Showing posts with label sunidhi chauhaan. Show all posts
Showing posts with label sunidhi chauhaan. Show all posts

Friday, September 1, 2017

गीत अतीत 28 || हर गीत की एक कहानी होती है || बखेड़ा / हंस मत पगली || विक्की प्रसाद || सिद्धार्थ गरिमा || सुखविंदर सिंह || सुनिधि चौहान || अक्षय कुमार

Geet Ateet 28
Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai...
Bakheda
Toilet Ek Prem Katha 
Vickey Prasad
Also featuring Sidharth-Garima, Sukhvinder Singh & Sunidhi Chauhan


"जब मैंने अपनी नानी को देखा कि पिछले तीन चार साल में वो कुछ और बूढी हो गयीं है, तब मैंने अपने आप से पुछा कि अब नहीं तो कब ?... " -    विक्की प्रसाद 

टॉयलेट एक प्रेम कथा के माध्यम से एक ज़रूरी सन्देश दर्शकों तक पहुँचाने की कोशिश की गयी है, फिल्म की सफलता में फिल्म के मधुर संगीत का भी बड़ा योगदान है. युवा संगीतकार विक्की प्रसाद ने आजकल के चालू ट्रेंड से हटकर फिल्म की पृठभूमि के अनुसार इसके गीतों को रचा है, सुनते हैं विक्की प्रसाद से इसी फिल्म के दो सबसे लोकप्रिय गीत "बखेड़ा" और "हंस मत पगली" के बनने की कहानी. प्ले पर क्लिक करें और सुने अपने दोस्त अपने साथी सजीव सारथी के साथ आज का एपिसोड.



डाउनलोड कर के सुनें यहाँ से....

सुनिए इन गीतों की कहानियां भी -
हौले हौले (गैर फ़िल्मी सिंगल)
कागज़ सी है ज़िन्दगी (जीना इसी का नाम है) 
बेखुद (गैर फ़िल्मी सिंगल)
इतना तुम्हें (मशीन) 
आ गया हीरो (आ गया हीरो)
ये मैकदा (गैर फ़िल्मी ग़ज़ल)
पूरी कायनात (पूर्णा)
दम दम (फिल्लौरी)
धीमी (ट्रैपड) 
कारे कारे बदरा (ब्लू माउंटेन्स)
रेज़ा रेज़ा (सलाम मुंबई)

Tuesday, February 8, 2011

पिया न रहे मन-बसिया..रंगरेज से दर्द-ए-दिल बयां कर रहे हैं "तनु वेड्स मनु" के संगीतकार कृष्णा ,गीतकार राजशेखर

Taaza Sur Taal (TST) - 05/2011 - TANU WEDS MANU

"तनु वेड्स मनु".. यह नाम सुनकर आपके मन में कोई भी उत्सुकता उतरती नहीं होगी, इसका मुझे पक्का यकीन है। मेरा भी यही हाल था। एक बेनाम-सी फिल्म, अजीबो-गरीब नाम और अजीबो-गरीब जोड़ी मुख्य-पात्रों की। "माधवन" और "कंगना".. मैं अपने सपने में भी इस जोड़ी की कल्पना नहीं कर सकता था..। लेकिन एक दिन अचानक इस फिल्म की कुछ झलकियाँ यू-ट्युब पर देखने को मिलीं. हल्की-सी उत्सुकता जागी और जैसे-जैसे दृश्य बढते गए, मैं इस "बेढब"-सी अजबनी दुनिया से जुड़ता चला गया। झलकियाँ का ओझल होना था और मैं यह जान चुका था कि यह फिल्म बिन देखे हीं नकार देने लायक नहीं है। कुछ तो अलग है इसमें और इन्हीं दृश्यों के बीच जब "कदी साडी गली पुल (भुल) के भी आया करो" के बीट्स ढोलक पर कूदने लगे तो जैसे मेरे कानों ने पायल बाँध लिये और ये दो नटखट उचकने लगे अपनी-अपनी जगहों पर। फिर तो मुझे समझ आ चुका था कि ऐंड़ी पर खड़े होकर मुझे इस फिल्म के गानों की बाट जोहनी होगी। फिर भी मन में एक संशय तो ज़रूर था कि "कदी साडी गली".. ये गाना तो पुराना है और जब एक पुराने गाने के सहारे फिल्म का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है तो मुमकिन है कि "ओरिजनल गानों" में कोई दम न हो। लेकिन मैं दुआ कर रहा था कि मेरा शक़ गलत निकले और मेरी दुआ बहुत हद तक कामयाब हुई, इसकी मुझे बेहद खुशी है।

लेम्बर हुसैनपुरी के गाए "कदी साडी गली" में अजब का नशा है। ढोल के बजते हीं पाँव खुद-ब-खुद थिरकने लगते हैं। फिल्म में आने से पहले यह गाना जिस मुकाम पर था, आर०डी०बी० ने रीमिक्स करके उस मुकाम को कुछ और ऊपर कर दिया है। पंजाबी भांगड़ों की तो वैसे हीं धूम और धुन गजब की होती है, लेकिन कई मर्तबा एक तरह के हीं बीट्स इस्तेमाल होने के कारण मज़ा जाता रहता है। अच्छी बात यह है कि इस गाने में नयापन है। बस यही उम्मीद करता हूँ कि यह गाना फिल्म के कथानक को आगे बढाने में मदद करेगा और ठूंसा हुआ-सा नहीं दिखेगा।

फिल्म का पहला गाना हीं आर०डी०बी० का? लेकिन आर०डी०बी० तो बस एक हिप-हॉप या डांस-मस्ती गाने के लिए फिल्म में लाए जाते हैं यानि कि हर फिल्म में इनका बस एक हीं गाना होता है। "तब तो कोई न कोई दूसरा संगीतकार हीं इस फिल्म की नैया को अपने गानों के पतवार और चप्पु के सहारे पार लगाएगा और अगर गाने अच्छे करने हैं तो निर्देशक(आनंद एल राय) कोई जाने-माने संगीतकार को हीं यह बागडोर सौपेंगे ताकि बुरे गानों के कारण फिल्म की लुटिया न डूब जाए..." यही सोच रहे हैं ना आप? अमूमन हर किसी की यही सोच होती है। कोई भी नए संगीतकारों पर एकबारगी भरोसा नहीं कर पाता.. और अगर कोई फिल्म किसी निर्देशक की पहली फिल्म हो तब तो हर एक सुलझे इंसान की यही सलाह होती है कि भाई फिल्म में लगा पैसा निकालना हो तो रिस्क मत लो, सेफ़ खेलो और किसी नामी संगीतकार से गाने तैयार करवा लो ताकि फिल्म भले पिट जाए लेकिन गाने हिट हो जाएँ।

यहीं पर आपसे चूक हो गई। हाँ, लेकिन आनंद साहब ने कोई चूक नहीं की। इन्होंने न सिर्फ़ खुद कुछ नया करने का बीड़ा उठाया, बल्कि अपने साथ-साथ गीत और संगीत में भी नए मोहरे सजाकर पूरी की पूरी बाजी हीं रोमांचक कर दी। नया गीतकार, नया संगीतकार.. चलेंगे तो सब साथ, ढलेंगे तो सब साथ, लेकिन इस बात की तो खुशी होगी कि "फिल्म इंडस्ट्री" के दबाव के आगे झुकना नहीं पड़ा, जो दिल में आया वही किया। तो आईये हम सब स्वागत करते हैं संगीतकार "कृष्णा" (Krsna) एवं गीतकार "राजशेखर" का।

ये कृष्णा कौन हैं, ये राजशेखर पहले किधर थे, इन प्रश्नों का जवाब तो हम ढूँढ नहीं पाये, लेकिन इतना यकीन है कि इन दोनों की यह पहली हिन्दी-फिल्म है। और पहली हीं फिल्म में दोनों ने अपनी छाप छोड़ने की पूरी कोशिश की है।

चलिए तो इस जोड़ी के पहले गीत की बात करते हैं। "ओ रंगरेज मेरे"... इस गीत के बोल बड़े हीं खूबसूरत है। उर्दू और देसी शब्दों के इस्तेमाल से राजशेखर ने एक सूफ़ियाना माहौल तैयार किया है।

रंगरेज तूने अफ़ीम क्या है खा ली,
जो मुझसे तू है पूछे कि कौन-सा रंग?
रंगों का कारोबार है तेरा,
ये तू हीं तो जाने कि कौन-सा रंग?
मेरा बालम रंग, मेरा साजन रंग,
मेरा कातिक रंग, मेरा अगहन रंग,
मेरा फ़ागुन रंग, मेरा सावन रंग..

हद रंग दे, अनहद भी रंग दे,
मंदिर, मस्जिद, मयकद रंग..

आजा हर वसलत रंग दे,
जो आ न सके तो फ़ुरक़त रंग दे..

ऐ रंगरेज मेरे...
ये कौन-से पानी में तूने कौन-सा रंग घोला है?


"मेरे आठों पहर मनभावन रंग दे"- रंगरेज से ब़ड़ी हीं मीठी गुहार लगाई है हमारे आशिक़ ने। अब यहाँ पर रंगरेज खुदा है या फिर इश्क़ के पैरहन रंगने वाली प्रेमिका.. इसका खुलासा तो दिल की दराज़ें खोलकर हीं किया जा सकता है, लेकिन जो भी हो सबसे बड़ा रंगरेज तो खुदा हीं है और खुदा से इस तरह जुड़ने को हीं "निर्गुण" कहते हैं (हिन्दी फिल्मों में निर्गुण का सबसे बड़ा उदाहरण "लागा चुनरी में दाग" है)। जब आशिक़ यह कहता है कि "मेरा क़ातिल तू, मेरा मुंसिफ़ तू" तो चचा ग़ालिब का यह शेर याद आ जाता है:

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क, जीने और मरने का,
उसी को देखकर जीते हैं, जिस काफ़िर पर दम निकले!


इस रंगरेज के पास "कृष्णा" दो बार गए हैं एक बार अपनी हीं आवाज़ के साथ तो दूसरी बार "वडाली बंधुओं" की मंडली के साथ। यूँ तो वडाली बंधुओं (पुरनचंद वडाली एवं प्यारेलाल वडाली) पर खुदा की मेहर है (इसलिए इनकी आवाज़ों से सजी हुई हरेक नज़्म दिल को सुकून पहुँचाती है और यहाँ भी इन दोनों ने वही समां बाँधा है), लेकिन इस बार कृष्णा पर भी उस ऊपर वाले ने अपनी रहमत तारी कर दी है। दोनों हीं गाने अपनी जगह पर कमाल के बने हैं। धुन एक हीं है, इसलिए ज्यादा कुछ फ़र्क की उम्मीद भी नहीं थी। लेकिन जहाँ पर वडाली बंधु हों, वहाँ नयापन खुद-ब-खुद आ जाता है, इसलिए कृष्णा को यही कोशिश करनी थी कि वे पूरी तरह से कमजोर न पड़ जाएँ... ऐसा नहीं हुआ, यह सबके लिए अच्छी खबर है!

मोहित चौहान! यह नाम लिख देने/सुन लेने के बाद मन में किसी पहाड़ी वादी की परछाईयाँ उभर आती है और दिखने लगता है एक शख्स जो हाथ में गिटार और आँख में प्रेयसी के ख्वाब लिए पत्तों और गुंचों के बीच से चला जा जा रहा है। पहाड़ों का ठेठ अंदाज़ उसकी आवाज़ में खुलकर नज़र आता है और यही कारण है कि हर संगीतकार मोहित चौहान से "प्यार के दो मीठे बोल" गुनगुनाने की दरख्वास्त कर बैठता है। "कितने दफ़े दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफ़े" (यूँ हीं).. बोल बड़े हीं सीधे और साधारण हैं, लेकिन मोहित की आवाज़ ने इस गाने में जान डाल दी है।

"पिया न रहे मन बसिया" - रूप कुमार राठौड़ साहब को मैने पहले हज़ारों बार सुना है, लेकिन आज तक इनकी आवाज़ इस तरह की पहले कभी नहीं लगी थी, जैसी कि इस गाने में है। इनकी आवाज़ यहाँ पहचान में हीं नहीं आती। मैंने तो कई जगहों पर "शफ़कत अमानत अली" का नाम लिखा पाया था (और मैं मान भी बैठा था) , लेकिन आठ-दस विश्वस्त सूत्रों और ब्लॉगों के चक्कर लगाने के बाद मुझे यकीन करना पड़ा कि ये अपने रूप साहब हीं हैं। अपनी नई आवाज़ में वही पुराना जादू बिखेरने में ये यहाँ भी कामयाब हुए हैं। ज़रा इस गाने के बोलो पर गौर करें:

पल न कटे अब सखी रे पिया बिन,
नीम-सा कड़वा लागे दिन,
हाय! नीम-सा कड़वा लागे अब दिन,
उस पे ये चंदा हाय.. चंदा भी बना सखी सौतन कि
चंदा भी बना हाय.. सखी सौतन कि
कीसो रात मोरी अमावसिया...
मन बसंत को पतझड़ कर वो
ले गयो, ले गयो, ले गयो... रंग-रसिया


पहले फिल्म के लिहाज से राजशेखर ने बेहतरीन पंक्तियाँ गढी हैं। जहाँ इस गाने में "मन-बसिया" और "रंग-रसिया" की बात हो रही है, वहीं अगले गाने "मन्नु भैया" में "करोलबाग की गलियों", "केसर", "यमुना" और "शर्मा जी" जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके इन्होंने गाने में चार-चाँद लगा दिए हैं। नाम से हीं ज़ाहिर है कि "मन्नु भैया" की टाँग खींची जा रही है और इस खेल में सबसे आगे हैं "सुनिधि चौहान" और उनका तबले और ढोलक (मज़ाक वाले) पर संगत दे रहे हैं नीलाद्री देबनाथ, उज्जैनी मुखर्जी, राखी चाँद और विवेक नायक

अंबिया, इलायची, दालचीनी और केसर,
सुखाएगी तन्नु करोलबाग की छत पर,
तब मन्नु भैया का करिहैं..

