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Sunday, September 14, 2014

‘कौन गली गयो श्याम...’ : SWARGOSHTHI – 185 : THUMARI KHAMAJ & PAHADI



स्वरगोष्ठी – 185 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 4 : ठुमरी खमाज और पहाड़ी


डॉ. प्रभा अत्रे को जन्मदिवस पर शुभकामना देते हुए सुनिए श्रृंगार और भक्तिरस से अभिमंत्रित ठुमरी 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ की चौथी कड़ी में कृष्णमोहन मिश्र और संज्ञा टण्डन की ओर से आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन है। यह पूर्व में प्रकाशित / प्रसारित श्रृंखला का परिमार्जित रूप है। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के कुछ स्तम्भ केवल श्रव्य माध्यम से प्रस्तुत किये जाते हैं तो कुछ स्तम्भ आलेख और चित्र दृश्य के साथ गीत-संगीत श्रव्य माध्यम से तो कुछ स्तम्भ पूर्णतः केवल श्रव्य माध्यम से प्रस्तुत किये जाते हैं। इस श्रृंखला से हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। श्रृंखला के अंकों को हम प्रायोगिक रूप से दोनों माध्यमों में प्रस्तुत कर रहे हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की प्रमुख सहयोगी संज्ञा टण्डन की आवाज़ में पूरा आलेख और गीत-संगीत श्रव्य माध्यम से भी प्रस्तुत किया जा रहा है। हमारे इस प्रयोग पर आप अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजिएगा। आज के अंक में हम प्रस्तुत करने जा रहे हैं, खमाज की एक बेहद लोकप्रिय ठुमरी- ‘कौन गली गयो श्याम...’। इस ठुमरी को कई गायक-गायिकाओं ने गाया है। इनमें विदुषी रसूलन बाई, डॉ. प्रभा अत्रे, पण्डित छन्नूलाल मिश्र, विदुषी परवीन सुलताना आदि की प्रस्तुतियाँ रेखांकित की जा सकती है। आज हम आपको पहले यह पारम्परिक ठुमरी डॉ. प्रभा अत्रे के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। इसके बाद यही ठुमरी बेगम परवीन सुलताना की आवाज़ में सुनवाएँगे, जिसे उन्होने फिल्म ‘पाकीज़ा’ के लिए गाया था।



पिछले छह दशक की अवधि में भारतीय संगीत जगत की किसी ऐसी कलासाधिका का नाम लेना हो, जिन्होने संगीत-चिन्तन, मंच-प्रस्तुतीकरण, शिक्षण, पुस्तक-लेखन, शोध आदि सभी क्षेत्रों में पूरी दक्षता के साथ संगीत के शिखर को स्पर्श किया है, तो वह एक नाम विदुषी (डॉ.) प्रभा अत्रे का ही है। वर्तमान में प्रभा जी ऐसी महिला कलासाधिका हैं, जो किराना घराने की गायकी का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। कल ही उनका 83वाँ जन्मदिवस बीता है। 'रेडियो प्लेबैक इंडिया' परिवार इस अवसर पर उन्हें शताधिक शुभकामनाएँ अर्पित करता है। गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत प्रभा जी को किराना घराने के विद्वान सुरेशबाबू माने और विदुषी (पद्मभूषण) हीराबाई बरोडकर से संगीत-शिक्षा मिली। कठिन साधना के बल पर उन्होने खयाल, तराना, ठुमरी, दादरा, गजल, भजन आदि शैलियों के गायन में दक्षता प्राप्त की। डॉ. अत्रे को प्रत्यक्ष सुनना एक दिव्य अनुभूति देता है। उनकी गायकी में राग और रचना के साहित्य की स्पष्ट भवाभिव्यक्ति उपस्थित होती है। स्पष्ट शब्दोच्चार और संगीत के विविध अलंकारों से सुसज्जित रचना उनके कण्ठ पर आते ही हर वर्ग के श्रोताओं मुग्ध कर देती है। मूलतः खयाल गायिका के रूप में विख्यात प्रभा अत्रे ठुमरी गायन में समान रूप से दक्ष हैं। राग मिश्र खमाज, दीपचंदी ताल में गायी गई ठुमरी- ‘कौन गली गयो श्याम...’ अनेक संगीत समारोहों में अनुरोध के साथ सुनी जाती रही है। लीजिए, आप भी इस ठुमरी की रसानुभूति कीजिए। तबला संगति नारायण राव इन्दोरकर ने की है।


