बुधवार, 21 दिसंबर 2011

आओ झूमें गायें, मिलके धूम मचायें....क्योंकि दोस्तों जश्न है ये ज़िदगी



किसी स्कूली छात्र को अगर "गाँव" शीर्षक पर निबन्ध लिखने को कहा जाये तो वह जिन जिन बातों का ज़िक्र करेगा, जिस तरह से गाँव का चित्रण करेगा, वो सब कुछ इस गीत में दिखाई देता है, और जैसे एक आदर्श गाँव का चित्र उभरकर हमारे सामने आता है। फ़िल्म 'पराया धन' शुरु होती है इसी गीत से और गीत में ही फ़िल्म की नामावली को शामिल किया गया है।

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 814/2011/254

'आओ झूमें गायें' शृंखला की चौथी कड़ी में इसी गीत की बारी। फ़िल्म 'पराया धन' का यह गीत "आओ झूमें गायें" को जितनी भी सुनें अच्छा ही लगता है। गीत के बोल, संगीत-रचना, और गायकों की अदायगी, सब कुछ इतना सुंदर है कि गीत दिल को छू लेता है। ख़ास कर आशा जी नें जो अल्हड़ता दिखाई है अपनी आवाज़ के ज़रिये, वही इस गीत का एक्स-फ़ैक्टर है और गीत के अन्त तक हमें गीत से जोड़े रखता है। फ़िल्मांकन की बात करे तो वह भी बड़ा ही ख़ूबसूरत है। किसी स्कूली छात्र को अगर "गाँव" शीर्षक पर निबन्ध लिखने को कहा जाये तो वह जिन जिन बातों का ज़िक्र करेगा, जिस तरह से गाँव का चित्रण करेगा, वो सब कुछ इस गीत में दिखाई देता है, और जैसे एक आदर्श गाँव का चित्र उभरकर हमारे सामने आता है। फ़िल्म 'पराया धन' शुरु होती है इसी गीत से और गीत में ही फ़िल्म की नामावली को शामिल किया गया है। गीत को एक पार्श्व-संगीत के रूप में प्रयोग किया गया है और दृश्य में गाँव की ख़ुशहाली, पैदावार, फ़सलों की कटाई, उन्हें बाज़ार तक पहुँचाने की प्रक्रिया वगेरह दिखाई गई है। बलराज साहनी और हेमा मालिनी तथा अन्य गाँववालों पर फ़िल्माया यह गीत एक बहुत ही पॉज़िटिव फ़ील पैदा करता है।

'पराया धन' १९७१ की फ़िल्म थी जिसका निर्माण व निर्देशन राजेन्द्र भाटिया नें किया था। बलराज साहनी, हेमा मालिनी, राकेश रोशन, अजीत, अभि भट्टाचार्य प्रमुख अभिनीत इस फ़िल्म के गीत लिखे थे आनन्द बक्शी नें और फ़िल्म के संगीतकार थे राहुल देव बर्मन। सुधेन्दु रॉय की कहानी, वेद राही की पटकथा और एस. खलील के संवाद से सजी इस फ़िल्म को ख़ूब सफलता मिली थी। सुन्दर पर्वतीय लोकेशन के मनोरम पार्श्व नें लोगों को जितना आकर्षित किया, उतना ही आकर्षण हेमा मालिनी की ख़ूबसूरत अंदाज़ों नें भी किया और साथ ही फ़िल्म के गीतों के भी क्या कहने थे! प्रस्तुत गीत के अलावा किशोर कुमार के गाये "आज उनसे पहली मुलाक़ात होगी", "दिल हाय मेरा दिल तेरा दिल", लता-किशोर का गाया "तू प्यार तू प्रीत", आशा-मन्ना का एवरग्रीन होली गीत "होली रे होली मस्तों की टोली" जैसे गीत उस ज़माने में तो गली-गली गूंजे ही थे, आज भी आय दिन रेडियो में बज उठते हैं। इस होली गीत को होली के दिन अगर न सुन लें तो लगता है जैसे होली के रंग भी फीके पड़ गए हों। चलिए अब इस गीत को सुना जाये और खो जायें एक सुन्दर पर्वतीय गाँव के दृश्यों में।



मित्रों, ये आपके इस प्रिय कार्यक्रम "ओल्ड इस गोल्ड" की अंतिम शृंखला है, ८०० से भी अधिक एपिसोडों तक चले इस यादगार सफर में हमें आप सबका जी भर प्यार मिला, सच कहें तो आपका ये प्यार ही हमारी प्रेरणा बना और हम इस मुश्किल काम को इस अंजाम तक पहुंचा पाये. बहुत सी ऐसी बातें हैं जिन्हें हम सदा अपनी यादों में सहेज कर रखेंगें. पहले एपिसोड्स से लेकर अब तक कई साथी हमसे जुड़े कुछ बिछड़े भी पर कारवाँ कभी नहीं रुका, पहेलियाँ भी चली और कभी ऐसा नहीं हुआ कि हमें विजेता नहीं मिला हो. इस अंतिम शृंखला में हम अपने सभी नए पुराने साथियों से ये गुजारिश करेंगें कि वो भी इस श्रृखला से जुडी अपनी कुछ यादें हम सब के साथ शेयर करें....हमें वास्तव में अच्छा लगेगा, आप सब के लिखे हुए एक एक शब्द हम संभाल संभाल कर रखेंगें, ये वादा है.

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें admin@radioplaybackindia.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें +91-9811036346 (सजीव सारथी) या +91-9878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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