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शनिवार, 28 जनवरी 2012

रेडियो प्लेबैक आर्टिस्ट ऑफ द मंथ - कुहू गुप्ता

कुहू गुप्ता 

कवर गीतों से लेकर ढेरों ओरिजिनल गीतों को अपनी आवाज़ से सजाया है कुहू ने, इन्टरनेट पर सक्रिय अनेकों संगीतकारों की धुनों में अपनी आवाज़ का रंग भरने वाली गायिका कुहू गुप्ता है रेडियो प्लेबैक की आर्टिस्ट ऑफ द मंथ...अपने अब तक के करियर के कुछ यादगार गीत और गायन के अपने खट्टे मीठे अनुभव बाँट रही है आपके साथ गायिका कुहू गुप्ता.

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

ग्यारह हो हमारा, देश का यही है आज नारा -ठोंक दे किल्ली टीम इंडिया....करोड़ों भारतीयों की आवाज़ को सुरों में पिरोया देश विदेश में बसे संगीत योद्धाओं ने

Awaaz mahotsav World Cup Cricket 2011 Special Song

आज मीरपुर में भारतीय क्रिकेट टीम विश्व कप पर २८ सालों बाद बेहद मजबूती के साथ अपनी दावेदारी पेश करने उतरेगी....आज पूरा देश उन्हें शुभकामनाएँ दे रहा है. दोस्तों क्रिकेट हमारे देश में किसी धर्म से कम नहीं है, और विश्व कप उन खास मौकों में से एक है जब पूरा देश एक सूत्र में बंध जाता है, सब एक दूसरे से बस यही पूछते नज़र आते है -"स्कोर क्या है ?". जब जीत हार एक खेल से बढ़ कर कुछ हो जाए, जब करोड़ों धड़कनों की दुआ बस एक हो जाए, तो छाना लाजमी ही है - जीत का जूनून. इसी जीत के जज्बे को सलाम करने उतरे हैं आज हिंद युग्म के कुछ नए तो कुछ तजुर्बेकार सिपाह सलार...वहाँ मैदाने जंग में जब भारत के ११ खिलाड़ी अपने हुनर का दम लगायेंगें वहीं करोड़ों दर्शक एक सुर में गायेंगें....क्या ? अरे घबराईये नहीं, हम लाये हैं एक ऐसा गीत जो २ अप्रैल तक हर क्रिकेट प्रेमी की जुबान पे होगा, हर मैच से पहले और बाद में हर कोई बस यही गुनगुनाएगा...."ठोंक दे किल्ली टीम इंडिया"...आपके शब्दों को सुरों में ढाल कर आज हिंद युग्म गर्व से पेश करता है टीम इंडिया को शुभकामनाएँ देता ये दमदार गीत, जिसके माध्यम से आज हिंद युग्म परिवार में जुड रहे कुछ बेहद नए मगर प्रतिभाशाली संगीतकर्मी.....

गीत के बोल -

जोश भी है, होश भी है हबीब,
हौंसले भी बुलंद है,
मांग अपनी खैर मेरे रकीब,
दिन अब तेरे चंद है,
निकले हैं धुन में,
हम जियाले नौजवाँ,
मैदाने जंग है ये खेल नहीं,
ठोंक दे किल्ली, टीम इंडिया ओ ओ ओ,
गाढ़ दे बल्ला, come on india lets go...,
छा ने दे - जीत का जूनून

स स स स सुनो नगाड़े, किला हिला दो बढ़ो चलो,
च च च च चलो दहाड़े, किला हिला दो बढ़ो चलो,
विजय तिरंगा फहराना है, किला हिला दो बढ़ो चलो,
है करोड़ों उम्मीदें तुमसे....हार के पंजों से,
जीत को, छीन लो,
नाम हमारे हो फ़तेह,
ठान लो,
एक से एक मिले तो हों ग्यारह, ग्यारह हो हमारा, (means 2011 should belongs to us)
देश का यही है आज नारा,
ठोंक दे किल्ली, टीम इंडिया ओ ओ ओ,
गाढ़ दे बल्ला, come on india lets go...,


मेकिंग ऑफ़ "जीत का जूनून" - गीत की टीम द्वारा

ईश्वर रविशंकर: An idea.. conceived... endeavored... now delivered...

The song started of from the brain-cells of AK Deepesh who came up with the thought of making a song to cheer the Indian Cricket Team for this World Cup. The very thought was vibrant and struck a chord with every one on our team.

We embarked on this project a month back when Sajeev Sarathie penned some fantastic lines off his mind. Sajeev speaking for this song was a masterstroke for us since Sajeev, a being cricket enthusiast himself was obviously thrilled at the thought amd did not just stop with passionate writing but also went out of his way to help us throughout the song.

Once the lyrics and the melody were in place, we started off with the groove design with Manoj at the helm. Needless to say, the amazing drummer that he is, he nailed it! With the basic framework now in place, we started off on arrangements & programming and from there on it was a process of evolution set in motion.

This was also the first time we got the chance to work with Kuhoo Gupta (thanks to Sajeev Bhaiya). Have always been a great fan of her singing and working with her was ever better than we had ever imagined. Versatility, speed and a thorough professional attitude describe her the best (not to mention amazingly cheery all the time). She finished off her portions in no time and proved to be such a value add to our team!

Tara Balakrishnan who has almost always been a part of our projects worked her magic in the very last minute with some breath-taking harmonies and super-expressive singing.

With Anup Menon - The Guitarist on the team, there could obviously be no dearth for energy. He played an active part in the song offering suggestions and improvisations most of which when incorporated improve the song.

I didn't have to go far in searching for the male lead, Deepesh being an amazing singer himself. Apart from singing the lead, Deepesh stayed up while making the song right from Day 1 and this song is as much his baby as mine.

Two people who stood by us no matter what deserve a special mention. Baba Vijay and Vinod Venugopal are not only the ones behind the video for the song and the teaser but also the right catalyst charging us up when the chips were down!

Balamurali Balu is another friend we would like to thank for his guidance throughout.

Last but not the least, we thank all our friends (active and passive) who have motivated us, kept us on our toes, criticized for improvements and helped us through out the promotions from the day the teaser was out!

Jeet Ka Junoon required a junoon of our own since we did have a lot of hurdles jump across (what with lack of a proper funding to execute a project so ambitious, etc) but it finally proved to worth all our efforts.

We sure had a blast working together and hope you will too, when you listen!

सजीव सारथी: मैं कुछ ऐसा करना चाहता था इस वर्ल्ड कप के लिए पर जिन संगीतकारों के साथ जिद के साथ ऐसा गीत करने को कह सकता था, वो सब यहाँ वहाँ व्यस्त थे. तभी एक दिन ईश्वर का मेल आया, ईश्वर ने मेरे लिखे एक गीत की (मुरली वेंकट के लिए) की अर्रेंजमेंट की थी, जब ईश्वर ने कहा उसके एक मूल धुन पर गीत लिखना है तो मुझे लगा कि कोई दूसरे तरह का गीत होगा, पर जब अगली मेल में उसने लिखा कि ये गीत वर्ल्ड कप के लिए है तो मुझे बहुत ख़ुशी हुई...इस गीत में बहुत बड़ी टीम थी, और सबको ईश्वर ने बहुत सलीके से संभाला है, दीपश शुरू में बहुत चिंतित था मगर कई कई बार प्रक्टिस करने के बाद उसमें काफी जोश आ गया, और तारा ने भी हरमोनिस में उसका अच्छा साथ निभाया. कुहू ने लास्ट मिनट में एंट्री की है और देखिये अपने स्पनिश अलाप से कैसा जादू चलाया है...पर मेरी नज़र में जो इस गीत को एक लेवल ऊपर लेकर जाता है वो है इसका गिटार, अनूप ने जो एनर्जी इस गीत में फूंकी है वो लाजावाब है.... २०११ हमारा होगा, मुझे उम्मीद ही नहीं विश्वास है, इंडियन क्रिकेट टीम एक बार फिर इतिहास लिखेगी...come on India lets go....ये कप हमें दे दे ठाकुर :)




Kuhoo - Singer (Pune)
Kuhoo, as her name implies, is gifted with a melliflous voice. The rich tonal quality captivates the listener instantly and everytime. She began singing at the tender age of 5. Her formal education in music started at the age of 11 when she started training in Hindustani Classical Vocals. This was to be the beginning of a journey for her as she improved her singing every passing day. She won many national level prizes in singing. Equally competent in academics, Kuhoo studied in IIT Mumbai and completed her M. Tech from Computer Science department.

Anup Menon - Guitars (Paris)
An elite academic whose passions are rock, heavy metal and the likes apart from his precious books, Anup is an ultra-dynamic guitarist. Creative and spontaneous, his energy is infectious!

सजीव सारथी
हिन्द-युग्म के 'आवाज़' मंच के प्रधान संपादक सजीव सारथी हिन्द-युग्म के वरिष्ठतम गीतकार हैं। हिन्द-युग्म पर इंटरनेटीय जुगलबंदी से संगीतबद्ध गीत निर्माण का बीज सजीव ने ही डाला है, जो इन्हीं के बागवानी में लगातार फल-फूल रहा है। कविहृदयी सजीव की कविताएँ हिन्द-युग्म के बहुचर्चित कविता-संग्रह 'सम्भावना डॉट कॉम' में संकलित है। सजीव के निर्देशन में ही हिन्द-युग्म ने 3 फरवरी 2008 को अपना पहला संगीतमय एल्बम 'पहला सुर' ज़ारी किया जिसमें 6 गीत सजीव सारथी द्वारा लिखित थे। पूरी प्रोफाइल यहाँ देखें।

Tara Balakrishnan - Female Vocals (Houston)
Fabulous singer with a blessed voice and amazing creativity Tara can sing any genre with unbelievable ease and grace. A highly competent singer with 10 years of carnatic training, she has even sung in a Tamil movie.
Based out of Houston, SAP Consultant.

AK Deepesh - Male Vocals (Cochin)
A highly positive person with a dynamic & contemporary voice, Deepesh is a highly promising singer who is sure to rock the industry very soon.

Manoj Krishnan - Groove Design (California)
A sudden turn around during high school caused Manoj to get suddenly interested in music. There has been no looking back ever since. He rocked his college with his formidable drumkit and is now actively into programming and other aspects of music as well.

Eshwar Ravishankar - Composition and Arrangement (Chennai)
An aspiring management student by day and a musician by night, Eshwar is ever passionate about every job he undertakes. He is into composing jingles for ads/corporate videos and the likes under the brand name Sonus Unbound.

