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Wednesday, April 13, 2011

ए मेरे हमसफ़र रोक अपनी नज़र...जितनी उत्कृष्ट अभिनेत्री थी नूतन उनकी गायिकी में भी उतना ही क्लास था

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 634/2010/334

प्रिय दोस्तों, नमस्कार और स्वागत है आपका आप ही के इस मनचाहे महफ़िल में जिसका नाम है 'ओल्ड इज़ गोल्ड'। इस स्तंभ में इन दिनों जारी है लघु शृंखला 'सितारों की सरगम' जिसमें हम कुछ ऐसे गीत सुनवा रहे हैं जिन्हें गाया है अभिनेता - अभिनेत्रियों नें। जी नहीं, हम 'सिंगिंग् स्टार्स' की बात नहीं कर रहे, बल्कि हम केवल स्टार्स की बात कर रहे हैं जो मूलतः अभिनेता या अभिनेत्री हैं, लेकिन किसी न किसी फ़िल्म में एक या एकाधिक गीत गाया है। राज कपूर, दिलीप कुमार, और मीना कुमारी के बाद आज बारी है अभिनेत्री नूतन की। अभिनेत्री व फ़िल्म निर्मात्री शोभना समर्थ की बेटी नूतन को शोभना जी नें ही अपनी निर्मित फ़िल्म 'हमारी बेटी' में लौंच किया था, जिसमें नूतन नें एक गीत भी गाया था, जिसके बोल थे "तूने कैसा दुल्हा भाये री बाँकी दुल्हनिया"। 'हमारी बेटी' १९५० की फ़िल्म थी। इसके दस साल बाद, १९६० में शोभना समर्थ नें अपनी छोटी बेटी तनुजा को लौंच करने के लिए बनाई फ़िल्म 'छबिली' जिसमें मुख्य नायिका बनीं नूतन और इस फ़िल्म में संगीतकार स्नेहल भाटकर नें नूतन से ही सारे गीत गवाये जो उन पर फ़िल्माये गये। यह वाक़ई आश्चर्य की बात है कि जिस दौर में संगीतकार लता और आशा को गवाने के लिए तत्पर रहते थे, उस दौर में उन्होंने नूतन को मौका दिया अपने अभिनय के साथ साथ गायन के जोहर दिखाने का भी। और नूतन नें भी क्या कमाल का गायन प्रस्तुत किया था इस फ़िल्म में!

'छबिली' के गीतकार थे एस. रतन। इस फ़िल्म का हेमंत कुमार और नूतन का गाया "लहरों पे लहर उल्फ़त है जवाँ" हम 'गीत अपना धुन पराई' शृंखला में सुनवा चुके हैं। इस फ़िल्म का दूसरा सब से लोकप्रिय गीत है नूतन की एकल आवाज़ में "ऐ मेरे हमसफ़र, रोक अपनी नज़र" और जब भी नूतन के गायन प्रतिभा की बात चलती है तो सब से पहले इसी गीत का ज़िक्र किया जाता है। इसलिए आज की कड़ी में हम इसी गीत को बजा रहे हैं। इन दो गीतों के अलावा 'छबिली' में नूतन नें "मिला ले हाथ, ले बन गई बात" और "हे बाबू हे बाबा" एकल आवाज़ में गाया; तथा गीता दत्त के साथ मिलकर "यारों किसी से न कहना" और महेन्द्र कपूर के साथ "ओ माइ डार्लिंग् ओ माइ स्वीटी' जैसे गीत भी गाए। आज भले 'छबिली' फ़िल्म की कहानी किसी को याद न होगी, लेकिन इस बात के लिए यह फ़िल्म सब के ध्यान में रहती है कि इसमें नूतन ने अपनी आवाज़ में कुछ लाजवाब गीत गाये थे। आज के इस प्रस्तुत गीत को सुनने के बाद यकायक यह सवाल ज़हन में उभरता है कि नूतन नें और फ़िल्मों में क्यों नहीं गाया होगा! क्या ख़ूबसूरत आवाज़ थी और कितनी सुंदर अदायगी! और शत शत आभार स्नेहल भाटकर का भी, क्योंकि उनके प्रयास के बग़ैर शायद यह संभव नहीं हो पाता। आइए इस लाजवाब गीत का आनंद लिया जाये!



क्या आप जानते हैं...
कि नूतन को ५ बार फ़िल्मफ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, और ये फ़िल्में हैं 'सीमा', 'सुजाता', 'बंदिनी', 'मिलन', और 'मैं तुल्सी तेरे आंगन की'।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 5/शृंखला 14
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - एक ज़माने में इस बेमिसाल अभिनेता को सिंगिंग स्टार बनकर भी गाना पड़ता था, पर ये गीत उस दौर के बहुत बाद का है.

