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Friday, March 6, 2009

गुडिया हमसे रूठी रहोगी...कब तक न हंसोगी...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 15

दोस्तों, कभी आप ने किसी रूठे हुए बच्चे को मनाया है? बच्चे जितनी जल्दी रूठ जाते हैं उतनी ही जल्दी उन्हे मना भी सकते हैं. मन के बहुत ही सच्चे होते हैं यह मासूम बच्चे. निदा फाजली ने ठीक ही कहा है कि "घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए". जी हाँ, रोते हुए बच्चे को हंसाना किसी इबादत से कम नहीं. आज 'ओल्ड इस गोल्ड' के लिए हमने एक ऐसा ही गीत चुना है जिसमें एक छोटी सी नन्ही सी गुडिया को हंसाने की कोशिश की जा रही है.

सन 1964 में एक फिल्म आई थी दोस्ती.सत्यन बोस ने इस फिल्म का निर्देशन किया था और सुधीर कुमार और सुशील कुमार ने इस फिल्म में दो अपाहिज किरदार निभाए थे जो एक दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त भी थे. संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी और गायक मोहम्मद रफ़ी को इस फिल्म के लिए फिल्म फेयर अवॉर्ड्स से सम्मानित किया गया था. रफ़ी साहब ने इस फिल्म में कुछ ऐसे गीत गाए हैं जो कालजयी बनकर रह गये हैं. "चाहूँगा मैं तुझे सांझ सवेरे", "जानेवालों ज़रा मुड्के देखो मुझे", "मेरी दोस्ती मेरा प्यार", "मेरा तो जो भी क़दम है वो तेरी राह में है", और "राही मनवा दुख की चिंता क्यूँ सताती है" जैसे गाने आज भी कहीं ना कहीं से सुनने को मिल जाते हैं. लेकिन इस फिल्म में लता मंगेशकर ने भी एक गीत गाया था जिसे आज हम इस श्रृंखला में शामिल कर रहे हैं. राग पहाड़ी पर आधारित यह प्यारा सा गीत "गुडिया हमसे रूठी रहोगी" सुनकर आपके चेहरे पर भी खुशी की किरण लहरा जाएगी ऐसा हम उम्मीद करते हैं. इस गाने को सुनते हुए आप में से कुछ लोगों को शायद "मिलन" फिल्म का वो गीत भी याद आ जाए "गुज़र जाए सुख से तेरी दुख भरी रतिया", भाई मुझे तो इन दोनो गीतों की धुनों में थोड़ी बहुत समानता महसूस होती है. तो लीजिए आप भी सुनिए और अगर आप के घर में छोटी सी नन्ही सी गुडिया रानी है तो अगली बार जब वो रूठ जाए तो इसी गाने से उसे मनाईएगा.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. पी एल संतोषी के बोल और सी रामचंद्र का संगीत.
२. सारंगी वादक पंडित राम नारायण का नाम जुडा है इस गीत से.
३. लता की मधुर आवाज़ है इस दर्द भरे गीत में.

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
मनु जी ने लडखडाते हुए ही सही पर जवाब दिया. उज्जवल ने भी हामी भरी. जी हाँ जवाब सही है...बधाई.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, November 26, 2008

षड़ज ने पायो ये वरदान - एक दुर्लभ गीत


येसू दा का जिक्र जारी है, सलिल दा के लिए वो "आनंद महल" के गीत गा रहे थे, उन्हीं दिनों रविन्द्र जैन साहब भी अभिनेता अमोल पालेकर के लिए एक नए स्वर की तलाश में थे. जब उन्होंने येसू दा की आवाज़ सुनी तो लगा कि यही एक भारतीय आम आदमी की सच्ची आवाज़ है, दादा(रविन्द्र जैन) ने बासु चटर्जी जो कि फ़िल्म "चितचोर" के निर्देशक थे, को जब ये आवाज़ सुनाई तो दोनों इस बात पर सहमत हुए कि यही वो दिव्य आवाज़ है जिसकी उन्हें अपनी फ़िल्म के लिए तलाश थी. उसके बाद जो हुआ वो इतिहास बना. चितचोर के अविस्मरणीय गीतों को गाकर येसू दा ने राष्टीय पुरस्कार जीता और उसके बाद दादा और येसू दा की जुगलबंदी ने खूब जम कर काम किया.

