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Saturday, March 5, 2016

"मैं ख़ुश होना चाहूँ, ख़ुश हो ना सकूँ....", इसी गीत से हुई थी पार्श्वगायन की शुरुआत!


एक गीत सौ कहानियाँ - 77
 

'मैं ख़ुश होना चाहूँ, ख़ुश हो ना सकूँ...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।  इसकी 77-वीं कड़ी में आज जानिए हिन्दी सिनेमा के पहले पार्श्वगायन-युक्त गीत के बारे में। यह गीत है 1935 की फ़िल्म ’धूप छाँव’ का, "मैं ख़ुश होना चाहूँ...", जिसे के. सी. डे, पारुल घोष, सुप्रभा सरकार और हरिमति दुआ ने गाया था। बोल पंडित सुदर्शन के और संगीत राय चन्द बोराल का। 


R C Boral, K. C. Dey, Suprova Sarkar
पार्श्वगायन या ’प्लेबैक’ भारतीय सिनेमा का एक बहुत आम पक्ष है। यह सर्वविदित है कि फ़िल्मी गीतों में अभिनेताओं के लिए गायकों की आवाज़ों के प्रयोग को प्लेबैक या पार्श्वगायन कहते हैं। लेकिन आज की पीढ़ी के बहुत से संगीत रसिकों को शायद यह पता ना हो कि किस तरह से इस पार्श्वगायन की शुरुआत हुई थी। कहाँ से यह विचार किसी के मन में आया था? आज ’एक गीत सौ कहानियाँ’ में पार्श्वगायक के शुरुआत की कहानी पहले पार्श्वगायन-युक्त गीत के साथ प्रस्तुत है। भारतीय सिनेमा में पार्श्वगायन की शुरुआत का श्रेय जाता है संगीतकार राय चन्द बोराल को जो उन दिनों न्यू थिएटर्स से जुड़े हुए थे। उन्होंने ही वर्ष 1935 की फ़िल्म ’धूप छाँव’ में एक समूह गीत में पार्श्वगायन का प्रयोग किया था। नितिन बोस निर्देशित यह ऐतिहासिक फ़िल्म दरसल बंगला में इसी वर्ष निर्मित ’भाग्य चक्र’ फ़िल्म का रीमेक था। इस तरह से भले ’धूप छाँव’ को प्लेबैक-युक्त पहली हिन्दी फ़िल्म मानी जाती है, पर ’भाग्य चक्र’ इस दिशा में पहली भारतीय फ़िल्म थी। ’धूप छाँव’ फ़िल्म के लोकप्रिय गीतों में "अंधे की लाठी तू ही है...", "बाबा मन की आँखें खोल...", "तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफ़िर जाग ज़रा..." और "प्रेम की नैया चली जल में..." शामिल हैं। पर जिस गीत ने पार्श्वगायन की नीव रखी वह था "मैं ख़ुश होना चाहूँ, ख़ुश हो ना सकूँ..." जिसे चार गायक-गायिकाओं ने गाया था - के. सी. डे (मन्ना डे के चाचा), पारुल घोष (अनिल बिस्वास की बहन), सुप्रभा सरकार (उस समय शान्तिनिकेतन की छात्रा) और हरिमति दुआ। इस गीत में नायिका के लिए पार्श्वगायन किया था सुप्रभा सरकार ने, जबकि के. सी. डे ने अपने लिए और अभिनेता अहि सान्याल के लिए गाया था। पारुल और हरिमति ने अपने-अपने लिए गाए। इस तरह से के. सी. डे और सुप्रभा सरकार बने पहले पार्श्वगायक व पहली पार्श्वगायिका।