सवाल १ - कौन है ये गायक/अभिनेता - १ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - सहगायिका कौन हैं इस गीत में - ३ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अनजाना जी बढ़त पर हैं लगता है इस बार अमित जी को खासी मशक्कत करनी पड़ेगी

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, September 22, 2010

श्याम मुरली मनोहर बजाओ....लता के स्वरों में पंडित नरेंद्र शर्मा का लिखा ये भजन आज लगभग भुला सा दिया गया है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 489/2010/189

ता मंगेशकर के गाए दुर्लभ गीतों की इस शृंखला में आज के लिए हमने जिस गीत को चुना है, वह है १९५१ की फ़िल्म 'नंदकिशोर' का। यह एक धार्मिक फ़िल्म थी और धार्मिक फ़िल्मों के गानें अगर भूले बिसरे बन जाएँ तो उसमें बहुत ज़्यादा हैरत की बात नहीं है। कुछ गिने चुने धार्मिक फ़िल्मों को अगर अलग रखें तो ज़्यादातर इस जौनर की फ़िल्में ही बॊक्स ऒफ़िस पर ठण्डी ही रही और इन फ़िल्मों के गानें भी ज़्यादा सुनाई नहीं दिए। 'नंद किशोर' भी एक ऐसी ही फ़िल्म है जिसमें युं तो बेहद सुरीली मीठे गानें थे, लेकिन अफ़सोस कि ये गानें सही तरीक़े से लोगों तक पहुँच ना सके। नलिनी जयवन्त, दुर्गा खोटे और सुमती गुप्ते अभिनीत इस फ़िल्म में संगीत था स्नेहल भाटकर का तथा शुद्ध हिंदी में ये गानें लिखे पंडित नरेन्द्र शर्मा ने। इस फ़िल्म से जो कृष्ण भजन आपको आज हम सुनवा रहे हैं, उसके बोल हैं "श्याम मुरली मनोहर बजाओ"। युं तो ४० के दशक में स्नेहल भाटकर को सामाजिक फ़िल्मों में संगीत देने का अवसर मिला था, लेकिन ५० के दशक के शुरुआत से ही माइथोलॊजिकल फ़िल्मों के लिए वो अनुबन्धित होते गए और सामाजिक कामयाब फ़िल्मों से वो दूर होते गए। 'नंदकिशोर' का सब से मशहूर गीत था लता का गाया हुआ "राधा के मन की मुरली का पुजारी"। "कल भोर भए हरि जाएँगे" और आज का प्रस्तुत गीत भी मधुर गीत रहे लेकिन इन्हें इतनी प्रसिद्धी नहीं मिली। लेकिन कभी कभी किसी कलाकार को याद रखने के लिए एक ही गीत काफ़ी होता है। और स्नेहल के करीयर में भी एक ऐसा गीत बना जिसने उन्हें अमर कर दिया। "कभी तन्हाइयों में युं हमारी याद आएगी" आज भी जब हम सुनते हैं तो इस विस्मृत संगीतकार की यादें ताज़ा हो जाती हैं, बल्कि इस गीत को सुनते हुए आज भी जैसे रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

दोस्तो, आइए आज पंडित नरेन्द्र शर्मा की बातें की जाए। डॊ. रामविलास वर्मा ने अपना एक लेख प्रकाशित किया था 'पंडित नरेन्द्र शर्मा स्मृति ग्रंथ' में, जिसमें उन्होंने शर्मा जी से अपनी एक भेंट का संस्मरण पेश किया था। उनसे उनकी फ़िल्मी यात्रा की शुरुआत के बारे में पूछने पर उन्होंने जवाब दिया था - "१९४३ के फ़रवरी माह में भगवती बाबू अचानक घर आए और बोले, 'देखो, हम तुमको बम्बई ले चलते हैं, फ़िल्मवालों ने बुलाया है गीत लेखन के लिए'। मैंने कहा 'भगवती बाबू, फ़िल्म के लिए गीत लेखन का अभ्यास तो हमें हैं नहीं, बिल्कुल भी नहीं और फिर फ़िल्म वालों से परिचय भी तो नहीं है। भगवती बाबू ने उत्तर दिया - हम भी तो वहाँ हैं, चिन्ता क्यों करते हो, चलो। उनके साथ बम्बई रवाना हुआ। इलाहाबाद से बम्बई की यात्रा में मैंने पूर्वाभ्यास के रोप में एक गीत लिखने की कोशिश की। यह सुन रखा था यहाँ गीत उर्दू में भी लिखना होता है। उर्दू का अभ्यास तो मुझे था ही क्योंकि उ.प्र. में उन दिनों उर्दू दूसरी भाषा के रूप में पढ़ाई जाती थी। जो गीत मैंने यात्रा के दौरान रचा, उसका मुखड़ा था - "ऐ बादे सबा, इठलाती न आ, मेरा गुंचा-ए-दिल तो सूख गया"। ख़ैर, बम्बई पहुँचे। बॊम्बे टाकीज़ संस्था की निर्देशिका थीं उस समय की विख्यात अभिनेत्री देविकारानी। मुझे याद है कि १७ फ़रवरी के अपरान्ह अर्थात् दोपहर बाद हम उनसे मिलने पहुँचे थे। भगवती बाबू साथ में थे। देविका जी से दो घण्टे चर्चा हुई। अन्त में उन्होंने पूछा - आप हमारे बुलावे पर इलाहाबाद से कब रवाना हुए? मैंने उत्तर दिया - १५ फ़रवरी को। इस पर उन्होंने यह कहकर मुझे आश्चर्यचकित कर दिया, 'तो १५ फ़रवरी से आपको बॊम्बे टाकीज़ में नियुक्ति पक्की'। तीन वर्ष हम वहाँ रहे।" तो दोस्तों, पंडित नरेन्द्र शर्मा के इन शब्दों के बाद आइए अब उन्ही का लिखा आज का गीत सुनते हैं फ़िल्म 'नंदकिशोर' से।



