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Wednesday, November 11, 2009

कि अब ज़िन्दगी में मोहब्बत नहीं है....कैफ़ इरफ़ानी के शब्दों में दिल का हाल कहा मुकेश ने

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #५९

ज की महफ़िल में हम हाज़िर हैं शरद जी की पसंद की दूसरी नज़्म लेकर। इस नज़्म में जिसने आवाज़ दी है, उसके गुजर जाने के बाद बालीवुड के पहले शो-मैन राज कपूर साहब ने कहा था कि "मुकेश के जाने से मेरी आवाज और आत्मा,दोनों चली गई"। जी हाँ, आज की महफ़िल मुकेश साहब यानि कि "मुकेश चंद माथुर" को समर्पित है। यह देखिए कि शरद जी की बदौलत पिछली बार हमें मन्ना दा का एक गीत सुनना नसीब हुआ था और आज संगीत के दूसरे सुरमा मुकेश साहब का साथ हमें मिल रहा है। तो आज हम मुकेश साहब के बारे में, उनके पहले सफ़ल गीत, अनिल विश्वास साहब और नौशाद साहब से उनकी मुलाकात और सबसे बड़ी बात राज कपूर साहब से उनकी मुलाकात के बारे में विस्तार से जानेंगे।(साभार:लाइव हिन्दुस्तान) मुकेश चंद माथुर का जन्म २२ जुलाई १९२३ को दिल्ली में हुआ था। उनके पिता लाला जोरावर चंद माथुर एक इंजीनियर थे और वह चाहते थे कि मुकेश उनके नक्शे कदम पर चलें. लेकिन वह अपने जमाने के प्रसिद्ध गायक अभिनेता कुंदनलाल सहगल के प्रशंसक थे और उन्हीं की तरह गायक अभिनेता बनने का ख्वाब देखा करते थे। लालाजी ने मुकेश की बहन सुंदर प्यारी को संगीत की शिक्षा देने के लिए एक शिक्षक रखा था। जब भी वह उनकी बहन को संगीत सिखाने घर आया करते थे, मुकेश पास के कमरे में बैठकर सुना करते थे और स्कूल में सहगल के अंदाज में गीत गाकर अपने साथियों का मनोरंजन किया करते थे। इस दौरान मशहूर संगीतकार रोशन हारमोनियम पर उनका साथ दिया करते थे। गीत-संगीत में रमे मुकेश ने किसी तरह दसवीं तक पढाई करने के बाद स्कूल छोड दिया और दिल्ली लोक निर्माण विभाग में सहायक सर्वेयर की नौकरी कर ली. जहां उन्होंने सात महीने तक काम किया। इसी दौरान अपनी बहन की शादी में गीत गाते समय उनके दूर के रिश्तेदार मशहूर अभिनेता मोतीलाल ने उनकी आवाज सुनी और प्रभावित होकर वह उन्हें १९४० में बम्बई ले आए और उन्हें अपने साथ रखकर पंडित जगन्नाथ प्रसाद से संगीत सिखाने का भी प्रबंध किया। इसी दौरान खूबसूरत मुकेश को एक हिन्दी फिल्म निर्दोष(१९४१) में अभिनेता बनने का मौका मिल गया, जिसमें उन्होंने अभिनेता-गायक के रूप में संगीतकार अशोक घोष के निर्देशन मेंअपना पहला गीत.दिल ही बुझ हुआ हो तो.भी गाया। इस फिल्म में उनकी नायिका नलिनी जयवंत थीं, जिनके साथ उन्होंने दो युगल गीत भी गाए। यह फिल्म फ्लाप हो गई और मुकेश के अभिनेता-गायक बनने की उम्मीदों को तगडा झटका लगा।

मुकेश का कैरियर जब डगमगाने लगा था, तभी मोतीलाल प्रसिद्ध संगीतकार अनिल विश्वास के पास उन्हें लेकर गए और उनसे अनुरोध किया कि वह अपनी फिल्म में मुकेश से कोई गीत गवाएं। मुकेश को कामयाबी मिली निर्माता मजहर खान की फिल्म पहली नजर(१९४५) के गीत "दिल जलता है तो जलने दे" से जो संयोग से मोतीलाल पर ही फिल्माया गया था। अनिल विश्वास के संगीत निर्देशन में डा.सफदर सीतापुरी की इस गजल को मुकेश ने सहगल की शैली में ऐसी पुरकशिश आवाज में गाया कि लोगों को भ्रम हो जाता था कि इसके गायक सहगल हैं। और तो और खुद सहगल ने भी इस गजल को सुनने के बाद कहा था अजीब बात है। मुझे याद नहीं आता कि मैंने कभी यह गीत गाया है । इसी गीत को सुनने के बाद सहगल ने मुकेश को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। हालांकि इस गीत ने मुकेश को गायक के रूप में पहचान दिलाई लेकिन उन्हें यह कामयाबी इतनी आसानी से नहीं मिली। फिल्म जब रिलीज के लिए तैयार थी तब वितरकों और समालोचकों ने इसे देखने के बाद कहा कि गीत हीरो की छवि पर फिट नहीं बैठता है। उन्होंने इस गीत को फिल्म से हटाने का सुझाव दिया। यह सुनकर मुकेश की आंखों में आंसू आ गए और उन्होंने निर्माता मजहर खान से ही कोई सुझाव देने का अनुरोध किया। इस पर मजहर खान ने कहा कि यह गीत सिर्फ पहले शो के लिए फिल्म में रखा जाएगा। इस बारे अंतिम निर्णय दर्शकों की प्रतिक्रिया देखने के बाद ही लिया जाएगा। दर्शकों से इस गाने को जब जबरदस्त तारीफ मिली और लोग यह गीत गाते हुए सिनेमाघर से निकलने लगे तब मजहर खान ने कहा मेरी बात याद रखना। एक दिन आएगा जब कोई मेरी फिल्म को याद नहीं रखेगा लेकिन तुम्हारा गीत हमेशा याद रखा जाएगा।
यह बात सच साबित हुई और आज देखिए भले हीं किसी को "पहली नज़र" की जानकारी हो या नहीं हो लेकिन "दिल जलता है तो जलने दे" हर किसी के दिल में जगह बनाए हुए है। और यह भी सच है कि आज ९०% लोग यही सोचते हैं कि इस गाने को खुद सहगल साहब ने गाया था। शायद यही कारण था कि मुकेश साहब अपनी अलग पहचान बनाना चाहते थे। अब इस प्रक्रिया में उनका साथ अनिल विश्वास साहब ने दिया या फिर नौशाद साहब ने, इसमें भयंकर मतभेद है। इसलिए हम दोनों का मत देख लते हैं।

