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Sunday, June 28, 2020

राग वृन्दावनी सारंग : SWARGOSHTHI – 468 : RAG VRINDAVANI SARANG





स्वरगोष्ठी – 468 में आज

काफी थाट के राग – 12 : राग वृन्दावनी सारंग

विदुषी अश्विनी भिड़े से वृन्दावनी सारंग की एक बन्दिश और आशा भोसले व मुहम्मद रफी से फिल्मी गीत सुनिए





अश्विनी भिड़े देशपाण्डे

आशा  भोसले और मुहम्मद रफी

“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “काफी थाट के राग” की बारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार उस समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की बारहवीं कड़ी में आज हमने काफी थाट के राग वृन्दावनी सारंग को चुना है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग वृन्दावनी सारंग का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के स्वरों में राग वृन्दावनी सारंग की एक बन्दिश के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। इस राग के स्वरों का फिल्मी गीतों में भी उपयोग किया गया है। राग वृन्दावनी सारंग के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1966 में प्रदर्शित फिल्म "दिल दिया दर्द लिया” से नौशाद का स्वरबद्ध किया एक विख्यात गीत “सावन आए या न आए…”, आशा भोसले और मुहम्मद रफी के युगल स्वर में सुनवा रहे हैं।



राग वृन्दावनी सारंग का सम्बन्ध काफी थाट से माना जाता है। इस राग में गान्धार और धैवत स्वर वर्जित होता है। अतः इसकी जाति औड़व-औड़व होती है। राग के आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। अन्य स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। कुछ विद्वान राग वृन्दावनी सारंग को खमाज थाट का राग मानते हैं, किन्तु इसे काफी थाट का राग मानना उचित है। “राग परिचय” ग्रन्थ के लेखक हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव के अनुसार किसी भी राग का थाट निश्चित करने के लिए स्वर से अधिक महत्वपूर्ण राग का स्वरूप होता है। स्वरूप की दृष्टि से राग, खमाज की तुलना में काफी थाट के अधिक समीप है। सारंग के कई प्रकार हैं, जैसे शुद्ध सारंग, मियाँ की सारंग, मध्यमाद सारंग आदि। इस राग की रचना उत्तर प्रदेश के एक लोकगीत के आधार पर हुई है। साधारण बोल-चाल की भाषा में राग सारंग का अर्थ वृन्दावनी सारंग ही माना जाता है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम आपको सुविख्यात गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के स्वर में इस राग की एक बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। रचना के बोल हैं; “सखी री मोरा जिया बेकल होत...”। यह रचना मध्यलय, मत्तताल में निबद्ध है।

वृन्दावनी सारंग : “सखी री मोरा जिया बेकल होत...” : अश्विनी भिड़े देशपाण्डे


फिल्म संगीत में रागों का सर्वाधिक उपयोग यदि किसी संगीतकार ने किया है, तो वह हैं, नौशाद अली। फिल्म संगीत के क्षेत्र में नौशाद को उनके समय तक सर्वाधिक प्रतिष्ठा प्राप्त थी। नौशाद पहले संगीतकार थे जिन्होने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व के बल पर फिल्म जगत में संगीतकार का दर्जा भी नायक या निर्देशक के समकक्ष ला खड़ा किया। नौशाद ऐसे संगीतकार थे, जिन्होने फिल्मों में अपनी रचनाएँ भारतीय संगीत पद्धति के अन्तर्गत विकसित की। उन्होने राग आधारित स्वरक्रम के साथ कभी तो विशुद्ध शास्त्रीय बन्दिशें सृजित की तो कभी शास्त्रीय संगीत के आधार में लोकसंगीत के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए बहुत ही सरस और मीठे गीत रचे। ऐसा ही एक राग आधारित गीत आज हम आपको सुनवा रहे हैं। 1966 में दिलीप कुमार और वहीदा रहमान अभिनीत फिल्म “दिल दिया दर्द लिया” प्रदर्शित हुई थी। फिल्म के गीतकार शकील बदायूनी और संगीतकार नौशाद थे। फिल्म में नौशाद के स्वरबद्ध कई राग आधारित गीत हैं। इनमें से एक गीत “सावन आए या न आए...” राग वृन्दावनी सारंग के स्वरों पर आधारित इतनी विराट और कसी हुई रचना है कि फिल्मी गीतों में राग का इतना सफल रूपान्तरण बहुत कठिनाई से परिलक्षित होता है। “हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया” के ग्रन्थकार के.एल. पाण्डेय के अनुसार इस गीत में राग वृन्दावनी सारंग के साथ राग मेघ और शुद्ध सारंग का स्पर्श भी हुआ है। आइए सुनते हैं, राग वृन्दावनी सारंग पर आधारित यह फिल्मी गीत। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

वृन्दावनी सारंग : “सावन आए या न आए...” : मुहम्मद रफी और आशा भोसले : फिल्म - दिल दिया दर्द लिया




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 468वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1981 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित लोकप्रिय गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के दूसरे सत्र अर्थात 470वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के द्वितीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस युगलगीत में किन गायक कलाकारो के स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 4 जुलाई, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 470 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 466वें अंक में हमने आपको 1961 में प्रदर्शित फिल्म “छोटे नवाब” के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – मालगुंजी और खमाज, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – रूपक तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


संवाद


मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अन्य समर्थ देशों की तुलना में हमारे प्रयास सराहनीय रहे हैं। अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की बारहवीं कड़ी में आज आपने काफी थाट के जन्य राग वृन्दावनी सारंग का परिचय प्राप्त किया। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के स्वरों में राग वृन्दावनी सारंग की एक बन्दिश के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन कराया। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार आज की कड़ी में हमने आपको 1966 में प्रदर्शित फिल्म "दिल दिया दर्द लिया” से नौशाद का स्वरबद्ध किया एक विख्यात गीत “सावन आए या न आए…”, आशा भोसले और मुहम्मद रफी के युगल स्वर में प्रस्तुत किया। इस गीत के गीतकार शकील बदायूनी और संगीतकार नौशाद हैं।

