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Sunday, February 21, 2016

राग गौड़ सारंग : SWARGOSHTHI – 258 : RAG GAUR SARANG


स्वरगोष्ठी – 258 में आज

दोनों मध्यम स्वर वाले राग – 6 : राग गौड़ सारंग

इस राग में सुनिए पन्नालाल घोष और अनिल विश्वास की रचनाएँ




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला – ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों की चर्चा कर रहे हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वरों का प्रयोग किया जाता है। संगीत के सात स्वरों में ‘मध्यम’ एक महत्त्वपूर्ण स्वर होता है। हमारे संगीत में मध्यम स्वर के दो रूप प्रयोग किये जाते हैं। स्वर का पहला रूप शुद्ध मध्यम कहलाता है। 22 श्रुतियों में दसवाँ श्रुति स्थान शुद्ध मध्यम का होता है। मध्यम का दूसरा रूप तीव्र या विकृत मध्यम कहलाता है, जिसका स्थान बारहवीं श्रुति पर होता है। शास्त्रकारों ने रागों के समय-निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त निश्चित किये हैं। इन्हीं में से एक सिद्धान्त है, “अध्वदर्शक स्वर”। इस सिद्धान्त के अनुसार राग का मध्यम स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार राग में यदि तीव्र मध्यम स्वर की उपस्थिति हो तो वह राग दिन और रात्रि के पूर्वार्द्ध में गाया-बजाया जाएगा। अर्थात, तीव्र मध्यम स्वर वाले राग 12 बजे दिन से रात्रि 12 बजे के बीच ही गाये-बजाए जा सकते हैं। इसी प्रकार राग में यदि शुद्ध मध्यम स्वर हो तो वह राग रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच का अर्थात उत्तरार्द्ध का राग माना गया। कुछ राग ऐसे भी हैं, जिनमें दोनों मध्यम स्वर प्रयोग होते हैं। इस श्रृंखला में हम ऐसे ही रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की छ्ठी कड़ी में आज हम राग गौड़ सारंग के स्वरूप की चर्चा करेंगे। साथ ही सबसे पहले सुप्रसिद्ध बाँसुरी वादक पण्डित पन्नालाल घोष की बाँसुरी पर राग गौड़ सारंग की के स्वर में एक अनूठी रचना सुनेगे, और फिर इसी राग के स्वरों में पिरोया 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘हमदर्द’ का एक गीत मन्ना डे और लता मंगेशकर की युगल आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे।

स श्रृंखला में अभी तक आपने जो राग सुने हैं, वह सभी कल्याण थाट के राग माने जाते हैं और इन्हें रात्रि के पहले प्रहर में ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। दोनों मध्यम स्वर स्वर से युक्त आज का राग, ‘गौड़ सारंग’ भी कल्याण थाट का माना जाता है, किन्तु इस राग के गायन-वादन का समय रात्रि का प्रथम प्रहर नहीं बल्कि दिन का दूसरा प्रहर होता है। राग गौड़ सारंग में दोनों मध्यम के अलावा सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। इस राग के आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं, इसीलिए इसे सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग कहा जाता है। परन्तु इसमे आरोह और अवरोह के सभी स्वर वक्र प्रयोग किये जाते है, इसलिए इसे वक्र सम्पूर्ण जाति का राग माना जाता है। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है।

