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Sunday, January 1, 2012

सुर संगम में आज- सुर संगम की पचास अंकों की यात्रा

सुर संगम- 50 : यादें
‘सुर संगम’ के सभी पाठकों/श्रोताओं का इस स्वर्ण जयन्ती अंक में हार्दिक स्वागत है। दोस्तों, २ जनवरी २०११ को हमने शास्त्रीय और लोक संगीत से अनुराग रखने वाले रसिकों के लिए इस श्रृंखला का शुभारम्भ किया था। हमारे दल के सर्वाधिक कर्मठ साथी सुजोय चटर्जी ने इस स्तम्भ की नीव रखी थी। उद्देश्य था- शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत-प्रेमियों को एक ऐसा मंच देना जहाँ किसी कलासाधक अथवा किसी संगीत-विधा पर हम आपसे संवाद कायम कर सकें और आपसे विचारों का आदान-प्रदान कर सकें। आज के इस स्वर्ण जयन्ती अंक के माध्यम से हम पिछले एक वर्ष के अंकों का स्वतः मूल्यांकन करेंगे और आपकी सहभागिता का उल्लेख भी करेंगे।

Sunday, December 4, 2011

‘झगड़े नउवा मूँडन की बेरिया...’ समाज के हर वर्ग का सम्मान है, संस्कार गीतों में

आज की कड़ी में बालक के मुंडन संस्कार पर ही हम केन्द्रित रहेंगे। पिछले दो अंकों में हमने जातकर्म अर्थात जन्म संस्कार तक की चर्चा की थी। जन्म और मुंडन के बीच नामकरण, निष्क्रमण और अन्नप्राशन संस्कार होते हैं। इन तीनों संस्कारों के अवसर पर क्रमशः शिशु को एक नया नाम देने, पहली बार शिशु को घर के बाहर ले जाने और छः मास का हो जाने पर शिशु को ठोस आहार देने के प्रसंग उत्सव के रूप में मनाए जाते हैं। मुंडन संस्कार अत्यन्त हर्षपूर्ण वातावरण में मनाया जाता है। बालक के तीन या पाँच वर्ष की आयु में उसके गर्भ के बालों का मुंडन कर दिया जाता है। इससे पूर्व बालक के बालों को काटना निषेध होता है। इस अवसर को चूड़ाकर्म संस्कार भी कहा जाता है।

Sunday, November 27, 2011

‘ए हो जन्मी है बिटिया हमार...’ कन्या-जन्म पर पारम्परिक सोहर का अभाव है

सुर संगम- 46 – संस्कार गीतों में अन्तरंग पारिवारिक सम्बन्धों की सोंधी सुगन्ध

संस्कार गीतों की नयी श्रृंखला - दूसरा भाग

‘सुर संगम’ के एक नये अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब लोक-संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछले अंक से हमने संस्कार गीतों की श्रृंखला आरम्भ की है। प्राचीन भारतीय परम्परा के अनुसार सम्पूर्ण मानव जीवन को १६ संस्कारों में बाँटा गया है। इन विशेष अवसरों पर विशेष लोक-धुनों में गीतों को गाने की परम्परा है। हमने पिछले अंक में जातकर्म संस्कार, अर्थात पुत्र-जन्म के मांगलिक अवसर पर गाये जाने ‘सोहर’ गीतों की चर्चा की थी। आज के अंक में हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाते हैं।

लोकगीतों में छन्द से अधिक भाव और रस का महत्त्व होता है। प्रत्येक अवसरों के लिए प्रकृतिक रूप से उपजी धुने शताब्दियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रहीं हैं। लोक-गीतकार इन धुनों में अपने बोली के शब्दों को समायोजित करके गाने लगता है। इन गीतों में सामाजिक और पारिवारिक सम्बन्धों की बात होती है, इसी प्रकार सोहर गीतों में सास-बहू, ननद-भाभी और देवर-भाभी के नोक-झोक के रोचक प्रसंग होते हैं। उल्लास और संवेदनशीलता का भाव मुखर होता है। नवजात शिशु की तुलना राम, कृष्ण, लव-कुश आदि से की जाती है और पौराणिक प्रसंगों को लौकिक रूप दे दिया जाता है। मात्र लय पर आधारित, भावप्रधान गीतों में सोहर गीत सम्भवतः सबसे प्राचीन है। पुत्र-जन्म के अवसर पर गाये जाने वाले सोहर में उल्लास और उत्साह का भाव होता है, किन्तु जन्म से पूर्व के गीतों में माँ और नवागत शिशु के प्रति मंगल-कामनाएँ की जाती हैं। अधिकतर गीतों में देवी-देवताओं की प्रार्थना भी की जाती है। अब हम आपको एक ऐसा सोहर सुनवाते हैं, जिसमे सन्तान-प्राप्ति के लिए माँ गंगा से प्रार्थना की गई है।

Sunday, November 20, 2011

‘सिया रानी के जाये दुई ललनवा, विपिन कुटिया में...’ सोहर से होता है नवागन्तुक का स्वागत

सुर संगम- 44 – संस्कार गीतों में अन्तरंग पारिवारिक सम्बन्धों की सोंधी सुगन्ध

संस्कार गीतों की नयी श्रृंखला - पहला भाग

‘सुर संगम’ स्तम्भ के एक नये अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः उपस्थित हूँ। पिछले अंकों में आपने शास्त्रीय गायन और वादन की प्रस्तुतियों का रसास्वादन किया था, आज बारी है, लोक संगीत की। आज के अंक से हम आरम्भ कर रहे हैं, लोकगीतों के अन्तर्गत आने वाले संस्कार गीतों का सिलसिला।

किसी देश के लोकगीत उस देश के जनमानस के हृदय की अभिव्यक्ति होते हैं। वे उनकी हार्दिक भावनाओं के सच्चे प्रतीक हैं। प्रकृतिक परिवेश में रहने वाला मानव अपने आसपास के वातावरण और संवेदनाओं से जुड़ता है तो नैसर्गिक रूप से उनकी अभिव्यक्ति के लिए एकमात्र साधन है, लोकगीत अथवा ग्राम्यगीत। भारतीय उपमहाद्वीप के निवासियों का जीवन आदिकाल से ही संगीतमय रहा है। वैदिक ऋचाओं को भी तीन स्वरों में गान की प्राचीन परम्परा चली आ रही है। भारतीय परम्परा के अनुसार प्रचलित लोकगीतों को हम चार वर्गों में बाँटते हैं। प्रत्येक उत्सव, पर्व और त्योहारों पर गाये जाने वाले गीतों को हम ‘मंगल गीत’ की श्रेणी में, तथा घरेलू और कृषि कार्यों के दौरान श्रम को भुलाने के लिए गाने वाले गीतों को ‘श्रम गीत’ के नाम से पुकारा जाता है। तीसरी श्रेणी के गीतों को ‘ऋतु गीत’ कहा जाता है, जिसके अन्तर्गत चैती, कजरी, सावनी आदि का गायन होता है। लोकगीतों की चौथी श्रेणी है- ‘संस्कार गीत’ की, जिसका गायन मानव जीवन से जुड़े १६ संस्कार के अवसरों पर किया जाता है।

आज से हम ‘सुर संगम’ के आगामी अंकों में संस्कार गीतों पर आपसे चर्चा करेंगे। भारतीय समाज में व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक के जीवन को १६ संस्कारों में बाँटा जाता है। भारत के गैर हिन्दू समुदाय में भी इन अवसरों पर थोड़े नाम परिवर्तन और भिन्न रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। १६ संस्कारों में से आज हम ‘जातकर्म संस्कार’ अर्थात पुत्र-जन्म के अवसर पर मनाए जाने वाले उत्सव और इस अवसर पर गाये जाने वाले गीतों की चर्चा करेंगे। इस विधा के गीतों में सन्तान के जन्म का उल्लास होता है, नवगन्तुक शिशु के प्रति मंगल-कामनाएँ प्रकट की जाती है और शिशु की माता को बधाई दी जाती है। शिशु जन्मोत्सव के गीतों का चलन देश के हर प्रान्त और हर क्षेत्र में है। भाषा में आंचलिक परिवर्तन के होते हुए भी गीतों का मूलभाव सर्वत्र एक ही रहता है। समूचे उत्तर भारत में इस प्रकार के गीत को ‘सोहर’ के नाम से जाना जाता है। सोहर-गायन की कई धुने प्रचलित हैं। एक सर्वाधिक लोकप्रिय धुन में बँधे सोहर से हम आज शुरुआत करते हैं। जाने-माने शास्त्रीय गायक पण्डित छन्नूलाल मिश्र इस पारम्परिक सोहर में प्रयुक्त स्वरों के माध्यम से सामवेद की ऋचाओं के स्वरों की व्याख्या और तुलना कर रहे हैं। लीजिए पहले आप सुनिए यह सोहर-

भोजपुरी सोहर : ‘मोरे पिछवरवा चन्दन गाछ....’ : स्वर – पण्डित छन्नूलाल मिश्र


‘जातकर्म संस्कार’ पुत्र-जन्म के अवसर पर मनाया जाता है। परन्तु १६ संस्कारों की सूची में यह चौथे क्रमांक पर है। जातकर्म से पूर्व के तीन संस्कार और मनाए जाते हैं, जिन्हें गर्भाधान, पुंसवन और सीमान्त संस्कार कहते हैं। इन अवसरों पर प्रस्तुत किए जाने वाले गीतों में गर्भस्थ शिशु और माँ के स्वास्थ्य की कामना की जाती है। अवध क्षेत्र में इन गीतों को ‘सरिया’ कहा जाता है। सरिया गीतों में प्रायः ननद-भाभी के बीच रोचक और कटाक्षपूर्ण वार्तालाप भी उपस्थित रहता है। सोहर गीतों के वर्ण्य विषयों में पर्याप्त विविधता होती है। इन गीतों में कहीं सास और ननद पर कटाक्ष होता है तो ससुर से धन-धान्य का मुक्त-हस्त दान का अनुरोध होता है। नवजात शिशु के स्वस्थ रहने, बुद्धिमान बनने और भावी जीवन में सफलता पाने की कामना भी इन गीतों में की जाती है। ब्रज, बुन्देलखण्ड, अवध और भोजपुर क्षेत्र के सोहर गीतों में राम और कृष्ण के जन्म के प्रसंग सहज और सरल लौकिक रूप में चित्रण अनिवार्य रूप से मिलता है। कुछ सोहर गीतों में बाल्मीकि आश्रम में सीता के पुत्रों- लव और कुश के जन्म का प्रसंग भी वर्णित होता है। आइए, अब हम आपको एक ऐसा ही सोहर सुनवाते हैं, जिसमे लव-कुश के जन्म का प्रसंग है। यह सोहर गीत पारम्परिक नहीं है। इसकी रचना और गायन लखनऊ के भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय की सेवानिवृत्त प्रोफेसर तथा शास्त्रीय, उपशास्त्रीय और लोक संगीत की विदुषी कमला श्रीवास्तव ने किया है। आइए सुनते हैं, यह मनमोहक अवधी सोहर गीत-

