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Sunday, March 5, 2017

मध्यरात्रि बाद के राग : SWARGOSHTHI – 307 : RAGAS AFTER MIDNIGHT





स्वरगोष्ठी – 307 में आज

राग और गाने-बजाने का समय – 7 : रात के तीसरे प्रहर के राग

राग मालकौंस - “नन्द के छैला ढीठ लंगरवा...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला – “राग और गाने-बजाने का समय” की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीतानुरागियों का स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि उत्तर भारतीय संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं अथवा प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों के प्रयोग का एक निर्धारित समय होता है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर को दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर को रात्रि के प्रहर कहे जाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में आज हम आपसे सातवें प्रहर अर्थात रात्रि के तीसरे प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के प्रमुख राग मालकौंस की मध्यलय की एक खयाल रचना सुविख्यात गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही 1955 में प्रदर्शित फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ से इसी प्रहर के राग अड़ाना पर आधारित एक गीत उस्ताद अमीर खाँ के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं।



भारतीय संगीत के रागों का समय निर्धारण करने के लिए शास्त्रकारों ने कुछ नियम बनाए हैं। श्रृंखला की पिछली कड़ियों में हमने कुछ नियमों का उल्लेख किया था। आज हम आपसे ऋषभ और गान्धार स्वरों के आधार पर रागों के समय निर्धारण की प्रक्रिया पर बात करेंगे और सातवें प्रहर अर्थात रात के तीसरे प्रहर के कुछ रागों की रचनाएँ भी सुनवाएँगे। ऋषभ और गान्धार स्वरों वाले रागों के तीन वर्ग होते हैं। प्रथम वर्ग के रागों में कोमल ऋषभ और शुद्ध गान्धार स्वर उपस्थित होते हैं। इस वर्ग के रागों का गायन-वादन दिन और रात के अन्तिम प्रहर में किया जाता है। इस वर्ग के राग भैरव, पूर्वी और मारवा थाट के अन्तर्गत आते हैं। दूसरे वर्ग के रागों में शुद्ध ऋषभ और शुद्ध गान्धार स्वर होते हैं। इस वर्ग के रागों के गायन-वादन प्रथम प्रहर में किया जाता है। बिलावल, खमाज और कल्याण थाट के राग इसी श्रेणी में आते हैं। तीसरा वर्ग कोमल गान्धार स्वर का होता है। इस वर्ग के राग दूसरे, तीसरे और चौथे प्रहर में गाये-बजाए जाते हैं। तीसरे वर्ग में काफी, आसावरी, भैरवी तोड़ी थाट के सभी राग आते हैं। इस कड़ी में हम रात्रि के तीसरे प्रहर के रागों पर चर्चा कर रहे हैं। तीसरे प्रहर के दो प्रमुख राग, मालकौंस और अड़ाना में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल होते हैं। भैरवी थाट का एक प्रमुख राग मालकौस है। राग मालकौंस औडव-औडव जाति का राग है, अर्थात आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग किया जाता है। राग मालकौंस में ऋषभ और पंचम स्वरों का प्रयोग नहीं होता। गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाते हैं। राग के आरोह में नि(कोमल) सा (कोमल) म (कोमल) नि(कोमल) सां और अवरोह में सां नि(कोमल) (कोमल) म (कोमल) म (कोमल) सा स्वर लगते हैं। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस राग का चलन तीनों सप्तकों में समान रूप किया जाता है। गम्भीर और शान्त प्रकृति का राग होने के कारण यह मींड़ प्रधान होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में इस राग का सौन्दर्य खूब निखर उठता है।

विदुषी अश्विनी  भिड़े  देशपांडे 
अब हम आपको राग मालकौंस के मध्यलय में खयाल की एक मोहक रचना का रसास्वादन कराते हैं। इसे प्रस्तुत कर रही है, सुप्रसिद्ध गायिका डॉ. अश्विनी भिड़े देशपाण्डे। डॉ. अश्विनी भिड़े जयपुर अतरौली खयाल गायकी परम्परा की एक सर्वप्रिय गायिका हैं। मुख्यतः खयाल गायिका के रूप में विख्यात अश्विनी जी ठुमरी, दादरा, भजन और अभंग गायन में भी समान रूप से दक्ष हैं। उनकी प्रारम्भिक संगीत शिक्षा गन्धर्व महाविद्यालय से और पारम्परिक संगीत की शिक्षा पण्डित नारायण राव दातार से पलुस्कर परम्परा में हुई। बाद में उन्हें अपनी माँ श्रीमती माणिक भिड़े और गुरु पण्डित रत्नाकर पै से जयपुर अतरौली परम्परा में मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। अश्विनी जी ने भारतीय संगीत के व्यावहारिक पक्ष के साथ-साथ सैद्धान्तिक पक्ष को भी आत्मसात किया है। एक कुशल गायिका होने के साथ ही उन्होने ‘रागरचनांजलि’ नामक पुस्तक की रचना भी की है। इस पुस्तक के पहले भाग का प्रकाशन वर्ष 2004 में और दूसरे भाग का प्रकाशन वर्ष 2010 में किया गया था। वर्तमान में अश्विनी जी संगीत के मंचों पर जितनी लोकप्रिय हैं उतनी ही निष्ठा से नई पीढ़ी को पारम्परिक संगीत की दीक्षा भी दे रही हैं। आज की कड़ी में हम उनकी आवाज़ में राग मालकौंस का एक मध्यलय खयाल प्रस्तुत कर रहे हैं। यह तीनताल की मोहक रचना है।

राग मालकौंस : “नन्द के छैला ढीठ लंगरवा...” : डॉ. अश्विनी भिड़े देशपाण्डे


रात्रि के तीसरे प्रहर के कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- आनन्द भैरवी, शहाना, धवलश्री, मधुकंस, मंजरी, यशरंजनी, नागनंदिनी, नवरसकान्हड़ा, नायकी, बागेश्रीकान्हड़ा, मियाँकान्हड़ा, नन्दकौंस, अड़ाना आदि। अब हम आपको राग अड़ाना में पिरोया एक फिल्मी गीत सुनवाएँगे। राग अड़ाना, आसावरी थाट का राग है। यह षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग होता है, जिसमें कोमल गान्धार और कोमल धैवत तथा दोनों निषाद का प्रयोग होता है। आरोह में शुद्ध गान्धार और अवरोह में शुद्ध धैवत का प्रयोग वर्जित होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में गाने-बजाने वाले राग अड़ाना का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है।