बकौल अनिल विश्वास: मुकेश दूसरा कुंदनलाल सहगल बनने की चाह लिए मेरे पास आया था। उसने सहगल की आवाज में नौशाद का रिकार्ड सुना था, जो शाहजहां फिल्म का गीत "जब दिल ही टूट गया" था। इसलिए मैंने उससे पहली नजर में "दिल जलता है तो जलने दे" सहगल के अंदाज में गवाया। फिर मैंने मुकेश से कहा कि हमने यह बात साबित कर दी है कि हम एक और सहगल बना सकते हैं। पर अब यह साबित करना है कि मुकेश वास्तविक मुकेश है, सहगल की नकल भर नहीं है। मैंने मुकेश को सहगल के रूप में पेश किया और मैंने ही "अनोखा प्यार" में उसकी विशिष्ट आवाज में "जीवन सपना टूट गया" और "अब याद न कर भूल जा ऐ दिल वो फसाना" गवाकर उसे सहगल के प्रभाव से बाहर निकाला।

और नौशाद साहब की यह दलील थी:: मैंने दिलीप कुमार के लिए मेला और अंदाज में मुकेश से पहले-पहल उनकी विशिष्ट शैली में गवाया था। गायक बनने के प्रारंभिक दौर में मुकेश को शराब पीने की बडी हीं बुरी लत थी। एक दिन मैंने उन्हें कारदार स्टूडियो में दिन के समय नशे की हालत में पकड लिया। मैंने उनसे कहा मुकेशचंद तुम "दिल जलता है" से साबित कर चुके हो कि तुम सहगल बन सकते हो लेकिन अब क्या तुम साबित करना चाहते हो कि तुम पीने के मामले में भी सहगल को पछाड सकते हो। यह सुनकर मुकेश की आंखों में आंसू आ गए। मैंने कहा तुम्हारी अपनी अनूठी आवाज है तुम्हें अपनी गायकी को साबित करने के लिए सहगल या किसी दूसरे गायक की आवाज की नकल करने की जरूरत नहीं है।

अब चाहे इस बात का श्रेय जिसे भी मिले, लेकिन यह अच्छा हुआ कि हमें अनोखा एक मुकेश मिल गया जिसकी आवाज़ सुनकर हम आज भी कहीं खो-से जाते हैं, जो दूसरे गायकों को सुनकर कम हीं होता है। वैसे राजकपूर से मुकेश की मुलाकात की कहानी भी बड़ी हीं दिलचस्प है। १९४३ की बात है। उस समय राजकपूर सहायक निर्देशक हुआ करते थे। रंजीत स्टूडियो में जयंत देसाई की फिल्म "बंसरी" के सेट पर एक खूबसूरत नौजवान किन्हीं खयालों में खोया हुआ पियानो पर एक गीत गा रहा था। वहां से गुजर रहे राजकपूर उस गीत को सुनकर कुछ देर के लिए ठिठक गए। पूछने पर पता लगा कि वह युवक मुकेश है। आगे चलकर दोनों के बीच घनिष्ठ मित्रता हो गई और मुकेश आखिरी दम तक राजकपूर की आवाज बने रहे।

चलते-चलते हम मुकेश साहब के बारे में सलिल दा के ख़्यालात जान लेते हैं: जिस क्षण मैंने "सुहाना सफर" की रिकार्डिंग की, उसी समय मैं जान गया था कि मुकेश के स्वर ने "मधुमती" के इस गीत के अल्हड भाव को आत्मसात कर लिया है। मैं "जागते रहो" के "जिंदगी ख्वाब है" और "चार दीवारी" के "कैसे मनाऊं पियवा" को भी इस गीत से कमतर नहीं मानता हूं। बाद के वर्षों में मुकेश ने "आनन्द" के "कहीं दूर जब दिन ढल जाए" में भावनाओं की असीम गहराई को अपने मधुर स्वर से अभिव्यक्ति दी थी। इस गीत को मैं मुकेश के गाए गीतों में सर्वश्रेष्ठ मानता हूं। मुकेश साहब के बारे में कहने को और भी बहुत कुछ है, लेकिन बाकी बातें कभी दूसरे आलेख में करेंगे।