अवधी सोहर : ‘सिया रानी के जाये दुई ललनवाँ...’ : स्वर – विदुषी कमला श्रीवास्तव


सोहर गीतों का वर्ण्य विषय कुछ भी हो, कोई भी भाषा हो अथवा किसी भी क्षेत्र की हो, नवजात शिशु के स्वागत और उसके भावी सुखमय जीवन की कामना तथा उल्लास का भाव हर गीत में मौजूद होता है। एक भोजपुरी सोहर की एक पंक्ति है- ‘सासु लुटावेली रुपैया, त ननदी मोहरवा रे....’, जिसका भाव यह है कि शिशु के आगमन से हर्षित सास रूपये का और ननद सोने की मोहरों का दान करतीं हैं। सोहर का ही एक प्रकार होता है- ‘मनरजना’, जिसे प्रसव से ठीक पहले गाया जाता है। नाम से ही सहज अनुमान हो जाता है इन गीतों का उद्देश्य परिवार के सदस्यों का मनोरंजन करना होता है। मनरजना गीतों का एक उद्देश्य यह भी होता है कि गर्भवती के कष्ट को कम किया जा सके। ऐसी ही एक अवधी मनरजना गीत की एक पंक्ति देखें- ‘ननदी जो तोरे हुईहैं भतीजवा, तोहे देहों गले की तिलरी...’। इस गीत में वर्णित ‘तिलरी’ का अर्थ है, तीन लड़ियों वाला गले का आभूषण। अब हम आपको अवध क्षेत्र का एक लोकप्रिय सोहर गीत सुनवाते हैं, जिसके बारे में कहा जाता है कि इस सोहर की रचना गोस्वामी तुलसीदास ने किया था। इस सोहर गीत को स्वर दिया है, सुपरिचित गायिका इन्दिरा श्रीवास्तव ने।

अवधी सोहर : ‘चैतहि के तिथि नौमी त नौबत बाजै हो...’ : स्वर – विदुषी इन्दिरा श्रीवास्तव


और अब बारी है इस कड़ी की पहेली की जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अन्दर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से अधिक अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

सुर संगम 45 की पहेली : एक भोजपुरी फिल्म में सोहर गीत शामिल किया गया था। इस ऑडियो क्लिप को सुन कर गीत की गायिका को पहचानिए। गायिका के नाम की सही पहचान करने पर आपको मिलेंगे 5 अंक।


पिछ्ली पहेली का परिणाम : सुर संगम के 44 वें अंक में पूछे गए प्रश्न का सही उत्तर है- सोहर, और पहेली का सही उत्तर दिया है- क्षिति जी ने, जिन्हें मिलते हैं 5 अंक, बधाई।

अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। परन्तु सोहर गीतों पर यह चर्चा हम ‘सुर संगम’ के अगले अंक में भी जारी रखेंगे। अगले रविवार को हम पुनः उपस्थित होंगे। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई होगी। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तम्भ को और रोचक बना सकते हैं। आप अपने विचार और सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६-३० बजे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, October 23, 2011

‘जिनके दुश्मन सुख मा सोवें उनके जीवन को धिक्कार...’ वीर रस की लोक-काव्य-धारा : आल्हा

सुर संगम- 40 – आल्हा-ऊदल चरित्रों की ऐतिहासिकता

(पहला भाग)
सुर संगम’ के गत सप्ताह के अंक में हमने बुन्देलखण्ड की वीर-भूमि में उपजी और और समूचे उत्तर भारत में लोकप्रिय लोक-गायन शैली ‘आल्हा’ पर चर्चा आरम्भ की थी। आज के अंक में हम इस लोकगाथा के दो वीर चरित्रों- आल्हा और ऊदल की ऐतिहासिकता पर चर्चा करेंगे। बारहवीं शताब्दी में उपजी लोक संगीत की यह विधा अनेक शताब्दियों तक श्रुति परम्परा के रूप जीवित रही। परिमाल राजा के भाट जगनिक ने इस लोकगाथा को गाया और संरक्षित किया। आल्हा और ऊदल की ऐतिहासिकता के विषय में पिछले दिनों हमने बुन्देलखण्ड की लोक-कलाओं और लोक-साहित्य के शोधकर्त्ता, उरई निवासी श्री अयोध्याप्रसाद गुप्त ‘कुमुद’ से चर्चा की थी।

बारहवीं शताब्दी के इतिहास में आल्हा और ऊदल का उल्लेख उस रूप में नहीं मिलता, जिस रूप में ‘आल्ह खण्ड’ में किया गया है, इस प्रश्न पर श्री कुमुद का कहना है कि इतिहास केवल राजाओं को महत्त्व देता है, सामान्य सैनिकों को नहीं,चाहे वे कितने भी वीर क्यों न हों। गायक जगनिक ने पहली बार सेना के सामान्य सरदारों और सैनिकों को अपनी गाथा में शामिल कर उनका यशोगान किया। उसने बहादुर सैनिकों को उनके यथोचित सम्मान से विभूषित किया। आल्हा और ऊदल राजा नहीं थे। इसलिए उनके बारे में इतिहास में उल्लेख नहीं मिलता है। जबकि इतिहासकार महोबा के राजा परमाल, दिल्ली के सम्राट पृथ्वीराज चौहान और जयचन्द को ऐतिहासिक व्यक्तित्व मानते हैं। उन्होंने बताया कि आल्हा के लेखन का कार्य सबसे पहले ब्रिटिश शासनकाल में फर्रुखाबाद के कलेक्टर सर चार्ल्स इलियट ने १८६५ में कराया। इसका संग्रह ‘आल्ह खण्ड’ के नाम से प्रचलित हुआ तथा यह पहला संग्रह कन्नौजी भाषा में था।

आल्हा-ऊदल चरित्रों और ‘आल्ह खण्ड’ की ऐतिहासिकता को प्रमाणित करते हुए श्री कुमुद ने कहा कि आज भी अनेक शिलालेख और भवन मौजूद हैं, जो प्रमाणित करते हैं कि आल्हा-ऊदल ऐतिहासिक पात्र हैं। उन्होंने बताया कि आल्हा और मलखान के शिलालेख हैं। श्री कुमुद के अनुसार वर्ष ११८२ के शिलालेख में यह उल्लेख है कि पृथ्वीराज चौहान ने महोबा के परमाल राजा को पराजित किया था। आल्हा के ऐतिहासिक व्यक्तित्व की पुष्टि उत्तर प्रदेश के जनपद ललितपुर में मदनपुर के एक मन्दिर में लगे ११७८ के एक शीलालेख से भी होती है। इसमें आल्हा का उल्लेख बिकौरा-प्रमुख अल्हन देव के नाम से हुआ है। मदनपुर में आज भी ६७ एकड़ की एक झील है। इसे मदनपुर तालाब भी कहते हैं। इसके पास ही बारादरी बनी है। यह बारादली आल्हा-ऊदल की कचहरी के नाम से प्रसिद्ध है। इस बारादरी और झील को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने संरक्षित किया है। आल्हा-ऊदल को ऐतिहासिक चरित्र सिद्ध करने वाले शिलालेखों और अभिलेखों की चर्चा हम जारी रखेंगे। थोड़ा विराम लेकर अब हम आपको प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश के आल्हा-विशेषज्ञ विजय सिंह की आवाज़ में ‘आल्ह खण्ड’ से एक प्रसंग सुनवाते है-

आल्हा गायन : स्वर – विजय सिंह : प्रसंग – माड़वगढ़ की लड़ाई


आल्हा गायकी और इसके चरित्रों की ऐतिहासिकता के विषय में श्री कुमुद ने बताया कि पृथ्वीराज रासौ में भी चन्द्रवरदाई ने आल्हा को अल्हनदेव शब्द से सम्बोधित किया है। उस काल में बिकौरा गाँवों का समूह था। आज भी बिकौरा गाँव मौजूद है। इसमें ११वीं और १२वीं शताब्दी की इमारते हैं। इससे प्रतीत होता है कि पृथ्वीराज चौहान के हाथों पराजित होने से चार साल पहले महोबा के राजा परमाल ने आल्हा को बिकौरा का प्रशासन प्रमुख बनाया था। यह गाँव मदनपुर से ५ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है तथा दो गाँवों में विभक्त है। एक को बड़ा बिकौरा तथा दूसरे को छोटा बिकौरा कहा जाता है। उन्होंने बताया कि महोबा में भी ११वीं और १२वीं शताब्दी के ऐसे अनेक भवन मौजूद हैं जोकि आल्हा-ऊदल की प्रमाणिकता को सिद्ध करते हैं। इसी तरह सिरसागढ़ मे मलखान की पत्नी का चबूतरा भी एक ऐतिहासिक प्रमाण है। यह चबूतरा मलखान की पत्नी गजमोदनी के सती-स्थल पर बना है। पृथ्वीराज चौहान के साथ परमाल राजा की पहली लड़ाई सिरसागढ़ में ही हुई थी। इसमें मलखान को पृथ्वीराज ने मार दिया था। यहीं उनकी पत्नी सती हो गई थी। सती गजमोदिनी की मान्यता इतनी अधिक है कि उक्त क्षेत्र मे गाये जाने वाले मंगलाचरण में पहले सती की वन्दना की जाती है। उन्होंने बताया कि आल्हा ऊदल की ऐतिहासिकता की पुष्टि पन्ना के अभिलेखों में सुरक्षित एक पत्र से भी होती है। यह पत्र महाराजा छत्रसाल ने अपने पुत्र जगतराज को लिखा था।

श्री कुमुद ने आगे कहा कि आल्हा के किले को भी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने संरक्षित किया है। आल्हा की लाट, मनियादेव का मन्दिर, आल्हा की सांग आज भी मौजूद हैं। इन्हें भी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने मान्यता दी है। आइए अब हम आपको १९५९ में प्रदर्शित फिल्म ‘सम्राट पृथ्वीराज चौहान’ में प्रयुक्त एक आल्हा गीत सुनवाते हैं। हिन्दी फिल्मों में आल्हा की धुन पर आधारित गीतों का प्रयोग कम ही हुआ है। बहुत खोज करने पर यह गीत प्राप्त हो सका है। पिछले दशक में प्रदर्शित फिल्म ‘मंगल पाण्डे’ के एक गीत में भी आल्हा-धुन का प्रयोग किया गया था। हमारे पाठको को यदि आल्हा-गीतों की धुन पर आधारित किसी फिल्म-गीत की जानकारी हो तो हमें अवश्य सूचित करें।

आइए सुनते हैं, मोहम्मद रफी के स्वर में फिल्म ‘सम्राट पृथ्वीराज चौहान’ का यह आल्हा गीत, भरत व्यास के शब्दों को संगीतबद्ध किया है बसन्त देसाई ने-

आल्हा –‘लो कामना पूरी हुई हैं....’ : स्वर – मोहम्मद रफी : गीतकार – भरत व्यास


सुर संगम पहेली : पिछले कुछ सप्ताह से इस स्तम्भ की पहेली स्थगित थी। इस अंक से हम पुनः पहेली आरम्भ कर रहे हैं।

आज का प्रश्न – अगले अंक में हम आपसे आगरा घराने के एक उस्ताद संगीतज्ञ की चर्चा करेंगे, जिन्हें ‘आफताब-ए-मौसिकी’ की उपाधि से नवाजा गया था। उस महान गायक का आपको नाम और घराना बताना है।

अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। अगले रविवार को हम एक उस्ताद शास्त्रीय गायक के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा के साथ पुनः उपस्थित होंगे। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई होगी। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तम्भ को और रोचक बना सकते हैं! आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

