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Thursday, January 26, 2012

शत्रुओं की छाती पर लोहा कुट.. बाबा नागार्जुन की हुंकार के साथ आईये करें गणतंत्र दिवस का स्वागत

महफ़िल-ए-ग़ज़ल ०२


बचपन बीत जाता है, बचपना नहीं जाता। बचपन की कुछ यादें, कुछ बातें साथ-साथ आ जाती हैं। उम्र की पगडंडियों पर चलते-चलते उन बातों को गुनगुनाते रहो तो सफ़र सुकून से कटता है। बचपन की ऐसी हीं दो यादें जो मेरे साथ आ गई हैं उनमें पहली है कक्षा सातवीं से बारहवीं तक (हाँ मेरे लिए बारहवीं भी बचपन का हीं हिस्सा है) पढी हुईं हिन्दी कविताएँ और दूसरी है साल में कम-से-कम तीन दिन देशभक्त हो जाना। आज २६ जनवरी है तो सोचा कि इन दो यादों को एक साथ पिरोकर एक ऐसे कवि और उनकी ऐसी कविताओं का ताना-बाना बुना जाए जिससे महफ़िल की पहचान बढे और आज के लिए थोड़ी बदले भी (बदलने की बात इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि आज की महफ़िल में उर्दू की कोई ग़ज़ल नहीं, बल्कि हिन्दी की कुछ कविताएँ हैं)



मैंने बचपन की किताबों में कईयों को पढा और उनमें से कुछ ने अंदर तक पैठ भी हासिल की। ऐसे घुसपैठियों में सबसे आगे रहे बाबा नागार्जुन यानि कि ग्राम तरौनी, जिला दरभंगा के वैद्यनाथ मिश्र। अभी तक कंठस्थ है मुझे "बादल को घिरते देखा है"।


शत-शत निर्झर-निर्झरणी कल 
मुखरित देवदारु कनन में, 
शोणित धवल भोज पत्रों से 
छाई हुई कुटी के भीतर, 
रंग-बिरंगे और सुगंधित 
फूलों की कुंतल को साजे, 
इंद्रनील की माला डाले 
शंख-सरीखे सुघड़ गलों में, 
कानों में कुवलय लटकाए, 
शतदल लाल कमल वेणी में, 
रजत-रचित मणि खचित कलामय 
पान पात्र द्राक्षासव पूरित 
रखे सामने अपने-अपने 
लोहित चंदन की त्रिपटी पर, 
नरम निदाग बाल कस्तूरी 
मृगछालों पर पलथी मारे 
मदिरारुण आखों वाले उन 
उन्मद किन्नर-किन्नरियों की 
मृदुल मनोरम अँगुलियों को 
वंशी पर फिरते देखा है।


एक साँस में इतना कुछ लिख और पढ जाना मेरे लिए नामुमकिन के बराबर था(है)। और ऊपर से... सारे बिंब अतुलनीय। "कहाँ गया धनपति कुबेर वह, कहाँ गई उसकी वह अल्का.. नहीं ठिकाना कालिदास के व्योमप्रवाही गंगाजल का"... ईमानदारी से कहूँ तो यह बाबा नागार्जुन हीं थे जिन्होंने मुझे कालिदास से जोड़ा। मेरे हिसाब से वे कालिदास के मुँहलग्गु थे.. तभी तो उन्होंने कालिदास से सीधे-सीधे पूछ लिया कि:


वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका 
प्रथम दिवस आषाढ़ मास का 
देख गगन में श्याम घन-घटा 
विधुर यक्ष का मन जब उचटा 
खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर 
चित्रकूट से सुभग शिखर पर 
उस बेचारे ने भेजा था 
जिनके ही द्वारा संदेशा 
उन पुष्करावर्त मेघों का 
साथी बनकर उड़ने वाले 
कालिदास! सच-सच बतलाना 
पर पीड़ा से पूर-पूर हो 
थक-थककर औ' चूर-चूर हो 
अमल-धवल गिरि के शिखरों पर 
प्रियवर! तुम कब तक सोये थे? 
रोया यक्ष कि तुम रोये थे!


ये दो कविताएँ महज कविताएँ नहीं मेरे लिए हिन्दी साहित्य का मुख्यद्वार थीं। साहित्य में मेरी अभिरूचि पैदा हुई तो बाबा की दूसरी कविताओं को ढूँढ कर पढना शुरू किया। और अब जो बाबा मेरे सामने मौजूद थे, वे पहले के बाबा से निपट उल्टे थे। भारी-भरकम संस्कृतमय हिन्दी के शब्दों को गूंथने वाले बाबा को मैंने जब यह कहते सुना कि:


आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी, 
यही हुई है राय जवाहरलाल की 


इन्दु जी, इन्दु जी, क्या हुआ आपको? 
सत्ता की मस्ती में, भूल गई बाप को?


या फिर "भाई मोरारजी" को श्रद्धांजलि देती हुई ये पंक्तियां पढीं:


हाय तुम्हारे बिना लगेगा सूना यह संसार जी, 
गिरवी कौन रखेगा हमको सात समंदर पार जी


तो मालूम चला कि बाबा का असल रूप यही है। "खिचड़ी विप्लव देखा हमने" नाम के कविता-संग्रह में उन्होंने इंमरजेंसी के पक्ष और विपक्ष दोनों की जो बघ्घियां उधेड़ी हैं, उसका सानी कहीं नहीं.. कोई नहीं। न यकीन आए तो "जाने तुम कैसी डायन हो" और "तुनुक मिजाजी नहीं चलेगी" नाम की ये दो कविताएँ देखें। बाबा किसी एक विचारधारा से बंधे ने थे, वे जनवादी थे, जनता के लिए लिखते थे और हमेशा जनता के साथ खड़े होते थे। तभी तो इमरजेंसी के खिलाफ हुए "संपूर्णक्रांति आंदोलन" में जेल जाने के बावजूद जब उन्हें लगा कि आंदोलन दिशाहीन हो रहा है तो उन्होंने "जयप्रकाश नारायण" को संबोधित करते हुए कहा कि:


खिचड़ी विप्लव देखा हमने, 
भोगा हमने क्रांति विलास,
अब भी खत्म नहीं होगा क्या
पूर्णक्रांति का भ्रांति विलास?


बाबा अपने जीवनकाल में हर अन्याय के खिलाफ मुखर रहे। अपनी बातों को व्यंग्य के रूप में पेश करने में उनका कोई जवाब न था। उनके मन में जो आया,  उन्होंने सो लिखा। आज हम आपके लिए उनकी ऐसी हीं एक रचना लेकर आए हैं जो क्रांति, शांति, भाषण, प्रवचन और घोषणाओं जैसे हर एक गोरखधंधे पर कुठाराघात करती है।


भागलपुर के सुलतानगंज में जन्मे संजय झा की एक अदना-सी कोशिश थी "स्ट्रिंग्स.. बाउंड बाई फेथ" नाम की फिल्म। कुंभ मेले पर आधारित यह फिल्म कुंभ के साधुओं के विरोध के कारण रीलिज तो नहीं हो पाई, लेकिन इस फिल्म के एक गाने ने बाबा के विध्वंसक शब्दों की वज़ह से सबका (कम से कम मेरा) ध्यान खींचा। इस गाने को अपने अलहदा और हुंकारमय संगीत से सजाया है ज़ुबिन गर्ग ने और आवाज़ें हैं खुद ज़ुबिन, सौरन रॉय चौधरी और आजकल पापोन के नाम से लोकप्रिय अंगरंग महंता की।


ॐ के आह्वान के साथ "हमेशा-हमेशा राज करेगा मेरा पोता" (इशारा तो समझ हीं रहे होंगे) जैसा व्यंग्य, "शत्रुओं की छाती पर लोहा कुट" जैसी हुंकार और "इसी पेट के अंदर समा जाए सर्वहारा" जैसा विषाद महसूस करते चलें तो आज के दिन बाबा को याद करने/कराने की मेरी कोशिश सफल हो जाएगी।

ॐ श‌ब्द ही ब्रह्म है..
ॐ श‌ब्द्, और श‌ब्द, और श‌ब्द, और श‌ब्द
ॐ प्रण‌व‌, ॐ नाद, ॐ मुद्रायें
ॐ व‌क्तव्य‌, ॐ उद‌गार्, ॐ घोष‌णाएं
ॐ भाष‌ण‌...
ॐ प्रव‌च‌न‌...
ॐ हुंकार, ॐ फ‌टकार्, ॐ शीत्कार
ॐ फुस‌फुस‌, ॐ फुत्कार, ॐ चीत्कार
ॐ आस्फाल‌न‌, ॐ इंगित, ॐ इशारे
ॐ नारे, और नारे, और नारे, और नारे

ॐ स‌ब कुछ, स‌ब कुछ, स‌ब कुछ
ॐ कुछ न‌हीं, कुछ न‌हीं, कुछ न‌हीं
ॐ प‌त्थ‌र प‌र की दूब, ख‌रगोश के सींग
ॐ न‌म‌क-तेल-ह‌ल्दी-जीरा-हींग
ॐ मूस की लेड़ी, क‌नेर के पात
ॐ डाय‌न की चीख‌, औघ‌ड़ की अट‌प‌ट बात
ॐ कोय‌ला-इस्पात-पेट्रोल‌
ॐ ह‌मी ह‌म ठोस‌, बाकी स‌ब फूटे ढोल‌

ॐ इद‌मान्नं, इमा आपः इद‌म‌ज्यं, इदं ह‌विः
ॐ य‌ज‌मान‌, ॐ पुरोहित, ॐ राजा, ॐ क‌विः
ॐ क्रांतिः क्रांतिः स‌र्व‌ग्वंक्रांतिः
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः स‌र्व‌ग्यं शांतिः
ॐ भ्रांतिः भ्रांतिः भ्रांतिः स‌र्व‌ग्वं भ्रांतिः
ॐ ब‌चाओ ब‌चाओ ब‌चाओ ब‌चाओ
ॐ ह‌टाओ ह‌टाओ ह‌टाओ ह‌टाओ
ॐ घेराओ घेराओ घेराओ घेराओ
ॐ निभाओ निभाओ निभाओ निभाओ