उस्ताद अमीर  खाँ 
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्मों की गणना ‘मील के पत्थर’ के रूप में की जाती है। ऐसी ही एक उल्लेखनीय फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ थी जिसका प्रदर्शन 1955 में हुआ था। इस फिल्म में कथक नृत्य शैली का और राग आधारित गीत-संगीत का कलात्मक उपयोग किया गया था। फिल्म का निर्देशन वी. शान्ताराम ने और संगीत निर्देशन वसन्त देसाई ने किया था। वी. शान्ताराम के फिल्मों की सदैव यह विशेषता रही है कि उसके विषय नैतिक मूल्यों रक्षा करते प्रतीत होते है। साथ ही उनकी फिल्मों में रूढ़ियों का विरोध भी नज़र आता है। फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ में उन्होने भारतीय शास्त्रीय नृत्य और संगीत की महत्ता को रेखांकित किया था। फिल्म को इस लक्ष्य तक ले जाने में संगीतकार वसन्त देसाई का उल्लेखनीय योगदान रहा। जाने-माने कथक नर्तक गोपीकृष्ण फिल्म की प्रमुख भूमिका में थे। इसके अलावा संगीत के ताल पक्ष को निखारने के लिए सुप्रसिद्ध तबलावादक गुदई महाराज (पण्डित सामता प्रसाद) का उल्लेखनीय योगदान था। वसन्त देसाई ने सारंगीनवाज़ पण्डित रामनारायन और सन्तूरवादक पण्डित शिवकुमार शर्मा का सहयोग भी प्राप्त किया था। संगीतकार वसन्त देसाई की सफलता का दौर फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ से ही आरम्भ हुआ था। वसन्त देसाई की प्रतिभा का सही मूल्यांकन वी. शान्ताराम ने ही किया था। प्रभात कम्पनी में एक साधारण कर्मचारी के रूप में उनकी नियुक्ति हुई थी। यहीं रह कर उन्होने अपनी कलात्मक प्रतिभा का विकास किया था। आगे चलकर वसन्त देसाई, शान्ताराम की फिल्मों के मुख्य संगीतकार बने। शान्ताराम जी ने 1955 में फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ का निर्माण किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक बसन्त देसाई ने इस फिल्म में कई राग आधारित स्तरीय गीतों की रचना की थी। फिल्म का शीर्षक गीत ‘झनक झनक पायल बाजे...’ राग अड़ाना का एक मोहक उदाहरण है। इस गीत को स्वर प्रदान किया, सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ ने। आइए, सुनते हैं, राग अड़ाना पर आधारित यह गीत। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग अड़ाना : ‘झनक झनक पायल बाजे...’ : फिल्म झनक झनक पायल बाजे : उस्ताद अमीर खाँ और साथी


संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 307वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको छठे दशक की फिल्म के राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 310वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के प्रथम सत्र की पहेली-श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – गीतांश में गायक और गायिका के स्वरों को पहचानिए और हमे उनके नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 11 मार्च, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 309वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 305 की संगीत पहेली में हमने 1955 में प्रदर्शित फिल्म ‘सीमा’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग जयजयवन्ती, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल एकताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका लता मंगेशकर। इस बार की पहेली में हमारे एक नये पाठक आशीष पँवार शामिल हुए हैं। आशीष जी का हार्दिक स्वागत है। उन्होने तीन में से दो प्रश्नों के सही उत्तर दिये है। इनके अलावा हमारी नियमित प्रतिभागी पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने भी सही उत्तर दिये हैं। सभी छः प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला “राग और गाने-बजाने का समय” का यह सातवाँ अंक था। अगले अंक में हम रात के अन्तिम प्रहर के रागों पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, December 27, 2015

नौशाद के गीतों में राग-दर्शन : SWARGOSHTHI – 250 : RAG BASED SONGS BY NAUSHAD


स्वरगोष्ठी – 250 में आज


संगीत के शिखर पर – 11 : फिल्म संगीतकार नौशाद अली


फिल्मों में रागदारी संगीत की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम साधक नौशाद अली




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरीली श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की ग्यारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की ग्यारहवीं कड़ी में हम आपको फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। आपको हम यह भी अवगत कराना चाहते हैं कि दो दिन पूर्व, अर्थात 25 दिसम्बर को नौशाद अली का 96वीं जयन्ती थी। इस उपलक्ष्य में हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक में नौशाद अली के चार महत्त्वपूर्ण दशकों की संगीत-यात्रा के कुछ चुने हुए गीतों का उल्लेख कर रहे हैं। पाँचवें से लेकर आठवें दशक के बीच नौशाद सर्वाधिक सक्रिय थे। इन चार दशकों में से प्रत्येक दशक के एक-एक गीत चुन कर हम आपके लिए प्रस्तुत करेंगे। इन गीतों में आपको क्रमशः राग बिहाग, मालकौंस, वृन्दावनी सारंग और पहाड़ी के स्वरों के दर्शन होंगे।



25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद का जन्म हुआ था। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करता था। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठते, साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घर वालों की फटकार बदस्तूर जारी रहा। अन्ततः एक दिन घर में बिना किसी को बताए मायानगरी बम्बई की ओर रुख किया।

इसके आगे का वृतान्त हम जारी रखेंगे, इस बीच थोड़ा विराम लेकर हम आपको नौशाद के फिल्मी सफर के पहले दशक का संगीतबद्ध किया एक गीत सुनवाते हैं। यह गीत हमने 1946 में प्रदर्शित फिल्म ‘शाहजहाँ’ से लिया है। फिल्म के नायक और गायक कुन्दनलाल (के.एल.) सहगल थे। कई अर्थों में यह फिल्म भारतीय फिल्म इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों से अंकित है। इस फिल्म का गीत- ‘जब दिल ही टूट गया...’ सहगल का अन्तिम गीत हुआ। इसी गीत के गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी की यह पहली फिल्म थी। इसी गीत को नौशाद ने सहगल से आग्रह कर दो बार, एक बार बिना शराब पिये और फिर दोबारा शराब पिला कर रिकार्ड कराया और उन्हें यह एहसास कराया कि बिना पिये वे बेहतर गाते हैं। बहरहाल, आइए हम आपको सहगल का गाया और नौशाद का संगीतबद्ध किया फिल्म ‘शाहजहाँ’ का वह गीत सुनवाते हैं जो राग बिहाग पर आधारित है। इस गीत में राग के स्वर और भाव स्पष्ट रूप से झलकते हैं।