क्या आप जानते हैं...
कि संगीतकार स्नेहल भाटकर के संगीत से सजी जो अंतिम हिंदी की दो फ़िल्में आई थीं, उनमें एक था १९८९ की फ़िल्म 'प्यासे नैन' और १९९४ की फ़िल्म 'सहमे हुए सिताए'।

विशेष सूचना:

लता जी के जनमदिन के उपलक्ष्य पर इस शृंखला के अलावा २५ सितंबर शनिवार को 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें' में होगा लता मंगेशकर विशेष। इस लता विशेषांक में आप लता जी को दे सकते हैं जनमदिन की शुभकामनाएँ बस एक ईमेल के बहाने। लता जी के प्रति अपने उदगार, या उनके गाए आपके पसंदीदा १० गीत, या फिर उनके गाए किसी गीत से जुड़ी आपकी कोई ख़ास याद, या उनके लिए आपकी शुभकामनाएँ, इनमें से जो भी आप चाहें एक ईमेल में लिख कर हमें २० सितंबर से पहले oig@hindyugm.com के पते पर भेज दें। हमें आपके ईमेल का इंतज़ार रहेगा।


अजय देशपांडे जी ने लता जी के दुर्लभ गीतों को संगृहीत करने के उद्देश्य से एक वेब साईट का निर्माण किया है, जरूर देखिये यहाँ.

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. इस फ़िल्म के नायक वो हैं जिनकी जोड़ी निरुपा रॊय के साथ बहुत सारी माइथोलोजिकल फ़िल्मों में ख़ूब जमी थी। नायक का नाम बताएँ। २ अंक।
२. जिस बैनर तले इस फ़िल्म का निर्माण हुआ था, वह इस फ़िल्म की नायिका के नाम से ही है। नायिका का नाम बताएँ। २ अंक।
३. फ़िल्मी के शीर्षक में "प्यार" शब्द का इस्तेमाल है। फ़िल्म के संगीतकार का नाम बताएँ। ३ अंक।
४. गीत के मुखड़े में वह शब्द मौजूद है जो शीर्षक था उस फ़िल्म का जिसमें मास्टर ग़ुलाम हैदर ने लता से कुछ बेहद लोकप्रिय गीत गवाए थे। गीत का मुखड़ा बताइए। ३ अंक।

पिछली पहेली का परिणाम -
अवध जी अब बेहद करीब हैं, शायद एक जवाब दूर बस....अन्य सभी को भी बधाई, बेहद मुश्किल सवालों के भी तुरंत जवाब देकर आप सब ने साबित किया है कि आप लोग सच्चे संगीत प्रेमी हैं

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, July 18, 2010

लहरों पे लहर, उल्फत है जवाँ....हेमंत दा इस गीत में इतनी भारतीयता भरी है कि शायद ही कोई कह पाए ये गीत "इंस्पायर्ड" है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 441/2010/141