ॐ द‌लों में एक द‌ल अप‌ना द‌ल, ॐ
ॐ अंगीक‌रण, शुद्धीक‌रण, राष्ट्रीक‌रण
ॐ मुष्टीक‌रण, तुष्टिक‌रण‌, पुष्टीक‌रण
ॐ ऎत‌राज़‌, आक्षेप, अनुशास‌न
ॐ ग‌द्दी प‌र आज‌न्म व‌ज्रास‌न
ॐ ट्रिब्यून‌ल‌, ॐ आश्वास‌न
ॐ गुट‌निरपेक्ष, स‌त्तासापेक्ष जोड़‌-तोड़‌
ॐ छ‌ल‌-छंद‌, ॐ मिथ्या, ॐ होड़‌म‌होड़
ॐ ब‌क‌वास‌, ॐ उद‌घाट‌न‌
ॐ मारण मोह‌न उच्चाट‌न‌

ॐ काली काली काली म‌हाकाली म‌हकाली
ॐ मार मार मार वार न जाय खाली
ॐ अप‌नी _________
ॐ दुश्म‌नों की पामाली
ॐ मार, मार, मार, मार, मार, मार, मार
ॐ अपोजीश‌न के मुंड ब‌ने तेरे ग‌ले का हार
ॐ ऎं ह्रीं क्लीं हूं आङ
ॐ ह‌म च‌बायेंगे तिल‌क और गाँधी की टाँग
ॐ बूढे की आँख, छोक‌री का काज‌ल
ॐ तुल‌सीद‌ल, बिल्व‌प‌त्र, च‌न्द‌न, रोली, अक्ष‌त, गंगाज‌ल
ॐ शेर के दांत, भालू के नाखून‌, म‌र्क‌ट का फोता
ॐ ह‌मेशा ह‌मेशा राज क‌रेगा मेरा पोता
ॐ छूः छूः फूः फूः फ‌ट फिट फुट
ॐ श‌त्रुओं की छाती पर लोहा कुट
ॐ भैरों, भैरों, भैरों, ॐ ब‌ज‌रंग‌ब‌ली
ॐ बंदूक का टोटा, पिस्तौल की न‌ली
ॐ डॉल‌र, ॐ रूब‌ल, ॐ पाउंड
ॐ साउंड, ॐ साउंड, ॐ साउंड

ॐ ॐ ॐ
ॐ ध‌रती, ध‌रती, ध‌रती, व्योम‌, व्योम‌, व्योम‌, व्योम‌
ॐ अष्ट‌धातुओं के ईंटो के भ‌ट्टे
ॐ म‌हाम‌हिम, म‌हम‌हो उल्लू के प‌ट्ठे
ॐ दुर्गा, दुर्गा, दुर्गा, तारा, तारा, तारा
ॐ इसी पेट के अन्द‌र स‌मा जाय स‌र्व‌हारा
ह‌रिः ॐ त‌त्स‌त, ह‌रिः ॐ त‌त्स‌त‌


नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस गाने/ग़ज़ल/नज़्म को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3

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खेल महफ़िल का:

जो भी महफ़िल-ए-ग़ज़ल के पुराने श्रोता हैं वो यह जानते होंगे कि गायब शब्द का मतलब क्या है। जो नए हैं उन्हें बता दें कि हम हर कड़ी में पेश की गई ग़ज़ल/नज़्म/कविता से एक शब्द हटा दिया करेंगे, जिसको लेकर पाठकों को या तो खुद से कुछ लिखना है या किसी नामचीन ग़ज़लगो/कवि की वे पंक्तियाँ टिप्पणी में डालनी हैं जिसमें यह शब्द मौजूद हो। तो अब आपकी बारी है..... खेल शुरू किया जाए!!!



पुराना हिसाब:

सही शब्द:  क़तरा
बधाईयाँ:  रीतेश जी
चंद शेर:

तुझको एक क़तरा भी न ग़म मिले,
अपना हक़ तमाम लिया है इसलिए - रीतेश जी

इशरत-ए-कतरा है दरिया में फ़ना हो जाना,
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना - चचा ग़ालिब


तो चलिए गिरता है आज की महफ़िल का परदा।

साक़ी-ए-महफ़िल-  विश्व दीपक

Monday, September 1, 2008

मासिक टॉप 10 पन्ने

पाठकों का रूख क्या है? यह जानने के लिए यह टेबल उपयोगी है। हम डायरेक्ट विजीट के आधार पर प्रत्येक माह के शीर्ष १० पोस्टों को प्रदर्शित कर रहे हैं।

आवाज़ पर जुलाई २००८ के टॉप १० पन्ने

RankPage TitleDirect VisitsTotal Page Views
1बढ़े चलो452818
2संगीत दिलों का उत्सव है404772
3आवारादिल400583
4तेरे चेहरे पे263422
5अलविदा इश्मित158179
6पॉडकास्ट कवि सम्मेलन155210
7सीखिए गायकी के गुर130160
8मानसी का साक्षात्कर107172
9नैना बरसे रिमझिम-रिमझिम98163
10झूमो रे दरवेश76118

Stats from 1 July 2008 to 31 July 2008
Source: FeedBurner

आवाज़ पर अगस्त २००८ के टॉप १० पन्ने

RankPage TitleDirect VisitsTotal Page Views
1मैं नदी366612
2मेरे सरकार265410
3चले जाना263448
4जीत के गीत225452
5बे-इंतहा170312
6ऑनलाइन काव्यपाठ और अभिनय का मौका140208
7आसाम के लोकसंगीत का ज़ादू132170
8वो खंडवा का शरारती छोरा130199
9सूफी संगीत भाग दो112151
10लौट चलो पाँव पड़ूँ तोरे श्याम83124

Stats from 1 August 2008 to 31 August 2008
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आवाज़ पर सितम्बर २००८ के टॉप १० पन्ने

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1कहने को हासिल सारा जहाँ था304351
2चलो एक बार फिर से265329
3अहमद फ़‌राज़ की शायरी279321
4दोस्तों ने निभा दी दुश्मनी प्यार से254288
5प्रेमचंद की कहानी 'प्रेरणा'237264
6ओ मुनिया216234
7कोई ना रोको दिल की उड़ान को॰॰157178
8गाइए गणपति जगवंदन135168
9हाहाकार और बालिका-वधू122148
10सच बोलता है मुँह पर120136

Stats from 1 September 2008 to 30 September 2008
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आवाज़ पर अक्टूबर २००८ के टॉप १० पन्ने

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1करवाचौथ पर कविता तथा संगीतबद्ध गीत310367
2राकेश खंडेलवाल की पुस्तक का विमोचन222271
3ऐसा नही कि आज मुझे चाँद चाहिए221265
4डरना-झुकना छोड़ दे191247
5माह का पॉडकास्ट कवि सम्मेलन179210
6जी॰बी॰ रोड पर एक फिल्म195208
7सूरज, चंदा और सितारें158186
8आखिरी बार बस, तेरा दीदार160185
9सांसों की माल में सिमरूँ मैं94118
10बेकरार कर के हमें यूँ न जाइए89102

Stats from 1 October 2008 to 31 October 2008
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आवाज़ पर नवम्बर २००८ के टॉप १० पन्ने

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1छठ-पर्व विशेष पृष्ठ226269
2हुस्न205237
3उड़ता परिंदा169192
4पाकिस्तानी बैंड गीत-माहिया119134
5तू रूबरू89130
6प्रेमचंद की कहानी 'देवी'95116
7सुनीता यादव का साक्षात्कार91106
8पर्यावरण बचाओ- Go Green86102
9षड़ज ने पायो ये वरदान6488
10प्रेमचंद की कहानी 'वरदान'7186

Stats from 1 October 2008 to 31 October 2008
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Saturday, August 30, 2008

अब तक के संगीतबद्ध गीत सुनें

हिन्द-युग्म पर अब तक के रीलिज्ड सभी गीतों को आप यहाँ सुन सकते हैं। हम अलग-अलग प्लेयरों में अलग-अलग तरीके से गीत सुनने का विकल्प दे रहे हैं। नीचे के विकल्पों से अपने पसंद का नेवीगेशन चुनें
सभी गीतजुलाई 2008 रीलिजअगस्त 2008 रीलिज




4 जुलाई 2008 से लेकर अब तक के रीलिज्ड गीत





जुलाई 2008 के रीलिज्ड गीत





अगस्त 2008 के रीलिज्ड गीत

Wednesday, August 27, 2008

दर्द को सुरीलेपन की पराकाष्ठा पर ले जाने वाले अमर गायक मुकेश

आज सुबह आपने पढ़ा हृदयनाथ मंगेशकर का संस्मरण 'वो जाने वाले हो सके तो॰॰॰॰' आज हम पूरे दिन मुकेश को याद कर रहे हैं, उनके गाये गीत सुनवाकर, उनसी जुड़ी यादें बाँटकर॰॰॰॰आगे पढ़िए तपन शर्मा 'चिंतक' की प्रस्तुति 'मैं तो दीवाना, दीवाना, दीवाना'


मुकेश के साथ कल्याण जी
चित्र साभार- हमाराफोटोज
वे परिश्रम से कभी गुरेज़ नहीं करते थे. कितनी ही बार री-टेक करो,उन्हें नाराज़ी नहीं होती.कितनी ही बार रिहर्सल के लिये कॉल करो वे तैयार..बस अभी आया.उन्हें अपने परफ़ॉरमेंस से जल्द सेटिसफ़ेक्शन नहीं होता था. बता रहे थे ख्यात संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी के स्व.कल्याणजी भाई. नब्बे के दशक में जब वे लता पुरस्कार लेने इन्दौर आए तो दो दिन का डेरा था मेरे शहर. आयोजन का एंकर होने की वजह से हमेशा से कलाकारों का संगसाथ आसानी से मिलता रहा है सो कल्याणजी भाई से लम्बी बात करने का मौक़ा भी मिल ही गया. एक दिन उनके संगीत सफ़र की चर्चा होती रही, दूसरे दिन गायक-गायिकाओं पर. जब मुकेशजी पर बात आई तो कल्याणजी भाई भावुक हो उठे. मुकेशजी के घर में गुजराती परिवेश भी रहा क्योंकि पत्नी सरल गुजराती थीं (अभी इसी साल सरलबेन का देहांत हुआ है) कल्याणजी भाई बोले हम गुजराती में ही बतियाते और ख़ूब ठहाके लगाते . बहुत हँसमुख थे मुकेश भाई लेकिन जब दर्द भरे गीत की पंक्तियाँ गाने लगते तो सारे आलम का दर्द अपने गायन में उड़ेल देते.