जब दिल्ली के मिक्सर में घुट जावे कानपुर की भंग,
जब दिल्ली के ऊपर चढ जावे कानपुर का रंग,
जब क़ुतुब से भी ऊपर जावे, कानपुर की पतंग,
तब मन्नु भैया का करिहैं..


मुझे तो यह गाना बेहद पसंद आया। इस गाने में जहाँ एक तरफ़ मस्ती है, मज़ाक है, वहीं दूसरी तरफ़ शब्दों और ध्वनियों की अच्छी धमाचौकड़ी भी है। ऐसे गाने अमूमन "पुरूष-स्वर" (मेल-व्याएस) में तैयार किए जाते है, लेकिन यहाँ कृष्णा की दाद देनी होगी जो इन्होंने सुनिधि को ये गाना सौंपा और वाह! सुनिधि ने दिल खुश कर दित्ता यार ;)

फिल्म का अंतिम गाना है मिका की आवाज़ में "जुगनी"। यह गाना दूसरे "जुगनी" गानों की तरह हीं है, इसलिए कुछ अलग-सा नहीं लगा मुझे। हाँ, मिका पा जी की मेहनत झलकती है और इसमें दो राय नहीं है कि इस गाने के लिए इनसे अच्छा कोई दूसरा गायक नहीं हो सकता था, लेकिन संगीत (संगीतकार) ने इनका साथ नहीं दिया। "बीट्स" प्रेडिक्टेबल हैं.. इसलिए मज़ा रह-रहकर किरकिरा हो जाता है। मुझे किसी भी दिन (any day) "ओए लकी लकी ओए" का "जुगनी" इस "जुगनी" से ज्यादा पसंद आएगा। क्या करें! स्वाद-स्वाद की बात है :)

तो इस तरह से "तनु वेड्स मनु" के संगीत ने गुमनाम से नामचीन का सफ़र आखिरकार तय कर हीं लिया (है)।

आज की समीक्षा आपको कैसी लगी, ज़रूर बताईयेगा। चलिए तो इस बातचीत को यहीं विराम देते हैं। अगले हफ़्ते फिर मुलाकात होगी। नमस्कार!

आवाज़ रेटिंग - 7/10

सुनने लायक गीत - रंगरेज, पिया न रहे, मन्नु भैया, साडी गली

एक और बात: इस फिल्म के सारे गाने(प्रिव्यु मात्र) आप कृष्णा के ओफ़िसियल वेबसाईट पर सुन सकते हैं यहाँ:
http://krsnamusic.com/news/tanu-weds-manu-piya-sung-by-roop-kumar-rathod-or-shafqat-amanat-ali/




अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Tuesday, November 23, 2010

सुजॉय जी को शादी का तोहफ़ा देने आ गए हैं सलीम-सुलेमान और अमिताभ भट्टाचार्य "बैंड बाजा बारात" के साथ

अभी वक़्त है अपने नियमित ताज़ा सुर ताल का.. ताज़ा सुर ताल यानि कि टी एस टी, जिसके मेजबान मुख्य रूप से सुजॉय जी हुआ करते हैं। मुख्य रूप से इसलिए कहा क्योंकि हर मंगलवार के दिन समीक्षा के दौरान उनसे बातचीत होती है, अब ये बातचीत मैं करूँ या फिर सजीव जी करें... पिछली मर्तबा ये बागडोर सजीव जी ने संभाली थी और उसके पहले कई हफ़्तों तक बातचीत का वो सिरा मेरे हाथ में था.. लेकिन दूसरा सिरा हमेशा हीं सुजॉय जी थामे रहते हैं। आज के दिन और आज के बाद दो-तीन और हफ़्तों तक स्थिति अलग-सी रहने वाली है। ऐसा इसलिए है क्योंकि सुजॉय जी घर गए हुए हैं.. अपनी ज़िंदगी के उस सिरे को संभालने जिसका दूसरा सिरा उनकी अर्धांगिनी के हाथों में है। जी हाँ, कल हीं सुजॉय जी की शादी थी। शादी बड़ी धूमधाम से हुई और होती भी क्यों नहीं, जब हम सब दोस्तों और शुभचिंतकों की दुआएँ उनके साथ थीं। हम सब तक की तरफ़ से सुजॉय जी को शादी की शुभकामनाएँ, बधाईयाँ एवं बहुत-बहुत प्यार .. (बड़ों की तरफ़ से आशीर्वाद भी).. हम नहीं चाहते थे कि इन मंगल घड़ियों में उन्हें थोड़ा भी तंग किया जाए, इसलिए कुछ हफ़्तों तक ताज़ा सुर ताल मैं अकेले हीं (या फिर कभी-कभार सजीव जी के साथ) हीं संभालने वाला हूँ। आपसे उसी प्रोत्साहन की उम्मीद रहेगी, जो सुजॉय जी को हासिल होती है। धन्यवाद! चलिए तो इन्हीं बातों के साथ आज की समीक्षा का शुभारंभ करते हैं।

इसे इत्तेफ़ाक़ हीं कहेंगे कि शादी की बातें करते-करते हम जिस फिल्म की समीक्षा करने जा रहे हैं, वह फिल्म भी शादियों को हीं ध्यान में रख कर बनी है। यशराज बैनर्स के तहत आने वाली इस फिल्म का निर्देशन किया है मनीष शर्मा ने, कहानी भी उन्हीं की है, जबकि पटकथा लिखी है हबीब फैजल ने। फिल्म के मुख्य कलाकार हैं अनुष्का शर्मा और रणवीर सिंह। फिल्म १० दिसम्बर २०१० को रीलिज होने वाली है। इस फिल्म में संगीत है पार्श्व-संगीत के दम पर हिन्दी-फिल्मों में अपनी पहचान बनाने वाले "सलीम-सुलेमान" बंधुओं का और गीत लिखे हैं "अमित त्रिवेदी" के खासम-खास "अमिताभ भट्टाचार्य" ने (देव-डी, उड़ान)।

फिल्म का पहला गाना है "ऐं वैं.. ऐं वैं".. आवाज़ें हैं सलीम मर्चैंट और सुनिधि चौहान की। गाने की धुन ऐसी है कि पहली बार में हीं आपके मन पर छा जाए और संयोजन भी कमाल का है। गीत सुनकर डान्स-फ्लोर पर उतरने को जी करने लगता है। चूंकि गाने के माध्य्म से पंजाबी माहौल तैयार किया गया है, इसलिए पार्श्व में बैंजो और बांसुरी को आराम से महसूस किया जा सकता है। अमिताभ के बोल बाकी नियमित पंजाबी गानों (भांगड़ा) से काफी अलग हैं। "चाय में डुबोया बिस्किट हो गया" या फिर "गुड़ देखा, मक्खी वहीं फिट हो गया".. जैसी पंक्तियाँ विरले हीं सुनने को मिलती है। मुझे यह गाना बेहद भाया। इस गाने का एक "दिल्ली क्लब मिक्स" भी है, जिसमें मास्टर सलीम ने सलीम मर्चैंट का स्थान लिया है। मास्टर सलीम के आने से "माँ दा लाडला" वाली फिलिंग आ जाती है। थोड़ी कोशिश करने पर आप आवाज़ में इस परिवर्तन को महसूस कर सकते हैं। दोनों हीं गाने अच्छे हैं।

गीत - ऐं वैं


गीत - ऐं वैं (दिल्ली क्लब मिक्स)


अब बढते हैं अगले गाने की ओर। यह गाना है "तरकीबें", जिसे गाया है बेन्नी दयाल ने और उनका बेहतरीन तरीके साथ दिया है सलीम मर्चैंट ने। सलीम-सुलेमान और बेन्नी दयाल की जोड़ी "पॉकेट में रॉकेट" के बाद एक बार फिर साथ आई है। कहीं कहीं यह गाना उसी गाने का एक्सटेंशन लगता है। बेन्नी दयाल एक बार फिर सफल हुए हैं, अपनी आवाज़ का जादू चलाने में। लेकिन मेरे हिसाब से इस गाने की सबसे खूबसूरत बात है, इसके बोल। "अनकन्वेशनल राईटिंग" की अगर बात आएगी, तो इस गाने को उसमें जरूर शुमार किया जाएगा। "कंघी हैं तरकीबें" या फिर "हौसलें सेंक ले" जैसे विचार आपको सोचने पर और सोचकर खुश होने पर मजबूर करते हैं।

गीत - तरकीबें


अगला गाना है "श्रेया घोषाल" की आवाज़ में "आधा इश्क़"। आजकल यह कहावत चल पड़ी है कि श्रेया कभी गलत नहीं हो सकती और श्रेया का गाया गाना कभी बुरा नहीं हो सकता। तो फिर "आधा इश्क़" को खूबसूरत होना हीं है। कुछ लोग इसलिए परेशान हैं कि "आधा इश्क़" भी कुछ होता है क्या?.. उन लोगों को शायद यह पता नहीं कि एकतरफ़ा इश्क़ तो आधा हीं हुआ ना.. यह मेरा ख्याल है, लेकिन ख्याल कोई भी हो.. जब ज़िंदगी "दस ग्राम" की हो सकती है तो इश्क़ "आधा" क्यों नहीं हो सकता। क्या कहते हैं आप लोग?

गीत - आधा इश्क़


चलिए तो बात को आगे बढागे हुए एलबम के चौथे गाने की ओर आते हैं। यह गाना है बेन्नी दयाल और हिमानी कपूर की आवाज़ो में "दम-दम"। इस गाने को सुनने के बाद मुझे यही लगा कि सलीम-सुलेमान ने "दम" भरे गाने के लिए बेन्नी को चुनकर गलती कर दी। गाने में जब तक अंतरा नहीं आता, तब तक दम जैसी कोई बात हीं नज़र नहीं आती। अब जबकि इस गाने को एक आईटम सॉंग जैसा होना है तो आवाज़ से भी वो जोश झलकना चाहिए ना। अंतरे के पहले (यानि कि मुखरे में) धुन भी थोड़ी सुस्त है। अंतरे में यह गाना जोर पकड़ता है, लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है। "दम-दम" में दम नहीं है मेरे भाई!! "दम-दम" का एक सूफ़ी-मिक्स है जिसे सुखविंदर ने गाया है.. सभी जानते हैं कि "जोश" का दूसरा नाम है "सुखविंदर" और ऊपर से मिक्स यानि कि "पेसी ट्युन" तो सूफ़ी-मिक्स हर मामले में बढिया है "दम-दम" से। मेरी यही चाहत है कि फिल्म में "सूफ़ी-मिक्स" हो, तभी मज़ा आएगा।

गीत - दम दम


गीत - दम दम (सूफ़ी मिक्स)


अगले गाने "मितरा" में गायकी की कमान संभाली है खुद अमिताभ भट्टाचार्य ने और उनका साथ दिया है सलीम मर्चैंट ने। यह गाना हर मामले में बेहतरीन है। इस गाने में "अमित त्रिवेदी" की झलक मिलती है, शायद इसीलिए अमिताभ भी माईक के पीछे आने को राजी हुए हैं। सलीम की आवाज़ हर तरह के गाने में काम करती है, इसलिए वे यहाँ भी अपना असर छोड़ जाते हैं। मितरा के बाद बारी है एक नियमित भांगड़े की, जो हर पंजाबी शादी के लिए एक रस्म-सा माना जाता है। लेकिन यह भांगड़ा दूसरे पंजाबी भांगड़ों से थोड़ा अलग है। इस भांगड़े का नाम यूँ तो "बारी बरसी" हीं है, लेकिन इसमें "खट के" कोई हीर या रांझा नहीं लाते, बल्कि "पिज़्ज़ा" , "गोंद" और "खजूर" लाते हैं। इस गाने को सुनकर आप अपने पेट और मुँह पर हाथ रखकर "हँसी" रोकने की कोशिश करेंगे तो वहीं अपनी कदमों को काबू में रखकर यह कोशिश करेंगे कि कहीं "नाच न निकल जाए"। चूँकि यह गाना मस्ती के लिए बना है और एक नियमित पैटर्न पर बना है, इसलिए इसे अच्छा या खराब निर्धारित करने का कोई तुक नहीं बनता। चलिए तो अब सुनते हैं "मितरा" और "बारी बरसी"।

गीत - मितरा


गीत - बारी बरसी


कुल मिलाकर मुझे "सलीम-सुलेमान" की यह पेशकश अच्छी लगी। आप इस समीक्षा से कितना इत्तेफ़ाक़ रखते हैं, यह ज़रूर बताईयेगा। अगली बार मिलने के वादे के साथ आपका यह दोस्त आपसे विदा लेता है। चलते-चलते इस फिल्म का "थीम सॉंग" सुन लेते हैं, जिसे गाया है सलीम मर्चैंट और श्रद्धा पंडित ने। छोटा-सा गाना है, लेकिन चूँकि यह थीम है तो मेरे हिसाब से फिल्म में एक से ज्यादा बार बजेगा जरूर।



आवाज़ की राय में

चुस्त-दुरुस्त गीत: तरकीबें और मितरा

लुंज-पुंज गीत: दम-दम

Tuesday, November 2, 2010

ऐक्शन रिप्ले के सहारे इरशाद कामिल और प्रीतम ने बाकी गीतकार-संगीतकार जोड़ियों को बड़े हीं जोर का झटका दिया

ताज़ा सुर ताल ४२/२०१०


सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' की एक और कड़ी के साथ हम हाज़िर हैं, और आप सभी का हार्दिक स्वागत है इस साप्ताहिक स्तंभ में! विश्व दीपक जी, पता है जब भी मैं इस स्तंभ के लिए आप से बातचीत का सिलसिला शुरु करता हूँ तो मुझे क्या याद आता है?