Song - Jeet Ka Junoon
Vocals - AK Deepesh, Tara Balakrishnan, Kuhoo
Groove Design - Manoj Krishnan
Guitars - Anup Menon
Composition and Arrangement - Eshwar Ravishankar
Lyrics - Sajeev Sarathie

Graphics - Prashen's media


All rights reserved with the artists and Hind Yugm

शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

Go Green- दुनिया और पर्यावरण बचाने की अपील- आवाज़ का एक अंतरराष्ट्रीय गीत

हिन्द-युग्म ने इंटरनेट की दुनिया में शुक्रवार की एक नई परम्परा विकसित की है, जिसके अंतर्गत शुक्रवार के दिन इंटरनेटीय जुगलबंदी से रचे गये संगीतबद्ध गीत का विश्वव्यापी प्रदर्शन होता है। हिन्द-युग्म ने संगीत की इस नई और अनूठी परम्परा को देश से निकालकर विदेश में भी स्थापित किया है। वर्ष 2009 में आवाज़ ने भारत में स्थित रूसी दूतावास के लिए भारत-रूस मित्रता के लिए एक गीत 'द्रुज्बा' बनाया था। वह हमारा पहला प्रोजेक्ट था जिसमें हमने एक से अधिक देश की संवेदनाओं को सुरबद्ध किया था।

आज हम एक ऐसा गीत लेकर आये हैं, जिसमें अंतर्निहित संवेदनाएँ, चिंताएँ और सम्भावनाएँ वैश्विक हैं। पूरी दुनिया हरियाली के भविष्य को लेकर चिंतित है। यह चिंता पर्यावरणवादियों को खाये जा रही है कि बहुत जल्द पुरी दुनिया फेफड़े भर हवा के लिए मरेगी-कटेगी। हम सब की यह जिम्मेदारी है कि अपनी आने वाली पीढ़ियों को हम कम से कम एक ऐसी दुनिया दे जिसमें हवा-पानी की लड़ाई न हो। शायद इसीलए जो थोड़ा भी संजीदा है, वे 'गो ग्रीन' के साथ है।

हमने इस बार फ्यूजन के माध्यम से इसी संदेश को ताज़ा किया है। शास्त्रीय संगीत और पश्विमी संगीत के इस फ्यूजन में मिक्सिंग और साउंड-इंजीनियरिंग का काम बॉलीवुड-फेम के सन्नी सनौर ने किया है, जो संगीतकार संदीप चौठा के सहायक हैं। गाने का अंग्रेजी हिस्सा विदेशी कलाकारों द्वारा परिणित हुआ है, इसलिए यह हिन्द-युग्म का अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट है।


तो सुनिए 'दुनिया बचाने, पर्यावरण बचाने और गो ग्रीन' का संगीतबद्ध संदेश-


गीत के बोल (Song's Lyrics):

See the trees dancing for singing birds
See the waves fighting on the sea shores
Beauty is all we got from nature
Are we gonna see that here forever

Save our mother
Today together
Tell our people
we go we go we go we go we

Go green go green

We go we go we go green

Go green go green
We go we go we go green

हरियाले जंगल, पर्वत, झरने, नदिया और समुन्दर

ये सब हैं अपनी जागीरें

कुदरत ने बांटे हैं बिन मोल ही सबको देखो यारों

जीने की सारी तदबीरें,

नेमतें हजारों मिली है हमें जब

कुछ तो यारों हम भी करें अब ज़रा,

स्वर्ग से भी सुन्दर नज़र आएगी धरा,

रंग दो इसे अब हरा

Save our mother
Today together
Tell our people
we go we go we go we go we

Go green go green
We go we go we go green
Go green go green
We go we go we go green

मेकिंग ऑफ़ "Go Green" - गीत की टीम द्वारा

Juniana Lanning: When I first got a copy of "Go Green" from Bala, I knew right away from the sound of it I was going to have fun with this project! In fact, I immediately began singing it as I was doing my work around the house! Within the next couple of weeks, I was able to record an initial vocal track to accompany the music, send it to Bala for critique, and then begin working on the final version. It was a chance for me to learn to sing in a slightly different style than I usually would in my own music. I found it challenging, educating and rewarding, especially when I got the final mix back from Bala and heard it entirely in context with the song. It sounded so great- I was excited! After that, the song underwent a change that I did not expect! I knew that Bala was working with another woman (Kuhoo Gupta) on the other vocal part,which was originally sung by Unnikrishnan Kb, and I was anxious to hear how it turned out. The final version is actually quite different from the first mix I got, and really sounds beautiful! Everyone did an excellent job, and I am honored and humbled to have had a chance to be a part of this project!.

Balamurali Balu: Making music for a cause is always an additional motivation. I did a Tamil version of this song 6 months ago. Later when I was chatting with Sajeev, we casually decided about doing a Hindi version. Sajeev wrote the lyrics with a lightening speed. I have experimented mixing Indian classical and pop in this song having the experts from both the ends - Kuhoo Gupta and Juniana Lanning. Kuhoo also showed some extra interest in adding sargams and other improvisations - had fun with this process. My very good friend Subbu has played the guitar parts. Later came in Sunny Sanour, a Bollywood sound Engineer working for Sandeep Chowta. I initially contacted him for the mastering work of the song. But he was so kind and volunteered to do the mixing as well. The song portrays different moods with continuous change of instruments/arrangement throughout the song. Its really a changeling task for the sound engineer - Sunny has handled this very well.

Kuhoo Gupta: This song is different in a way, which you all will come to know after listening only :) One thing I liked about this song was the way Western and Indian music blended and the way it gave room for improvisation and the jugalbandi towards the end of the song. I thank Bala for giving me the freedom to improvise as I liked and accommodate it in the song. English and Hindi lyrics have been written very nicely. It was nice working with Bala and the team on this song.

Sajeev Sarathie: इस प्रोजेक्ट पर काम करना मेरे लिए बहुत ही खुशकिस्मती वाली बात थी. एक तो गीत में एक बहुत ज़रूरी सन्देश दिया जा रहा है दुसरे ये सही मायनों हम लोगों का पहला अंतर्राष्ट्रीय फुज़न गीत है. बाला की ये धुन किसी भी राष्ट्रीय - अंतरष्ट्रीय गीत के टक्कर की है उस पर से सन्नी भाई की मिक्सिंग ने जैसे चार चाँद लगा दिये. जुनियाना और कुहू ने मिलकर फुज़न को एक अलग ही मुकाम दे दिया है. इतने शानदार गीत का हिस्सा हूँ ये मेरे लिए फक्र की बात है।


जुनियाना लैनिंग (गायिका)
अमेरिका के शहर पोर्टलैंड ओरेजॉन में रह रही जुनियाना एक फुल-टाइम माँ और पार्ट टाइम साउंड-इंजीनियर और गायिका हैं। जब ये अपने परिवार के साथ व्यस्त नहीं होती है, तब ये पियानो, ड्रम बजा रही होती हैं, गा रही होती हैं या फिर मिक्सिंग कर रही होती हैं। हाल में ही इनका एक युगल एल्बम 'सेवन इंजन्स' रीजिल हुआ है। ये अक्सर लिखती हैं और अपने पति के साथ मिक्सिंग करती हैं। स्थानीय कलाकारों के लिए ये मिक्सिंग और मास्टरिंग का काम करती रही हैं।

सन्नी सनौर (मिक्सिंग व साउंड इंजीनयरिंग)
सन्नी बॉलीवुड में साउंड इंजीनियर हैं। संगीतकार संदीप चौठा के लिए काम करते हैं। ये नई प्रतिभाओं को उभारने में पूरा सहयोग देते हैं, जिनमें भविष्य में कुछ बड़ा करने की सम्भावना है।

बालमुरली बालू (गीत व संगीत)
दिन में रिसर्चर बालामुरली बालू रात में संगीतकार का चोला पहन लेते हैं. १५ साल की उम्र से बाला ने धुनों का श्रृंगार शुरू कर दिया था. एक ड्रमर और गायक की हैसियत से कवर बैंडों के लिए १० वर्षों तक काम करने के बाद उन्हें महसूस हुआ उनकी प्रतिभा का सही अर्थ मूल गीतों को रचने में है. बाला मानते हैं कि उनकी रचनात्मकता और कुछ नया ईजाद करने की उनकी क्षमता ही उन्हें भीड़ से अलग साबित करती है. ये महत्वकांक्षी संगीतकार इन दिनों एक पॉप अल्बम "मद्रासी जेनर" पर काम रहा है, जिसके इसी वर्ष बाजार में आने की सम्भावना है।

कुहू गुप्ता (गायिका)
पुणे में रहने वाली कुहू गुप्ता पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। गायकी इनका जज्बा है। इन्होने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्राप्त की है । इन्होंने राष्ट्रीय स्तर की कई गायन प्रतिस्पर्धाओं में भाग लिया है और इनाम जीते हैं। जी टीवी के प्रचलित कार्यक्रम 'सारेगामा' में भी 2 बार भाग लिया है। जहाँ तक गायकी का सवाल है तो इन्होंने व्यवसायिक प्रोजेक्ट भी किये हैं और इनका एल्बम "कुहू कुहू बोले कोयलिया" मार्केट में आ चुका है । इंटरनेट पर नये संगीत में रुचि रखने वाले श्रोताओं के बीच कुहू काफी चर्चित हैं। कुहू ने हिन्द-युग्म के ताजातरीन एल्बम 'काव्यनाद' में महादेवी वर्मा की कविता 'जो तुम आ जाते एक बार' को गाया है, जो इस एल्बम का सबसे अधिक सराहा गया गीत है।

सजीव सारथी (गीतकार)
हिन्द-युग्म के 'आवाज़' मंच के प्रधान संपादक सजीव सारथी हिन्द-युग्म के वरिष्ठतम गीतकार हैं। हिन्द-युग्म पर इंटरनेटीय जुगलबंदी से संगीतबद्ध गीत निर्माण का बीज सजीव ने ही डाला है, जो इन्हीं के बागवानी में लगातार फल-फूल रहा है। कविहृदयी सजीव की कविताएँ हिन्द-युग्म के बहुचर्चित कविता-संग्रह 'सम्भावना डॉट कॉम' में संकलित है। सजीव के निर्देशन में ही हिन्द-युग्म ने 3 फरवरी 2008 को अपना पहला संगीतमय एल्बम 'पहला सुर' ज़ारी किया जिसमें 6 गीत सजीव सारथी द्वारा लिखित थे। पूरी प्रोफाइल यहाँ देखें।

Song - Go Green
Singers: Juniana Lanning & Kuhoo Gupta
Guitars: Subramanian Krish
Lyrics: Sajeev Sarathie & Balamurali Balu
Mixing & Mastering: Sunny @ Static Wave
Music: Balamurali Balu


Song # 22, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2010

गाँव से लायी एक सुरीला सपना रश्मि प्रभा और जिसे मिलकर संवार रहे हैं ऋषि, कुहू, श्रीराम और सुमन सिन्हा

दोस्तों, आपने गौर किया होगा कि एक दो शुक्रवारों से हम कोई नया गीत अपलोड नहीं कर रहे हैं. दरअसल बहुत से गीत हैं जिन पर काम चल रहा है, पर ऑनलाइन गठबंधन की कुछ अपनी मजबूरियां भी होती है, जिनके चलते बहुत से गीत अधर में फंस जाते हैं. पर हम आपको बता दें कि आवाज़ महोत्सव का तीसरा सत्र जारी है और अगला नया गीत आप जल्द ही सुनेंगें. इन सब नए गीतों के निर्माण के अलावा भी कुछ प्रोजेक्ट्स हैं जिन पर आवाज़ की टीम पूरी तन्मयता से काम कर रही है. ऐसे ही एक प्रोजेक्ट् से आईये आपका परिचय कराएँ आज.

युग्म से जुड़े सबसे पहले संगीतकार ऋषि एस एक बेहद प्रतिभाशाली संगीतकार हैं, इस बात का अंदाजा, हर सत्र में प्रकाशित उनके गीतों को सुनकर अब तक हमारे सभी श्रोताओं को भी हो गया होगा. आमतौर पर आजकल संगीतकार धुन पहले रचते हैं, ऐसे में दिए हुए शब्दों को धुन पर बिठाना और उसमें जरूरी भाव भरना एक दुर्लभ गुण ही है, और उससे भी दुर्लभ है गुण, शुद्ध कविताओं को स्वरबद्ध करने का. अमूमन गीत एक खास खांचे में लिखे जाते हैं ताकि धुन आसानी से बिठाई जा सके, पर जब कवि कविता लिखता है तो वह इन सब बंधनों से दूर रहकर अपने मन को शब्दों में उंडेलता है. ऐसे में उन लिखे शब्दों उनके भाव अनुसार स्वरबद्ध करना एक चुनौती भरा काम ही है. यही कारण है कि जब हमने किसी कवि की कविताओं को इस प्रोजेक्ट के लिए संगीत में ढालने का मन बनाया तो बतौर संगीतकार ऋषि एस को ही चुना.

दरअसल ये सुझाव कवियित्री रश्मि प्रभा का था. आईये सुनें उनकी ही जुबानी कि ये ख़याल उन्हें कैसे आया.

रश्मि प्रभा - शब्दों के साथ चलते चलते एक दिन देखा कि कुछ शब्द सरगम की धुन में थिरक रहे हैं और हवा कह गई- ज़िन्दगी भावनाओं को गुनगुनाना चाहती है ' .... ऐसा महसूस होते मैंने धुन और स्वर को आवाज़ दी और पलक झपकते ऋषि, कुहू, श्रीराम इमानी का साथ मेरी यात्रा को संगीतमय बना गया,.... ज़िन्दगी के इंतज़ार को देखते हुए गाँव से सपना ले आने की बात सुनकर सुमन सिन्हा भी सहयात्री बने और हमने सोचा ज़िन्दगी की तलाश में हम सब जौहरी बनेंगे ...हर गीत में हमारे ख्वाब, हमारी कोशिशें, हमारे हकीकत हैं --- आइये हम साथ हो लें....