फ़िल्म हिमालय की गोद में का गीत था "मैं तो एक ख़्वाब हूँ..." की रिहर्सल लगभग पूर्णता की ओर आ गई थी. कल्याणजी भाई ने बताया हम लगभग संतुष्ट थे, लेकिन ये लगभग मुकेशजी मेरे और आनंदजी के चेहरे पर पढ़ लिया था. बोले कुछ कमी लग रही है क्या . हमने कहा हाँ गीत का स्टार्ट और बेहतर हो सकता था. मुकेशजी ने कहा तो भाई बताओ न क्या चाहते हो. कल्याणजी ने कहा आप ऐसा स्टार्ट लीजिये जैसे आप मोहम्मद रफ़ी हैं.मुकेशजी ने कहा ऐसा बोलो न .. रिकॉर्डिंग शुरू हुई और क्या लाजवाब गीत बना है याद कीजिये आप. बात यहीं ख़त्म नहीं हो जाती. गाना पूरा होने के बाद मुकेशजी ने रफ़ी साहब को फ़ोन किया रफ़ी भाई मैंने आपका कुछ चुरा लिया. रफ़ी साहब हैरान कहने लगे मैंने एक गीत में आपके स्टाइल में आमद ली है. रफ़ी साहब और मुकेशजी देर तब फ़ोन पर बतियाते रहे. बात बड़ी सादी है, लेकिन सादा तबियत और नेक इंसान मुकेशजी की महानता देखिये कि अपने समकालीन गायक का थोड़ा सा अंदाज़ भी फ़ॉलो किया तो उसे जताया,यहाँ आजकल पूरी की पूरी धुन चुराई जा रही है और फ़िर भी शर्म नहीं है किसी को.

शास्त्रीय संगीत के पेचोख़म से दूर रहने वाले गायक थे मुकेश. एक सुर पर लम्बा टिकना उनके लिये मुमकिन नहीं होता था क्योंकि हर वॉइस कल्चर की अपनी लिमिटेशन तो होती ही है लेकिन मुकेश अपनी इस मर्यादा से ख़ूब वाकिफ़ थे. उन्होनें बंधे हुए मीटर में रहते हुए भावप्रणवता और इमोशन्स पर अपना ध्यान रखा . जब नौशाद साहब के साथ मेला और अंदाज़ के गीत गाए तो आप महसूस करेंगे कि मुकेश जी ने अपने ऊपर चढ़ी सहगल अंदाज़ की केंचुली निकाल फ़ेंकी और पूरे फ़ार्म में आ गए.

मेरा मानना है कि मुकेश सर्वहारा के गायक थे.शर्तिया कह सकता हूँ कि आप-हमसब कम से कम मुकेशजी के गीत तो गुनगुनाते ही हैं. आप नोटिस लीजियेगा कि पारिवारिक अंताक्षरी में जब भी पुराने गीत गुनगुनाए जाते हैं, उसमें मुकेश का रंग गाढ़ा ही नज़र आता है. उनके गीतों की संख्या कम है लेकिन लोकप्रियता के लिहाज़ से मुकेश आज भी सर्वश्रेष्ठ कहे जा सकते हैं.

एक ख़ास बात मुकेश स्मृति-दिवस पर यह बात विशेष रूप से कहना चाहूँगा कि भारतीय रजत-पट के शो-मेन राजकपूर को जन-जन में पहुँचाने में मुकेश का गायन एक महत्वपूर्ण कड़ी है और इसके महत्व को कभी ख़ारिज न किया जा सकेगा.

इस बात का ज़िक्र बहुत कम होता है लेकिन यहाँ ज़रूर करूंगा. फ़िल्म संगीत के लिये जो कुछ मुकेशजी ने किया वह तो अदभुत है ही लेकिन फ़िल्मों से अलहदा श्री रामचरितमानस की पाँच घंटे की ध्वनि-मुद्रिका संचयन मुकेशजी का एक अनोखा कारनामा है भारतीय संस्कृति के लिये.

मुकेश जी की आवाज़ में कसक,दर्द,करूणा,हास्य,आशा-निराशा और श्रंगार रस की अभिव्यक्ति सहजता से उभरती थी लेकिन दर्द में तो वे बेमिसाल थे.वे इंसानियत के तक़ाज़ों की दृष्टि से भी विलक्षण थे.अभी पिछले दिनों उनके पुत्र नितिन से आत्मीय मुलाक़ात हुई तब उन्होने विनम्रता से बताया कि पापा अच्छाइयों का सूर्य थे .उनकी गायकी से मिली छाया से जितना कर पाया कम है लेकिन मैं संतुष्ट हूँ.क्या अगले जन्म में मुकेश बनना चाहेंगे आप, मैने नितिन भाई से पूछा था.तो भावुक होकर बोले मुकेशजी जैसे इंसान दुनिया में दोबारा नहीं आते.मैं अगले जन्म में भी उनका बेटा ही बनना चाहूँगा.

इसमें कोई शक नहीं कि नौशाद,शंकर-जयकिशन, कल्याणजी-आनंदजी,सलिल चौधरी,सचिनदेव बर्मन,रोशन,ह्सरत जयपुरी,शैलेंद्र,साहिर और इंदीवर के गीतों और संगीत को निर्वेवाद रूप से अनमोल कहा जा सकता है लेकिन इन रचनाओं को अमरत्व प्रदान करने काम तो मुकेश ने ही किया यह भी अकाट्य सत्य है.

जीवन का आना-जाना चलता रहेगा. संसार की गति थमने का नाम नहीं लेगी.फूल-पत्तियाँ खिलते रहेंगे,आवाज़े आतीं रहेंगी और संगीत बजता रहेगा लेकिन मुकेश जैसे कोमल स्वर की कमी कभी पूरी न हो सकेगी. संगीतप्रेमी मन हमेशा कहता रहेगा...

ये घाट,तू ये बाट कभी भूल न जाना
ओ जाने वाले, हो सके तो लौट के आना

सुनिए लोक-संगीत से रचा-बसा बम्बई का बाबू फिल्म का एक गीत 'चल री सजनी, अब क्या सोचे?'





पढ़िए हृदयनाथ मंगेशकर का संस्मरण 'ओ जाने वाले हो सके तो॰॰॰'

ओ जाने वाले हो सके तो ....

हृदयनाथ मंगेशकर द्वारा लिखित संस्मरण

हजारों गाने गानेवाले मुकेश दा के आखिरी शब्‍द थे – ‘यह पट्टा खोल दो’

खुशमिज़ाज मुकेश
तीस हजार फुट की ऊँचाई पर हमारा जहाज उड़ा जा रहा है। रूई के गुच्‍छों जैसे अनगिनत सफेद बादल चारों ओर छाए हुए हुए हैं। ऊपर फीके नीले रंग का आसमान है। इन बादलों और नीले आकाश से बनी गुलाबी क्षितिज रेखा दूर तक चली गई है। कभी-कभी कोई बड़ा सा बादल का टुकड़ा यों सामने आ जाता है, माने कोई मजबूत किला हो। हवाई जहाज की कर्कश आवाज को अपने कानों में झेलते हुए मैं उदास मन से भगवान की इस लीला को देख रहा हूँ।

अभी कल-परसों ही जिस व्‍यक्ति के साथ ताश खेलते हुए और अपने अगले कार्यक्रमों की रूपरेखा बनाते हुए हमने विमान में सफर किया था, उसी अपने अतिप्रिय, आदरणीय मुकश दा का निर्जीव, चेतनाहीन, जड़ शरीर विमान के निचले भाग में रखकर हम लौट रहे हैं। उनकी याद में भर-भर आनेवाली ऑंखों को छिपाकर हम उनके पुत्र नितिन मुकेश को धीरज देते हुए भारत की ओर बढ़ रहे हैं।

आज 29 अगस्‍त है। आज से ठीक एक महीना एक दिन पहले मुकेश दा यात्री बनकर विमान में बैठे थे। आज उसी देश को, जिसमें पिछले 25 वर्षों का एक दिन, एक घण्‍टा, एक क्षण भी ऐसा नहीं गुजरा था कि जब हवा में मुकश दा का स्‍वर न गूंज रहा हो; जिसमें एक भी व्‍यक्ति ऐसा नहीं था, जिसने मुकेश दा का स्‍वर सुनकर गर्दन न‍ हिला दी हो; जिसमें एक भी ऐसा दुखी जीव नहीं था, जिसने मुकेश दा की दर्द-भरी आवाज में अपने दुखों की छाया न देखी हो। सर्वसाधारण के लिए दुख शाप हो सकता, पर कलाकार के लिए वह वरदान होता है।

अनुभूति के यज्ञ में अपने जीवन की समिधा देकर अग्नि को अधिकाधिक प्रज्‍वलित करके उसमें जलती हुई अपनी जीवनानुभूतियों और संवेदनाओं को सुरों की माला में पिरोते-पिरोते मुकेश दा दुखों की देन का रहस्‍य जान गये थे। यह दान उन्‍हें बहुत पहले मिल चुका था।

उस दिन 1 अगस्‍त था वेंकुवर के एलिजाबेथ सभागृह में कार्यक्रम की पूरी तैयारियॉं हो चुकी थीं। मुकश दा मटमैले रंग की पैंट, सफेद कमीज, गुलाबी टाई और नीला कोट पहनकर आए थे। समयानुकूल रंगढंग की पोशाकों में सजे-धजे लोगों के बीच मुकेश दा के कपड़े अजीब-से लग रहे थे। पर ईश्‍वर द्वारा दिए गए सुन्‍दर रूप और मन के प्रतिबिम्‍ब में वे कपड़े भी उनपर फब रहे थे। ढाई-तीन हजार श्रोताओं से सभागृह भर गया। ध्‍वनि-परीक्षण करने के बाद मैं ऊपर के ‘साउंड बूथ’ में ‘मिक्‍सर चैनल’ हाथ में संभाले हुए कार्यक्रम के प्रारम्‍भ होने की प्रतीक्षा कर रहा था। मुकेश दा के ‘माइक’ का ‘स्‍विच’ मेरे पास था। इतने में मुकेश दा मंच पर आए। तालियों की गड़गड़ाहट से सारा हाल गुंज उठा। मुकश दा ने बोलना प्रारम्‍भ किया तो ‘भाइयो और बहनो’ कहते ही इतनी सारी तालियाँ पिटीं की मुझे हाल के सारे माइक बंद कर देने पड़े।

मुकश दा अपना नाम पुकारे जाने पर सदैव पिछले विंग से निकलकर धीरे-धीर मंच पर आते थे। वे जरा झुककर चलते थे। माइक के सामने आकर उसे अपनी ऊँचाई के अनुसार ठीक कर तालियों की गड़गड़ाहट रूकने का इंतजार करते थे। फिर एक बार ‘राम-राम, भाई-बहनों’ का उच्‍चारण करते थे। कोई भी कार्यक्रम क्‍यों न हो, उनका यह क्रम कभी नहीं बदला।

उस दिन मुकश दा मंच पर आए और बोले, “राम-राम, भाई-बाहनों आज मुझे जो काम सौंपा गया है, वह कोई मुश्किल काम नहीं है। मुझे लता की पहचान आपसे करानी है। लता मुझसे उम्र में छोटी है और कद में भी; पर उसकी कला हिमालय से भी ऊँची है। उसकी पहचान मैं आपसे क्‍या कराऊँ! आइए, हम सब खूब जोर से तालियॉं बजाकर उसका स्‍वागत करें! लता मंगेशकर ....’’

