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Wednesday, June 22, 2016

"हमारे देश में बहुत सारा टेलेंट है और उन्हें मौके मिलने चाहिए" -सिद्धार्थ बसरूर : एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है (16)

Siddharth Basrur
हौंटड ३, कट्टी बट्टी, फोबिया, हैप्पी एंडिंग, और अभी हाल ही में रमन राघव २.० में पर्व्श्गायन कर गायक सिद्धार्थ बसरूर में गायन की दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बना ली है. राम संपत, शंकर एहसान लोय, और सचिन जिगर जैसे बड़े संगीतकारों के साथ काम  कर चुके सिद्धार्थ है हमारे आज के ख़ास मेहमान, मिलिए इस उभरते हुए गायक से "एक मुलाकात ज़रूरी है" के आज के एपिसोड में. 


एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें 

Wednesday, November 5, 2008

एक मुलाकात कवयित्री, गायिका और चित्रकार सुनीता यादव से

हिंद युग्म ने जिस उद्देश्य से बाल-उद्यान मंच की शुरूआत की थी, वो था बच्चों को सीधे तौर पर इस हिन्दी इंटरनेटिया आयाम से जोड़ने की। आज हम अगर इस उद्देश्य में काफी हद तक सफल हो पाये हैं तो उसका एक बड़ा श्रेय जाता है हमारे सबसे सक्रिय और समर्पित कार्यकर्ताओं में से एक सुनीता यादव को। महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा, पुणे द्वारा आदर्श शिक्षक पुरस्कार (२००४) और जॉर्ज फेर्नादिज़ पुरस्कार (२००६) से सम्मानित सुनीता ने और भी बहुत सी उपलब्धियाँ हासिल की है जैसे केंद्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा आयोजित हिन्दी नव लेखक शिविरों में कविता पाठ, आकाशवाणी औरंगाबाद से भी कविताओं का प्रसारण, परिचर्चायों में भागीदारी, गायन में अनेक पुरस्कारों से पुरस्कृत, २००५ में कत्थक नृत्यांगना कु.पार्वती दत्ता द्वारा आयोजित विश्व नृत्य दिवस कार्यक्रम का संचालन आदि। अभी पिछले महीने की आकाशवाणी औरंगाबाद के हिन्दी कार्यक्रम में सुनीता यादव का काव्य-पाठ प्रसारित हुआ, जिसे सुनीता ने बहुत ही अलग ढंग से पेश किया। हमें इस कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग प्राप्त हुई है, आपको भी सुनवाते हैं-



उर्जा से भरपूर सुनीता यादव हैं - हमारी सप्ताह की फीचर्ड आर्टिस्ट, जिनसे हमने की एक खास मुलाकात। पेश है उसी बातचीत के कुछ अंश -


हिंद युग्म - लेखन, गायन, संगीत कला, चित्र कला, तैराकी, आपके तो इतने सारे रचनात्मक रूप हैं, कैसे समय निकाल पाती है सबके लिए ?

सुनीता यादव - जीवन के सभी क्षेत्रों में विचारों, भावनाओं तथा कर्मों की रचना से जुडी आदतों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। छोटे-बड़े सभी कार्य एकाग्रता तथा व्यवस्थित रूप से किए जाने पर ही मनुष्य में निपुणता और सहज भाव से सब कुछ करने की क्षमता आती है। जिस तरह एक साइकिल चलानेवाला साइकिल चलाते-चलाते मित्रों से बातें कर सकता है, अपने चारों तरफ़ की सुरम्य दृश्यावली का आनंद उठा सकता है और बिना भय, उलझन या चिंता के अन्य वाहनों तथा पैदल चलनेवालों को बचाते हुए निकल जाता है :-) रुकने की जरूरत हो तो स्वत: ही ब्रेक लग जाते हैं ..

हिंद युग्म- ओडिसा, हैदराबाद,असम और अब औरंगाबाद इन सब मुक्तलिफ़ भाषा व संस्कारों वाले क्षेत्रों में रहने का अनुभव कैसा रहा और इस यायावरी ने आपकी रचनात्मकता को कितना समृद्ध किया ?