विश्व दीपक - अरे पहले मुझे सभी को नमस्ते तो कह लेने दो! सभी पाठकों व श्रोताओं को मेरा नमस्कार और सुजॊय, आप को भी! हाँ, अब बताइए आप को किस बात की याद आती है।

सुजॊय - जब मैं छोटा था, और गुवाहाटी में रहता था, तो उस ज़माने में तो फ़िल्मी गानें केवल रेडियो पर ही सुनाई देते थे, तभी से मुझे रेडियो सुनने में और ख़ास कर फ़िल्म संगीत में दिलचस्पी हुई। तो आकाशवाणी के गुवाहाटी केन्द्र से द्पहर के वक़्त दो घंटे के लिए सैनिक भाइयों का कार्यक्रम हुआ करता था (आज भी होता है) , जिसके अंतर्गत कई दैनिक, साप्ताहिक और मासिक कार्यक्रम प्रस्तुत होते थे फ़िल्मी गीतों के, कुछ कुछ विविध भारती अंदाज़ के। तो हर शुक्रवार के दिन एक कार्यक्रम आता था 'एक ही फ़िल्म के गीत', जिसमें किसी नए फ़िल्म के सभी गीत बजाए जाते थे। तो गर्मी की छुट्टियों में या कभी भी जब शुक्रवार को स्कूल की छुट्टी हो, उस 'एक ही फ़िल्म के गीत' कार्यक्रम को सुनने के लिए मैं और मेरा बड़े भाई बेसबरी से इंतज़ार करते थे। और कार्यक्रम शुरु होने पर जब उद्‍घोषक कहते कि "आज की फ़िल्म है...", उस वक़्त तो जैसे उत्तेजना चरम सीमा तक पहूँच जाया करती थी कि कौन सी फ़िल्म के गानें बजने वाले हैं। मुझे अब भी याद है कि हम किस तरह से ख़ुश हुए थे जिस दिन 'हीरो' फ़िल्म के गानें हमने पहली बार सुने थे उसी कार्यक्रम में।

विश्व दीपक - बहुत ही ख़ूबसूरत यादें हैं, और मैं भी महसूस कर सकता हूँ। उन दिनों मनोरंजन के साधन केवल रेडियो ही हुआ करता था, जिसकी वजह से रेडियो की लोकप्रियता बहुत ज़्यादा थी। अब बस यही कह सकते हैं कि विज्ञान ने हमें दिया है वेग, पर हमसे छीन लिया है आवेग।

सुजॊय - वाह! क्या बात कही है आपने! हाँ, तो मैं यही कह रहा था कि आज 'ताज़ा सुर ताल' प्रस्तुत करते हुए मुझे ऐसा लगता है कि मैं भी उन्हीं उद्‍घोषकों की तरह किसी नए फ़िल्म के गानें लेकर आता हूँ, कार्यक्रम वही एक ही फ़िल्म का है, लेकिन श्रोता से अब मैं एक प्रस्तुतकर्ता बन गया हूँ। चलिए अब बताया जाये कि आज हम कौन सी नई फ़िल्म के गीत लेकर उपस्थित हुए हैं।

विश्व दीपक - दरअसल, आज हम ज़रा हल्के फुल्के मूड में हैं। इसलिए ना तो आज किसी क़िस्म का सूफ़ी गीत बजेगा, और ना ही कोई दर्शन का गीत। आज तो बस मस्ती भरे अंदाज़ में सुनिए अक्षय कुमार और ऐश्वर्या राय बच्चन की नई नवेली फ़िल्म 'ऐक्शन रीप्ले' के गीत। विपुल शाह निर्देशित इस फ़िल्म में गीतकार - सगीतकार जोड़ी के रूप में हैं इरशाद कामिल और प्रीतम। अन्य मुख्य कलाकारों में शामिल हैं रणधीर कपूर, किरण खेर, ओम पुरी, नेहा धुपिया और आदित्य रॊय कपूर।

सुजॊय - इससे पहले कि गीतों का सिलसिला शुरु करें, मैं यह याद दिलाना चाहूँगा कि विपुल शाह की थोड़ी कम ही चर्चा होती है, लेकिन इन्होंने बहुत सी कामियाब और म्युज़िकल फ़िल्में दी हैं और अपने लिए एक सम्माननीय स्थान इस इण्डस्ट्री में बना लिया है। विपुल शाह और अक्षय कुमार की जोड़ी भी ख़ूब रंग लायी है, जैसे कि 'वक़्त', 'नमस्ते लंदन', 'सिंह इज़ किंग्' और 'लंदन ड्रीम्स' जैसी फ़िल्मों में। विपुल शाह निर्मित और अनीज़ बाज़्मी निर्देशित रोमांटिक कॊमेडी 'सिंह इज़ किंग्' में प्रीतम के सुपरहिट संगीत से ख़ुश होकर विपुल ने अपनी इस अगली रोमांटिक कॊमेडी के संगीत के लिए प्रीतम को चुना है।

विश्व दीपक - फ़िल्म की कहानी के हिसाब से फ़िल्म में ७० के दशक के संगीत की छाया होनी थी। दरअसल इस फ़िल्म की कहानी भी बेहद अजीब-ओ-ग़रीब है। इस फ़िल्म में आदित्य रॊय कपूर अपने माता पिता (ऐश्वर्या और अक्षय), जिनकी एक दूसरे से शादी नहीं हो पायी थी, टाइम मशीन में बैठ कर ७० के दशक में पहूँच जाता है और अपने माता पिता का मिलन करवाता है। तो इतनी जानकारी के बाद आइए अब पहला गीत सुन ही लिया जाए।

गीत - ज़ोर का झटका


सुजॊय - वाक़ई ज़ोर का झटका था! फ़ुल एनर्जी के साथ दलेर मेहंदी और रीचा शर्मा ने इस गीत को गाया है और आजकल यह गीत लोकप्रियता की सीढियाँ चढ़ता जा रहा है। शादी के नुकसानों को लेकर कई हास्य गीत बनें हैं, यह गीत उसी श्रेणी में आता है, और पूरी टीम ने ही अच्छा अंजाम दिया है गीत को।

विश्व दीपक - बड़ा ही संक्रामक रीदम है गीत का। कुछ कुछ "चोर बाज़ारी" गीत की तरह लगता है शुरु शुरु में, लेकिन बाद में प्रीतम ने गीत का रुख़ दूसरी ओर ही मोड़ दिया है। दलेर मेहंदी की गायकी के तो क्या कहने, और रीचा शर्मा के गले की हरकतों से तो सभी वाक़ीफ़ ही हैं। इन दोनों के अलावा मास्टर सलीम ने भी अपनी आवाज़ दी है इस गीत में कुछ और मसाला डालने के लिए।

सुजॊय - इस मस्ती भरे गीत के बाद अब एक रोमांटिक गीत, उस ७० के दशक के स्टाइल का हो जाए! गायिका हैं श्रेया घोषाल।

गीत - ओ बेख़बर


विश्व दीपक - बड़ा ही मीठा, सुरीला गीत था श्रेया की आवाज़ में। प्रीतम के संगीत की विशेषता यही है कि वो पूरी तरह से व्यावसायिक हैं, जिसे कहते हैं 'ट्रुली प्रोफ़ेशनल'। जिस तरह का संगीत आप उनसे माँगेंगे, वो बिलकुल उसी तरह का गीत आपको बनाकर दे देंगे। पीछले साल प्रीतम का ट्रैक रेकॊर्ड सब से उपर था, इस साल भी शायद उनका ही नाम सब से उपर रहेगा। ख़ैर, इस गीत की बात करें तो एक टिपिकल यश चोपड़ा फ़िल्म के गीत की तरह सुनाई देता है, बस लता जी की जगह अब श्रेया घोषाल है।

सुजॊय - मुझे तो इस गीत को सुनते हुए लग रहा था जैसे फूलों भरी वादियों, बर्फ़ीली पहाड़ियों, हरे भरे खेतों और झीलों में यह फ़िल्माया गया होगा। गानें का रंग रूप तो आधुनिक ही है, लेकिन एक उस ज़माने की बात भी कहीं ना कहीं छुपी हुई है। ऐश्वर्या के सौंदर्य को कॊम्प्लीमेण्ट करता यह गीत लोगों के दिलों को छू सकेगा, हम तो ऐसी ही उम्मीद करेंगे। ऐश्वर्या - श्रेया कम्बिनेशन में फ़िल्म 'गुरु' का गीत "बरसो रे मेघा मेघा" जिस तरह से लोकप्रिय हुआ था, इस गीत से भी वह उम्मीद रखी जा सकती है।

विश्व दीपक - चलिए अब बढ़ते हैं तीसरे गीत की ओर। इस बार सेवेंटीज़ के रेट्रो शैली का एक गीत "नखरे", जिसे आप एक कैम्पस छेड़-छाड़ सॊंग् भी कह सकते हैं।

गीत - नखरे


सुजॊय - "लड़की जो बनती प्रेमिका, बैण्ड बजाये चैन का, उड़ जाता सर्कीट ब्रेन का, पटरी पे बैठा आदमी, देखे रास्ता ट्रेन का"। कमाल के ख़यालात हैं इरशाद साहब के, जिनके लेखनी की दाद देनी ही पड़ेगी! और संगीत में प्रीतम ने कमाल तो किया ही है। गाने में आवाज़ फ़्रण्कोयस कास्तलीनो का था, जिन्हें आजकल हिंदी के एल्विस प्रेस्ली कहा जा रहा है। एक फ़ुल्टू रॊक-एन-रोल पार्टी सॊंग जिसे सुन कर झूमने को दिल करता है।

विश्व दीपक - अक्षय कुमार के मशहूर संवाद "आवाज़ नीचे" को गीत के शुरुवाती हिस्से में सुना जा सकता है। गीत के ऒरकेस्ट्रेशन की बात करें तो गीटार और पर्क्युशन का ज़बरदस्त इस्तेमाल प्रीतम ने किया है, और गीत के मूड और स्थान-काल-पात्र के साथ पूरा पोरा न्याय किया है।

सुजॊय - अच्छा विश्व दीपक जी, पिछली बार आपने किसी हिंदी फ़िल्म में होली गीत कब देखी थी याद है कुछ आपको?

विश्व दीपक - मेरा ख़याल है कि विपुल शाह की ही फ़िल्म 'वक़्त' में "डू मी एक फ़ेवर लेट्स प्ले होली" और 'बाग़बान' में "होली खेले रघुवीरा अवध में" ही होने चाहिए। वैसे आप के सवाल से ख़याल आया कि ७० के दशक में जिस तरह से होली गीत फ़िल्मों के लिए बनते थे, और जिस तरह से फ़िल्माये जाते थे, उनमें कुछ और ही बात होती थी। फ़िल्मी गीतों से धीरे धीरे विविधता ख़त्म होती जा रही है, ख़ास कर त्योहारों के गीत को बंद ही हो गये हैं। ख़ैर, होली गीत की बात चली है तो 'ऐक्शन रीप्ले' में भी एक होली गीत की गुंजाइश रखी गई है, आइए उसी गीत को सुन लिया जाए।

गीत - छान के मोहल्ला


सुजॊय - ऐश्वर्या और नेहा धुपिया पर फ़िल्माया गया यह गीत सुनिधि चौहान और ऋतु पाठक की आवाज़ों में था। पूर्णत: देसी फ़्लेवर का गाना था, लेकिन प्रीतम ने इस बात का पूरा पूरा ध्यान रखा कि यह एक आइटम सॊंग् होते हुए भी ऐश्वर्या पर फ़िल्माया जा रहा है, इसलिए एक तरह ही शालीनता भी बरक़रार रखी है।

विश्व दीपक - इरशाद कामिल लगता है गुलज़ार साहब के नक्श-ए-क़दम पर चल निकले हैं इस गीत में, जब वो लिखते हैं कि "जली तो, बुझी ना, क़सम से कोयला हो गई मैं"। इस तरह की उपमाएँ गुलज़ार साहब ही देते आये हैं। देखना यह है कि क्या यह गीत भी "डू मी एक फ़ेवर" की तरह चार्टबस्टर बन पाता है या नहीं।

सुजॊय - चार गानें हमने सुन लिए, और एक बात आपने ग़ौर की होगी कि इनमें ७० के दशक के रंग को लाने की कोशिश तो की गई है, लेकिन हर गीत एक दूसरे से अलग है। हम इस ऐल्बम के करीब करीब बीचो बीच आ पहुँचे हैं, यानी कि ९ गीतों में से ४ गीत सुन चुके हैं। तो आइए बिना कोई कमर्शियल ब्रेक लिए सुनते हैं 'ऐक्शन रीप्ले' का पाँचवाँ गीत।

गीत - तेरा मेरा प्यार


विश्व दीपक - कुल्लू मनाली की स्वर्गीक सुंदरता इस गीत के फ़िल्मांकन की ख़ासीयत है, और इस गीत को सुनने के बाद समझ में आता है कि विपुल शाह ने करीब करीब एक साल तक क्यों इंतेज़ार किया वहाँ के मौसम में सुधार का। पहाड़ी लोक गीत की छाया लिए इस गीत में अगर प्रीतम के भट्ट कैम्प की शैली सुनाई देती है तो कुछ कुछ रहमान का अंदाज़ भी महसूस होता है।

सुजॊय - बिलकुल मुझे भी यह गीत ईमरान हाश्मी टाइप का गीत लगा। कार्तिक, महालक्ष्मी और अंतरा मित्र की आवाज़ों में यह रोमांटिक गीत का भी अपना मज़ा है। और आपने कुल्लू मनाली का ज़िक्र छेड़ कर तो जैसे मुझे रोहतांग पास की पहाड़ियों में वापस ले गए जहाँ पर मैं अपने मम्मी डैडी के साथ दो साल पहले दशहरे के समय गया था। रोहतांग पास के समिट पर ऐसी बर्फ़ीली हवाएँ कि एक मिनट आप खड़े नहीं रह सकते। वहाँ से वापस आने के बाद ऐसा लगा कि जैसे किसी सपनो की दुनिया से घूम कर वापस आ रहे हों। मेरी मम्मी का एक्स्प्रेशन कुछ युं था कि "अब मुझे कहीं और घूमने जाने की चाहत ही नहीं रही"। ऐसा है कुल्लू मनाली।