तो यूँ हुई शुरूआत इस प्रोजेक्ट की. जैसा कि उन्होंने बताया कि गायन के लिए कुहू और श्रीराम को चुना गया. दरअसल रश्मि जी कुहू की गायिकी की तभी से मुरीद हो चुकी थी जब से उन्होंने उनकी आवाज़ में "प्रभु जी" गीत सुना था. चूँकि ये गीत जिनके डेमो आप अभी सुनने जा रहे हैं, ये स्टूडियो में भी रिकॉर्ड होंगें बेहद अच्छे तरीके से, तो उस मामले में भी कुहू, श्रीराम और रश्मि जी का एक शहर में होना भी फायदेमंद होगा ऐसे हमें उम्मीद है. रश्मिजी की बातों में आपने एक नाम नया भी है, जिनसे आवाज़ के श्रोता वाकिफ नहीं होंगें शायद. ये हैं सुमन सिन्हा, सुमन जी इस प्रोजेक्ट के आधार बनेगें. ये आवाज़ के नए "महारथी" हैं जो हमारे साथ अब लंबे समय तक निभाने आये हैं. आने वाली बहुत सी ऐसी घोषणाओं में आप इनका जिक्र पढेंगें. सुमन जी मूल रूप से पटना बिहार के रहने वाले हैं और साहित्य संगीत और सिनेमा से इनका जुड़ाव पुराना है. इनके बारे में अधिक जानकारी हम आने वाले समय में आप तक पहुंचाएंगें. फिलहाल बढते हैं इस प्रोजेक्ट् की तरफ जिसके लिए अब तक ३ गीत तैयार हो चुके है. इन तीनों गीतों एक झलक आईये अब आपको सुनवाते हैं एक के बाद एक....



ये तीन गीत हैं -
१. इंतज़ार
२. गाँव से रे
३. फितरत

याद रहे अभी ये संस्करण एक डेमो है, और होम स्टूडियो रेकॉर्डेड है...आपकी राय से हम इसे और बेहतर बना पायेंगें-


मेकिंग ऑफ़ "प्रोजेक्ट कविता ०१" - गीत की टीम द्वारा

श्रीराम ईमानी : I love working with this team. For starters Rishi’s compositions are a pleasure to sing. I like the level of detail that he goes to, particularly the additional vocals, and the emphasis he puts on how each word and line should sound. Rashmi ji’s lyrics are straight from the heart, and the imagery they bring to one’s mind are delightful! And finally, Kuhoo – with whom it has always been a pleasure to sing,both on stage and in the studio. We’ve worked together on several songs from our time together in IIT, and it has been an enjoyable and enriching experience as we grew with each song, and I hope this continues for several years to come. I admire every member of this wonderful team and hope. you all like these songs

कुहू गुप्ता : रश्मि जी की कविताओं में कुछ अलग बात है जो दिल को छू जाती है, शायद ज़िन्दगी की सच्चाई है ! और उस पर ऋषि जी संगीत रचना हो तो सोने पे सुहागा. मुझे ये गाने गाने में बहुत आनंद आया. श्रीराम के साथ मैंने ४-५ साल पहले कॉलेज के स्टेज पर गाया था, सोचा न था आज उसी के साथ मूल रचनाएँ भी गाऊँगी. आशा करती हूँ इस टीम का काम आप सब को पसंद आएगा !

ऋषि एस: The poetry for this set of songs have been hand picked by me from the writings of Rashmi ji. This is the first time I have worked with a female lyricist and the difference in the creative thought process is subtle at some places and apparent at the others. The melodies have been inspired from the thought provoking message and rhythmic structure of the poetry. The lyrical value and musical content have been taken to the next level of listening pleasure by vocalists Kuhoo Gupta and Sriram Emani, who have presented the songs with an apt mix of emotions and musicality. Thanks to the whole team for making these songs happen. Special thanks to hindyugm for showcasing independent musicians.


Creative Commons License
Zindagi by Rishi S is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivs 3.0 Unported License.

हमें उम्मीद है कि आप सब की शुभकामनाओं से हम इस और ऐसे सभी अन्य प्रोजेक्ट्स को बहुत कामियाबी से निभा पायेंगें, हमें आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा.

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

ये इंतज़ार बड़ा मुश्किल, कितनी हीं रंगीं हो महफ़िल...महसूस किया कुहू ने रूचि और वेंकटेश के साथ

Season 3 of new Music, Song # 18

नए गीतों से रोशन आवाज़ महोत्सव २०१० में आज बारी है १८ वें गीत की, और आज फिर उसी गायिका की आवाज़ से रोशन है ये महफ़िल जो पहले ही इस सत्र में ५ गीतों को अपनी आवाज़ दे चुकी हैं, जी हाँ आपने सही पहचाना ये उभरती हुई बेहद प्रतिभशाली गायिका है कुहू गुप्ता, जिन पर पूरे आवाज़ परिवार को नाज़ है, तभी तो वो हर उभरते हुए संगीतकार की पहली पसंद बन चुकी हैं आज. आज का गीत कुछ शास्त्रीय रंग लिए हुए है जिसके माध्यम से पहली बार आवाज़ के मंच पर उतर रहे हैं एक हुनरमंद संगीतकार और एक बेहद नयी गीतकारा. संगीतकार वेंकटेश शंकरण हैं जिनका परिचय आप नीचे पढ़ सकते हैं, गीत को लिखा है रूचि लाम्बा ने. निलंजन नंदी ने गीत का संयोजन किया है. हमें पूरा यकीन है बेहद मधुर और बेहद कर्णप्रिय इस गीत को आप हमेशा अपने संकलन में रखना चाह्गें. तो सुनिए ये गीत

गीत के बोल -

कुछ ना भाये मन को मेरे,
हर पल देखूँ सपने तेरे, तेरे , तेरे
जिया लागे ना, तेरे बिन..

जिया लागे ना, नहीं लागे लागे, नहीं लागे लागे, जिया लागे ना,
तेरे बिन, नींद आवे ना, नैना जागे जागे, नैना जागे जागे, नींद आवे ना,
तेरे बिन, जिया लागे ना..

जग को रजनी सुलाए,
मझको यादें जगाए,
सर्द पुरवा के झोंके,
तेरी आहट सुनाए..

जिया लागे ना, तेरे बिन,
जिया लागे ना, नहीं लागे लागे, नहीं लागे लागे, जिया लागे ना,
तेरे बिन
नींद आवे ना,
तेरे बिन
जिया लागे ना,
तेरे बिन

साँझ के धुंधले आँचल छाए,
मुझको घेरे यादों के साये, जिया लागे ना,

साँझ के धुंधले आँचल छाए,
मुझको घेरे यादों के साये, जिया लागे ना,

ये इंतज़ार बड़ा मुश्किल,
कितनी हीं रंगीं हो महफ़िल

तू हीं मेरे
मन में है,
तू हीं धड़कन में है,
तेरे बिना,
मेरा जिया,
कहीं नहीं,
लागे पिया.. ना ना ना ना ना

तेरे बिन, जिया लागे ना,
जिया लागे ना, नहीं लागे लागे, नहीं लागे लागे, जिया लागे ना,
तेरे बिन, नींद आवे ना, नैना जागे जागे, नैना जागे जागे, नींद आवे ना,
तेरे बिन, जिया लागे ना..



मेकिंग ऑफ़ "तेरे बिन" - गीत की टीम द्वारा

वेंकटेश शंकरण: मैंने कुहू के साथ पहले भी एक गाना किया है, जो अब एक व्यावसायिक एलबम का हिस्सा बन चुका है। मुझे कुहू के बारे में जानकारी एक अंतर्जालीय संगीत समूह (इंटरनेट म्युज़िक फोरम) से मिली थी। जहाँ तक रूचि का सवाल है, तो इनसे मैं सबसे पहले अपनी हीं अकादमी में मिला था और अपनी धुन पर गीत लिखने की मैंने इनसे पेशकश की थी। मेरा यह सौभाग्य है कि ये खुशी-खुशी राजी हो गईं। निलंजन के अरेंजमेंट के बारे में मैं क्या कहूँ, मैंने इनसे जिस चीज की उम्मीद की थी, आखिरकार मैंने वही पाया। मैं तो यही कहूँगा कि कैलिफ़ोर्निया के इन दो हुनरमंदों और कुहू के साथ काम करने का मेरा अनुभव बहुत हीं अच्छा रहा। गाने की फाईनल मिक्सिंग आने से पहले इसमें थोड़े-बहुत बदलाव हुए थे, ताकि गाना जो बनकर निकले वह लोगों के दिलों को छू जाए। कोशिश तो यही थी, पता नहीं हम इसमें कितना सफल हुए हैं। अब सब कुछ आप श्रोताओं के हाथ में हैं..उम्मीद करता हूँ कि हमारा यह प्रयास आप सबों को पसंद आएगा।

रूचि लांबा: इस गाने की धुन वेंकटेश जी ने जब मुझे सुनाई, तो ये गीत मुझे सुनते हीं पसंद आ गया। धुन इतनी सुंदर थी कि इस पर गीत के बोल अपने आप हीं आते गए। ये मेरा सौभाग्य है कि वेंकटेश जी ने मुझसे गीत के बोल लिखने को कहे। बिरहा (विरह) और प्रेम से भरा ये गीत, कुहू जी ने बहुत खूबसूरती से गाया है। मैं आशा करती हूँ कि ये गीत और लोगों को भी बहुत पसंद आएगा।

कुहू गुप्ता: वेंकटेश के साथ किया गया मेरा पहला गाना बहुत हीं लोकप्रिय रहा है और ये गाना भी मुझे बेहद पसंद आया। इस गाने के लफ़्ज़ों में जो दर्द है वो गाने में ज़ाहिर करना मेरे लिए एक मुश्किल काम था। ऐसा खूबसूरत गीत लिखने के लिए मैं रूचि को बधाई देना चाहूँगी। निलंजन ने जो अरेंजमेंट किया है, वो गाने के लिए एकदम उपयुक्त है। आशा करती हूँ कि श्रोताओं को यह गाना पसंद पाएगा।

वेंकटेश शंकरण (संगीतकार)
कैलिफोर्निया में रह रहे वेंकटेश संगीत को अपनी ज़िंदगी का एक हिस्सा मानते हैं। इन्होंने अब तक न सिर्फ़ हिन्दुस्तानी कलाकारों के लिए धुनें तैयार की हैं, बल्कि कई सारे अमरीकियों के लिए भी गानों का निर्माण किया है। ये वहाँ पर "सुर म्युज़िक अकादमी" नाम की एक संगीत संस्था चलाते हैं, जहाँ पर हिन्दुस्तानी संगीत, हिन्दुस्तानी साज़ और नृत्य की शिक्षा दी जाती है। आवाज़ पर "तेरे बिन" गाने के साथ ये पहली बार हाज़िर हुए हैं।

रूचि लांबा (गीतकारा)
इनका जन्म मुंबई में हुआ , लेकिन जब ये बस ग्यारह साल की थीं तभी अपने परिवार के साथ आस्ट्रेलिया चली गईं। वहाँ पर पलने-बढने के बावजूद इन्हें हिन्दुस्तानी संगीत और कविताओं से बहुत प्यार रहा है। शादी के बाद ये कैलिफ़ोर्निया आ गईं और आठ साल से अमरीका में हीं हैं। ये पेशे से एक जर्नलिस्ट (पत्रकार) और पब्लिक रिलेशन्स कंसल्टेंट हैं। जब भी वक़्त मिलता है, ये गीत और शेर लिख लिया करती हैं। "तेरे बिन" आवाज़ पर इनकी पहली प्रस्तुति है।

निलंजन नंदी (अरेंजर एवं मिक्सिंग इंजीनियर)
१९६९ में जब निलंजन महज ६ साल के थे, तभी से इन्होंने बाल-कलाकार के तौर पर प्रदर्शन करना शुरू कर दिया था। बचपन से हीं (छठी कक्षा से) इनमें संगीतकार बनने की एक ललक थी। इसलिए इन्होंने वोकल म्युज़िक, गिटार, सरोद, मेलोडिका, पियानो, सिंथेसाइज़र एवं इंडो-अफ़्रो वाद्य-यंत्रों,जिनमें ड्रम इन्हें सबसे ज्यादा पसंद था, को सीखना शुरू कर दिया। ये फ़्युज़न संगीत एवं एथनीक तरीकों(स्टाइल्स) में पारंगत हैं। ये अपनी धुनों को प्रोग्राम करना, साथ हीं साथ अपने स्टुडियो में मिक्स एवं रिकार्ड करना काफी पसंद करते हैं। किसी भी धुन को अरेंज करते समय इनकी दिली ख्वाहिश रहती है कि कम से कम साज़ों का इस्तेमाल हो। "तेरे बिन", जो आवाज़ पर इनकी पहली पेशकश है, को अरेंज करते समय भी इन्होंने इसी बात का ध्यान रखा है।