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग वृन्दावनी सारंग : SWARGOSHTHI – 468 : RAG VRINDAVANI SARANG : 28 जून, 2018


Sunday, June 7, 2020

राग आभोगी कान्हड़ा : SWARGOSHTHI – 465 : RAG ABHOGI KANHADA





स्वरगोष्ठी – 465 में आज

काफी थाट के राग – 9 : राग आभोगी कान्हड़ा

विदुषी अश्विनी भिड़े से आभोगी कान्हड़ा की बन्दिश और आशा भोसले से फिल्म का एक गीत सुनिए





आशा भोसले 
अश्विनि भिड़े देशपांडे 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “काफी थाट के राग” की नौवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार उस समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की नौवीं कड़ी में आज हमने काफी थाट के राग आभोगी अथवा आभोगी कान्हड़ा को चुना है। श्रृंखला की आज की इस कड़ी में हम राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने राग आभोगी अथवा आभोगी कान्हड़ा चुना है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम सुविख्यात पार्श्वगायिका आशा भोसले के स्वर में 1975 में प्रदर्शित फिल्म “कागज की नाव” से राग आभोगी कान्हड़ा पर आधारित एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इससे पहले राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुप्रसिद्ध संगीत विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के स्वर में राग आभोगी कान्हड़ा की एक बन्दिश भी हम प्रस्तुत कर रहे हैं।




राग आभोगी अथवा आभोगी कान्हड़ा को काफी थाट जन्य माना जाता है। इसमें गान्धार स्वर कोमल और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। इस राग में पंचम और निषाद स्वर वर्जित होने से राग की जाति औड़व औड़व होती है। इस राग का गायन और वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में अधिक खिलता है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षड्ज होता है। यह कर्नाटक पद्धति का एक मधुर राग है, जिसका प्रचार उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में अधिक हुआ है। कान्हड़ा का प्रकार होने के कारण अवरोह में गान्धार स्वर का वक्र प्रयोग किया जाता है, जैसे; कोमल ग, म, रे, सा। यह स्वर बार बार प्रयोग किया जाता है और कोमल गान्धार स्वर आन्दोलित होता है। ग्रन्थकार हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव की पुस्तक “राग परिचय” के अनुसार राग आभोगी और राग आभोगी कान्हड़ा बहुत थोड़ा अन्तर होता है। राग आभोगी को आभोगी कान्हड़ा बनाने के लिए कोमल ग, म, रे, सा, स्वरसमूह का प्रयोग किया जाता है, अन्यथा सम्पूर्ण राग के चलन में कोई परिवर्तन नहीं होता। कुछ विद्वान इस भेद को नहीं मानते, उनका कहना है कि यह भेद करना ‘बाल की खाल निकालना’ है। आभोगी और आभोगी कान्हड़ा दोनों में रे, कोमल ग, म, कोमल ग, रे, सा स्वरों का प्रयोग होता है, केवल आभोगी कान्हड़ा में कान्हड़ा अंग लाने के लिए कोमल ग, म, रे, सा का प्रयोग करते हैं। परन्तु आभोगी में इन स्वरों का प्रयोग नहीं किया जाता। कुछ विद्वानों का मत है कि आभोगी राग में आन्दोलित कोमल गान्धार स्वर से ही कान्हड़ा अंग स्पष्ट हो जाता है, चाहे वक्र कोमल गान्धार स्वर अवरोह में लें अथवा न लें। इस राग का चलन तीनों सप्तकों में होता है। यह खयाल शैली का राग है, इसमें ठुमरी नहीं गायी जाती। इस राग का आलाप अत्यन्त कर्णप्रिय लगता है। राग आभोगी कान्हड़ा के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं, इस राग में एक मोहक द्रुत खयाल, जिसे स्वर दे रही हैं, सुविख्यात गायिका अश्विनी भिड़े देशपाण्डे। 

राग आभोगी कान्हड़ा : “रस बरसत तोरे घर...” : विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे 





राग आभोगी का न्यास स्वर मध्यम और उपन्यास स्वर धैवत होता है। इस राग के गायन और वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय रात्रि में 11 से 12 बजे के मध्य माना जाता है। इस राग के बारे में सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ और मयूरवीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र बताते हैं कि संगीतमार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के मतानुसार अवरोह में जब सां, ध, म, ग(कोमल), रे ,सा स्वरों का प्रयोग किया जाएगा तो यह राग आभोगी होगा। जब इसमें म, ग(कोमल), रे, सा के स्थान पर ग(कोमल), म, रे, सा स्वरो का प्रयोग करेंगे यह आभोगी कान्हड़ा बन जाता है। ये कान्हड़ा अंग के राग हैं। इस राग की प्रकृति शान्त व आत्मनिवेदन की होती है। आभोगी के श्रवण से भक्तिभाव की अभिव्यक्ति होगी तथा आभोगी कान्हड़ा के श्रवण से मन शान्त हो जाएगा। दोनों ही राग डिप्रेशन और चिन्ताविकृत को दूर का रास्ता दिखा कर गहन निद्रा का सुख प्रदान कर सकते हैं। कुछ विद्वान राग आभोगी और आभोगी कान्हड़ा में वादी और संवादी स्वरों का अन्तर भी मानते हैं। वे राग आभोगी में षडज और मध्यम तथा राग आभोगी कान्हड़ा में मध्यम और षडज को क्रमशः वादी और संवादी मानते हैं। इस परिवर्तन से राग आभोगी पूर्वांग और राग आभोगी कान्हड़ा को उत्तरांग प्रधान राग होना चाहिए, परन्तु यह भेद उचित नहीं मालूम होता। शास्त्र सदैव क्रियात्मक संगीत का अनुसरण करता है। जो बातें क्रियात्मक संगीत में होती है, वही शास्त्र में शामिल की जाती है। क्रियात्मक संगीत में कोमल ग, म, रे, सा के अतिरिक्त कोई भेद दिखाई नहीं पड़ता। इसलिए वादी और संवादी स्वरों के फलस्वरूप पूर्वांग और उत्तरांग का भेद न्यायसंगत नहीं है। अब हम आपको राग आभोगी कान्हड़ा पर आधारित वर्ष 1975 में प्रदर्शित फिल्म “कागज की नाव” से एक गीत सुनवा रहे हैं। पार्श्वगायिका आशा भोसले के स्वर में प्रस्तुत इस गीत के शब्द नक्श लायलपुरी के उयर संगीत सपन जगमोहन का है। “हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया” के ग्रन्थकार के.एल. पाण्डेय के अनुसार इस गीत में राग आभोगी कान्हड़ा के साथ राग बागेश्री का स्पर्श भी हुआ है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग आभोगी कान्हड़ा : “ना जइयो रे सौतन घर...” : आशा भोसले : फिल्म : कागज की नाव 