राग बिहाग : फिल्म ‘शाहजहाँ’ : ‘ऐ दिल-ए-बेकरार झूम…’ : कुन्दनलाल सहगल




घर से भाग कर बम्बई (अब मुम्बई) पहुँचे नौशाद अली कुछ समय तक भटकते रहे। एक दिन न्यू पिक्चर कम्पनी में संगीत वादकों के चयन के लिए प्रकाशित विज्ञापन के आधार पर नौशाद बड़ी उम्मीद लेकर ग्रांट रोड स्थित कम्पनी के कार्यालय पहुँचे। वहाँ उस समय के जाने-माने संगीतकार उस्ताद झण्डे खाँ वादकों का इंटरव्यू ले रहे थे। नौशाद ने भी खाँ साहब को कुछ सुनाया। उन्होने बाद में आने को कह कर नौशाद को रुखसत किया। उसी इंटरव्यू में नौशाद की भेंट गुलाम मोहम्मद से हुई, जो आगे चलकर पहले उनके सहायक बने और फिर बाद में स्वतंत्र संगीतकार भी हुए। बहरहाल, उस्ताद झण्डे खाँ ने नौशाद को पियानो वादक के रूप में चालीस रुपये और गुलाम मोहम्मद को तबला व ढोलक वादक के रूप में साठ रुपये मासिक वेतन पर रख लिया। और इस तरह नौशाद का प्रवेश फिल्म संगीत के क्षेत्र में हुआ।

नौशाद की छठें दशक की फिल्मों में रागदारी संगीत का प्रभुत्व बढ़ता गया। आइए अब हम वर्ष 1952 की उस फिल्म और उसके एक गीत की चर्चा करते हैं जिसने नौशाद की राग आधारित गीतों की रचना करने की अपनी क्षमता को उजागर किया। इस वर्ष प्रदर्शित फिल्म ‘बैजू बावरा’ में नौशाद ने कई कालजयी गीतो की रचना कर अपने शास्त्रीय संगीत के प्रति अनुराग को सिद्ध किया। फिल्म के गीतों के लिए उनके पास मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर की आवाज़ का साथ तो था ही, रागों का शुद्ध रूप में प्रस्तुत करने की ललक के कारण उन्होने उस समय के प्रख्यात शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर को भी फिल्म गीत गाने के लिए राजी किया। खाँ साहब और पण्डित पलुस्कर द्वारा प्रस्तुत राग देशी के स्वरों में जुगलबन्दी वाला गीत- ‘आज गावत मन मेरो...’ तो फिल्म संगीत के इतिहास में एक अमर गीत बन चुका है। इसके अलावा उस्ताद अमीर खाँ ने अपने एकल स्वर में राग पूरिया धनाश्री में गीत- ‘तोरी जय जय करतार...’ भी गाया था। परन्तु आज हम आपको नौशाद के सर्वप्रिय पार्श्वगायक मोहम्मद रफी के स्वर में राग मालकौंस पर आधारित वह गीत सुनवाते हैं, जिसकी लोकप्रियता आज भी कायम है।


राग मालकौंस : फिल्म ‘बैजू बावरा’ : ‘मन तड़पत हरिदर्शन को आज...’ : मोहम्मद रफी




पियानो वादक के रूप में नौशाद को न्यू पिक्चर कम्पनी में एक ठिकाना तो मिल गया, परन्तु मंज़िल तो अभी कोसों दूर थी। अभी तक नौशाद मुम्बई (तब बम्बई) में रह रहे अलीम साहब के नाम लखनऊ से अपने एक मित्र का खत लेकर आए थे और उन्हीं के साथ गुजर कर रहे थे। नौकरी मिलते ही उन्होने अलीम साहब पर बोझ बने रहना उचित नहीं समझा और लखनऊ के ही एक अख्तर साहब के साथ दादर में रहने लगे। नौशाद के यह दूसरे आश्रयदाता एक दूकान में सेल्समैन थे और रात में दूकान बन्द होने के बाद दरवाजा बन्द कर अन्दर ही सोते थे। नौशाद को भी ऐसे ही रहना पड़ता था। कभी जब दूकान में गर्मी अधिक होती तो दोनों बाहर फुटपाथ पर रात गुजारते थे।

फिल्मों के प्रसंग के अनुसार नौशाद उस समय के दिग्गज शास्त्रीय गायकों को आमंत्रित कर गवाने से भी नहीं चूके। 1952 की फिल्म ‘बैजू बावरा’ में उस्ताद अमीर खाँ और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर के स्वरों में तथा 1954 की फिल्म ‘शबाब’ में दोबारा उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में ऐसा प्रयोग वे कर चुके थे। फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ के एक प्रसंग में अकबर के दरबारी गायक तानसेन के स्वर में जब एक गीत की आवश्यकता हुई तो नौशाद ने उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ को गाने के लिए बड़ी मुश्किल से राजी किया। उस्ताद का राग सोहनी में गाया वह गीत था- ‘प्रेम जोगन बनके…’। इस ठुमरीनुमा गीत के लिए के. आसिफ ने उस्ताद को पचीस हजार रुपये मानदेय के रूप में दिया था। यह गीत उन्हें इतना पसन्द आया कि के. आसिफ ने उस्ताद बड़े गुलाम अली को पचीस हजार रुपये और देकर एक और गीत ‘शुभ दिन आयो राजदुलारा...’ (राग रागेश्री) भी गवाया था। लोकधुनों और राग आधारित गीतों के अलावा गज़लों की संगीत-रचना में भी नौशाद सिद्ध थे। फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’, ‘मेरे महबूब’, ‘दिल दिया दर्द लिया’, ‘पालकी’ आदि फिल्मों में उनकी संगीतबद्ध गज़लें बेहद लोकप्रिय हुई थीं। सातवें दशक की फिल्म ‘दिल दिया दर्द लिया’ में मोहम्मद रफी का गाया- ‘कोई सागर दिल को बहलाता नहीं...’और ‘गुजरे हैं आज इश्क़ में...’ की धुनें बेहद आकर्षक थीं। परन्तु आज हम इस दशक के गीतों में से चुन कर आपको फिल्म का जो गीत सुनवा रहे हैं, वह राग वृन्दावनी सारंग पर आधारित है। मोहम्मद रफी और आशा भोसले के स्वरों में प्रस्तुत इस युगल गीत के बोल हैं- ‘सावन आए या न आए, जिया जब झूमे सावन है...’। तीनताल और कहरवा में निबद्ध इस गीत का आनन्द आप लीजिए।