विश्व दीपक - चलिए अब कुल्लू मनाली से पंजाब की धरती पर आ उतरते हैं, और सुनते हैं मीका की आवाज़ में "धक धक धक"।

गीत - धक धक धक


सुजॊय - प्रीतम के गायक चयन के बारे में हम कुछ दिन पहले ही बात कर चुके हैं। आज फिर से दोहरा रहे हैं कि प्रीतम यह भली भाँति जानते हैं कि कौन सा गीत किस गायक से गवाना है। और जब गीत बनकर बाहर आता है तो हमें यह मानना ही पड़ता है कि इस गीत के लिए चुना हुआ गायक ही सार्थक हैं उस गीत के लिए।

विश्व दीपक - इकतारा की धुनें, उसके बाद फिर धिनचक रीदम, कुल मिलाकर एक मस्ती भरा गीत। इस गीत के लिए भी थम्प्स अप ही देंगे। चलिए अब लुका छुपी का खेल भी खेल लिया जाए। अगर आपको याद हो तो फ़िल्म 'ड्रीम गर्ल' में एक गाना था "छुपा छुपी खेलें आओ", और अमिताभ बच्चन की फ़िल्म 'दो अंजाने' में भी "लुक छुप लुक छुप जाओ ना" गीत था। ये दोनों ही गानें बच्चों को केन्द्र में रख कर लिखे और फ़िल्माये गये थे। लेकिन 'ऐक्शन रीप्ले' का "लुक छुप" एक मस्ती और धमाल से लवरेज़ गीत है जिसे के. के और तुल्सी कुमार ने गाया है, जो आजकल अपने अपने करीयर में पूरे फ़ॊर्म में हैं।

सुजॊय - ७० के दशक के संगीत की बात है तो कुछ हद तक ऋषी कपूर के नृत्य गीतों की छाया इस गीत में पड़ती हुई सी लगती है। चलिए सुनते हैं।

गीत - लुक छुप जाना


विश्व दीपक - आपने ग़ौर किया कि मुखड़े का इस्तेमाल अंतरे में भी हुआ है, और यही चीज़ शायद गीत को भीड़ से अलग करती है। तालियों, सिन्थेसाइज़र, ग्रुंजे गीटार और स्टेडियम रॊक के रम्ग इस गीत में भरे गये हैं। ७० के नहीं, बल्कि मैं यह कहूँगा कि अर्ली से लेके मिड एइटीज़ का प्रभाव है इस गीत के संगीत में।

सुजॊय - रॊक मूड को बरकरार रखते हुए अब बारी है सूरज जगन के आवाज़ की, गीत है "आइ ऐम डॊग गॊन क्रेज़ी"। सूरज जगन आज के अग्रणी रॊक गायकों में से एक हैं, लेकिन इस गीत में ऐसा लगता है कि जैसे उन्होंने आवाज़ को दबाया हुआ है। इस ऐल्बम के हिसाब से मुझे तो यह गीत थोड़ा ढीला लगा, देखते हैं हमारे श्रोताओं के क्या विचार हैं।

विश्व दीपक - ६० और ७० के दशकों में बनने वाले रॊक गीतों का अंदाज़ लाने की कोशिश है इस गीत में। यहाँ पे यह बताना ज़रूरी है कि प्रीतम ही वो संगीतकार हैं जिन्होंने हार्ड रॊक को बैण्ड शोज़ से निकालकर हिंदी फ़िल्म संगीत की मुख्य धारा में शामिल करवाया 'गैंगस्टर' और 'लाइफ़ इन ए मेट्रो' जैसी फ़िल्मों के ज़रिये। आइए सुनते हैं...

गीत - आइ ऐम डॉग गॊन क्रेज़ी


सुजॊय - और अब हम पहूँच गये हैं 'ऐक्शन रीप्ले' फ़िल्म के नौवें और अंतिम गीत पर। श्रेया घोषाल की आवाज़ में नृत्य गीत "बाकी मैं भूल गई" प्यार का इज़हार करने वाले गीतों की श्रेणी में आता है, जिसमें नायिका अपनी दीवानगी ज़ाहिर करती है और उसका इक़रार करती है। प्रीतम विविधता का परिचय देते हुए मुखड़े और अंतरे की रीदम को बिलकुल अलग रखा है।

विश्व दीपक - वैसे इस गीत का प्रेरणा स्रोत हैं एक मिडल-ईस्टर्ण नंबर है, और फ़ीरोज़ ख़ान की फ़िल्मों में इस तरह के संगीत का इस्तेमाल सुना गया है। कुल मिलाकर यही कह सकते हैं कि इस ऐल्बम का एक सुखांत हुआ है। चलिए यह गीत सुन लेते हैं।

गीत - बाकी मैं भूल गई


सुजॊय - इन तमाम गीतों को सुनने के बाद मेरी अदालत यह फ़ैसला देती है कि 'ऐक्शन रीप्ले' के गीतों को बार बार रीप्ले किया जाए और सुना जाए। मेलडी और मस्ती का संगम है 'ऐक्शन रीप्ले' का ऐल्बम। प्रीतम, इरशाद कामिल और तमाम गायक गायिकाओं को मेरी तरफ़ से थम्प अप! 'चुस्त-दुरुस्त गीत' और 'लुंज पुंज गीत' तो विश्व दीपक जी अभी बताएँगे, लेकिन मुझसे अगर पूछा जाए कि वह एक गीत कौन सा है जो इस ऐल्बम का सर्वोत्तम है, तो मेरा वोट "ओ बेख़बर" को ही जाएगा।

विश्व दीपक - आपकी पसंद से हमारी पसंद जुदा कैसे हो सकती है सुजॉय जी। आपने "ओ बेखबर" को वोट दिया है तो मैं उसे हीं आज का "चुस्त-दुरुस्त" गीत घोषित करता हूँ। वैसे इस फिल्म के सभी गाने अच्छे हैं। मज़ेदार बात तो ये है कि इस दिवाली को जिन दो बड़ी फिल्मों में टक्कर है वे हैं "ऐक्शन रिप्ले" और "गोलमाल ३" और दोनों में हीं संगीत प्रीतम दा का है। अगर आप दोनों फिल्मों के गानें सुनें तो आपको लगेगा कि प्रीतम दा ने अपना ज्यादा प्यार "ऐक्शन रिप्ले" को दिया है और "गोलमाल ३" को जल्दी में निपटा-सा दिया है। खैर ये तो निर्माता-निर्देशक पर निर्भर करता है कि वे किसी संगीतकार या गीतकार से किस तरह का काम लेते हैं। मैं तो बस इतना हीं कह सकता हूँ कि विपुल शाह इस काम में सफल साबित हुए हैं। चलिए तो इन्हीं बातों के साथ आज की बैठक समाप्त करते हैं। जाते-जाते सुजॉय जी आपको और सभी मित्रों को दिपावली की अग्रिम शुभकामनाएँ।

आवाज़ की राय में

चुस्त-दुरुस्त गीत: ओ बेख़बर

लुंज-पुंज गीत: आइ ऐम डॉग गॊन क्रेज़ी

Tuesday, October 19, 2010

संगीत समीक्षा : गुजारिश - संगीत निर्देशन में भी अव्वल साबित हुए संजय लीला भंसाली...तुराज़ के शब्दों ने रचा एक अनूठा संसार

दोस्तों आज टी एस टी मैं आप मुझे देखकर हैरान हो रहे होंगें, दरअसल सुजॉय छुट्टी पर हैं, और मैंने वी डी को पटा कर ये मौका ढूंढ लिया कि मैं आपको उस अल्बम के संगीत के बारे में बता सकूँ जिसने मेरे दिलो जेहन पर इन दिनों जादू सा कर दिया है.

जब बात संगीत की चलती है, और जब कोई मुझसे पूछता है कि मुझे किस तरह का संगीत पसंद है तो मैं बड़ी उलझन में फंस जाता हूँ, क्योंकि मुझे लगभग हर तरह का संगीत पसंद आता है, पुराने, नए, शास्त्रीय, हिप होप, ग़ज़ल सभी कुछ तो सुनता हूँ मैं, फिर किसे कहूँ कि ये मुझे नापसंद नहीं....खैर पसंद भी कई तरह की होती है, कुछ गीतों के शब्द हमें भा जाते हैं (मसलन गुलाल) तो कुछ उसके खालिस संगीत संयोजन की वजह से मन को लुभा जाते (जैसे रोबोट और अजब प्रेम की गजब कहानी) हैं....हाँ पर ऐसी अल्बम्स तो मैं उँगलियों पे गिन सकता हूँ जिसने मुझे संगीत की सम्पूर्ण संतुष्ठी दी है. ऐसा संगीत जिसे सुन तन मन और आत्मा भी संतुष्ट हो जाए.....संजय लीला बंसाली एक ऐसे निर्देशक हैं, जिनकी फ़िल्में रुपहले पर्दे पर कविता लिखती है, वो शुद्ध भारतीय सोच के निर्देशक हैं जो बिना गीत संगीत के फिल्मों की कल्पना नहीं करते (ब्लैक एक अपवाद है). मुझे उनकी फिल्मों का बेसब्री से इंतज़ार रहता है क्योंकि उनकी दो फिल्मों का संगीत (हम दिल दे चुके सनम और देवदास) मेरे “सम्पूर्ण संतुष्ठी अल्बम” की श्रेणी में निश्चित ही आता है. दोनों ही फिल्मों में इस्माईल दरबार का संगीत था, देवदास के बाद कुछ मतभेदों के चलते निर्देशक-संगीतकार की ये जोड़ी अलग हो गयी, जो अगर साथ रहती तो शायद हमें और भी बहुत से मास्टर पीस अल्बम्स सुनने को मिल सकते थे. ब्लैक बिना गीत संगीत के बनी भारतीय फिल्म थी, जो कामियाब भी रही, पर संजय लौट आये अपने नैसर्गिक फॉर्म में “संवरिया” के साथ. मोंटी का था संगीत इसमें जिन्होंने देवदास का शीर्षक संगीत भी रचा था. संगीत के हिसाब से अल्बम बुरी तो नहीं थी, पर संजय के अन्य फिल्मों के टक्कर की भी नहीं थी. इसी फिल्म में हमें संजय का एक नया रूप दिखा जब एक गीत को उन्होंने खुद संगीतबद्ध किया “थोड़े बदमाश हो तुम”. एक लंबे अंतराल के बाद संजय लौटे हैं उसी जेनर की फिल्म लेकर जिसमें उन्हें महारथ हासिल है. ख़ामोशी, देवदास, ब्लैक आदि सभी फ़िल्में व्यक्तिगत अक्षमताओं (शारीरिक और मानसिक) से झूझते और उनपर विजय पाते किरदारों पर है. “गुज़ारिश” भी उसी श्रेणी में आती है, और बतौर संगीतकार संजय लीला बंसाली ने इस बार पूरी तरह से कमान संभाली है....ऐसे में कुछ शंकाएं संभव है, मगर उनकी फिल्मों से अपेक्षाएं हमेशा ही बढ़ चढ कर रहती है, वो कुछ भी कम स्तरीय करेंगें ऐसी इस जीनियस से उम्मीद नहीं की जा सकती.....चलिए इस लंबी भूमिका के बाद अब जरा “गुज़ारिश" के संगीत की चर्चा की जाए.

बरसते पानी की आवाज़ और पार्श्व से आ रहे कुछ संवादों से अल्बम की शुरूआत होती है. ये है फिल्म का शीर्षक गीत, के के की डूबी और डुबो देने वाली आवाज़ में “इसमें तेरी बाहों में मर जाऊं...” सुनकर वाकई मर जाने का जी करता है....सचमुच किसी गीत में इतनी मासूम गुज़ारिश, शब्द जैसे भेद जाते हैं गहरे तक...और के के .....मेरे ख्याल से वो इस कालजयी गीत के लिए एक अदद राष्ट्रीय सम्मान का हक तो रखते ही हैं. वोइलिन के स्वरों में इतना दर्द बहुत अरसे बाद सुनाई दिया है.....ऐ एम् तुराज़ की बतौर गीतकार ये शायद पहली फिल्म होगी, मगर उनका आगाज़ बहुत ही शानदार है. इस पहले गीत से ही संजय अपने साथ सुनने वालों को जोड़ लेते हैं.

गीत - गुज़ारिश


“सौ ग्राम जिंदगी” जब शुरू होता है तो “यादें” (सुभाष घई कृत) का शीर्षक गीत याद आता है जो हरिहरन ने गाया था...नगमें हैं किस्से हैं....पर अंतरे तक आते आते कुणाल गांजावाला इस गीत को अपने नायाब गायन से एक अलग ही मुकाम पर ले जाते हैं....शब्द सुनिए – देर तक उबाली है, प्याली में डाली है, कड़वी है नसीब सी, ये कॉफी गाढ़ी काली है...चमच्च भर चीनी हो बस इतनी सी मर्जी है.....वाह....यहाँ गीतकार हैं विभु पूरी, एक और नयी खोज जो निश्चित ही बधाई के हकदार हैं. संगीत संयोजन यहाँ भी जबरदस्त है. कम से कम वाध्य हैं पर जो हैं उनको संजय ने बहुत ही “संभाल के खर्चा” है. LIFE IS GOOD....सुनिए...