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक नई सप्ताह के साथ हम फिर एक बार हाज़िर हैं। दोस्तों, हमारे देश का संगीत विश्व का सब से पुराना व स्तरीय संगीत रहा है। प्राचीन काल से चली आ रही भारतीय शास्त्रीय संगीत पूर्णत: वैज्ञानिक भी है और यही कारण है कि आज पूरा विश्व हमारे इसी संगीत पर शोध कर रही है। जब फ़िल्म संगीत का जन्म हुआ, तब फ़िल्मी गीत इसी शास्त्रीय संगीत को आधार बनाकर तैयार किए जाने लगे। फिर सुगम संगीत का आगमन हुआ और फ़िल्मी गीतों में शास्त्रीय राग तो प्रयोग होते रहे लेकिन हल्के फुल्के अंदाज़ में। लोकप्रियता को देखते हुए मूल शास्त्रीय संगीत धीरे धीरे फ़िल्मी गीतों से ग़ायब होता चला गया। फिर पश्चिमी संगीत ने भी फ़िल्मी गीतों में अपनी जगह बना ली। इस तरह से कई परिवर्तनों से होते हुए फ़िल्म संगीत ने अपना लोकप्रिय पोशाक धारण किया। पश्चिमी असर की बात करें तो हमारे संगीतकारों ने ना केवल पश्चिमी साज़ों का इस्तेमाल किया, बल्कि समय समय पर विदेशी धुनों को भी अपने गीतों का आधार बनाया। ऐसे गीतों को हम सभ्य भाषा में 'इन्स्पायर्ड सॊंग्‍स' कहते हैं, जब कि कुछ लोग इन्हे 'कॊपीड सॊंग्स' भी कहते हैं। ख़ैर, यहाँ हम इस नैतिक मूल्यों वाली वितर्क में नहीं जाएँगे, बल्कि आपको यह बताना चाहेंगे कि आज से हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर शुरु कर रहे हैं अपनी नई लघु शृंखला 'गीत अपना धुन पराई' जिसके तहत आप दस ऐसे गीत सुन पाएँगे जिनकी धुन किसी विदेशी मूल धुन या गीत से प्रेरित है। धुन चाहे इन्स्पायर्ड हो या कॊपीड, अहम बात यह है कि इस तरह के ज़्यादातर गानें ही मक़बूल हुए हैं, और हमारे यहाँ तो यही रवायत है कि जो हिट है वही फ़िट है। गाना अगर पब्लिक को पसंद आ गया, तो हर गुनाह माफ़ हो जाता है। वैसे आपको बता दें कि हम ज़्यादातर दो चार गिने चुने संगीतकारों पर ही धुनों की चोरी का आरोप लगाते आए हैं, जब कि हक़ीक़त यह है कि फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर में भी बहुत से संगीतकारों ने विदेशी धुनों का सहारा लिया। हमारे यहाँ हिपोक्रिसी भी ख़ूब है कि अगर किसी महान संगीतकार ने किसी पश्चिमी धुन का सहारा लिया तो उन्हे कुछ नहीं कहा गया, उनके गीत को "इन्स्पायर्ड" की श्रेणी में डाल दिया गया; लेकिन अगर किसी नए या छोटे संगीतकार ने ऐसा किया तो उन पर चोरी का इल्ज़ाम लगा दिया गया। ख़ैर, जैसा कि हमने कहा कि हम इस वितर्क की ओर नहीं जाएँगे, बल्कि केवल इन गीतों का आनंद लेंगे।

'गीत अपना धुन पराई' शृंखला की पहली कड़ी के लिए हमने चुना है वह गीत जो आधारित है गीत "The main who plays the mandolino" की धुन पर। इस अंग्रेज़ी गीत को गाया था डीन मारटिन ने। कुछ याद आया दोस्तों कि किस तरह का था यह धुन? इस धुन पर आधारित जो आज का प्रस्तुत गीत है, वह है "लहरों पे लहर, उलफ़त है जवाँ, रातों के सहर, चली आओ यहाँ"। हेमन्त कुमार और नूतन की आवाज़ों में यह फ़िल्म 'छबिली' का गीत है जो आई थी सन्‍ १९६० में। इस गीत के संगीतकार हैं स्नेहल भाटकर। आज जब नूतन और स्नेहल का ज़िक्र एक साथ आ ही गया है तो आपको बता दें कि शोभना समर्थ, जो अपने ज़माने की जानीमानी अभिनेत्री रही हैं, वो फ़िल्में भी बनाती थीं, निर्मात्री भी थीं। और उन्होने जब अपनी बेटी नूतन को फ़िल्मों में लौंच करने के बारे में सोचा तो एक फ़िल्म प्लान की 'हमारी बेटी'। यह बात है सन्‍ १९५० की। और इस फ़िल्म के लिए संगीतकार उन्होने चुना स्नेहल भाटकर को। आगे चलकर, इसके १० साल बाद, जब शोभना जी अपनी छोटी बेटी तनुजा को लौंच करने के लिए 'छबिली' फ़िल्म का निर्माण किया १९६० में, तो एक बार फिर से उन्होने स्नेहल के नाम का ही चुनाव किया। तो ये बात होती है विश्वास की, भरोसे की, और यह बात होती है संगीत को जानने की, समझने की, और उससे लगाव की। बात करते हैं आज के गीत की, तो इस गीत की धुन के बारे में हेमन्त दा का क्या कहना है, आइए जान लेते हैं उन्ही के शब्दों में, जो उन्होने कहे थे विविध भारती के सम्भवत: 'जयमाला' कार्यक्रम में - "बहुत साल पहले की बात है, मेरा एक दोस्त विदेश से बहुत सारे रेकॊर्ड्स लेकर आया था। मैंने उनमें से एक रेकॊर्ड सीलेक्ट कर लिया। फिर मुझे नूतन का फ़ोन आया कि 'छबिली' का एक गाना आपको गाना है। मैं गया। स्नेहल भाटकर म्युज़िक डिरेक्टर थे। जब मैं वहाँ पहुँचा तो मैं हैरान हो गया यह देख कर कि गाने का ट्यून वही था जिसे घर में मैंने सीलेक्ट किया था। लेकिन सुनिए स्नेहल ने इस धुन को कितने अच्छे से सजाया है इस गीत में।" और दोस्तों, चलते चलते लगे हाथ डीन मारटिन से जुड़ी कुछ तथ्य भी आपको देना चाहेंगे। डीन मारटिन का पूरा नाम था डीनो पौल क्रौसेटी। उनका जन्म ७ जून १९१७ को ओहियो, अमेरिका में हुआ था। वो बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। एक गायक होने के साथ साथ वो एक फ़िल्म अभिनेता, कॊमेडीयन, टी.वी कलाकार व स्टेज आरटिस्ट भी थे। उनके हिट एकल गीतों में शामिल है "Memories Are Made of This", "That's Amore", "Everybody Loves Somebody", "Mambo Italiano", "Sway", "Volare" और "Ain't That a Kick in the Head?" उन्हे उनके चाहने वाले 'King of Cool' के नाम से बुलाते थे। उनका २५ दिसम्बर १९९५ को ७८ वर्ष की आयु में कैलिफ़ोर्निया में निधन हो गया।