राग वृन्दावनी सारंग : ‘सावन आए या न आए...’ : आशा भोसले और रफी : फिल्म दिल दिया दर्द लिया




स्वतंत्र संगीतकार के रूप में नौशाद को अवसर तो 1939-40 में ही मिल चुका था। अपने शुरुआती दौर में उन्होने उत्तर प्रदेश की लोकधुनों का प्रयोग करते हुए अनेक लोकप्रिय गीत रचे। ऐसे गीतों में प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य की छटा थी। दरअसल नौशाद के ऐसे प्रयोगों से उन दिनों प्रचलित फिल्म संगीत को एक नया मुहावरा मिला। आगे चल कर अन्य संगीतकारों ने भी प्रादेशिक और क्षेत्रीय लोक संगीत से जुड़ कर ऐसे ही प्रयोग किए। लोक संगीत के साथ ही उन्होने शास्त्रीय राग आधारित गीतों का प्रचलन भी पाँचवें दशक से आरम्भ कर दिया था। नौशाद के संगीत से सजे अगले जिस गीत की हम चर्चा करने जा रहे हैं, वह आठवें दशक की फिल्म ‘पाकीजा’ की एक ठुमरी है। इस ठुमरी, ‘कौन गली गयो श्याम...’ के फिल्मी प्रयोग पर थोड़ी चर्चा करेंगे। फिल्म और फिल्म संगीत के इतिहास में दो दशकों का प्रतिनिधित्व करने वाली फिल्म ‘पाकीज़ा’ है। 60 के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में फिल्म ‘पाकीजा’ के निर्माण की योजना बनी थी। फिल्म की निर्माण प्रक्रिया में इतना अधिक समय लग गया कि दो संगीतकारों को फिल्म का संगीत तैयार करना पड़ा। 1972 में प्रदर्शित इस फिल्म के संगीत के लिए संगीतकार गुलाम मोहम्मद ने शास्त्रीय रागों का आधार लेकर एक से एक गीतों की रचना की थी। गुलाम मोहम्मद ने इस फिल्म के अधिकतर गीत अपने जीवनकाल में ही रिकार्ड करा लिये थे। इसी दौरान वे ह्रदय रोग से पीड़ित हो गए थे। अन्ततः 17 मार्च, 1968 को उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद फिल्म का पृष्ठभूमि संगीत और तीन ठुमरियाँ- परवीन सुल्ताना, राजकुमारी और वाणी जयराम कि आवाज़ में संगीतकार नौशाद ने रिकार्ड किया। अन्ततः यह महत्वाकांक्षी फिल्म गुलाम मोहम्मद के निधन के लगभग चार वर्ष बाद प्रदर्शित हुई थी। संगीत इस फिल्म का सर्वाधिक आकर्षक पक्ष सिद्ध हुआ, किन्तु इसके सर्जक इस सफलता को देखने के लिए हमारे बीच नहीं थे। आइए, फिल्म ‘पाकीज़ा’ में नौशाद द्वारा शामिल की गई वह पारम्परिक ठुमरी सुनवाते हैं, जिसे सुप्रसिद्ध गायिका परवीन सुलताना ने राग पहाड़ी का स्वर दिया है। विदुषी परवीन सुलताना ने तीनों सप्तकों में फिरने वाले स्वरो में इस ठुमरी को एक अलग रंग दिया है। आप इस ठुमरी का रसास्वादन कीजिए और मुझे वर्ष 2015 के इस समापन अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग  पहाड़ी : फिल्म  पाकीज़ा : ‘कौन गली गयो श्याम...’ : बेगम परवीन सुलताना






संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 250वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वाद्य संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा। ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी अंक में हम वार्षिक विजेताओं द्वारा प्रस्तुत ‘स्वरगोष्ठी’ का अंक प्रकाशित करेंगे।


1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग का आभास हो रहा है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप वाद्य के वादक के नाम का अनुमान लगा सकते हैं?

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 2 जनवरी, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 252वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 248 की संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित रामनारायण द्वारा प्रस्तुत सारंगी पर राग दरबारी का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग दरबारी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल मध्यलय तीनताल और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- वाद्य – सारंगी। सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं- जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ का यह ग्यारहवाँ और समापन अंक था। इस अंक में हमने भारतीय फिल्मों के अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के व्यक्तित्व और कृतित्व पर संक्षिप्त प्रकाश डालने का प्रयत्न किया है। यह वर्ष 2015 का समापन अंक था। अगला अंक वर्ष 2016 का पहला अंक होगा। इस अंक में ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली के चौथे वार्षिक विजेता का परिचय प्राप्त करेंगे। आगामी अंकों में यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  





Sunday, October 4, 2015

मध्यरात्रि बाद के राग : SWARGOSHTHI – 238 : RAGAS OF AFTER MIDNIGHT



स्वरगोष्ठी – 238 में आज

रागों का समय प्रबन्धन – 7 : रात के तीसरे प्रहर के राग

राग मालकौंस - “नन्द के छैला ढीठ लंगरवा...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला- ‘रागों का समय प्रबन्धन’ की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीतानुरागियों का स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि उत्तर भारतीय संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं अथवा प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों के प्रयोग का एक निर्धारित समय होता है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर को दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर को रात्रि के प्रहर कहे जाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में आज हम आपसे सातवें प्रहर अर्थात रात्रि के तीसरे प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के प्रमुख राग मालकौंस की मध्यलय की एक खयाल रचना सुविख्यात गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही 1955 में प्रदर्शित फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ से इसी प्रहर के राग अड़ाना पर आधारित एक गीत उस्ताद अमीर खाँ के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं।