आज की नज़्म के रचनाकार कैफ़ इरफ़ानी साहब के बारे में ज्यादा जानकारी हासिल नहीं हो पाई है। हाँ इतना मालूम हुआ है कि उन्होंने ५०-६० के दशक में बीस से भी ज्यादा फिल्मों में गीत लिखे थे। उनमें से कुछ फिल्मों की फेहरिश्त लगे हाथों पेश किए देता हूँ: आगोश, डाकू की लड़की, धुन, गुल सनोबर, जल तरंग, मल्हार, मिस-५८, नाच, राग-रंग, राजपूत, सरदार, शान, शीशम, शेरू, तराना, तूफ़ान। इन्हीं फिल्मों में से एक "डाकू की लड़की" के एक गीत की कुछ पंक्तियाँ हमारे दिल को छू गई, इसलिए आप सबके सामने उसे लाना लाज़िमी है:

नज़रों से छुप गया है तक़दीर का सवेरा
गिरता है जो भी आँसू लेता है नाम तेरा


दिल में कोई कसक महसूस हुई या नहीं। हुई ना! तो इस कसक को हजार-गुणा करने के लिए दर्द से लबरेज आज की नज़्म पेश-ए-खिदमत है। मुकेश साहब की आवाज़ में छुपी टीस का पान करने के लिए तैयार हो जाईये:

जियेंगे मगर मुस्कुरा ना सकेंगे,
कि अब ज़िन्दगी में मोहब्बत नहीं है
लबों पे ____ अब आ ना सकेंगे,
कि अब ज़िन्दगी में मोहब्बत नहीं है

बहारें चमन में जब आया करेंगी,
नज़ारों की महफ़िल सजाया करेंगी
नज़ारें भी हमको हँसा ना सकेंगे,
कि अब ज़िन्दगी में मोहब्बत नहीं है

जवानी जो लायेगी सावन की रातें,
ज़माना करेगा मोहब्बत की बातें
मगर हम ये सावन मना ना सकेंगे,
कि अब ज़िन्दगी में मोहब्बत नहीं है




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "मुकद्दर" और शेर कुछ यूं था -

ये जानके चुपचाप हैं मेरे मुकद्दर की तरह,
हमने तो इनके सामने खोला था दिल के राज को...

महफ़िल में सबसे पहले हाज़िर हुए शरद कोकास साहब...शरद जी, आपका बहुत-बहुत स्वागत है। यह नज़्म है हीं कुछ ऐसी कि पसंद न आने का सवाल हीं नहीं उठता।

हालांकि महफ़िल की शुरूआत हो चुकी थी, लेकिन महफ़िल की विधिवत शुरूआत (शेर पेश करके) कुलदीप जी ने की। आपने साकी अमरोही साहब का यह शेर पेश किया:

काम आपने मुकद्दर का अँधेरा नहीं होता
सूरज तो निकलता है सवेरा नहीं होता। (साकी साहब के बारे में हमें अंतर्जाल पर कुछ नहीं मिला, आप अगर कुछ जानकारी मुहैया कराएँगे तो अच्छा होगा)

अंजुम साहब के बाद महफ़िल में नज़र आए शामिख जी। ये रहे आपके कुछ शेर:

ज़िन्दगी का मुक़द्दर सफ़र दर सफ़र
आख़िरी साँस तक बेक़रार आदमी (निदा फ़ाज़ली)

हाथ में जाम जहाँ आया मुक़द्दर चमका
सब बदल जायेगा क़िस्मत का लिखा, जाम उठा (बशीर बद्र)

रेखाओं का खेल है मुक़द्दर
रेखाओं से मात खा रहे हो (कैफ़ी आज़मी)

राज जी, आपके जैसे अगर कला के कद्रदान हों तो कोई खुद को अकेला कैसे महसूस कर सकता है। हौसला-आफ़ज़ाई के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया। आप इसी तरह महफ़िल में आते रहें और महफ़िल में चार चाँद लगाते रहें,यही आरजू है हमारी।

मंजु जी, क्या बात है!! वाह, बहुत उम्दा स्वरचित कहा है आपने:

मुकद्दर ने ही संघषों की अमावस्या - सी काली रात को ,
दीये की रोशनी की तरह जीवन में उजाला भर दिया है।

सीमा जी, देर हुई- कोई बात नहीं। शेर कहने से नहीं चूके आप, यह देखकर अच्छा लगा। यह रही आपकी पेशकश:

पेशानियों पे लिखे मुक़द्दर नहीं मिले,
दस्तार कहाँ मिलेंगे जहाँ सर नहीं मिले (राहत इन्दौरी)

क़फ़स में खींच ले जाये मुक़द्दर या नशेमन में।
हमें परवाज़ से मतलब है, चलती हो हवा कोई॥ (सीमाब अकबराबादी)

वाणी जी, आपको नज़्म पसंद आई, इसके लिए एक हीं आदमी हैं, जिनका शुक्रिया अदा करना चाहिए - शरद जी। लेकिन यह देखिए महफ़िल जिसके कारण मुमकिन हो पाई, वही नदारद हैं। कहाँ हैं शरद जी????

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, August 27, 2008

ओ जाने वाले हो सके तो ....