संगीत पहेली



‘स्वरगोष्ठी’ के 465वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1971 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित लोकप्रिय गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के दूसरे सत्र अर्थात 470वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के द्वितीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 13 जून, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 467 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 463 वें अंक में हमने आपको 1960 में निर्मित किन्तु अप्रदर्शित फिल्म “भूल न जाना” के एक लोकप्रिय गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – सिन्दूरा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मुकेश। 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 

संवाद



मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अन्य समर्थ देशों की तुलना में हमारे प्रयास अधिक सराहनीय रहे हैं। अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी" की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की नौवीं कड़ी में आज आपने काफी थाट के जन्य राग आभोगी अथवा आभोगी कान्हड़ा का परिचय प्राप्त किया। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के स्वर में राग आभोगी कान्हड़ा में एक द्रुत खयाल हमने प्रस्तुत किया। इसके साथ ही वर्ष 1975 में प्रदर्शित फिल्म “कागज की नाव” से राग आभोगी कान्हड़ा का स्पर्श करता एक गीत पार्श्वगायिका आशा भोसले के स्वर में प्रस्तुत किया। इस गीत के गीतकार नक्श लायलपुरी और संगीतकार सपन जगमोहन हैं। कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा  radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  
रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग आभोगी कान्हड़ा : SWARGOSHTHI – 465 : RAG ABHOGI KANHADA : 7 जून, 2018




Sunday, December 29, 2019

राग गारा : SWARGOSHTHI – 449 : RAG GARA






स्वरगोष्ठी – 449 में आज


नौशाद की जन्मशती पर उनके राग – 5 : राग गारा


लच्छू महाराज की अनूठी नृत्य-संरचना देखिए, गारा में पिरोया गीत; “मोहे पनघट पे नन्दलाल छेड़ गयो...”



लता मंगेशकर
नौशाद
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला – “नौशाद की जन्मशती पर उनके राग” की पाँचवीं और समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान रहे नौशाद अली के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा करेंगे। श्रृंखला की विभिन्न कड़ियों में हम आपको फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के कुछ राग-आधारित गीत प्रस्तुत करेंगे। 25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद अली का जन्म हुआ था। इस तिथि के अनुसार बीते 25 दिसम्बर, 2019 को नौशाद का एक सौवाँ जन्मदिन सम्पन्न हुआ है। इस उपलक्ष्य में हम “स्वरगोष्ठी” के दिसम्बर मास के प्रत्येक अंक में नौशाद के कुछ राग आधारित ऐतिहासिक गीत प्रस्तुत किया। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता वाहिद अली घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करते थे। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठने लगे। वहाँ वह साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। फिल्म प्रदर्शन के दौरान दृश्य के अनुकूल सजीव संगीत प्रसारित हुआ करता था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही लद्दन खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घरवालों की फटकार बदस्तूर जारी रही। अन्ततः 1937 में एक दिन घर में बिना किसी को बताए मायानगरी बम्बई (अब मुम्बई) की ओर रुख किया।


नौशाद के सांगीतिक जीवन की सर्वाधिक उल्लेखनीय फिल्म “मुगल-ए-आजम” रही है। “मुग़ल-ए-आज़म', वर्ष 1960 की सर्वाधिक चर्चित फ़िल्म मानी जाती है। फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार सुजॉय चटर्जी के अनुसार के. आसिफ़ निर्देशित इस महत्वाकांक्षी फ़िल्म की नीव सन् 1944 में रखी गयी थी। दरअसल बात ऐसी थी कि आसिफ़ साहब ने एक नाटक पढ़ा। उस नाटक की कहानी शाहंशाह अकबर के राजकाल की पृष्ठभूमि में लिखी गयी थी। कहानी उन्हें अच्छी लगी और उन्होंने इस पर एक बड़ी फ़िल्म बनाने की सोची। लेकिन उन्हें उस वक़्त यह अन्दाज़ा भी नहीं हुआ होगा कि उनके इस सपने को साकार होते 16 साल लग जायेंगे। 'मुग़ल-ए-आज़म' अपने ज़माने की बेहद मंहगी फ़िल्म थी। एक-एक गीत के सीक्वेन्स में इतना खर्चा हुआ कि जो उस दौर की किसी पूरी फ़िल्म का खर्च होता था। नौशाद के संगीत निर्देशन में भारतीय शास्त्रीय संगीत व लोक संगीत की छटा लिये इस फ़िल्म में कुल 12 गीत थे जिनमें आवाज़ें दी उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ, लता मंगेशकर, शमशाद बेग़म और मोहम्मद रफ़ी ने। हिन्दी फ़िल्म संगीत के इतिहास का यह एक स्वर्णिम अध्याय रहा। यहाँ तक कि इस फ़िल्म के सर्वाधिक लोकप्रिय गीत "प्यार किया तो डरना क्या" को शताब्दी का सबसे रोमांटिक गीत का ख़िताब भी दिया गया था। लता मंगेशकर की ही आवाज़ में फ़िल्म का अन्य गीत "मोहे पनघट पे नन्दलाल छेड़ गयो रे..." का भी अपना अलग महत्व है। कहा जाता है कि मुस्लिम सब्जेक्ट पर बनी इस ऐतिहासिक फ़िल्म में राधा-कृष्ण से सम्बन्धित इस गीत को रखने पर विवाद खड़ा हो सकता है, ऐसी आशंका जतायी गयी थी। वरिष्ठ निर्देशक विजय भट्ट भी इस गीत को फ़िल्म में रखने के ख़िलाफ़ थे। हालाँकि वो इस फ़िल्म से सीधे-सीधे जुड़े नहीं थे, पर उनकी यह धारणा थी कि यह फ़िल्म को ले डूब सकता है क्योंकि मुग़ल शाहंशाह को इस गीत के दृश्य में हिन्दू उत्सव जन्माष्टमी मनाते हुए दिखाया जाता है। नौशाद ने यह तर्क भी दिया कि जोधाबाई चूँकि ख़ुद एक हिन्दू थीं, इसलिए सिचुएशन के मुताबिक इस गीत को फ़िल्म में रखना कुछ ग़लत नहीं था। फिर भी नाज़ुकता को ध्यान में रखते हुए फ़िल्म के पटकथा लेखकों ने इस सीन में एक संवाद ऐसा रख दिया जिससे यह तर्क साफ़-साफ़ जनता तक पहुँच जाये।