सुनीता यादव - ये मेरा सौभाग्य है कि भारत के विभिन्न राज्यों में रहने का आनंद मिला। इन प्रदेशों की भाषा, सामाजिक जीवन तथा संस्कृति से परिचित होने का सुअवसर मिला। मुसाफिरी व यायावरी ने मुझे बहुभाषी बना दिया। रही बात रचनात्मकता की मैं बहुत ही साधारण हूँ। जी हाँ मेरी उपलब्धियां सामान्य हैं, ये बड़ी बात है कि हिंद युग्म ने मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।

हिंद युग्म - एक अध्यापिका होने का कितना फायदा मिलता है ?

सुनीता यादव - बहुत फायदा होता है ...मेरी बुद्धि बहुत सामान्य है. मुझे तो विद्यार्थियों से ही बहुत सारी बातें सीखने को मिलती है :-) मेरी इच्छा है कि जिस प्रकार पदार्थों को ऊर्जा में बदलने के लिए विशेष विधिओं की आवश्यकता होती है उसी प्रकार मैं उनमें आत्म विश्वास, साहस व बौद्धिक जिज्ञासा भर दूँ ...ताकि वे जीवन में किसी भी क्षण में अपने आप को छोटा न समझें।

बाल-उद्यान के लिए कुछ आयोजन
  1. ऐ शहीदे मुल्को-बाल-कवि सम्मेलन

  2. स्मृति-लेखन तथा चित्रकला प्रदर्शनी

  3. कोचिंग संस्थान में स्मृति प्रतियोगिता

  4. अनाथालय में चित्रकला प्रतियोगिता


हिंद युग्म -हिंद युग्म परिवार में आपके लिए मशहूर है कि आप एक multi dimensional artist हैं, जो कला की हर विधा में निपुण हैं, कैसा रहा युग्म में अब तक का आपका सफर ?

सुनीता यादव - बहुत ही बढिया सफर रहा है। शुरू से विद्यालयीन स्तर पर इन गतिविधिओं से जुडी तो थी पर हिंद युग्म से जुड़ने के बाद यह समझ में आया कि अपने को उन्नत करनेवाले गुणों का विकास सम्भव है :-) प्रथम प्रयास की सफलता ही बाद के प्रयासों के लिए टॉनिक का कार्य करती है, है न ? चाहे जो भी हो हिंद-युग्म से जुड़ने के बाद उसकी रचनात्मक और कला क्षेत्र की सीमा विस्तृत हो जाती है। 'पहला सुर' महज एक प्रयास ही नहीं सारे भारत के संगीत प्रेमियों के लिए एक दिग्दर्शन भी है।

हिंद युग्म - इतना सब कुछ करने के बाद भी आप एक पत्नी हैं, माँ हैं. परिवार का सहयोग किस हद तक मिलता है, क्या कभी आपकी व्यस्तता को लेकर आपके पति या बिटिया ने असहजता जताई है ?

तेरे कितने रूप!
सुनीता यादव - पति और बेटी की तो बात बाद में आती है ...मैं पहले अपनी मम्मी जी की बात कह दूँ ? कोई अपनी बहू का साथ इतना नहीं देती होगी जितनी वे देती हैं। स्कूल की शिक्षिकाएँ हों, राष्ट्रभाषा के सदस्य हों या मेरे मित्र हों सभी के साथ उनका व्यवहार बहुत ही आत्मीय है। मेरे पति के बारे में क्या कहूँ सहृदय को धन्यवाद की आवश्यकता या प्रशंसा के शब्दों का प्रयोजन नहीं होता .. अंधेरे में फूलों का सुगंध भी प्रकाश का कार्य कर सकती है वे तो मुझे...शिला पर स्थिर बैठ कर जलधारा के वेग का सामना करते हुए बहते हुओं को बचाने की प्रेरणा देते हैं ... और मेरी बिटिया ने हिंद-युग्म के सारे गतिविधियों में मेरा साथ दिया...हम दोनों ही थे जब गरमी की छुट्टियों में भिन्न-भिन्न संस्थाओं में जाकर २५० विद्यार्थियों के लिए प्रतियोगिताओं का आयोजन किए थे. मुझे इस बात का गर्व भी है कि वह self-made है...बाल दिवस के अवसर पर आप उसकी प्रतिभा से परिचित होंगे .

हिंद युग्म - आप युग्म पर बहुतों के लिए प्रेरणा हैं, आपकी प्रेरणा कौन है ?