पन्नालाल घोष
प्राचीन ग्रन्थकार राग कामोद, केदार और हमीर की तरह राग गौड़ सारंग को भी बिलावल थाट का राग मानते थे, क्योंकि तब इस राग में तीव्र मध्यम स्वर प्रयोग नहीं किया जाता था। परन्तु जब से इन रागों में दोनों मध्यम का प्रयोग होने लगा, तब से इन्हें कल्याण थाट का राग माना जाने लगा। राग गौड़ सारंग के आरोह और अवरोह में तीव्र मध्यम स्वर का अल्प प्रयोग केवल पंचम स्वर के साथ किया जाता है। शुद्ध मध्यम स्वर आरोह और अवरोह दोनों में किया जाता है। राग की रंजकता को बढ़ाने के लिए कभी-कभी अवरोह में कोमल निषाद का अल्प प्रयोग राग केदार और हमीर की तरह राग गौड़ सारंग में भी किया जाता है। इस राग का चलन वक्र होता है। किन्तु तानों में वक्रता कम की जाती है। राग गौड़ सारंग का उदाहरण हम आपको बाँसुरी पर सुनवाएँगे। बाँसुरी वाद्य को शास्त्रीय मंच पर प्रतिष्ठित कराने वाले सुविख्यात बाँसुरी वादक पण्डित पन्नालाल घोष से अब हम इस राग में निबद्ध एक मनोहारी रचना सुनवा रहे हैं। 24 जुलाई, 1911 को अविभाजित भारत के बारिसाल, पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) में जन्में पन्नालाल घोष का एक और नाम था, अमलज्योति घोष। परन्तु अपने संगीतज्ञ जीवन में वह अपने पुकारने के नाम से ही विख्यात हुए। इनके पिता अक्षय कुमार घोष स्वयं एक संगीतज्ञ थे और सितार बजाते थे। पन्ना बाबू को बचपन में अपने पिता से ही सितार वादन की शिक्षा मिली थी। जब वे कुछ बड़े हुए तो उनके हाथ कहीं से एक बाँसुरी मिल गई। उन्होने बाँसुरी पर अपने सितार पर सीखे हुए तंत्रकारी कौशल की नकल करना शुरू किया। एक बार एक सन्यासी ने सुन कर बालक पन्नालाल को भविष्य में महान बाँसुरी वादक बनने का आशीर्वाद दिया। आगे चल कर शास्त्रीय संगीत के मंच पर उन्होने बाँसुरी वाद्य को प्रतिष्ठा दिलाई। लीजिए, अब आप पण्डित पन्नालाल घोष से बाँसुरी पर बजाया राग गौड़ सारंग की तीनताल में निबद्ध एक रचना सुनिए।


राग गौड़ सारंग : तीनताल में निबद्ध एक रचना : पण्डित पन्नालाल घोष 




अनिल विश्वास और लता मंगेशकर
सुप्रसिद्ध फिल्म संगीतकार अनिल विश्वास ने 1953 की फिल्म ‘हमदर्द’ के लिए एक रागमाला गीत तैयार किया था, जिसमें चार अन्तरे चार अलग-अलग रागों में स्वरबद्ध थे। इन्हीं में से एक अन्तरा राग गौड़ सारंग में था। आज हम आपको वही अन्तरा सुनवा रहे हैं। पन्नालाल घोष और अनिल विश्वास परस्पर मित्र भी थे और सम्बन्धी भी। हमारे साथी, फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार और स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी ने एक साक्षात्कार में अनिल विश्वास के व्यक्तित्व और कृतित्व को उभारा था। उसी साक्षात्कार का कुछ अंश हम आपके लिए प्रस्तुत करते हैं। 
पन्नालाल घोष बाद में अनिल बिस्वास के बहनोई बने, पहले से ही दोनों बहुत अच्छे मित्र थे। अपने परम मित्र और बहनोई को याद करते हुए विविध भारती के ’संगीत सरिता’ में अनिल दा ने कुछ इस तरह से उनके बारे में बताया था साक्षात्कार लेने वाले सितार वादक तुषार भाटिया को – “पन्नालाल घोष बाँसुरी को कॉनसर्ट के स्तर पर लाने का श्रेय जाता है, अभी तक उन्हीं को पिता माना जाता है। कुछ हमारी पुरानी बातें हमें याद आ जाती हैं। तुमको मालूम नहीं होगा कि पन्ना से पहले मैं बाँसुरी बजाता था। तो एक दिन ऐसा हुआ कि माँ तीरथ से वापस आईं, जब गईं तब मैं बच्चे की आवाज़ में बोलता था, वापस आईं तो मैं मर्द की आवाज़ में बोलने लगा। तो उन्होंने आकर देखा कि हमारी कुलुंगी के उपर, क्या कहते हैं उसको, वह बाँसुरी रखी हुई है, उन्होंने सारे उठाके फेंक दिए और कहा कि यह तेरी आवाज़ को क्या हो गया? मैंने जाकर पन्ना को कहा कि मेरी बाँसुरी तो गई, अब क्या होगा? उन्होंने कहा कि मैं पकड़ लेता हूँ!” अनिल दा ने एक आश्चर्य करने वाले तथ्य को भी उजागर किया कि पन्नालाल घोष बाँसुरी से पहले सितार बजाते थे और उनके पिता (अक्षय घोष) एक बहुत अच्छे सितार वादक थे। तो इस तरह से बाँसुरी बजाने के शौकीन अनिल बिस्वास बन गए मशहूर संगीतकार और सितार बजाने के शौकीन पन्नालाल घोष बन गए मशहूर बाँसुरी वादक। दोनों एक दूसरे से इतना प्यार करते थे कि एक बाद जब अनिल बिस्वास को रेडियो पर पहली बार गायन रेकॉर्ड करने के लिए रेकॉर्डिंग्‍ रूम में भेजा गया तो बाहर प्रतीक्षा कर रहे पन्नालाल घोष पसीना-पसीना हो गए इस घबराहट में कि उनका दोस्त कैसा परफ़ॉर्म करेगा! अनिल दा ने उस साक्षात्कार में यह भी बताया कि पन्ना बाबू का पहला व्यावयासिक वादन अनिल दा के रेकॉर्डिंग्‍ में ही बजाया था, और जब तक वो बम्बई में रहे, अनिल दा के हर फ़िल्म में वो ही बाँसुरी बजाया करते थे। 
 पार्श्वगायक मन्ना डे और लता मंगेशका के गाये, राग गौड़ सारंग के स्वरों में पिरोए फिल्म हमदर्द के इस गीत में पण्डित पन्नालाल घोष की बाँसुरी के अलावा पण्डित रामनारायण की सारंगी का भी योगदान था। तीनताल में निबद्ध यह गीत अब आप सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग गौड़ सारंग : “ऋतु आए ऋतु जाए सखी री...” : मन्ना डे और लता मंगेशकर फिल्म – हमदर्द 





संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 258वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग पर आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 260वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका का नाम हमे बता सकते हैं?

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 27 फरवरी, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 260वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 256 की संगीत पहेली में हमने आपको 1960 में प्रदर्शित फिल्म ‘कोहिनूर’ से राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग - हमीर, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायक – मुहम्मद रफी (और उस्ताद अमीर खाँ)।

इस बार की पहेली में कुल पाँच प्रतिभागियों ने सही उत्तर दिया है। हमारे नियमित प्रतिभागी विजेता हैं- चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप हमारी श्रृंखला ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’ का रसास्वादन कर रहे हैं। श्रृंखला के छठे अंक में हमने आपसे राग गौड़ सारंग पर चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें शीघ्र भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र



Saturday, March 29, 2014

अभिनेत्री नन्दा को श्रद्धांजलि आज 'एक गीत सौ कहानियाँ' में...


एक गीत सौ कहानियाँ - 26
 

‘अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम...’



"मुझे अभी-अभी पता चला कि अभिनेत्री नन्दा, जिसे हम बेबी नन्दा कहते थे, वो अब हमारे बीच नहीं रही। यह सुन कर मुझे बहुत दुख हुआ। बेबी नन्दा जब 4-5 साल की थी, तब उसने 'मन्दिर' फ़िल्म में मेरे छोटे भाई की भूमिका निभायी थी। मैं नन्दा के पिताजी मास्टर विनायक जी की कम्पनी में बतौर बाल कलाकार 1943 से काम करती थी। मेरी और नन्दा और उसकी बड़ी बहन मीना के साथ बड़ी दोस्ती थी। नन्दा की पहली फ़िल्म 'तूफ़ान और दीया' से मैंने नन्दा के लिए प्लेबैक शुरु किया। बहुत अच्छी इंसान थी। भगवान उसकी आत्मा को शान्ति दे।" --- लता मंगेशकर


