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रविवार, 10 नवंबर 2013

‘भयभंजना वन्दना सुन हमारी...’ : राग मियाँ की मल्हार में भक्तिरस


  
स्वरगोष्ठी – 143 में आज


रागों में भक्तिरस – 11


मन्ना डे को भावांजलि अर्पित है उन्हीं के गाये गीत से 


रेडियो प्लेबैक इण्डिया के साप्ताहिक स्तम्भ स्वरगोष्ठी के मंच पर जारी लघु श्रृंखला रागों में भक्तिरस की ग्यारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीतानुरागियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, जारी श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस राग पर आधारित फिल्म संगीत के उदाहरण भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम आपसे ऋतु प्रधान राग मियाँ की मल्हार में उपस्थित भक्तिरस पर चर्चा करेंगे। आपके समक्ष इस राग के भक्तिरस-पक्ष को स्पष्ट करने के लिए हम तीन भक्तिरस से पगी रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। सबसे पहले हम 1956 में प्रदर्शित फिल्म बसन्त बहार का राग मियाँ की मल्हार पर आधारित एक वन्दना गीत सुर-गन्धर्व मन्ना डे की आवाज़ में प्रस्तुत कर उनकी स्मृतियों को भावांजली अर्पित करेंगे। आपको स्मरण ही होगा की बीते 24 अक्तूबर को बैंगलुरु में उनका निधन हो गया था। इसके बाद पण्डित विश्वमोहन भट्ट का मोहन वीणा पर बजाया राग मियाँ की मल्हार सुनेगे। अन्त में इसी राग के स्वरों में पिरोया एक मोहक भजन भी सुनेगे। 
  


फिल्म-संगीत-जगत में समय-समय पर कुछ ऐसे गीतों की रचना हुई है, जो आज हमारे लिए अनमोल धरोहर बन गए हैं। 1956 में प्रदर्शित फिल्म 'बसन्त बहार' में ऐसे ही अमर गीत रचे गए थे। यूँ तो इस फिल्म के सभी गीत अपने समय में हिट हुए थे, किन्तु फिल्म का एक गीत- 'केतकी गुलाब जूही चम्पक वन फूलें...' और दूसरा गीत- ‘भयभंजना वन्दना सुन हमारी...’ कई कारणों से फिल्म-संगीत-इतिहास के पृष्ठों में दर्ज़ हुआ। इन दोनों गीतों में पार्श्वगायक मन्ना डे की प्रतिभा को विस्तार मिला था। पहले गीत में पहली बार किसी वरिष्ठ शास्त्रीय गायक (पण्डित भीमसेन जोशी) और फिल्मी पार्श्वगायक (मन्ना डे) ने मिल कर एक ऐसा युगल गीत गाया, जो पूरी तरह राग बसन्त बहार के स्वरों में ढाला गया था। इसी प्रकार दूसरा गीत- ‘भयभंजना वन्दना सुन हमारी...’ मन्ना डे की एकल आवाज़ में राग मियाँ की मल्हार पर आधारित था। इस फिल्म से जुड़ा एक रेखांकन योग्य तथ्य यह भी है कि फिल्म के संगीतकार शंकर-जयकिशन राग आधारित मधुर गीतों के माध्यम से अपने उन आलोचकों को करारा जवाब देने में सफल हुए, जो उनके संगीत में शास्त्रीयता की कमी का आरोप लगाया करते थे।