सुनीता यादव - मेरे लिए मेरे प्रेरणा स्रोत रहे मेरे माता-पिता. महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा के मेरे गुरुजन। वे सारे प्रिय जन जिन्होंने मुझे आगे बढ़ने में दिशा प्रदान की। पिताजी की कर्मठता मुझमें रच-बस जाए तो अपने-आप को धन्य समझूंगी। अपने जीवन में सबसे महीयसी महिला मैं श्रीमती अनीता सिद्धये को मानती हूँ जिनकी प्रेरणा ही मेरे एक मात्र संबल हैं। आतंरिक गुणों का विकास कैसे किया जाय ये कोई उनसे सीखे.

हिंद युग्म - बच्चों के लिए बाल-उद्यान के माध्यम से आपका योगदान अमूल्य रहा है, आने वाले बाल-दिवस के लिए क्या योजनायें हैं?

सुनीता यादव - बाल- दिवस आने तो दीजिए :-)

हिंद युग्म - बहुत से पुरस्कार और सम्मान आपने पाये....पर वो कौन सा सम्मान है जो सुनीता यादव को सबसे अधिक प्रिय है, या जिसे पाने की तमन्ना है ?

सुनीता यादव - महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा ने जिन पुरस्कारों से सम्मानित किया उसके लिए मैं अत्यन्त आभारी हूँ. सभी के कल्याणार्थ साधारण-सा कार्य भी कर सकूँ यही मेरा लक्ष्य है ..बाकी.. सेवा, प्रसिद्धि या प्रशंसा नहीं चाहती .

सुनीता जी आप इसी उर्जा और लगन से काम करती रहें और जीवन के हर मुकाम पर सफलता आपके कदम चूमें, हम सब की यही कामना है.


सुनीता यादव ने हिन्द-युग्म के पहले इंटरनेटीय एल्बम 'पहला सुर' के एक गीत 'तू है दिल के पास' को स्वरबद्ध भी किया था (साथ में गीत के बोल भी सुनीता ही ने लिखे थे और गाया भी इन्होंने ही था)। साथ-साथ यह गीत दुबारा सुन लें-

Sunday, September 28, 2008

चलो, एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों

मशहूर पार्श्व गायक महेन्द्र कपूर को अनिता कुमार की श्रद्धाँजलि

दोस्तो,

जन्म- ९ जनवरी १९३४
मूल- अमृतसर, पंजाब
मृत्यु- २७ सितम्बर, २००८
अभी-अभी खबर आयी कि शाम साढ़े सात बजे महेंद्र कपूर सदा के लिए रुखसत हो लिए। सुनते ही दिल धक्क से रह गया। अभी कल ही तो हेमंत दा की बरसी थी और वो बहुत याद आये, और आज महेंद्र कपूर चल दिये।

कानों में गूंजती उनकी आवाज के साथ साथ अपने बचपन की यादें भी लौट रही हैं। 1950 के दशक में जब महोम्मद रफ़ी, तलत महमूद, मन्ना डे, हेमंत दा, मुकेश और कालांतर में किशोर दा की तूती बोलती थी ऐसे में भी महेंद्र कपूर साहब ने अपना एक अलग मुकाम बना लिया था। एक ऐसी आवाज जो बरबस अपनी ओर खींच लेती थी। यूं तो उन्होंने उस जमाने के सभी सफ़ल नायकों को अपनी आवाज से नवाजा लेकिन मनोज कुमार भारत कुमार न होते अगर महेंद्र कपूर जी की आवाज ने उनका साथ न दिया होता। महेंद्र कपूर जी का नाम आते ही जहन में 'पूरब और पश्चिम' के गाने गूंजते लगते हैं

"है प्रीत की रीत जहां की रीत सदा, मैं गीत वहां के गाता हूँ, भारत का रहने वाला हूँ भारत की बात सुनाता हूँ"

आज भी इस गीत को सुनते-सुनते कौन भारतीय साथ में गुनगुनाने से खुद को रोक सकता है और किस भारतीय की छाती इस गाने के साथ चौड़ी नहीं होती। लाल बहादुर शास्त्री जी ने नारा दिया था "जय जवान, जय किसान", भारत के इस सपूत ने शास्त्री जी के इस नारे को अपने गीतों में न सिर्फ़ जिया बल्कि उस नारे को अमर भी कर दिया। जहां एक तरफ़ 'शहीद' फ़िल्म में उनकी आवाज गूंजी

"मेरा रंग दे बसंती चौला, माय , रंग दे बंसती चौला"