क्या आप जानते हैं...
कि इसी डीन मारटिन की "The main who plays the mandolino" की धुन से प्रेरीत हो कर एक और गीत बना था बॊलीवुड में, फ़िल्म 'बाज़ीगर' का गीत "ये काली काली आँखें", जिसके संगीतकार थे अनु मलिक।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. डॊरिस डे का मशहूर गीत से प्रेरित है ये गीत, संगीतकार बताएं - ३ अंक.
२. इस दार्शनिक गीत के गीतकार बताएं - २ अंक.
३. ग़ज़ल किंग कहे जाते हैं इस गीत के गायक, नाम बताएं - १ अंक.
४. १९५७ में आई इस लो बजेट फिल्म का नाम बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी आपको मान गए हुज़ूर. अवध जी कुछ बहके जरूर पर आखिर मामला पकड़ ही लिया, इंदु जी, कब तक सावन के गाने बजायेंगें हम.....इतना काहे सोचती हैं आप :) किश जी ओटावा से हमारे साथ जुड़े, पर शायद सवाल नहीं समझ पाए, इस बार कोशिश कीजियेगा

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, February 22, 2010

ज़िंदगी किस मोड़ पर लाई मुझे...पूछते हैं तलत साहब नक्श की इस गज़ल में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 353/2010/53

ह है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल और आप इन दिनों इस पर सुन रहे हैं तलत महमूद साहब पर केन्द्रित शृंखला 'दस महकती ग़ज़लें और एक मख़मली आवाज़'। तलत साहब की गाई ग़ज़लों के अलावा इसमें हम आपको उनके जीवन से जुड़ी बातें भी बता रहे हैं। कल हमने आपको उनके शुरुआती दिनों का हाल बताया था, आइए आज उनके शब्दों में जानें कि कैसा था उनका पहला पहला अनुभव बतौर अभिनेता। ये उन्होने विविध भारती के 'जयमाला' कार्यक्रम में कहे थे। "कानन देवी, एक और महान फ़नकार। उनके साथ मैंने न्यु थिएटर्स की फ़िल्म 'राजलक्ष्मी' में एक छोटा सा रोल किया थ। उस फ़िल्म में एक रोल था जिसमें उस चरित्र को एक गाना भी गाना था। निर्देशक साहब ने कहा कि आप तो गाते हैं, आप ही यह रोल कर लीजिये। मं अगले दिन ख़ूब शेव करके, दाढ़ी बनाकर सेट पर पहुँच, और तब मुझे पता चला कि दरसल रोल साधू का है। मेक-अप मैन आकर मेरा पूरा चेहरा सफ़ेद दाढ़ी से ढक दिया। जब गोंद सूखने लगा तो चेहरा इतना खिंचने लगा कि मुझसे मुंह भी खोला नहीं जा रहा था। निर्देशक साहब ने कहा कि ज़रा मुंह खोल कर तो गाओ! मुझे उन पर बड़ा ग़ुस्सा आया और दिल किया कि दाढ़ी उतार कर फेंक दूँ। तभी वहाँ आ पहुँची कानन देवी और मैं अपने आप को संभाल लिया।" दोस्तों, थी यह एक मज़ेदार क़िस्सा। 'राजलक्ष्मी' तलत महमूद साहब की पहली फ़िल्म थी बतौर अभिनेता और गायक। साल था १९४५। इसके बाद उन्होने १२ और फ़िल्मों में अभिनय किया जिनकी फ़ेहरिस्त इस प्रकार है - तुम और मैं ('४७), समाप्ति ('४९), आराम ('५१), दिल-ए-नादान ('५३), डाक बाबू ('५४), वारिस ('५४), रफ़्तार ('५५), दिवाली की रात ('५६), एक गाँव की कहानी ('५७), लाला रुख़ ('५८), मालिक ('५८) और सोने की चिड़िया ('५८)। आज के अंक के लिए हमने जिस ग़ज़ल को चुना है वह है १९५६ की फ़िल्म 'दिवाली की रात' का। "ज़िंदगी किस मोड़ पर लाई मुझे, हर ख़ुशी रोती नज़र आई मुझे"। नक्श ल्यालपुरी का क़लाम और मौसिक़ी कमचर्चित संगीतकार स्नेहल भाटकर की।