भिनेत्री नन्दा अब इस दुनिया में नहीं रहीं। लता जी के उपर्युक्त शब्दों से पता चलता है कि कितना अन्तरंग रिश्ता रहा होगा दोनों में। आज नन्दा जी को श्रद्धा-सुमन अर्पित करने के लिए लता जी के गाये और नन्दा जी पर फ़िल्माये फ़िल्म 'हम दोनो' के भजन "अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम" से बेहतर कोई रचना नहीं होगी। गाँधीवादी विचारधारा लिये राग गौड़ सारंग आधारित इस भजन को सुन कर ऐसा लगता है कि जैसे कोई पारम्परिक रचना होगी। पर नहीं, यह एक फ़िल्मी गीत है जिसे साहिर लुधियानवी ने लिखा है और जयदेव ने स्वरबद्ध किया है। फ़िल्मी भजनों की श्रेणी में शायद सर्वोपरि है यह भजन। यह केवल भजन ही नहीं, बल्कि साप्रदायिक एकता और अहिंसा का संदेश भी है। ख़ास बात यह है कि स्वतंत्र संगीतकार के रूप में यह जयदेव की पहली भक्ति रचना थी। जयदेव के ही शब्दों में, "बतौर स्वतन्त्र संगीतकार, मेरी पहली फ़िल्में थीं 'जोरु का भाई', 'किनारे-किनारे' और 'नवकेतन' की एक फ़िल्म, जो सारे के सारे नाकामयाब रहे। फिर मुझे मिला 'हम दोनो"। तो पहली ही भजन में इस तरह की सफलता यकायक देखने को नहीं मिलती। इस भजन की गायिका, स्वयं लता जी कहती हैं, "इस भजन को अगर सुबह और रात के वक़्त सुना जाये तो एक अजीब सी सुकून मिलता है" (जयमाला, विविध भारती)। लता जी को यह भजन इतना पसन्द है कि नूरजहाँ जब कई वर्ष बाद भारत आयीं थीं और उनके स्वागत में -'Mortal Men, Immortal Melodies' नामक शो आयोजित किया गया था, उस शो में लता जी ने इसे शामिल किया था। रूपक ताल में स्वरबद्ध यह भजन सुनने में कितना सीधा-सरल लगता है, ध्यान से सुनने पर अहसास होता है कि जयदेव ने कितनी मेहनत की होगी इस पर। गीत निचले स्वर से शुरू होकर क्रमश: ऊपर के स्वरों तक पहुंचता चला जाता है। एक तरफ़ लता की आवाज़ और दूसरी तरफ़ कोरस की आवाज़, इन दो आवाज़ों के साथ जयदेव ने क्या ख़ूब प्रयोग किया हैं। दो आवाज़ों को एक बार मिला दिया और फिर किस सुन्दरता से दोनों को अलग कर दिया, इन सब छोटी-छोटी बातों से भी इस भजन में निखार आया है।

केवल लता जी ही नहीं, इस भजन के कद्रदानों की संख्या बहुत बड़ी है। फ़िल्म-संगीत के पहले दौर के कलाकारों से लेकर आज के दौर के कलाकारों में इस भजन के चाहनेवाले शामिल हैं। तिमिर बरन और उमा देवी ने अपने अपने 'जयमाला' कार्यक्रमों में इस भजन को चुना था। कलात्मक फ़िल्मों के जाने-माने संगीतकार अजीत वर्मन ने इस भजन के बारे में अपने 'जयमाला' में फ़ौजी भाइयों से कहा है, "मेरे भाई, अभी जो गाना मैं सुनाने जा रहा हूँ, सच्ची, जब मैं अकेला, अकेला तो मैं हो ही नहीं सकता क्योंकि मेरा दिल मेरे साथ रहता है, my heart is my inspiration, हाँ तो यह गाना जयदेव का "अल्लाह तेरो नाम" इतना अच्छा भजन बहुत कम बना है। इतना सिम्पल वो ही बना सकता है जो बहुत लम्बी राह चला हो।" अनूप जलोटा द्वारा प्रस्तुत 'हिट सुपरहिट फ़ेवरिट फ़ाइव' कार्यक्रम में अपने मनपसन्द पाँच गीतों में सर्वप्रथम उन्होंने इसी भजन को चुना और कहा, "मुझे बहुत पसन्द है लता जी का गाया "अल्लाह तेरो नाम"। यह कहूँगा कि इसकी ख़ूबी है कि कितनी सरल कम्पोज़िशन और कितनी पावरफ़ुल कम्पोज़िशन है जिसे जयदेव जी ने बनायी है, लता जी ने गाया तो अच्छा ही है, लेकिन आपको एक छोटा सा उदाहरण दे दूँ इस गाने के बारे में, कि इससे ज़्यादा सरल क्या हो सकती है कम्पोज़िशन की कि इसका स्थायी और अन्तरा एक ही धुन पर है। सिर्फ़ "स" को "म" कर दिया।" इस भजन के कद्रदानों में कविता कृष्णमूर्ती, जावेद अख़्तर, शबाना आज़मी, राकेश ओमप्रकाश मेहरा, स्वानन्द किरकिरे और सोनू निगम भी शामिल हैं।