तो दूसरी तरफ़ 'उपकार' फ़िल्म के किसान की आवाज बन उन्हों ने गर्व से कहा

"मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती," ।

गीत सुनें

चलो इक बार फिर से


शेष गाने आप नीचे के प्लेयर से सुनें।
मोहम्मद रफ़ी को अपना गुरु मानने वाले, महेंद्र जी ने 1956 में ही फ़िल्मी गीतों के गायन की दुनिया में प्रवेश किया, लोगों ने शुरू-शुरू में कहा कि मोहम्मद रफ़ी को कॉपी करता है, लेकिन महज तीन साल बाद ही सन 1959 में उनका गाया 'नवरंग' फ़िल्म का गाना

-"आधा है चंद्रमा रात आधी, रह न जाये तेरी-मेरी बात आधी"

कालजयी गीत हमारे दिलों पर अपनी मोहर लगा गया। इसके पहले कि लोग कहते कि अरे ये तो तुक्का था जो लग गया, 1959 में ही एक और फ़िल्म 'धूल का फूल' का वो प्यारा सा गीत

"तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ, वफ़ा कर रहा हूँ वफ़ा चाहता हूँ"

ऐसा लोकप्रिय हुआ कि हर कोई उनसे वफ़ा करने को मजबूर हो गया।

फ़िर तो महेंद्र जी की शोहरत को मानो पंख लग गये, 1963 में आयी फ़िल्म 'गुमराह' का वो सदा बहार गीत

-" चलो इक बार फ़िर से अजनबी बन जाएं हम दोनों"

तान छेड़ते महेन्द्र
सुनिल दत्त और माला सिन्हा पर फ़िल्माया गया ये गीत हर टूटे दिल की आवाज बन गया और आज भी है। इस गाने पर महेंद्र जी को पहली बार फ़िल्म फ़ेअर अवार्ड भी मिला। इसी जैसा एक और गीत जो हमें याद आ रहा है वो है फ़िल्म 'वक़्त' का। हम लगभग दस साल के रहे होंगे जब फ़िल्म आयी "वक़्त", इस फ़िल्म के दो गाने बहुत लोकप्रिय हुए, एक तो मन्ना डे का गाया हुआ सदाबहार गीत जो आज भी हर किसी को गुदगुदाता है "ऐ मेरी जोहरा जबीं" और दूसरा गीत जो बहुत लोकप्रिय हुआ वो था महेंद्र जी का गाया
" दिन हैं बहार के ",

शशी कपूर और शर्मिला टैगोर पर फ़िल्माये इस गीत में महेंद्र जी ने जमाने भर की बेबसी भर शशी कपूर के किरदार को नयी ऊंचाई पर पहुंचा दिया था।

जहां ये गमगीन गाने हमारे गमों के साथी बने वहीं 'बहारें फ़िर भी आयेगीं' फ़िल्म का गीत
"बदल जाए अगर माली चमन होता नहीं खाली"

हर दिल की हौसलाअफ़्जाई करता मिल जाता है।
'किस्मत' फ़िल्म का वो गाना
"लाखों है यहां दिल वाले पर प्यार नहीं मिलता"
और
"तुम्हारा चाहने वाला खुदा की दुनिया में मेरे सिवा भी कोई और हो खुदा न करे"
कितने प्रेमियों को जबान दे गया

क्या क्या याद करें? अगर उन्होंने देश प्रेम, विरह, रोमान्स, आशावाद दिया तो भक्ति का रंग भी खूब जमाया। पूरब पश्चिम में उनकी गायी आरती
"ॐ जय जगदीश हरे "
तो आज मेरे ख्याल से हर घर में पूजा के अवसर पर बजती है। किसने सोचा था कि फ़िल्म का हिस्सा बन कर भी ये आरती फ़िल्मी रंग से अछूती रहेगी। बिना किसी लटके-झटके के सीधे सादे ट्रेडिशनल ढंग से गायी ये आरती आज भी मन को शांती देती है।
74 साल की उम्र में भी गुर्दे की बीमारी से जूझते हुए भी इस भारत के सपूत ने चैन से घर बैठना स्वीकार नहीं किया और देश-विदेश में घूम-घूम के भारतीय संगीत का जादू बिखेरता रहा, फ़िर वो जादू चाहे हिन्दी में हो या पंजाबी, गुजराती या मराठी में। मानो कहते हों

"तुम अगर साथ देने का वादा करो मैं यूं ही मस्त नगमें लुटाता रहूँ"

---अनिता कुमार

Monday, September 8, 2008

वह कभी पीछे मुडकर नहीं देखती, इसीलिए वह आशा है

सजय पटेल ने दो बरस पहले ख्यात गायिका आशा भोंसले से उनके जन्मदिन के ठीक एक दिन पहले बात की थी.उसी गुफ़्तगू की ज़ुगाली आज आवाज़ पर....