तालियों की तेज आवाज के बीच दीदी मंच पर पहुँचीं। मुकेश दा ने उसे पास खींच लिया। सिर पर हाथ रखकर उसे आशीर्वाद दिया और घूमकर वापस अन्‍दर चले गए। मंच से कोई भय नहीं, कोई संकोच नहीं, बनावट तो बि‍ल्‍कुल भी नहीं। सबकुछ बिल्‍कुल स्‍वाभाविक और शांत।

दीदी के पाँच गाने पूरे होने पर मुकेश दा फिर मंच पर आए। एक बार फिर माइक ऊपर-नीचे किया और हारमोनियम संभाला। जरा-सा खंखार कर, कुछ फुसफुसाकर (शायद ‘राम-राम कहा होगा) कहना शुरू किया, “मैं भी कितना ढीठ आदमी हूँ। इतना बड़ा कलाकार अभी-अभी यहाँ आकर गया है और उसके बाद मैं यहाँ गाने के लिए आ खड़ा हुआ हूँ। भाइयो और बहनो, कुछ गलती हो जाए तो माफ करना।’’

मुकेश दा के शब्‍दों को सुनकर मेरा जी भर आया। एक कलाकार दूसरे का कितना सम्‍मान करता है, इसका यह एक उदाहरण है। मुकेश दा के निश्‍छल और बढ़िया स्‍वभाव से हम सब मंत्रमुग्‍ध-से हो गये थे कि माइक पर सुर उठा – “जाने कहॉँ गये वो दिन ....”

गीत की इस पहली पंक्ति पर ही बहुत देर तक तालियाँ बजती रहीं। और फिर सुरों में से शब्‍द और शब्‍दों में से सुरों की धारा बह निकली। लग रहा था कि मुकश दा गा नहीं रहे हैं, वे श्रोताओं से बातें कर रहे हैं। सारा हॉल शांत था गाना पूरा हुआ। पर तालियाँ नहीं बजीं। मुकेश दा ने सीधा हाथ उठाया (यह उनकी आदत थी) और अचानक तालियों की गड़गड़ाहट बज उठी। तालियों के उसी शोर में मुकेश दा ने अगला गाना शुरू कर दिया – ‘डम-डम डिगा-डिगा’ और इस बार तालियों के साथ श्रोताओं के पैरों ने ताल देना शुरू कर दिया था।

यह गाना पूरा हुआ तो मुकेश दा अपनी डायरी के पन्‍ने उलटने लगे। एक मिनट, दो मिनट, पर मुकेश दा को कोई गाना भाया ही नहीं। लोगों में फुसफुसाहट होने लगी। अन्‍त में मुकेश दा ने डायरी का पीछा छोड़ दिया और मन से ही गाना शुरू कर दिया-‘दिल जलता है तो जलने दे’ यह मुकेश दा का तीस वर्ष पुराना सबसे पहला गना था। मैं सोचने लगा कि क्‍या इतना पुराना गाना लोगों को पसन्‍द आएगा! मन-ही-मन मैं मुकेश दा पर नाराज होने लगा। ऐसे महत्‍वपूर्ण कार्यक्रम के लिए उन्‍होंने पहले से गानों का चुनाव क्‍यों नहीं कर लिया था।

मैंने ‘बूथ’ से ही बैकस्‍टेज के लिए फोन मिलाया और मुकेश दा के पुत्र नितिन को बुलाकर कहा, “अगले कार्यक्रम के लिए गाना चुनकर तैयार रखो।’’

नितिन ने जवाब दिया, “यह नहीं हो सकता। यह पापा की आदत है।’’

गाना खत्‍म होते ही हॉल में ‘वंस मोर’ की आवाजें आने लगीं। मेरा अंदाज बिल्‍कुल गलत साबित हुआ था। मैंने झट से नितिन को दुबारा फोन मिलाया और कहा, “मैंने जो कुछ कहा था, मुकेश दा को पता न चले।’’ तभी दीदी मंच पर पहुँच गई और दो गीतों की शुरूआत हो गई। ‘सावन का महीना’, ‘कभी-कभी मेरे दिल में’, ‘दिल तड़प-तड़प के’ आदि एक के बाद एक गानों का तांता लगा रहा। फिर आखिरी दो गानों का प्रारम्‍भ हुआ – ‘आ जा रे, अब मेरा दिल पुकारा’।

इस गाने का पहला स्‍वर उठते ही मैं 1950 में जा पहुंचा। दिल्‍ली के लालकिले के मैदान में एक लाख लोग मौजूद थे ठण्‍ड का मौसम था। तरूण, सुन्‍दर मुकेश दा बाल संवारे हुए स्‍वेटर पर सूट डाले, मफलर बाँधे बाएँ हाथ से हारमोनियम बजा रहे थे और मैं दीदी के साथ गा रहा था, ‘आजा रे ...’ मेरे जीवन का वह दूसरा या तीसरा गाना था। मुकेश दा ने जबरदस्‍ती मुझे गाने को बिठा दिया था और खुद हारमोनियम बजाने लगे थे। मैं घबराना गया और कुछ भी गलत-सलत गाने लगता था। मुकेश दा मुझे सांत्‍वना देते जाते और मेरा साथ देने लग जाते। मुझे उनका यह तरूण सुन्‍दर रूप याद आने लगा, जिसे 26 वर्षों के कटु अनुभवों के बाद भी उनहोंने कायम रखा था। पर उनकी आवाज में एक नया जादू चढ़ गया था।

मिलवाकी से हम वाशिंगटन की ओर चले। हम सबों के हाथ सामानों से भरे थे। हवाई अड्डा दूर, और दूर होता जा रहा था। मैं थक गया था और रूक-रूककर चल रहा था। तभी किसी ने पीछे से मेरे हाथ से बैग ले लिया। मैंने दचककर पीछे देखा तो मुकेश दा। मैंने उन्‍हें बहुत समझाया, पर उन्‍होंने एक न सुनी। विमान में हम पास-पास बैठे। वे बोले, ‘अब खाना निकालो’। (हम दोनों ही शाकाहारी थे)। मैंने उन्हें चिवड़ा और लड्डू दिए और वे खाने लगे। तभी मैंने कहा, ‘मुकेश दा, कल के कार्यक्रम में आपकी आवाज अच्‍छी नहीं थी। लगता है, आपको जुकाम हो गया है!’

उन्‍होंने सिर हिलाया। बोले, ‘मैं दवा ले रहा हूँ। पर सर्दी कम होती ही नहीं है, इसलिए आवाज में जरा-सी खराश आ गई है’। फिर विषय बदलकर उन्‍होंने मुझसे ताश निकालने को कहा। करीब-करीब एक घंटे तक हम दोनों ताश खेलते रहे। खेल के बीच में उन्‍होंने मुझसे कहा ‘गाते समय जब मेरी आवाज ऊँची उठती है तब तू ‘फेडर’ को नीचे कर दिया कर, क्‍योंकि सर्दी के कारण ऊपर के स्‍वरों को संभालना जरा कठिन पड़ता है। फिर रमी के ‘प्‍वाइन्‍ट’ लिखने के लिए उन्‍होंने जेब से पेन निकाला। उसे मेरे सामने रखते हुए बोले, ‘बाल, यह क्रास पेन है। जब से मैंने क्रास पेन से लिखना शुरू किया है, दूसरा कोई पेना भाता ही नहीं है। तुम भी क्रास पेन खरीद लो’। और वाशिंगटन में उन्‍होंने आग्रह करके मुझे एक क्रास पेन खरीदवा ही दिया।

अनहोनी, जो होनी बन गई!

उसी शाम भारतीय राजदूत के यहाँ हमारी पार्टी थी। देश-विदेश के लोग आए हुए थे। मुकेश दा अपनी रोज की पोशाक में इधर-उधर घूम रहे थे। तभी किसी ने सुझाया कि गाना होना चाहिए। उस जगह तबला, हारमोनियम कुछ भी नहीं था, पर सबों के आग्रह पर मुकेश दा खड़े हो गए और जरा-सा स्‍वर संभालकर गाने लगे – ‘आँसू भरी है ये जीवन की राहें...’ वाद्यों की संगत न होने के कारण उनकी आवाज के बारीक-बारीक रेशे भी स्‍पष्‍ट सुनाई दे रहे थे। सहगल से काफी मिलती हुई उनकी वह सरल आवाज भावनाओं से ऐसी भरी हुई थी कि मैं उसे कभी भुला न पाऊँगा।

रात को मैंने टोका, ‘आपको पार्टी के लिए बुलाया था, गाने के लिए नहीं। किसी ने कहा और आप गाने लगे!’ वे हंसकर बाले, ‘यहाँ कौन बार-बार आता है! अब पता नहीं यहाँ फिर कभी आ पाऊँगा या नहीं!’

