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सोमवार, 1 दिसंबर 2008

एक चित का चोर जो गायक भी है, गीतकार भी और संगीतकार भी....- रविन्द्र जैन


हमने आपको सुनवाया था येसुदास का गाया रविन्द्र जैन का स्वरबद्ध किया एक अनमोल गीत. चलिए अब बात करते हैं एक बेहद अदभुत संगीत निर्देशक, गीतकार और गायक रंविन्द्र जैन की, जिन्हें फ़िल्म जगत प्यार से दादू के नाम से जानता है. स्वर्गीय के सी डे के बाद वो पहले संगीत सर्जक हैं जिन्होंने चक्षु बाधा पर विजय प्राप्त कर अपनी प्रतिभा को दक्षिण एशिया ही नही, वरन संसार भर में फैले समस्त भारतीय परिवारों तक बेहद सफलता के साथ पहुंचाया. दादू के संगीत में अलीगढ की सामासिक संस्कृति, बंगाल के माधुर्य और हिंदू जैन परम्परा का अदभुत मिश्रण है. २८ फरवरी १९४४ में जन्में रविन्द्र जैन की फिल्मी सफर शुरू हुआ १४ जनवरी १९७२ के दिन जब कोलकत्ता से मुंबई पहुंचे दादू ने फ़िल्म सेण्टर स्टूडियो में अपना पहला गाना रिकॉर्ड किया, गायक थे मोहम्मद रफी साहब. रफी साहब को जब ज्ञात हुआ की दादू अलीगढ से हैं तो उनसे ग़ज़ल सुनाने का आग्रह किया तो दादू ने पेश किया ये कलाम-
गम भी हैं न मुक्कमल, खुशियाँ भी हैं अधूरी,
आंसू भी आ रहे हैं, हंसना भी है जरूरी,
ग़ज़ल का मत्तला सुनते ही रफी साहब ने कहा की देखिये मास्टर जी, देखिये मेरे बाल खड़े हो गए...तब से दादू की हर रिकॉर्डिंग के बाद रफी साहब उसी ग़ज़ल को सुनाने की फरमाईश करते.
आगे बढ़ने से पहले क्यों न रफी साहब का गाया और दादू का स्वरबद्ध किया फ़िल्म "कांच और हीरा" का ये लाजवाब गीत -
"नज़र आती नही मंजिल...."



जिस फ़िल्म के लिए रफी साहब का गाया हुआ पहला गीत रिकॉर्ड किया, वह एक शायर की आत्मकथा थी, बाद में शायर की जगह चोर ने ले ली, और फ़िल्म का नाम हो गया "चोर मचाये शोर". चोर ने कुछ यूँ शोर मचाया की बेचारा शायर यह कहकर खामोश हो गया कि घुंघुरू की तरह बजता ही रहा हूँ मैं. गीत चूँकि सबको बहुत पसंद था तो फ़िल्म में उसकी सिचुएशन न होने पर भी उसे शामिल कर लिया गया. यह किशोर दा का पहला गाना था दादू के निर्देशन में. किशोर दा बड़े बड़े संगीतकारों को दाव दे जाते थे फ़िर रविन्द्र जैन तो एक नए नाम थे. सिप्पी साहब ने बंगाल की दुहाई देते हुए किशोर दा को फ़ोन किया "किशोरदा एक बार गाना सुन तो लो फ़िर निर्णय तुम्हारा है". जिस दिन स्टूडियो बुक था रिकॉर्डिंग के लिए उस दिन दादू का किशोर दा से संपर्क नही हो पा रहा था, तभी अचानक वहां किशोर दा अवतरित हो गए और बिना किसी औपचारिकता के सीधी आज्ञा दी कि "आगे गान सुनाओ". दादू अभी स्टूडियो पहुंचे ही थे, साजिंदों को आना था, गीत को संगीत से सजाना था. पर जैसे तैसे दादू ने किशोर दा को गीत सुनना शुरू किया पहली ही पंक्ति से किशोर दा उसे दोहराने लगे. दादू ने कहा "अभी तो समय लगेगा संगीत की ट्यूनिंग में." तब किशोर दा ने दादू की पीठ ठोंकी और कहा "तुम इत्मीनान से काम करो, मुझे कोई जल्दी नही है" शायद उन्हें भी कुछ ऐसा मिल गया था जिसे गाकर उन्हें बेहद आत्मसंतोष मिलने वाला था. तभी तो उन्होंने फ़ोन कर किसी अन्य संगीतकार की रिकॉर्डिंग कैंसल कर गाया फ़िल्म "चोर मचाये शोर" का वो अमर गीत. सुनते हैं -



किशोर दा ने उनके संगीत निर्देशन में एक और गजब का गीत गाया फ़िल्म "तपस्या" के लिए -"जो राह चुनी तूने, उसी राह पे राही चलते जाना रे". मन्ना डे का भी साथ मिला दादू को जब उन्होंने फ़िल्म सौदागर के लिए "दूर है किनारा" गीत गाया. राजश्री फ़िल्म के साथ उनका गठ बंधन बेहद कामियाब रहा. फ़िल्म सौदागर में लता जी ने गाया "तेरा मेरा साथ रहे..." तो वहीँ इसी फ़िल्म का एक और गीत था जिसे आशा ने बहुत खूबसूरत अंदाज़ में गाया. गीत अपनी आलंकारिक भाषा के लिए प्रसिद्ध हुआ- जिसमें एक शब्द के दो अर्थ थे- "सजना है मुझे सजना के लिए...". क्या हम कल्पना कर सकते हैं किसी और के स्वर में इस गीत की...सुनिए -



फ़िल्म "चोर मचाये शोर", "सौदागर" और "दो जासूस" के बाद दादू का सिक्का संगीत जगत में चल निकला. "चितचोर" के मधुर गीतों ने सब के चित चुरा लिए तो "फकीरा" और "दुल्हन वही जो पिया मन भाये" जैसी फिल्मों के संगीत ने उन्हें खासी ख्याति दी.

फिर दादू को साथ मिला राजकपूर का जिसका जिक्र पढ़िए-सुनिए अगले अंक में।

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