'दिवाली की रात' फ़िल्म में तलत महमूद साहब के साथ पर्दे पर नज़र आईं रूपमाला और शशिकला। फ़िल्म के निर्मता थे विशनदास सप्रू और राम रसीला, तथा निर्देशक थे दीपक आशा। प्रस्तुत ग़ज़ल के शायर नक्श ल्यायलपुरी के अलावा इस फ़िल्म के गानें लिखे मधुकर राजस्थानी ने। आपको यहाँ बताना चाहेंगे कि नक्श साहब ने फ़िल्मी दुनिया में बतौर गीतकार क़दम रखा था सन् १९५२ में जगदीश सेठी की फ़िल्म 'जग्गू' में, जिसमें उन्होने एक कैबरे गीत लिखा था। जसवंत राय के नाम से पंजाब के ल्यायलपुर में जन्मे नक्श साहब अपने स्कूली दिनों से ही लिखने में प्रतिभा रखते थे। उनके उर्दू टीचर परीक्षाओं के बाद उनकी कॊपियाँ अपने पास रख लेते थे, नोट्स के लिए नहीं बल्कि उन शेरों और कविताओं के लिए जो आख़िरी पन्नों पर वो लिखा करते थे। नक्श साहब की यह प्रतिभा परवान चढ़ती गई और वो स्कूल से कॊलेज में दाख़िल हुए। देश के बंटवारे के बाद वो अपने परिवार के साथ लखनऊ आ गए, लेकिन उनकी सृजनात्मक पिपासा और उनकी बेरोज़गारी ने उन्हे लखनऊ छोड़ बम्बई चले जाने पर मजबूर किया। उस समय उनकी आयु १९ वर्ष की थी और साल था १९५१। बम्बई के वो शुरुआती बहुत सुखद नहीं थे। लेकिन उन्हे कुछ राहत मिली जब डाक-तार विभाग में उन्हे एक नौकरी मिल गई। लेकिन उनके जैसे प्रतिभाशाली इंसान की वह जगह नहीं थी। बहरहाल वहाँ पर उन्होने कुच दोस्त बनाए और उन्ही दोस्तों के आग्रह पर उन्होने एक नाटक लिखा 'तड़प', जो उनके लिए फ़िल्म जगत में दाख़िले के लिए मददगार साबित हुआ। राम मोहन, जो उस नाटक के नायक थे और फ़िल्मकार जगदीश सेठी के सहायक भी, नक्श साहब को सेठी साहब के पास ले गए, और इस तरह से उन्हे फ़िल्म 'जग्गू' में गीत लिखने का मौका मिला और हिंदी फ़िल्म जगत में उनकी एंट्री हो गई। नक्श साहब की बातें आगे भी जारी रहेंगे, फ़िल्हाल सुना जाए तलत साहब की मख़मली आवाज़, लेकिन उससे पहले ये रहे इस ग़ज़ल के चार शेर।

ज़िंदगी किस मोड़ पर लाई मुझे,
हर ख़ुशी रोती नज़र आई मुझे।

जिनके दामन में सुहाने ख़्वाब थे,
फिर उन्ही रातों की याद आई मुझे।

हो गई वीरान महफ़िल प्यार की,
ये फ़िज़ा भी रास ना आई मुझे।

छीन कर मुझसे मेरे होश-ओ-हवास,
अब जहाँ कहता है सौदाई मुझे।



क्या आप जानते हैं...
तलत महमूद की फ़िल्म 'दिल-ए-नादान' के हीरोइन की तलाश के लिए ए. आर. कारदार ने 'ऒल इंडिया बिउटी कॊंटेस्ट' का आयोजन किया जिसे प्रायोजित किया उस ज़माने की मशहूर टूथपेस्ट कंपनी 'कोलीनोस' ने। इस कॊंटेस्ट की विजेयता बनीं पीस कंवल (Peace Kanwal), जो नज़र आए तलत साहब के साथ 'दिल-ए-नादान' में।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