हृदयनाथ मंगेशकर द्वारा लिखित संस्मरण

हजारों गाने गानेवाले मुकेश दा के आखिरी शब्‍द थे – ‘यह पट्टा खोल दो’

खुशमिज़ाज मुकेश
तीस हजार फुट की ऊँचाई पर हमारा जहाज उड़ा जा रहा है। रूई के गुच्‍छों जैसे अनगिनत सफेद बादल चारों ओर छाए हुए हुए हैं। ऊपर फीके नीले रंग का आसमान है। इन बादलों और नीले आकाश से बनी गुलाबी क्षितिज रेखा दूर तक चली गई है। कभी-कभी कोई बड़ा सा बादल का टुकड़ा यों सामने आ जाता है, माने कोई मजबूत किला हो। हवाई जहाज की कर्कश आवाज को अपने कानों में झेलते हुए मैं उदास मन से भगवान की इस लीला को देख रहा हूँ।

अभी कल-परसों ही जिस व्‍यक्ति के साथ ताश खेलते हुए और अपने अगले कार्यक्रमों की रूपरेखा बनाते हुए हमने विमान में सफर किया था, उसी अपने अतिप्रिय, आदरणीय मुकश दा का निर्जीव, चेतनाहीन, जड़ शरीर विमान के निचले भाग में रखकर हम लौट रहे हैं। उनकी याद में भर-भर आनेवाली ऑंखों को छिपाकर हम उनके पुत्र नितिन मुकेश को धीरज देते हुए भारत की ओर बढ़ रहे हैं।

आज 29 अगस्‍त है। आज से ठीक एक महीना एक दिन पहले मुकेश दा यात्री बनकर विमान में बैठे थे। आज उसी देश को, जिसमें पिछले 25 वर्षों का एक दिन, एक घण्‍टा, एक क्षण भी ऐसा नहीं गुजरा था कि जब हवा में मुकश दा का स्‍वर न गूंज रहा हो; जिसमें एक भी व्‍यक्ति ऐसा नहीं था, जिसने मुकेश दा का स्‍वर सुनकर गर्दन न‍ हिला दी हो; जिसमें एक भी ऐसा दुखी जीव नहीं था, जिसने मुकेश दा की दर्द-भरी आवाज में अपने दुखों की छाया न देखी हो। सर्वसाधारण के लिए दुख शाप हो सकता, पर कलाकार के लिए वह वरदान होता है।

अनुभूति के यज्ञ में अपने जीवन की समिधा देकर अग्नि को अधिकाधिक प्रज्‍वलित करके उसमें जलती हुई अपनी जीवनानुभूतियों और संवेदनाओं को सुरों की माला में पिरोते-पिरोते मुकेश दा दुखों की देन का रहस्‍य जान गये थे। यह दान उन्‍हें बहुत पहले मिल चुका था।

उस दिन 1 अगस्‍त था वेंकुवर के एलिजाबेथ सभागृह में कार्यक्रम की पूरी तैयारियॉं हो चुकी थीं। मुकश दा मटमैले रंग की पैंट, सफेद कमीज, गुलाबी टाई और नीला कोट पहनकर आए थे। समयानुकूल रंगढंग की पोशाकों में सजे-धजे लोगों के बीच मुकेश दा के कपड़े अजीब-से लग रहे थे। पर ईश्‍वर द्वारा दिए गए सुन्‍दर रूप और मन के प्रतिबिम्‍ब में वे कपड़े भी उनपर फब रहे थे। ढाई-तीन हजार श्रोताओं से सभागृह भर गया। ध्‍वनि-परीक्षण करने के बाद मैं ऊपर के ‘साउंड बूथ’ में ‘मिक्‍सर चैनल’ हाथ में संभाले हुए कार्यक्रम के प्रारम्‍भ होने की प्रतीक्षा कर रहा था। मुकेश दा के ‘माइक’ का ‘स्‍विच’ मेरे पास था। इतने में मुकेश दा मंच पर आए। तालियों की गड़गड़ाहट से सारा हाल गुंज उठा। मुकश दा ने बोलना प्रारम्‍भ किया तो ‘भाइयो और बहनो’ कहते ही इतनी सारी तालियाँ पिटीं की मुझे हाल के सारे माइक बंद कर देने पड़े।

मुकश दा अपना नाम पुकारे जाने पर सदैव पिछले विंग से निकलकर धीरे-धीर मंच पर आते थे। वे जरा झुककर चलते थे। माइक के सामने आकर उसे अपनी ऊँचाई के अनुसार ठीक कर तालियों की गड़गड़ाहट रूकने का इंतजार करते थे। फिर एक बार ‘राम-राम, भाई-बहनों’ का उच्‍चारण करते थे। कोई भी कार्यक्रम क्‍यों न हो, उनका यह क्रम कभी नहीं बदला।

उस दिन मुकश दा मंच पर आए और बोले, “राम-राम, भाई-बाहनों आज मुझे जो काम सौंपा गया है, वह कोई मुश्किल काम नहीं है। मुझे लता की पहचान आपसे करानी है। लता मुझसे उम्र में छोटी है और कद में भी; पर उसकी कला हिमालय से भी ऊँची है। उसकी पहचान मैं आपसे क्‍या कराऊँ! आइए, हम सब खूब जोर से तालियॉं बजाकर उसका स्‍वागत करें! लता मंगेशकर ....’’