Nitin Bose & Pankaj Mullick
पंकज राग लिखित महत्वपूर्ण पुस्तक ’धुनों की यात्रा’ में यह बताया गया है कि किस तरह से निर्देशक नितिन बोस के मन में पार्श्वगायन का ख़याल आया था। हुआ यूं कि एक दिन नितिन बोस संगीतकार/गायक पंकज मल्लिक के घर के बाहर अपनी गाड़ी में बैठे-बैठे मल्लिक बाबू का इन्तज़ार कर रहे थे। दोनों को साथ में स्टुडियो जाना था। वो गाड़ी में बैठे हुए हॉर्ण बजा कर पंकज मल्लिक को बुलाए जा रहे थे पर मल्लिक बाबू के कानों में जूं तक नहीं रेंगी क्योंकि वो उस समय अपने एक पसन्दीदा अंग्रेज़ी गीत को ग्रामोफ़ोन प्लेयर पर बजा कर उसके साथ-साथ ज़ोर ज़ोर से गाते जा रहे थे। कुछ समय बाद गीत ख़त्म होने पर जब पंकज मल्लिक ने हॉर्ण की आवाज़ सुनी और भाग कर बाहर गाड़ी में पहुँचे तो गुस्से से तिलमिलाए हुए नितिन बोस ने उनसे इस देरी की वजह पूछी। पूरी बात सुनने पर नितिन बोस के मन यह बात घर कर गई कि पंकज मल्लिक किसी गीत के "साथ-साथ" गा रहे थे। उन्हें यह विचार आया कि क्यों न अभिनेता सिर्फ़ होंठ हिलाए और पीछे से कोई अच्छा गायक गीत को गाए? उस दौरान बन रही बंगला फ़िल्म ’भाग्य चक्र’ के संगीतकार बोराल बाबू को जब उन्होंने यह बात बताई तो बोराल बाबू ने बहुत ही दक्षता के साथ इसको अंजाम दिया, न केवल ’भाग्य चक्र’ में, बल्कि ’धूप छाँव’ में भी। इसमें ध्वनि-मुद्रक (sound recordist) मुकुल बोस (नितिन बोस के भाई) का भी उल्लेखनीय योगदान था। इस तरह से पार्श्वगायन की शुरुआत के लिए केवल राय चन्द बोराल को ही नहीं, बल्कि नितिन बोस, पंकज मल्लिक और मुकुल बोस को भी श्रेय जाता है।



अब सवाल यह है कि पार्श्वगायन की शुरुआत के लिए इसी गीत को क्यों चुना गया? भारतीय सिनेमा के 100 वर्ष पूर्ति पर फ़िल्म इतिहासकार विजय बालाकृष्णन ने एक साक्षात्कार में बताया था कि इस फ़िल्म में एक लम्बा ’स्टेज सीन’ फ़िल्माया जाना था जो एक गीत था। उस ज़माने में किसी एक सीन को एक ही कैमरे से और एक ही शॉट में फ़िल्माया जाता था। इसलिए इस गीत के लिए यह मुश्किल आन पड़ी कि एक तो बहुत लम्बा सीन है, उस पर गीत है। अलग अलग शॉट में फ़िल्माने का मतलब होगा कि अभिनेताओं को यह गीत छोटे-छोटे टुकड़ों में गाना पड़ेगा जिसका असर गीत के प्रवाह में पड़ेगा। इसका एक ही उपाय था कि गाने को पहले रेकॉर्ड कर लिया जाए और फ़िल्मांकन अलग अलग सीन के रूप में हो। तो जब पंकज मल्लिक वाली घटना से नितिन बोस के मन में प्लेबैक का ख़याल आया तब उन्होंने इसका प्रयोग इसी गीत में करने का फ़ैसला किया। हरमन्दिर सिंह ’हमराज़’ द्वारा संकलित ’हिन्दी फ़िल्म गीत कोश’ के अनुसार प्रस्तुत गीत से पार्श्वगायन की शुरुआत हुई थी। इस गीत को एक ड्रामा कंपनी के स्टेज परफ़ॉरमैन्स गीत के रूप में फ़िल्माया गया था। गीत कोश में इसे फ़िल्म के तीसरे गीत के रूप में चिन्हित किया गया था। यह भी उल्लेखनीय तथ्य है कि इस फ़िल्म के गीत क्रमांक-4 "आज मेरो घर मोहन आयो..." का एक भाग इस "मैं ख़ुश होना चाहूँ..." के साथ ही जुड़ा हुआ है जो अहि सान्याल की आवाज़ में है। बाद में गीत क्रमांक-4 को पूर्णत: फ़िल्माया गया है के. सी. डे व अन्य कलाकारों की आवाज़ों में। इस तरह से "मैं ख़ुश होना चाहूँ..." दरअसल दो गीतों का संगम है। 

फिल्म - धूप-छांव : "मैं खुश होना चाहूँ..." : के.सी. डे, पारुल घोष, सुप्रभा सरकार और हरिमति दुआ



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Thursday, May 23, 2013

‘कारवाँ सिने संगीत का’


भारतीय सिनेमा के सौ साल – 45

कारवाँ सिने-संगीत का

फिल्मों में पार्श्वगायन की शुरुआत : ‘मैं ख़ुश होना चाहूँ, हो न सकूँ...’