जयदेव और लता
फ़िल्म 'हम दोनों' में लता के गाये दो भजन हैं - एक तो "अल्लाह तेरो नाम" और दूसरा भजन है राग धानी आधारित "प्रभु तेरो नाम, जो ध्याये फल पाये"। कुछ लोगों के अनुसार "अल्लाह तेरो नाम" "प्रभु तेरो नाम" का ही एक दूसरा संस्करण है, पर सच्चाई यह है कि ये दोनों एक दूसरे से बिल्कुल अलग, और स्वतंत्र रचनाएँ हैं। दोनों भजन नन्दा पर फ़िल्माया गया है। फिल्म के इन गीतों से एक रोचक प्रसंग जुड़ा है। सचिनदेव बर्मन से कुछ मतभेद के कारण उन दिनों लता मंगेशकर ने उनकी फिल्मों में गाने से मना कर दिया था। बर्मन दादा के सहायक रह चुके जयदेव ने इस प्रसंग में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। पहले तो लता जी ने जयदेव के संगीत निर्देशन में गाने से मना कर दिया, परन्तु जब उन्हें यह बताया गया कि यदि ‘हम दोनों’ के गीत लता नहीं गाएँगी तो फिल्म से जयदेव को ही हटा दिया जाएगा, यह जान कर लता जी गाने के लिए तैयार हो गईं। उन्हें यह भी बताया गया कि भक्तिरस में पगे इन गीतों के लिए जयदेव ने अलौकिक धुनें बनाई है। अब इसे लता जी की उदारता मानी जाए या व्यावसायिक कुशलता, उन्होने इन गीतों को अपने स्वरों में ढाल कर कालजयी बना दिया। "अल्लाह तेरो नाम" भजन में दो अन्तरे हैं। फ़िल्म के पर्दे पर और ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड पर, दोनों में दो अन्तरे सुनाई पड़ते हैं। पर एक बात ध्यान देने योग्य हैं कि जब जयदेव जी ने विविध भारती पर अपनी 'जयमाला' प्रस्तुत की थी, उसमें इस भजन को सुनवाते हुए कहा था, "फ़ौजी भाइयों, जो सेवा आप हमारी कर रहे हैं, इस देश की रक्षा कर रहे हैं, हम सब आप लोगों के शुक्रगुज़ार हैं, आप जहाँ भी हों, पहाड़ों में, सहराओं में, समन्दरों में, भगवान आप को ख़ुश रखें, आप के परिवारों को ख़ुशहाल रखें। इस धरती का रूप न उजड़े, प्यार की ठण्डी धूप न उजड़े, सबको मिले दाता सबको मिले इसका वरदान। सबको मिले सुख-शान्ति, यही है ईश्वर से मेरी प्रार्थना"। अगर आप इन शब्दों पर ग़ौर करें तो साफ़-साफ़ इस भजन का तीसरी अन्तरा हमारे सामने आ जाता है - "इस धरती का रूप न उजड़े, प्यार की ठण्डी धूप न उजड़े, सबको मिले दाता सबको मिले इसका वरदान, सबको सन्मति दे भगवान"। तो क्या यह तीसरा अन्तरा भी साहिर साहब ने लिखा था जिसे गीत में जगह नहीं मिली? या फिर ये शब्द जयदेव जी के ही थे इस कार्यक्रम के लिए? क्या पता!