चित्र परिचय : आल्हा-ऊदल की आराध्य मैहर की देवी माँ शारदा


आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, October 16, 2011

‘जा दिन जनम लियो आल्हा ने, धरती धँसी अढ़ाई हाथ.....’ बुन्देलखण्ड की लोकप्रिय लोक-गायकी शैली

सुर संगम- 39 – वीर रस का संचार करती लोक-काव्य की अजस्र धारा- आल्हा पर एक चर्चा


शास्त्रीय तथा लोक संगीत के साप्ताहिक स्तम्भ ‘सुर संगम’ के आज एक नए अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज हम उत्तर भारत में प्रचलित लोक गीत-संगीत की एक ऐसी विधा पर आपसे चर्चा करेंगे, जो श्रोताओं में वीर रस का संचार करने में सक्षम है। लोक संगीत की यह शैली ‘आल्हा’ के नाम से लोकप्रिय है।

आल्हा, वीरगाथा काल के महाकवि जगनिक द्वारा प्रणीत और परमाल रासो पर आधारित बुन्देली और अवधी का एक महत्त्वपूर्ण छन्दबद्ध काव्य है। इस काव्य का प्रणयन लगभग सन १२५० में माना जाता है। इसमें महोबा के वीर आल्हा और ऊदल के वीरता की गाथा होती है। यह उत्तर प्रदेश के अवध और मध्य प्रदेश के बुन्देलखण्ड की सर्वाधिक लोकप्रिय वीर-गाथा है। पावस ऋतु के अन्तिम चरण से लेकर पूरे शरद ऋतु तक समूहिक रूप से अथवा व्यक्तिगत स्तर पर इन दोनों प्रदेशों में आल्हा-गायन होता है। आल्हा के अनेक संस्करण उपलब्ध हैं, जिनमें कहीं ५२ तो कहीं ५६ लड़ाइयाँ वर्णित हैं। इस लोकमहाकाव्य की गायकी की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित हैं। जगनिक के लोककाव्य “आल्ह-खण्ड” की लोकप्रियता देशव्यापी है। महोबा के शासक परमाल के दोनों शूरवीर भाइयों- आल्हा और ऊदल की शौर्य-गाथा केवल बुन्देलखण्ड तक ही सीमित नहीं रह गई है, बल्कि अवध, कन्नौज, रूहेलखण्ड, ब्रज आदि क्षेत्रों की बोलियों में भी विकसित हुईं। आल्हा या वीर छन्द अर्द्धसम मात्रिक छन्द है, जिसके हर पद (पंक्ति) में क्रमशः १६-१६ मात्राएँ, चरणान्त क्रमशः दीर्घ-लघु होता है। यह छन्द वीररस से ओत-प्रोत होता है। इस छन्द में अतिशयोक्ति अलंकार का प्रचुरता से प्रयोग होता है। एक लोककवि ने आल्हा के छन्द-विधान को इस प्रकार समझाया है-

आल्हा मात्रिक छन्द, सवैया, सोलह-पन्द्रह यति अनिवार्य।
गुरु-लघु चरण अन्त में रखिये, सिर्फ वीरता हो स्वीकार्य।
अलंकार अतिशयताकारक, करे राई को तुरत पहाड़।
ज्यों मिमयाती बकरी सोचे, गुँजा रही वन लगा दहाड़।


आल्हा-गायन में प्रमुख संगति वाद्य ढोलक, झाँझ, मँजीरा आदि है। विभिन्न क्षेत्रों में संगति-वाद्य बदलते भी हैं। ब्रज क्षेत्र की आल्हा-गायकी में सारंगी के लोक-स्वरूप का प्रयोग किया जाता है, जबकि अवध क्षेत्र के आल्हा-गायन में सुषिर वाद्य क्लेरेनेट का प्रयोग भी किया जाता है। आल्हा का मूल छन्द कहरवा ताल में निबद्ध होता है। प्रारम्भ में आल्हा गायन विलम्बित लय में होता है। धीरे-धीरे लय तेज होती जाती है। आइए, ब्रज क्षेत्र की परम्परागत आल्हा-गायकी का एक उदाहरण आपको लोक-गायक बलराम सिंह के स्वरों में सुनवाते हैं।

आल्हा गायन : स्वर – बलराम सिंह : प्रसंग – इन्दल हरण


राजा परमाल देव चन्देल वंश के अन्तिम राजा थे। तेरहवीं शताब्दी के आरम्भ में यह वंश समाप्त हो गया। वर्तमान में महोबा एक साधारण कस्बा है, परन्तु ११वीं और १२वीं शताब्दी में चन्देलों की राजधानी था। आल्हा और ऊदल इसी राजा परमाल देव के दरबार के योद्धा थे। यह दोनों भाई अभी बच्चे ही थे कि उनके पिता जसराज एक लड़ाई में मारे गए। राजा को अनाथ बच्चों पर दया आई। राजा परमाल आल्हा और ऊदल को राजमहल में ले आए और अपनी रानी मलिनहा को सौंप दिया। रानी ने उन दोनों भाइयों की परिवरिश और लालन-पालन अपने पुत्र के समान ही किया। युवा होते ही दोनों भाई वीरता में अद्वितीय हुए। आल्हा-काव्य इन दोनों भाइयों की वीरता की ही गाथा है।

बारहवीं शताब्दी में चन्देल राजपूतों की वीरता और जान पर खेलकर स्वामी की सेवा करने के लिए किसी राजा-महाराजा को भी यह अमर कीर्ति नहीं मिली होगी, जितनी आल्हा गीत के नायकों आल्हा और ऊदल को मिली। आल्हा और ऊदल का अपने स्वामी और अपने राजा के लिए प्राणों का बलिदान करना ही इस लोक-गाथा का मूल तत्व है। आल्हा और ऊदल की वीरता के कारनामे चन्देली कवि ने उन्हीं के काल में गाये थे। वीर रस के इस काव्य में अलंकारों का प्रयोग अत्यन्त रोचक है। अतिशयोक्ति अलंकार का एक उदाहरण देखें- “जा दिन जनम लियो आल्हा ने धरती धँसी अढ़ाई हाथ...”। आल्हा-ऊदल और महोबा की सेना की वीरता के सन्दर्भ में “आल्ह-खण्ड” में थोड़े शाब्दिक हेर-फेर के साथ यह पंक्ति कई बार दोहराई गई है- “बड़े लड़इया महोबे वाले, जिनके बल को वार न पार...”। एक महाकाव्य मे जो साहित्यिक गुण होने चाहिए, वह सब इस लोक-गाथा में हैं। “आल्ह-खण्ड” का साहित्यिक विवेचना करने वाले तथा परम्परागत आल्हा गायकी के दीवानों के मानस में तो आल्हा और ऊदल यथार्थ चरित्र के रूप में बसे हुए हैं, किन्तु वैज्ञानिक ढंग से विवेचना करने वाले इन्हें काल्पनिक चरित्र ही मानते हैं। इस सम्बन्ध में हमने बुन्देलखण्ड की लोक कलाओं और लोक साहित्य के वरिष्ठ अध्येता और शोधकर्त्ता अयोध्याप्रसाद गुप्त ‘कुमुद’ से आल्हा की ऐतिहासिकता के विषय पर बातचीत की है, जिसे हम अगले सप्ताह ‘सुर संगम’ में प्रस्तुत करेंगे। आज के अंक को विराम देने से पहले आइए आपको अवध क्षेत्र में प्रचलित आल्हा का एक उदाहरण सुनवाते हैं। उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले के सुप्रसिद्ध लोक-गायक लल्लू बाजपेयी के स्वरों में यह आल्हा है। गायन के बीच-बीच में विभिन्न चरित्रों द्वारा गद्य संवाद भी बोले गए हैं।

आल्हा गायन : स्वर – लल्लू बाजपेयी : प्रसंग – मचला हरण


अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। अगले रविवार को हम आल्हा गायकी के सम्बन्ध में इस आलेख के दूसरे भाग के साथ पुनः उपस्थित होंगे। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई होगी। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तम्भ को और रोचक बना सकते हैं! आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

चित्र परिचय : वीर आल्हा


आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, August 7, 2011

सुर संगम में आज - जारी है लोक संगीत शैली कजरी पे चर्चा

सुर संगम - 32 -लोक संगीत शैली "कजरी" (अंतिम भाग)

कजरी गीतों में प्रकृति का चित्रण, लौकिक सम्बन्ध, श्रृंगार और विरह भाव का वर्णन ही नहीं होता; बल्कि समकालीन सामाजिक, राजनीतिक घटनाओं का चित्रण भी प्रायः मिलता है|
"केतने पीसत होइहें जेहल में चकरिया..." - कजरी गीतों के जरिए स्वतंत्रता का संघर्ष

शास्त्रीय और लोक संगीत के इस साप्ताहिक स्तम्भ "सुर संगम" के आज के अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत प्रेमियों का स्वागत करता हूँ| पिछले अंक में हमने आपसे देश के पूर्वांचल की अत्यन्त लोकप्रिय लोक-संगीत-शैली "कजरी" के बारे में कुछ जानकारी बाँटी थी| आज दूसरे भाग में हम उस चर्चा को आगे बढ़ाते हैं| पिछले अंक में हमने "कजरी" के वर्ण्य विषय और महिलाओं द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली कजरियों के विभिन्न प्रकार की जानकारी आपसे बाँटी थी| मूलतः "कजरी" महिला प्रधान गायकी ही है| "कजरी" गीतों में कोमल भावों और लोक-जीवन की जैसी अभिव्यक्ति होती है उससे यह महिला प्रधान गायन शैली के रूप में ही स्थापित है| परन्तु ब्रज के सखि सम्प्रदाय के प्रभाव और उन्नीसवीं शताब्दी में उपशास्त्रीय संगीत का हिस्सा बन जाने के कारण पुरुष वर्ग द्वारा भी अपना लिया गया| बनारस (अब वाराणसी) के जिन संगीतज्ञों का ठुमरी के विकास में योगदान रहा है, उन्होंने "कजरी" को भी उप्शास्त्रीयता का रंग दिया| "कजरी" को प्रतिष्ठित करने में बनारस के उच्चकोटि के संगीतज्ञ बड़े रामदास जी का योगदान अविस्मरणीय है| इन्ही बड़े रामदास जी के प्रपौत्र पण्डित विद्याधर मिश्र ने उपशास्त्रीय अंग में कजरी गायन की परम्परा को जारी रखा है| (बड़े रामदास जी के पौत्र और विद्याधर मिश्र के पिता पं. गणेशप्रसाद मिश्र के स्वरों में आप "सुर संगम" के 28 वें अंक में टप्पा गायन सुन चुके हैं) आइए; यहाँ थोड़ा रुक कर, बड़े रामदास जी की कजरी रचना -"बरसन लागी बदरिया रूमझूम के..." उपशास्त्रीय अन्दाज़ में सुनते हैं; स्वर पण्डित विद्याधर मिश्र का है-