वो सही मायनों में संगीत का सुनहरा दौर था. जब पूरे पूरे ओर्केस्ट्रा के साथ हर गीत के लिए जम कर रिहर्सल हुआ करती थी, जहाँ फ़िल्म के निर्देशक भी मौजूद होते थे और गायक अपने हर गीत में जैसे अपना सब कुछ दे देता था. येसू दा और रविन्द्र दादा के बहाने हम एक ऐसे ही गीत के बनने की कहानी आज आपको सुना रहे हैं. येसू दा की माने तो ये उनका हिन्दी में गाया हुआ सबसे बहतरीन गीत है. पर दुखद ये है कि न तो ये फ़िल्म कभी बनी न ही इसके गीत कभी चर्चा में आए.

राजश्री वाले एक फ़िल्म बनाना चाहते थे संगीत सम्राट तानसेन के जीवन पर आधारित, चूँकि पुरानी तानसेन काफी समय पहले बनी थी राजश्री ७०-८० के दशक के दर्शकों के लिए तानसेन को फ़िर से जिन्दा करना चाहते थे और उनके पास "तुरुप का इक्का" संगीतकार रविन्द्र जैन भी थे, तो काम असंभव नही दिखता था. बहरहाल काम शुरू हुआ. रविन्द्र जी ने गीत बनाया "षड़ज ने पायो ये वरदान" और सबसे पहले रफी साहब से स्वर देने का आग्रह किया. रफी साहब उन दिनों अपने चरम पर थे, तो हो सकता है बात समय के अभाव की रही हो पर उन्होंने दादा से बस यही कहा "रवि जी,मोहमद रफी इस जीवन काल में तो कम से कम ये गीत नही गा पायेगा...". दादा आज भी मानते हैं कि ये उनका बड़प्पन था जो उन्होंने ऐसा कहा. हेमंत दा से भी बात की गई पर काम कुछ ऐसा मुश्किल था कि हेमंत दा भी पीछे हट गए, यह कहकर कि इस गीत को गाने के बारे में सोचकर ही मैं तनावग्रस्त हो जाता हूँ. तब जाकर दादा ने येसू दा से इसे गाने के लिए कहा. दोनों महान कलकारों ने पूरे दो दिन यानी कुल ४८ घंटें बिना रुके, बिना भोजन खाए और बिना पानी का एक घूँट पिये काम करते हुए गीत की रिकॉर्डिंग पूरी की. ५९ वीं बार के "टेक" में जाकर गीत "ओके" हुआ. सुनने में असंभव सी लगती है बात, पर सच्चे कलाकारों का समर्पण कुछ ऐसा ही होता है.

फ़िल्म क्यों नही बनी और इसके गीत क्यों बाज़ार में नही आए इन कारणों के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नही है, पर येसू दा अपने हर कंसर्ट में इस गीत का जिक्र अवश्य करते हैं, १९८६ में दुबई में हुए एक कार्यक्रम में उन्होंने इसे गाया भी जिस की रिकॉर्डिंग आज हम आपके लिए लेकर आए हैं....हमारे सुधि श्रोताओं के नाम येसू दा और रविन्द्र जैन "दादा" का का ये नायाब शाहकार -




दादा इन दिनों वेद् और उपनिषद के अनमोल बोलों को धुन में पिरोने का काम कर रहे हैं. और वो इस कोशिश में येसू दा को नए रूप में आज के पीढी के सामने रखेंगें. संगीत के कद्रदानों के लिए इससे बेहतर तोहफा भला क्या होगा. सोमवार को हम लौटेंगे और बात करेंगे रविन्द्र जैन साहब के बारे में, विस्तार से. बने रहिये आवाज़ पर.

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