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Sunday, October 23, 2011

‘जिनके दुश्मन सुख मा सोवें उनके जीवन को धिक्कार...’ वीर रस की लोक-काव्य-धारा : आल्हा

सुर संगम- 40 – आल्हा-ऊदल चरित्रों की ऐतिहासिकता

(पहला भाग)
सुर संगम’ के गत सप्ताह के अंक में हमने बुन्देलखण्ड की वीर-भूमि में उपजी और और समूचे उत्तर भारत में लोकप्रिय लोक-गायन शैली ‘आल्हा’ पर चर्चा आरम्भ की थी। आज के अंक में हम इस लोकगाथा के दो वीर चरित्रों- आल्हा और ऊदल की ऐतिहासिकता पर चर्चा करेंगे। बारहवीं शताब्दी में उपजी लोक संगीत की यह विधा अनेक शताब्दियों तक श्रुति परम्परा के रूप जीवित रही। परिमाल राजा के भाट जगनिक ने इस लोकगाथा को गाया और संरक्षित किया। आल्हा और ऊदल की ऐतिहासिकता के विषय में पिछले दिनों हमने बुन्देलखण्ड की लोक-कलाओं और लोक-साहित्य के शोधकर्त्ता, उरई निवासी श्री अयोध्याप्रसाद गुप्त ‘कुमुद’ से चर्चा की थी।

बारहवीं शताब्दी के इतिहास में आल्हा और ऊदल का उल्लेख उस रूप में नहीं मिलता, जिस रूप में ‘आल्ह खण्ड’ में किया गया है, इस प्रश्न पर श्री कुमुद का कहना है कि इतिहास केवल राजाओं को महत्त्व देता है, सामान्य सैनिकों को नहीं,चाहे वे कितने भी वीर क्यों न हों। गायक जगनिक ने पहली बार सेना के सामान्य सरदारों और सैनिकों को अपनी गाथा में शामिल कर उनका यशोगान किया। उसने बहादुर सैनिकों को उनके यथोचित सम्मान से विभूषित किया। आल्हा और ऊदल राजा नहीं थे। इसलिए उनके बारे में इतिहास में उल्लेख नहीं मिलता है। जबकि इतिहासकार महोबा के राजा परमाल, दिल्ली के सम्राट पृथ्वीराज चौहान और जयचन्द को ऐतिहासिक व्यक्तित्व मानते हैं। उन्होंने बताया कि आल्हा के लेखन का कार्य सबसे पहले ब्रिटिश शासनकाल में फर्रुखाबाद के कलेक्टर सर चार्ल्स इलियट ने १८६५ में कराया। इसका संग्रह ‘आल्ह खण्ड’ के नाम से प्रचलित हुआ तथा यह पहला संग्रह कन्नौजी भाषा में था।

आल्हा-ऊदल चरित्रों और ‘आल्ह खण्ड’ की ऐतिहासिकता को प्रमाणित करते हुए श्री कुमुद ने कहा कि आज भी अनेक शिलालेख और भवन मौजूद हैं, जो प्रमाणित करते हैं कि आल्हा-ऊदल ऐतिहासिक पात्र हैं। उन्होंने बताया कि आल्हा और मलखान के शिलालेख हैं। श्री कुमुद के अनुसार वर्ष ११८२ के शिलालेख में यह उल्लेख है कि पृथ्वीराज चौहान ने महोबा के परमाल राजा को पराजित किया था। आल्हा के ऐतिहासिक व्यक्तित्व की पुष्टि उत्तर प्रदेश के जनपद ललितपुर में मदनपुर के एक मन्दिर में लगे ११७८ के एक शीलालेख से भी होती है। इसमें आल्हा का उल्लेख बिकौरा-प्रमुख अल्हन देव के नाम से हुआ है। मदनपुर में आज भी ६७ एकड़ की एक झील है। इसे मदनपुर तालाब भी कहते हैं। इसके पास ही बारादरी बनी है। यह बारादली आल्हा-ऊदल की कचहरी के नाम से प्रसिद्ध है। इस बारादरी और झील को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने संरक्षित किया है। आल्हा-ऊदल को ऐतिहासिक चरित्र सिद्ध करने वाले शिलालेखों और अभिलेखों की चर्चा हम जारी रखेंगे। थोड़ा विराम लेकर अब हम आपको प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश के आल्हा-विशेषज्ञ विजय सिंह की आवाज़ में ‘आल्ह खण्ड’ से एक प्रसंग सुनवाते है-