तालियों की तेज आवाज के बीच दीदी मंच पर पहुँचीं। मुकेश दा ने उसे पास खींच लिया। सिर पर हाथ रखकर उसे आशीर्वाद दिया और घूमकर वापस अन्‍दर चले गए। मंच से कोई भय नहीं, कोई संकोच नहीं, बनावट तो बि‍ल्‍कुल भी नहीं। सबकुछ बिल्‍कुल स्‍वाभाविक और शांत।

दीदी के पाँच गाने पूरे होने पर मुकेश दा फिर मंच पर आए। एक बार फिर माइक ऊपर-नीचे किया और हारमोनियम संभाला। जरा-सा खंखार कर, कुछ फुसफुसाकर (शायद ‘राम-राम कहा होगा) कहना शुरू किया, “मैं भी कितना ढीठ आदमी हूँ। इतना बड़ा कलाकार अभी-अभी यहाँ आकर गया है और उसके बाद मैं यहाँ गाने के लिए आ खड़ा हुआ हूँ। भाइयो और बहनो, कुछ गलती हो जाए तो माफ करना।’’

मुकेश दा के शब्‍दों को सुनकर मेरा जी भर आया। एक कलाकार दूसरे का कितना सम्‍मान करता है, इसका यह एक उदाहरण है। मुकेश दा के निश्‍छल और बढ़िया स्‍वभाव से हम सब मंत्रमुग्‍ध-से हो गये थे कि माइक पर सुर उठा – “जाने कहॉँ गये वो दिन ....”

गीत की इस पहली पंक्ति पर ही बहुत देर तक तालियाँ बजती रहीं। और फिर सुरों में से शब्‍द और शब्‍दों में से सुरों की धारा बह निकली। लग रहा था कि मुकश दा गा नहीं रहे हैं, वे श्रोताओं से बातें कर रहे हैं। सारा हॉल शांत था गाना पूरा हुआ। पर तालियाँ नहीं बजीं। मुकेश दा ने सीधा हाथ उठाया (यह उनकी आदत थी) और अचानक तालियों की गड़गड़ाहट बज उठी। तालियों के उसी शोर में मुकेश दा ने अगला गाना शुरू कर दिया – ‘डम-डम डिगा-डिगा’ और इस बार तालियों के साथ श्रोताओं के पैरों ने ताल देना शुरू कर दिया था।

यह गाना पूरा हुआ तो मुकेश दा अपनी डायरी के पन्‍ने उलटने लगे। एक मिनट, दो मिनट, पर मुकेश दा को कोई गाना भाया ही नहीं। लोगों में फुसफुसाहट होने लगी। अन्‍त में मुकेश दा ने डायरी का पीछा छोड़ दिया और मन से ही गाना शुरू कर दिया-‘दिल जलता है तो जलने दे’ यह मुकेश दा का तीस वर्ष पुराना सबसे पहला गना था। मैं सोचने लगा कि क्‍या इतना पुराना गाना लोगों को पसन्‍द आएगा! मन-ही-मन मैं मुकेश दा पर नाराज होने लगा। ऐसे महत्‍वपूर्ण कार्यक्रम के लिए उन्‍होंने पहले से गानों का चुनाव क्‍यों नहीं कर लिया था।

मैंने ‘बूथ’ से ही बैकस्‍टेज के लिए फोन मिलाया और मुकेश दा के पुत्र नितिन को बुलाकर कहा, “अगले कार्यक्रम के लिए गाना चुनकर तैयार रखो।’’

नितिन ने जवाब दिया, “यह नहीं हो सकता। यह पापा की आदत है।’’

गाना खत्‍म होते ही हॉल में ‘वंस मोर’ की आवाजें आने लगीं। मेरा अंदाज बिल्‍कुल गलत साबित हुआ था। मैंने झट से नितिन को दुबारा फोन मिलाया और कहा, “मैंने जो कुछ कहा था, मुकेश दा को पता न चले।’’ तभी दीदी मंच पर पहुँच गई और दो गीतों की शुरूआत हो गई। ‘सावन का महीना’, ‘कभी-कभी मेरे दिल में’, ‘दिल तड़प-तड़प के’ आदि एक के बाद एक गानों का तांता लगा रहा। फिर आखिरी दो गानों का प्रारम्‍भ हुआ – ‘आ जा रे, अब मेरा दिल पुकारा’।

इस गाने का पहला स्‍वर उठते ही मैं 1950 में जा पहुंचा। दिल्‍ली के लालकिले के मैदान में एक लाख लोग मौजूद थे ठण्‍ड का मौसम था। तरूण, सुन्‍दर मुकेश दा बाल संवारे हुए स्‍वेटर पर सूट डाले, मफलर बाँधे बाएँ हाथ से हारमोनियम बजा रहे थे और मैं दीदी के साथ गा रहा था, ‘आजा रे ...’ मेरे जीवन का वह दूसरा या तीसरा गाना था। मुकेश दा ने जबरदस्‍ती मुझे गाने को बिठा दिया था और खुद हारमोनियम बजाने लगे थे। मैं घबराना गया और कुछ भी गलत-सलत गाने लगता था। मुकेश दा मुझे सांत्‍वना देते जाते और मेरा साथ देने लग जाते। मुझे उनका यह तरूण सुन्‍दर रूप याद आने लगा, जिसे 26 वर्षों के कटु अनुभवों के बाद भी उनहोंने कायम रखा था। पर उनकी आवाज में एक नया जादू चढ़ गया था।