कजरी - "बरसन लागी बदरिया रूमझूम के..." गायक - विद्याधर मिश्र

सुनिए यहाँ

कजरी गीतों में प्रकृति का चित्रण, लौकिक सम्बन्ध, श्रृंगार और विरह भाव का वर्णन ही नहीं होता; बल्कि समकालीन सामाजिक, राजनीतिक घटनाओं का चित्रण भी प्रायः मिलता है| ब्रिटिश शासनकाल में राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत अनेक कजरी गीतों की रचना की गई| बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में पूरे देश में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जन-चेतना का जो विस्तार हुआ उससे "कजरी" शैली भी अछूती नहीं रही| अनेक लोकगीतकारों ने ऐसी अनेक राष्ट्रवादी कजरियों की रचना की जिनसे तत्कालीन ब्रिटिश सरकार भयभीत हुई और ऐसे अनेक लोक गीतों को प्रतिबन्धित कर दिया| इन लोकगीतों के रचनाकारों और गायकों को ब्रिटिश सरकार ने कठोर यातनाएँ भी दीं| परन्तु प्रतिबन्ध के बावजूद लोक परम्पराएँ जन-जन तक पहुँचती रहीं| इन विषयों पर रची गईं अनेक कजरियों में महात्मा गाँधी के सिद्धांतों को रेखांकित किया गया| ऐसी ही एक कजरी की पंक्तियाँ देखें -"चरखा कातो, मानो गाँधी जी की बतियाँ, विपतिया कटि जइहें ननदी..."| कुछ कजरियों में अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों पर प्रहार किया गया| ऐसी ही एक कजरी आज हम आपको सुनवाते हैं| इस कजरी की स्थायी की पंक्तियाँ बिल्कुल सामान्य कजरी की भाँति है, किन्तु एक अन्तरे में लोकगीतकार ने अंगेजों की दमनात्मक नीतियों को रेखांकित किया है| मूल गीत की पंक्तियाँ हैं -"कैसे खेले जईबू सावन में कजरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी..."| इन पंक्तियों में काले बादलों का घिरना, गुलामी के प्रतीक रूप में चित्रित हुआ है| अन्तरे की पंक्तियाँ हैं -

"केतनो लाठी गोली खईलें, केतनो डामन फाँसी चढ़ीलें,
केतनों पीसत होइहें जेहल में चकरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी..."|

कजरी का यह अन्तरा गाते समय बड़ी चतुराई से अन्य सामान्य भाव वाले अन्तरों के बीच जोड़ दिया जाता था| ऐसा माना जाता है कि मूल कजरी की रचना जहाँगीर नामक लोकगीतकार ने की थी; किन्तु इसके प्रतिबन्धित अन्तरे के रचनाकार का नाम अज्ञात ही है| यह कजरी स्वतंत्रता से पूर्व विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग क्षेरीय बोलियों में प्रचलित थी| हम आपको इस कजरी के दो संस्करण सुनवाते है| पहला संस्करण लोकगायक मोहम्मद कलीम के स्वरों में है| इसे कजरी का पछाहीं संस्करण कहा जाता है| दूसरा संस्करण मीरजापुरी कजरी के रूप में है|

कजरी : "कैसे खेलन जइयो सावन मा कजरिया, बदरिया घिरी आई गोरिया..." : स्वर - मोहम्मद कलीम

कजरी : "कैसे खेलै जाबे सावन में कजरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी..." : समूह स्वर

वर्तमान समय में लोकगीतों का प्रचलन धीरे-धीरे लुप्त हो रहा है| ऐसे में पूर्वांचल की अन्य लोक शैलियों की तुलना में "कजरी" की स्थिति कुछ बेहतर है| नई पीढी को इस सशक्त लोक गायन शैली से परिचित कराने में कुछेक संस्थाएँ और कुछ कलाकार आज भी सलग्न हैं| राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय सांस्कृतिक संगठन संस्कार भारती ने कुछ वर्ष पूर्व मीरजापुर में "कजरी महोत्सव" का आयोजन किया था| यह संगठन समय-समय पर नई पीढी के लिए कजरी प्रशिक्षण की कार्यशालाएँ भी आयोजित करता है| उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी की ओर से भी विदुषी कमला श्रीवास्तव के निर्देशन में कार्यशालाएँ आयोजित होती रहती है| मीरजापुर की सुप्रसिद्ध कजरी गायिका उर्मिला श्रीवास्तव ने गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत नई पीढी के कई गायक-गायिकाओं को तैयार किया है और आज भी इस कार्य में संलग्न हैं| आइए अब हम उर्मिला श्रीवास्तव के स्वरों में सुनते हैं एक परम्परागत कजरी -

कजरी : "हमके सावन में झुलनी गढ़ाई दे पिया..." : स्वर - उर्मिला श्रीवास्तव

पारम्परिक कजरियों की धुनें और उनके टेक निर्धारित होते हैं| आमतौर पर कजरियाँ जैतसार, ढुनमुनियाँ, खेमटा, बनारसी और मीरजापुरी धुनों के नाम से पहचानी जाती हैं| कजरियों की पहचान उनके टेक के शब्दों से भी होती है| कजरी के टेक होते हैं- 'रामा', 'रे हरि', 'बलमू', 'साँवर गोरिया', 'ललना', 'ननदी' आदि| आइए हम एक बार फिर फिल्म संगीत में "कजरी" के प्रयोग पर चर्चा करते हैं| पिछले भाग में हमने आपको भोजपुरी फिल्म "विदेसिया" से महिलाओं द्वारा समूह में गायी जाने वाली मीरजापुरी कजरी का रसास्वादन कराया था| आज की फ़िल्मी कजरी भी भोजपुरी फिल्म से ही है| 1964 में प्रदर्शित फिल्म "नैहर छुटल जाय" में गायक मन्ना डे ने एक परम्परागत बनारसी कजरी का गायन किया था| इसके संगीतकार जयदेव ने कजरी की परम्परागत धुन में बिना कोई काट-छाँट किये प्रस्तुत किया था| आप सुनिए श्रृंगार रस से अभिसिंचित यह फ़िल्मी कजरी और मैं कृष्णमोहन मिश्र आपसे यहीं विराम लेने की अनुमति चाहता हूँ| आपके सुझावों की हमें प्रतीक्षा रहेगी|

कजरी : "अरे रामा रिमझिम बरसेला पनियाँ..." : फिल्म - नैहर छुटल जाए : स्वर : मन्ना डे

सुर-संगम का आगामी अंक होगा ख़ास, इसलिए हमने सोचा है की उस अंक के बारे में कोई पहेली नहीं पूछी जाएगी| आगामी अंक में हम श्रद्धा सुमन अर्पित करेंगे महान कविगुरू श्री रबींद्रनाथ ठाकुर को जिनकी श्रावण माह की २२वीं तिथि यानी कल ८ अगस्त को पुण्यतिथि है|

पिछ्ली पहेली का परिणाम: अमित जी को एक बार फिर से बधाई!!!
अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तंभ को और रोचक बना सकते हैं!आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० बजे कृष्णमोहन जी के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!


प्रस्तुति - सुमित चक्रवर्ती

आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, July 31, 2011

"नीक सैयाँ बिन भवनवा नाहीं लागे सखिया..." - रिमझिम फुहारों के बीच श्रृंगार रस में पगी कजरी

सुर संगम - 31 -लोक संगीत शैली "कजरी" (प्रथम भाग)

महिलाओं द्वारा समूह में प्रस्तुत की जाने वाली कजरी को "ढुनमुनियाँ कजरी" कहा जाता है| भारतीय पञ्चांग के अनुसार भाद्रपद मास, कृष्णपक्ष की तृतीया (इस वर्ष 16 अगस्त) को सम्पूर्ण पूर्वांचल में "कजरी तीज" पर्व धूम-धाम से मनाया जाता है|

शास्त्रीय और लोक संगीत के प्रति समर्पित साप्ताहिक स्तम्भ "सुर संगम" के आज के अंक में हम लोक संगीत की मोहक शैली "कजरी" अथवा "कजली" से अपने मंच को सुशोभित करने जा रहे हैं| पावस ने अनादि काल से ही जनजीवन को प्रभावित किया है| लोकगीतों में तो वर्षा-वर्णन अत्यन्त समृद्ध है| हर प्रान्त के लोकगीतों में वर्षा ऋतु को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है| उत्तर प्रदेश के प्रचलित लोकगीतों में ब्रज का मलार, पटका, अवध की सावनी, बुन्देलखण्ड का राछरा, तथा मीरजापुर और वाराणसी की "कजरी"; लोक संगीत के इन सब प्रकारों में वर्षा ऋतु का मोहक चित्रण मिलता है| इन सब लोक शैलियों में "कजरी" ने देश के व्यापक क्षेत्र को प्रभावित किया है| "कजरी" की उत्पत्ति कब और कैसे हुई; यह कहना कठिन है, परन्तु यह तो निश्चित है कि मानव को जब स्वर और शब्द मिले होंगे और जब लोकजीवन को प्रकृति का कोमल स्पर्श मिला होगा, उसी समय से लोकगीत हमारे बीच हैं| प्राचीन काल से ही उत्तर प्रदेश का मीरजापुर जनपद माँ विंध्यवासिनी के शक्तिपीठ के रूप में आस्था का केन्द्र रहा है| अधिसंख्य प्राचीन कजरियों में शक्तिस्वरूपा देवी का ही गुणगान मिलता है| आज "कजरी" के वर्ण्य-विषय काफी विस्तृत हैं, परन्तु "कजरी" गायन का प्रारम्भ देवी गीत से ही होता है|

"कजरी" के वर्ण्य-विषय ने जहाँ एक ओर भोजपुरी के सन्त कवि लक्ष्मीसखी, रसिक किशोरी आदि को प्रभावित किया, वहीं हजरत अमीर खुसरो, बहादुर शाह ज़फर, सुप्रसिद्ध शायर सैयद अली मुहम्मद 'शाद', हिन्दी के कवि अम्बिकादत्त व्यास, श्रीधर पाठक, द्विज बलदेव, बदरीनारायण उपाध्याय 'प्रेमधन' आदि भी "कजरी" के आकर्षण मुक्त न हो पाए| यहाँ तक कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने भी अनेक कजरियों की रचना कर लोक-विधा से हिन्दी साहित्य को सुसज्जित किया| साहित्य के अलावा इस लोकगीत की शैली ने शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में भी अपनी आमद दर्ज कराई| उन्नीसवीं शताब्दी में उपशास्त्रीय शैली के रूप में ठुमरी की विकास-यात्रा के साथ-साथ कजरी भी इससे जुड़ गई| आज भी शास्त्रीय गायक-वादक, वर्षा ऋतु में अपनी प्रस्तुति का समापन प्रायः "कजरी" से ही करते है| कजरी के उपशास्त्रीय रूप का परिचय देने के लिए हमने अपने समय की सुप्रसिद्ध गायिका रसूलन बाई के स्वरों में एक रसभरी "कजरी" -"तरसत जियरा हमार नैहर में..." का चुनाव किया है| यह लोकगीतकार छबीले की रचना है; जिसे रसूलन बाई ने ठुमरी के अन्दाज में प्रस्तुत किया है| इस "कजरी" की नायिका अपने मायके में ही दिन व्यतीत कर रही है, सावन बीतने ही वाला है और वह विरह-व्यथा से व्याकुल होकर अपने पिया के घर जाने को उतावली हो रही है| लीजिए, आप भी सुनिए यह कजरी गीत -