 
भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘कारवाँ सिने संगीत का’ में आप सभी सिनेमा-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का दूसरा गुरुवार है और इस दिन हम ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ स्तम्भ के अन्तर्गत ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सदस्य सुजॉय चटर्जी की प्रकाशित पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ से किसी रोचक प्रसंग का उल्लेख करते हैं। आज के अंक में सुजॉय जी 1935 की फिल्मों में संगीत की स्थिति पर चर्चा आरम्भ कर रहे हैं। 



के. सी. डे
1935 वर्ष को हिंदी सिने-संगीत के इतिहास का एक स्मरणीय वर्ष माना जाएगा। संगीतकार रायचंद बोराल ने, अपने सहायक और संगीतकार पंकज मल्लिक के साथ मिलकर ‘न्यू थिएटर्स’ में प्लेबैक पद्धति, अर्थात पार्श्वगायन की शुरुआत की। पर्दे के बाहर रेकॉर्ड कर बाद में पर्दे पर फ़िल्माया गया पहला गीत था फ़िल्म ‘धूप छाँव’ का, और वह गीत था के. सी. डे का गाया “तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफ़िर जाग ज़रा”। इसी फ़िल्म का अन्य गीत “मन की आँखें खोल बाबा” भी के. सी. डे के गाये लोकप्रिय गीतों में से एक है। इन गीतों से पार्श्वगायन की शुरुआत ज़रूर हुई, पर सही मायने में इन्हें प्लेबैक्ड गीत नहीं कहा जा सकता क्योंकि के. सी. डे के गाये इन गीतों को उन्हीं पर फ़िल्माया गया था। इन गीतों को सुन कर साफ़ महसूस होता है कि इससे पहले के गीतों से इन प्री-रेकॉर्डेड गीतों के स्तर में कितना अंतर है। इस फ़िल्म में सहगल का गाया “अंधे की लाठी तू ही है” और उमा शशि का गाया “प्रेम कहानी सखी सुनत सुहाये चोर चुराये माल” तथा पहाड़ी सान्याल व उमा शशि का गाया युगल गीत “मोरी प्रेम की नैया चली जल में” भी फ़िल्म के चर्चित गाने थे। ‘धूप छाँव’ के गीतकार थे पंडित सुदर्शन। प्लेबैक तकनीक के आने के बाद भी कई वर्षों तक बहुत से अभिनेता गीत गाते रहे, फिर धीरे धीरे अभिनेता और गायक की अलग लग श्रेणी बन गई। आइए, अब हम आपको फिल्म ‘धूप छाँव’ का गीत- “तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफ़िर जाग ज़रा...” सुनवाते हैं। यह गीत के.सी. डे का गाया और उन्हीं पर फिल्माया गया था।


फिल्म धूप छाँव : ‘तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफिर जाग जरा...’ : के.सी. डे


पारुल घोष
‘धूप छाँव’ में ही पारुल घोष, सुप्रभा सरकार और हरिमति का गाया एक गीत था “मैं ख़ुश होना चाहूँ, हो न सकूँ”, जो सही अर्थ में पहला प्लेबैक गीत था। इस तरह से इन तीन गायिकाओं को फ़िल्म-संगीत की प्रथम पार्श्वगायिकाएँ होने का गौरव प्राप्त है। हरमन्दिर सिंह ‘हमराज़’ को दिए एक साक्षात्कार में सुप्रभा सरकार ने पार्श्वगायन की शुरुआत से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए बताया था – “उन्होंने (सुप्रभा सरकार ने) बताया कि फ़िल्मों में उनका प्रवेश 13 वर्ष की आयु में तत्कालीन अभिनेत्री लीला देसाई के भाई के प्रयत्नों से हुआ था। सन्‍ 1935 में जब ‘न्यू थिएटर्स’ द्वारा ‘जीवन मरण’ (बंगला) तथा ‘दुश्मन’ (हिन्दी) का निर्माण शुरु हुआ तब पार्श्वगायन पद्धति का प्रथम उपयोग इसी फ़िल्म में किया जाना था परन्तु फ़िल्म की शूटिंग्‍ के समय, एक दृश्य में पेड़ से नीचे कूदते समय नायिका लीला देसाई की टाँग टूट गई और फ़िल्म का निर्माण रुक गया। इसी बीच फ़िल्म ‘धूप छाँव’ का निर्माण शुरु हुआ। निर्देशक नितिन बोस ने पहले तो सुप्रभा जे की आवाज़ को नामंज़ूर ही कर दिया था, लेकिन एक समूह गीत में सुप्रभा, हरिमती और पारुल घोष की आवाज़ों में रेकॉर्ड किया गया जो कि बाद में प्रथम पार्श्व गीत के रूप में जाना गया।” उधर पंकज मल्लिक ने भी अपनी आत्मकथा में पार्श्वगायन की शुरुआत का दिल्चस्प वर्णन किया है। पंकज राग लिखित किताब ‘धुनों की यात्रा’ से प्राप्त जानकारी के अनुसार – “नितिन बोस स्टुडिओ जाते समय अपनी कार से पंकज मल्लिक के घर से उन्हें लेते हुए जाते थे। एक दिन उनके घर के सामने कई बार हार्न देने पर भी पंकज मल्लिक नहीं मिकले, और काफ़ी देर बाद अपने पिता के बताने पर कि नितिन बोस उनकी बाहर कार में प्रतीक्षा कर रहे हैं, वे हड़बड़ाते हुए बाहर आए और देरी का कारण बताते हुए कहा कि वे अपने मनपसंद अंग्रेज़ी गानों का रेकॉर्ड सुनते हुए गा रहे थे, इसी कारण हॉर्न की आवाज़ नहीं सुन सके। इसी बात पर नितिन बोस को विचार आया कि क्यों न इसी प्रकार पार्श्वगायन लाया जाए। उन्होंने बोराल से चर्चा की और अपने पूरे कौशल के साथ बोराल ने इस विचार को साकार करते हुए इसे ‘धूप छाँव’ में आज़माया।” अब हम आपको फिल्म ‘धूप छाँव’ का वह गीत सुनवाते हैं, जिसे भारतीय सिनेमा का पहला पार्श्वगीत माना गया।