बहुत से फ़िल्मी गीतों को कृष्ण की लीलाओं से प्रेरणा मिली हैं। पर "मोहे पनघट..." कुछ अलग ही मुकाम रखता है। इस गीत के लिए गीतकार शक़ील बदायूनी और संगीतकार नौशाद का नाम रेकॉर्ड पर दर्शाया गया है। पर सत्य यह है कि मूल गीत न तो शक़ील ने लिखा है और न ही मूल संगीत नौशाद का है। यह दरअसल एक पारम्परिक बन्दिश है जिसे शक़ील और नौशाद ने फ़िल्मी जामा पहनाया है। क्योंकि इसके मूल रचयिता का नाम किसी को मालूम नहीं है और इसे एक पारम्परिक रचना के तौर पर भी गाया जाता रहा है, इसलिए शायद किसी ने विरोध नहीं किया। पर ऐसे गीतों में गीतकार के नाम के जगह 'पारम्परिक' शब्द दिया जाना बेहतर होता। ख़ैर, उपलब्ध तथ्यों के अनुसार राग गारा पर आधारित इस मूल ठुमरी का सबसे पुराना ग्रामोफ़ोन 78 RPM रेकॉर्ड इन्दुबाला की आवाज़ में आज भी सुना जा सकता है। इन्दुबाला का जन्म 1899 में हुआ था और ऐसी धारणा है कि उनकी गायी यह रेकॉर्डिंग 1915 से 1930 के बीच के किसी वर्ष में की गई होगी। 1932 में उस्ताद अज़मत हुसैन ख़ाँदिलरंग ने इसी ठुमरी को 'कोलम्बिआ रेकॉर्ड कम्पनी' के लिए गाया था। गौहर जान की आवाज़ में यह ठुमरी मशहूर हुई थी। मूल रचना के शब्द हैं "मोहे पनघट पर नन्दलाल छेड़ दीनो रे, मोरी नाजुक कलइयाँ मरोड़ दीनो रे.."। 'मुग़ल-ए-आज़म' के गीत में शक़ील ने शब्दों को आम बोलचाल वाली हिन्दी में परिवर्तित कर ठुमरी का फ़िल्मी संस्करण तैयार किया है। बहुत से फ़िल्मी गीतों को कृष्ण की लीलाओं से प्रेरणा मिली हैं। पर "मोहे पनघट..." कुछ अलग ही मुकाम रखता है।

लच्छू महाराज
विविध भारती के एक कार्यक्रम में नौशाद साहब ने इस गीत को याद करते हुए बताया, "इस फ़िल्म में एक सिचुएशन ऐसी आई जिसमें अकबर बादशाह कृष्णजन्म पर्व मना रहे हैं। आसिफ़ साहब ने मुझसे कहा कि वो इस सिचुएशन पर एक गाना चाहते हैं जिसमें वह झलक, वह माहौल पैदा हो। मैंने गाना बनाया, रेकॉर्ड करवाया, और उन्हें सुनाया। उन्हें बहुत पसन्द आया। तब मैंने उनसे रिक्वेस्ट किया कि इस गीत के पिक्चराइज़ेशन में जो डान्स इस्तेमाल होगा, उसे आप किसी फ़िल्मी डान्स डिरेक्टर से नहीं, बल्कि एक क्लासिकल डान्सर से करवाइयेगा। उन्होंने कहा कि फिर आप ही ढूँढ लाइये। मैंने लच्छू महाराज को आसिफ़ साहब से मिलवाया, जो लखनऊ कथक घराने के एक सुप्रतिष्ठित गुरु और कलाकार थे। आसिफ़ साहब ने उन्हें गाना सुनाया, तो वो रोने लग गये। आसिफ़ साहब परेशान हो गये, कहने लगे कि यह डान्स का गाना है, इसमें रोने की कौन सी बात है भला, मुझे भी समझ नहीं आ रहा था कि क्या बात हो गई, तब लच्छू महाराज ने कहा कि बिल्कुल यही स्थायी बोल वाली ठुमरी मेरे बाबा गाया करते थे, इसने मुझे उनकी याद दिला दी।"