संघर्ष हर एक के जीवन में हमेशा ही रहता है, लेकिन उन्होंने पीछे मुड़कर देखना नहीं सीखा और शायद इसीलिए वह सिर्फ़ नाम की आशा नहीं, ज़िंदगी का वो फ़लसफ़ा हैं जिसमें "निराशा' शब्द के लिए कोई जगह नहीं। वह वैसा फूल भी नहीं हैं जिसे कल मुरझाना है, वह ऐसी ख़ुशबू हैं जिसकी महक में उल्लास है, ख़ुशी है, ज़ज़्बा है।ये सारे शब्द उस आवाज़ के लिये यहाँ झरे हैं, जो साठ बरसों से मादकता, मदहोशी और मुस्कान का मीठा सिलसिला पेश करती आई हैं, आशा भोंसले।

दो बरस पहले टेलीफ़ोन पर उनसे जब चर्चा हुई थी तब आशाजी ने कहा- जीवन ताल और लय में होना ज़रूरी है। सुर उतरा तो चढ़ जाएगा, लेकिन ताल बिगड़ी तो समझिए संगीत का समॉं ही बिगड़ गया। मनुष्य के लिए "चाल-ढाल और गाने वालों के लिए ताल' बहुत ज़रूरी है। मैंने न जाने कितने संगीतकारों के साथ काम किया तो उसे अपना एक विनम्र कर्तव्य माना। कभी काम करके थकान नहीं महसूस की मैंने। मानकर चली कि संगीत का काम भी एक इबादत है, उसे तो करना ही है।

बातचीत में ज़ेहन में उनके सैकड़ों गीत उभरे लेकिन मैंने उनसे दो ख़ास प्रोजेक्ट की चर्चा की। एक उस्ताद अली अकबर ख़ॉं के साथ किए शास्त्रीय संगीत के एलबम की और दूसरे ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली द्वारा रचे गए ग़ज़लों के एलबम की। आशाजी ने बताया कि उस्ताद अली अकबर ख़ॉं साहब अपने एलबम के लिए क्लासिकल मौसिक़ी के कई बड़े नाम आज़मा चुके थे। लेकिन बात इसलिए नहीं बन रही थी कि वो जो चाहते वह बनता नहीं। गाने वाला अपना रंग उसमें उड़ेल देता। मैं ठहरी "प्लेबैक सिंगर' सो जैसा उन्होंने बताया, मैंने गाया। उनका सबसे बढ़िया कॉम्प्लीमेंट मेरे लिए यह था कि आशाबाई आपने बाबा के संगीत को पुनर्जीवित कर दिया। न जाने कौन-कौन से कैसे-कैसे क्लिष्टतम राग और बंदिशें थीं उसमें। लेकिन बस पन्द्रह दिन ख़ॉं साहब के साथ बैठी और रिकॉर्ड कर दिया। ग़ुलाम अली साहब के साथ भी पहले गाने में घबरा रही थी, पर मेरी बेटी वर्षा ने कहा - आप कीजिए। रात को एक कम्पोज़िशन गाकर सोई और सुबह दिमाग़ में धुन मुकम्मिल हो गई। बस बाकी तो आप संगीतप्रेमी जानते ही हैं कि वह एलबम लोगों को कितना पसंद आया।

जन्मदिन बिताने की तैयारी क्या है, पूछने पर उन्होंने कहा - अब जन्मदिन या जीवन की सारी ख़ुशियॉं मैं अपने नाती-पोतों में तलाशती हूँ। यह पूछने पर कि क्या यह कहना बेहतर होगा कि भारत में पॉप की साम्राज्ञी आप हैं, तो आशाजी ने ठहाके के साथ कहा कि मैंने अण्णा (संगीतकार सी.रामचंद्र) के साथ "इना मीना डीका' गाया था। वहॉं से पॉप को एक नई पहचान मिली। अब "रंग रंग रंगीला' तक सारा सिलसिला पॉप और मस्ती का ही तो है। उन्होंने मज़ाकिया लहज़े में कहा- लोगों के जीवन में जैसे "पाप' है वैसे ही मेरे जीवन में "पॉप' है।आशा जी बोले जा रहीं थीं और मेरे दिलों-दिमाग़ में सुरों का समंदर उमड़ता आ रहा था. यक़ीन जाने लें मुझ जैसे कानसेन के लिये इस सुरगंध से बतियाना लगभग एक क़िस्म से हिप्नॉटाइज़ हो जाने जैसा था.