कुहू गुप्ता (गायिका)
पुणे में रहने वाली कुहू गुप्ता पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। गायकी इनका जज्बा है। ये पिछले 6 वर्षों से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले रही हैं। इन्होंने राष्ट्रीय स्तर की कई गायन प्रतिस्पर्धाओं में भाग लिया है और इनाम जीते हैं। इन्होंने ज़ी टीवी के प्रचलित कार्यक्रम 'सारेगामा' में भी 2 बार भाग लिया है। जहाँ तक गायकी का सवाल है तो इन्होंने कुछ व्यवसायिक प्रोजेक्ट भी किये हैं। वैसे ये अपनी संतुष्टि के लिए गाना ही अधिक पसंद करती हैं। इंटरनेट पर नये संगीत में रुचि रखने वाले श्रोताओं के बीच कुहू काफी चर्चित हैं। कुहू ने हिन्द-युग्म के ताजातरीन एल्बम 'काव्यनाद' में महादेवी वर्मा की कविता 'जो तुम आ जाते एक बार' को गाया है, जो इस एल्बम का सबसे अधिक सराहा गया गीत है। इस संगीत के सत्र में भी यह इनका छठा गीत है।

Song - Tere Bin
Voice - Kuhoo Gupta
Music - Venkatesh Sankaran
Lyrics - Ruchi Lamba
Arrangement and Mixing - Nilanjan Nandy
Graphics - Prashen's media


Song # 18, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

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शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

बिन तोड़े पीसे कड़वी सुपारी का स्वाद चखा कुहू, वी डी और ऋषि ने मिलकर

Season 3 of new Music, Song # 13

देखते ही देखते आवाज़ संगीत महोत्सव अपने तीसरे संस्करण में तेरहवें गीत पर आ पहुंचा है, हमारे बहुत से श्रोताओं की शिकायत रही है कि हम कुछ ऐसे गीत नहीं प्रस्तुत करते जो आज कल के फ़िल्मी गीतों को टक्कर दे सकें, तो इसे हमारे संगीतकारों ने एक चुनौती के तौर पर लिया है, और आपने गौर किया होगा कि इस सत्र में हमने बहुत से नए जोनरों पर नए तजुर्बे किये हैं. ऐसी ही एक कोशिश आज हो रही है, एक फ़िल्मी आइटम गीत जैसा कुछ रचने की, पर यहाँ भी हमने अपनी साख नहीं खोयी है. "बाबूजी धीरे चलना" से "बीडी जलाई ले" तक जाने कितने ऐसे आइटम गीत बने हैं जो सरल होते हुए भी कहीं न कहीं गहरी चोट करते है. ये गीत भी कुछ उसी श्रेणी का है. दोस्तों, इश्क मोहब्बत को फ़िल्मी गीतकारों ने दशकों से नयी नयी परिभाषाओं में बाँधा है, हमारे "इन हाउस" गीतकार विश्व दीपक तन्हा ने भी एक नया नाम दिया है इस गीत में मोहब्बत को. ऋषि एस, जो अमूमन अपने मेलोडियस गीतों के लिए जाने जाते हैं एक अलग ही दुनिया रचते हैं इस गीत में, और कुहू अपनी आवाज़ का एक बिलकुल ही नया रंग लेकर उतर जाती है गीत की मस्ती में. यही हमारे इन कलाकारों की सबसे बड़ी खासियत है कि ये हमेशा ही कुछ नया करने की चाह में रहते हैं और दोहराव से बचना चाहते हैं, बिलकुल वैसे ही जैसे पुराने दौर के फनकार होते थे इन मामलों में. तो सुनिए आज का ये ओर्जिनल गीत.

गीत के बोल -

ये कड़वी कड़वी कड़वी……
कड़वी सुपारी….

अब मैं
छिल-छिल मरूँ…
या घट-घट जिऊँ
तिल-तिल मरूँ
या कट-कट जिऊँ

जिद्दी आँखें….
आँके है कम जो इसे,
फाँके बिन तोड़े पिसे,
काहे फिर रोए, रिसे…

कड़वी सुपारी है,
मिरची करारी है…
कड़वी सुपारी है…… हाँ

कड़वी सुपारी है,
चुभती ये आरी है…
कड़वी सुपारी है…… हाँ

तोलूँ क्या? मोलूँ क्या?
क्या खोया …बोलूँ क्या?
घोलूँ क्या? धो लूँ क्या?
ग़म की जड़ी……

होठों के कोठों पे
जूठे इन खोटों पे
हर लम्हा सजती है
हर लम्हा रजती है…

टुकड़ों की गठरी ये
पलकों की पटरी पे
जब से उतारी है
…… नींदें उड़ीं!!

आशिक तो यारों
बला का जुआरी है
तभी तो कभी तो
बने ये भिखारी है……

मानो, न मानो
पर सच तो यही है
मोहब्बत बड़ी हीं
कड़वी सुपारी है…

गीत अब यहाँ उपलब्ध है

कड़वी सुपारी है मुजीबु पर भी, जहाँ श्रोताओं ने इसे खूब सराहा है देखिये यहाँ

मेकिंग ऑफ़ "कड़वी सुपारी" - गीत की टीम द्वारा

ऋषि एस: ये गीत फिर से एक कोशिश है एक नए जौनर पर काम करने की जिस पर मैंने पहले कभी काम नहीं किया, ये तीसरी बार है जब, वी डी, कुहू और मैंने एक साथ काम किया है. मैंने गीत का खाका रचा और इन दोनों ने उसमें सांसें फूंक दी है...बस यही कहूँगा

कुहू गुप्ता:काफी समय से हम लोग कुछ अलग तरह का गाना करना चाह रहे थे और एक दिन ऋषि इस गाने को ले आये जो बॉलीवुड मायने में कुछ कुछ एक आइटम नंबर जैसा था. मुझे उनका ये एक्सपेरिमेंट बहुत पसंद आया और कडवी सुपारी का राज़ खुलने का तरीका भी जो विश्व दीपक ने बखूबी लिखा है. ऋषि का हर गाना सुनने में बड़ा आसान लगता है लेकिन जब गाने बैठो तो तरह तरह की तकलीफें होती हैं :) ख़ासकर इस गाने में मुझे vibratos और volume dynamics एक ही साथ लेनी थी जो मेरे लिए एक चुनौती थी. आशा करती हूँ इस तकनीक को मैं वैसा निभा पायी हूँ जैसा ऋषि ने गाना बनाते वक्त सोचा था. इस तरह का आईटम नंबर गाना और वो भी ओरिजिनल, मेरे लिए एक बहुत ही नया और नायाब अनुभव था और गाना पूरा होने के बाद बहुत संतुष्टि भी हुई.

विश्व दीपक तन्हा:इस गाने के बोल पहले लिखे गए या फिर ट्युन पहले तैयार हुआ.. इसका फैसला आसान नहीं। हर बार की तरह ऋषि जी ने मुझे ट्युन भेज दिया और इस बार पूरे गाने का ट्युन था.. ना कि सिर्फ़ मुखरे का। मैंने दो-चार बार पूरा का पूरा ट्युन सुना .. और शब्दों की खोज में लग गया। कुछ देर बाद न जाने कैसे मेरे दिमाग में "कड़वी सुपारी है" की आमद हुई और फिर मैं भूल हीं गया कि मैं कोई गाना लिखने बैठा था और उस रात गाने के बदले एक कविता की रचना हो गई। अगली रात जब ऋषि जी ने पूछा कि गाना किधर है तो मैंने अपनी मजबूरी बता दी। फिर उन्होंने कहा कि अच्छा कविता हीं दो.. मैं कुछ करता हूँ। और फिर उस रात हम दोनों ने मिलकर आधी पंक्तियाँ कविता से उठाकर ट्युन पर फिट कीं और आधी नई लिखी गईं। और इस तरह मज़ाक-मज़ाक में यह गाना तैयार हो गया :) गाना किससे गवाना है, इसके बारे में कोई दो राय थी हीं नहीं। दर-असल कुहू जी ने हमसे पहले हीं कह रखा था कि उन्हें एक आईटम-साँग करना है। ऋषि जी के ध्यान में यह बात थी और इसी कारण यह गाना शुरू किया गया था। फ़ाईनल प्रोडक्ट आने के बाद जब कुहू जी को सुनाया गया तो उनके आश्चर्य की कोई सीमा नहीं थी और रिकार्ड होने के बाद हमारे आश्चर्य की। उम्मीद करता हूँ कि हमारा यह प्रयास सबों को पसंद आएगा। यह गाना एक प्रयोग है, इसलिए इसे पर्याप्त समय दें..
कुहू गुप्ता
पुणे में रहने वाली कुहू गुप्ता पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। गायकी इनका जज्बा है। ये पिछले 6 वर्षों से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले रही हैं। इन्होंने राष्ट्रीय स्तर की कई गायन प्रतिस्पर्धाओं में भाग लिया है और इनाम जीते हैं। इन्होंने ज़ी टीवी के प्रचलित कार्यक्रम 'सारेगामा' में भी 2 बार भाग लिया है। जहाँ तक गायकी का सवाल है तो इन्होंने कुछ व्यवसायिक प्रोजेक्ट भी किये हैं। वैसे ये अपनी संतुष्टि के लिए गाना ही अधिक पसंद करती हैं। इंटरनेट पर नये संगीत में रुचि रखने वाले श्रोताओं के बीच कुहू काफी चर्चित हैं। कुहू ने हिन्द-युग्म ताजातरीन एल्बम 'काव्यनाद' में महादेवी वर्मा की कविता 'जो तुम आ जाते एक बार' को गाया है, जो इस एल्बम का सबसे अधिक सराहा गया गीत है। इस संगीत के सत्र में भी यह इनका पांचवा गीत है।

ऋषि एस
ऋषि एस॰ ने हिन्द-युग्म पर इंटरनेट की जुगलबंदी से संगीतबद्ध गीतों के निर्माण की नींव डाली है। पेशे से इंजीनियर ऋषि ने सजीव सारथी के बोलों (सुबह की ताज़गी) को अक्टूबर 2007 में संगीतबद्ध किया जो हिन्द-युग्म का पहला संगीतबद्ध गीत बना। हिन्द-युग्म के पहले एल्बम 'पहला सुर' में ऋषि के 3 गीत संकलित थे। ऋषि ने हिन्द-युग्म के दूसरे संगीतबद्ध सत्र में भी 5 गीतों में संगीत दिया। हिन्द-युग्म के थीम-गीत को भी संगीतबद्ध करने का श्रेय ऋषि एस॰ को जाता है। इसके अतिरिक्त ऋषि ने भारत-रूस मित्रता गीत 'द्रुजबा' को संगीत किया। मातृ दिवस के उपलक्ष्य में भी एक गीत का निर्माण किया। भारतीय फिल्म संगीत को कुछ नया देने का इरादा रखते हैं।

विश्व दीपक तन्हा
विश्व दीपक हिन्द-युग्म की शुरूआत से ही हिन्द-युग्म से जुड़े हैं। आई आई टी, खड़गपुर से कम्प्यूटर साइंस में बी॰टेक॰ विश्व दीपक इन दिनों पुणे स्थित एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। अपनी विशेष कहन शैली के लिए हिन्द-युग्म के कविताप्रेमियों के बीच लोकप्रिय विश्व दीपक आवाज़ का चर्चित स्तम्भ 'महफिल-ए-ग़ज़ल' के स्तम्भकार हैं। विश्व दीपक ने दूसरे संगीतबद्ध सत्र में दो गीतों की रचना की। इसके अलावा दुनिया भर की माँओं के लिए एक गीत को लिखा जो काफी पसंद किया गया।
Song - Kadvi Supari
Voice - Kuhoo Gupta
Backup voice - Rishi S
Music - Rishi S
Lyrics - Vishwa Deepak Tanha
Graphics - samarth garg


Song # 13, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

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शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

सडकें छोटी थीं, दिल बड़े थे, उस शहर के जहाँ इत्तेफ़ाकन मिले थे नितिन, उन्नी और कुहू

Season 3 of new Music, Song # 12

आज बेहद गर्व के साथ हम युग्म के इस मंच पर पेश कर रहे हैं, दो नए फनकारों को, संगीतकार नितिन दुबे संगीत रचेता होने के साथ-साथ एक संवेदनशील गीतकार भी हैं, जिन्होंने अपने जीवन के अनुभवों को शब्दों और सुरों में पिरो कर एक गीत बनाया, जिसे स्वर देने के लिए उतरे आज के दूसरे नए फनकार उन्नीकृष्णन के बी, जिनका साथ दिया है। इस गीत में महिला स्वरों के लिए सब संगीतकारों की पहली पसंद बन चुकी गायिका कुहू गुप्ता। कुहू और उन्नी के स्वरों में ये गीत यक़ीनन आपको संगीत के उस पुराने सुहाने दौर की याद दिला देगा, जब अच्छे शब्द और मधुर संगीत से सजे युगल गीत हर जुबाँ पर चढ़े होते थे. सुनिए और आनंद लीजिए.