भारतीय संगीत के रागों का समय निर्धारण करने के लिए शास्त्रकारों ने कुछ नियम बनाए हैं। श्रृंखला की पिछली कड़ियों में हमने कुछ नियमों का उल्लेख किया था। आज हम आपसे ऋषभ और गान्धार स्वरों के आधार पर रागों के समय निर्धारण की प्रक्रिया पर बात करेंगे और सातवें प्रहर अर्थात रात के तीसरे प्रहर के कुछ रागों की रचनाएँ भी सुनवाएँगे। ऋषभ और गान्धार स्वरों वाले रागों के तीन वर्ग होते हैं। प्रथम वर्ग के रागों में कोमल ऋषभ और शुद्ध गान्धार स्वर उपस्थित होते हैं। इस वर्ग के रागों का गायन-वादन दिन और रात के अन्तिम प्रहर में किया जाता है। इस वर्ग के राग भैरव, पूर्वी और मारवा थाट के अन्तर्गत आते हैं। दूसरे वर्ग के रागों में शुद्ध ऋषभ और शुद्ध गान्धार स्वर होते हैं। इस वर्ग के रागों के गायन-वादन प्रथम प्रहर में किया जाता है। बिलावल, खमाज और कल्याण थाट के राग इसी श्रेणी में आते हैं। तीसरा वर्ग कोमल गान्धार स्वर का होता है। इस वर्ग के राग दूसरे, तीसरे और चौथे प्रहर में गाये-बजाए जाते हैं। तीसरे वर्ग में काफी, आसावरी, भैरवी तोड़ी थाट के सभी राग आते हैं। इस कड़ी में हम रात्रि के तीसरे प्रहर के रागों पर चर्चा कर रहे हैं। तीसरे प्रहर के दो प्रमुख राग, मालकौंस और अड़ाना में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल होते हैं। भैरवी थाट का एक प्रमुख राग मालकौस है। राग मालकौंस औडव-औडव जाति का राग है, अर्थात आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग किया जाता है। राग मालकौंस में ऋषभ और पंचम स्वरों का प्रयोग नहीं होता। गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाते हैं। राग के आरोह में निसा निसां और अवरोह में सांनिधसा स्वर लगते हैं। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस राग का चलन तीनों सप्तकों में समान रूप किया जाता है। गम्भीर और शान्त प्रकृति का राग होने के कारण यह मींड़ प्रधान होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में इस राग का सौन्दर्य खूब निखर उठता है। 

डॉ. अश्विनी भिड़े देशपांडे
अब हम आपको राग मालकौंस के मध्यलय में खयाल की एक मोहक रचना का रसास्वादन कराते हैं। इसे प्रस्तुत कर रही है, सुप्रसिद्ध गायिका डॉ. अश्विनी भिड़े देशपाण्डे। डॉ. अश्विनी भिड़े जयपुर अतरौली खयाल गायकी परम्परा की एक सर्वप्रिय गायिका हैं। मुख्यतः खयाल गायिका के रूप में विख्यात अश्विनी जी ठुमरी, दादरा, भजन और अभंग गायन में भी समान रूप से दक्ष हैं। उनकी प्रारम्भिक संगीत शिक्षा गन्धर्व महाविद्यालय से और पारम्परिक संगीत की शिक्षा पण्डित नारायण राव दातार से पलुस्कर परम्परा में हुई। बाद में उन्हें अपनी माँ श्रीमती माणिक भिड़े और गुरु पण्डित रत्नाकर पै से जयपुर अतरौली परम्परा में मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। अश्विनी जी ने भारतीय संगीत के व्यावहारिक पक्ष के साथ-साथ सैद्धान्तिक पक्ष को भी आत्मसात किया है। एक कुशल गायिका होने के साथ ही उन्होने ‘रागरचनांजलि’ नामक पुस्तक की रचना भी की है। इस पुस्तक के पहले भाग का प्रकाशन वर्ष 2004 में और दूसरे भाग का प्रकाशन वर्ष 2010 में किया गया था। वर्तमान में अश्विनी जी संगीत के मंचों पर जितनी लोकप्रिय हैं उतनी ही निष्ठा से नई पीढ़ी को पारम्परिक संगीत की दीक्षा भी दे रही हैं। आज की कड़ी में हम उनकी आवाज़ में राग मालकौंस का एक मध्यलय खयाल प्रस्तुत कर रहे हैं। यह तीनताल की मोहक रचना है।

राग मालकौंस : “नन्द के छैला ढीठ लंगरवा...” : डॉ. अश्विनी भिड़े देशपाण्डे




रात्रि के तीसरे प्रहर के कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- आनन्द भैरवी, शाहाना, धवलश्री, मधुकंस, मंजरी, यशरंजनी, नागनंदिनी, नवरसकान्हड़ा, नायकी, बागेश्रीकान्हड़ा, मियाँकान्हड़ा, नन्दकौंस, अड़ाना आदि। आज हम आपको राग अड़ाना में पिरोया एक फिल्मी गीत सुनवाएँगे। राग अड़ाना, आसावरी थाट का राग है। यह षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग होता है, जिसमें कोमल गान्धार और कोमल धैवत तथा दोनों निषाद का प्रयोग होता है। आरोह में शुद्ध गान्धार और अवरोह में शुद्ध धैवत का प्रयोग वर्जित होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में गाने-बजाने वाले राग अड़ाना का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है।

उस्ताद अमीर खाँ 
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्मों की गणना ‘मील के पत्थर’ के रूप में की जाती है। ऐसी ही एक उल्लेखनीय फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ थी जिसका प्रदर्शन 1955 में हुआ था। इस फिल्म में कथक नृत्य शैली का और राग आधारित गीत-संगीत का कलात्मक उपयोग किया गया था। फिल्म का निर्देशन वी. शान्ताराम ने और संगीत निर्देशन वसन्त देसाई ने किया था। वी. शान्ताराम के फिल्मों की सदैव यह विशेषता रही है कि उसके विषय नैतिक मूल्यों रक्षा करते प्रतीत होते है। साथ ही उनकी फिल्मों में रूढ़ियों का विरोध भी नज़र आता है। फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ में उन्होने भारतीय शास्त्रीय नृत्य और संगीत की महत्ता को रेखांकित किया था। फिल्म को इस लक्ष्य तक ले जाने में संगीतकार वसन्त देसाई का उल्लेखनीय योगदान रहा। जाने-माने कथक नर्तक गोपीकृष्ण फिल्म की प्रमुख भूमिका में थे। इसके अलावा संगीत के ताल पक्ष को निखारने के लिए सुप्रसिद्ध तबलावादक गुदई महाराज (पण्डित सामता प्रसाद) का उल्लेखनीय योगदान था। वसन्त देसाई ने सारंगीनवाज़ पण्डित रामनारायन और सन्तूरवादक पण्डित शिवकुमार शर्मा का सहयोग भी प्राप्त किया था। संगीतकार वसन्त देसाई की सफलता का दौर फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ से ही आरम्भ हुआ था। वसन्त देसाई की प्रतिभा सही मूल्यांकन वी. शान्ताराम ने ही किया था। प्रभात कम्पनी में एक साधारण कर्मचारी के रूप में उनकी नियुक्ति हुई थी। यहीं रह कर उन्होने अपनी कलात्मक प्रतिभा का विकास किया था। आगे चलकर वसन्त देसाई, शान्ताराम की फिल्मों के मुख्य संगीतकार बने। शान्ताराम जी ने 1955 में फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ का निर्माण किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक बसन्त देसाई ने इस फिल्म में कई राग आधारित स्तरीय गीतों की रचना की थी। फिल्म का शीर्षक गीत ‘झनक झनक पायल बाजे...’ राग अड़ाना का एक मोहक उदाहरण है। इस गीत को स्वर प्रदान किया, सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ ने। आइए, सुनते हैं, राग अड़ाना पर आधारित यह गीत। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग अड़ाना : ‘झनक झनक पायल बाजे...’ : फिल्म झनक झनक पायल बाजे : उस्ताद अमीर खाँ और साथी