आशा जी ने बताया कि लता मंगेशकर की छोटी बहन होना हमेशा से फ़ख़्र का विषय रहा है और हमने हमेशा एक व्यावसायिक अनुशासन को क़ायम रखा है. वे (दीदी)हमेशा एक महान गुलूकारा रहीं है और न जाने कितने गायक-गायिकाओं ने उनसे प्रेरणा ली है तो मेरे लिये तो वे बड़ी बहन और एक प्यारी सखी रहीं हैं.आशाजी ठीक कहतीं हैं.और बुरा न मानें जब भी कोई इन दो स्वर-महारानियों में तुलता करता है तो मुझे बेहद अफ़सोस होता है. देखा जाए तो दोनों एक तरह एक ध्वनि-मुद्रिका दो साइड हैं.बताइये कैसे करें तुलना. एक तरफ़ कोई गीत अधिक अच्छा है , दूसरी तरफ़ कोई दूसरा अच्छा.

आशा भोंसले गायकी में विविधता का दूसरा नाम है. ज़रा ग़ौर फ़रमाइये इस छोटी सी फ़ेहरिस्त पर : अब के बरस भेज भैया को बाबुल,रंग,रंग,रंगीला,दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये,दम मारो दम,आगे भी जाने न तू,पीछे भी जाने तू, जो भी है बस वही एक पल है,चैन से हमको कभी आपने जीने न दिया,सुन सुन दीदी तेरे लिये एक रिश्ता आया है;कितनी विविधता है इन गीतों के मूड में और यहीं आकर आशाजी अपवाद हो जातीं है.वे वैरायटी का सरमाया हैं.

आशा भोंसले अपनी निजी ज़िन्दगी में बहुत टेढ़े-मेढ़े रास्तों से गुज़रीं हैं,लेकिन अपने नाम की तरह उन्होंने अपने आप को साबित किया है.समय की अदला-बदली चलती रहेगी,तहज़ीब छुपा-छाई खेलती रहेगी,ज़ुबान के तेवर बदलेंगें लेकिन आशा भोंसले हर दौर में प्रासंगिक होंगी.इस सर्वकालिक महान गायिका को ज़िन्दगी की पिचहत्तरवीं पायदान पर हम सब संगीतपेमियों का प्रेमल सलाम !

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(चित्र में आशा जी एक कंसर्ट में गाती हुईं, संगीत दे रहे हैं, मरहूम संगीतकार और पति आर डी बर्मन साहब)
चित्र साभार - हमाराफोटोस

Wednesday, July 16, 2008

लता मंगेशकर को अपना रोल मॉडल मानती हैं, गायिका -मानसी पिम्पले, आवाज़ पर इस हफ्ते का उभरता सितारा

आवाज़ पर इस हफ्ते की हमारी "फीचर्ड आर्टिस्ट" हैं - मानसी पिम्पले, हिंद युग्म पर अपने पहले गीत "बढ़े चलो" से चर्चा में आयीं मानसी रमेश पिम्पले, मूल रूप से महाराष्ट्र से हैं, और इन्हे हिंद युग्म से जोड़ने का श्रेय जाता है, युग्म की बेहद सक्रिय कवयित्री सुनीता यादव को. मानसी इन्हीं की शिष्या थीं कभी, और तभी से सुनीता ने इनके हुनर को परख लिया था. मानसी ने अभी-अभी ही अपनी बारहवीं की पढ़ाई पूरी की है, और अब अपने कैरियर से जुड़ी दिशा की तरफ़ अग्रसर है. संगीत को अपना जनून मानने वाली मानसी, लता जी को अपना रोल मॉडल मानती हैं, तथा आज के दौर के, श्रेया घोषाल और शान इनके सबसे पसंदीदा गायिका/गायक हैं. Zee tv के कार्यक्रम Hero Honda सा रे गा मा पा, के लिए भी मानसी का चुनाव हुआ था,जहाँ हिमेश रेशमिया भी बतौर जज़ मौजूद थे, पर नियति ने शायद पहले ही, उनकी कला को दुनिया तक पहुँचने का माध्यम, हिंद युग्म को चुन लिया था. चित्रकला और टेबल टेनिस का भी शौक रखने वाली मानसी, युग्म को एक शानदार प्लेटफोर्म मानती हैं, नए कलाकारों के लिए. जब हमने उनसे बात की तो वो अपने पहले गीत को मिली आपार सराहना से बेहद खुश नज़र आयीं. "I saw a means of pursuing my passion through Hind Yugm, which is a very good platform for new talent and art" - ये कथन थे मानसी के.