1949 में बनी फिल्म 'बरसात' से अपनी हलकी-फुलकी और आसानी से गुनगुनाने वाली सरल धुनों के बल पर सफलता के झण्डे गाड़ने वाले शंकर-जयकिशन को जब 1956 की फिल्म 'बसन्त बहार' का प्रस्ताव मिला तो उन्होने इस शर्त के साथ इसे तुरन्त स्वीकार कर लिया कि फिल्म के राग आधारित गीतों के गायक मन्ना डे ही होंगे। मन्ना डे की प्रतिभा से यह संगीतकार जोड़ी, विशेष रूप से शंकर, बहुत प्रभावित थे। 'बूट पालिश' के बाद शंकर-जयकिशन के साथ मन्ना डे नें अनेक यादगार गाने गाये थे। इससे पूर्व शंकर-जयकिशन के संगीत पर मन्ना डे फिल्म 'सीमा' का सर्वप्रिय भक्तिगीत- "तू प्यार का सागर है, तेरी एक बूँद के प्यासे हम...." गाकर संगीत-प्रेमियों को प्रभावित कर चुके थे। ऐसे ही कुछ गीतों को गाकर मन्ना डे नें शंकर को इतना प्रभावित कर दिया कि आगे चल कर शंकर उनके सबसे बड़े शुभचिन्तक बन गए। फिल्म के नायक भारतभूषण के भाई शशिभूषण सभी गीत मोहम्मद रफी से गवाना चाहते थे। शंकर-जयकिशन ने फिल्म 'बसन्त बहार' में मन्ना डे के स्थान पर किसी और पार्श्वगायक को लेने से मना कर दिया। फिल्म के निर्देशक राजा नवाथे मुकेश की आवाज़ को पसन्द करते थे, परन्तु वो इस विवाद में तटस्थ बने रहे। निर्माता आर. चन्द्रा भी पशोपेश में थे। मन्ना डे को हटाने का दबाव जब अधिक हो गया तब शंकर-जयकिशन को फिल्म छोड़ देने की धमकी देनी पड़ी। अन्ततः मन्ना डे के नाम पर सहमति बनी। फिल्म 'बसन्त बहार' में शंकर-जयकिशन ने 9 गीत शामिल किये थे, जिनमें से दो गीत- 'बड़ी देर भई...' और 'दुनिया न भाए मोहे...' मोहम्मद रफी के एकल स्वर में गवा कर उन्होने शशिभूषण की बात भी रख ली। इसके अलावा उन्होने मन्ना डे से चार गीत गवाए। राग मियाँ की मल्हार पर आधारित एकल गीत- 'भयभंजना वन्दना सुन हमारी...’, राग पीलू पर आधारित- 'सुर ना सजे...’, लता मंगेशकर के साथ युगल गीत- 'नैन मिले चैन कहाँ...’ और राग बसन्त बहार के स्वरों में पिरोया- 'केतकी गुलाब जूही...’ जिसे मन्ना डे के साथ पण्डित भीमसेन जोशी ने गाया था। आज के अंक में हम आपको शैलेन्द्र का लिखा, शंकर-जयकिशन का झपताल में संगीतबद्ध किया, मन्ना डे का गाया, राग मियाँ की मल्हार पर आधारित भक्तिरस से सराबोर वही गीत सुनवाते हैं।


राग मियाँ की मल्हार : ‘भयभंजना वंदना सुन हमारी...’ : मन्ना डे : फिल्म – बसन्त बहार



पं. विश्वमोहन भट्ट
राग मियाँ की मल्हार, वर्षा ऋतु की चरम अवस्था के सौन्दर्य की अनुभूति कराने पूर्ण समर्थ है। यह राग वर्तमान में वर्षा ऋतु के रागों में सर्वाधिक प्रचलित और लोकप्रिय है। सुप्रसिद्ध इसराज और मयूर वीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के अनुसार- राग मियाँ की मल्हार की सशक्त स्वरात्मक परमाणु शक्ति, बादलों के परमाणुओं को प्रभावित करने में समर्थ है वहीं दूसरी ओर कोमल निषाद के साथ मध्यम और पंचम स्वरों का योग विनय भाव की अभिव्यक्ति करने में सक्षम है। कोमल गान्धार के साथ मध्यम और ऋषभ की संगति और कान्हड़ा अंग से संचालित होने के कारण भक्तिरस की अनुपम सृष्टि होती है। राग मियाँ की मल्हार तानसेन के प्रिय रागों में से एक है। कुछ विद्वानों का मत है कि तानसेन ने कोमल गान्धार तथा शुद्ध और कोमल निषाद का प्रयोग कर इस राग का सृजन किया था। अकबर के दरबार में तानसेन को सम्मान देने के लिए उन्हें ‘मियाँ तानसेन’ नाम से सम्बोधित किया जाता था। इस राग से उनके जुड़ाव के कारण ही मल्हार के इस प्रकार को ‘मियाँ की मल्हार’ कहा जाने लगा। यह राग काफी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। आरोह और अवरोह में दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। राग मियाँ की मल्हार के स्वरों का ढाँचा कुछ इस प्रकार बनता है कि कोमल निषाद एक श्रुति ऊपर लगने लगता है। इसी प्रकार कोमल गान्धार, ऋषभ से लगभग ढाई श्रुति ऊपर की अनुभूति कराता है। इस राग में गान्धार स्वर का प्रयोग अत्यन्त सावधानी से करना पड़ता है।