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 238वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको छठे दशक की फिल्म के राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 240वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – गीतांश में गायक और गायिका के स्वरों को पहचानिए और हमे उनके नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 10 अक्टूबर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 240वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 



‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 236 की संगीत पहेली में हमने 1955 में प्रदर्शित फिल्म ‘सीमा’ के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग जयजयवन्ती, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल एकताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका लता मंगेशकर। 

इस बार की पहेली में हमारे एक नये पाठक करवार, कर्नाटक से सुधीर हेगड़े शामिल हुए हैं। सुधीर जी का हार्दिक स्वागत है। उन्होने तीनों प्रश्नों के सही उत्तर दिये है। इनके अलावा हमारी नियमित प्रतिभागी जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने भी सही उत्तर दिये हैं। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘रागों का समय प्रबन्धन’ का यह सातवाँ अंक था। अगले अंक में हम रात के अन्तिम प्रहर के रागों पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




Saturday, September 5, 2015

"बिन गुरु ज्ञान कहाँ से पाऊँ..." - शिक्षक दिवस के उपलक्ष्य पर बैजु बावरा और उनके गुरु स्वामी हरिदास का स्मरण


एक गीत सौ कहानियाँ - 65

 
शिक्षक दिवस पर गुरु का स्मरण

'मन तड़पत हरि दर्शन को आज...' 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 65-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म ’बैजु बावरा’ के सदाबहार भक्ति रचना "मन तड़पत हरि दर्शन को आज..." के बारे में जिसे मोहम्मद रफ़ी ने गाया था।

Rai Mohan as Swami Haridas
गुरु शिष्य की परम्परा सदियों से हमारे देश में चली आ रही है। गुरु द्रोण से लेकर आज के दौर में भी गुरु और शिष्य का रिश्ता बरकरार है। आज शिक्षक दिवस के उपलक्ष्य में ’एक गीत सौ कहानियाँ’ के माध्यम से याद करते हैं बैजु बावरा और उनके गुरु स्वामी हरिदास जी को। 1952 की फ़िल्म ’बैजु बावरा’ में एक दृश्य है जिसमें बैजु के गुरु हरिदास जी बीमार हैं और बिस्तर से उठ नहीं पा रहे। पर बैजु की आवाज़ में "मन तड़पत हरि दर्शन को आज" सुन कर वो इतने प्रभावित हो जाते हैं, उन पर इस भजन का ऐसा असर होता है कि वो अपने पाँव पर खड़े हो जाते हैं और चल कर अपने शिष्य को गले लगा लेते हैं। "बिन गुरु ज्ञान कहाँ से पाऊँ, दीजो दान हरि गुण गाऊँ, सब गुणी जन पे तुम्हरा राज, तड़पत हरि दर्शन को आज"। बैजु बावरा का जन्म गुजरात सलतनत के चम्पानेर में एक ग़रीब ब्राह्मण के घर हुआ था। उनका नाम बैजनाथ मिश्र था। पिता की मृत्यु के बाद उनकी माँ, जो एक कृष्ण भक्त थीं, बैजनाथ को साथ लेकर वृन्दावन चली गईं। वहीं पर बैजु की मुलाक़ात स्वामी हरिदास से हुई जिनके गुरुकुल में बैजु की शिक्षा-दीक्षा हुई। बैजु ने एक अनाथ बालक गोपाल को गोद लिया और उसे संगीत में पारंगत बनाया। समय के साथ-साथ बैजु और गोपाल की प्रसिद्धि बढ़ी और चन्देरी के राज दरबार में दोनों को गाने का अवसर मिला। गोपाल ने अपनी शिष्या प्रभा से विवाह कर एक पुत्री मीरा को जन्म दिया। एक दिन जब बैजु कहीं गए हुए थे, गोपाल अपनी पत्नी और पुत्री के साथ चन्देरी को हमेशा के लिए छोड़ कर कुछ कश्मीरी व्यवसायी लोगों के दिए लालच में पड़ कर कश्मीर चले गए। जब बैजु ने वापस आकर देखा कि उसका परिवार बिखर गया है, वह एक भिखारी बन गया और पागलों की तरह यहाँ-वहाँ भटकने लगा। और तभी उनके नाम के आगे "बावरा" लग गया। तानसेन, जो स्वामी हरिदास के ही शिष्य थे, उन्होंने अपने गुरु से बैजु के बारे में सुन रखा था। उनसे मिलने की चाह तानसेन के मन में जागी और उन्होंने अपने रीवा के संरक्षक राजा रामचन्द्र बघेला से एक संगीत प्रतियोगिता आयोजित करने का अनुरोध किया क्योंकि उन्हें यकीन था कि बैजु ज़रूर इसमें भाग लेने आएगा। बैजु आया और ऐसा राग मृगरंजिनि गाया कि हिरण सम्मोहित हो गए। राग मालकौंस गाकर बैजु बावरा ने एक पत्थर को भी पिघला दिया था। और फ़िल्म ’बैजु बावरा’ का प्रस्तुत भजन भी राग मालकौंस पर ही आधारित है। यह भजन फ़िल्मी भजनों में एक बहुत ऊँचा स्थान रखता है। फ़िल्म-संगीत में इतना दिव्य और अलौकिक काम बहुत कम देखने को मिलता है। और सबसे महत्वपूर्ण जो बात है इस भजन में वह यह कि इस शुद्ध हिन्दी/संस्कृत आधारित भजन के रचयिता तीन मुसलमान कलाकार हैं - शक़ील बदायूंनी, नौशाद अली और मोहम्मद रफ़ी। साम्प्रदायिक सदभाव का इससे बेहतर उदाहरण और कोई नहीं हो सकता! ’बैजु बावरा’ फ़िल्म में बैजु, तानसेन और स्वामी हरिदास की भूमिकाओं में थे क्रम से भारत भूषण, सुरेन्द्रनाथ और राय मोहन।