कजरी -"तरसत जियरा हमार नैहर में..." - गायिका : रसूलन बाई


मूलतः "कजरी" महिलाओं द्वारा गाया जाने वाला लोकगीत है| परिवार में किसी मांगलिक अवसर पर महिलाएँ समूह में कजरी-गायन करतीं हैं| महिलाओं द्वारा समूह में प्रस्तुत की जाने वाली कजरी को "ढुनमुनियाँ कजरी" कहा जाता है| भारतीय पञ्चांग के अनुसार भाद्रपद मास, कृष्णपक्ष की तृतीया (इस वर्ष 16 अगस्त) को सम्पूर्ण पूर्वांचल में "कजरी तीज" पर्व धूम-धाम से मनाया जाता है| इस दिन महिलाएँ व्रत करतीं है, शक्तिस्वरूपा माँ विंध्यवासिनी का पूजन-अर्चन करती हैं और "रतजगा" (रात्रि जागरण) करते हुए समूह बना कर पूरी रात कजरी-गायन करती हैं| ऐसे आयोजन में पुरुषों का प्रवेश वर्जित होता है| यद्यपि पुरुष वर्ग भी कजरी गायन करता है; किन्तु उनके आयोजन अलग होते हैं, जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे| "कजरी" के विषय परम्परागत भी होते हैं और अपने समकालीन लोकजीवन का दर्शन कराने वाले भी| अधिकतर कजरियों में श्रृंगार रस (संयोग और वियोग) की प्रधानता होती है| कुछ "कजरी" परम्परागत रूप से शक्तिस्वरूपा माँ विंध्यवासिनी के प्रति समर्पित भाव से गायी जाती है| भाई-बहन के प्रेम विषयक कजरी भी सावन मास में बेहद प्रचलित है| परन्तु अधिकतर "कजरी" ननद-भाभी के सम्बन्धों पर केन्द्रित होती हैं| ननद-भाभी के बीच का सम्बन्ध कभी कटुतापूर्ण होता है तो कभी अत्यन्त मधुर भी होता है| दोनों के बीच ऐसे ही मधुर सम्बन्धों से युक्त एक "कजरी" अब हम आपको सुनवाते हैं, जिसे केवल महिलाओं द्वारा समूह में गायी जाने वाली "कजरी" के रूप प्रस्तुत किया गया है| इस "कजरी" को स्वर दिया है- सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका विदुषी गिरिजा देवी, प्रभा देवी, डाली राहुत और जयता पाण्डेय ने| आप भी सुनिए; यह मोहक कजरी गीत-

समूह कजरी -"घरवा में से निकली ननद भौजाई ..." - गिरिजा देवी, प्रभा देवी, डाली राहुत व जयता पाण्डेय


"कजरी" गीत का एक प्राचीन उदाहरण तेरहवीं शताब्दी का, आज भी न केवल उपलब्ध है, बल्कि गायक कलाकार इस "कजरी" को अपनी प्रस्तुतियों में प्रमुख स्थान देते हैं| यह "कजरी" हजरत अमीर खुसरो की बहुप्रचलित रचना है, जिसकी पंक्तियाँ हैं -"अम्मा मेरे बाबा को भेजो जी कि सावन आया..." | अन्तिम मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ज़फर की एक रचना -"झूला किन डारो रे अमरैयाँ..." भी बेहद प्रचलित है| भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की कई कजरी रचनाओं को विदुषी गिरिजादेवी आज भी गातीं हैं| भारतेन्दु ने ब्रज और भोजपुरी के अलावा संस्कृत में भी कजरी-रचना की है| एक उदाहरण देखें -"वर्षति चपला चारू चमत्कृत सघन सुघन नीरे | गायति निज पद पद्मरेणु रत, कविवर हरिश्चन्द्र धीरे |" लोक संगीत का क्षेत्र बहुत व्यापक होता है| साहित्यकारों द्वारा अपना लिये जाने के कारण कजरी-गायन का क्षेत्र भी अत्यन्त व्यापक हो गया| इसी प्रकार उपशास्त्रीय गायक-गायिकाओं ने भी "कजरी" को अपनाया और इस शैली को रागों का बाना पहना कर क्षेत्रीयता की सीमा से बाहर निकाल कर राष्ट्रीयता का दर्ज़ा प्रदान किया| शास्त्रीय वादक कलाकारों ने "कजरी" को सम्मान के साथ अपने साजों पर स्थान दिया, विशेषतः सुषिर वाद्य के कलाकारों ने| सुषिर वाद्यों; शहनाई, बाँसुरी, क्लेरेनेट आदि पर कजरी की धुनों का वादन अत्यन्त मधुर अनुभूति देता है| "भारतरत्न" सम्मान से अलंकृत उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई पर तो "कजरी" और अधिक मीठी हो जाती थी| यही नहीं मीरजापुर की सुप्रसिद्ध कजरी गायिका उर्मिला श्रीवास्तव आज भी अपने कार्यक्रम में क्लेरेनेट की संगति अवश्य करातीं हैं| आइए अब हम आपको सुषिर वाद्य बाँसुरी पर कजरी धुन सुनवाते हैं, जिसे सुप्रसिद्ध बाँसुरी वादक पण्डित पन्नालाल घोष ने प्रस्तुत किया है-

बाँसुरी पर कजरी धुन : वादक - पन्नालाल घोष


ऋतु प्रधान लोक-गायन की शैली "कजरी" का फिल्मों में भी प्रयोग किया गया है| हिन्दी फिल्मों में "कजरी" का मौलिक रूप कम मिलता है, किन्तु 1963 में प्रदर्शित भोजपुरी फिल्म "बिदेसिया" में इस शैली का अत्यन्त मौलिक रूप प्रयोग किया गया है| इस कजरी गीत की रचना अपने समय के जाने-माने लोकगीतकार राममूर्ति चतुर्वेदी ने और संगीतबद्ध किया है एस.एन. त्रिपाठी ने| यह गीत महिलाओं द्वारा समूह में गायी जाने वाली "ढुनमुनिया कजरी" शैली में मौलिकता को बरक़रार रखते हुए प्रस्तुत किया गया है| इस कजरी गीत को गायिका गीत दत्त और कौमुदी मजुमदार ने अपने स्वरों से फिल्मों में कजरी के प्रयोग को मौलिक स्वरुप दिया है| आप यह मर्मस्पर्शी "कजरी" सुनिए और मैं कृष्णमोहन मिश्र आपसे "कजरी लोक गायन शैली" के प्रथम भाग को यहीं पर विराम देने की अनुमति चाहता हूँ| अगले रविवार को इस श्रृंखला का दूसरा भाग लेकर पुनः उपस्थित रहूँगा|

"नीक सैंयाँ बिन भवनवा नाहीं लागे सखिया..." : फिल्म - बिदेसिया : गीता दत्त, कौमुदी मजुमदार व साथी


और अब बारी है इस कड़ी की पहेली की जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से अधिक अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

पहेली: सुर-संगम के २८वें अंक में हमने आपको पंडित गणेश प्रसाद मिश्र की आवाज़ में "टप्पा" सुनाया था| आगामी अंक में हम आपको सुनवाएँगे उनके दादा जी की आवाज़ में कजरी| आपको बताना है उनका नाम|

पिछ्ली पहेली का परिणाम: अमित जी को एक बार फिर से बधाई!!!
अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तंभ को और रोचक बना सकते हैं!आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० बजे कृष्णमोहन जी के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

खोज व आलेख - कृष्णमोहन मिश्र

प्रस्तुति - सुमित चक्रवर्ती


आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, July 10, 2011

उर्जा से भरी तान और ठेके "टप्पे" के

सुर संगम - 28 - पारंपरिक संगीत शैली - टप्पा

टप्पों को एकाएक प्रस्तुत करने हेतु नियमानुसार पहले आलाप को ठुमरी अंग में गाया जाता है तथा उसके पश्चात तेज़ी से असमान लयबद्ध लहज़े में बुने शब्दों के उपयोग से तानायत की ओर बढ़ा जाता है|

सुर-संगम के सभी श्रोता-पाठकों को सुमित चक्रवर्ती का स्नेह भरा नमस्कार! तो कहिए कैसे बीते गर्मियों के दिन? जैसे किसी किसी मुसाफ़िर का मंज़िल पाने पर संघर्ष समाप्त हो जाता है, मानो ठीक उसी प्रकार गर्मियों के ये झुलसा देने वाले दिन भी अब बीत चुके हैं| और आ गयी है वर्षा ऋतु सबके जीवन में हर्ष की नई फुहार लिए| तो हम ने भी सोचा की क्यों न इस बार के अंक में कुछ अलग प्रकार का संगीत चर्चा में लाया जाए| आज का सुर-संगम आधारित है पंजाब व सिंध प्रांतों की प्रसिद्ध उप-शास्त्रीय गायन शैली 'टप्पा' पर|

टप्पा भारत की प्रमुख पारंपरिक संगीत शैलियों में से एक है| यह माना जाता है की इस शैली की उत्पत्ति पंजाब व सिंध प्रांतों के ऊँट चलाने वालों द्वारा की गई थी| इन गीतों में मूल रूप से हीर और रांझा के प्रेम व विरह प्रसंगो को दर्शाया जाता है| खमाज, भैरवी, काफ़ी, तिलांग, झिन्झोटि, सिंधुरा और देश जैसे रागों तथा पंजाबी, पश्तो जैसे तालों द्वारा प्रेम-प्रसंग अथवा करुणा भाव व्यक्त किए जाते हैं| टप्पा की विशेषता हैं इसमें लिए जाने वाले ऊर्जावान तान और असमान लयबद्ध लहज़े| टप्पा गायन को एक लोक-शैली से ऊपर उठाकर एक शास्त्रीय शैली का रूप दिया था मियाँ ग़ुलाम नबी शोरी नें जो अवध के नवाब असफ़-उद्-दौलह के दरबारी गायक थे| इस शैली के बारे में और जानने से पहले क्यों न एक अल्प-विराम ले कर प्रसिद्ध टप्पा गायिका विदुषी मालिनी राजुर्कर द्वारा राग भैरवी में प्रस्तुत इस टप्पे का आनंद लें!

टप्पा - राग भैरवी - विदुषी मालिनी राजुर्कर


टप्पा गायन शैली में ठेठ 'टप्पे के तान' प्रयोग में लाए जाते हैं| पंजाबी ताल, जिसे 'टप्पे का ठेका' भी कहा जाता है, में ताल के प्रत्येक चक्र में तान के खिंचाव और रिहाई का प्रयोग आवश्यक होता है| टप्पों को एकाएक प्रस्तुत करने हेतु नियमानुसार पहले आलाप को ठुमरी अंग में गाया जाता है तथा उसके पश्चात तेज़ी से असमान लयबद्ध लहज़े में बुने शब्दों के उपयोग से तानायत की ओर बढ़ा जाता है| टप्पा गायकी में जमजमा, गीतकारी, खटका, मुड़की व हरकत जैसे कई अलंकार प्रयोग में लाए जाते हैं| यह शैली मूलतः ग्वालियर घराने तथा बनारस घराने की विशेषता है| दोनो घरानों के टपपों में ताल और आशुरचना की शैली का उपयोग जैसे कुछ संरचनात्मक मतभेद हैं, लेकिन मौलिक सिद्धांत एक जैसे ही हैं| आइए सुनते हैं ग्वालियर घराने की प्रसिद्ध गायिका श्रीमती शाश्वती मंडल पाल द्वारा राग खमाज में गाए इस टप्पे को|

टप्पा - राग खमाज - शाश्वती मंडल पाल


आज के दौर में टप्पा प्रदर्शन के परिदृश्य में जब कलाकारों की बात आती है तो निस्संदेह सबसे शानदार माना जाता है विदुषी मालिनी राजुर्कर को| ७० के दशक से इन्होंने इस शैली को जनप्रिय बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है| अपने स्पष्ट व उज्ज्वल तानों से न कावेल इन्होंने कई उत्कृष्ट प्रस्तुतियां दी हैं बल्कि टपपों में मूर्छना जैसी तकनीकों का प्रयोग करा इस शैली को एक नया रूप दिया है| इनके अलावा ग्वालियर घराने से आरती अंकालिकर, आशा खादिलकर, शाश्वती मंडल पाल जैसी गायिकाओं नें इस गायन शैली को लोकप्रिय किया| बनारस घराने से बड़े रामदासजी, सिद्धेश्वरी देवी, गिरिजा देवी, पंडित गणेश प्रसाद मिश्र तथा राजन व साजन मिश्र जैसे दिग्गजों ने भी इस शैली में उल्लेखनीय प्रस्तुतियाँ दी हैं| आइए आज की चर्चा को समाप्त करते हुए सुनें पंडित गणेश प्रसाद मिश्र द्वारा राग काफ़ी में गाए इस टप्पे को|

टप्पा - राग काफ़ी - पंडित गणेश प्रसाद मिश्र


और अब बारी है इस कड़ी की पहेली की जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से अधिक अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

पहेली: यह सितार से मिलता जुलता वाद्य है जिसमें सितार की तुलना में नीचे के नोट्स का प्रयोग किया जाता है|

पिछ्ली पहेली का परिणाम: क्षिति जी ने एक बार फिर सही उत्तर दिया, अमित जी कहाँ ग़ायब हो गये?

अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तंभ को और रोचक बना सकते हैं!आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० बजे सुजॉय के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

प्रस्तुति - सुमित चक्रवर्ती


आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, July 3, 2011

परदेस में जब घर-परिवार और सजनी की याद आई तब उपजा लोक संगीत "बिरहा"

सुर संगम - 27 - लोक गीत शैली -बिरहा

बिरहा गायन के मंचीय रूप में वाद्यों की संगति होती है| प्रमुख रूप से ढोलक, हारमोनियम और करताल की संगति होती है|

शास्त्रीय और लोक संगीत के साप्ताहिक स्तम्भ "सुर संगम" के इस नए अंक में आप सभी संगीत-प्रेमियों का, मैं कृष्णमोहन मिश्र हार्दिक स्वागत करता हूँ| दोस्तों; भारतीय लोक संगीत में अनेक ऐसी शैलियाँ प्रचलित हैं जिनमें नायक से बिछड़ जाने या नायक से लम्बे समय तक दूर होने की स्थिति में विरह-व्यथा से व्याकुल नायिका लोकगीतों के माध्यम से स्वयं को अभिव्यक्त करती है| देश के प्रायः प्रत्येक क्षेत्र में नायिका की विरह-व्यथा का प्रकटीकरण करते गीत बहुतेरे हैं, परन्तु विरह-पीड़ित नायक की अभिव्यक्ति देने वाले लोकगीत बहुत कम मिलते हैं| उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में लोक-संगीत की एक ऐसी विधा अत्यन्त लोकप्रिय है, जिसे "बिरहा" नाम से पहचाना जाता है|


चित्र परिचय
बिरहा गुरुओं का यह 1920 का दुर्लभ चित्र है; जिसके मध्य में बैठे हैं, बिरहा को एक प्रदर्शनकारी कला के रूप में प्रतिष्ठित करने वाले गुरु बिहारी यादव, बाईं ओर है- रम्मन यादव तथा दाहिनी ओर हैं- गुरु पत्तू सरदार (यादव)|


इस लोक-संगीत की उत्पत्ति के सूत्र उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में मिलते हैं| ब्रिटिश शासनकाल में ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन कर महानगरों में मजदूरी करने की प्रवृत्ति बढ़ गयी थी| ऐसे श्रमिकों को रोजी-रोटी के लिए लम्बी अवधि तक अपने घर-परिवार से दूर रहना पड़ता था| दिन भर के कठोर श्रम के बाद रात्रि में छोटे-छोटे समूह में यह लोग इसी लोक-विधा के गीतों का ऊँचे स्वरों में गायन किया करते थे| लगभग 55 वर्ष पहले वाराणसी के ठठेरी बाज़ार,चौखम्भा आदि व्यावसायिक क्षेत्रों में श्रमिकों को 'बिरहा' गाते हुए मैंने प्रत्यक्ष देखा-सुना है| प्रारम्भ में 'बिरहा' श्रम-मुक्त करने वाले लोकगीत के रूप में ही प्रचलित था| बिरहा गायन के आज दो प्रकार हमें मिलते हैं| पहले प्रकार को "खड़ी बिरहा" कहा जाता है| गायकी के इस प्रकार में वाद्यों की संगति नहीं होती, परन्तु गायक की लय एकदम पक्की होती है| पहले मुख्य गायक तार सप्तक के स्वरों में गीत का मुखड़ा आरम्भ करता है और फिर गायक दल उसमें सम्मिलित हो जाता है| बिरहा गायन का दूसरा रूप मंचीय है, परन्तु उसकी चर्चा से पहले आइए सुनते हैं "खड़ी विरहा" का एक उदाहरण-

खड़ी बिरहा : गायक - मन्नालाल यादव और साथी


कालान्तर में लोक-रंजन-गीत के रूप में इसका विकास हुआ| पर्वों-त्योहारों अथवा मांगलिक अवसरों पर 'बिरहा' गायन की परम्परा रही है| किसी विशेष पर्व पर मन्दिर के परिसरों में 'बिरहा दंगल' का प्रचलन भी है| बिरहा के दंगली स्वरुप में गायकों की दो टोलियाँ होती है और बारी-बारी से बिरहा गीतों का गायन करते हैं| ऐसी प्रस्तुतियों में गायक दल परस्पर सवाल-जवाब और एक दूसरे पर कटाक्ष भी करते हैं| इस प्रकार के गायन में आशुसर्जित लोक-गीतकार को प्रमुख स्थान मिलता है| 'बिरहा' के अखाड़े (गुरु घराना) भी होते है| विभिन्न अखाड़ों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का भाव रहता है| लगभग पाँच दशक पहले एक ऐसे ही अखाड़े के गुरु -पत्तू सरदार को मैं निकट से जानता था| वह बिरहा-गीतों के अनूठे रचनाकार और गायक थे| उनके अखाड़े के सैकड़ों शिष्य थे, जिन्हें समाज में लोक गायक के रूप में भरपूर सम्मान प्राप्त था| गुरु पत्तू सरदार निरक्षर थे| प्रायः वह शाम को अपने घर के छज्जे पर बैठ कर मेरे विद्यालय से लौटने की प्रतीक्षा किया करते थे, मैं उनके गीतों को लिपिबद्ध जो करता था| गुरु पत्तू वेदव्यास की तरह बोलते जाते थे और मैं गणेश की तरह लिखता जाता था| उनके रचे गए अनेक बिरहा-गीत आज भी मेरी स्मृतियों में सुरक्षित हैं| विरहा-गीतों के प्रसंग अधिकतर रामायण, महाभारत और पौराणिक कथाओं पर आधारित होते हैं| कभी-कभी लोकगीतकार सामयिक विषयों पर भी गीत रचते हैं| गुरु पत्तू सरदार ने 1965 के भारत-पाक युद्ध में भारत की विजय-गाथा को इन पंक्तियों में व्यक्त किया था -"चमके लालबहादुर रामनगरिया वाला, अयूब के मुह को काला कर दिया..."| इसी प्रकार टोकियो ओलम्पिक से स्वर्ण पदक जीत कर लौटे भारतीय हाकी दल के स्वागत के लिए भी उन्होंने विरहा गीत की रचना की थी| विगत चार-पाँच दशकों में अनेक बिरहा गायकों ने लोक संगीत की इस विधा को लोकप्रिय करने में अपना योगदान किया| इनमें से दो गायकों- वाराणसी के हीरालाल यादव और इलाहाबाद के राम कैलाश यादव के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं| आइए यहाँ रुक कर राम कैलाश यादव और उनके साथियों द्वारा प्रस्तुत विरहा का आनन्द लेते हैं| इस विरहा गीत में शिव विवाह का अत्यन्त रोचक प्रसंग है|

बिरहा - शिव विवाह भाग - 1 : गायक - राम कैलाश यादव और साथी


बिरहा - शिव विवाह भाग - 2 : गायक - राम कैलाश यादव और साथी


बिरहा गायन के मंचीय रूप में वाद्यों की संगति होती है| प्रमुख रूप से ढोलक, हारमोनियम और करताल की संगति होती है| करताल गुल्ली के आकार में लगभग 8 -9 इंच लम्बे स्टील के दो टुकड़े होते हैं, जिसे गायक अपनी दोनों हथेलियों के बीच रख कर आपस में टकराते हुए बजाते हैं| बिरहा लोकगीत का फिल्मों में प्रायः नहीं के बराबर उपयोग हुआ है| आश्चर्यजनक रूप से 1955 की फिल्म "मुनीमजी" में "बिरहा" का अत्यन्त मौलिक रूप में प्रयोग किया गया है| देवानन्द और नलिनी जयवन्त अभिनीत इस फिल्म के संगीतकार सचिनदेव बर्मन हैं तथा हेमन्त कुमार और साथियों के स्वरों में इस बिरहा का गायन किया गया है| इस बिरहा में भी शिव विवाह का ही प्रसंग है| गीत की अन्तिम पंक्तियों में दो नाम लिये गए है - पहले "बरसाती" और फिर "दुखहरण" | पहला नाम अखाड़े के गुरु का और दूसरा नाम गायक का है| यह गीत बरसाती यादव अखाड़े का है और इसे किसी दुखहरण नामक गायक ने गाया था| आइए सुनते हैं लोकगीत "बिरहा" का यह फ़िल्मी रूप -

बिरहा गीत -"शिवजी बियाहने चले पालकी सजाय के..." : फिल्म - मुनीमजी : गायक - हेमन्त कुमार और साथी


और अब बारी इस कड़ी की पहेली का जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से अधिक अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

पहेली: शास्त्रीय गायन की यह शैली पंजाब में उपजी तथा यही शैली बंगाल में जाकर 'पुरातनी' के नाम से प्रसिद्ध हुई|

पिछ्ली पहेली का परिणाम: अमित जी यह क्या? आपने तो हथियार ही डाल दिये!!! खैर, क्षिती जी ने पुनः सटीक उत्तर दे कर ५ और अंक अर्जित कर लिये है, बधाई!