नीचे पेश है, हिंद युग्म की मानसी से हुई बातचीत के कुछ अंश, आप भी मानसी की आवाज़ में ये दमदार गीत "बढ़े चलो" अवश्य सुनें और इस उभरती हुई प्रतिभावान गायिका को अपना स्नेह दे.

हिंद युग्म - मानसी स्वागत है एक बार फ़िर, ये बताइए कि संगीत आपके जीवन में क्या महत्त्व रखता है ?

मानसी - संगीत मेरा जनून है, और ये मेरे जीवन में विशेष स्थान रखता है, मेरा मानना है शब्द जब संगीत में ढल कर आते हैं तो हर व्यक्ति तक अपनी पहुँच बना पाते हैं, संगीत वो कड़ी है जो आपको इश्वर से जोड़ती है.

हिद युग्म - आप zee tv के सा रे गा मा पा शो के लिए भी चुनी गई थीं, उसके बारे में बताइए.

मानसी - मैं २००४ में चुनी गई थी पहले राउंड के लिए मगर १८ वर्ष से कम उम्र होने के कारण प्रतियोगिता का हिस्सा नहीं बन पायी, उसके बाद कभी कोशिश नही की, फ़िर पढ़ाई की तरफ फोकस बदल गया.

हिंद युग्म - क्या आपके अभिभावक आपके इस जनून को बढ़ावा देते हैं ?

मानसी - जी बिल्कुल, ये उनकी प्रेरणा और मार्गदर्शन ही है जो मैं आज यहाँ हूँ, वो मेरे सबसे अच्छे समीक्षक है, जब भी मुझे कुछ गाना होता है, सब से पहले उन्हें ही सुनाती हूँ, ध्यान से सुनकर वो मेरी कमियों को दुरुस्त करते हैं, अगर मैंने कुछ अच्छा गाया है तो ये उन्ही की बदौलत है .

हिंद युग्म - अब आप B Pharma की पढ़ाई करने जा रही हैं, पढ़ाई के साथ-साथ अपने शौक को कैसे प्लान किया है आपने ?

मानसी - अभी तो सारा ध्यान दाखिले और पढ़ाई की तरफ़ ही है, पर संगीत तो हमेशा ही दिनचर्या का हिस्सा रहेगा, मेरी कोशिश रहेगी की इस दौरान अपने रियाज़ के लिए और अधिक समय निकालूं और ख़ुद को इतना काबिल कर लूँ कि किसी भी नए गीत और उन्दा तरीके से निभा पाऊं.

हिंद युग्म - आप हिंद युग्म के लिए एक खोज हैं, हमारे संगीतकार ऋषि एस के साथ काम करना कैसा रहा ?

मानसी - मैं सुनीता मेम की शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने मुझे हिंद युग्म और ऋषि एस से मिलवाया, ऋषि जी के संगीत के एक आत्मा है, वो हर गीत पर बहुत मेहनत करते हैं, और गायक को अपनी बात बड़े अच्छे तरीके से समझाते हैं, वो आपको हमेशा सहज महसूस कराते हैं, उनके साथ काम करना बेहद बढ़िया अनुभव रहा.

हिंद युग्म - "बढे चलो" में आपकी गायकी की बहुत तारीफ हुई है, आप कैसा महसूस कर रही हैं ?

मानसी - मैं बहुत खुश हूँ, साथ ही धन्येवाद देना चाहूंगी ऋषि जी और सजीव जी को, जिन्होंने मुझे इस गीत को गाने का मौका दिया, और अलोक शंकर जी का जिन्होंने बहुत सुंदर लिखा इस गीत को, और अपने तमाम समीक्षकों /श्रोताओं का जिन्होंने अपनी टिप्पणियों से मुझे प्रोत्साहित किया, मेरा सोलो गीत "मैं नदी" भी सब को पसंद आएगा, ऐसी मुझे आशा है.