आल्हा गायन : स्वर – विजय सिंह : प्रसंग – माड़वगढ़ की लड़ाई


आल्हा गायकी और इसके चरित्रों की ऐतिहासिकता के विषय में श्री कुमुद ने बताया कि पृथ्वीराज रासौ में भी चन्द्रवरदाई ने आल्हा को अल्हनदेव शब्द से सम्बोधित किया है। उस काल में बिकौरा गाँवों का समूह था। आज भी बिकौरा गाँव मौजूद है। इसमें ११वीं और १२वीं शताब्दी की इमारते हैं। इससे प्रतीत होता है कि पृथ्वीराज चौहान के हाथों पराजित होने से चार साल पहले महोबा के राजा परमाल ने आल्हा को बिकौरा का प्रशासन प्रमुख बनाया था। यह गाँव मदनपुर से ५ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है तथा दो गाँवों में विभक्त है। एक को बड़ा बिकौरा तथा दूसरे को छोटा बिकौरा कहा जाता है। उन्होंने बताया कि महोबा में भी ११वीं और १२वीं शताब्दी के ऐसे अनेक भवन मौजूद हैं जोकि आल्हा-ऊदल की प्रमाणिकता को सिद्ध करते हैं। इसी तरह सिरसागढ़ मे मलखान की पत्नी का चबूतरा भी एक ऐतिहासिक प्रमाण है। यह चबूतरा मलखान की पत्नी गजमोदनी के सती-स्थल पर बना है। पृथ्वीराज चौहान के साथ परमाल राजा की पहली लड़ाई सिरसागढ़ में ही हुई थी। इसमें मलखान को पृथ्वीराज ने मार दिया था। यहीं उनकी पत्नी सती हो गई थी। सती गजमोदिनी की मान्यता इतनी अधिक है कि उक्त क्षेत्र मे गाये जाने वाले मंगलाचरण में पहले सती की वन्दना की जाती है। उन्होंने बताया कि आल्हा ऊदल की ऐतिहासिकता की पुष्टि पन्ना के अभिलेखों में सुरक्षित एक पत्र से भी होती है। यह पत्र महाराजा छत्रसाल ने अपने पुत्र जगतराज को लिखा था।

श्री कुमुद ने आगे कहा कि आल्हा के किले को भी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने संरक्षित किया है। आल्हा की लाट, मनियादेव का मन्दिर, आल्हा की सांग आज भी मौजूद हैं। इन्हें भी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने मान्यता दी है। आइए अब हम आपको १९५९ में प्रदर्शित फिल्म ‘सम्राट पृथ्वीराज चौहान’ में प्रयुक्त एक आल्हा गीत सुनवाते हैं। हिन्दी फिल्मों में आल्हा की धुन पर आधारित गीतों का प्रयोग कम ही हुआ है। बहुत खोज करने पर यह गीत प्राप्त हो सका है। पिछले दशक में प्रदर्शित फिल्म ‘मंगल पाण्डे’ के एक गीत में भी आल्हा-धुन का प्रयोग किया गया था। हमारे पाठको को यदि आल्हा-गीतों की धुन पर आधारित किसी फिल्म-गीत की जानकारी हो तो हमें अवश्य सूचित करें।

आइए सुनते हैं, मोहम्मद रफी के स्वर में फिल्म ‘सम्राट पृथ्वीराज चौहान’ का यह आल्हा गीत, भरत व्यास के शब्दों को संगीतबद्ध किया है बसन्त देसाई ने-

आल्हा –‘लो कामना पूरी हुई हैं....’ : स्वर – मोहम्मद रफी : गीतकार – भरत व्यास


सुर संगम पहेली : पिछले कुछ सप्ताह से इस स्तम्भ की पहेली स्थगित थी। इस अंक से हम पुनः पहेली आरम्भ कर रहे हैं।

आज का प्रश्न – अगले अंक में हम आपसे आगरा घराने के एक उस्ताद संगीतज्ञ की चर्चा करेंगे, जिन्हें ‘आफताब-ए-मौसिकी’ की उपाधि से नवाजा गया था। उस महान गायक का आपको नाम और घराना बताना है।

अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। अगले रविवार को हम एक उस्ताद शास्त्रीय गायक के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा के साथ पुनः उपस्थित होंगे। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई होगी। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तम्भ को और रोचक बना सकते हैं! आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

चित्र परिचय : आल्हा-ऊदल की आराध्य मैहर की देवी माँ शारदा


आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, October 16, 2011

‘जा दिन जनम लियो आल्हा ने, धरती धँसी अढ़ाई हाथ.....’ बुन्देलखण्ड की लोकप्रिय लोक-गायकी शैली

सुर संगम- 39 – वीर रस का संचार करती लोक-काव्य की अजस्र धारा- आल्हा पर एक चर्चा


शास्त्रीय तथा लोक संगीत के साप्ताहिक स्तम्भ ‘सुर संगम’ के आज एक नए अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज हम उत्तर भारत में प्रचलित लोक गीत-संगीत की एक ऐसी विधा पर आपसे चर्चा करेंगे, जो श्रोताओं में वीर रस का संचार करने में सक्षम है। लोक संगीत की यह शैली ‘आल्हा’ के नाम से लोकप्रिय है।

आल्हा, वीरगाथा काल के महाकवि जगनिक द्वारा प्रणीत और परमाल रासो पर आधारित बुन्देली और अवधी का एक महत्त्वपूर्ण छन्दबद्ध काव्य है। इस काव्य का प्रणयन लगभग सन १२५० में माना जाता है। इसमें महोबा के वीर आल्हा और ऊदल के वीरता की गाथा होती है। यह उत्तर प्रदेश के अवध और मध्य प्रदेश के बुन्देलखण्ड की सर्वाधिक लोकप्रिय वीर-गाथा है। पावस ऋतु के अन्तिम चरण से लेकर पूरे शरद ऋतु तक समूहिक रूप से अथवा व्यक्तिगत स्तर पर इन दोनों प्रदेशों में आल्हा-गायन होता है। आल्हा के अनेक संस्करण उपलब्ध हैं, जिनमें कहीं ५२ तो कहीं ५६ लड़ाइयाँ वर्णित हैं। इस लोकमहाकाव्य की गायकी की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित हैं। जगनिक के लोककाव्य “आल्ह-खण्ड” की लोकप्रियता देशव्यापी है। महोबा के शासक परमाल के दोनों शूरवीर भाइयों- आल्हा और ऊदल की शौर्य-गाथा केवल बुन्देलखण्ड तक ही सीमित नहीं रह गई है, बल्कि अवध, कन्नौज, रूहेलखण्ड, ब्रज आदि क्षेत्रों की बोलियों में भी विकसित हुईं। आल्हा या वीर छन्द अर्द्धसम मात्रिक छन्द है, जिसके हर पद (पंक्ति) में क्रमशः १६-१६ मात्राएँ, चरणान्त क्रमशः दीर्घ-लघु होता है। यह छन्द वीररस से ओत-प्रोत होता है। इस छन्द में अतिशयोक्ति अलंकार का प्रचुरता से प्रयोग होता है। एक लोककवि ने आल्हा के छन्द-विधान को इस प्रकार समझाया है-

आल्हा मात्रिक छन्द, सवैया, सोलह-पन्द्रह यति अनिवार्य।
गुरु-लघु चरण अन्त में रखिये, सिर्फ वीरता हो स्वीकार्य।
अलंकार अतिशयताकारक, करे राई को तुरत पहाड़।
ज्यों मिमयाती बकरी सोचे, गुँजा रही वन लगा दहाड़।


आल्हा-गायन में प्रमुख संगति वाद्य ढोलक, झाँझ, मँजीरा आदि है। विभिन्न क्षेत्रों में संगति-वाद्य बदलते भी हैं। ब्रज क्षेत्र की आल्हा-गायकी में सारंगी के लोक-स्वरूप का प्रयोग किया जाता है, जबकि अवध क्षेत्र के आल्हा-गायन में सुषिर वाद्य क्लेरेनेट का प्रयोग भी किया जाता है। आल्हा का मूल छन्द कहरवा ताल में निबद्ध होता है। प्रारम्भ में आल्हा गायन विलम्बित लय में होता है। धीरे-धीरे लय तेज होती जाती है। आइए, ब्रज क्षेत्र की परम्परागत आल्हा-गायकी का एक उदाहरण आपको लोक-गायक बलराम सिंह के स्वरों में सुनवाते हैं।