गीत - सौ ग्राम ज़िंदगी


तीसरा गीत “तेरा जिक्र” तो जैसे पूरी तरह से एक कविता (गीतकार तरुज़) है, जिसमें हल्का सा सूफी अंदाज़ भी पिरोया गया है, शैल के साथ राकेश पंडित ने दिया है सूफी स्टाईल में. “तेरा जिक्र है या इत्र है, जब जब करता हूँ महकता हूँ....”. अलग अंदाज़ का गीत है और एक दो बार सुनते ही नशे की तरह सर चढ जाता है. चौथा गीत “सायबा” गोवा के किसी क्लब में ले चलेगा आपको, वैभवी जोशी ने गहरे भाव से इसे गाया है, संगीत संयोजन और शब्द यहाँ भी उत्कृष्ट है (तारुज़). फ्रांसिस कास्तिलेनो और शैल ने कोरस की भूमिका निभायी है यहाँ, जो गीत को और रंग भरा बनाता है. अल्बम के अधिकतर गीतों की तरह ये गीत भी एक अंतरे का है, संजय ने इस तरह के छोटे छोटे गीतों का प्रयोग ख़ामोशी, HDDCS, और देवदास में भी किये हैं.

गीत - तेरा ज़िक्र


गीत - सायबा


“जागती आँखों में भी अब कोई सोता है....जब कोई नहीं होता, तब कोई होता है...” के के की आवाज़ में इतनी गहराई है कि ऑंखें बंद करके सुनो तो मन उड़ने लगता है, ये भी एक छोटा सा मगर सुंदर सा गीत है. छटा गीत “उडी” एक अलग ही कलेवर का है, और अल्बम के बहतरीन गीतों में से एक है, सुनिधि चौहान की मदमस्त आवाज़ और गोवा के लोक रंग का तडका, यक़ीनन “उडी” आपको लंबे समय तक याद रहेगा...

गीत - जाने किसके ख्वाब


गीत - उड़ी


“कह न सकूँ मैं इतना प्यार” में शैल एक बार फिर सुनाई देते हैं. पियानो की स्वरलहरियों में प्रेम की बेबसी कहीं कहीं देवदास के “वो चाँद जैसी लड़की” की याद दिला जाती है. अच्छा गाया है. दिल से गाया है मन को छूता है. अगला गीत हर्षदीप कौर की आवाज़ में हैं, रियल्टी शोस से निकली इस लड़की की आवाज़ में गहराई है, यहाँ भी शब्द बहुत खूबसूरत है, कहीं कहीं गुलज़ार साहब याद आ जाते हैं – चाँद की कटोरी है, रात ये चटोरी है....वाह...”रिश्ते झीने मलमल के”, “मोहब्बत का स्वटर”, “हाथ का छाता” जैसे शब्द युग्म वाकई सिहरन सी उठा जाते है. गीतकार विभु पूरी को बधाई. सेक्सोफोन का एक पीस है इंटरल्यूड में, सुनिए क्या खूब है. एक और शानदार गीत.

गीत - कह न सकूँ


गीत - चाँद की कटोरी


“दायें बाएं” में एक बार फिर के के को सुनकर सकून मिलता है, यहाँ गीटार है पार्श्व में, मधुर रोमांस की तरंगें, जहाँ दर्द भी सोया सोया है, उभरता है मगर जैसे चाहत उसे फिर सुला देती हो....प्यार के सुरीले अहसास को मधुरता से सहलाता है ये गीत. “धुंधुली धुंधली शाम” अंतिम गीत है....पंछियों के स्वर, झील का किनारा....डूबती शाम, एक पूरा चित्र आँखों के सामने उभर आता है.....”तुम्हारे बाद हमारा हाल कुछ ऐसा है..कि जैसे साज़ के सारे तार टूट जाते हैं....” मुझे न जाने क्यों रबिन्द्र नाथ टैगोर याद आ गए. शंकर महादेवन ने संभाला है यहाँ माईक.....बहरहाल...

गीत - दाएँ बाएँ


गीत - धुंधली धुंधली


"गुज़ारिश" मेरी राय में इस वर्ष की सबसे बढ़िया अल्बम है....शायद “ओमकारा” के बाद ये पहली अल्बम है जिसने मुझे वो “सम्पूर्ण संतुष्टी” दी है. (“मैं” शब्द इसलिए इस्तेमाल कर रहा हूँ क्योंकि मैं नहीं जानता कि आप मेरी इस राय से सहमत होंगे या नहीं) वैसे तो टी एस टी के वाहक तन्हा जी और सुजॉय जी ने रेटिंग बंद करवा दी है है पर फिर भी मैं इस अल्बम को ५/५ की रेटिंग देना चाहूँगा.....आप सब भी सुनिए और बताईये कि आपको कैसे लगे “गुज़ारिश” के गीत.

Tuesday, September 21, 2010

खासी तिंग्या का खास अंदाज़ लिए तन्हा राहों में कुछ ढूँढने निकले हैं गुमशुदा बिक्रम घोष और राकेश तिवारी

ताज़ा सुर ताल ३६/२०१०


विश्व दीपक - 'ताज़ा सुर ताल' में आप सभी का फिर एक बार बहुत बहुत स्वागत है! पिछले हफ़्ते हमने एक ऒफ़बीट फ़िल्म 'माधोलाल कीप वाकिंग्‍' के गानें सुने थे, और आज भी हम एक ऒफ़बीट फ़िल्म लेकर हाज़िर हुए हैं। इस फ़िल्म के भी प्रोमो टीवी पर दिखाई नहीं दिए और कहीं से इसकी चर्चा सुनाई नहीं दी। यह फ़िल्म है 'गुमशुदा'।

सुजॊय - अपने शीर्षक की तरह ही यह फ़िल्म गुमशुदा-सी ही लगती है। सुना है कि यह एक मर्डर मिस्ट्री की कहानी पर बनी फ़िल्म है जिसका निर्माण किया है सुधीर डी. आहुजा ने और निर्देशक हैं अशोक विश्वनाथन। फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं रजत कपूर, विक्टर बनर्जी, सिमोन सिंह, राज ज़ुत्शी और प्रियांशु चटर्जी। फ़िल्म में संगीत है बिक्रम घोष का और गानें लिखे हैं राकेश त्रिपाठी ने।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, ये बिक्रम घोष कहीं वही बिक्रम घोष तो नहीं हैं जो एक नामचीन तबला वादक हैं और जिनका फ़्युज़न संगीत में भी दबदबा रहा है?

सुजॊय - जी हाँ, आपने बिल्कुल ठीक पहचाना, और आपको यह भी बता दूँ कि बिक्रम के पिता हैं पंडित शंकर घोष जो एक जानेमाने तबला वादक रहे हैं जिन्होंने उस्ताद अली अक़बर ख़ान और पंडित रविशंकर जैसे मैस्ट्रोस का संगत किया है।

विश्व दीपक - जहाँ तक फ़िल्मी करीयर का सवाल है, बिक्रम घोष का हिंदी फ़िल्मों में यह पदार्पण है, जबकि बांगला फ़िल्मों में वो संगीत दे चुके हैं।

सुजॊय - हाँ, उनके संगीत से सजी कुछ बांगला फ़िल्में हैं इति श्रीकांत (२००४), देवकी (२००५), नील राजार देशे (२००८), और पियालीर पासवर्ड (२००९)। साल २००९ में एक फ़िल्म बनी थी अंग्रेज़ी, हिंदी और गुजराती में 'लिटल ज़िज़ू' के नाम से जिसमें बिक्रम घोष ने गिउलियानो मोदारेली के साथ मिलकर संगीत दिया था। और आइए अब बातों को देते हैं विराम और सुनते हैं 'गुमशुदा' का पहला गीत सुनिधि चौहान की आवाज़ में।

गीत - तन्हा राहें


विश्व दीपक - "तन्हा राहें मेरी उलझी सी क्यों लगे, एक नया अरमाँ फिर भी दिल में जगे, ढूंढे नज़रें मेरी अंजानी मंज़िलें, साया भी क्यों मेरा अब फ़साना लगे"; क्योंकि यह एक मर्डर मिस्ट्री फ़िल्म है, इसलिए इस फ़िल्म के गीतों से हमें उसी तरह की उम्मीदें रखनी चाहिए। और इस पहले गीत में भी एक क़िस्म का सस्पेन्स छुपा सा लगता है, जैसे कोई राज़, कोई डर छुपा हुआ हो। सुनिधि की आवाज़ में यह गीत सुन कर फ़िल्म 'दीवानगी' के शीर्षक गीत की याद आ गई। "सपनों से कह दो अब मुझे ना ठगे", गीतकार राकेश तिवारी के इन बोलों में नई बात नज़र आई है।

सुजॊय - और गीत के संगीत संयोजन से भी सस्पेन्स टपक रहा है। साज़ों के इस्तेमाल में भी विविधता अपनाई गई है। परक्युशन से लेकर लातिनो कार्निवल म्युज़िक के नमूने सुने जा सकते हैं इस गीत में। गायकी के बारे में यही कह सकते हैं कि यह स्टाइल सुनिधि का मनचाहा स्टाइल है और इसलिए शायद इस गीत को गाना उनके लिए बायें हाथ का खेल रहा होगा। इस तरह के गानें उन्होंने शुरु से ही बहुत से गाए हैं, इसलिए गायकी के लिहाज़ से कोई नई बात नहीं है इसमें।

विश्व दीपक - आइए अब बढ़ते हैं दूसरे गीत की ओर, इस बार आवाज़ है सोनू निगम की। जब फ़िल्म का शीर्षक ही है 'गुमशुदा' तो इस फ़िल्म के किसी गीत में अगर ढूंढने की बात हो तो इसमें हैरत वाली कोई बात नहीं, है न? इस गीत के बोल हैं "ढूंढो, गली गली डगर डगर नगर नगर शहर शहर अरे ढूंढो, हर सफ़र दर बदर आठों पहर शाम-ओ-सहर अरे ढूंढो"।

गीत - ढूंढो


सुजॊय - इस गीत में अगर ढूंढ़ने जाएँ तो बिक्रम घोष का ज़बरदस्त ऒरकेस्ट्रेशन मिलता है। वैसे गीत का जो बेसिक ट्युन है वह सीधा सादा सा है, एल्किन अरेंजमेण्ट में हेवी ऒरकेस्ट्रेशन का प्रयोग हुआ है। भारतीय और विदेशी साज़ों का अच्छा फ़्युज़न हुआ है। कुछ कुछ क़व्वली शैली का भी सहारा लिया गया है। कहीं कहीं हार्ड रॊक शैली का भी असर मिलता है।

विश्व दीपक - गीतकार राकेश तिवारी की बात करें तो वो एक कोलकाता बेस्ड स्क्रीनप्ले राइटर, संवाद लेखक, गीतकार और निर्देशक हैं। १४ नवंबर १९७० को कोलकाता में जन्में राकेश ने मुंबई मायानगरी की तरफ़ रूख किया साल २००० में। निम्बस टेलीविज़न के साथ उन्होंने काम करना शुरु किया और एशियन स्काइशॊप के लिए बहुत से विज्ञापन लिखे। लेकिन २००२ में वो कोलकाता वापस आ गए और यहीं पर काम करना शुरु कर दिया। राकेश तिवारी करीब १० टीवी धारावाहिक लिख चुके हैं और फ़िल्मों के लिए १६० से उपर गीत लिख चुके हैं। उन्होंने एक बंगला फ़िल्म 'बोनोभूमि' में एक हिंदी गीत भी लिखा है जो फ़िल्म का एकमात्र ऒरिजिनल गीत है।

सुजॊय - 'गुमशुदा' फ़िल्म में कुल ६ गीत हैं और हर गीत एक एकल गीत है और हर गीत में अलग आवाज़ है। सुनिधि चौहान और सोनू निगम के बाद अब इस गीत में आवाज़ जून बनर्जी की है।

गीत - किसने पहचाना


विश्व दीपक - स्पैनिश प्रभाव का एक और उदाहरण था यह गीत, जिसमें अकोस्टिक स्पैनिश लूप पूरे गीत में छाया हुआ है। "किसने पहचाना खेल मन का अंजाना", इस गीत में भी वही सस्पेन्स, वही अद्‍भुत रस! अब तो भई एक जैसा लगने लगा है। "तन्हा राहें" गीत का ही एक्स्टेंशन लगा यह गीत। बस ऒरकेस्ट्र्शन में थोड़ा हेर फेर है।

सुजॊय - इस गीत की गायिका जून बनर्जी एक उभरती गायिका हैं। बांगला फ़िल्मों में उन्होंने कई गीत गाए हैं। हिंदी फ़िल्मों की बात करें तो जून ने २००९ में 'रात गई बात गई' में अनुराग शर्मा के साथ एक युगल गीत गाया था, उससे पहले 'गांधी माइ फ़ादर' में भी उनकी आवाज़ सुनाई दी थी। २००७ में शंकर अहसान लॊय के संगीत में जून बनर्जी ने शंकर महादेवन और विशाल दादलानी के साथ मिलकर 'हाइ स्कूल म्युज़िकल-२' में "उड़ चले" गीत गाया था।

विश्व दीपक - और अब चौथा गीत और चौथी आवाज़, रोनिता डे की, बोल "चुप था पानी चुप थी लहर, एक हवा का झोंका, उठ गया है भँवर"।

गीत - चुप था पानी


सुजॊय - इस गीत में भी वही सपेन्स और डर छुपा है, "गहरा घना दलदल, धंस गया है कमल, कौन किसको रोके, कहदे रुक जा संभल, आनेवाले कल में बीता कल क्यों मिले, ख़्वाबों के रंगों में क्यों ख्वाहिशें घुले"। इस गीत में कोरस का गाया "उंगली पकड़ के मीर मौला रस्ता बता दे मेरे मौला" सुनने में अच्छा लगता है।

विश्व दीपक - अगर आपको इससे पहले के दो गीत ज़्यादा नहीं भाये हों तो इस गीत में बिक्रम घोष ने पूरी कोशिश की है कि उन गीतों की ख़ामियों को पूरा कर दे। अच्छा कॊम्पोज़िशन है और रोनिता डे ने अच्छा निभाया है इसको। और इस गीत में भी परक्युशन का इस्तेमाल सुनाई देता है।