साहिर
इस दौर के सुप्रसिद्ध गीतकार स्वानन्द किरकिरे ने हाल में इस भजन की सुन्दर स्मीक्षा की है, जिसका हिन्दी में अनुवाद कुछ इस तरह का है - "पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो अहसास होता है कि बहुत सालों तक मैंने सही मायने में इस भजन के शब्दों पर ग़ौर नहीं किया था। अपनी उम्र के तीसरे दशक में पाँव रखने के बाद मैं इस भजन के बोलों की ओर आकर्षित हुआ और समझ आया कि ये बोल क्या संदेश दे रहे हैं। मैंने आविष्कार किया कि "अल्लाह तेरो नाम" महज़ एक भजन नहीं है, यह युद्ध के ख़िलाफ़ एक दरख्वास्त है। कुछ तो बात है इस गीत में कि यह मेरे साथ रहा है इतने सालों से। इसे मैं गीत नहीं समझता, यह तो एक प्रार्थना है, श्लोक है, अमृत वाणी है, और मेरे अनुसार यह हिन्दी फ़िल्म इतिहास की सर्वश्रेष्ठ प्रार्थना है। इस गीत के साथ मेरी जो सबसे पुरानी स्मृतियाँ हैं, वो ये कि इसे हमारे स्कूल में स्वाधीनता दिवस और गणतन्त्र दिवस पर गाया जाता था। और मेरी यह धारणा थी कि मैं इसे जानता हूँ, समझता हूँ। पर उस वक़्त मैं ग़लत था। बोलों की अगर बात करें तो मुझे नहीं लगता कि साहिर साहब से बेहतर कोई इसे लिख पाते, जिनकी शायरी ने मुझे हमेशा प्रेरित किया है। यह उनका ही कमाल है कि एक साधारण प्रार्थना गीत में उन्होंने ऐसी सोच, ऐसे उच्च विचार भरे हैं कि यह एक यूनिवर्सल प्रेयर बन गया है। अगर पहला अन्तरा हीरा है तो दूसरे अन्तरे में तो साहिर साहब ने काव्य के गहराई की हर सीमा पार कर दी है। "ओ सारे जग के रखवाले, निर्बल को बल देने वाले, बलवानों को दे दो ज्ञान" हमें एक अलग ही स्तर पर ले जाता है। इसमें मीटर है, मेलडी है, अर्थ है, गहराई है। युद्ध में विश्वास रखने वालों और बिना कुछ जाने एक दूसरे को मारने वालों के लिए यह गीत जैसे एक व्यंग है, वार है। इस गीत का एक और आकर्षण है साज़ों का अरेन्जमेण्ट और कम्पोज़िशन। कमचर्चित संगीतकार जयदेव ने इस गीत में कई रागों को इस तरह से छिड़का है कि एक आकर्षण करने वाली ख़ुशबू सी आती है जब जब इसे सुनते हैं। इसे हर बार सुनते हुए मेरी आँखें भर आती हैं। लता जी ने यह गीत गाया है। सोनू निगम एक और गायक हैं जो इसे बहुत ख़ूबसूरती से गाते हैं। मैं जब भी उनसे मिलता हूँ, अपने दोस्तों के साथ बैठ जाता हूँ उनसे यह गीत सुनने के लिए। यह गीत एक बेहतरीन उदाहरण है एक सशक्त और सर्वव्यापी प्रार्थना का जो मुझे अपने जज़्बातों और देशभक्ति भावना को जगाने में मदद करती है। इस भजन के सुर मेरे विवेक में और मुझमें समाया हुआ है, हमेशा हमेशा।"

इसी गीत के माध्यम से 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की तरफ़ से स्वर्गीय अभिनेत्री नन्दा को हमारी भावभीनी श्रद्धांजलि। ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे!

फिल्म - हम दोनों : अल्लाह तेरो नाम ईश्वर तेरो नाम...' : लता मंगेशकर : संगीत - जयदेव : गीतकार - साहिर लुधियानवी 





अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज और आलेख - सुजॉय चटर्जी व कृष्णमोहन मिश्र
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

Sunday, April 21, 2013

ऋतु आधारित राग हैं इस रागमाला गीत में



स्वरगोष्ठी – 117 में आज

रागों के रंग रागमाला गीत के संग – 4


‘ऋतु आए ऋतु जाए सखी री मन के मीत न आए...’



‘स्वरगोष्ठी’ के एक नये अंक के साथ मैं, कृष्णमोहन मिश्र अपने संगीत-प्रेमी पाठकों-श्रोताओं के बीच एक बार पुनः उपस्थित हूँ। आज के अंक में हम एक बार फिर लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग रागमाला गीत के संग’ की अगली कड़ी प्रस्तुत कर रहे हैं। श्रृंखला के पिछले दो अंकों में हमने जो गीत शामिल किये थे, उनमे रागों के क्रम प्रहर के क्रमानुसार थे। परन्तु आज के रागमाला गीत में रागों का क्रम बदलते मौसम के अनुसार है। इस गीत में ग्रीष्म ऋतु का राग गौड़ सारंग, वर्षा ऋतु का राग गौड़ मल्हार, पतझड़ का राग जोगिया और बसन्त ऋतु का राग बहार क्रमशः शामिल किया गया है। रागमाला का यह गीत हमने 1953 प्रदर्शित फिल्म ‘हमदर्द’ से लिया है। फिल्म के संगीतकार हैं, अनिल विश्वास और इसे मन्ना डे और लता मंगेशकर ने गाया है। 