फिर आयी गीत के फ़िल्मांकन की बारी। यह भी कोई आसान काम नहीं था। मधुबाला एक प्रशिक्षित नृत्यांगना नहीं थी। लच्छू महाराज ने लगातार पाँच दिनों तक मधुबाला को नृत्य सिखाया। कहा जाता है कि इस गीत के लाँग शॉट्स में लच्छू महाराज के दल के किसे लड़के ने मधुबाला के स्थान पर नृत्य किया, पर गीत के दृश्यों को देख कर अन्दाज़ा लगाना मुश्किल है। है ना आश्चर्य की बात! एक और आश्चर्य की बात यह है कि इतने स्तरीय गीतों के बावजूद उस वर्ष का 'फ़िल्मफ़ेअर' पुरस्कार 'मुग़ल-ए-आज़म' के लिए नौशाद को नहीं बल्कि 'दिल अपना और प्रीत परायी' के लिए शंकर जयकिशन को दिया गया। इसमें सन्देह नहीं कि 'दिल अपना...' के गानें भी बेहद मकबूल हुए थे, पर स्तर की बात करें तो 'मुग़ल-ए-आज़म' कई क़दम आगे थी। फ़िल्मफ़ेअर में ऐसा कई बार हुआ है। उदाहरण के तौर पर 1967 में शंकर जयकिशन को 'सूरज' के लिए यह पुरस्कार दिया गया जबकि 'गाइड', 'ममता' और 'अनुपमा' प्रतियोगिता में शामिल थी। 1971 में शंकर जयकिशन को फ़िल्म 'पहचान' के लिए यह पुरस्कार दिया गया जबकि उसी साल 'दो रास्ते' और 'तलाश' जैसी म्युज़िकल फ़िल्में थीं। 1973 में एक बार फिर शंकर जयकिशन को 'बेइमान' के लिए यह पुरस्कार दिया गया जबकि 'पाक़ीज़ा' के संगीतकार ग़ुलाम मोहम्मद को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। क्या यह सही निर्णय था? ख़ैर, कला किसी पुरस्कार का मोहताज नहीं। सच्चा पुरस्कार है, श्रोताओं का प्यार जो 'मुग़ल-ए-आज़म' को बराबर मिली और अब तक मिलती रही है। चूँकि यह गीत शास्त्रीय नृत्यप्रधान है, इसीलिए हम आपको इस गीत का रसास्वादन करने के लिए ‘यू-ट्यूब’ के सौजन्य से वीडियो रूप में प्रस्तुत कर रहे है।

राग गारा : “मोहे पनघट पे नन्दलाल छेड़ गयो रे...” : लता मंगेशकर और साथी : फिल्म – मुगल-ए-आजम



विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे
राग गारा को खमाज थाट जन्य राग माना जाता है। इस राग में दोनों गान्धार और दोनों निषाद प्रयोग किये जाते हैं। इस राग की जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण होती है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सभी सात स्वरों का प्रयोग होता है। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। इस राग के गायन-वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय रात्रि का दूसरा प्रहर माना जाता है। राग गारा में अधिकतर उपशास्त्रीय संगीत; जैसे ठुमरी, दादरा, झूला, कजरी आदि और सुगम तथा फिल्म संगीत आदि गाया-बजाया जाता है। यह विलम्बित खयाल का राग नहीं है। इसमें विशेषकर मन्द्र और मध्य के पूर्वांग के स्वर प्रयोग किए जाते हैं। कुछ विद्वान मध्यम स्वर को षडज स्वर मान कर भी गाते-बजाते हैं। इस राग में काफी समानता राग पीलू से पाई जाती है। कुछ विद्वान इस राग को क्षुद्र प्रकृति का राग मानते हैं। अब हम आपको राग पीलू में निबद्ध एक उपशास्त्रीय रचना सुनवा रहे हैं। इसे प्रस्तुत कर रही हैं, सुप्रसिद्ध विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे। दरअसल यह एक झूला गीत है, जिसे वर्षा ऋतु में गाया जाता है। आप यह झूला गीत सुनिए और इस श्रृंखला और इस वर्ष की समापन प्रस्तुति कड़ी से विराम लेने की हमें अनुमति दीजिए।

राग गारा : झूला गीत : “बदरिया रे झूला धीरे से झूला रे...” : विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ का यह वर्ष 2019 की समापन कड़ी है। हमारी अगली कड़ी का प्रकाशन वर्ष 2020 के पहले रविवार को होगा। वर्ष के पहले और दूसरे अंक में आप पहेली के वार्षिक महाविजेताओं की प्रस्तुतियों का रसास्वादन करेंगे; अतः इस अंक में हम कोई भी पहेली नहीं दे रहे हैं। अब हमारी अगली पहेली 451वें अंक में प्रकाशित होगी।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 447वें अंक की पहेली में हमने आपके लिए एक रागबद्ध गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा आपसे की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – देसी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – पण्डित दत्तात्रेय विष्णु (डी.वी.) पलुस्कर और उस्ताद अमीर खाँ

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, डोम्बिवली, महाराष्ट्र से श्रीपाद बावडेकर, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को दो-दो अंक मिलते हैं। सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


संवाद


"स्वरगोष्ठी" की पहेली के वर्ष 2019 के महाविजेताओं को व्यक्तिगत रूप से ई-मेल से सूचित कर दिया गया है। डॉ. किरीट छाया, प्रफुल्ल पटेल, मुकेश लाडिया, क्षिति तिवारी और डी. हरिणा माधवी हमारे सम्भावित महाविजेता हैं। नए वर्ष 2020 का पहला और दूसरा अंक इन महाविजेताओं की प्रस्तुतियों के आधार पर ही होगा।उपरोक्त सभी सम्भावित महाविजेताओं से अनुरोध किया गया है कि वे अपना स्वयं का गाया/बजाया अथवा अपनी पसन्द का आडियो/वीडियो क्लिप हमें शीघ्र भेज दें। मुकेश जी से आग्रह है कि वे आडियो/वीडियो क्लिप के साथ अपना परिचय-वृत्त भी अतिशीघ्र भेज दें। आपके प्रेषण की हमें प्रतीक्षा है। 



अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “नौशाद की जन्मशती पर उनके राग” की पाँचवीं और समापन कड़ी में आज आपने राग गारा का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के उपशास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए आपने सुविख्यात गायिका विदुषी अश्वनी भिड़े देशपाण्डे के स्वर में इस राग में पिरोया एक उपशास्त्रीय झूला गीत प्रस्तुत किया। नौशाद द्वारा राग गारा के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत के उदाहरण के लिए हमने आपके लिए लता मंगेशकर और साथियों के स्वर में राग गारा पर आधारित फिल्म “मुगल-ए-आजम” का एक ऐतिहासिक गीत प्रस्तुत किया। अब हामारी मुलाक़ात नये वर्ष 2020 के अगले अंक में 5 जनवरी के अंक में होगी। कुछ तकनीकी समस्या के कारण “स्वरगोष्ठी” की पिछली कुछ कड़ियाँ हम “फेसबुक” पर अपने कुछ मित्र समूह पर साझा नहीं कर पा रहे थे। संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
 राग गारा : SWARGOSHTHI – 449 : RAG GARA : 29 दिसम्बर, 2019

Sunday, March 17, 2019

राग शुद्ध कल्याण : SWARGOSHTHI – 411 : RAG SUDDHA KALYAN






स्वरगोष्ठी – 411 में आज

कल्याण थाट के राग – 9 : राग शुद्धकल्याण

विदुषी अश्विनी भिड़े से राग शुद्ध कल्याण का खयाल और इस राग में पिरोया गीत लता मंगेशकर से सुनिए




अश्विनी भिड़े देशपाण्डे
लता मंगेशकर
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी लघु श्रृंखला “कल्याण थाट के राग” के नौवें अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट-व्यवस्था है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए उपरोक्त 12 स्वरों में से कम से कम 5 स्वरों का होना आवश्यक है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के 12 स्वरों में से क्रमानुसार 7 मुख्य स्वरों के समुदाय को थाट कहते हैं। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये 10 थाट हैं- कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन्हीं 10 थाटों के अन्तर्गत प्रचलित-अप्रचलित सभी रागों को सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाटों के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन कवि द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग 300 सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से पहला थाट कल्याण है। इस श्रृंखला में हम कल्याण थाट के दस रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आज के अंक में कल्याण थाट के एक और जन्य राग “शुद्ध कल्याण” पर चर्चा करेंगे। इस राग में पहले हम आपको सुविख्यात गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के स्वर में निबद्ध खयाल रचना सुनवाएँगे। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार 1957 में प्रदर्शित फिल्म “पेइंग गेस्ट” से इसी राग में पिरोया एक गीत लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।



कल्याण थाट का ही एक अन्य राग शुद्ध कल्याण है। इस राग के आरोह में मध्यम और निषाद स्वर तथा अवरोह में मध्यम स्वर वर्जित होता है। इसकी जाति औड़व-षाड़व होती है। इस राग में निषाद स्वर का अल्प प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। रात्रि के प्रथम प्रहर में इस राग का गायन-वादन सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। इस राग में सभी शुद्ध स्वर प्रयोग किए जाते हैं। राग शुद्ध कल्याण की रचना राग भूपाली और राग कल्याण के मेल से हुई है। इसके आरोह में राग भूपाली और अवरोह में राग कल्याण के स्वर प्रयोग होते हैं। अवरोह में तीव्र मध्यम स्वर अति अल्प प्रयोग होता है, इसीलिए अवरोह की जाति में तीव्र मध्यम स्वर की गणना नहीं की जाती। इस राग में राग भूपाली और कल्याण का मिश्रण होने के कारण कुछ विद्वान इसे राग भूपकल्याण भी कहते हैं। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं, राग शुद्ध कल्याण में निबद्ध एक बन्दिश, जिसे विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे ने प्रस्तुत किया है।

राग शुद्ध कल्याण : “बतियाँ दुहरावत हैं...” : अश्विनी भिड़े देशपाण्डे


राग शुद्ध कल्याण में पंचम और ऋषभ स्वरों की कणयुक्त संगति इसकी प्रमुख विशेषता है। कल्याण थाट के एक अन्य राग छायानट में पंचम और ऋषभ की संगति का विशेष महत्त्व है। जहाँ तक केवल पंचम और ऋषभ स्वरों की संगति का प्रश्न है, राग छायानट और शुद्ध कल्याण में अन्तर यह है कि छायानट में पंचम से ऋषभ स्वर पर आते समय मींड़ का और राग शुद्ध कल्याण में कण का प्रयोग किया जाता है। राग शुद्ध कल्याण गम्भीर प्रकृति का राग है। इसका चलन मन्द्र, मध्य और तार तीनों सप्तकों भलीभाँति किया जा सकता है। इसमें निषाद स्वर अल्प है। कुछ संगीतज्ञ इसे पूर्णतः वर्जित कर देते है, कुछ केवल मींड़ में और कुछ इसका स्पष्ट प्रयोग करते हैं। निषाद स्वर का अधिक प्रयोग करने से राग कल्याण की छाया आने लगती है। इससे बचने के लिए मन्द्र की तुलना मध्य सप्तक मे इसका कम प्रयोग करना चाहिए। इसके विपरीत निषाद स्वर पूर्णतः वर्जित करने से राग जैत कल्याण की छाया आने की सम्भावना होती है। अब हम आपको राग शुद्ध कल्याण पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। यह गीत हमने 1957 में प्रदर्शित फिल्म “पेइंग गेस्ट” से लिया है। इसके संगीतकार सचिनदेव बर्मन हैं और इसे स्वर दिया है, लता मंगेशकर ने। आप यह सुमधुर गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग शुद्ध कल्याण : “चाँद फिर निकला...” : लता मंगेशकर : फिल्म – पेइंग गेस्ट




संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 411वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1960 में प्रदर्शित एक फिल्म के रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 420वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2019 के दूसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इस गीत में किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 23 मार्च, 2019 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के अंक संख्या 413 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 409 की पहेली में हमने आपसे वर्ष 1963 में प्रदर्शित फिल्म “सेहरा” के एक गीत का एक अंश सुनवा कर तीन प्रश्नों में से पूर्ण अंक प्राप्त करने के लिए कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – मारू विहाग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी श्रृंखला “कल्याण थाट के राग” की नौवीं कड़ी में आज आपने राग “शुद्ध कल्याण” का परिचय प्राप्त किया। साथ ही इस राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के स्वर में एक खयाल रचना का रसास्वादन किया। इसके बाद इसी राग पर आधारित एक गीत फिल्म “पेइंग गेस्ट” से लता मंगेशकर के स्वर में प्रस्तुत किया गया। संगीतकार सचिनदेव बर्मन ने इस गीत को राग शुद्ध कल्याण के स्वरों का आधार दिया है। इस गीत को लता मंगेशकर ने गाया है। “स्वरगोष्ठी” पर हमारी पिछले अंकों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया  
राग शुद्धकल्याण : SWARGOSHTHI – 411 : RAG SUDDHAKALYAN : 17 मार्च, 2019

Sunday, December 9, 2018

राग वृन्दावनी सारंग : SWARGOSHTHI – 397 : RAG VRINDAVANI SARANG






स्वरगोष्ठी – 397 में आज

पूर्वांग और उत्तरांग राग – 12 : राग वृन्दावनी सारंग

आशा भोसले और रफी से फिल्मी गीत और विदुषी अश्विनी भिड़े से राग वृन्दावनी सारंग सुनिए




अश्विनी भिड़े देशपाण्डे
आशा भोसले और मोहम्मद रफी
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की बारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। रागों को पूर्वांग और उत्तरांग में विभाजित करने के लिए सप्तक के सात स्वरों के साथ तार सप्तक के षडज स्वर को मिला कर आठ स्वरों के संयोजन को दो भागों में बाँट दिया जाता है। प्रथम भाग षडज से मध्यम तक पूर्वांग और दूसरे भाग पंचम से तार षडज तक उत्तरांग कहा जाता है। इसी प्रकार जो राग दिन के पहले भाग (पूर्वार्द्ध) अर्थात दिन के 12 बजे से रात्रि के 12 बजे के बीच में गाया-बजाया जाता हो उन्हें पूर्व राग और जो राग दिन के दूसरे भाग (उत्तरार्द्ध) अर्थात रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाता हो उन्हें उत्तर राग कहा जाता है। भारतीय संगीत का यह नियम है कि जिन रागों में वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में हो तो उन्हें दिन के पूर्वार्द्ध में और जिन रागों को वादी स्वर सप्तक उत्तरांग में हो उन्हे दिन के उत्तरार्द्ध में गाया-बजाया जाना चाहिए। राग का वादी स्वर यदि सप्तक के प्रथम भाग में है संवादी स्वर निश्चित रूप से सप्तक के दूसरे भाग में होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर सप्तक के दूसरे भाग में हो तो संवादी स्वर सप्तक के पूर्व में होगा। वादी और संवादी स्वरों में सदैव तीन अथवा चार स्वरों का अन्तर होता है। इसलिए यदि वादी स्वर ऋषभ है तो संवादी स्वर पंचम या धैवत होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर धैवत हो तो संवादी स्वर गान्धार अथवा ऋषभ होगा। भीमपलासी, बसन्त और भैरवी जैसे कुछ राग इस नियम के अपवाद होते हैं। इस कठनाई को दूर करने के लिए सप्तक के पूर्वांग और उत्तरांग का क्षेत्र बढ़ा दिया जाता है। पूर्वांग का क्षेत्र षडज से पंचम तक और उत्तरांग का क्षेत्र मध्यम से तार सप्तक के षडज तक माना जाता है। इस प्रकार वादी-संवादी में से यदि एक स्वर पूर्वांग में हो तो दूसरा स्वर उत्तरांग में हो जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ पूर्वांग और उत्तरांग प्रधान रागों पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए चुने गए अधिकतर रागों में वादी स्वर षडज अथवा ऋषभ होता है और संवादी स्वर पंचम अथवा मध्यम होता है। श्रृंखला की बारहवीं कड़ी में आज हमने राग वृन्दावनी सारंग चुना है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम मोहम्मद रफी और आशा भोसले के स्वर में 1966 में प्रदर्शित फिल्म “दिल दिया दर्द लिया” से राग वृन्दावनी सारंग पर आधारित एक युगलगीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के स्वर में राग वृन्दावनी सारंग में निबद्ध एक रचना भी हम प्रस्तुत कर रहे हैं।



राग वृन्दावनी सारंग का सम्बन्ध काफी थाट से माना जाता है। इस राग में गान्धार और धैवत स्वर वर्जित होता है। अतः इसकी जाति औड़व-औड़व होती है। राग के आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। अन्य स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। कुछ विद्वान राग वृन्दावनी सारंग को खमाज थाट का राग मानते हैं, किन्तु इसे काफी थाट का राग मानना उचित है। “राग परिचय” ग्रन्थ के लेखक हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव के अनुसार किसी भी राग का थाट निश्चित करने के लिए स्वर से अधिक महत्वपूर्ण राग का स्वरूप होता है। स्वरूप की दृष्टि से यह राग, खमाज की तुलना में काफी थाट के अधिक समीप है। इस राग के प्राचीन ध्रुवपदों में कहीं-कहीं अल्प शुद्ध धैवत स्वर का प्रयोग मिलता है, किन्तु वर्तमान इस राग में शुद्ध धैवत का प्रयोग कभी नहीं होता। सारंग के कई प्रकार हैं, जैसे शुद्ध सारंग, मियाँ की सारंग, मध्यमादि सारंग आदि। इस राग की रचना उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र में प्रचलित एक लोक संगीत के आधार पर हुई है। साधारण बोल-चाल की भाषा में राग सारंग का अर्थ वृन्दावनी सारंग ही माना जाता है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम आपको सुविख्यात गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के स्वर में इस राग की एक बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। रचना के बोल हैं, -“सखी री मोरा जिया बेकल होत...”। यह रचना मध्यलय, मत्तताल में निबद्ध है।