गीत के बोल -

एक शहर था जिसके सीने में
सडकें छोटी थीं, दिल बड़े थे
उस शहर से, भरी दोपहर में
मैं अकेला चला था
इस अकेले सफ़र पे

मैं अकेला चला था
इस अकेले सफ़र पे
क्या हसीं इत्तफाक था
बन गए हमसफ़र तुम

मेरे दिल के, एक कोने में
गहरे कोहरे थे, मुद्दतों से
फिर मौसम खुला, तुम दिखे थे
पास आकर रुके थे
साथ मिलकर चले थे

तन्हा ये काफिला था
लम्बे ये फासले थे
क्या हसीं इत्तफाक था
बन गए हमसफ़र तुम

तुमसे पहले मेरी ज़िन्दगी
एक धुंधला सा इतिहास है
मैं जिसके किस्से खुद ही लिख कर
खुद ही भूल चूका हूँ

याद आता नहीं जितना भी सोचूं
क्या वो किस्से थे
क्यों लिखे थे

फिर मौसम खुला, तुम दिखे थे
पास आकर रुके थे
साथ मिलकर चले थे

मैं अकेला चला था
इस अकेले सफ़र पे
क्या हसीं इत्तफाक था
बन गए हमसफ़र तुम

तन्हा ये काफिला था
लम्बे ये फासले थे
क्या हसीं इत्तफाक था
बन गए हमसफ़र तुम



मेकिंग ऑफ़ "क्या हसीन इत्तेफ़ाक" - गीत की टीम द्वारा

नितिन दुबे: जब मैंने इस गाने पर काम करना शुरू किया था तो इसका रूप थोड़ा अलग था। एक पूरा बीच का भाग पहले नहीं था और इसका अन्त भी अलग था। उन्नी और मैं अच्छे दोस्त हैं और कई कवर वर्ज़न्स पर हमने साथ काम किया है। धीरे धीरे हमें लगा कि एक मूल गाना भी हमें एक साथ करना चाहिये। मैं वैसे भी कुछ समय से इस गाने पर धीरे धीरे काम कर ही रहा था। सोचा क्यों न यही गाना साथ करें। मुझे खुशी है जिस तरह उन्नी ने इस गाने को निभाया है। कुहू इस गाने के लिये मेरी पहली और अकेली पसंद थीं। और उन्होंने इसे मेरी आशाओं से बढ़ कर ही गाया है। यह आज के युग में इन्टरनेट का ही कमाल है कि मैं कभी कुहू से मिला भी नहीं हूं मगर इस गाने में एक साथ काम किया है और यह मैं कुहू की प्रतिभा का कमाल कहूंगा कि बिना मेरे साथ सिटिंग किये और बिना मार्गदर्शन के ही उन्होंने गाने का मूड बहुत अच्छी तरह पकड़ा और पेश किया।

उन्नीकृष्णन के बी: “क्या हसीं इत्तेफाक था” एक ऐसा गाना है जो मेरे दिल के बेहद करीब है। जिन दिनों नितिन यह गाना बना रहे थे‚ उन दिनों उन का और मेरा मिलना काफी होता था और इसीलिये मैंने इस गाने को काफी करीब से रूप लेते देखा है। मेरे लिये यह गाना ज़रा कठिन था क्योंकि इस में थोड़ी ग़ज़ल की तरह की गायकी की ज़रूरत है और मेरी मातृभाषा दक्षिण भारतीय है तथा मैंने ग़ज़ल कभी ज़्यादा सुनी भी नहीं। लेकिन मैनें बहुत रियाज़ किया इस गाने के लिये जिसके लिये मुझे नितिन का बहुत मार्गदर्शन भी मिला। और इसके नतीजे से मैं खुश हूं। मुझे लगता है कि मैं इस गाने के मूड को ठीक से पकड़ पाया हूं और इसके लिये मैं नितिन व कुहू का विशेष रूप से शुक्रग़ुज़ार हूं। मैं आशा करता हूं कि भविष्य में भी हम और भी गानों पर साथ काम कर पायेंगे।

कुहू गुप्ता: नितिन की रचनाएं यूं भी मेरी बहुत पसंदीदा थी, मैं खुद उनके साथ कोई गीत करने को उत्सुक थी कि उनका एक मेल आया करीब ४ महीने पहले, वो चाहते थे कि मैं उनके लिए एक रोमांटिक युगल गीत गाऊं. मैंने तो ख़ुशी में गीत बिना सुने ही उन्हें हां कह दिया. क्योंकि मैं जानती थी की ये भी निश्चित ही एक बेमिसाल गीत होगा, और मेरा अंदाजा बिलकुल भी गलत नहीं हुआ यहाँ. गाना बहुत ही सूथिंग था, जिस पर खुद उन्होंने बहुत प्यारे शब्द लिखे थे, ये गीत चूँकि उनके व्यक्तिगत जीवन से प्रेरित था, तो उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण भी था, मैं उम्मीद करती हूँ कि मैंने अपने गायन में उनके जज़्बात ठीक तरह निभाए हैं. मेरे पहले टेक में कुछ कमियां थी जो नितिन ने दूर की. हम दोनों को इंतज़ार था कि पुरुष स्वर पूरे हों और गीत जल्दी से जल्दी मुक्कमल हो, पर तभी दुभाग्यवश बगलोर कार्टलोन दुर्घटना हुई और प्रोजेक्ट में रुकावट आ गयी....हम सब की प्रार्थना थी कि नितिन इन सब से उबर कर गीत को पूरा करें और देखिये किस तरह उन्होंने इस गीत को मिक्स करके वापसी की है. उन्नी ने अपना भाग बहुत खूबी से निभाया है, मैं हमेशा से उनकी आवाज़ की प्रशंसक रही हूँ. और मुझे ख़ुशी है कि इस गीत में हमें एक दूसरे के साथ सुर से सुर मिलाने का मौका मिला।
नितिन दुबे
नितिन संगीतकार भी हैं और एक शायर व गीतकार भी। अपने संगीतबद्ध किये गीतों को वह खुद ही लिखते हैं और उनका यह मानना हैं कि गाने के बोल उतना ही महत्व रखते हैं जितना कि उसकी धुन व संगीत। आर्किटेक्चर और सम्पत्ति विकास के क्षेत्र में विदेश से विशिष्ट शिक्षा प्राप्त करने के बाद नितिन कई वर्षों से व्यवसाय और संगीत के बीच वक्त बांट रहे हैं। अपने गीतों की अलबम ‘उड़ता धुआँ ’ तैयार करने के बाद नितिन अब इस कोशिश में हैं कि इस अलबम को व्यापक रूप से रिलीज़ करें और इसी लिये एक प्रोड्यूसर की खोज में हैं। “उड़ता धुआँ” रिलीज़ होने में चाहे जितना भी वक्त लगे‚ नितिन का कहना है कि वह गाने बनाते रहेंगे क्योंकि संगीत के बिना उन्हें काफी अधूरेपन का अहसास होता है।

उन्नीकृष्णन के बी
उन्नीकृष्णन पेशे से कम्प्यूटर इन्जीनियर हैं लेकिन संगीत का शौक बचपन से ही रखते हैं। कर्नाटक शास्त्रीय संगीत में इन्होंने विधिवत शिक्षा प्राप्त की है तथा स्कूल व कालिज में भी स्टेज पर गाते आये हैं। नौकरी शुरू करने के बाद कुछ समय तक उन्नी संगीत को अपनी दिनचर्या में शामिल नहीं कर पाये मगर पिछले काफी वक्त से वो फिर से नियमित रूप से रियाज़ कर रहे हैं‚ हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले रहे हैं‚ गाने रिकार्ड कर रहे हैं और आशा करते हैं कि अपनी आवाज़ के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचें।

कुहू गुप्ता
पुणे में रहने वाली कुहू गुप्ता पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। गायकी इनका जज्बा है। ये पिछले 6 वर्षों से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले रही हैं। इन्होंने राष्ट्रीय स्तर की कई गायन प्रतिस्पर्धाओं में भाग लिया है और इनाम जीते हैं। इन्होंने ज़ी टीवी के प्रचलित कार्यक्रम 'सारेगामा' में भी 2 बार भाग लिया है। जहाँ तक गायकी का सवाल है तो इन्होंने कुछ व्यवसायिक प्रोजेक्ट भी किये हैं। वैसे ये अपनी संतुष्टि के लिए गाना ही अधिक पसंद करती हैं। इंटरनेट पर नये संगीत में रुचि रखने वाले श्रोताओं के बीच कुहू काफी चर्चित हैं। कुहू ने हिन्द-युग्म ताजातरीन एल्बम 'काव्यनाद' में महादेवी वर्मा की कविता 'जो तुम आ जाते एक बार' को गाया है, जो इस एल्बम का सबसे अधिक सराहा गया गीत है। इस संगीत के सत्र में भी यह इनका चौथा गीत है।

Song - Kya Haseen Itteffaq Tha
Voices - Unnikrishnan K B , Kuhoo Gupta
Music - Nitin Dubey
Lyrics - Nitin Dubey
Graphics - Prashen's media


Song # 12, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

इस गीत का प्लेयर फेसबुक/ऑरकुट/ब्लॉग/वेबसाइट पर लगाइए

गुरुवार, 3 जून 2010

गीत कभी बूढ़े नहीं होते, उनके चेहरों पर कभी झुर्रियाँ नहीं पड़ती...सच ही तो कहा था गुलज़ार साहब ने

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # ४४

गुलज़ार, राहुल देव बर्मन, आशा भोसले। ७० के दशक के आख़िर से लेकर ८० के दशक के मध्य भाग तक इस तिकड़ी ने फ़िल्म सम्गीत को एक से एक यादगार गीत दिए हैं। लेकिन इनमें जिस फ़िल्म के गानें सब से ज़्यादा सुने और पसंद किए गए, वह फ़िल्म थी 'इजाज़त'। इस फ़िल्म में आशा जी का गाया हर एक गीत कालजयी साबित हुआ। ख़ास कर "मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है"। गुलज़ार साहब ने शब्दों के ऐसे ऐसे जाल बुने हैं इस गीत में कि ये बस वो ही कर सकते हैं। चाहे ख़त में लिपटी रात हो या एक अकेली छतरी में आधे आधे भीगना, या युं कहें कि मन का आधा आधा भीगना, सूखे वाले हिस्से का घर ले आना और गिले मन को बिस्तर के पास छोड़ आना, इस तरह के ऒब्ज़र्वेशन और कल्पना गुलज़ार साहब के अलावा कोई दूसरा आज तक नहीं कर पाया है। विविध भारती में गुलज़ार साहब एक बार 'जयमाला' कार्यक्रम में यह गीत बजाया था। तो उन्होने अपने ही शायराना अंदाज़ में इस गीत को पेश करने से पहले कुछ इस तरह से कहे थे - "दिल में ऐसे संभलते हैं ग़म जैसे कोई ज़ेवर संभालता है। टूट गए, नाराज़ हो गए, अंगूठी उतारी, वापस कर दिए। कंगन उतारी, सात फेरों के साथ वापस कर दिए। पर बाक़ी ज़ेवर जो दिल में रख लिए उनका क्या होगा?" तो आइए सुनते हैं हम यह गीत और हमारा दावा है कि शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे यह गीत पसंद नहीं!