अनिल विश्वास और लता मंगेशकर 
‘रागमाला’ संगीत का वह प्रकार होता है, जिसमे किसी गीत में एक से अधिक रागों का प्रयोग हो और सभी राग स्वतंत्र रूप से रचना में उपस्थित हों। रागमाला गीतों में रागों का संयोजन प्रायः प्रहर के क्रम में, ऋतु के क्रम में अथवा थाट के क्रम में किया जाता है। आज के अंक में प्रस्तुत किया जाने वाला गीत 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘हमदर्द’ से लिया गया है और ऋतु के रागों के क्रम में है। गीत में चार अन्तरे हैं, जिन्हें संगीतकार अनिल विश्वास ने चार अलग-अलग रागों में निबद्ध किया था। इस फिल्म और इसके गीतों के बारे में फिल्म संगीत के प्रख्यात शोधकर्त्ता पंकज राग ने अपनी पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ में लिखा है- “फिल्म ‘हमदर्द’ (1953) तो शास्त्रीय संगीत आधारित कम्पोज़ीशन के लिए हिन्दी फिल्म संगीत के इतिहास में अमर हो चुकी है। स्वयं अनिल विश्वास की ही प्रोडक्शन (निर्मात्री- आशालता विश्वास) के बैनर तले बनी इस फिल्म में ‘ऋतु आए ऋतु जाए सखी री...’ (मन्ना डे, लता) एक बेहतरीन रागमाला थी, जिसमें खयाल अंग का प्रयोग था और गौड़ सारंग, गौड़ मल्हार, जोगिया और बहार पर आधारित लाजवाब टुकड़े थे। कम्पोज़ीशन और गायकी के इतने सुन्दर उदाहरण फिल्म संगीत में कम ही मिलते हैं”। संगीतकार अनिल विश्वास ने इस रागमाला गीत के लिए मन्ना डे और लता मंगेशकर को चुना था।

मन्ना डे 
अनिल विश्वास मन्ना डे की प्रतिभा से बहुत अच्छी तरह परिचित थे। उन्होने इस गीत के चारो अन्तरों को चार अलग-अलग रागों में खयाल अंग में संगीतबद्ध किया था। उन दिनों यह चलन था कि पक्के रागों पर आधारित गीतों को गाने के लिए संगीत जगत के सिद्ध गायकों से फिल्मों में गीत गवाया जाता था। परन्तु अनिल विश्वास ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने पुरुष स्वर के लिए मन्ना डे को और नारी स्वर के लिए लता मंगेशकर पर भरोसा किया और फिल्म संगीत जगत का यह कालजयी गीत तैयार हुआ। एक बार अनिल विश्वास ने इस गीत की रचना प्रक्रिया के बारे में अपने एक साक्षात्कार में कहा था- “आजकल गायक कलाकारों के पास रिहर्सल का समय नहीं होता, मगर फिल्म ‘हमदर्द’ के इस गीत को रिकार्ड करने से पहले मन्ना डे और लता ने लगातार 15 दिनों तक इस गीत का रिहर्सल किया था”। एक अन्य साक्षात्कार में मन्ना डे ने बताया था- “इस गीत को रिकार्ड करने में 6-7 घण्टे का समय लगा था। हम सब बुरी तरह थक गए थे, लेकिन रिकार्डिंग के बाद गाना सुन कर अनिल दा खुशी के मारे सचमुच नाचने लगे। उन्हें नाचते देख कर लगा कि वो हमारी मेहनत से सन्तुष्ट थे”