सुजॊय - अब एक रॊक नंबर रुपंकर की आवाज़ में। जी हाँ, वही रुपंकर जो आज बंगाल के एक जाने माने और कामयाब गायक हैं। इनका पूरा नाम है रुपंकर बागची। बंगाल में इनके गाए बांगला गीतों के हज़ारों लाखों चाहने वाले हैं। उनके गाए ग़ैर-फ़िल्मी ऐल्बम्स, फ़िल्मी गीत और विज्ञापन जिंगल्स घर घर गूंज रहे हैं बंगाल में। उन्हें कई पुरस्कारों से भी नवाज़ा जा चुका है। टीवी धारावाहिक 'शोनार होरिन' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ टाइटल गीत का 'टेलीसम्मान' ख़िताब मिला, तो फ़िल्म 'अंदरमहल' के लिए सर्बश्रेष्ठ गायक का पुरस्कार मिला मशहूर मीडिया ग्रूप 'आनंद बज़ार पत्रिका' से।उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का भी पुरस्कार मिल चुका है और कई बार सर्वश्रेष्ठ ऐल्बम के पुरस्कार से भी नवाज़े जा चुके हैं। उनके गाये रोमांटिक गानें तो जैसे आज के बांगला युवाओं के दिलों की धड़कन बन गये है।

विश्व दीपक - आज के दौर के रॊक शैली के गायकों में सूरज जगन का नाम इन दिनों सब से उपर चल रहा है। और इस गीत में भी रुपंकर का अंदाज़ सूरज जगन से मिलता जुलता सुनाई दे रहा है। लीजिए आप भी सुनिए।

गीत - इसमे है चमक इसमें है नशा


विश्व दीपक - और अब फ़िल्म का छठा और अंतिम गीत, जिसे गाया है दोहर ने। यह शायद इस ऐल्बम का सब से अनोखा गीत है क्योंकि इसके बोल हिंदी के नहीं बल्कि उत्तरी-पूर्वी भारत के किसी राज्य का है। गीत के बोल हैं "खासी तिंग्या"। भले ही गीत के बोल समझ में ना आते हों लेकिन इस लोक धुन में वही पहाड़ों वाला आकर्षण है जो अपनी तरह खींचता है और इस गीत को सुनते हुए जैसे हम उत्तर-पूर्व में पहुँच जाते हैं।

सुजॊय - वाक़ई इस तरह का संगीत किसी हिंदी फ़िल्म में पहले कभी सुनने को नहीं मिला है। क्योंकि मैं ख़ुद उत्तरपूर्वी भारत में एक लम्बे अरसे तक रह चुका हूँ, शायद इसीलिए यह भाषा बहुत ही जानी-पहचानी-सी लग रही है। लेकिन बात ऐसी है कि उत्तरपूर्व भारत में इतनी सारी जनजातियाँ हैं और सबकी अलग अलग भाषाएँ हैं कि किसी एक भाषा को अलग से पहचान पाना आसान नहीं। मुझे जितना लग रहा है कि यह खासी भाषा है जो मेघालय की एक जनजाति है। लेकिन मैं पक्का कह नहीं सकता। गीत कुछ इस तरह का है "ahai klimnoe khasi tingya, ahai klimnoe khasi tingya, kilma savay kilm thungya, kilma savay kilm thungya"। आइए सुनते हैं, बड़ा मीठा सा गाना है, और क्यों ना हो, लोक गीत होते ही मीठे हैं चाहे किसी भी अंचल के क्यों ना हों!

गीत - खासी तिंग्या


सुजॊय - 'गुमशुदा' फ़िल्म के गानों के बारे में यही कहूँगा कि सभी गानें सिचुएशनल है, फ़िल्म को देखते हुए शायद इनका असर पता चलेगा। सिर्फ़ अगर बोल और संगीत की बात है तो "चुप था पानी" और "खासी तिंग्या" मुझे अच्छे लगे। मेरी तरफ़ से ३ की रेटिंग।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, इस एलबम पर कोई भी टिप्पणी करने से पहले मैं आपको धन्यवाद देना चाहूँगा क्योंकि आपकी बदौलत हीं हम इन ऑफबीट फिल्मों के गीतों से रूबरू हो पा रहे हैं, नहीं तो आज के समय में कोई भी समीक्षक इन फिल्मों पर अपनी नज़र या अपनी कलम नहीं दौड़ाता या फिर अगर दौड़ाता भी है तो इन फिल्मों (और इनके गीतों) को सिरे से निरस्थ कर देता है। हम बस यही मानकर चलते हैं कि अच्छा संगीत तो बड़े संगीतकारों की झोली से हीं निकल सकता है और इस गलत सोच के कारण बिक्रम घोष जैसे संगीतकार नेपथ्य में हीं रह जाते हैं। मैं आवाज़ के सारे श्रोताओं से यह दरख्वास्त करता हूँ कि अगर आप "गुमशुदा" के गाने सुनने के मूड में नहीं हैं(थे), फिर भी आज के "ताज़ा सुर ताल" में शामिल किए गए इन गानों को एक मर्तबा जरूर सुन लें, उसके बाद निर्णय पूर्णत: आपका होगा कि आगे इन गानों को सुनना है भी या नहीं। जैसा कि सुजॉय जी ने कहा कि संगीतकार ने हिन्दी फिल्मों में अच्छा पदार्पण करने की पूरी कोशिश की है, अब भले हीं इस कोशिश में थोड़ा दुहराव आ गया है, लेकिन इस कोशिश को सराहा जाना चाहिए। सुजॉय जी की रेटिंग को सम्मान देते हुए मैं आज की समीक्षा के समापन की घोषणा करता हूँ। अगली बार एक बड़ा हीं खास एलबम होगा, मेरे सबसे पसंदीदा संगीतकार का... इंतज़ार कीजिएगा।

आवाज़ रेटिंग्स: गुमशुदा: ***

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # १०६- फ़िल्म 'लिटल ज़िज़ू' को राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों की किस श्रेणी के तहत पुरस्कृत किया गया था?

TST ट्रिविया # १०७- आज जब मेघालय के खासी लोक संगीत का ज़िक चला है तो बताइए कि वह कौन सी लोरी थी अनिल बिस्वास की स्वरबद्ध की हुई जिसमें उन्होंने खासी लोक धुन का इस्तमाल किया था?

TST ट्रिविया # १०८- निर्देशक अशोक विश्वनाथन को कितनी बार नैशनल अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. फ़िल्म - सूरजमुखी, गायिका - अर्पिता साहा
२. अल्ताफ़ राजा
३. फ़िल्म 'हिना' की क़व्वाली "देर ना हो जाए कहीं"

Tuesday, June 8, 2010

रब्बा लक़ बरसा.... अपनी फ़िल्म "कजरारे" के लिए इसी किस्मत की माँग कर रहे हैं हिमेश भाई

ताज़ा सुर ताल २१/२०१०

सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' की एक और ताज़े अंक के साथ हम हाज़िर हैं। विश्व दीपक जी, इस शुक्रवार को 'राजनीति' प्रदर्शित हो चुकी हैं, और फ़िल्म की ओपनिंग अच्छी रही है ऐसा सुनने में आया है, हालाँकि मैंने यह फ़िल्म अभी तक देखी नहीं है। 'काइट्स' को आशानुरूप सफलता ना मिलने के बाद अब देखना है कि 'राजनीति' को दर्शक किस तरह से ग्रहण करते हैं। ख़ैर, यह बताइए आज हम किस फ़िल्म के संगीत की चर्चा करने जा रहे हैं।

विश्व दीपक - आज हम सुनेंगे आने वाली फ़िल्म 'कजरारे' के गानें।

सुजॊय - यानी कि हिमेश इज़ बैक!

विश्व दीपक - बिल्कुल! पिछले साल 'रेडियो - लव ऑन एयर' के बाद इस साल का उनका यह पहला क़दम है। 'रेडियो' के गानें भले ही पसंद किए गए हों, लेकिन फ़िल्म को कुछ ख़ास सफलता नहीं मिली थी। देखते हैं कि क्या हिमेश फिर एक बार कमर कस कर मैदान में उतरे हैं!

सुजॊय - 'कजरारे' को पूजा भट्ट ने निर्देशित किया है, जिसके निर्माता हैं भूषण कुमार और जॉनी बक्शी। फ़िल्म के नायक हैं, जी हाँ, हिमेश रेशम्मिया, और उनके साथ हैं मोना लायज़ा, अमृता सिंह, नताशा सिन्हा, गौरव चनाना और गुल्शन ग्रोवर। संगीत हिमेश भाई का है और गानें लिखे हैं हिमेश के पसंदीदा गीतकार समीर ने। तो विश्व दीपक जी, शुरु करते हैं गीतों का सिलसिला। पहला गीत हिमेश रेशम्मिया और सुनिधि चौहान की आवाज़ों में। इस गीत को आप एक टिपिकल हिमेश नंबर कह सकते हैं। भारतीय और पाश्चात्य साज़ों का इस्तेमाल हुआ है। हिमेश भाई के चाहनेवालों को ख़ूब रास आएगा यह गीत।

गीत: कजरा कजरा कजरारे


विश्व दीपक - सुजॊय जी, इस गाने की शुरुआत मुझे पसंद आई। जिस तरह से "सुनिधि चौहान" ने "कजरा कजरा कजरारे" गाया है, वह दिल के किसी कोने में एक नटखटपन जगा देता है और साथ हीं सुनिधि के साथ गाने को बाध्य भी करता है। मुझे आगे भी सुनिधि का यही रूप देखने की इच्छा थी, लेकिन हिमेश ने अंतरा में सुनिधि को बस "चियर लिडर" बना कर रख दिया है और गाने की बागडोर पूरी तरह से अपने हाथ में ले ली है। हिमेश की आवाज़ इस तरह के गानों में फबती है, लेकिन शब्दों का सही उच्चारण न कर पाना और अनचाही जगहों पर हद से ज्यादा जोर देना गाने के लिए हानिकारक साबित होते हैं। हिमेश "उच्चारण" संभाल लें तो कुछ बात बने। खैर अब हम दूसरे गाने की ओर बढते हैं।

सुजॊय - अब दूसरा गीत भी उसी हिमेश अंदाज़ का गाना है। उनकी एकल आवाज़ में सुनिए "रब्बा लक बरसा"। इस गीत में महेश भट्ट साहब ने वायस ओवर किया है। गाना बुरा नहीं है, लेकिन फिर एक बार वही बात कहना चाहूँगा कि अगर आप हिमेश फ़ैन हैं तो आपको यह गीत ज़रूर पसंद आएगा।

विश्व दीपक - जी आप सही कह रहे हैं। एक हिमेश फ़ैन हीं किसी शब्द का बारंबार इस्तेमाल बरदाश्त कर सकता है। आप मेरा इशारा समझ गए होंगे। हिमेश/समीर ने "लक लक लक लक" इतनी बार गाने में डाला है... कि "शक लक बूम बूम" की याद आने लगती है और दिमाग से यह उतर जाता है कि इस "लक़" का कुछ अर्थ भी होता है। एक तो यह बात मुझे समझ नहीं आई कि जब पूरा गाना हिन्दी/उर्दू में है तो एक अंग्रेजी का शब्द डालने की क्या जरूरत थी। मिश्र के पिरामिडों के बीच घूमते हुए कोई "लक लक" बरसा कैसे गा सकता है। खैर इसका जवाब तो "समीर" हीं दे सकते हैं। हाँ इतना कहूँगा कि इस गाने में संगीत मनोरम है, इसलिए खामियों के बावजूद सुनने को दिल करता है। विश्वास न हो तो आप भी सुनिए।

गीत: रब्बा लक़ बरसा


सुजॊय - अब इस एल्बम का तीसरा गीत और मेरे हिसाब से शायद यह इस फ़िल्म का सब से अच्छा गीत है। हिमेश रेशम्मिया के साथ इस गीत में आवाज़ है हर्षदीप कौर की। एक ठहराव भरा गीत है "आफ़रीन", जिसमें पारम्परिक साज़ों का इस्तेमाल किया गया है। ख़ास कर ढोलक का सुंदर प्रयोग सुनने को मिलता है गीत में। भले ही हर्षदीप की आवाज़ मौजूद हो गीत के आख़िर में, इसे एक हिमेश रेशम्मिया नंबर भी कहा जा सकता है।

विश्व दीपक - जी यह शांत-सा, सीधा-सादा गाना है और इसलिए दिल को छू जाता है। इस गाने के संगीत को सुनकर "तेरे नाम" के गानों की याद आ जाती है। हर्षदीप ने हिमेश का अच्छा साथ दिया है। हिमेश कहीं-कहीं अपने "नेजल" से अलग हटने की कोशिश करते नज़र आते हैं ,लेकिन "तोसे" में उनकी पोल खुल जाती है। अगर हिमेश ऐसी गलतियाँ न करें तो गीतकार भी खुश होगा कि उसके शब्दों के साथ छेड़छाड़ नहीं की गई है। फिर भी इतना कहा जा सकता है कि यह गाना एल्बम के बाकी गानों से बढिया है। तो लीजिए पेश है यह गाना।

