिर एक बार एक सफल सस्पेन्स थ्रिलर। इस फ़िल्म की कहानी के बारे में भी आपको बताना चाहेंगे। अपने पिता के मौत के बाद राजेश्वरी अनाथ हो जाती है, और बोझ बन जाती है एक विधवा पर जो माँ है एक ऐसे बेटे रमेश की जिसकी मानसिक हालत ठीक नहीं। उस औरत का यह मानना है कि अगर राजेश्वरी रमेश से शादी कर ले तो वो ठीक हो जाएगा। लेकिन राजेश्वरी को कतई मंज़ूर नहीं कि वो उस पागल से शादी करे, इसलिए वो आत्महत्या करने निकल पड़ती है। लेकिन संयोगवश उसकी मुलाक़ात हो जाती है राजा अमित कुमार सिंह से। दोनों मिलते हैं, उन्हे एक दूजे से प्यार हो जाता है, और फिर वे शादी कर लेते हैं। राजेश्वरी का राजमहल में स्वागत होता है। इस ख़ुशी को अभी तक वो हज़म भी नहीं कर पायी थी कि उसे पता चलता है कि अमित का पूनम नाम की किसी लड़की से एक बार शादी हुई थी जो अब इस दुनिया में नहीं है। और तभी शुरु होता है डर! राजेश्वरी को महसूस होता है कि पूनम की आत्मा अब भी महल में मौजूद है। ख़ास कर उनके शयन कक्ष में जहाँ वो देखती है कि कुर्सियाँ ख़ुद ब ख़ुद हिल रहीं हैं, बिस्तर पर बैठते ही लगता है कि जैसे अभी कोई लेटा हुआ था वहाँ, खिड़कियाँ अपने आप ही खुल जाया करती हैं, और उसे किसी की आवाज़ भी सुनाई देती है। और फिर एक दिन पुलिस बरामद करता है पूनम का कंकाल!!! किसने कत्ल किया था पूनम का? क्या अमित ही ख़ूनी है? क्या वाक़ई पूनम की आत्मा भटक रही है हवेली में? अब क्या होगा राजेश्वरी का? यही थी कोहरा की कहानी, जो अपने ज़माने की एक मशहूर सस्पेन्स थ्रिलर रही। तो लीजिए आज का गीत सुनिए....



क्या आप जानते हैं...
कि हेमन्त कुमार 'बीस साल बाद' के "कहीं दीप जले कहीं दिल" को पहले पहले गीता दत्त से गवाना चाह रहे थे। पर उनके घर में रिहर्सल के दौरान "ज़रा मिलना नज़र पहचान के" का वह आवश्यक नाज़ुक लहज़ा जब गीता नहीं ला पाई तो हेमन्त ने उनसे माफ़ी माँग कर लता को बुला लिया।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 04/शृंखला 08
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - इतना बहुत है इस यादगार गीत को पहचानने के लिए.

सवाल १ - गीतकार बताएं - 2 अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - 1 अंक
सवाल ३ - संगीतकार कौन हैं - 1 अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी छाये हुए हैं, शरद जी और इंदु जी भी सही हैं...इंदु जी हम बढ़ावा नहीं दे रहे हैं....की ये जो फ़िल्में हैं इन बातों को बढ़ाव दे रही है ? नहीं दरअसल इन सब में मानव मन की स्वाभाविक दिलचस्पी रहती है, तो महज उसे बांटा जा रहा है. कृपया लडें नहीं बाबा....