मुकेश दा ! आपका कहना सच ही था। वाशिंगटन से ये लोग आपके अंतिम दर्शनों के लिए न्‍यूयार्क आए थे और उस पार्टी की याद कर करके आँसू बहा रहे थे।

बोस्‍टन में मुकेश दा की आवाज बहुत खराब हो गई थी। एक गाना पूरा होते ही मैंने ऊपर से फोन किया और दीदी से कहा, ‘मुकेश दा को मत गाने देना। उनकी आवाज बहुत खराब हो रही है’।
दीदी बोलीं, ‘फिर इतना बड़ा कार्यक्रम पूरा कैसे होगा?’
मैंने सुझाया, ‘नितिन को गाने के लिए कहो’।

दीदी मान गईं। मंच पर आईं और श्राताओं से बोलीं, ‘आज मैं आपके सामने एक नया मुकेश पेश कर रही हूँ। यह नया मुकेश मेरे साथ आपका मनपसंन्‍द गाना ‘कभी-कभी मेरे दिल में...’ गाएगा।‘

लोग अनमने से हो फुसफुस करने लगे थे। तभी नितिन मंच पर पहुँचा। देखने में बिल्‍कुल मुकेश दा जैसा। उसने दीदी के पाँव छुए और गाना शुरू किया – कभी-कभी मेरे दिल में... ‘ नितिन की आवाज में कच्‍चापन था। पर सुरों की फेंक, शब्‍दोच्‍चार बिल्‍कुल पिता जैसे थे। गाना खतम होते ही ‘वंस मोर’ की आवाजें उठने लगीं। लोग नितिन को छोड़ने को तैयार ही नहीं थे। ‘विंग’ में बैठे मुकेश दा का चेहरा आनन्‍द से चमक उठा।

‘ऐंबुलेंस’ में उन्‍होंने केवल एक वाक्‍य बोला –यह पट्टा खोल दो’ (वह ह्वील चेयर का पट्टा था) फिर वे कुछ नहीं बोले। हजारों गाने गानेवाले मुकेश दा के वे आखिरी शब्‍द थे – ‘यह पट्टा खोल दो’।

कौन-सा पट्टा? कौन-सा बंधन? ह्वील चेयर का पट्टा या जीवन का बंधन? मुकेश दा को बाँधे हुए चमड़े का पट्टा या चैतन्‍य को बाँधे हुए जड़त्‍व का पट्टा? कहीं उनके कहने का आशय यही तो नहीं था!
फिर वे मंच पर आए और हारमोनियम पर हाथ रख दिया। बाप-बेटे ने मिलकर ‘जाने कहाँ गए वे दिन’ गाया। उसके बाद के सारे गाने नितिन ने ही गाए। मुकेश दा ने हारमोनियम पर साथ दिया।

अगले दिन वे मुझेसे बोले,'अब मेरे सर पर से एक और बोझ उतर गया। नितिन की चिन्‍ता मुझे नहीं रही। अब मैं मरने के लिए तैयार हूँ’।

मैने कहा, ‘अपना गाना गाए बिना आपको मरने कैसे दूँगा। पन्‍द्रह वर्ष पूर्व आपने मेरे गाने की रिहर्सल तो की थी, पर गाया नहीं था। गाना मुझे ही पड़ा था’। (वह गाना था – ‘त्‍या फुलांच्‍या गंध कोषी’)

वे हंसकर बोले, ‘मेरे कोई नया गाना तैयार कराओ। मैं जरूर गाऊँगा।
अगले दिन हम टोरन्‍टो से डेट्रायट जाने के लिए रेलगाड़ी पर सवार हुए। हमारा एनाउंसर हमें छोड़ने आया था। मुकेश दा ने उससे पूछा, ‘क्‍यों मियॉँ साहेब, आप नहीं आ रहे हमारे साथ!”

उसने जवाब दिया, मैं तो आपको छोड़ने आया हूँ।’

मुकेश दा हँसे, अरे, आप क्‍या हमें छोड़ेंगे!
हम आपको ऐसा छोड़ेंगे कि फिर कभी नहीं मिलेंगे’। मियाँ का दिल भर आया। बोला, ‘नहीं-नहीं। ऐसी अशुभ बात मुंह से मत निकालिए’।

मुकेश दा हंसे। ‘राम-राम’ कहते हुए गाड़ी में चढ़कर मेरे पास आ बैठे। ताश निकालकर हम ‘रमी’ खेलने लगे। वे तीन डॉलर हार गए। मुझे पैसे देते हुए बोले, आज रात को फिर खेलेंगे। मैं तुमसे ये तीनों डॉलर वापस जीत लूँगा’।

और सचमुच ही डेट्रायट (अमरीका) में उन्‍होंने मुझे अपने कमरे में बुला लिया और मैं, अरूण, रवि उनके साथ रात साढ़े ग्‍यारह बजे तक ‘रमी’ खेलते रहे। इस बार मुकेश दा छह डॉलर हार गए। हमने उनकी खूब मजाक उड़ाई। मुझसे बोले, ‘आज कुल मिलाकर मैं नौ डॉलर हार गया हूँ। मगर कल रात को तुमसे सब वसूल कर लूँगा।

पर ‘कल की रात’ उनकी आयु में नहीं लिखी थी। मुझे कल्‍पना भी नहीं थी कि ‘कल की रात’ मुझे मुकेश दा के निर्जीव शरीर के पास बैठकर काटनी पड़ेगी।

झूठे बंधन तोड़ के सारे .....

अपने पुत्र नितिन मुकेश के साथ
वह दिन ही अशुभ था। एक मित्र को जल्‍दी भारत लौटना था, इसलिए उसके टिकट की भागदौड़ में ही दोपहर के तीन बज गए। टिकट नहीं मिला सो अलग। साढ़े चार बजे हम होटल लौटे। मैं, दीदी और अनिल मोहिले शाम के कार्यक्रम की रूपरेखा बनाने लगे। हम सब भूखे थे, इसलिए चाय और सैण्‍डविच मंगा ली गई थी। तभी मुकेश दा का फोन आया कि हारमोनियम ऊपर भिजवा दो। (उनका कमरा बीसवीं मंजिल पर था और हमारा सोलहवीं पर)। मैंने हारमोनियम भेज दिया। कार्यक्रम की चर्चा पूरी करने के बाद मैंने अनिल मोहिले से कहा, ‘चाय पीने के बाद म्‍यूजीसियंश को तैयार करके ठीक छह बजे मंच पर पहुंच जाना’। तभी चाय आ गई। मैं चाय तैयार कर ही रहा था कि ऊपर आओ। उसकी आवाज सुनते ही मैं भागा। अपने कमरे में मुकेश दा लुंगी और बनियान पहने हुए पलंग के पीछे हाथ टिकाए बैठे थे। मैंने नितिन से पूछा, “क्‍या हुआ?”

उसने बताया, ‘पापा ने कुछ देर गाया। फिर उन्‍होंने चाय मंगाई। पीकर वे बाथरूम गए। बाथरूम से आने के बाद उन्‍हें गर्मी लगने लगी और पसीना आने लगा। इसलिए मैंने आपको बुला लिया। मुझे कुछ डर लग रहा है’।

मैं सोचने लगा-पसीना आ जाने भर से ही यह लड़का डर गया है। कमाल है। फिर मैंने मुकेश दा से कहा, ‘आप लेट जाइए’।

वे एकदम बोल पड़े, ‘अरे तुम अभी तक एक नहीं? मैं लेटूँगा नहीं। लेटने से मुझे तकलीफ होती है। तुम स्‍टेज पर जाओ। मैं इंजेक्शन लेकर पीछे-पीछे आता हूँ। लता को कुछ मत बताना। वह घबरा जाएगी।

‘अच्‍छा,’ कहकर मैंने उनकी पीठ पर हाथ रख और झटके से हटा लिया। मेरा हाथ पसीने से भीग गया था। इतना पसीना, माने नहाकर उठे हों। तभी डॉक्‍टर आ गया। ऑक्‍सीजन की व्‍यवस्‍था की गई। मैंने मुकेश से पूछा, ‘आपको दर्द हो रहा है’?

उन्‍होंने सिर हिलाकर ‘न’ कहा। फिर उन्‍हें ‘ह्वील चेयर’ पर बिठाकर नीचे लाया गया। ऑक्‍सीजन लगा हुआ था, फिर भी लिफ्ट में उन्‍हें तकलीफ ज्‍यादा होने लगी, ‘ह्वील चेयर’ को ही ‘ऐंबुलेंस’ पर चढ़ा दिया गया। यह सब बीस मिनट में हो गया।

‘ऐंबुलेंस’ में उन्‍होंने केवल एक वाक्‍य बोला –यह पट्टा खोल दो’ (वह ह्वील चेयर का पट्टा था) फिर वे कुछ नहीं बोले। हजारों गाने गानेवाले मुकेश दा के वे आखिरी शब्‍द थे – ‘यह पट्टा खोल दो’।

कौन-सा पट्टा? कौन-सा बंधन? ह्वील चेयर का पट्टा या जीवन का बंधन? मुकेश दा को बाँधे हुए चमड़े का पट्टा या चैतन्‍य को बाँधे हुए जड़त्‍व का पट्टा? कहीं उनके कहने का आशय यही तो नहीं था!

‘एमरजेन्‍सी वार्ड’ में पहुंचने से पूर्व उन्‍होंने केवल एक बार आँखे खोलीं, हंसे और बेटे की तरफ हाथ उठाया। डॉक्‍टर ने वार्ड का दरवाजा बंद कर लिया। आधे घंटे बाद दरवाजा खुला। डॉक्‍टर बाहर आया ओर उसने मेरे कंधे पर हाथ रख दिया। उसके स्‍पर्श ने मुझसे सबकुछ कह दिया था।

विशाल सभागृह खचाखच भरा हुआ है। मंच सजा हुआ है। सभी वादक कलाकार साज मिलाकर तैयार बैठे हुए हैं। इंतजार है कि कब मैं आऊँ, माइक ‘टेस्‍ट’ करूँ और कार्यक्रम शुरू हो। मैं मंच पर गया। सदैव की भाँति रंगभूमि को नमस्‍कार किया। माइक हाथ में लिया और बोला "भाइयो और बहनो, कार्यक्रम प्रारंभ होने में देर हो रही है, पर उसके लिए आज मैं आपसे क्षमा नहीं माँगूँगा। आज मैं किसी से कुछ नहीं माँगूँगा। केवल उससे बारम्‍बार एक ही माँग है – ‘ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना ...’