1. तलत की गाई इस ग़ज़ल के मतले में शब्द है- "नवाज़िश", बताईये ग़ज़ल के बोल.-३ अंक.
2. कौन हैं इस गज़ल के शायर- २ अंक.
3. नानुभाई वकील निर्देशित इस फिल्म के संगीतकार का नाम बताएं जो बेहद कमचर्चित ही रहे- २ अंक.
4. एक और मकबूल संगीतकार का भी नाम जुड़ा है इस गीत के साथ उनका भी नाम बताएं- सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी, आप बड़ी हैं, कुछ विपक्ष में कहने की हिम्मत नहीं होती, इसलिए अपनी जान बचने की खातिर हम ये इलज़ाम शरद जी के सर डाल देते हैं, दरअसल उनका सुझाव था और इससे हमें भी इत्तेफाक है कि यदि सारे जवाब आ जाते हैं तो बाकी श्रोता मूक दर्शक बने रहते हैं, और हमारा उद्देश्य सबकी भागीदारी है, वैसे कल के सवाल का कोई सही जवाब नहीं आया. अवध जी बहुत दिनों में आये और जवाब दिए बिना चले गए. :), खैर आज सही

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, February 9, 2010

कभी तन्हाईयों में यूं हमारी याद आएगी....मुबारक बेगम की दर्द भरी सदा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 340/2010/40

फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर की कमचर्चित पार्श्वगायिकाओं को सलाम करते हुए आज हम आ पहुँचे हैं इस ख़ास शृंखला की अंतिम कड़ी पर। अब तक हमने इस शृंखला में क्रम से सुलोचना कदम, उमा देवी, मीना कपूर, सुधा मल्होत्रा, जगजीत कौर, कमल बारोट, मधुबाला ज़वेरी, मुनू पुरुषोत्तम और शारदा का ज़िक्र कर चुके हैं। आज बारी है उस गयिका की जिनके गाए सब से मशहूर गीत के मुखड़े को ही हमने इस शृंखला का नाम दिया है। जी हाँ, "कभी तन्हाइयों में युं हमारी याद आएगी" गीत की गयिका मुबारक़ बेग़म आज 'ओल्ड इस गोल्ड' की केन्द्रबिंदु हैं। मुबारक़ बेग़म के गाए फ़िल्म 'हमारी याद आएगी' के इस शीर्षक गीत को सुनते हुए जैसे महसूस होने लगता है इस गीत में छुपा हुआ दर्द। जिस अंदाज़ में मुबारक़ जी ने "याद आएगी" वाले हिस्से को गाया है, इसे सुनते हुए सचमुच ही किसी ख़ास बिछड़े हुए की याद आ ही जाती है और कलेजा जैसे कांप उठता है। इस गीत में, इसकी धुन में, इसकी गायकी में कुछ ऐसी शक्ति है कि सीधे आत्मा को कुछ देर के लिए जैसे अपनी ओर सम्मोहित कर लेती है और गीत ख़त्म होने के बाद ही हमारा होश वापस आता है। किदार शर्मा का लिखा हुआ यह गीत है जिसकी तर्ज़ बनाई है स्नेहल भाटकर ने। किदार शर्मा ने कई नए कलाकारों को समय समय पर मौका दिया है जिनमें शामिल हैं कई अभिनेता अभिनेत्री, संगीतकार, गायक और गायिकाएँ। 'हमारी याद आएगी' फ़िल्म जितना मुबारक़ बेग़म के लिए यादगार फ़िल्म है, उतनी ही यादगार साबित हुई संगीतकार स्नेहल भाटकर के लिए भी। स्नेहल भी एक कमचर्चित फ़नकार हैं। भविष्य में जब हम कमचर्चित संगीतकारों पर किसी शृंखला का आयोजन करेंगे तो स्नेहल भाटकर से सबंधित जानकारी आपको ज़रूर देंगे। आज करते हैं मुबारक़ बेग़म की बातें। लेकिन उससे पहले आपको बता दें कि आज हम इसी कालजयी गीत को सुनेंगे।

कई साल पहले मुबारक़ बेग़म विविध भारती पर तशरीफ़ लाई थीं और वरिष्ठ उद्‍घोषक कमल शर्मा ने उनसे मुलाक़ात की थी। उसी मुलाक़ात में मुबारक़ जी ने इस गीत के पीछे की कहानी का ज़िक्र किया था। पेश है उसी बातचीत का वह अंश। दोस्तों, आप सोचते होंगे कि मैं लगभग सभी आलेख में विविध भारती के कार्यक्रमों का ही ज़िक्र करता रहता हूँ। दरअसल बात ही ऐसी है कि उस गुज़रे ज़माने के कलाकारों से संबंधित सब सर्वाधिक सटीक जानकारी केवल विविध भारती के पास ही उपलब्ध है। फ़िल्म संगीत के इतिहास को आने वाली पीढ़ियों के लिए सहज कर रखने में विविध भारती के योगदान को अगर हम सिर्फ़ उल्लेखनीय कहें तो कम होगा। ख़ैर, आइए मुबारक़ बेग़म के उस इंटरव्यू को पढ़ा जाए।