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, October 6, 2010

ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं.....वीभत्स रस को क्या खूब उभरा है रफ़ी साहब ने इस दर्द भरे नगमें में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 499/2010/199

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! आज है इस स्तंभ की ४९९ वीं कड़ी। नौ रसों की चर्चा में अब बस एक ही रस बाक़ी है और वह है विभत्स रस। जी हाँ, 'रस माधुरी' लघु शृंखला की अंतिम कड़ी में आज ज़िक्र विभत्स रस का। विभत्स रस का अर्थ है अवसाद, या मानसिक अवसाद भी कह सकते हैं इसे। अपने आप से हमदर्दी इस रस का एक लक्षण है। कहा गया है कि विभत्स रस से ज़्यादा क्षतिकारक और व्यर्थ रस और कोई नहीं। विभत्स उस भाव को कहते हैं कि जिसमें है अतृप्ति, अवसाद और घृणा। गाली गलोच और अश्लीलता भी विभत्स रस के ही अलग रूप हैं। विभत्स रस के चलते मन में निराशावादी विचार पनपने लगते हैं और इंसान अपने धर्म और कर्म के मार्ग से दूर होता चला जाता है। शक्ति और आत्मविश्वास टूटने लगता है। यहाँ तक कि आत्महत्या की भी नौबत आ सकती है। अगर इस रस का ज़्यादा संचार हो गया तो आदमी मानसिक तौर पर अस्वस्थ होकर उन्मादी भी बन सकता है। विभत्स रस से बाहर निकलने का सब से अच्छा तरीक़ा है शृंगार रस का सहारा लेना। अच्छे मित्र और अच्छी रुचियाँ इंसान को मानसिक अवसाद से बाहर निकालने में मददगार साबित हो सकती हैं। दोस्तों, विभत्स रस के ये तमाम विशेषताओं को पढ़ने के बाद आप समझ गए होंगे कि हमारी फ़िल्मों में इस रस के गीतों की कितनी प्रचूरता है। "तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं, अब तो पास बुलाले" जैसे गीत इस रस के उदाहरण है। तलत महमूद साहब ने इस तरह के निराशावादी और ग़मगीन गीत बहुत से गाए हैं। लेकिन हमने आज के लिए जिस गीत को चुना है, वह है १९७१ की फ़िल्म 'हीर रांझा' का मोहम्मद रफ़ी साहब का गाया "ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं"। अपनी हीर से जुदा होकर दीवाना बने रांझा की ज़ुबान से निकले इस गीत में शब्दों के रंग भरे हैं गीतकार कैफ़ी आज़्मी ने और संगीत है मदन मोहन का।

वैसे तो मदन मोहन के साथ लता मंगेशकर का नाम जोड़ा जाता है अपने सर्वोत्तम गीतों के लिए, लेकिन सच्चाई यह है कि मदन मोहन साहब ने जितने भी गायक गायिकाओं से अपने गीत गवाए हैं, उन सभी से वो उनके १००% पर्फ़ेक्शन लेकर रहे हैं। फिर चाहे आशा भोसले हो या किशोर कुमार, मुकेश हो या तलत महमूद, भूपेन्द्र हो या फिर रफ़ी साहब। और यही बात गीतकारों के लिए भी लागू होती है। कैफ़ी आज़्मी के साथ मदन मोहन ने फ़िल्म 'हक़ीक़त' में काम किया जिसके गानें कालजयी बन गये हैं। और फ़िल्म 'हीर रांझा' के गानें भी उसी श्रेणी में शोभा पाते हैं। इस गीत के बोल मुकम्मल तो हैं ही, इसकी धुन और संगीत संयोजन भी कमाल के हैं। फ़िल्म के सिचुएशन और सीन के मुताबिक़ गीत के इंटरल्युड संगीत में कभी बांसुरी पर भजन या कीर्तन शैली की धुन है तो अगले ही पल क़व्वाली का रीदम भी आ जाता है। तो आइए सुनते हैं यह गीत और इसी के साथ नौ रसों पर आधारित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की यह लघु शृंखला 'रस माधुरी' यहीं सम्पन्न होती है। आशा है इन रसों का आपने भरपूर रसपान किया होगा और हमारे चुने हुए ये नौ गीत भी आपको भाए होंगे। आपको यह शृंखला कैसी लगी, यह आप हमें टिप्पणी के अलावा हमारे ईमेल पते oig@hindyugm.com पर भी भेज सकते हैं। दोस्तों, कल है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का ५००-वाँ अंक। इस ख़ास अवसर पर हमने कुछ विशेष सोच रखा है आपके मनोरंजन के लिए। तो अवश्य पधारिएगा कल इसी समय अपने इस मनपसंद ब्लॊग पर। और हाँ, आज जो हम पहेली पूछने जा रहे हैं, वह होगा उस गीत के लिए जो बजेगा हमारे ५०१ अंक में। तो अब हमें इजाज़त दीजिए, और आप हल कीजिए आज की पहेली का और आनंद लीजिए रफ़ी साहब की आवाज़ का। नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि मुम्बई के ब्रीच कैण्डी का बॊम्बेलिस रेस्तराँ मदन मोहन की पसंदीदा जगहों में से एक थी जहाँ तलत महमूद और जयकिशन भी जाया करते थे। जिस दिन तीनों वहाँ मौजूद हों तो उनमें एक होड़ सी लग जाती थी कि कितनी लड़कियाँ किससे ऒटोग्राफ़ माँगती हैं। इसमें तलत की ही अक्सर जीत होती थी।