आल्हा गायन : स्वर – बलराम सिंह : प्रसंग – इन्दल हरण


राजा परमाल देव चन्देल वंश के अन्तिम राजा थे। तेरहवीं शताब्दी के आरम्भ में यह वंश समाप्त हो गया। वर्तमान में महोबा एक साधारण कस्बा है, परन्तु ११वीं और १२वीं शताब्दी में चन्देलों की राजधानी था। आल्हा और ऊदल इसी राजा परमाल देव के दरबार के योद्धा थे। यह दोनों भाई अभी बच्चे ही थे कि उनके पिता जसराज एक लड़ाई में मारे गए। राजा को अनाथ बच्चों पर दया आई। राजा परमाल आल्हा और ऊदल को राजमहल में ले आए और अपनी रानी मलिनहा को सौंप दिया। रानी ने उन दोनों भाइयों की परिवरिश और लालन-पालन अपने पुत्र के समान ही किया। युवा होते ही दोनों भाई वीरता में अद्वितीय हुए। आल्हा-काव्य इन दोनों भाइयों की वीरता की ही गाथा है।

बारहवीं शताब्दी में चन्देल राजपूतों की वीरता और जान पर खेलकर स्वामी की सेवा करने के लिए किसी राजा-महाराजा को भी यह अमर कीर्ति नहीं मिली होगी, जितनी आल्हा गीत के नायकों आल्हा और ऊदल को मिली। आल्हा और ऊदल का अपने स्वामी और अपने राजा के लिए प्राणों का बलिदान करना ही इस लोक-गाथा का मूल तत्व है। आल्हा और ऊदल की वीरता के कारनामे चन्देली कवि ने उन्हीं के काल में गाये थे। वीर रस के इस काव्य में अलंकारों का प्रयोग अत्यन्त रोचक है। अतिशयोक्ति अलंकार का एक उदाहरण देखें- “जा दिन जनम लियो आल्हा ने धरती धँसी अढ़ाई हाथ...”। आल्हा-ऊदल और महोबा की सेना की वीरता के सन्दर्भ में “आल्ह-खण्ड” में थोड़े शाब्दिक हेर-फेर के साथ यह पंक्ति कई बार दोहराई गई है- “बड़े लड़इया महोबे वाले, जिनके बल को वार न पार...”। एक महाकाव्य मे जो साहित्यिक गुण होने चाहिए, वह सब इस लोक-गाथा में हैं। “आल्ह-खण्ड” का साहित्यिक विवेचना करने वाले तथा परम्परागत आल्हा गायकी के दीवानों के मानस में तो आल्हा और ऊदल यथार्थ चरित्र के रूप में बसे हुए हैं, किन्तु वैज्ञानिक ढंग से विवेचना करने वाले इन्हें काल्पनिक चरित्र ही मानते हैं। इस सम्बन्ध में हमने बुन्देलखण्ड की लोक कलाओं और लोक साहित्य के वरिष्ठ अध्येता और शोधकर्त्ता अयोध्याप्रसाद गुप्त ‘कुमुद’ से आल्हा की ऐतिहासिकता के विषय पर बातचीत की है, जिसे हम अगले सप्ताह ‘सुर संगम’ में प्रस्तुत करेंगे। आज के अंक को विराम देने से पहले आइए आपको अवध क्षेत्र में प्रचलित आल्हा का एक उदाहरण सुनवाते हैं। उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले के सुप्रसिद्ध लोक-गायक लल्लू बाजपेयी के स्वरों में यह आल्हा है। गायन के बीच-बीच में विभिन्न चरित्रों द्वारा गद्य संवाद भी बोले गए हैं।

आल्हा गायन : स्वर – लल्लू बाजपेयी : प्रसंग – मचला हरण


अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। अगले रविवार को हम आल्हा गायकी के सम्बन्ध में इस आलेख के दूसरे भाग के साथ पुनः उपस्थित होंगे। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई होगी। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तम्भ को और रोचक बना सकते हैं! आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

चित्र परिचय : वीर आल्हा


आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

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