वृन्दावनी सारंग : “सखी री मोरा जिया बेकल होत...” : अश्विनी भिड़े देशपाण्डे


फिल्म संगीत में रागों का सर्वाधिक उपयोग यदि किसी संगीतकार ने किया है, तो वह हैं, नौशाद अली। फिल्म संगीत के क्षेत्र में नौशाद को उनके समय तक सर्वाधिक प्रतिष्ठा प्राप्त थी। नौशाद पहले संगीतकार थे जिन्होने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व के बल पर फिल्म जगत में संगीतकार का दर्जा भी नायक या निर्देशक के समकक्ष ला खड़ा किया। नौशाद ऐसे संगीतकार थे, जिन्होने फिल्मों में अपनी रचनाएँ भारतीय संगीत पद्धति के अन्तर्गत विकसित की। उन्होने राग आधारित स्वरक्रम के साथ कभी तो विशुद्ध शास्त्रीय बन्दिशें सृजित की तो कभी शास्त्रीय संगीत के आधार में लोकसंगीत के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए बहुत ही सरस और मीठे गीत रचे। ऐसा ही एक राग आधारित गीत आज हम आपको सुनवा रहे हैं। 1966 में दिलीप कुमार और वहीदा रहमान अभिनीत फिल्म “दिल दिया दर्द लिया” प्रदर्शित हुई थी। फिल्म के गीतकार शकील बदायूनी और संगीतकार नौशाद थे। फिल्म में नौशाद के स्वरबद्ध कई राग आधारित गीत हैं। इनमें से एक गीत –“सावन आए या न आए...” राग वृन्दावनी सारंग के स्वरों पर आधारित इतनी विराट और कसी हुई रचना है कि फिल्मी गीतों में राग का इतना सफल रूपान्तरण बहुत कठिनाई से परिलक्षित होता है। जिस प्रकार मल्हार को वर्षा ऋतु का राग माना जाता है, उसी प्रकार राग सारंग को ग्रीष्म ऋतु का राग माना जाता है। आइए सुनते हैं, राग वृन्दावनी सारंग पर आधारित यह फिल्मी गीत। आप इस मधुर गीत का रसास्वादन करें और हमे आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

वृन्दावनी सारंग : “सावन आए या न आए...” : मुहम्मद रफी और आशा भोसले : फिल्म – दिल दिया दर्द लिया



संगीत पहेली

“स्वरगोष्ठी” के 397वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1966 में प्रदर्शित एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। इस वर्ष की अन्तिम पहेली तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के पाँचवें सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।




1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायिका के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 15 दिसम्बर, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 399वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 395वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1964 में प्रदर्शित फिल्म “मैं सुहागन हूँ” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – देश, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मोहम्मद रफी और आशा भोसले

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, फीनिक्स, अमेरिका से मुकेश लाडिया, मेरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

डी.हरिणा माधवी की पुस्तक का मुखपृष्ठ
मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की बारहवीं कड़ी में आपने राग वृन्दावनी सारंग का परिचय प्राप्त किया। इस राग में आपने सुविख्यात गायिका विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे के स्वर में एक बन्दिश का रसास्वादन किया। साथ ही आपने इस राग पर आधारित संगीतकार नौशाद द्वारा संगीतबद्ध फिल्म “दिल दिया दर्द लिया” का एक गीत आशा भोसले और मोहम्मद रफी के युगल स्वर में सुना। “स्वरगोष्ठी” के 394 और 395वें अंक में हमने आपको संगीत विषयक एक नवीन पुस्तक के प्रकाशन की शुभ सूचना दी थी। हैदराबाद निवासी, संगीत शिक्षिका, “स्वरगोष्ठी” की नियमित पाठक और पहेली का नियमित उत्तर देने वाली सुश्री हरिणा माधवी ने अपने संगीत-शिक्षण-कार्य के दौरान अनेक स्वरचित बन्दिशों का एक संकलन तैयार किया है, जिसका संक्षिप्त विवरण और मुखपृष्ठ का चित्र हमें प्राप्त हुआ है। इस प्रकाशन का विस्तृत विवरण अपने पाठकों को हम शीघ्र ही सूचित करेंगे।

Book Title – “PRERNA” - Hindustani Shastriya Sangeet ki Swarachit Bandishe.

ISBN - 978-93-5281-756-6

Subject content

- Includes 61 bandishes in 25 popular ragas beginning from Bhairav to Bhairavi.

- Bhavarth of each Bandish is given to picturise the content to the learner.

- Pictures / illustration were drawn / given by the students to support the subject matter / poetic content of few Bandishes.

- Ragas included in the book are placed in an order, according to time theory of Ragas (Samay chakra).

- Utmost care was taken to keep the content unmanipulated.

- All bandishes have been performed in music concerts, well appreciated by audiences.

- The book 'Prerna' is an outcome of their suggestion, consent, and approval of my able Gurus and eminent artist of the music field.

- Cover page of the book is attractive and informative in citing each Swara is traditionally known to have originated from the respective animal.

हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग वृन्दावनी सारंग : SWARGOSHTHI – 397 : RAG VRINDAVANI SARANG : 9 दिसम्बर, 2018

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