मिलवाकी से हम वाशिंगटन की ओर चले। हम सबों के हाथ सामानों से भरे थे। हवाई अड्डा दूर, और दूर होता जा रहा था। मैं थक गया था और रूक-रूककर चल रहा था। तभी किसी ने पीछे से मेरे हाथ से बैग ले लिया। मैंने दचककर पीछे देखा तो मुकेश दा। मैंने उन्‍हें बहुत समझाया, पर उन्‍होंने एक न सुनी। विमान में हम पास-पास बैठे। वे बोले, ‘अब खाना निकालो’। (हम दोनों ही शाकाहारी थे)। मैंने उन्हें चिवड़ा और लड्डू दिए और वे खाने लगे। तभी मैंने कहा, ‘मुकेश दा, कल के कार्यक्रम में आपकी आवाज अच्‍छी नहीं थी। लगता है, आपको जुकाम हो गया है!’

उन्‍होंने सिर हिलाया। बोले, ‘मैं दवा ले रहा हूँ। पर सर्दी कम होती ही नहीं है, इसलिए आवाज में जरा-सी खराश आ गई है’। फिर विषय बदलकर उन्‍होंने मुझसे ताश निकालने को कहा। करीब-करीब एक घंटे तक हम दोनों ताश खेलते रहे। खेल के बीच में उन्‍होंने मुझसे कहा ‘गाते समय जब मेरी आवाज ऊँची उठती है तब तू ‘फेडर’ को नीचे कर दिया कर, क्‍योंकि सर्दी के कारण ऊपर के स्‍वरों को संभालना जरा कठिन पड़ता है। फिर रमी के ‘प्‍वाइन्‍ट’ लिखने के लिए उन्‍होंने जेब से पेन निकाला। उसे मेरे सामने रखते हुए बोले, ‘बाल, यह क्रास पेन है। जब से मैंने क्रास पेन से लिखना शुरू किया है, दूसरा कोई पेना भाता ही नहीं है। तुम भी क्रास पेन खरीद लो’। और वाशिंगटन में उन्‍होंने आग्रह करके मुझे एक क्रास पेन खरीदवा ही दिया।

अनहोनी, जो होनी बन गई!

उसी शाम भारतीय राजदूत के यहाँ हमारी पार्टी थी। देश-विदेश के लोग आए हुए थे। मुकेश दा अपनी रोज की पोशाक में इधर-उधर घूम रहे थे। तभी किसी ने सुझाया कि गाना होना चाहिए। उस जगह तबला, हारमोनियम कुछ भी नहीं था, पर सबों के आग्रह पर मुकेश दा खड़े हो गए और जरा-सा स्‍वर संभालकर गाने लगे – ‘आँसू भरी है ये जीवन की राहें...’ वाद्यों की संगत न होने के कारण उनकी आवाज के बारीक-बारीक रेशे भी स्‍पष्‍ट सुनाई दे रहे थे। सहगल से काफी मिलती हुई उनकी वह सरल आवाज भावनाओं से ऐसी भरी हुई थी कि मैं उसे कभी भुला न पाऊँगा।

रात को मैंने टोका, ‘आपको पार्टी के लिए बुलाया था, गाने के लिए नहीं। किसी ने कहा और आप गाने लगे!’ वे हंसकर बाले, ‘यहाँ कौन बार-बार आता है! अब पता नहीं यहाँ फिर कभी आ पाऊँगा या नहीं!’

मुकेश दा ! आपका कहना सच ही था। वाशिंगटन से ये लोग आपके अंतिम दर्शनों के लिए न्‍यूयार्क आए थे और उस पार्टी की याद कर करके आँसू बहा रहे थे।

बोस्‍टन में मुकेश दा की आवाज बहुत खराब हो गई थी। एक गाना पूरा होते ही मैंने ऊपर से फोन किया और दीदी से कहा, ‘मुकेश दा को मत गाने देना। उनकी आवाज बहुत खराब हो रही है’।
दीदी बोलीं, ‘फिर इतना बड़ा कार्यक्रम पूरा कैसे होगा?’
मैंने सुझाया, ‘नितिन को गाने के लिए कहो’।

दीदी मान गईं। मंच पर आईं और श्राताओं से बोलीं, ‘आज मैं आपके सामने एक नया मुकेश पेश कर रही हूँ। यह नया मुकेश मेरे साथ आपका मनपसंन्‍द गाना ‘कभी-कभी मेरे दिल में...’ गाएगा।‘

लोग अनमने से हो फुसफुस करने लगे थे। तभी नितिन मंच पर पहुँचा। देखने में बिल्‍कुल मुकेश दा जैसा। उसने दीदी के पाँव छुए और गाना शुरू किया – कभी-कभी मेरे दिल में... ‘ नितिन की आवाज में कच्‍चापन था। पर सुरों की फेंक, शब्‍दोच्‍चार बिल्‍कुल पिता जैसे थे। गाना खतम होते ही ‘वंस मोर’ की आवाजें उठने लगीं। लोग नितिन को छोड़ने को तैयार ही नहीं थे। ‘विंग’ में बैठे मुकेश दा का चेहरा आनन्‍द से चमक उठा।

‘ऐंबुलेंस’ में उन्‍होंने केवल एक वाक्‍य बोला –यह पट्टा खोल दो’ (वह ह्वील चेयर का पट्टा था) फिर वे कुछ नहीं बोले। हजारों गाने गानेवाले मुकेश दा के वे आखिरी शब्‍द थे – ‘यह पट्टा खोल दो’।