प्र: यह गीत (कभी तन्हाइयों में युं) किदार शर्मा की फ़िल्म 'हमारी याद आएगी' का है, संगीतकार स्नेहल भाटकर।

उ: पहले पहले यह गीत रिकार्ड पर नहीं था। इस गीत के बस कुछ लाइनें बैकग्राउंड के लिए लिया गया था।

प्र: किदर शर्मा की और कौन कौन सी फ़िल्मों में आपने गीत गाए?

उ: 'शोख़ियाँ', 'फ़रीयाद'।

प्र: किदार शर्मा के लिए आप की पहली फ़िल्म कौन सी थी?

उ: 'शोख़ियाँ'। संगीत जमाल सेन का था। मैं जो बात बता रही थी कि "हमारी याद आएगी" गाना रिकार्ड पर नहीं था। इसे पार्ट्स मे बैकग्राउंड म्युज़िक के तौर पर फ़िल्म में इस्तेमाल किया जाना था। मुझे याद है बी. एन. शर्मा गीतकार थे, स्नेहल और किदार शर्मा बैठे हुए थे। रिकार्डिंग् के बाद किदार शर्मा ने मुझे ४ आने दिए। मैंने किदार शर्मा की तरफ़ देखा। उन्होने मुझसे उसे रखने को कहा और कहा कि यह 'गुड-लक' के लिए है। सच में वह मेरे लिए लकी साबित हुई।

प्र: आप बता रहीं थीं कि शुरु शुरु में यह गीत रिकार्ड पर नहीं था?

उ: हाँ, लेकिन बाद में उन लोगों को गीत इतना पसंद आया कि उन्होने सारे पार्ट्स जोड़कर गीत की शक्ल में रिकार्ड पर डालने का फ़ैसला किया। मैं अभी आपको बता नहीं सकती, लेकिन अगर आप गाना बजाओ तो मैं ज़रूर बता सकती हूँ कि कहाँ कहाँ गीत को जोड़ा गया है।

प्र: आपको यह पता था कि ऐसा हो रहा है?

उ: पहले मुझे मालूम नहीं था, लेकिन रिकार्ड रिलीज़ होने के बाद पता चला।

प्र: आपने अपना शेयर नहीं माँगा?

उ: दरअसल मैं तब बहुत नई थी, इसलिए मैंने अपना मुंह बंद ही रखा, वरना मुझे जो कुछ भी मिल रहा था वो भी बंद हो जाता। आगे भी कई बार ऐसे मौके हुए कि जब मुझसे कुछ कुछ लाइनें गवा ली गई और बाद में उन लोगों ने उसे एक गीत के शक्ल में रिकार्ड पर उतार दिया।


दोस्तों, इस अंश को पढ़कर आप समझ सकते हैं कि मुबारक़ बेग़म जैसी कमचर्चित गायिकाओं को किस किस तरह का संघर्ष करना पड़ता होगा! ये सब जानकर दिल उदास हो जाता है कि इतनी सुरीले कलाकारों को उन्हे अपना हिस्सा नहीं मिला जिसके वो हक़दार थे। 'आवाज़' की तरफ़ से हमारी ये छोटी सी कोशिश थी इन कमचर्चित गायिकाओं को याद करने की, आशा है आपको पसंद आई होगी। अपनी राय आप टिपण्णी के अलावा hindyugm@gmail.com के पते पर भी लिख भेज सकते हैं। आप से हमारा बस यही गुज़ारिश है कि इन कमचर्चित कलाकारों को कभी भुला ना दीजिएगा, अपनी दिल की वादियों में इन सुरीली आवाज़ों को हमेशा गूंजते रहने दीजिए, क्योंकि ये आवाज़ें आज भी बार बार हमसे यही कहती है कि कभी तन्हाइयों में युं हमारी याद आएगी।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

नैनों में छुपे,
कुछ ख्वाब मिले,
मन झूम उठा,
कुछ कहा होगा, भूले ख्वाबों ने...

अतिरिक्त सूत्र- शुद्ध सोने से सजे गीतों की शृंखला में कल फिर गूंजेगी कुंदन लाल सहगल की आवाज़

पिछली पहेली का परिणाम-
बिलकुल सही शरद जी, एक अंक और आपके खाते में, एक गुजारिश है आपसे, आप अपने ऐसे शोस् जिनमे आपको ऐसे गजब के फनकारों की संगती मिली हो, उनके अनुभव अन्य श्रोताओं के साथ भी अवश्य बाँटें

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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