गीत: आफ़रीन


सुजॊय - फ़िल्म का चौथा गीत भी एक युगल गीत है, इस बार हिमेश का साथ दे रहीं हैं श्रेया घोषाल। गीत के बोल हैं "तुझे देख के अरमान जागे"। आपको याद होगा अभी हाल ही में फ़िल्म 'हाउसफ़ुल' में एक गीत आया था "वाल्युम कम कर पप्पा जग जाएगा"। तो भई हम तो यहाँ पर यही कहेंगे कि वाल्युम कम कर नहीं तो पूरा मोहल्ला जग जाएगा। जी हाँ, "तुझे देख के अरमान जागे" के शुरु में हिमेश साहब कुछ ऐसी ऊँची आवाज़ लगाते हैं कि जिस तरह से उनके "झलक दिखला जा" गीत को सुन कर गुजरात के किसी गाँव में भूतों का उपद्रव शुरु हो गया था, अब की बार तो शायद मुर्दे कब्र खोद कर बाहर ही निकल पड़ें! ख़ैर, मज़ाक को अलग रखते हुए यह बता दूँ कि आगे चलकर हिमेश ने इस गीत को नर्म अंदाज़ में गाया है और श्रेया के आवाज़ की मिठास के तो कहने ही क्या। वो जिस गीत को भी गाती हैं, उसमें मिश्री और शहद घोल देती हैं।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, क्यों न लगे हाथों पांचवाँ गीत भी सुन लिया जाए| क्योंकि यह गीत भी हिमेश रेशम्मिया और श्रेया घोषाल की आवाजों में हीं है, और अब की बार बोल हैं "तेरीयाँ मेरीयाँ"। दोस्तों, जिस गीत में "ँ" का इस्तेमाल हो और अगर उस गाने में आवाज़ हिमेश रेशम्मिया की हो, तो फिर तो वही सोने पे सुहागा वाली बात होगी ना! नहीं समझे? अरे भई, मैं हिमेश रेशम्मिया के नैज़ल अंदाज़ की बात कर रहा हूँ। इस गीत में उन्हे भरपूर मौका मिला है अपनी उस मनपसंद शैली में गाने का, जिस शैली के लिए वो जाने भी जाते हैं और जिस शैली की वजह से वो एकाधिक बार विवादों से भी घिर चुके हैं। जहाँ तक इस गीत का सवाल है, संतूर की ध्वनियों का सुमधुर इस्तेमाल हुआ है। वैसे यह मैं नहीं बता सकता कि क्या असल में संतूर का प्रयोग हुआ है या उसकी ध्वनियों को सीन्थेसाइज़र के ज़रिये पैदा किया गया है। जो भी है, सुरीला गीत है, लेकिन श्रेया को हिस्सा कम मिला है इस गानें में।

गीत: तुझे देख के अरमान जागे


गीत: तेरीयां मेरीयां


सुजॊय - विश्व दीपक जी, मुझे ऐसा लगता है कि हिमेश रेशम्मिया जब भी कोई फ़िल्म करते हैं, तो अपने आप को ही सब से ज़्यादा सामने रखते हैं। बाके सब कुछ और बाकी सब लोग जैसे पार्श्व में चले जाते हैं। यह अच्छी बात नहीं है। अब आप उनकी कोई भी फ़िल्म ले लीजिए। वो ख़ुद इतने ज़्यादा प्रोमिनेन्स में रहते हैं कि वो फ़िल्म कम और हिमेश रेशम्मिया का प्राइवेट ऐल्बम ज़्यादा लगने लगता है। दूसरी फ़िल्मों की तो बात ही छोड़िए, 'कर्ज़', जो कि एक पुनर्जन्म की कहानी पर बनी कामयाब फ़िल्म का रीमेक है, उसका भी यही हाल हुआ है। ख़ैर, शायद यही उनका ऐटिट्युड है। आइए अब इस फ़िल्म का अगला गीत सुनते हैं "वो लम्हा फिर से जीना है"। हिमेश और हर्षदीप कौर की आवाज़ें, फिर से वही हिमेश अंदाज़। एक वक़्त था जब हिमेश के इस तरह के गानें ख़ूब चला करते थे, देखना है कि क्या बदलते दौर के साथ साथ लोगों का टेस्ट भी बदला है या फिर इस गीत को लोग ग्रहण करते हैं।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, इस गाने के साथ हीं क्यों न हम फ़िल्म का अंतिम गाना भी सुन लें| हिमेश और सुनिधि की आवाज़ें, और एक बार फिर से हिमेश का नैज़ल अंदाज़। ढोलक के तालों पर आधारित इस लोक शैली वाले गीत को सुन कर आपको अच्छा लगेगा। जैसा कि अभी अभी आपने कहा कि आजकल हिमेश जिस फ़िल्म में काम करते हैं, बस वो ही छाए रहते हैं, तो इस फ़िल्म में भी वही बात है। हर गीत में उनकी आवाज़, हर गाना वही हिमेश छाप। अपना स्टाइल होना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन अगर विविधता के लिए थोड़ा सा अलग हट के किया जाए तो उसमें बुराई क्या है? ख़ैर, मैं अपना वक्तव्य यही कहते हुए समाप्त करूँगा कि 'कजरारे' पूर्णत: हिमेश रेशम्मिया की फ़िल्म होगी।

गीत: वो लम्हा फिर से जीना है


गीत: सानु गुज़रा ज़माना याद आ गया


"कजरारे" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***

सुजॊय - हिमेश के चाहने वालों को पसंद आएँगे फ़िल्म के गानें, और जिन्हे हिमेश भाई का गीत-संगीत अभी तक पसंद नहीं आया है, उन्हें इस फिल्म से ज्यादा उम्मीदें नहीं रखनी चाहिए, मैं तो ये कहूँगा की उन्हें इस एल्बम से दूर ही रहना चाहिए|

विश्व दीपक - सुजॊय जी, मुझे यह लगता है कि हमें इस एल्बम को सिरे से नहीं नकार देना चाहिए, क्योंकि संगीत बढ़िया है और कुछ गाने जैसे कि "रब्बा लक़ बरसा", "कजरारे" और "आफरीन" खूबसूरत बन पड़े हैं| हाँ इतना है कि अगर हिमेश ने अपने अलावा दूसरों को भी मौक़ा दिया होता तो शायद इस एल्बम का रंग ही कुछ और होता| लेकिन हम कर भी क्या सकते हैं, हिमेश भाई और पूजा भट्ट को जो पसंद हो, हमें तो वही सुनना है| मैं बस यही उम्मीद करता हूँ कि आगे चलकर कभी हमें "नमस्ते लन्दन" जैसे गाने सुनने को मिलेंगे... तब तक के लिए "मिलेंगे मिलेंगे" :)

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ६१- "शाम-ए-ग़म की क़सम आज ग़मगीं हैं हम", इस गीत के साथ हिमेश रेशम्मिया का क्या ताल्लुख़ है?

TST ट्रिविया # ६२- "आपको कैसा लगेगा अगर मैं आपको नए ज़माने का एक गीत सुनाऊँ जिसमें ना कोई ख़त, ना इंतेज़ार, ना झिझक, ना कोई दर्द, बस फ़ैसला है, जिसमें हीरो हीरोइन को सीधे सीधे पूछ लेता है कि मुझसे शादी करोगी?" दोस्तॊम, ये अल्फ़ाज़ थे हिमेश रेशम्मिया के जो उन्होने विविध भारती पर जयमाला पेश करते हुए कहे थे। तो बताइए कि उनका इशारा किस गाने की तरफ़ था?

TST ट्रिविया # ६३- गीतकार समीर के साथ जोड़ी बनाने से पहले हिमेश रेशम्मिया की जोड़ी एक और गीतकार के साथ ख़ूब जमी थी जब उनके चुनरिया वाले गानें एक के बाद एक आ रहे थे और छा रहे थे। बताइए उस गीतकार का नाम।


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. पेण्टाग्राम
२. सोना महापात्रा
३. "give me some sunshine, give me some rain, give me another chance, I wanna grow up once again".

आलोक, आपने तीनों सवालों के सही जवाब दिए, इसलिए आपको पुरे अंक मिलते हैं| सीमा जी, इस बार आप पीछे रह गईं| खैर कोई बात नहीं, अगली बार......

Tuesday, June 1, 2010

बस प्यार का नाम न लेना, आइ हेट लव स्टोरीज़, यही गुनगुनाते आ पहुँचे हैं विशाल, शेखर, कुमार और अन्विता

ताज़ा सुर ताल २०/२०१०

सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' के आज के अंक में आप सब का स्वागत है। विश्व दीपक जी, पिछले हफ़्ते फ़िल्म 'काईट्स' प्रदर्शित हुई, लेकिन आश्चर्य की बात रही कि फ़िल्म को वो लोकप्रियता हासिल नहीं हो सकी जिसकी उम्मीदें की गईं थी। ऐसा सुनने में आया है कि जिन लोगों को अंग्रेज़ी फ़िल्में देखने का शौक है, उन्हे यह फ़िल्म पसंद आई, लेकिन बॊलीवुड मसाला फ़िल्मों के दर्शकों को यह फ़िल्म ज़्यादा हज़म नहीं हुई। आपके क्या विचार हैं 'काइट्स' को लेकर?

विश्व दीपक - सुजॊय जी, मैंने अभी तक काईट्स देखी नहीं है, इसलिए कुछ भी कहने की हालत में नहीं हूँ। इस शनिवार देखने का विचार है, उसी के बाद अपने विचार जाहिर करूँगा। हाँ, लेकिन यह तो है कि ज्यादातर दर्शकों को फिल्म की कहानी में कुछ भी नया नज़र नहीं आया है, उन सब का कहना है कि ऋतिक रोशन का इस फिल्म के लिए ढाई साल का ब्रेक लेना हजम नहीं होता। वहीं मुझे एकाध ऐसे भी लोग मिले हैं जिन्हें यह फिल्म "फिल्मांकन" (सिनेमाटोग्राफी) के कारण पसंद आई है तो दो-चार ऐसे भी हैं जिन्हें बारबारा मोरी के अभिनय ने प्रभावित किया है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस फिल्म को इसी के हाईप (हद से ज्यादा प्रचार और उम्मीदों) से सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है।

सुजॊय - चलिए, हम काईट्स से आगे बढते हैं। आज हम जिस फ़िल्म के संगीत की चर्चा करने जा रहे हैं, उस फ़िल्म से भी लोगों की उम्मीदें हैं। और क्यों ना हो जब फ़िल्म करण जोहर के 'धर्मा प्रोडक्शन्स' के बैनर तले बन रही हो! जी हाँ, आज 'ताज़ा सुर ताल' में ज़िक्र 'आइ हेट लव स्टोरीज़' के संगीत की।

विश्व दीपक - इस फ़िल्म के संगीत की चर्चा तो हम करेंगे, लेकिन आपने ग़ौर किया है कि फ़िल्म के टाईटल को किस तरह से स्पेल किया गया है? 'I Hate Luv Storys' - जिस तरह से हम SMS में टाइप करते हैं, उसी शैली को अपनाया गया है, शायद टाईटल के ज़रिये भी आज के युवा वर्ग को आकर्षित करने का प्रयास हुआ है। ख़ैर, 'आइ हेट लव स्टोरीज़' में इमरान ख़ान और सोनम कपूर ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई हैं। मूलत: यह एक रोमांटिक कॊमेडी है जिसका निर्देशन किया है नवोदित निर्देशक पुनीत मल्होत्रा ने, जो मशहूर डिज़ाइनर मनीष मल्होत्रा के भतीजे हैं और जिन्होने पहले करण जोहर के सहायक के रूप में काम कर चुके हैं। यह फ़िल्म प्रदर्शित हो रही है २ जुलाई के दिन।

सुजॊय - इस फ़िल्म में संगीत है विशाल-शेखर का, और गानें लिखे हैं अन्विता दत्त गुप्तन, कुमार और विशाल दादलानी। विशाल-शेखर का ट्रैक-रिकार्ड अच्छा रहा है। 'ओम शांति ओम', ’दोस्ताना’ और 'बचना ऐ हसीनों' के हिट संगीत के बाद अब देखना है कि क्या उनका कमाल इस फ़िल्म में भी चलता है। वैसे काफ़ी यंग फ़िल्म है और म्युज़िक भी भी उसी अंदाज़ का है। तो सुनते हैं पहला गीत जिसे विशाल दादलानी ने गाया है और लिखा है अन्विता ने।

गीत: जब मिला तू


सुजॊय - यह एक पेप्पी नंबर था, और कई ईलेक्ट्रॊनिक इन्स्ट्रूमेण्ट्स के इस्तेमाल से एक शार्प फ़ील आया है गीत में। "रु तु रु तु" गीत का कैच लाइन है जो गीत को दिल-ओ-दिमाग़ पर बसाने का काम करता है। विशाल ने अपने जानदार गायकी से गीत को वही रफ़ फ़ील दिया है जिसकी इस गीत को ज़रूरत थी। अच्छी बात यह भी है कि पाश्चात्य और पेपी नंबर होते हुए भी गीत के बोल वज़नदार हैं। कहने का मतलब यह कि सिर्फ़ संगीत पर ही नहीं, बल्कि बोलों पर भी ध्यान दिया गया है। और विश्व दीपक जी, अन्विता के लिखे इस गीत को सुनते हुए यकायक फ़िल्म 'दोस्ताना' के "जाने क्यों दिल चाहता है" गीत की याद आ ही जाती है। कुछ कुछ वैसा अंदाज़ मिलता है इस गीत में। मेरे ख़याल से तो इस गीत को अच्छा रेस्पॊन्स मिलने वाला है।

विश्व दीपक - जी सुजॊय जी, मेरा भी यही ख्याल है। जहाँ विशाल अपनी अलग तरह की आवाज़ के लिए जाने जाते हैं तो अन्विता भी इन दिनों अपने शब्दों का लोहा मनवा रही हैं। मेरे जहन में अन्विता का लिखा "खुदा जाने" (बचना ऐ हसीनों) अभी तक जमा हुआ है। तब से मैं इनकी लेखनी का फैन हूँ। अभी हाल में हीं "बदमाश कंपनी" का "चस्का" भी इनके लफ़्ज़ों के कारण लीक से हटकर साबित हुआ है। गौरतलब है कि बालीवुड में महिला गीतकारों की बेहद कमी है, इसलिए दुआ करता हूँ कि अन्विता इस पुरूष-प्रधान संगीत की दुनिया में अपना स्थान पक्का कर लें।