इसी के साथ 'सुर-संगम' के आज के इस अंक को यहीं पर विराम देते हैं| आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तंभ को और रोचक बना सकते हैं! आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० बजे हमारे प्रिय सुजॉय चटर्जी के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

आलेख -कृष्ण मोहन मिश्र
प्रस्तुति - सुमित चक्रवर्ती


आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, May 22, 2011

सुर संगम में आज - गुरूदेव रबिंद्रनाथ ठाकुर और रबिंद्रसंगीत

सुर संगम - 21 - रविन्द्र संगीत में बसती है बंगाल की आत्मा

इस शैली ने बंगाल की संगीत अवधारणा में एक नया आयाम जोड़ा। गुरूदेव ने लगभग २३०० गीत रचे जिनका संगीत भारतीय शास्त्रीय संगीत की ठुमरी शैली से प्रभावित है। ये गीत प्रकृति के प्रति उनके गहरे लगाव और मानवीय भावनाओं को दर्शाते हैं।

तुम इस बार मुझे अपना ही लो हे नाथ, अपना लो।
इस बार नहीं तुम लौटो नाथ
हृदय चुराकर ही मानो।


उपरोक्त पंक्तियों में समर्पण का भाव घुला हुआ है| समर्पण किसी प्रेमिका का प्रेमी के प्रति, समर्पण किसी भक्त का अपने ईश्वर के प्रति| और यह जानकर भी शायद आश्चर्य नहीं होगा की ये पंक्तियाँ एक ऐसे महकवि की रचना के हिन्दी अनुवाद में से ली गई हैं जिन्होंने अपना समस्त जीवन अपनी रचनाओं के माध्यम से देश व समाज में जागृति लाने में समर्पित कर दिया था| जी हाँ! मैं बात कर रहा हूँ 'गुरुदेव' श्री रबिंद्रनाथ ठाकुर की| सुर-संगम के सभी श्रोता-पाठकों का मैं, सुमित चक्रवर्ती हार्दिक अभिनंदन करता हूँ हमारी २१वीं कड़ी में जो समर्पित है महान कविगुरू श्री रबिंद्रनाथ ठाकुर को जिनका १५०वाँ जन्मदिवस वैसाख महीने की २५वीं तिथि यानि ९ मई २०११ को मनाया गया|

रबिंद्रनाथ ठाकुर का जन्म देवेंद्रनाथ ठाकुर और शारदा देवी की संतान के रूप में वर्ष १८६१ में कोलकाता के जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी में हुआ। उनकी स्कूल की पढ़ाई प्रतिष्ठित सेंट्‍ ज़ेवियर स्कूल में हुई। टैगोर ने बैरिस्टर बनने की चाहत में १९७८ में इंग्लैंड के ब्रिजटोन में पब्लिक स्कूल में नाम दर्ज कराया। उन्होंने लंदन विश्वविद्यालय में कानून का अध्ययन किया लेकिन १८८० में बिना डिग्री हासिल किए ही वापस आ गए। उनका १८८३ में मृणालिनी देवी के साथ विवाह हुआ। बचपन से ही उनकी कविता, छन्द और भाषा में अद्भुत प्रतिभा का आभास लोगों को मिलने लगा था। उन्होंने पहली कविता आठ साल की उम्र लिखी थी और १८७७ में केवल सोलह वर्ष की उम्र में उनकी लघुकथा प्रकाशित हुई थी। वे बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगद्रष्टा थे तथा एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति बने। वे एकमात्र कवि हैं जिसकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्र-गान बनीं - भारत का राष्ट्र-गान "जन गण मन" और बांग्लादेश का राष्ट्र-गान "आमार सोनार बांग्ला" गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं। आइये गुरूदेव व उनकी रचनाओं के बारे में और जानने से पहले सुनते हैं उनके द्वारा रचित एक मधुर गीत उन्हीं की आवाज़ में।

गीत - तबे मोने रेखो (तुम याद रखना)


गुरूदेव ने अपने द्वारा रची कविताओं को गीतों का रूप दे दिया, इस प्रकार रचना हुई एक नई संगीत विधा की जिसे हम रबिंद्र संगीत के नाम से जानते हैं। इस शैली ने बंगाल की संगीत अवधारणा में एक नया आयाम जोड़ा। गुरूदेव ने लगभग २३०० गीत रचे जिनका संगीत भारतीय शास्त्रीय संगीत की ठुमरी शैली से प्रभावित है। ये गीत प्रकृति के प्रति उनके गहरे लगाव और मानवीय भावनाओं को दर्शाते हैं। रबिंद्र संगीत ने बंगाली संस्कृति पर एक गहरा प्रभाव डाला है तथा इसे बांग्लादेश तथा पश्चिम बंगाल दोनों की सांस्कृतिक निधि माना गया है। सामजिक जन चेतना तथा भारतीय स्वाधीनता में उनके गीतों ने महत्त्व्पूर्ण भूमिका निभाई।

रबिंद्रसंगीत एक विशिष्ट संगीत पद्धति के रूप में विकसित हुआ है। इस शैली के कलाकार पारंपरिक पद्धति में ही इन गीतों को प्रस्तुत करते हैं। बीथोवेन की संगीत रचनाओं(सिम्फनीज़) या विलायत ख़ाँ के सितार की तरह रबिंद्रसंगीत अपनी रचनाओं के गीतात्मक सौन्दर्य की सराहना के लिए एक शिक्षित, बुद्धिमान और सुसंस्कृत दर्शक वर्ग की मांग करता है। १९४१ में गुरूदेव की मृत्यु हो गई परन्तु उनका गौरव और उनके गीतों का प्रभाव अनन्त है। उन्होंने अपने गीतों में शुद्ध कविता को सृष्टिकर्त्ता, प्रकृति और प्रेम से एकीकृत किया है। मानवीय प्रेम प्रकृति के दृश्यों में मिलकर सृष्टिकर्त्ता के लिए समर्पण (भक्ति) में बदल जाता है। उनके 2000 अतुल्य गीतों का संग्रह गीतबितान(गीतों का बागीचा) के रूप में जाना जाता है। इस पुस्तक के चार प्रमुख हिस्से हैं- पूजा (भक्ति), प्रेम (प्यार), प्रकृति (प्रकृति) और बिचित्रा (विविध)। लीजिए प्रस्तुत है गुरूदेव द्वारा रचित एक गीत "ग्राम छाड़ा ओई रांगा माटीर पौथ" का हिन्दी अनुवाद जिसे गाया है आगरा घराने की प्रसिद्घ गायिका श्रीमति दिपाली नाग ने। इस गीत में कवि अपने देश की धरती को याद कर रहा है।

गाँव से दूर - दीपली नाग - रबिंद्र संगीत (हिन्दी अनुवाद)


यह एक स्वीकृत तथ्य है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत के तत्वों को रबिन्द्र-संगीत में एक बहुत ही बुद्धिमान और प्रभावी तरीके से इस्तेमाल किया गया है। इसे इन गीतों में कथित भावों व मनोदशा को व्यक्त करने हेतु एक इकाई के रूप में ही सीमित रखा गया है ताकि शात्रीय संगीत के तत्व गीत के मुख्य भाव के साथ प्रतिद्वन्द्वित न हों। इसीलिए कई गीतों में शास्त्रीय संगीत का आंशिक अनुरूप पाया जाता है। परन्तु यह भी पाया गया है कि कुछ गीतों में न केवल रागों व तालों को उनके शुद्ध रूप में अपनाकर बल्कि कुछ अवसरों में तो गुरूदेव ने रागों को बहुत ही रोचक रूप में मिश्रित कर अपनी सबसे सुंदर व बौद्धिक रूप से चुनौतिपूर्ण रचनाएँ प्रस्तुत की हैं। आइए सुनते हैं राग मेघ और राग देश के ऐसे ही एक मिश्रण पर आधारित एक गीत को प्रसिद्ध रबिंद्रसंगीत गायिका श्रीराधा बन्धोपाध्याय की आवाज़ में तथा उसके बाद सुनिए इसी गीत का इन्स्ट्रुमेंटल वर्ज़न जिसे प्रस्तुत किया गया है सरोद पर। इस गीत में वर्षा के प्रति तड़प को प्रमि से विरह की तड़प से जोड़कर दर्शाया गया है।

एशो श्यामोलो सुन्दोरो - श्रीराधा बन्धोपाध्याय - राग मेघ व राग देश


एशो श्यामोलो सुन्दोरो - सरोद


और अब बारी इस कड़ी की पहेली का जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से अधिक अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

सुनिए और पहचानिए इस आवाज़ को।


पिछ्ली पहेली का परिणाम: अमित जी आपने थोडी सी देर कर दी, पिछ्ली बार क्षिति जी ने बता दिया कि वे खेल में बनी हुई हैं, बधाई!

इसी के साथ 'सुर-संगम' के आज के इस अंक को यहीं पर विराम देते हैं| गुरूदेव टैगोर की रचनाएँ और रबिंद्र संगीत एक ऐसा अनन्त सागर हैं जिनको एक अध्याय में समेटना नामुम्किन है, इसलिए इनसे जु़डे कई अन्य तथ्यों व रचनाओं को आपके समक्ष हम प्रस्तुत करेंगे सुर-संगम की सावन माह की किसी कड़ी में जब मनाई जाएगी कविगुरू की पुण्यतिथि| आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई। आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० बजे हमारे प्रिय सुजॉय दा प्रस्तुत करेंगे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का ग़ुलदस्ता, पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

खोज व आलेख- सुमित चक्रवर्ती



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, April 10, 2011

सुर संगम में आज - नवरात्रों की जगमग और चैती

सुर संगम - 15 - चैत्र मास की चैती
इस चर-अचर और दृश्य-अदृश्य जगत की जो विधाएँ, शिल्प, गतियाँ और चेष्टाएँ हैं, वह सब शास्त्र रचना के मूल तत्त्व हैं|


मस्कार! सुर-संगम के इस साप्ताहिक स्तंभ में मैं, सुमित चक्रवर्ती आपका अभिनंदन करता हूँ और साथ ही आप सब को नवरात्रों की हार्दिक शुभ-कामनाएँ भी देता हूँ। पिछ्ली कड़ी में हमनें पारंपरिक लोक व शास्त्रीय कला 'चैती' के बारे में चर्चा की। 'चैती' चैत्र मास के नवरात्रों के दिनों में प्रस्तुत की जाने वाली लोक एवं शास्त्रीय कला है। आइये इस कला के लोक पक्ष की चर्चा आगे बढ़ाते हुए हम बात करें इसके शास्त्रीय पक्ष के बारे में भी।

यह मान्यता है की प्रकृतिजनित, नैसर्गिक रूप से लोक कलाएँ पहले उपजीं, परम्परागत रूप में उनका क्रमिक विकास हुआ और अपनी उच्चतम गुणवत्ता के कारण ये शास्त्रीय रूप में ढल गईं| प्रदर्शनकारी कलाओं पर भरतमुनि का ग्रन्थ- 'नाट्यशास्त्र' पंचम वेद माना जाता है| नाट्यशास्त्र के प्रथम भाग, पंचम अध्याय के श्लोक ५७ में ग्रन्थकार ने स्वीकार किया है कि लोक जीवन में उपस्थित तत्वों को नियमों में बाँध कर ही शास्त्र प्रवर्तित होता है | श्लोक का अर्थ है- "इस चर-अचर और दृश्य-अदृश्य जगत की जो विधाएँ, शिल्प, गतियाँ और चेष्टाएँ हैं, वह सब शास्त्र रचना के मूल तत्त्व हैं|" चैती गीतों के लोक स्वरुप में ताल पक्ष के चुम्बकीय गुण के कारण ही उप-शास्त्रीय संगीत में यह स्थान पा सका| लोक परम्परा में चैती १४ मात्राओं के चाँचर ताल में गायी जाती है, जिसके बीच-बीच में ताल कहरवा का प्रयोग होता है| पूरब अंग के बोल बनाव की ठुमरी भी १४ मात्राओं के दीपचन्दी ताल में निबद्ध होती है और गीत के अन्तिम हिस्से में कहरवा की लग्गी का प्रयोग होता है| सम्भवतः चैती के इस गुण ने ही उप-शास्त्रीय गायकों को इसके प्रति आकर्षित किया होगा| आइए चैती के लोक स्वरुप का अनुभव 1908 के एक दुर्लभ रिकार्ड के माध्यम से करते हैं| इस रिकार्ड में अच्छन बाई की आवाज़ है|