कौन-सा पट्टा? कौन-सा बंधन? ह्वील चेयर का पट्टा या जीवन का बंधन? मुकेश दा को बाँधे हुए चमड़े का पट्टा या चैतन्‍य को बाँधे हुए जड़त्‍व का पट्टा? कहीं उनके कहने का आशय यही तो नहीं था!
फिर वे मंच पर आए और हारमोनियम पर हाथ रख दिया। बाप-बेटे ने मिलकर ‘जाने कहाँ गए वे दिन’ गाया। उसके बाद के सारे गाने नितिन ने ही गाए। मुकेश दा ने हारमोनियम पर साथ दिया।

अगले दिन वे मुझेसे बोले,'अब मेरे सर पर से एक और बोझ उतर गया। नितिन की चिन्‍ता मुझे नहीं रही। अब मैं मरने के लिए तैयार हूँ’।

मैने कहा, ‘अपना गाना गाए बिना आपको मरने कैसे दूँगा। पन्‍द्रह वर्ष पूर्व आपने मेरे गाने की रिहर्सल तो की थी, पर गाया नहीं था। गाना मुझे ही पड़ा था’। (वह गाना था – ‘त्‍या फुलांच्‍या गंध कोषी’)

वे हंसकर बोले, ‘मेरे कोई नया गाना तैयार कराओ। मैं जरूर गाऊँगा।
अगले दिन हम टोरन्‍टो से डेट्रायट जाने के लिए रेलगाड़ी पर सवार हुए। हमारा एनाउंसर हमें छोड़ने आया था। मुकेश दा ने उससे पूछा, ‘क्‍यों मियॉँ साहेब, आप नहीं आ रहे हमारे साथ!”

उसने जवाब दिया, मैं तो आपको छोड़ने आया हूँ।’

मुकेश दा हँसे, अरे, आप क्‍या हमें छोड़ेंगे!
हम आपको ऐसा छोड़ेंगे कि फिर कभी नहीं मिलेंगे’। मियाँ का दिल भर आया। बोला, ‘नहीं-नहीं। ऐसी अशुभ बात मुंह से मत निकालिए’।

मुकेश दा हंसे। ‘राम-राम’ कहते हुए गाड़ी में चढ़कर मेरे पास आ बैठे। ताश निकालकर हम ‘रमी’ खेलने लगे। वे तीन डॉलर हार गए। मुझे पैसे देते हुए बोले, आज रात को फिर खेलेंगे। मैं तुमसे ये तीनों डॉलर वापस जीत लूँगा’।

और सचमुच ही डेट्रायट (अमरीका) में उन्‍होंने मुझे अपने कमरे में बुला लिया और मैं, अरूण, रवि उनके साथ रात साढ़े ग्‍यारह बजे तक ‘रमी’ खेलते रहे। इस बार मुकेश दा छह डॉलर हार गए। हमने उनकी खूब मजाक उड़ाई। मुझसे बोले, ‘आज कुल मिलाकर मैं नौ डॉलर हार गया हूँ। मगर कल रात को तुमसे सब वसूल कर लूँगा।

पर ‘कल की रात’ उनकी आयु में नहीं लिखी थी। मुझे कल्‍पना भी नहीं थी कि ‘कल की रात’ मुझे मुकेश दा के निर्जीव शरीर के पास बैठकर काटनी पड़ेगी।

झूठे बंधन तोड़ के सारे .....

अपने पुत्र नितिन मुकेश के साथ
वह दिन ही अशुभ था। एक मित्र को जल्‍दी भारत लौटना था, इसलिए उसके टिकट की भागदौड़ में ही दोपहर के तीन बज गए। टिकट नहीं मिला सो अलग। साढ़े चार बजे हम होटल लौटे। मैं, दीदी और अनिल मोहिले शाम के कार्यक्रम की रूपरेखा बनाने लगे। हम सब भूखे थे, इसलिए चाय और सैण्‍डविच मंगा ली गई थी। तभी मुकेश दा का फोन आया कि हारमोनियम ऊपर भिजवा दो। (उनका कमरा बीसवीं मंजिल पर था और हमारा सोलहवीं पर)। मैंने हारमोनियम भेज दिया। कार्यक्रम की चर्चा पूरी करने के बाद मैंने अनिल मोहिले से कहा, ‘चाय पीने के बाद म्‍यूजीसियंश को तैयार करके ठीक छह बजे मंच पर पहुंच जाना’। तभी चाय आ गई। मैं चाय तैयार कर ही रहा था कि ऊपर आओ। उसकी आवाज सुनते ही मैं भागा। अपने कमरे में मुकेश दा लुंगी और बनियान पहने हुए पलंग के पीछे हाथ टिकाए बैठे थे। मैंने नितिन से पूछा, “क्‍या हुआ?”