हिंद युग्म - बहुत बहुत शुक्रिया मानसी, आपके उज्जवल भविष्य के लिए शुभकामनायें, संगीत का जनून बरकरार रहे और आप इसी तरह मधुर गीत गाती रहें, यही हमारी कामना है ...

मानसी - जी शुक्रिया, मैं हर गाने में अपना बेस्ट देने की कोशिश करूंगी, और उम्मीद करती हूँ कि हिंद युग्म परिवार भी मुझे यूँ ही प्रोत्साहित करता रहेगा .


मूल इंटरव्यू ( original interview )

Hind Yugm - Hi Manasi, Welcome once again, first of all tell us, what place music has in your life, how you connect with music?

Manasi - Music is my passion. It is very close to my heart and it holds a very high place in my life. Music has the power to convey every human feeling which words alone cannot do. And I feel that music is a form of worship, too.

Hind Yugm - You also got selected for ZEE TV, sa re ga ma pa, what was that story?

Manasi- I gave the auditions for Sa Re Ga Ma in 2004 and I just got short-listed in the preliminary round when they informed me that I was under-age (below 18) and so could not participate in the competition. So there was no further development in that and I haven’t tried to participate again after that as studies became my priority.

Hind Yugm - Do your parents support your interest?

A patriotic SongManasi - Oh yes, of course. Without their support and guidance I couldn’t have been whatever I am today. They are my biggest and best critics. If I have to perform or sing, they personally hear the song and point out all the mistakes and make me correct them before I give my performance. Their guidance and support is of extreme importance in my life.

Hind Yugm - Now you are going to study B Pharma, what plan you have, to manage your interest of singing in the coming days ?

Manasi - Right now I am concentrating mainly on my admission and studies. But that doesn’t mean I’ll put a full stop to my passion. I would try to train my voice in this period of my studies so that I can sing even better and be prepared to face any sort of challenge, i.e., to be able to sing any song flawlessly and with the same ease. I would try to continue my ‘riyaaz’ so that I stay in touch with music.

Hind Yugm - You are a found to hind yugm ( thanks to sunita yadav ) how was the experience of working with Rishi S. the composer ?

Manasi - Definitely, I myself wish to thank Sunita ma’am for introducing me to Hind Yugm and Rishi S Balaji. It was really a pleasant experience working on these two songs with Rishi Sir. He is an excellent upcoming composer and his music is definitely the soul of his songs. He makes it a point that the singer understands whatever he wants them to sing and is ready to explain it until it is understood. I consider myself very fortunate to have worked with such a talented person.

Hind Yugm - We are looking forward to hear your first solo song “main nadi",”badhe chalo“ is also well received by the audience, how is the feeling?

Manasi - I am feeling elated and at the same time I wish to thank Rishi sir and Sajeev sir for giving me an opportunity to sing these two songs. and Alok Shankar ji for providing such excellent lyrics, I also wish to thank all our critics who have given their precious comments which will help us to eliminate our flaws and present something much better. I only wish to request all of them to always give their support and encouragement. I am myself looking forward to the release of ‘Main Nadi’ and I hope it gets a good response.

Hind Yugm - Thank you very much manasi, and all the best for your future plans.....keep this passion for music, and keep singing such beautiful songs always ...

Manasi - Thanks for everything. I’ll try my best to give my best to each song I sing and I hope my association with Hind Yugm continues…

बिल्कुल मानसी, हम भी यही उम्मीद करेंगे, कि आप युहीं अपनी आवाज़ का जादू अपने हर गीत में बिखेरती रहें, हिंद युग्म कि समस्त टीम की तरफ़ से आपके उज्जवल भविष्य के लिए ढेरों शुभकामनायें.

Friday, February 1, 2008

आवाज़ के वाहक

हिन्द-युग्म ने इंटरनेट की जुगलबंदी से दुनिया भर में फैले युवा संगीतकारों, गीतकारों, गायकों, संगीत आलेखकों, संगीत समीक्षकों और वाचकों इत्यादि को एक मंच पर लाकर खड़ा कर दिया है। संगीत के हर पहलू का युग्म (जोड़) है हमारा यह प्रयास आवाज।

संगीतकार

हिन्द-युग्म ने १७ संगीतकारों की मदद से कुल ३७ गीत तैयार कर लिये हैं। वर्तमान में १५ संगीतकार अलग-अलग गीतों पर काम कर रहे हैं।

14. शिशिर पारखी,
15. कुमार आदित्य विक्रम


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