दोस्तों आज पहेली नहीं है. बल्कि एक निमंत्रण है, कल के ओल्ड इस गोल्ड के लिए, जो कि हमारी इस कोशिश में एक मील का पत्थर एपिसोड होने वाला है. कल ओल्ड इस गोल्ड भारतीय समय अनुसार सुबह ९ बजे प्रसारित होगा. जिसमें हम बात करेंगें भारत की पहली बोलती फिल्म "आलम आरा" की जिसके माध्यम से से हमें फिल्म संगीत की अनमोल धरोहर आज मिली हुई है. उन कलाकारों की जिन्होंने एक असंभव से लगते कार्य को अंजाम दिया. और एक बड़ी कोशिश हम कर रहे हैं. जैसा कि आप जानते होंगें भारत के पहली हिंदी फ़िल्मी गीत "दे दे खुदा के नाम पर" जो कि इसी फिल्म का था, कहीं भी ऑडियो विडियो के रूप में उपलब्ध नहीं है. एक प्रतियोगिता के माध्यम से हमने इस गीत को मुक्कमल किया (उपलब्ध बोलों को विस्तरित कर) और प्रतियोगिता के माध्यम से ही उसे हमारे संगीतकार मित्रों से स्वरबद्ध करा कर. जिस प्रविष्ठी को हमने चुना है इस गीत के नए संस्करण के रूप में उसे भी हम कल के एतिहासिक एपिसोड में आपके सामने रखेंगें....यदि आप को हमारी ये कोशिश अच्छी लगेगी तो हम इस तरह के प्रयोग आलम आरा के अन्य गीतों के साथ भी करना चाहेंगें. तो कल अवश्य पधारियेगा हमारी इस यादगार महफ़िल में. जहाँ तक पहेली का सवाल है ये एक नए रूप में आपके सामने होगी ५०१ वें एपिसोड से. शरद जी और अवध जी १०० का आंकड़ा छूने में सफल रहे हैं. इनके लिए एक खास तोहफा है जो हम देंगें इन्हें हमारे वार्षिक महोत्सव में. इसके आलावा जिन प्रतिभागियों ने बढ़ चढ कर पहेली में हिस्सा लिया उन सब का आभार तहे दिल से.....सबका नाम शायद नहीं ले पायें यहाँ पर जहाँ तक "." का चिन्ह आपको दिखे समझिए वो सब आप श्रोताओं के नाम हैं.....इंदु जी, प्रतिभा जी, नवीन जी, पदम सिंह जी, पाबला जी, मनु जी, सुमित जी, तन्हा जी, दिलीप जी, महेंद्र जी, निर्मला जी, स्वप्न मंजूषा जी, किशोर जी, राज सिंह जी, नीलम जी, शन्नो जी, ......................................................... सभी का आभार.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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