उसने बताया, ‘पापा ने कुछ देर गाया। फिर उन्‍होंने चाय मंगाई। पीकर वे बाथरूम गए। बाथरूम से आने के बाद उन्‍हें गर्मी लगने लगी और पसीना आने लगा। इसलिए मैंने आपको बुला लिया। मुझे कुछ डर लग रहा है’।

मैं सोचने लगा-पसीना आ जाने भर से ही यह लड़का डर गया है। कमाल है। फिर मैंने मुकेश दा से कहा, ‘आप लेट जाइए’।

वे एकदम बोल पड़े, ‘अरे तुम अभी तक एक नहीं? मैं लेटूँगा नहीं। लेटने से मुझे तकलीफ होती है। तुम स्‍टेज पर जाओ। मैं इंजेक्शन लेकर पीछे-पीछे आता हूँ। लता को कुछ मत बताना। वह घबरा जाएगी।

‘अच्‍छा,’ कहकर मैंने उनकी पीठ पर हाथ रख और झटके से हटा लिया। मेरा हाथ पसीने से भीग गया था। इतना पसीना, माने नहाकर उठे हों। तभी डॉक्‍टर आ गया। ऑक्‍सीजन की व्‍यवस्‍था की गई। मैंने मुकेश से पूछा, ‘आपको दर्द हो रहा है’?

उन्‍होंने सिर हिलाकर ‘न’ कहा। फिर उन्‍हें ‘ह्वील चेयर’ पर बिठाकर नीचे लाया गया। ऑक्‍सीजन लगा हुआ था, फिर भी लिफ्ट में उन्‍हें तकलीफ ज्‍यादा होने लगी, ‘ह्वील चेयर’ को ही ‘ऐंबुलेंस’ पर चढ़ा दिया गया। यह सब बीस मिनट में हो गया।

‘ऐंबुलेंस’ में उन्‍होंने केवल एक वाक्‍य बोला –यह पट्टा खोल दो’ (वह ह्वील चेयर का पट्टा था) फिर वे कुछ नहीं बोले। हजारों गाने गानेवाले मुकेश दा के वे आखिरी शब्‍द थे – ‘यह पट्टा खोल दो’।

कौन-सा पट्टा? कौन-सा बंधन? ह्वील चेयर का पट्टा या जीवन का बंधन? मुकेश दा को बाँधे हुए चमड़े का पट्टा या चैतन्‍य को बाँधे हुए जड़त्‍व का पट्टा? कहीं उनके कहने का आशय यही तो नहीं था!

‘एमरजेन्‍सी वार्ड’ में पहुंचने से पूर्व उन्‍होंने केवल एक बार आँखे खोलीं, हंसे और बेटे की तरफ हाथ उठाया। डॉक्‍टर ने वार्ड का दरवाजा बंद कर लिया। आधे घंटे बाद दरवाजा खुला। डॉक्‍टर बाहर आया ओर उसने मेरे कंधे पर हाथ रख दिया। उसके स्‍पर्श ने मुझसे सबकुछ कह दिया था।

विशाल सभागृह खचाखच भरा हुआ है। मंच सजा हुआ है। सभी वादक कलाकार साज मिलाकर तैयार बैठे हुए हैं। इंतजार है कि कब मैं आऊँ, माइक ‘टेस्‍ट’ करूँ और कार्यक्रम शुरू हो। मैं मंच पर गया। सदैव की भाँति रंगभूमि को नमस्‍कार किया। माइक हाथ में लिया और बोला "भाइयो और बहनो, कार्यक्रम प्रारंभ होने में देर हो रही है, पर उसके लिए आज मैं आपसे क्षमा नहीं माँगूँगा। आज मैं किसी से कुछ नहीं माँगूँगा। केवल उससे बारम्‍बार एक ही माँग है – ‘ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना ...’

धर्मयुग से साभार
रूपांतर- भारती मंगेशकर
प्रस्तुति- शैलेश भारतवासी
प्रस्तुति सहयोग- सतेन्द्र झा
चित्र साभार- हमाराफोटोजडॉटकॉम(यह संस्मरण विश्व हिन्दी न्यास की त्रैमासिक पत्रिका 'हिन्दी-जगत' में भी प्रकाशित किया गया है)


इस अवसर पर हमने इस संस्मरण में उल्लेखित सभी गीतों को सुनवाने का प्रबंध किया है।


ओ जाने वाले हो सके तो॰॰
Oh Jaane Waale Ho Sake To
आ जा रे, अब मेरा दिल पुकारा॰॰
Aa Ja Re, Ab Mera Dil Pukara
आँसू भरी है ये जीवन की राहें॰॰
Aanso Bhari Hai, Ye Jeevan Ki Rahen
दिल जलता है तो जलने दे॰॰
Dil Jalta Hai To Jalane De
दिल तड़प-तड़प के दे रहा है ये सदा॰॰
Dil Tadap-Tadap Ke De Raha Hai Ye Sada
डम-डम डिगा-डिगा॰॰
जाने कहाँ गये वो दिन॰॰
Jane Kahan Gaye Woh Din
सावन का महीना॰॰
Sawan Ka Mahina
कभी-कभी मेरे दिल में॰॰
Kabhi-Kabhi Mere Dil Mein



आज अमर गायक मुकेश की ३२वीं बरसी पर हम पूरे दिन मुकेश की यादें आपसे बांट रहे हैं। पढ़िए संगीत समीक्षक संजय पटेल का "दर्द को सुरीलेपन की पराकाष्ठा पर ले जाने वाले अमर गायक मुकेश", इसी पोस्ट में आप बम्बई का बाबू का गीत 'चल री सजनी! अब क्या सोचें॰॰॰' भी सुन पायेंगे। और साथ ही पढ़िए तपन शर्मा चिंतक की प्रस्तुति "मैं तो दीवाना, दीवाना-दीवाना"। तो पूरे दिन बने रहिए आवाज़ के संगी.

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