फिल्म धूप छाँव : ‘मैं ख़ुश होना चाहूँ, हो न सकूँ...’ : पारुल घोष, सुप्रभा सरकार और हरिमति


पारुल घोष सुप्रसिद्ध बांसुरीनवाज़ पंडित पन्नालाल घोष की बहन थीं। पारुल घोष की परपोती श्रुति मुर्देश्वर कार्तिक से की हुई मेरी बातचीत में अपनी ‘दीदा’ (बांगला में नानी को दीदा कहते हैं) को याद करते हुए श्रुति ने कहा, “मैं पारुल दीदा की परपोती हूँ। वो मेरे पिताजी की माँ सुधा मुर्देश्वर जी की माँ थीं। मुझे बहुत बहुत गर्व महसूस होता है यह सोचकर कि मैं उनकी परपोती हूँ। मैं हमेशा सोचती हूँ कि काश मैं उनसे मिल पाती। मेरे पिता पंडित आनंद मुर्देश्वर और दादा पंडित देवेन्द्र मुर्देश्वर ने दीदा के बारे में बहुत कुछ बताया है और मेरे पिता जी ने तो मुझे उनके कई गाये हुए गीतों को सिखाया भी है, जो दीदा ने उन्हें उनके बचपन में सिखाया था। मैं उन गीतों के बारे में बहुत जज़्बाती हूँ और वो सब गीत मेरे दिल के बहुत बहुत करीब हैं। मुझे अफ़सोस है कि मैं दीदा से नहीं मिल सकी। काश कि मैं कुछ वर्ष पूर्व जन्म लेती! उनकी लम्बी बीमारी के बाद 13 अगस्त 1977 को बम्बई में निधन हो गया। जैसा कि मैंने बताया कि दादाजी, पिताजी और तमाम रिश्तेदारों से मैंने पारुल दीदा के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। हमेशा से ही उनकी एक बहुत ही सुंदर तस्वीर मेरे दिल में रही है। एक सुंदर बंगाली चेहरा और एक दिव्य आवाज़ की मालकिन। जब मैं छोटी थी, तब मेरे पिताजी हमेशा कहते थे कि मेरी आवाज़ कुछ कुछ उन्हीं के जैसी है, और मैं यह बात सुन कर ख़ुश हो जाया करती थी। लेकिन अब मैं मानती हूँ कि दीदा के साथ मेरा कोई मुकाबला ही नहीं। वो स्वयं भगवान थीं।”

‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भ ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के अन्तर्गत आज हमने सुजॉय चटर्जी की इसी शीर्षक से प्रकाशित पुस्तक के कुछ पृष्ठ उद्धरित किये हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के आगामी अंक में आपके लिए हम इस पुस्तक के कुछ और रोचक पृष्ठ लेकर उपस्थित होंगे। सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ प्राप्त करने के लिए तथा अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव के लिए radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेजें।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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