धर्मयुग से साभार
रूपांतर- भारती मंगेशकर
प्रस्तुति- शैलेश भारतवासी
प्रस्तुति सहयोग- सतेन्द्र झा
चित्र साभार- हमाराफोटोजडॉटकॉम(यह संस्मरण विश्व हिन्दी न्यास की त्रैमासिक पत्रिका 'हिन्दी-जगत' में भी प्रकाशित किया गया है)


इस अवसर पर हमने इस संस्मरण में उल्लेखित सभी गीतों को सुनवाने का प्रबंध किया है।


ओ जाने वाले हो सके तो॰॰
Oh Jaane Waale Ho Sake To
आ जा रे, अब मेरा दिल पुकारा॰॰
Aa Ja Re, Ab Mera Dil Pukara
आँसू भरी है ये जीवन की राहें॰॰
Aanso Bhari Hai, Ye Jeevan Ki Rahen
दिल जलता है तो जलने दे॰॰
Dil Jalta Hai To Jalane De
दिल तड़प-तड़प के दे रहा है ये सदा॰॰
Dil Tadap-Tadap Ke De Raha Hai Ye Sada
डम-डम डिगा-डिगा॰॰
जाने कहाँ गये वो दिन॰॰
Jane Kahan Gaye Woh Din
सावन का महीना॰॰
Sawan Ka Mahina
कभी-कभी मेरे दिल में॰॰
Kabhi-Kabhi Mere Dil Mein



आज अमर गायक मुकेश की ३२वीं बरसी पर हम पूरे दिन मुकेश की यादें आपसे बांट रहे हैं। पढ़िए संगीत समीक्षक संजय पटेल का "दर्द को सुरीलेपन की पराकाष्ठा पर ले जाने वाले अमर गायक मुकेश", इसी पोस्ट में आप बम्बई का बाबू का गीत 'चल री सजनी! अब क्या सोचें॰॰॰' भी सुन पायेंगे। और साथ ही पढ़िए तपन शर्मा चिंतक की प्रस्तुति "मैं तो दीवाना, दीवाना-दीवाना"। तो पूरे दिन बने रहिए आवाज़ के संगी.

Thursday, July 31, 2008

वो शुरुवाती दिन...

मो. रफी को याद कर रहे हैं, युनुस खान

अट्ठाईस बरस पहले 31 जुलाई के दिन सुरसंसार का ये सुरीला पंछी, दुनिया को बेगाना मानकर उड़ गया, और तब से आज तक वो डाली कांप रही है । दरअसल मोहम्‍मद रफ़ी संगीत की दुनिया में शोर की साजिश के खि़लाफ़ एक सुरीला हस्‍तक्षेप थे।

दुनिया के नक्‍शे में खोजने चलें, तो पाकिस्‍तान के दायरे में लाहौर के नज़दीक कोटला सुल्‍तान सिंह को खोज पाना, काफी मशक्‍कत का काम होगा । यहां चौबीस दिसंबर 1924 को रफ़ी साहब का जन्‍म हुआ था । बाद में रफ़ी का परिवार लाहौर चला आया । यहां उन्होंने उस्ताद बड़े गु़लाम अली ख़ां साहब और उस्ताद अब्‍दुल वहीद ख़ां साहब से संगीत की तालीम ली थी ।


लाहौर में कुंदन लाल सहगल का एक कंसर्ट हो रहा था, लेकिन अचानक बिजली चली गयी और आयोजन रूक गया । सहगल ने कहा कि जब तक बिजली नहीं आयेगी वो नहीं गायेंगे । तेरह बरस के मोहम्‍मद रफ़ी इस आयोजन में अपने जीजा मोहम्‍मद हमीद के साथ आये हुए थे । उन्होंने कहा कि रफ़ी गाना गाकर जनता को शांत कर सकते हैं । इस तरह रफ़ी साहब को मंच पर गाने का मौका़ मिला था । रफ़ी साहब को पहली बार गाने का मौक़ा संगीतकार श्याम सुंदर ने दिया था सन 1942 में, फ़िल्म थी 'गुलबलोच' । इसमें रफ़ी ने अठारह बरस की उम्र में ज़ीनत बेगम के साथ 'सोणिए नी, हीरिए नी, तेरी याद ने बहुत सताया' गाना गाया था । ये गाना बेहद लोकप्रिय हुआ था । इसके बाद रफ़ी को लाहौर रेडियो स्टेशन पर नियमित गाने के बुलावे आने लगे । ये फ़िल्म 1944 में रिलीज़ हुई थी ।

यही वो साल था जब मो. रफ़ी बंबई चले आए थे । मैंने रफ़ी साहब की शुरूआत के बारे में एक किस्सा सुना है, पता नहीं इसमें किस हद तक सच्चाई है । रफ़ी साहब की मुलाक़ात नौशाद के वालिद से हुई थी और रफ़ी का गाना सुनकर उन्होंने नौशाद के नाम एक सिफ़ारिशी चिट्ठी लिखी थी । नौशाद से जब उनकी मुलाक़ात हुई तो उन्होंने इसी साल कारदार की फ़िल्म 'पहले आप' के गाने 'हिंदुस्‍तान के हम हैं हिंदोस्‍तां हमारा, हिंदु-मुस्लिम दोनों की आंखों का तारा' में रफ़ी साहब की आवाज़ का इस्तेमाल कोरस में किया था । इस गाने को दरअसल दुर्रानी, श्‍याम कुमार, मोतीराम, अलाउद्दीन वग़ैरह ने गाया था । इस मार्च-पास्ट गीत को सिपाहियों पर फिल्माया गया था । नौशाद ने सोचा था कि इस गाने में सिपाहियों के बूटों की आवाज़ ज़रूर होंगी । चूंकि उस ज़माने में उतनी तकनीकी सुविधाएं नहीं थीं, इसलिए गायकों को फौजी बूट पहनाए गये और पैर पटकते हुए गाने को कहा गया । इस गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान रफ़ी साहब के पैर में बहुत चोटें आ गयी थीं । रफ़ी साहब को इस गाने के बदले में पचास रूपये मेहनताना दिया गया था । इस फ़िल्म के लिए रफ़ी ने दो और कोरस गाने गाए थे ।

सन 1944 में रफ़ी साहब ने फिल्‍म 'गांव की गोरी' ( विलेज गर्ल) में संगीतकार श्‍याम सुंदर के निर्देशन में एक गाना गाया था जी.एम. दुर्रानी के साथ, बोल थे—'अजी दिल हो काबू में तो दिलदार की ऐसी-तैसी' . रिकॉर्ड कंपनी के रिकॉर्ड नंबर के मुताबिक़ ये रफ़ी साहब का दूसरा रिलीज़ गाना था । इस दौर में रफ़ी साहब कुछ फिल्‍मों में गानों में नज़र भी आए थे । 1945 में आई थी स्‍वर्णलता और नज़ीर के अभिनय से सजी फिल्‍म –'लैला मंजनू' । इस फ़िल्म में रफ़ी साहब ने एस. डी. बातिश और साथियों के साथ गाना गाया था 'तेरा जलवा जिसने देखा वो दीवाना हो गया'. ।संगीतकार थे पंडित गोविंदराम । इस गाने में रफ़ी परदे पर भी नज़र आए थे ।

संगीत के क़द्रदान जानते हैं कि मुकेश, रफ़ी और किशोर कुमार तीनों पर अपने शुरूआती दौर में कुंदन लाल सहगल का गहरा असर रहा था । लेकिन दिलचस्प बात ये है कि इन तीनों में से केवल रफ़ी साहब को ही सहगल के साथ गाने का मौक़ा मिला था । रफ़ी अकसर नौशाद से कहा करते थे कि उन्हें सहगल के साथ गाने का मौक़ा दिया जाये ।

ये मौक़ा आया सन 1946 में । जब नौशाद ने मो. रफ़ी को फिल्‍म 'शाहजहां' में कुंदनलाल सहगल के पीछे कोरस में मुख्या आवाज़ के रूप में मौक़ा दिया था । गाना था मजरूह सुल्‍तानपुरी का लिखा -'मेरे सपनों की रानी रूही रूही रूही' . आपको बता दें कि इसी फ़िल्म से बतौर गीतकार मजरूह का सफ़र शुरू हुआ था । कोरस के साथ साथ इस गाने में एकदम आखिर में रफ़ी साहब दो लाईनें गाते हैं । नौशाद साहब बताया करते थे कि रफ़ी इस गाने की दो पंक्तियां गाकर इतने खुश थे मानो उन्‍हें सारी दुनिया की दौलत मिल गयी हो ।

आप समझ सकते हैं कि आज़ादी के आसपास का समय भारतीय फ़िल्म संगीत में संक्रमण का समय था । अब तक कलाकार अपने गाने स्वयं गाते थे । सहगल, नूरजहां, सुरैया वग़ैरह प्ले बेक नहीं कर रहे थे, बल्कि अपने गाने खुद ही गा रहे थे और परदे पर भी होंठ हिला रहे थे । पर रफ़ी जिस दौर में उभर रहे थे तब प्लेबैक का सफ़र शुरू हो रहा था । सन 1946 में मो. रफी को अपना पहला हिंदी एकल गीत गाने का मौक़ा मिला था फिल्‍म थी महबूब ख़ान की 'अनमोल घड़ी' और गाने के बोल थे—'तेरा खिलौना टूटा बालक' . ये गाना फ़िल्म के नायक पर नहीं बल्कि एक खिलौने वाले पर फिल्‍माया गया था ।
इसी साल फीरोज़ निज़ामी के निर्देशन में रफी ने फिल्‍म 'शरबती आंखें' में दो एकल गीत रिकॉर्ड किए थे । 1947 में उन्‍होंने फीरोज़ निजामी के ही संगीत निर्देशन में मलिका-ए-तरन्‍नुम नूरजहां के साथ गाया-'यहां बदला वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है' । ये गाना बड़ा हिट हुआ । इस फ़िल्म के कोरस गीत 'वो अपनी याद दिलाने को' में रफी साहब परदे पर भी दिखे । लेकिन सन 1948 में एस यू सनी की फिल्‍म 'मेला' में रफ़ी ने अपना पहला हिट एकल गीत दिया था—'ये जिंदगी के मेले'। दिलचस्प बात ये है कि इस फ़िल्म में ये रफ़ी का गाया एकमात्र गाना था । बाकी सारे गाने मुकेश ने गाए थे । 1949 में फिल्‍म 'दुलारी' के लिए रफ़ी साहब ने 'सुहानी रात ढल चुकी' जैसा बेमिसाल नगमा गाया था । इसी साल अंदाज, चांदनी रात,दिल्लगी जैसी फिल्मों ने रफी साहब को फिल्मी दुनिया में स्थापित कर दिया था ।

जब बात शुरुवाती दिनों की हो रही है तो, क्यों न उनके द्वारा, उसी दौर में गाया गया बेहद चर्चित "सुहानी रात ढल चुकी " को सुन लिया जाए, ये विडियो, लन्दन में हुए रफी साहब के एक लाइव कंसर्ट से लिया गया है...आनंद लीजिये.



- युनुस खान

(लेखक विविध भारती में कार्यरत हैं । आवाज़ के पाठकों, के लिए विशेष, रफी साहब की पुण्यतिथि पर, दैनिक भास्कर में उनके द्वारा लिखे गए लेख की पुनाप्रस्तुती )



साथ ही पढिये, मो. रफी पर संजय पटेल का ये भावपूर्ण लेख.
बने रहिये आवाज़ के साथ, शाम सात बजे पढिये रफी साहब के संगीत सफर पर एक संक्षिप्त आलेख.

