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शुक्रवार, 24 अक्तूबर 2008

तेरा दीवाना हूँ...मेरा ऐतबार कर...

दूसरे सत्र के सत्रहवें गीत का विश्वव्यापी उदघाटन आज -

अपनी पहली ग़ज़ल "सच बोलता है..." गाकर रफ़ीक शेख ने ग़ज़ल गायन में अपनी पकड़ साबित की थी. आज वो लेकर आए हैं एक ताज़ी नज़्म -"आखिरी बार बस...". यह नज़्म रफ़ीक साहब की आवाज़ का एक नया अंदाज़ लिए हुए है, उनकी अब तक की तमाम ग़ज़लों से अलग इस नज़्म की नज़ाकत को उन्होंने बहुत बखूबी से निभाया है.रफ़ीक साहब की एक और खासियत ये है कि वो हमेशा नए शायरों की रचनाओं को अपनी आवाज़ में सजाते हैं. इस तरह वो हमारे मिशन में मददगार ही साबित हो रहे हैं. उनकी पिछली ग़ज़ल के शायर अज़ीम नवाज़ राही भी किसी ऐसे स्थान पर रहते हैं जहाँ इन्टरनेट आदि की सुविधा उपलब्ध नहीं है, यही कारण है कि हमें अब तक उनकी तस्वीर और अन्य जानकारियाँ उपलब्ध नहीं हो पायी हैं. लेकिन इस बार के रचनाकार मोइन नज़र के विषय में हमारे बहुत से श्रोता पहले से ही परिचित होंगे। मोइन नज़र वही शायर हैं जिनका कलाम 'इतना टूटा हूँ कि छूने से बिखर जाऊँगा, अब अगर और दुआ दोगे तो मर जाऊँगा' गाकर ग़ज़ल गायक गुलाम अली ने दुनिया में अपना परचम फहराया। मोइन नज़र साहब रेलवे में चाकरी करते हैं और फिलहाल मुम्बईवासी हैं। कहते हैं फनकार का काम बोलता है, तो आप भी सुनिए मोईन साहब ने क्या खूब बोल लिखे हैं यहाँ. अपने विचार देकर रफ़ीक शेख और नये शायर मोईन नज़र की हौसलाफजाई अवश्य करें.

नज़्म को सुनने के लिए प्लेयर पर क्लिक करें-



Here comes song no.17 for the season 2. "Akhiri baar bas..." is composed and rendered by Rafique Sheikh, and penned by a new writer Moin Nazar. This sad romantic nazm will surely touch your heart, so hear it and share your thoughts about it. Your valuable comments will help us to improvise.

To listen,please click on the player below -



बोल - Lyrics

आखिरी बार बस, तेरा दीदार कर,
मैं चला जाऊँगा, छोड़कर ये शहर,

अपनी चिलमन से बाहर निकल के ज़रा,
दुनिया वालों से छुप के संभल के ज़रा,
दो कदम आ मेरी सिम्त चल के ज़रा,
बैठ पहलु में मेरे, तू मचल के ज़रा,
तेरा दीवाना हूँ, तेरा दीवाना हूँ,
मेरा ऐतबार कर .....

तेरे जलवे चुरा लूँ, इन निगाहों में आ,
मैं तेरे हुस्न को, भर लूँ बाहों में आ,
साए में ताज के, चांदनी रात में,
दुधिया जिस्म को ले पनाहों में आ,
देख लूँ मैं तुझे, देख लूँ मैं तुझे,
आज भर के नज़र....

फ़िर उसके बाद मुलाकात न होगी शायद,
धड़कते दो दिलों में बात न होगी शायद,
जमीन प्यार की बंज़र मेरे हो जायेगी,
बरसों इन आँखों से बरसात न होगी शायद,
साथ मेरे तू चल, साथ मेरे तू चल,
ये सनम बाम पर...

SONG # 17, SEASON # 02, "AKHIRI BAAR BAS..." OPENED ON 24/10/2008 ON AWAAZ, HIND YUGM.
Music @ Hind Yugm, Where music is a passion

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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