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत -मेरा कुछ सामान...
कवर गायन -कुहू गुप्ता




ये कवर संस्करण आपको कैसा लगा ? अपनी राय टिप्पणियों के माध्यम से हम तक और इस युवा कलाकार तक अवश्य पहुंचाएं


कुहू गुप्ता
कुहू गुप्ता पेशे से पुणे में कार्यरत एक सॉफ्टवेर एन्जिनेअर हैं लेकिन इनका संगीत के साथ लगाव बचपन से ही रहा है. कहा जा सकता है कि इन्हें भगवान ने एक मधुर आवाज़ से नवांजा है और इनकी कोशिश यही है कि अपनी गायकी को हर दिन बेहतर बनाती जाएँ. इन्होने हिन्दुस्तानी शाश्त्रीय संगीत कि शिक्षा ११ साल की उम्र से शुरू की और ४ साल तक सीखा. ज़ी टीवी के मशहूर प्रोग्राम सारेगामापा में ये २ बार अपनी गायकी दिखा चुकी हैं. इन्होने कुछ मूल रचनाएँ भी गई हैं, जिनमे से एक हिंद युग्म के काव्य नाद एल्बम का हिस्सा है और कुछ व्यावसायिक तौर पर इस्तेमाल हुई हैं. इनके गाये हुए हिन्दी फिल्मों के गानों के कवर्स आज कल इन्टरनेट डेक्कन रेडियो पर भी सुनाये जा रहे हैं. इन सब के साथ साथ ये स्टेज शोव्स भी करती हैं.


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

मंगलवार, 1 जून 2010

क्या लता जी की आवाज़ से भी अधिक दिव्य और मधुर कुछ हो सकता है कानों के लिए

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # ४२

'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' में आज हम जिस गीत का रिवाइव्ड वर्ज़न लेकर आए हैं, वह है सन् १९९१ में बनी फ़िल्म 'लेकिन' से। हृदयनाथ मंगेशकर द्वारा स्वरबद्ध इस गीत को लता जी ने गाया था। ९० के दशक के शुरु शुरु में आई इस फ़िल्म के गीतों के माध्यम से लता जी ने यह एक बार फिर से साबित किया था कि इस नए दशक में भी अगर वो चाहें तो राज कर सकती हैं। लता जी ने सन् १९८३ में विविध भारती पर जयमाला कार्यक्रम प्रस्तुत किया था जिसमें उन्होने कुल ९ गीतों में से ५ गानें उन्होने अपने भाई हृदयनाथ के चुने। इनमें से एक गीत तो मराठी में था, बाक़ी के गानें थे "मुझे तुम याद करना और मुझको याद आना तुम" (मशाल), "तुम आशा विश्वास हमारे" (सुबह), "फ़ुटपाथों के हम रहनेवाले" (मशाल) तथा "ये आँखें देख कर हम सारी दुनिया भूल जाते हैं" (धनवान)। उसी कार्यक्रम में लता जी ने हृदयनाथ जी के बारे में यह कहा था - "मुझे कुछ ऐसा लग रहा है कि हृदयनाथ पर एक ठप्पा लग गया है ग़ैर फ़िल्मी गीत कॊम्पोज़ करने का, या फिर उनके गानों में क्लासिकल म्युज़िक की प्रचूरता है। लेकिन ऐसा नहीं है। एक गीत आपको सुनवाती हूँ जिसमें फ़िल्मी गीत का रीदम भी है, फ़िल्मी सिचुयशन के अनुरूप वेस्टर्ण म्युज़िक भी है और मिठास भी है।" और वह गीत था "फ़ुटपाथों के हम..."। तो दोस्तों, आइए अब आज का गीत सुना जाए, जिसे लिखा है गुलज़ार साहब ने।

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत -यारा सिली सिली...
कवर गायन -कुहू गुप्ता




ये कवर संस्करण आपको कैसा लगा ? अपनी राय टिप्पणियों के माध्यम से हम तक और इस युवा कलाकार तक अवश्य पहुंचाएं


कुहू गुप्ता
कुहू गुप्ता पेशे से पुणे में कार्यरत एक सॉफ्टवेर एन्जिनेअर हैं लेकिन इनका संगीत के साथ लगाव बचपन से ही रहा है. कहा जा सकता है कि इन्हें भगवान ने एक मधुर आवाज़ से नवांजा है और इनकी कोशिश यही है कि अपनी गायकी को हर दिन बेहतर बनाती जाएँ. इन्होने हिन्दुस्तानी शाश्त्रीय संगीत कि शिक्षा ११ साल की उम्र से शुरू की और ४ साल तक सीखा. ज़ी टीवी के मशहूर प्रोग्राम सारेगामापा में ये २ बार अपनी गायकी दिखा चुकी हैं. इन्होने कुछ मूल रचनाएँ भी गई हैं, जिनमे से एक हिंद युग्म के काव्य नाद एल्बम का हिस्सा है और कुछ व्यावसायिक तौर पर इस्तेमाल हुई हैं. इनके गाये हुए हिन्दी फिल्मों के गानों के कवर्स आज कल इन्टरनेट डेक्कन रेडियो पर भी सुनाये जा रहे हैं. इन सब के साथ साथ ये स्टेज शोव्स भी करती हैं.


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

शुक्रवार, 21 मई 2010

मजरूह, साहिर जैसे नामी गिरामी शायरों ने भी एक लंबी पारी खेली बतौर गीतकार

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # ३1

'ओल्ड इस गोल्ड रिवाइवल' के अंतरगत आप कुल ४५ गानें सुन रहे हैं इन दिनों एक के बाद एक, और इस शृंखला का दो तिहाई हिस्सा पूरी कर चुके हैं। यानी कि ३० गीत हम सुन चुके हैं और अभी १५ गानें और सुनवाने हैं। हम उम्मीद करते हैं कि ये कवर वर्ज़न्स आप को अच्छे लग रहे होंगे। तो इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए आज एक हंगामाख़ेज गीत जिसे राहुल देव बर्मन के पाश्चात्य शैली के गीतों की श्रेणी में सब से उपर रखा जाता है। जी हाँ, फ़िल्म 'कारवाँ' का "पिया तू अब तो आजा"। मजरूह सुल्तानपुरी ने इस गीत को लिखा था और आशा भोसले के साथ साथ पंचम ने भी "मोनिका ओ माइ डार्लिंग्" की आवाज़ लगाई थी इस गाने में। इस सेन्सुयस गीत का रिवाइव्ड वर्ज़न आज हम सुनने जा रहे हैं, लेकिन उससे पहले आपको यह बता दें कि 'कारवाँ' नासिर हुसैन की फ़िल्म थी। मुझे विकिपीडिया पर मजरूह साहब के जीवनी पर नज़र दौड़ाते हुए यह बात पता चली (वैसे मैं इसकी पुष्टि नहीं कर सकता) कि 'तीसरी मंज़िल' के लिए राहुल देव बर्मन को बतौर संगीतकार नियुक्त करने के निर्णय में मजरूह साहब का बड़ा हाथ था। मजरूह और नासिर हुसैन की गहरी दोस्ती थी। मजरूह साहब के कुछ यादगार गीतों वाली फ़िल्में नासिर साहब ने ही बनाई थी, जैसे कि 'पेयिंग् गेस्ट', 'फिर वही दिल लाया हूँ', 'तीसरी मंज़िल', 'बहारों के सपने', 'प्यार का मौसम', 'कारवाँ', 'यादों की बारात', 'हम किसी से कम नहीं', 'ज़माने को दिखाना है', 'क़यामत से क़यामत तक', 'जो जीता वही सिकंदर', और 'अकेले हम अकेले तुम'। इन फ़िल्मों में से ७ फ़िल्मों में पंचम का संगीत था। तो इसी जानकारी के साथ आइए सुना जाए "पिया तू अब तो आजा"।

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत -पिया तू अब तो आजा...
कवर गायन -कुहू गुप्ता




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कुहू गुप्ता
कुहू गुप्ता पेशे से पुणे में कार्यरत एक सॉफ्टवेर एन्जिनेअर हैं लेकिन इनका संगीत के साथ लगाव बचपन से ही रहा है. कहा जा सकता है कि इन्हें भगवान ने एक मधुर आवाज़ से नवांजा है और इनकी कोशिश यही है कि अपनी गायकी को हर दिन बेहतर बनाती जाएँ. इन्होने हिन्दुस्तानी शाश्त्रीय संगीत कि शिक्षा ११ साल की उम्र से शुरू की और ४ साल तक सीखा. ज़ी टीवी के मशहूर प्रोग्राम सारेगामापा में ये २ बार अपनी गायकी दिखा चुकी हैं. इन्होने कुछ मूल रचनाएँ भी गई हैं, जिनमे से एक हिंद युग्म के काव्य नाद एल्बम का हिस्सा है और कुछ व्यावसायिक तौर पर इस्तेमाल हुई हैं. इनके गाये हुए हिन्दी फिल्मों के गानों के कवर्स आज कल इन्टरनेट डेक्कन रेडियो पर भी सुनाये जा रहे हैं. इन सब के साथ साथ ये स्टेज शोव्स भी करती हैं.


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



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शुक्रवार, 14 मई 2010

कुछ गीत इंडस्ट्री में ऐसे भी बने जिनका सम्बन्ध केवल फिल्म और उसके किरदारों तक सीमित नहीं था...

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # २४

"चैन से हमको कभी आप ने जीने ना दिया, ज़हर जो चाहा अगर पीना तो पीने ना दिया"। फ़िल्म 'प्राण जाए पर वचन ना जाए' का यह दिल को छू लेने वाला गीत आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' की महफ़िल को रोशन कर रहा है। ओ. पी. नय्यर और आशा भोसले ने साथ साथ फ़िल्म संगीत में एक लम्बी पारी खेली है। करीब करीब १५ सालों तक एक के बाद एक सुपर डुपर हिट गानें ये दोनों देते चले आए हैं। कहा जाता है कि प्रोफ़ेशनल से कुछ हद तक उनका रिश्ता पर्सनल भी हो गया था। ७० के दशक के आते आते जब नय्यर साहब का स्थान शिखर से डगमगा रहा था, उन दिनों दोनों के बीच भी मतभेद होने शुरु हो गए थे। दोनों ही अपने अपने उसूलों के पक्के। फलस्वरूप, दोनों ने एक दूसरे से किनारा कर लिया सन् १९७२ में। इसके ठीक कुछ दिन पहले ही इस गीत की रिकार्डिंग् हुई थी। दोनों के बीच चाहे कुछ भी मतभेद चल रहा हो, दोनों ने ही प्रोफ़ेशनलिज़्म का उदाहरण प्रस्तुत किया और गीत में जान डाल दी। फ़िल्म के रिलीज़ होने के पहले ही इस फ़िल्म के गानें चारों तरफ़ छा गए। ख़ास कर यह गीत इतना ज़्यादा लोकप्रिय हो गया था कि फ़िल्मफ़ेयर पत्रिका ने आशा भोसले को उस साल के अवार्ड फ़ंकशन के लिए 'सिंगर ऒफ़ दि ईयर' चुन लिया। लेकिन दुखद बात यह हो गई कि आशा जी नय्यर साहब से कुछ इस क़दर ख़फ़ा हो गए कि वो ना केवल फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड लेने नहीं आईं, बल्कि इस फ़िल्म से यह गाना भी हटवा दिया जब कि गाना रेखा पर फ़िल्माया जा चुका था। फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड फ़ंकशन में नय्यर साहब ने आशा जी का पुरस्कार ग्रहण किया, और ऐसा कहा जाता है कि उस फ़ंकशन से लौटते वक़्त उस अवार्ड को गाड़ी से बाहर फेंक दिया और उसके टूटने की आवाज़ भी सुनी। कहने की आवश्यकता नहीं कि आशा और नय्यर के संगम का यह आख़िरी गाना था। समय का उपहास देखिए, इधर इतना सब कुछ हो गया, और उधर इस गीत में कैसे कैसे बोल थे, "आप ने जो है दिया वो तो किसी ने ना दिया", "काश ना आती आपकी जुदाई मौत ही आ जाती"। ऐसा लगा कि आशा जी नय्यर साहब के लिए ही ये बोल गा रही हैं। बहुत अफ़सोस होता है यह सोचकर कि इस ख़ूबसूरत संगीतमय जोड़ी का इस तरह से दुखद अंत हुआ। ख़ैर, सुनिए यह मास्टरपीस और सल्युट कीजिए ओ. पी. नय्यर की प्रतिभा को!