Vijay Bhatt
’बैजु बावरा’ विजय भट्ट और शंकर भट्ट के ’प्रकाश पिक्चर्स’ की फ़िल्म थी। नौशाद को उनका पहला बड़ा ब्रेक इसी बैनर ने दिया था साल 1940 में। उन दिनों डी. एन. मधोक फ़िल्म ’माला’ की कहानी और संवाद लिख रहे थे, और उन्होंने ही यह सुझाव दिया कि इस फ़िल्म के संगीत के लिए एक युवा संगीतकार की आवश्यक्ता है। भट्ट भाइयों ने नौशाद की पहली फ़िल्म ’प्रेम नगर’ की कुछ धुनों को सुन रखा था। मधोक के कहने पर नौशाद को 250 रुपये महीने पर रख लिया गया। विविध भारती के ’उजाले उनकी यादों के’ शृंखला में ’नौशाद-नामा’ शीर्षक से प्रस्तुत कार्यक्रम में नौशाद साहब ने ’बैजु बावरा’ के निर्माण से जुड़ी बहुत सी बातें बताई थी, उसी बातचीत से सम्पादित अंश प्रस्तुत है। "विजय भट्ट और शंकर भट्ट भाई थे, बहुत पढ़े-लिखे थे। ’स्टेशन मास्टर’ के बाद मैं ’कारदार प्रोडक्श्न्स’ में आ गया। एक दिन दोनो भाई मेरे पास आकर कहने लगे कि ’प्रकाश पिक्चर्स’ कंपनी को बन्द करने की नौबत आ गई है। मैंने पूछा कि क्या मैं कोई मदद कर सकता हूँ? वो बोले कि आप आइए, दिलीप कुमार और नरगिस को ले आइए, ताकि ’प्रकाश पिक्चर्स’ का कर्ज़ अदा हो जाए। मैंने उनसे हर सम्भव मदद करने का वादा किया और पूछा कि क्या उनके पास कोई कहानी है? फिर अगले छह महीने तक हमने ’बैजु बावरा’ की कहानी पर काम किया। पैसे और पेमेण्ट की कोई बात नहीं हुई, हम बस कहानी को डेवेलप करते चले गए। फिर मैंने एक सुझाव दिया विजु भाई को कि चैरेक्टर चलता है ऐक्टर नहीं चलता। विजु भाई ने पूछा कि क्या मतलब है इसका? मैंने समझाया कि अगर आप दिलीप कुमार या राज कपूर को बैजु बावरा के रोल के लिए लेंगे तो दर्शक उसे दिलीप कुमार या राज कपूर के रूप में ही पहचानेगी, कोई नहीं कहेगा कि बैजु आया है। ऐसे लड़के को लीजिए जो बैजु लगे और ऐसी किसी लड़की को लीजिए जो गौरी लगे।"

Naushad, Rafi & Shaqeel
नौशाद साहब ने आगे बताया कि मीना कुमारी के वालिद अली बक्श अपनी बेटियों के साथ दादर में रहते थे नौशाद के घर के आसपास ही। उन दिनों मीना वाडिया की एक जादू-टोने की पिक्चर में काम कर रही थी। मैंने अली बक्श से कहा कि मीना को मेरे साथ प्रकाश पिक्चर्स भेज दे ताकि उसे अच्छी फ़िल्म में काम करने का मौका मिल सके। और आख़िरकार भारत भूषण और मीना कुमारी बैजु और गौरी के रोल के लिए सीलेक्ट किए गए। वो अपना काम करते थे और मैं अपना। गाना रेकॉर्ड करके साउन्डट्रैक भेज देते थे पिक्चराइज़ करने के लिए। इस तरह से ’बैजु बावरा’ बनी। जब शंकर भाई ने यह सुना कि फ़िल्म के गीतों में शास्त्रीय संगीत और रागों का भरमार है तो उन्हें इस बात से थोड़ा ऐतराज़ हुआ। उन्होंने कहा कि लोगों के सर में दर्द हो जाएगा और वो भाग जाएँगे थिएटरों से। पर मैं अपने बात पे कायम था। मुझे पब्लिक का टेस्ट बदलना था। पब्लिक को क्यों हमेशा वही चीज़ें दी जाए जो उन्हें हर वक़्त पसन्द आते हैं? हमने पब्लिक को उन्हीं की संस्कृति के संगीत से रु-ब-रु करवाया, और हम कामयाब भी हुए। विजय भट्ट को इस फ़िल्म के लिए काफ़ी तारीफ़ें मिली और मुझे भी अपने हिस्से का इनाम मिला। फ़िल्म की सिल्वर जुबिली हुई, पर आज तक मेरा इस फ़िल्म के लिए कोई ऐग्रीमेण्ट नहीं बना। मुझे अब तक याद है वह जुमला जो विजय भट्ट ने मुझसे कहा था कि प्रकाश में ताला लगाना है। मैंने उनसे कहा था कि अगर वो मुझे इस फ़िल्म के लिए पैसे नहीं भी देगा तो भी मुझे कोई ऐतराज़ नहीं है।" और अब आप यही गीत सुनिए - 

'मन तड़पत हरिदर्शन को आज...' : फिल्म - बैजू बावरा : मुहम्मद रफी : नौशाद : शकील बदायूनी 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Sunday, June 14, 2015

भैरवी थाट के राग : SWARGOSHTHI – 223 : BHAIRAVI THAAT



स्वरगोष्ठी – 223 में आज
 

दस थाट, दस राग और दस गीत – 10 : भैरवी थाट
 
राग भैरवी में ‘फुलवन गेंद से मैका न मारो...’ 
और 
मालकौंस में ‘आए सुर के पंछी आए...’