प्रोफेसर शैलेन्द्र गोस्वामी
राग मियाँ की मल्हार को गाते-बजाते समय राग बहार से बचाना पड़ता है। परन्तु कोमल गान्धार का सही प्रयोग किया जाए तो इस दुविधा से मुक्त हुआ जा सकता है। इन दोनों रागों को एक के बाद दूसरे का गायन-वादन कठिन होता है, किन्तु उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने एक बार यह प्रयोग कर श्रोताओं को चमत्कृत कर दिया था। इस राग में गमक की तानें बहुत अच्छी लगती है। वर्षा ऋतु के प्राकृतिक सौन्दर्य को स्वरों के माध्यम से अभिव्यक्त करने के साथ ही भक्तिरस के सृजन के लिए भी यह राग सार्थक होता है। इस राग के दोनों रूपों की भावपूर्ण अनुभूति कराने के लिए हम आपको दो रचनाएँ सुनवाते है। पहले आप सुनेंगे विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित विश्वमोहन भट्ट द्वारा ‘मोहन वीणा’ पर बजाया राग ‘मियाँ की मल्हार’ में एक मोहक रचना। पाश्चात्य संगीत का "हवाइयन गिटार" वैदिककालीन वाद्य "विचित्र वीणा" का सरलीकृत रूप है। वर्तमान में "मोहन वीणा" के नाम से जिस वाद्ययंत्र को हम पहचानते हैं, वह पश्चिम के 'हवाइयन गिटार' या 'साइड गिटार' का भारतीय संगीत के अनुकूल परिष्कृत रूप है। "मोहन वीणा" के प्रवर्तक हैं, सुप्रसिद्ध संगीत-साधक पं. विश्वमोहन भट्ट, जिन्होंने अपने इस अनूठे वाद्य से समूचे विश्व को सम्मोहित किया है। श्री भट्ट के मोहन वीणा वादन के बाद राग मियाँ की मल्हार में पिरोया एक भजन भी आप सुनेगे। यह भजन प्रस्तुत कर रहे हैं, प्रोफेसर शैलेन्द्र गोस्वामी। इनके साथ तबला संगति पं. सुधीर पाण्डेय ने और हारमोनियम संगति महमूद धौलपुरी ने की है। आप राग मियाँ की मल्हार में भक्तिरस के तत्त्व का प्रत्यक्ष अनुभव कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग मियाँ की मल्हार : तंत्रवाद्य मोहन वीणा पर आलाप और तीनताल की गत : पं. विश्वमोहन भट्ट




राग मियाँ की मल्हार : भजन : ‘रीझत ग्वाल रिझावत श्याम...’ : डॉ. शैलेन्द्र गोस्वामी




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ की 143वीं संगीत पहेली में हम आपको एक जुगलबन्दी रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 150वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस रचना में किस राग की झलक है?

2 – यह रचना किस ताल में प्रस्तुत की गई है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 145वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 141वीं संगीत पहेली में हमने आपको युवा कलासाधक विकास भारद्वाज के सितारवादन का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग बागेश्री और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- तीनताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी और जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है, लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’, जिसके अन्तर्गत हमने आज की कड़ी में आपसे राग मियाँ की मल्हार में भक्तिरस के तत्त्व विषयक चर्चा की। अगले अंक में हम आपको एक अत्यधिक प्रचलित राग में गूँथी रचनाएँ सुनवाएँगे जिनमें भक्तिरस की रचनाएँ प्रस्तुत की जाती हैं। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

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