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत -चैन से हमको कभी...
कवर गायन - कुहू गुप्ता




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कुहू गुप्ता
कुहू गुप्ता पेशे से पुणे में कार्यरत एक सॉफ्टवेर एन्जिनेअर हैं लेकिन इनका संगीत के साथ लगाव बचपन से ही रहा है. कहा जा सकता है कि इन्हें भगवान ने एक मधुर आवाज़ से नवांजा है और इनकी कोशिश यही है कि अपनी गायकी को हर दिन बेहतर बनाती जाएँ. इन्होने हिन्दुस्तानी शाश्त्रीय संगीत कि शिक्षा ११ साल की उम्र से शुरू की और ४ साल तक सीखा. ज़ी टीवी के मशहूर प्रोग्राम सारेगामापा में ये २ बार अपनी गायकी दिखा चुकी हैं. इन्होने कुछ मूल रचनाएँ भी गई हैं, जिनमे से एक हिंद युग्म के काव्य नाद एल्बम का हिस्सा है और कुछ व्यावसायिक तौर पर इस्तेमाल हुई हैं. इनके गाये हुए हिन्दी फिल्मों के गानों के कवर्स आज कल इन्टरनेट डेक्कन रेडियो पर भी सुनाये जा रहे हैं. इन सब के साथ साथ ये स्टेज शोव्स भी करती हैं.


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रविवार, 9 मई 2010

फ़िल्मी गीतों के सुन्दर फिल्मांकन में उनकी लोकेशन की भी अहम भूमिका रही है फिर चाहे वो देसी हो या विदेशी

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # १९

१९६४ शक्ति सामंत के फ़िल्मी सफ़र का एक महत्वपूर्ण साल रहा क्युंकि इसी साल आयी थी फ़िल्म 'कश्मीर की कली'। शम्मी कपूर और शर्मिला टैगोर अभिनीत इस फ़िल्म ने उनके पहले की सभी फ़िल्मों को पीछे छोड़ दिया था कामयाबी की दृष्टि से। इस फ़िल्म में शक्तिदा ने पहली बार शर्मिला टैगोर को हिंदी फ़िल्मों में ले आये थे। हुआ यह था कि शक्तिदा एक बार किसी बंगला पत्रिका में शर्मिला की तस्वीर देख ली थी और वो उन्हे पसंद आ गयी। शक्तिदा ने उनके पिताजी को फोन किया और उनके पिताजी ने यह भी कहा कि अगर कहानी अच्छी है तो उनकी बेटी ज़रूर काम करेगी। बस फिर क्या था, तीन फ़िल्म वितरकों को साथ में लेकर शक्तिदा शर्मिला से मिलने उनके घर जा पहुँचे। उन फ़िल्म वितरकों को शर्मिला कुछ ख़ास नहीं लगी, लेकिन शक्तिदा को अपनी पसंद पर पूरा विश्वास था और उन्हे अपने फ़िल्म के लिए चुन लिया। फ़िल्म की शूटिंग शुरु हुई और पहले ही दिन शर्मिला का शम्मी कपूर और शक्तिदा से अच्छी दोस्ती हो गई। फ़िल्म की पूरी युनिट कश्मीर पहुंची और उनका डल झील के ७ या ८ 'हाउस बोट्स' में ठहरने का इंतज़ाम हुआ। युनिट के बाक़ी लोगों के लिए शहर के होटलों में व्यवस्था की गई। लेकिन लगातार बारिश होने की वजह से पहले १५ दिनों तक कोई शूटिंग नहीं हो पायी। शक्तिदा के अनुसार उन १५ दिनों में वे लोग डल झील में मछलियाँ पकड़ा करते थे। है ना मज़ेदार बात इस फ़िल्म से जुड़ी हुई! इस फ़िल्म के गीतों के बारे में कुछ कहने की शायद ज़रूरत ही नहीं है, बस इतना कहूँगा कि 'हावड़ा ब्रिज' के बाद ओ.पी. नय्यर एक बार फिर लौटे शक्तिदा के फ़िल्म में और ज़बरदस्त तरीके से लौटे। तो आइए आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में रिवाइव करें इसी फ़िल्म के एक बड़े ही ख़ूबसूरत को। फ़िल्म के लिए इसे आशा जी ने गाया था और गीतकार थे एस.एच. बिहारी।

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत - बलमा खुली हवा में...
कवर गायन - कुहू गुप्ता




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कुहू गुप्ता
कुहू गुप्ता पेशे से पुणे में कार्यरत एक सॉफ्टवेर इंजिनियर हैं लेकिन इनका संगीत के साथ लगाव बचपन से ही रहा है. कहा जा सकता है कि इन्हें भगवान ने एक मधुर आवाज़ से नवांजा है और इनकी कोशिश यही है कि अपनी गायकी को हर दिन बेहतर बनाती जाएँ. इन्होने हिन्दुस्तानी शाश्त्रीय संगीत कि शिक्षा ११ साल की उम्र से शुरू की और ४ साल तक सीखा. ज़ी टीवी के मशहूर प्रोग्राम सारेगामापा में ये २ बार अपनी गायकी दिखा चुकी हैं. इन्होने कुछ मूल रचनाएँ भी गई हैं, जिनमे से एक हिंद युग्म के काव्य नाद एल्बम का हिस्सा है और कुछ व्यावसायिक तौर पर इस्तेमाल हुई हैं. इनके गाये हुए हिन्दी फिल्मों के गानों के कवर्स आज कल इन्टरनेट डेक्कन रेडियो पर भी सुनाये जा रहे हैं. इन सब के साथ साथ ये स्टेज शोव्स भी करती हैं.


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

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ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

सोमवार, 3 मई 2010

मादक गीतों में जब घुलती थी आशा की नशीली आवाज़ तो रवानगी कुछ और ही होती थी

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # १३

क्योंकि आज रिवाइवल हो रहा है एक ऐसे गीत का जो उपज है आशा भोसले, ओ.पी. नय्यर और मजरूह सुल्तानपुरी के तिकड़ी की, तो यह गीत सुनवाने से पहले हो जाए कुछ बातें नय्यर साहब से जुड़ी हुई! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की कड़ी नंबर ३२४ में नय्यर साहब से की गई विविध भारती टीम के मुलाक़ात का अंश हमने प्रस्तुत किया था। आज उसी का दोहराव...

अहमद वसी: वक़्त चलता हुआ, चलता हुआ, कभी ना कभी आपको इस उमर पे लाता होगा जहाँ यह गुज़रा हुआ ज़माना जो है, ये गरदिशें जो हैं, ये अक्सर परछाइयाँ बन के चलती रहती हैं। तो क्या आप समझते हैं कि जो वक़्त गुज़रा वो बड़ा सुनहरा वक़्त था?

ओ. पी. नय्यर: वसी साहब, एक तो मैंने आप से अर्ज़ की कि मेरी ज़िंदगी का 'aim and inspiration have been an woman'. अगर उसके अंदर ७०% स्वीट मिली है तो बाक़ी के ३०% अगर मिर्ची भी लगी है तो ३०% मिर्ची में क्यों चिल्लाते हो बेटा, 'you have enjoyed your life, I have loved you, what else do you want'

यूनुस ख़ान: नय्यर साहब, जब आपकी युवावस्था के दिन थे, जब आप कुछ करना चाह रहे थे, तो आपके अंदर का एक अकेलापन ज़रूर रहा होगा आपकी जवानी के दिनों में।

नय्यर: मैं बार बार कई दफ़ा बता चुका हूँ कि मैं सड़कों पे अकेला रोया करता था 'alone in the nights and for no reason'। एक दफ़ा तो हमको मार पड़ी, मैंने बोला हम आपके बेटे ही नहीं हैं, मेरे माँ बाप तो कोई और हैं। बहुत पिटाई हुई, 'But they could not understand the loneliness in me'। हमने धोखा खाया तो पुरुषों से खाया है, औरतों ने धोखा नही दिया है। मेरी ज़िंदगी में कई औरतें रहीं जिनके साथ बड़ा मेरा दिल खोल के बात होती थी, और वो 'this was about when I was 19 years old'। लाहोर में। मैंने उसको २१.५ बरस तक छोड़ा। बड़े हसीन दिन थे वो, क्योंकि एक तो मुझे लाहोर शहर पसंद था, और मेरी जो 'romantic life' शुरु हुई वो लाहोर से हुई।

कमल शर्मा: आपकी जो शादी थी वो अरेन्ज्ड थी या...

नय्यर: 'that was a love marriage'।

यूनुस: नय्यर साहब, बात लाहोर की चल रही थी, आप ने कहा आपकी 'romantic life' वहाँ से शुरु हुई, किस तरह से आप मिलते थे और किस तरह से अपनी बातें करते थे?

नय्यर: यूनुस साहब, पब्लिक में थोड़े मिलेंगे! हम तो कोना ढ़ूंढते थे कि अलग जगह बैठ के बातें करने का मौका मिले। या उसी लड़की के घर ही चले जाते थे।

यूनुस: आप ने कभी किसी को प्रेम पत्र लिखा?

नय्यर: कमाल है कि मेरे पास चिट्ठियाँ रहीं, पर मैं चिट्ठियाँ लिखने के लिए 'I feel bored'. जो कुछ कहना था अपने ज़बान से कह दिया जी।

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गीत - ये है रेशमी जुल्फों का अँधेरा...
कवर गायन - कुहू गुप्ता




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कुहू गुप्ता पेशे से पुणे में कार्यरत एक सॉफ्टवेर इंजिनियर हैं लेकिन इनका संगीत के साथ लगाव बचपन से ही रहा है. कहा जा सकता है कि इन्हें भगवान ने एक मधुर आवाज़ से नवांजा है और इनकी कोशिश यही है कि अपनी गायकी को हर दिन बेहतर बनाती जाएँ. इन्होने हिन्दुस्तानी शाश्त्रीय संगीत कि शिक्षा ११ साल की उम्र से शुरू की और ४ साल तक सीखा. ज़ी टीवी के मशहूर प्रोग्राम सारेगामापा में ये २ बार अपनी गायकी दिखा चुकी हैं. इन्होने कुछ मूल रचनाएँ भी गई हैं, जिनमे से एक हिंद युग्म के काव्य नाद एल्बम का हिस्सा है और कुछ व्यावसायिक तौर पर इस्तेमाल हुई हैं. इनके गाये हुए हिन्दी फिल्मों के गानों के कवर्स आज कल इन्टरनेट डेक्कन रेडियो पर भी सुनाये जा रहे हैं. इन सब के साथ साथ ये स्टेज शोव्स भी करती हैं.


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

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ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

किस अदा से ज़ीनत का दूँ हर शै को पता- पाँचवा ताज़ा गीत

Season 3 of new Music, Song # 05

आवाज़ के लिए शुक्रवार का मतलब होता है बिलकुल ताज़ा। खुद के लिए और श्रोताओं के लिए ताज़े संगीत से सजे एक गीत को प्रस्तुत करना। संगीतबद्ध गीतों का तीसरा सत्र जो हमारे बिना किसी प्रयास के नये संगीतकारों-गायकों-लेखकों में आवाज़ महोत्सव 2010 के रूप में जाना जाने लगा है, में अब तक 4 नये गीत रीलिज हो चुके हैं। पाँचवें गीत के माध्यम से हम एक बिल्कुल नया संगीतकार सतीश वम्मी आवाज़ की दुनिया को दे रहे हैं। इस गीत के रचयिता आवाज़ के जाने-माने स्तम्भकार हैं जो किसी एक ग़ज़ल पर इतनी चर्चा करते हैं कि इंटरनेट पर कहीं एक जगह इतना-कुछ मिलना लगभग असम्भव है। गीत की आत्मा यानी गायिका कुहू गुप्ता 'जो तुम आ जाते एक बार' और 'प्रभु जी' से श्रोताओं के दिल में निवास करने लगी हैं।

गीत के बोल -

मुखड़ा :

होठों को खोलूँ न खोलूँ, बता,
आँखों से बोलूँ न बोलूँ, बता,
साँसों की भीनी-सी खुशबू को मैं,
बातों में घोलूँ न घोलूँ, बता..