सुजॊय - आमीन! चलिए अब सुना जाए दूसरा गीत जिसे शफ़ाक़त अमानत अली और सुनिधि चौहान ने गाया है, गीतकार हैं विशाल दादलानी। जी हाँ, विशाल आज के दौर के उन गिने चुने कलाकारों में से हैं जो एक संगीतकार भी हैं, एक गायक भी, और एक गीतकार के हैसियत से भी अच्छा परिचय दे रहे हैं। कोरस और अकॊस्टिक गिटार के साथ गीत आरम्भ होता है। शफ़ाक़त अमानत अली, जो करण जोहर की कई फ़िल्मों में गीत गा चुके हैं ("मितवा" - कभी अलविदा ना कहना, "तेरे नैना" - माइ नेम इज़ ख़ान), इस गीत में भी उनकी आवाज़ ने वही असर किया है, और इस गीत के मूड के मुताबिक उनकी आवाज़ अच्छी जमी है।

गीत: बिन तेरे


विश्व दीपक - गीत को सुनकर यह कहना ही पड़ेगा कि विशाल दादलानी एक बहुत ही अच्छे गीतकार हैं। उन्होंने इस गीत में रोमांस का माहौल बनाने के लिए उर्दू का जिस तरह इस्तेमाल किया है, वैसा इस्तेमाल आजकल के गीतों में बहुत कम ही सुनाई देता है। सुनिधि की आवाज़ इस गीत में अंतिम हिस्से में आतॊ है और बहुत ही नाज़ुकी के साथ उन्होने गाया है। दर=असल सुनिधि के आवाज़ के दो रूप हैं, एक रूप वह जिसमें वो "धूम मचाले" और "ऐसा जादू डाला रे" जैसे गीत गाती हैं और दूसरा रूप वह जिसमें वो इस तरह की नरमी वाले गानें गाती हैं। और दोनों ही में उन्हे महारथ हासिल है। इसमें कोई शक़ नहीं कि इस दौर की अग्रणी गायिका हैं सुनिधि। लेकिन जहाँ तक इस गीत की बात है, कुछ कमी सी लगती है, वह एक्स-फ़ैक्टर मिसिंग है जो गीत को हिट बनाने के लिए ज़रूरी होता है। देखते हैं कैसा चलता है यह गीत।

सुजॊय - और अब इस फ़िल्म का शीर्षक गीत और एक बार फिर विशाल दादलानी की आवाज़। इस बार गीतकार हैं कुमार। गीत एक डान्स नंबर है जिसकी धुन बहुत ही कैची है, बहुत ही ऐडिक्टिव है, जिसे फ़िल्म के परदे पर इमरान ख़ान एक क्लब में डान्स करते हुए नज़र आएँगे। 'जाने तू या जाने ना' के "पप्पु काण्ट डान्स साला" के लोकप्रिय डान्स के बाद अब देखना यह है कि क्या इस डान्स नंबर को भी वही सफलता प्राप्त होती है। चलिए गीत सुन लेते हैं, फिर इस गीत की थोड़ी और चर्चा करते हैं।

गीत: आइ हेट लव स्टोरीज़


सुजॊय - "मिल गए जो छोरा छोरी, हुई मस्ती थोड़ी थोड़ी, बस प्यार का नाम ना लेना, आइ हेट लव स्टोरीज़" - शायद आज की युवा पीढी को काफ़ी रास आएँगे ये बोल। जो भी है, विशाल दादलानी ने फिर एक बार गायक और संगीतकार की दोहरी भूमिका निभाई है। कुमार के शब्द हास्यप्रद होते हुए भी रचनात्मक सुनाई देते हैं। जिस तरह का चलन आज कर फ़िल्मी गीतों में छाया हुआ है कि हर गीत में कुछ कुछ अंग्रेज़ी के शब्द डाले जा रहे हैं, तो इस फ़िल्म के गीतों में भी मौजूद हैं, और विशाल शेखर एक ऐसे संगीतकार रहे हैं जिन्होने इस शैली का काफ़ी इस्तेमाल किया है।

विश्व दीपक - जी सही कह रहे हैं आप। मज़े की बात तो यह है कि अन्विता की तरह "कुमार" भी विशाल-शेखर के काफी प्रिय हैं। आप ’दोस्ताना’ का ’माँ दा लाडला’ कैसे भूल सकते हैं! कुमार इस तरह के गाने लिखने में खासे माहिर हैं। इन दिनों तो "कुमार" लगभग हर फिल्म में नज़र आ रहे हैं। जैसे कि "आल द बेस्ट", "जश्न", "दिल दोस्ती इटीसी", "चांस पे डांस", "गोलमाल", "गोलमाल रिटर्न्स", "सिकंदर" और "लाईफ़ पार्टनर"। वैसे क्या आपको यह पता है कि "ओम शांति ओम" में "जावेद अख्तर" और "विशाल दादलानी" (आँखों में तेरे) के अलावा एक और गीतकार थे और वो थे "कुमार"। उन्होंने उस फिल्म का सबसे ज्यादा सोलफुल नंबर (जग सूना-सूना लागे) लिखा था। मुझे यह बात जानकर बड़ा हीं सुखद आश्चर्य हुआ और मैं इस बात को आपसे शेयर किए बिना नहीं रह पाया।

सुजॊय - अरे वाह! मुझे तो यह पता हीं नहीं था। हम आगे बढेंगे तो हमें ऐसी हीं और भी बातें मालूम चलेंगी। तो चलिए फ़िल्म का चौथा गीत सुनते हैं जिसमें आवाज़ें हैं श्रेया घोषाल और सोना महापात्रा की। श्रेया का नाम सुनते ही सॊफ़्ट रोमांटिक गीत की कल्पना हम करते हैं। इस गीत में भी वही बात है। ९० के दशक में कई गीत ऐसे बने थे जिनमें इला अरुण ने राजस्थानी लोक शैली में कुछ कुछ पंक्तियाँ गाईं थीं जैसे कि फ़िल्म 'लम्हे' में "मोरनी बागा मा बोले आधी रात मा" या फिर "मेघा रे मेघा", फ़िल्म 'बटवारा' में "हाए उसके डंक बिछवा का", आदि। इन सभी गीतों में मुख्य गायिका रहीं लता जी। अब 'आइ हेट...' के इस गानें में मुख्य गायिका हैं श्रेया और राजस्थानी के शब्द गाईं हैं सोना महापात्रा ने। इन दोनों की आवाज़ों में जो कॊन्ट्रास्ट है, वही है गीत का आकर्षण। "बहारा बहारा हुआ दिल पहली बार है", सुनते हैं यह गीत और देखें कि आपका दिल भी बहारा हो पाता है या नहीं। और इस गीत के ज़रिए इस चिलचिलाती गरमी में हम निमंत्रण देते हैं सावन को। गीतकार हैं कुमार।

गीत: बहारा बहारा हुआ दिल पहली बार है


विश्व दीपक - सुजॊय जी, आपने तो इस गीत के बारें में सब कुछ हीं कह दिया है। इसलिए मेरे कहने के लिए कुछ ज्यादा नहीं बचता। फिर भी मैं सोना महापात्रा के बारे में कुछ बताना चाहूँगा। सोना कालेज आफ़ इन्जीनियरिंग एंड टेक्नोलोजी, भुवनेश्वर से अभियांत्रिकी स्नातक (बी०ई०) हैं, उन्होंने पुणे के सिम्बायोसिस से एम०बी०ए० की डिग्री हासिल की है और वो मारिको, इंडिया में बांड मैनेजर भी रह चुकी हैं। उनकी छोटी बहन प्रतीचि महापात्रा "विवा" बैंड के लिए गाती हैं। विशाल-शेखर की प्रिय "अनुश्का मनचंदा" भी इसी बैंड की हैं। सोना का पहला वीडियो सिंगल "बोलो ना" एम०टी०वी० पे सबसे ज्यादा देखा गया और फरमाईश किया गया वीडियो है। वहीं "तेरे इश्क़ नचाया" तो इतना ज्यादा म़क़बूल हुआ कि इसे विश्व के अमूमन हर चैनल पर प्रसारित किया गया। कुल मिलाकर "सोना" को ब्युटी विद व्याएस एंड ब्रेन कहा जा सकता है।

सुजॊय - जी। वैसे क्या आपको यह पता है कि "सोना" का नया एलबम "दिलजले" हिन्दुस्तान का पहला और एकमात्र ऐसा डिजीटल एलबम है जिसे पूरे विश्व के नोकिया म्युज़िक स्टोर्स में एक साथ रीलिज किया गया/जा रहा है। इस एलबम में संगीत है "राम संपत" का और बोल लिखे हैं "मुन्ना धीमन" और "राम संपत" ने। खैर ये सब बातें कभी और। अभी तो इस फ़िल्म के अंतिम गीत की बारी है। सूरज जगन और महालक्ष्मी अय्यर की आवाज़ों में "सदका किया यूँ इश्क़ का", बोल अन्विता के। साधारणत: सूरज जगन ने अब तक तेज़ और हार्ड हिटिंग रॊक शैली के गाने गाए हैं, लेकिन इस गीत में उनके आवाज़ के नरम पक्ष का परिचय हमें मिलता है। लगता है इस गीत को वही कामयाबी मिलेगी जो कामयाबी "ख़ुदा जाने ये क्या हुआ है" को मिली है। विश्व दीपक जी, आपका क्या कहना है इस गीत के बारे में?

विश्व दीपक - इस गीत की जो बात मुझे सबसे ज्यादा पसंद आई, वह है इस गीत का "कैची फ्रेज" यानि कि "सदका किया"। "अन्विता" ने बहुत हीं प्यारा लेकिन अनूठा शब्द हमारे बीच रखा है। मैं ज्यादा गहराई में तो नहीं जाना चाहूँगा लेकिन इतना बताता चलूँ कि सदका करने का अर्थ होता है ईश्वर या अल्लाह के नाम पर दान करना, किसी पर कुछ निछावर करना। आपने "सदके जाऊँ" का इस्तेमाल तो कई जगह देखा और सुना होगा। तो वहाँ भी यही सदका है। अरे, सदका करते-करते तो मैं "सूरज जगन" को भूल हीं गया। माफ़ कीजिएगा। तो जहाँ तक "सूरज" का सवाल है तो हमने उन्हें पहली मर्तबा "प्यार में कभी-कभी" में "हम नवजवां" गाते हुए सुना था। लेकिन वह गाना कुछ ज्यादा चला नहीं, इसलिए सूरज का भी नाम न हुआ। सही मायनें में सूरज को जाना गया "दिल दोस्ती ईटीसी" के "दम लगा" के कारण। उसके बाद "रॊक ऒन" के "जहरीले" ने तो उन्हें "रॊक स्टार" हीं बना दिया। आगे की कहानी तो जगजाहिर है। तो चलिए हम इसी बात पर "सदका किया" का लुत्फ़ उठाते हैं।

गीत: सदका किया


"आइ हेट लव स्टोरीज़" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****

सुजॊय - इस पूरे एल्बम की बात करें तो मुझे इसके ज़्यादातर गानें पसंद आए हैं, ख़ास तौर से "जब मिला तू", "बहारा बहारा" और "सदका किया"। विशाल शेखर ने हमें निराश नहीं किया।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, निराश करना तो दूर की बात है, उल्टे मैं यह कहूँगा कि विशाल-शेखर उम्मीदों से बढकर साबित हुए हैं। मुझे इस फिल्म के सारे गाने पसंद आएँ। इन पाँच गानों के अलावा एलबम में दो और गाने हैं- पहला शेखर की आवाज़ में बिन तेरे (रिप्राईज) और दूसरा राहत फतेह अली खान की आवाज़ में बहारा (चिल वर्सन)। ये दोनों वर्सन्स भी कमाल के बन पड़े हैं। मैं सभी पाठकों/श्रोताओं से यह आग्रह करूँगा कि वे इन दोनों गानों को भी जरूर सुनें, खासकर शेखर की आवाज़ में "बिन तेरे"। इस गाने में "शेखर" की आवाज़ को बेहद सराहा गया है।

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ५८- फ़िल्मी संगीतकार बनने से पहले विशाल दादलानी किस मशहूर बैण्ड में गाया करते थे(आज भी गाते हैं)?

TST ट्रिविया # ५९- आपने पहली बार फ़िल्म 'फ़ैमिली' में गीत गाया था। उसके बाद फ़िल्म 'जम्बो' में सोनू निगम के साथ आपने अपना पहला युगल गीत गाया था। आपने इंजिनीयरिंग् की हुई है और आप एम.बी.ए. भी हैं। बताइए हम किस गायक/गायिका की बात कर रहे हैं?

TST ट्रिविया # ६०- सूरज जगन ने हाल में एक ब्लॊकबस्टर फ़िल्म में एक गीत गाया था जो बेहद बेहद कामयाब हुई थी। गीत के बोल अंग्रेज़ी के थे जिसका भाव कुछ ऐसा था कि मुझे एक मौका और दे दो, मैं फिर से एक बार छोटे से बड़ा होना चाहता हूँ। बहुत आसान है, बताइए हम सूरज जगन के गाए किस गीत की बात कर रहे हैं?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. किशोर कुमार की जीवनी पर बनने वाली फ़िल्म में रणबीर किशोर दा का चरित्र निभाएँगे। लता से किशोर दा की शख़सीयत के कुछ पहलुओं से अपने आप को अवगत करवाने के लिए वो लता जी से मिलने वाले थे।
२. फ़िल्म 'बाबुल' का "कहता है बाबुल ओ मेरी बिटिया"।
३. फ़िल्म 'हिप हिप हुर्रे' में।

सीमा जी, आपने पहले सवाल का सही जवाब दिया है। तीसरे सवाल में आप बहुत नज़दीक थीं। बधाई स्वीकारें!!

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