कविता और संगीत से अव्वल, सुर को जिताने वाले मोहम्मद रफ़ी

अमर आवाज़ मोहम्मद रफ़ी को उनकी 28वीं बरसी पर याद कर रहे हैं संजय पटेल

मेरा तो जो भी कदम है वो तेरी राह में है॰॰॰

जी हाँ, स्तम्भकार संजय पटेल ने अपने ज़िंदगी के बहुत से कदम रफ़ी की याद में बढ़ाये हैं। संयोग है कि हमारे लिये ये विशेष आलेख रचने वाले संजय भाई ने मोहम्मद रफ़ी की मृत्यु पर ही पहला लेख इन्दौर के एक प्रतिष्ठित दैनिक में लिखा था. संजय भाई रफ़ी साहब के अनन्य मुरीद हैं और इस महान गायक की पहली बरसी से आज तक 31 जुलाई के दिन रफ़ी साहब की याद में उपवास रखते हैं। प्रस्तुत संजय की श्रद्धाँजलि-

रफ़ी एक ऐसी मेलोडी रचते थे कि मिश्री की मिठास शरमा जाए,सुनने वाले के कानों में मोगरे के फ़ूल झरने लगे,सुर जीत जाए और शब्द और कविता पीछे चली जाए.
मेरी यह बात अतिरंजित लग सकती है आपको लेकिन रफ़ी साहब का भावलोक है ही ऐसा. आप जितना उसके पास जाएंगे आपको वह एक पाक़ साफ़ संसारी बना कर ही छोड़ेगा.

मोहम्मद रफ़ी साहब को महज़ एक प्लै-बैक सिंगर कह कर हम वाक़ई एक बड़ी भूल करते हैं.दर असल वह महज़ एक आवाज़ नहीं;गायकी की पूरी रिवायत थे.सोचिये थे तो सही साठ साल से सुनी जा रही ये आवाज़ न जाने किस किस मेयार से गुज़री है. पंजाब के एक छोटे से क़स्बे से निकल कर मोहम्मद रफ़ी नाम का किशोर मुंबई आता है,कोई गॉड फ़ादर नहीं,कोई ख़ास पहचान नहीं ,सिर्फ़ संगीतकार नौशाद साहब के नाम का एक सिफ़ारिशी पत्र और अपनी क़ाबिलियत के बूते पर मोहम्मद रफ़ी देखते देखते पूरी दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम बन जाता है . इसमें क़िस्मत के करिश्मे का हाथ कम और मो.रफ़ी की अनथक मेहनत का कमाल ज़्यादा है. जिस तरह के अभाव और बिना आसरे की बसर मो.रफ़ी साहब ने की वह रोंगट खड़ी कर देने वाली दास्तान है. उस पर फ़िर कभी लेकिन ये तो बताना भी चाहूँगा कि मो.रफ़ी साहब की ज़िन्दगी में एक दिन ऐसा भी हुआ कि रेकॉर्डिंग के
बाद सब चले गए हैं और रफ़ी साहब स्टुडियो के बाहर देर तक खड़े हैं . तक़रीबन दो घंटे बाद तमाम साज़िंदों का हिसाब-किताब करने के बाद नौशाद साहब स्टुडियो के बाहर आकर रफ़ी साहब को देख कर चौंक गए हैं.पूछा तो बताते हैं कि घर जाने के लिये लोकल ट्रेन के किराये के पैसे नहीं है. नौशाद साहब हक़्के – बक़्के ! अरे भाई भीतर आकर माँग लेते ...रफ़ी साहब का जवाब : अभी काम पूरा हुआ नहीं और अंदर आकर पैसे माँगूं ? हिम्मत नहीं हुई नौशाद साहब. नौशाद साहब की आँखें छलछला आईं हैं. सोचिये किस बलन के इंसान थे रफ़ी साहब. और आज किसी रियलिटी शो में थोड़ा नाम कमा लेने वाले छोकर कैसे इतरा रहे हैं. लगता है भद्रता और शराफ़त का वह दौर रफ़ी साहब के साथ ही विदा हो गया.

आइये अब रफ़ी साहब की गायकी के बारे में बात हो जाए.सहगल साहब के बाद मोहम्मद रफ़ी एकमात्र नैसर्गिक गायक थे. उन्होने अच्छे ख़ासे रियाज़ के बाद अपनी आवाज़ को माँजा था. जिस उम्र में वे शुरू हुए उसके बारे में जान कर हैरत होती है कि कब तो उन्होंने सीखा , कब रियाज़ किया और कब की इतनी सारी और बेमिसाल रेकॉर्डिंग्स. संगीतकार वसंत देसाई की बात याद आ गई ...वे कहते थे रफ़ी साहब कोई सामान्य इंसान नही थे...वह तो एक शापित गंधर्व था जो किसी मामूली सी ग़लती का पश्चाताप करने इस मृत्युलोक में आ गया.बात रूपक में कही गई है लेकिन रफ़ी साहब की शख़्सियत पर एकदम फ़बती है. आज तो रफ़ी , किशोर और मुकेश गायकी परम्परा के ढेरों नक़ली वर्जन पैदा हो गए है लेकिन जिस दौर में रफ़ी साहब शुरू हुए तब के.एल.सहगल,पंकज मलिक,के.सी.डे,जी.एम.दुर्रानी जैसे चंद नामों को छोड़ कर पार्श्वगायन में कोई उल्लेखनीय परम्परा नहीं थी. हाँ जो अच्छा था वह यह कि बहुत क़ाबिल म्युज़िक डायरेक्टर्स थे जो गायकों को एक लाजवाब घड़ावन देते रहे.
रफ़ी साहब को भी श्यामसुंदर,नौशाद, ग़ुलाम मोहम्मद, मास्टर ग़ुलाम हैदर,खेमचंद प्रकाश,हुस्नलाल भगतराम जैसे गुणी मौसीकारों का सान्निध्य मिला जो रफ़ी साहब के कैरियर में एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुए.

रफ़ी साहब ने क्लासिकल म्युज़िक का दामन कभी न छोड़ा यही वजह है कि लगभग रफ़ी साहब को पहली बड़ी क़ामयाबी देने वाली तस्वीर बैजूबावरा में उन्होंने राग मालकौंस(मन तरपत)और दरबारी (ओ दुनिया के रखवाले) को जिस अधिकार और ताक़त के साथ गाया वन इस महान गुलूकार के हुनर की पुष्टि करने के लिये काफ़ी है. रफ़ी साहब ने जो सबसे बड़ा काम पार्श्वगायन के क्षेत्र में क्या वह यह कि उन्होनें अपने आप को कभी भी टाइप्ट नहीं होने दिया. ख़ुशी,ग़म,मस्ती,गीत,ग़ज़ल,लोक-संगीत,वैस्टर्न सभी स्टाइल में गाया और बख़ूबी गाया. सन अड़तालीस में वे शुरू हुए इस लिहाज़ से 2008 उनके गायकी का हीरक जयंती वर्ष है. साठ साल बाद भी उनके गीत पुराने नहीं पड़े और यक़ीनन कह सकता हूँ सौ साल बाद भी नहीं पड़ेंगे.
शब्दों की साफ़-शफ़्फ़ाक़ अदायगी,कविता के मर्म को समझने वाला दिल,संगीत को गहराई से जानने की समझ और एक ऐसा विलक्षण दिमाग़ जो संगीतकार और कम्पोज़िशन की रूह तक उतर जाता हो और जैसा चाहा गया उससे ज़्यादा डिलिवर करता है.

इस दुनिया से चले जाने के बाद भी (सनद रहे रफ़ी साहब को गुज़रे 28 बरस हो गए हैं;एक पीढ़ी ऐसी तैयार हो गई है जो साल भर में अपने माँ-बाप को भूल जाती है) रफ़ी साहब की गायकी का जलवा क़ायम है क्योंकि रफ़ी शब्द को गाते हुए भी शब्द और समय के पार की गायकी के कलाकार थे इसीलिये उनके गीतों की ताब और चमक बरक़रार है. रफ़ी साहब को सुनने का सबसे अच्छा तरीक़ा यह है कि हम उन्हें सुनें और चुप हो जाएँ.ऐसा चुप हो जाना ही सबसे अच्छा बोलना है. सादगी से रहने और गाने वाले रफ़ी साहब ने ऐसा गाया है जैसे कोई ख़ुशबू का ताजमहल खड़ा कर दे.स्वर में ओस की बूँद की पाक़ीज़गी पैदा करने वाले मोहम्मद रफ़ी कभी भी रेकॉर्डिंग ख़त्म होने के बाद कभी नहीं कहते थे कि मैं जाता हूँ.31 जुलाई 1980 को संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की एक गीत रेकॉर्ड करने के बाद रफ़ी साहब बोले “ओके नाऊ आइ विल लीव “ क्या कोई सोच सकता है उसी दिन आवाज़ का ये जादूगर इसी शाम इस दुनिया को अलविदा कह गया.....क्या सूफ़ी और दरवेश के अलावा किसी को मृत्यु जैसी सचाई का पूर्वाभास हो सकता है ?

चित्र सौजन्य- हमाराफोटोस डॉट कॉम

आज हम पूरे दिन रफी की याद फीचर आलेख प्रकाशित करेंगे। युनूस खान की कलम से दोपहर दो बजे, रफी के बारे में विशेष जानकारी शाम ७ बजे। तो बने रहिए 'आवाज' के साथ और गुनगुनाते रहिए रफ़ी के मीठे-मीठे तराने।

Wednesday, July 30, 2008

तेज़ बारिश में कबड्डी खेलना अच्छा लगता है ...

दिल्ली के अनुरूप कुकरेजा हैं, आवाज़ पर इस हफ्ते का उभरता सितारा.