तू बता मैं किस अदा से
ज़ीनत का दूँ हर शै को पता..
तू बता जो इस फ़िज़ा को
ज़ीनत सौंपूँ तो होगी ख़ता?

होठों को खोलूँ न खोलूँ, बता,
आँखों से बोलूँ न बोलूँ, बता,
साँसों की भीनी-सी खुशबू को मैं,
बातों में घोलूँ न घोलूँ, बता..

अंतरा 1:

है ये मेरे तक हीं,
ज़ीनत है ये किसकी
आखिर तेरा है जादू छुपा...

मैं तो मानूँ मन की
ज़ीनत जो है चमकी
आखिर तेरी हीं है ये ज़िया...

तू जाने कि तूने हीं दी है मुझे,
ये ज़ीनत कि जिससे मेरा जी सजे,
तो क्यों ना मेरा जी गुमां से भरे?
तो क्यों ना मैं जी लूँ उड़ा के मज़े?

हाँ तो मैं हँस लूँ न हँस लूँ, बता,
फूलों का मस्स लूँ न मस्स लूँ, बता,
धीरे से छूकर कलियाँ सभी,
बागों से जश लूँ न जश लूँ बता..

अंतरा 2:

यूँ तो फूलों पर भी,
ज़ीनत की लौ सुलगी,
लेकिन जी की सी ज़ीनत कहाँ?

जैसे हीं रूत बदली,
रूठी ज़ीनत उनकी,
लेकिन जी की है ज़ीनत जवाँ..

जो फूलों से बढके मिली है मुझे,
ये ज़ीनत जो आँखों में जी में दिखे,
तो क्यों ना मैं बाँटूँ जुबाँ से इसे?
तो क्यों ना इसी की हवा हीं चले?

हाँ तो मैं हँस लूँ न हँस लूँ, बता,
फूलों का मस्स लूँ न मस्स लूँ, बता,
धीरे से छूकर कलियाँ सभी,
बागों से जश लूँ न जश लूँ बता..

तू बता मैं गुलसितां से
ज़ीनत माँगूँ या कर दूँ अता....



मेकिंग ऑफ़ "ज़ीनत" - गीत की टीम द्वारा

सतीश वम्मी: "ज़ीनत" इंटरनेट की जुगलबंदी से बनाया मेरा पहला गाना है। इस गाने से न सिर्फ़ हम तीन लोग जुड़े हैं बल्कि तीन और लोगों का इसमें बहुत महत्वपूर्ण हाथ है: के के (गिटार, विशाखापत्तनम), श्रीकांत (बांसुरी, चेन्नई), शंपक (मिक्सिंग इंजीनियर, कोलकाता)। मैंने इन तीनों का साथ की-बोर्ड पर दिया है। बदकिस्मती है कि मैं अपनी टीम में से किसी से नहीं मिला हूँ, लेकिन आने वाले समय में इनसे जरूर मिलना चाहूँगा। मुझे याद है कि मैंने पहला डेमो जब विश्व को भेजा था तो उसमें अंतरा नहीं था। हमने सोचा कि हम पूरे गाने में केवल मुखड़े के ट्युन को नए शब्दों के साथ दुहराते रहेंगे। लेकिन जब विश्व ने मुझे इस गाने का मूल-भाव (थीम) बताया (ज़ीनत = आंतरिक और बाह्य... दोनों तरह की सुंदरता) तो मुझे लगा कि इस गाने को और भी खूबसूरत बनाया जा सकता है और फिर हमने इसमें दो अंतरे जोड़े। विश्व को धुन(गाने की ट्युन) की बारीकियों की अच्छी खासी समझ है और वे हर बार ऐसे शब्द इस्तेमाल करते हैं जो धुन पर पूरी तरह से फिट आते हैं। कुहू की गायकी का मैं पहले से हीं कायल रहा हूँ, मैंने उनके गाने मुज़िबू पर सुने थे, लेकिन कभी उनसे बात नहीं हुई थी। मुझे आज भी याद है कि जब मैंने और विश्व ने ये निर्णय लिया था कि यह गाना कुहू हीं गाएँगी तो मैं उनकी हाँ सुनने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था। मैं इससे ज्यादा क्या कहूँ कि कुहू ने इस गाने को एक नई ऊँचाई दी है। मुझे उम्मीद है कि आप सबों को हमारा यह प्रयास पसंद आएगा।

कुहू गुप्ता: सतीश के साथ ये मेरा पहला गाना है और हमेशा याद रहेगा. इनका परिचय मुझे विश्व ने करवाया जब सतीश उनके फीमेल सोलो गाने के लिए आवाज़ तलाश रहे थे. विश्व के साथ में पहले बहुत गाने कर चुकी हूँ लेकिन इस बार टीम में सतीश नए थे. हमेशा की तरह शुरू में उनसे बातचीत बहुत ही औपचारिक तौर पर हुई लेकिन जल्दी ही गाने पर साथ काम करते हुए हमें मज़ा आने लगा. जीनत एक बहुत ही सुन्दर रचना है जिसे आँखें बंद करके सुना जाए तो मन को शान्ति का अनुभव होता है. इस सुन्दर रचना को और मज़बूत बनाने के लिए विश्व की कलम ने बखूबी साथ दिया. इस गाने के शब्द मुश्किल ज़रूर हैं लेकिन जैसा कि गाने का नाम है जीनत यानी खूबसूरती, एक एक शब्द बहुत ही खूबसूरती से चुना गया है. अभी तक जितनी भी मूल रचनाएँ मैंने कि हैं उसमे से ये गाना मुझे इसलिए ख़ास याद रहेगा क्योकि ये पहला ऐसा गाना था जिसका अरेंजमेंट मेरे गाना गाने के बाद पूरा हुआ, जिसे मैं मज़ाक में रहमान स्टाइल कहती हूँ. अरेंजमेंट और गायन दोनों ही साथ साथ विकसित हुए जो मेरे लिए एक नया अनुभव था. इस गीत में हमेशा की तरह प्रयोग किये जाने वाले synthesizer के अलावा लाइव बांसुरी और गिटार का भी प्रयोग किया गया है जो गीत की खूबसूरती को और निखारता है।

विश्व दीपक: भले हीं यह लगे कि सतीश जी के साथ "ज़ीनत" मेरा पहला गाना है। लेकिन सच्चाई तो यह है कि किसी और गाने के बीच में "ज़ीनत" की धुन निकल आई थी। दर-असल सतीश जी के पास बरसों से एक ट्युन पड़ी थी जिसे उन्होंने "डियर लिरिसिस्ट" नाम दिया था। उन्हें इस ट्युन के लिए किसी हिन्दी-गीतकार की ज़रूरत थी। सतीश जी ने मुझे मुज़िबू पे ढूँढा और मैंने उनकी यह धुन ढूँढ ली। मैंने कहा कि हाँ मैं लिखूँगा। फिर इस तरह से हमारा "बेशक" (अगला गाना जो इस गाने के बाद रीलिज होने वाला है) बनके तैयार हुआ। तब तक हमने यह सोचा नहीं था कि यह गाना किसे देना है , उसी बीच सतीश जी "ज़ीनत" की ट्युन लेकर हाज़िर हुएँ और हम "बेशक" को रोक कर "ज़ीनत" में जुड़ गए। गाना जब आधा हुआ तभी सतीश जी ने पूछा कि आपके लिए "मन बता" जिन्होंने गाया है वो हमारा यह गाना गाएँगी। मैंने कहा कि मैं उनसे बात कर लेता हूँ और मुझे पक्का यकीन है कि वो ना नहीं कहेंगीं। फिर मैंने कुहू जी से बात की और कुहू जी ने लिरिक्स पढने और ट्युन सुनने के बाद हामी भर दी। फिर क्या था गाने पर काम शुरू हो गया और महज़ ७ या फिर १० दिनों में गाना बनकर तैयार भी हो गया। यह होली के आस-पास की घटना है। अब आप सोचेंगे कि गाना जब तभी हो गया था तो इतनी देर कहाँ लगी तो इसमें सारा दोष सतीश जी का(कुछ हद तक शंपक का भी, जो गाने की मिक्सिंग को परफ़ेक्ट करने में लगे थे) है :) वे अपने गाने से संतुष्ट हीं नही होते और इस गाने को अंतिम रूप देने में उन्होंने डेढ महीना लगा दिया। खैर कोई बात नहीं... वो कहते हैं ना कि इंतज़ार का फल मीठा होता है तो हमें इसी मीठे फल का इंतज़ार है। उम्मीद करता हूँ कि "न हम आपको निराश करेंगे और न आप हीं हमें निराश करेंगे।"

सतीश वम्मी
सतीश वम्मी मूलत: विशाखापत्तनम से हैं और इन दिनों कैलिफ़ोर्निया में रहते हैं। बिजनेस एवं बायोसाइंस से ड्युअल मास्टर्स करने के लिए इनका अमेरिका जाना हुआ। 2008 में डिग्री हासिल करने के बाद से ये एक बहुराष्ट्रीय बायोटेक कम्पनी में काम कर रहे हैं। ये अपना परिचय एक संगीतकार के रूप में देना ज्यादा पसंद करते हैं लेकिन इनका मानना है कि अभी इन्होंने संगीत के सफ़र की शुरूआत हीं की है.. अभी बहुत आगे जाना है। शुरू-शुरू में संगीत इनके लिए एक शौक-मात्र था, जो धीरे-धीरे इनकी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा बनता जा रहा है। इन्होंने अपनी पढाई के दिनों में कई सारे गाने बनाए जो मुख्यत: अंग्रेजी या फिर तेलगु में थे। कई दिनों से ये हिन्दी में किसी गाने की रचना करना चाहते थे, जो अंतत: "ज़ीनत" के रूप में हम सबों के सामने है। सतीश की हमेशा यही कोशिश रहती है कि इनके गाने न सिर्फ़ औरों से बल्कि इनके पिछले गानों से भी अलहदा हों और इस प्रयास में वो अमूमन सफ़ल हीं होते हैं। इनके लिए किसी गीत की रचना करना एक नई दुनिया की खोज करने जैसा है, जिसमें आपको यह न पता हो कि अंत में हमें क्या हासिल होने वाला है, लेकिन रास्ते का अनुभव अद्भुत होता है।


कुहू गुप्ता
पुणे में रहने वाली कुहू गुप्ता पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। गायकी इनका जज्बा है। ये पिछले 6 वर्षों से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले रही हैं। इन्होंने राष्ट्रीय स्तर की कई गायन प्रतिस्पर्धाओं में भाग लिया है और इनाम जीते हैं। इन्होंने ज़ी टीवी के प्रचलित कार्यक्रम 'सारेगामा' में भी 2 बार भाग लिया है। जहाँ तक गायकी का सवाल है तो इन्होंने कुछ व्यवसायिक प्रोजेक्ट भी किये हैं। वैसे ये अपनी संतुष्टि के लिए गाना ही अधिक पसंद करती हैं। इंटरनेट पर नये संगीत में रुचि रखने वाले श्रोताओं के बीच कुहू काफी चर्चित हैं। कुहू ने हिन्द-युग्म ताजातरीन एल्बम 'काव्यनाद' में महादेवी वर्मा की कविता 'जो तुम आ जाते एक बार' को गाया है, जो इस एल्बम का सबसे अधिक सराहा गया गीत है। इस संगीत के सत्र में भी यह इनका तीसरा गीत है।

विश्व दीपक 'तन्हा'
विश्व दीपक हिन्द-युग्म की शुरूआत से ही हिन्द-युग्म से जुड़े हैं। आई आई टी, खड़गपुर से कम्प्यूटर साइंस में बी॰टेक॰ विश्व दीपक इन दिनों पुणे स्थित एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। अपनी विशेष कहन शैली के लिए हिन्द-युग्म के कविताप्रेमियों के बीच लोकप्रिय विश्व दीपक आवाज़ का चर्चित स्तम्भ 'महफिल-ए-ग़ज़ल' के स्तम्भकार हैं। विश्व दीपक ने दूसरे संगीतबद्ध सत्र में दो गीतों की रचना की। इसके अलावा दुनिया भर की माँओं के लिए एक गीत को लिखा जो काफी पसंद किया गया।
Song - Zeenat
Voices - Kuhoo Gupta
Music - Satish Vammi
Lyrics - Vishwa Deepak
Graphics - Samarth Garg


Song # 05, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

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