अरे फुलेला फुल्वा - अच्छनबा


लोक कला जब शास्त्रीय स्वरुप ग्रहण करता है तो उसमें गुणात्मक वृद्धि होती है| चैती गीत इसका एक ग्राह्य उदाहरण है| चैती के लोक और उप-शास्त्रीय स्वरुप का समग्र अनुभव करने के लिए आप उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई वादन की यह प्रस्तुति सुनें।

उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ - चैती धुन


और अब अन्त में चर्चा- 'फिल्म संगीत में चैती' की| हिन्दी फ़िल्मों की जहाँ बात आती है, इनमें चैती गीतों का बहुत ज़्यादा प्रयोग नहीं हुआ है। केवल कुछ ही फ़िल्में ऐसी हैं जिनमें चैती का उल्लेखनीय प्रयोग किया गया हो।| वर्ष १९६३ में बनी फिल्म 'गोदान' में पंडित रविशंकर के संगीत निर्देशन में मुकेश ने चैती- 'हिया जरत रहत दिन रैन हो रामा' गाया था| यह लोक शैली में गाया चैती गीत है| ठुमरी अंग में आशा भोसले ने फिल्म 'नमकीन' में चैती गाया है जिसके बोल हैं- 'बड़ी देर से मेघा बरसा हो रामा, जली कितनी रतियाँ' | जैसा कि हमने पिछ्ली कड़ी में आपको बताया था कि चैती गीत मुख्यतः राग बिलावल अथवा राग यमनी बिलावल पर आधारित होते हैं परन्तु इस गीत में आपको राग तिलक कामोद का आनंद भी मिलेगा| लीजिए प्रस्तुत हैं ये दोनों फ़िल्मी चैती गीत।

हिया जरत रहत दिन रैन, हो रामा - मुकेश(फ़िल्म - गोदान)


बड़ी देर से मेघा बरसा, हो रामा - आशा भोसले(फ़िल्म - नमकीन)


और अब बारी इस कड़ी की पहेली का जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से ज़्यादा अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

सुनिए और पहचानिए कि यह किस सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक की आवाज़ है?



पिछ्ली पहेली का परिणाम: अमित जी ने पुन: सही उत्तर देकर ५ अंक प्राप्त कर लिये हैं, बधाई! क्या कोई और इन्हें चुनौति देना चाहेगा?

तो यह थी प्रसिद्ध लोक व शास्त्रीय शैली - चैती पर आधारित हमारी अंतिम कड़ी। आशा है आपको पसन्द आई। आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। हम एक बार पुनः आभार व्यक्त करेंगे लखनऊ के श्री कृष्‍णमोहन मिश्र का जिन्होंने इस कला के बारे में अपने असीम ज्ञान को हमसे बाँटा तथा इस प्रस्तुति में हमारा सहयोग दिया। आगामी रविवार की सुबह हम पुनः उपस्थित होंगे एक नई रोचक कड़ी लेकर, तब तक के लिए अपने साथी सुमित चक्रवर्ती को आज्ञा दीजिए| शाम ६:३० बजे अपने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के साथी सुजॉय चटर्जी के साथ पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

खोज व आलेख - कृष्‍णमोहन मिश्र
प्रस्तुति- सुमित चक्रवर्ती



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, April 3, 2011

कैसे सजन घर जईबे हो रामा....पारंपरिक चैत गीतों की मधुरता

सुर संगम - 14 - चैत्र मास की चैती
जब महिला या पुरुष इसे एकल रूप में गाते हैं तो इसे 'चैती' कहा जाता है परन्तु जब समूह या दल बना कर गाया जाता है तो इसे 'चैता' कहा जाता है| इस गायकी का एक और प्रकार है जिसे 'घाटो' कहते हैं | 'घाटो' की धुन 'चैती' से थोड़ी बदल जाती है| इसकी उठान बहुत ऊँची होती है और केवल पुरुष वर्ग ही इसे समूह में गाते हैं| कभी-कभी दो दलों में बँट कर सवाल-जवाब या प्रतियोगिता के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता है, इसे 'चैता दंगल' कहा जाता है।


सुर-संगम के इस साप्ताहिक स्तंभ मे सभी श्रोता-पाठकों का स्वागत है। परंपरागत भारतीय संगीत शैलियों को आज़ादी के बाद सुप्रसिद्ध संगीतविद व सांस्कृतज्ञ ठाकुर जयदेव सिंह ने 'आकाशवाणी' के लिए चार वर्गों- शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम और लोक संगीत में वर्गीकृत किया था| इन शैलियो के अलग-अलग रंग हैं और इन्हें पसंद करने वालों के अलग-अलग वर्ग भी हैं| लोक संगीत, वह चाहे किसी भी क्षेत्र का हो, उसमें ऋतुओं के अनुकूल गीतों का समृद्ध खज़ाना होता है| लोक संगीत की एक ऐसी ही शैली है- 'चैती'| उत्तर भारत के पूरे अवधी-भोजपुरी क्षेत्र तथा बिहार के भोजपुरी-मिथिला क्षेत्र की सर्वाधिक लोकप्रिय शैली 'चैती' है| हिन्दू कैलेण्डर के चैत्र मास में गाँव के चौपाल में महफिल सजती है और एक विशेष परंपरागत धुन में श्रृंगार और भक्ति रस में रचे 'चैती' गीतों का देर रात तक गायन किया जाता है।| जब महिला या पुरुष इसे एकल रूप में गाते हैं तो इसे 'चैती' कहा जाता है परन्तु जब समूह या दल बना कर गाया जाता है तो इसे 'चैता' कहा जाता है| इस गायकी का एक और प्रकार है जिसे 'घाटो' कहते हैं | 'घाटो' की धुन 'चैती' से थोड़ी बदल जाती है| इसकी उठान बहुत ऊँची होती है और केवल पुरुष वर्ग ही इसे समूह में गाते हैं| कभी-कभी दो दलों में बँट कर सवाल-जवाब या प्रतियोगिता के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता है, इसे 'चैता दंगल' कहा जाता है।

'चैती' गीतों का विषय मुख्यतः भक्ति और श्रृंगार रस होते हैं। भारतीय पञ्चांग के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा(पहली तिथि) से नया वर्ष शुरू होता है| नई फसल के घर आने का भी यही समय होता है जिसका उल्लास 'चैती' में प्रकट होता है| चैत्र नवरात्र प्रतिपदा के दिन से शुरू होता है और नवमी के दिन राम-जन्मोत्सव का पर्व मनाया जाता है| 'चैती' में राम-जन्म का प्रसंग लौकिक रूप में प्रस्तुत किया जाता है| इसके अलावा अपने भर्ता के लिए नायिका की विरह-व्यथा का चित्रण भी इन गीतों में होता है| कुछ चैती गीतों का साहित्य पक्ष इतना सबल होता है कि श्रोता संगीत और साहित्य के सम्मोहन में बँध कर रह जाता है| पटना की लोक संगीत विदुषी विंध्यवासिनी देवी की एक चैती में अलंकारों का प्रयोग देखें - 'चाँदनी चितवा चुरावे हो रामा, चईत के रतिया ....' इस गीत की अगली पंक्ति का श्रृंगार पक्ष तो अनूठा है - 'मधु ऋतु मधुर-मधुर रस घोले, मधुर पवन अलसावे हो रामा...'| चैती गीत गायन के मोहक परिवेश और इसकी आकर्षक धुन के कारण कबीर दास ने अपने कुछ निर्गुण भी चैती के स्वरों में पिरो दिए| कबीर की एक ऐसी ही निर्गुण चैती हम आपको सुनवा रहे हैं, वाराणसी के सुप्रसिद्ध शास्त्रीय-उप शास्त्रीय गायक पण्डित छन्नूलाल मिश्र के स्वर में| उन्होंने इस चैती को ठुमरी अंग में गाया है| पहले आप ठुमरी अंग में यह चैती सुनिए, उसके बाद हम चैती के शास्त्रीय पक्ष पर चर्चा करेंगे|

कैसे सजन घर जईबे हो रामा - पं० छन्नूलाल मिश्र


चैती की एक और विशेषता भी उल्लेखनीय है| यदि चैती गीत में प्रयोग किये गए स्वरों और राग 'यमनी बिलावल' के स्वरों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो आपको अद्भुत समानता मिलेगी| अनेक प्राचीन चैती में बिलावल के स्वर मिलते हैं किन्तु आजकल अधिकतर चैती में तीव्र माध्यम का प्रयोग होने से राग यमनी बिलावल का अनुभव होता है| यह उदाहरण भरतमुनि के इस कथन की पुष्टि करता है कि लोक कलाओं की बुनियाद पर ही शास्त्रीय कलाओं का भव्य महल खड़ा है| आइए सुप्रसिद्ध गायिका निर्मला देवी के स्वरों में सुनते हैं ठुमरी अंग में एक श्रृंगार प्रधान चैती| इसमें चैती का लोक स्वरुप, राग 'यमनी बिलावल' के मादक स्वर, दीपचन्दी और कहरवा ताल का जादू तथा निर्मला देवी की भावपूर्ण आवाज़ आपको परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ होंगे| हमनें आपसे पिछली कड़ी की पहेली में इसी ठुमरी का टुकड़ा सुनाया था और पूछा था गायिका के बारे में जो आज के दौर के एक सुप्रसिद्ध अभिनेता की माँ थीं। तो आप अब समझ ही गए होंगे कि हम बात कर रहे हैं निर्मला देवी की ही जो प्रसिद्ध बॉलीवुड अभिनेता 'गोविंदा' की माँ थीं। हम चैती के शास्त्रीय पक्ष पर चर्चा जारी रखेंगे सुर-संगम की आगामी कड़ी में|

येहि थईयाँ मोतिया हिराए गैली रामा - निर्मला देवी


और अब बारी इस कड़ी की पहेली का जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से ज़्यादा अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

सुनिए चैती के इस टुकड़े को जो एक हिन्दी फ़िल्म से लिया गया है। आपको पहचानना है कि यह चैती किस राग पर आधारित है?


पिछ्ली पहेली का परिणाम: अमित जी ने दोनों प्रश्नों के सही उत्तर दिये और पा गये हैं १० अंक। साथ ही अवध जी को हम ५ बोनस अंक देंगे क्योंकि उन्होंने यह भी बताया कि गायिका किस प्रसिद्ध अभिनेता की माँ थीं। बधाई!

यह थी प्रसिद्ध लोक शैली - चैती पर आधारित हमारी पहली कड़ी। आशा है आपको यह कड़ी पसन्द आई। चैती के बारे में अभी और भी रोचक बातें बाकी हैं जिन्हें हम आपसे बाँटेंगे अगले रविवार को। साथ ही हम आभार व्यक्त करेंगे लखनऊ के श्री कृष्‍णमोहन मिश्र का इस प्रस्तुति में योगदान के लिए। आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। आगामी रविवार की सुबह हम पुनः उपस्थित होंगे एक नई रोचक कड़ी लेकर, तब तक के लिए अपने साथी सुमित चक्रवर्ती को आज्ञा दीजिए| शाम ६:३० बजे अपने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के साथी सुजॉय चटर्जी के साथ पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

खोज व आलेख - कृष्‍णमोहन मिश्र
प्रस्तुति- सुमित चक्रवर्ती



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

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