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी नई लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ की दसवीं और समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस लघु श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के रागों का वर्गीकरण करने में समर्थ मेल अथवा थाट व्यवस्था पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग किया जाता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 में से कम से कम पाँच स्वरों की उपस्थिति आवश्यक होती है। भारतीय संगीत में ‘थाट’, रागों के वर्गीकरण करने की एक व्यवस्था है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार सात मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते है। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल का प्रचलन है, जबकि उत्तर भारतीय संगीत में दस थाट का प्रयोग किया जाता है। इन दस थाट का प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं दस थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को वर्गीकृत किया जाता है। श्रृंखला के आज के अंक में हम आपसे भैरवी थाट पर चर्चा करेंगे और इस थाट के आश्रय राग भैरवी में निबद्ध पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में दो खयाल रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। साथ ही भैरवी थाट के अन्तर्गत वर्गीकृत राग मालकौंस के स्वरों में निबद्ध एक फिल्मी गीत का उदाहरण पण्डित राजन मिश्र की आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे। 




श्रृंखला की पिछली नौ कड़ियों में हमने संगीत के नौ थाटों और उनके आश्रय रागों का परिचय प्राप्त किया। आज हम ‘भैरवी’ थाट और राग के बारे में चर्चा करेंगे। परन्तु इससे पहले आइए, थाट और राग के अन्तर को समझने का प्रयास किया जाए। दरअसल थाट केवल ढाँचा है और राग एक व्यक्तित्व है। थाट-निर्माण के लिए सप्तक के 12 स्वरों में से कोई सात स्वर क्रमानुसार प्रयोग किया जाता है, जब कि राग में पाँच से सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। साथ ही राग की रचना के लिए आरोह, अवरोह, प्रबल, अबल आदि स्वर-नियमों का पालन किया जाता है। आज का थाट है- ‘भैरवी’, जिसमें सा, रे॒, ग॒, म, प, ध॒, नि॒ स्वरों का प्रयोग होता है, अर्थात ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल और मध्यम स्वर शुद्ध। ‘भैरवी’ थाट का आश्रय राग भैरवी नाम से ही पहचाना जाता है। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यूँ तो इसके गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला में है, इसके साथ ही परम्परागत रूप से राग ‘भैरवी’ का गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। राग ‘भैरवी’ को ‘सदा सुहागिन राग’ भी कहा जाता है। इस राग में ठुमरी, दादरा, सुगम संगीत और फिल्म संगीत में राग भैरवी का सर्वाधिक प्रयोग मिलता है। परन्तु आज आपको सुनवाने के लिए हमने राग भैरवी में निबद्ध दो खयाल का चुनाव किया है। इन खयाल के स्वर पण्डित भीमसेन जोशी के हैं।  

राग भैरवी : विलम्बित ‘फुलवन गेंद से...’ और द्रुत खयाल- ‘हमसे पिया...’ : पं. भीमसेन जोशी




भैरवी थाट के अन्य कुछ प्रमुख राग हैं- भैरवी, मालकौस, धनाश्री, विलासखानी तोड़ी, भूपाल तोड़ी, सेनावती, हेमवर्द्धिनी आदि। राग मालकौंस, भैरवी थाट का प्रमुख राग होता है। यह औडव-औडव जाति का राग है, अर्थात आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग किया जाता है। राग मालकौंस में ऋषभ और पंचम स्वरों का प्रयोग नहीं होता। गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाते हैं। राग के आरोह में निसा निसां और अवरोह में सांनिधसा स्वर लगते हैं। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। रात्रि के तीसरे प्रहर में इस राग का सौन्दर्य खूब निखर उठता है। अब हम आपको 1985 में प्रदर्शित संगीत-प्रधान फिल्म ‘सुर संगम’ से एक गीत सुनवाते हैं। यह गीत राग मालकौंस के स्वरों में पिरोया गया है। इस गीत का पार्श्वगायन पण्डित राजन मिश्र ने किया है, जबकि परदे पर समर्थ अभिनेता गिरीश कर्नाड ने अभिनीत किया है। फिल्म में उन्होने सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पण्डित शिवशंकर शास्त्री का चरित्र निभाया है। फिल्म ‘सुर संगम’ का कथानक संजीव सोनार का लिखा हुआ था और इसके गीतकार वसन्त देव हैं। संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने फिल्म के लगभग सभी गीत रागों के आधार पर ही तैयार किए थे। इन्हीं गीतों में से राग मालकौंस पर आधारित गीत अब हम आपको सुनवाते हैं। आप यह गीत सुनिए और हमें इस अंक से और श्रृंखला से यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग मालकौंस : ‘आए सुर के पंछी आए...’ : पं. राजन मिश्र : फिल्म सुर संगम






संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 223वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक खयाल का अंश विद्वान गायक की आवाज में सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 230 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – गीत के इस अंश को सुन कर किस राग का आभास हो रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गायक की आवाज़ को पहचान सकते हैं? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 20 जून, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 225वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 221वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘शबाब’ से चुन कर एक गीत का अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मुलतानी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- कवयित्रि भक्त मीराबाई। इस बार की पहेली में सही उत्तर देने वाले संगीत-प्रेमी हैं- वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात   


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी लघु श्रृंखला ‘दस थाट, दस राग और दस गीत’ का यह समापन अंक था। अगले अंक से हमारी नई श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के रागों’ पर केन्द्रित रहेगी। इस श्रृंखला के लिए आप अपने पसंद के गीत, संगीत और राग की फरमाइश कर सकते हैं। अगले अंक में हम मल्हार अंग के एक प्रकार के साथ उपस्थित होंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों के अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फर्माइशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


Wednesday, February 12, 2014

'काली घोड़ी द्वारे कड़ी...' : एक रोचक रागमाला गीत









प्लेबैक इण्डिया ब्रोडकास्ट



रागो के रंग, रागमाला गीत के संग – 5



 राग काफी, मालकौंस और भैरवी के माध्यम से क्रमशः विकसित होते प्रेम की अनुभूति कराता रागमाला गीत

‘काली घोड़ी द्वारे खड़ी...’ से लेकर ‘काली घोड़ी दौड़ पड़ी...’ तक

फिल्म : चश्मेबद्दूर (1981)
गायक : येशुदास और हेमन्ती शुक्ला
गीतकार : इन्दु जैन
संगीतकार : राजकमल


आलेख : कृष्णमोहन मिश्र

स्वर एवं प्रस्तुति : संज्ञा टण्डन



आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी? अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव से हमें radioplaybackindia@live.com पर अवश्य अवगत कराएँ। 

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