फिल्म 'हमदर्द' के इस गीत के प्रसंग में अभिनेता शेखर एक अन्ध-गायक की भूमिका में हैं, जो नायिका निम्मी को संगीत की शिक्षा दे रहे हैं। गीत के पहले भाग के बोल हैं- ‘ऋतु आए ऋतु जाए सखी री, मन के मीत न आए...’। गीत के इस अन्तरे में ग्रीष्म ऋतु की दोपहरी का परिवेश चित्रित है और ऐसे परिवेश के चित्रण के लिए सर्वाधिक उपयुक्त राग गौड़ सारंग ही है। अनिल विश्वास ने गीत का दूसरा अन्तरा राग गौड़ मल्हार में निबद्ध किया था, जिसके बोल हैं- ‘बरखा ऋतु बैरी हमार...’। प्रचण्ड गर्मी के बाद जब वर्षा की बूँदें भूमि की तपिश को शान्त करने का प्रयत्न करती हैं, तब विरही मन और भी व्याकुल हो जाता है। गीत के इस भाग के शब्द भी परिवेश के अनुकूल रचे गए हैं। सुविधा की दृष्टि गीत के चारो अन्तरों को दो भाग में हमने बाँट दिया है। लीजिए गीत के प्रथम दो अन्तरे सुनिए।


रागमाला गीत : फिल्म हमदर्द : राग गौड़ सारंग और गौड़ मल्हार : मन्ना डे और लता मंगेशकर


गीतकार प्रेम धवन 
फिल्म ‘हमदर्द’ के इस रागमाला गीत के तीसरे अन्तरे में पतझड़ के परिवेश में नायिका के विरह भाव का चित्रण है। इस अन्तरे को संगीतकार अनिल विश्वास ने राग जोगिया में बाँधा है। इस अन्तरे के बोल हैं- 'पी बिन सूना री...'। गीत का चौथा और अन्तिम अन्तरा उल्लासपूर्ण परिवेश का चित्रण करता है। इसे राग बसन्त बहार के स्वर दिये गए हैं, जिसके बोल हैं- ‘आई मधु ऋतु बसन्त बहार रे...’। गीत के चारो अन्तरों को मन्ना डे और लता मंगेशकर ने रागानुकूल स्वरों की शुद्धता बनाए रखते हुए इस अनूठे गीत को भावपूर्ण ढंग से तीनताल में गाया है। गीतकार प्रेम धवन हैं। इस गीत को ऐतिहासिक बनाने में वाद्य संगीत के श्रेष्ठतम कलाकारों का योगदान भी रहा। गीत में सुप्रसिद्ध बाँसुरी वादक पन्नालाल घोष और सारंगी वादक पण्डित रामनारायण ने संगति की थी। रिकार्डिंग पूरी हो जाने के बाद जाने-माने सितार-वादक उस्ताद विलायत खाँ ने टिप्पणी की थी- ‘फिल्म संगीत जगत में आज एक श्रेष्ठतम गीत रिकार्ड हुआ है'। स्वयं मन्ना डे भी इस गीत को अपने श्रेष्ठ गीतों की श्रेणी में शीर्ष पर मानते हैं। आइए हम प्रेम धवन के लिखे, अनिल विश्वास द्वारा संगीतबद्ध किये तथा मन्ना डे व लता मंगेशकर के स्वरों में 'हमदर्द' फिल्म के इस 'रागमाला' गीत का तीसरा और चौथा अन्तरा सुनते हैं-


रागमाला गीत : फिल्म हमदर्द : राग जोगिया और बहार : मन्ना डे और लता मंगेशकर


आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 117वीं संगीत पहेली में हम आपको आधी शताब्दी पूर्व के एक फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 120वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस ताल में निबद्ध है?

2 – गीत के संगीतकार का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 119वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 115वें अंक में हमने आपको 1964 में प्रदर्शित फिल्म 'गोदान' से पार्श्वगायक मुकेश की आवाज़ में पारम्परिक चैती की धुन पर आधारित एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- संगीत शैली चैती और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- संगीतकार पण्डित रविशंकर। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर बैंगलुरु के पंकज मुकेश, जबलपुर की क्षिति तिवारी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।

झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग रागमाला गीत के संग’ को हम एक बार फिर विराम देंगे और उसके स्थान पर एक विशेष अंक प्रस्तुत करेंगे। दरअसल इस माह एक क्षेत्रीय भाषा की फिल्म अपने प्रदर्शन की आधी शताब्दी पूर्ण कर चुकी है। इस अवसर पर हम अपने एक अतिथि लेखक और युवा फिल्म पत्रकार रविराज पटेल का शोधपरक् आलेख प्रस्तुत करेंगे। आप भी हमारे आगामी अंकों के लिए भारतीय शास्त्रीय, लोक अथवा फिल्म संगीत से जुड़े नये विषयों, रागों और अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 

 प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र


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