इस बेहद प्रतिभाशाली संगीतकार की ताज़ा स्वरबद्ध ग़ज़ल "तेरे चेहरे पे" बीते शुक्रवार आवाज़ पर आयी और बहुत अधिक सराही गयी. ग़ज़लों को धुन में पिरोना इनका जनून है, और संगीत को ये अपना जीवन समर्पित करना चाहते हैं. फरीदा खानम, मुन्नी बेगम और जगजीत सिंह इन्हे बेहद पसंद हैं, अपने भाई निशांत अक्षर, जो ख़ुद एक उभरते हुए ग़ज़ल गायक हैं, के साथ मिलकर एक एल्बम भी कर चुके हैं. संगीत के आलावा अनुरूप को दोस्तों के साथ घूमना, बेड़मिन्टन, लॉन टेनिस, बास्केट बोंल और क्रिकेट खेलना अच्छा लगता है, मगर सबसे ज्यादा भाता है, तेज़ बारिश ( जो हालाँकि दिल्ली में कम ही नसीब होती है ) में कबड्डी खेलना. जिंदगी को अनुरूप कुछ इन शब्दों में बयां करते हैं -

Life always creates new and BIG troubles through which i pass learning new and BIGGER things.
Even A failure is a success if analyzed from the other side of it.


हमने अनुरूप से गुजारिश की, कि वो हिंद युग्म के साथ उनके पहले संगीत अनुभव के बारे में, यूनि कोड का प्रयोग कर हिन्दी में लिखें, तो उन्होंने कोशिश की, और इस तरह उन्होंने हिन्दी टंकण का ज्ञान भी ले लिया, अब हो सकता है जल्द ही वो अपना ख़ुद का हिन्दी ब्लॉग भी बना लें.....तो लीजिये पढिये, क्या कहते हैं अनुरूप, अपने और अपने संगीत के बारे में -

नमस्कार दोस्तों, सबसे पहले तो में हिंद युग्म का शुक्रिया अदा करना चाहूँगा कि मुझे अपना संगीत प्रस्तुत करने का मौका दिया. उन सभी श्रोतागणों का आभार, जिन्होंने इस ग़ज़ल को सुना और अपने विचार प्रकट किए.

मेरा संगीत का सफर बचपन से ही शुरू हुआ, पिताजी को तबला व् हारमोनियम बजाते देख मैं भी इसी ओर खिंचा चला आया. शुरू से ही मुझे गाने का शौक नही रहा बल्कि संगीत का शौक रहा, जैसे जैसे उम्र बढ़ी, मेरी रूचि संगीत में बढती गई और मैंने गिटर बजाना शुरू किया. ११ वि कक्षा में मुझे एक होम स्टूडियो सेट अप करने का मौका मिला जिसको मैंने पलक झपकते ही पूरा किया. १२वि कक्षा के अंत तक मेरे भाई (निशांत अक्षर) और मैंने मिलकर एक ग़ज़ल एल्बम को पूरा किया जिसका नाम है "चुप की आवाज़ ", जिसका उदघाटन समारोह दिल्ली के हिन्दी भवन में किया गया, और जिसके बोल लिखे विज्ञान व्रत ने.

सफर आगे बढ़ा और मैं दिल्ली विश्व विद्यालय के रेडियो से जुड़ा.

रेडियो पर एक दिन इंटरव्यू देते वक्त मैंने हिंद युग्म के बारे में सुना, जो मुझे बेहद अच्छा लगा. सजीव जी से मेरी मुलाक़ात डी यू रेडियो के मैनेजर के द्वारा हुई, जो कि उस वक्त इंटरव्यू ले रहे थे. बात करने के कुछ हफ्तों बाद ही उन्होंने मुझे कुछ कवियों से ऑनलाइन मिलवाया जिन्होंने मुझे अपनी रचनायें भेजी. काफ़ी समय बाद, मनुज जी की रचना मुझे और मेरे भाई, निशांत अक्षर, को पसंद आयी और हमने इस पर काम शुरू कर दिया, और उसके बाद कि कहानी आपके सामने है.

अंत में एक बार फ़िर से सभी श्रोतागणों, मनुज जी,सजीव जी और हिंद युग्म की पूरी टीम का धन्येवाद, आगे भी आप सब मेरी कोशिशों को युहीं प्रोत्साहित करते रहेंगे इस आशा के साथ -

अनुरूप

मुझसे संपर्क करें -

Web : http://anuroop.in

iLike : http://ilike.com/artist/anuroop

Blog : http://www.anuroopsmusic.blogspot.com

अनुरूप को, आवाज़ और हिंद युग्म की ढेरों शुभकामनायें...अगर आप ने, अब तक नही सुना तो अब सुनिए, इस युवा संगीतकार की स्वरबद्ध की ये खूबसूरत ग़ज़ल, और अपना प्रोत्साहन/मार्गदर्शन दें.

Friday, July 4, 2008

संगीत दिलों का उत्सव है - संगीत के नए सत्र की पहली सौगात

मित्रों,
आज से आवाज़ पर शुरू हो रहा है, संगीत का एक नया उत्सव,"पहला सुर" के कामियाब प्रयोग के बाद संगीत का ये नया सत्र शुरू करते हुए, हिंद युग्म उम्मीद करता है कि इस सत्र में प्रस्तुत होने वाले सभी गीत आपको और अधिक पसंद आयेंगे, जो संगीतकार हमारे साथ पहली एल्बम में जुड़े थे उनके भी संगीत में आप गजब की परिपक्वता देंखेंगे और उससे भी ज्यादा खुशी की बात यह है कि जो नए संगीतकार इस बार जुड़े हैं, सभी नौजवान हैं और बेहद गुणी हैं अपने फन में.
संयोगवश जिस गीत को हमने इस सत्र की शुरुवात करने के लिए चुना है, वो भी दस्तक है एक नए युवा संगीतकार जोड़ी की, जो दूर केरल के दो प्रान्तों में रहते हैं और कोयम्बतूर के करुणया महाविद्यालय से b-tech की पढ़ाई कर रहे हैं, इनके नाम है निखिल और चार्ल्स, निखिल के संगीत में जहाँ बारिश में भीगी मिटटी की सौंधी सौंधी महक मिलेगी आपको, तो चार्ल्स के गायन में किसी निर्झर सा प्रवाह, एक और आवाज़ है इस गीत में, गायिका मिथिला की, जिन्होंने बाखूबी साथ दिया है इस जोड़ी का, इस गीत को और खूबसूरत बनाने में, सजीव सारथी के लिखे, इस गीत को अपने एक दोस्त के होम स्टूडियो में दो दिन लगातार १०- १० घंटे काम कर मुक्कमल किया है-निखिल और चार्ल्स की टीम ने, इनकी मेहनत कहाँ तक सफल हुई है, सुन कर बताएं, और कोई सुधार की गंजाइश बता कर आप इन्हें मार्गदर्शन दें, तो प्रस्तुत है समीक्षा के लिए, आपके समुख हिंद युग्म का यह पहला नज़राना

Friends,
After the glorious success of Hind Yugm's debut album Pahla Sur, we are happy to announce the beginning of a new season of music @ Hindyugm, Where Music is a Passion, we wish all our existing and new composers a very happy music year ahead.
From today onwards,till December 31st, we will release a new song every Friday, so all you music lovers, mark your Fridays as music Fridays, from now on. We will surly give your ears a grand musical treat.

We are proudly opening this season from a song called " Sangeet Dilon Ka Utsav Hai ", composed by a composer duo from south Nikhil and Charles, and penned by Sajeev Sarathie, this song speaks about the magic of music,which make our lives so colourful. This song completed after 10-10 long hours of jammng for 2 complete days by the team, and very beautifully rendered by Charles and Mithila. So enjoy this soulful melody and leave your comments. so friends, Here comes THE FIRST SONG OF THE SEASON for you – LISTEN AND ENJOY



गीत के बोल -

जब सुर खनकते हैं,
बेजान साजों से,
आवाज़ के पंखों पर उड़ने लगता है कोई गीत जब,
झूम झूम लहराते हैं ये दिल क्योंकि..
संगीत दिलों का उत्सव है,
संगीत दिलों का उत्सव है...उत्सव है.....

गीतों के रंग न हो तो, नीरस है ये जीवन,
सरगम के सुर न छिड़े तो, सूना है मन आंगन,
हवाओं में संगीत है,
लहरों में संगीत है,
संगीत है बारिश की रिमझिम में,
धड़कन में संगीत है,
सांसों में संगीत है,
संगीत है कुदरत के कण कण में,
जब ताल से उठे,
दिल की सदा कोई,
हौले से ख्वाबों को सहला जाता है कोई गीत जब,
घूम घूम बलखाते हैं ये दिल क्योंकि...
संगीत दिलों का उत्सव है,
संगीत दिलों का उत्सव है...उत्सव है.....

गहरे ये रिश्ते हैं, संग रोते हँसते हैं,
सुख दुःख के सब मौसम, गीतों में बसते हैं,
कभी गूंजे बांसुरी,
वीणा की धुन कभी,
कभी ढोल मंजीरे बजते हैं,
तबले की थाप पर,
कभी नाचता है मन,
कभी सुर सितार के बहते हैं,
जब ताल से उठे,
दिल की सदा कोई,
धीमे से यादों को धड़का जाता है कोई गीत जब,
साथ साथ गुनुगुनाते हैं ये दिल क्योंकि ...
संगीत दिलों का उत्सव है,
संगीत दिलों का उत्सव है...उत्सव है.....

जब सुर खनकते हैं.....

Lyrics

jab sur khankte hain,
bezaan sajon se,
awaaz ke pankhon par udne lagta hai koi geet jab,
jhoom jhoom lehrate hain ye dil kyonki...
sangeet dilon ka utsav hai,
sangeet dilon ka utsav hai.... utsav hai....

geeton ke rang na ho to, neeras hai ye jeevan,
sargam ke sur na chide to, sunaa hai man aangan,
hawavon men sangeet hai,
lehron men sangeet hai,
sangeet hai barish ki rimjhim men,
dhadkan men sangeet hai,
sanson men sangeet hai,
sangeet hai kudrat ke kan kan men,
jab taal se uthe,
dil ki sada koi,
haule se khwabon ko sahla jaata hai koi geet jab,
ghoom ghoom balkhate hain ye dil kyonki...
sangeet dilon ka utsav hai,
sangeet dilon ka utsav hai.... utsav hai....


gahre ye rishte hain, sang rote hanste hain,
sukh dukh ke sab mausam, geeton men baste hain,
kabhi gunje bansuri,
veena ki dhun kabhi,
kabhi dhol manjeere bajte hain,
tablee ki thaap par,
kabhi nachta hai man,
kabhi sur sitaar ke bahte hain,
jab taal se uthe,
dil ki sada koi,
dheeme se yadon ko dhadka jaata hai koi geet jab,
saath saath gungunate hain ye dil kyonki...
sangeet dilon ka utsav hai,
sangeet dilon ka utsav hai.... utsav hai....

jab sur khankte hain......


You can download the song according to your prefrence from here -

यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)




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SANGEET DILON KA UTSAV HAI

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