ठुमरी - मिश्र खमाज : ‘कौन गली गयो श्याम...’ : विदुषी (डॉ.) प्रभा अत्रे




अब हम आज की ठुमरी ‘कौन गली गयो श्याम...’ के फिल्मी प्रयोग पर थोड़ी चर्चा करेंगे। फिल्म और फिल्म संगीत के इतिहास में दो दशकों का प्रतिनिधित्व करने वाली फिल्म ‘पाकीज़ा’ है। 60 के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में फिल्म ‘पाकीजा’ के निर्माण की योजना बनी थी। फिल्म की निर्माण प्रक्रिया में इतना अधिक समय लग गया कि दो संगीतकारों को फिल्म का संगीत तैयार करना पड़ा। 1972 में प्रदर्शित इस फिल्म के संगीत के लिए संगीतकार गुलाम मोहम्मद ने शास्त्रीय रागों का आधार लेकर एक से एक गीतों की रचना की थी। गुलाम मोहम्मद ने इस फिल्म के अधिकतर गीत अपने जीवनकाल में ही रिकार्ड करा लिये थे। इसी दौरान वे ह्रदय रोग से पीड़ित हो गए थे। अन्ततः 17 मार्च, 1968 को उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद फिल्म का पृष्ठभूमि संगीत और तीन ठुमरियाँ- परवीन सुल्ताना, राजकुमारी और वाणी जयराम कि आवाज़ में संगीतकार नौशाद ने रिकार्ड किया। अन्ततः यह महत्वाकांक्षी फिल्म गुलाम मोहम्मद के निधन के लगभग चार वर्ष बाद प्रदर्शित हुई थी। संगीत इस फिल्म का सर्वाधिक आकर्षक पक्ष सिद्ध हुआ, किन्तु इसके सर्जक इस सफलता को देखने के लिए प्रदर्शन के दौरान हमारे बीच नहीं थे। आइए, फिल्म ‘पाकीज़ा’ में नौशाद द्वारा शामिल की गई वह पारम्परिक ठुमरी सुनवाते हैं, जिसे सुप्रसिद्ध गायिका परवीन सुलताना ने राग पहाड़ी का स्वर दिया है। विदुषी परवीन सुलताना ने तीनों सप्तकों में फिरने वाले स्वरो में इस ठुमरी को एक अलग रंग दिया है। आप इस ठुमरी का रसास्वादन कीजिए।


राग – पहाड़ी : फिल्म – पाकीज़ा : ‘कौन गली गयो श्याम...’ : विदुषी परवीन सुलताना : संगीत – नौशाद




अब हम आज के इस आलेख और गीतों के समन्वित रूप को श्रव्य माध्यम में प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे संज्ञा टण्डन ने अपनी भावपूर्ण आवाज़ से सुसज्जित किया है। आप इस प्रस्तुति का रसास्वादन कीजिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


ठुमरी खमाज और पहाड़ी : ‘कौन गली गयो श्याम...’ : फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 4 : वाचक स्वर – संज्ञा टण्डन




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 185वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको देश के सुविख्यात गायक की आवाज़ में एक ठुमरी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 190वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – कण्ठ संगीत की इस रचना के अंश को सुन कर बताइए कि यह किस राग में निबद्ध है?

2 – क्या आप गायक की आवाज़ को पहचान रहे है? यदि हाँ, तो हमें गायक का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 187वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 183वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक मन्ना डे की आवाज़ में एक पारम्परिक ठुमरी के फिल्मी संस्करण का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक मन्ना डे। इस अंक की पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चण्डीगढ़ के हरकीरत सिंह, और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात




मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी प्रयोग पर चर्चा कर रहे हैं। इस लघु श्रृंखला में हम एक नया प्रयोग भी कर रहे हैं। आपको ‘स्वरगोष्ठी’ का यह स्वरूप कैसा लगा? हमें अवश्य बताइएगा। आप भी यदि भारतीय संगीत के किसी विषय में कोई जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पर भेज दें। अपने पाठको/श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित/प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।



वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Sunday, June 15, 2014

हेमन्त कुमार : शास्त्रीय, लोक और रवीन्द्र संगीत के अनूठे शिल्पी



स्वरगोष्ठी – 172 में आज

व्यक्तित्व – 2 : हेमन्त कुमार मुखोपाध्याय उपाख्य हेमन्त मुखर्जी

‘जाग दर्द-ए-इश्क जाग, दिल को बेकरार कर..’






‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ की दूसरी कड़ी में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, जारी लघु श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ में हम आपसे संगीत के कुछ ऐसे साधकों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं जिन्होंने मंच अथवा विभिन्न प्रसारण माध्यमों पर प्रदर्शन से इतर संगीत के प्रचार, प्रसार, शिक्षा, संरक्षण या अभिलेखीकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान किया है। इस श्रृंखला में हम फिल्मों के ऐसे संगीतकारों की भी चर्चा करेंगे जिन्होंने लीक से हट कर कार्य किया। हमारी आज की कड़ी के व्यक्तित्व हैं, बांग्ला और हिन्दी फिल्म के यशस्वी गायक और संगीतकार, हेमन्त कुमार मुखोपाध्याय जिन्हें हिन्दी फिल्मों के क्षेत्र में हम हेमन्त कुमार के नाम से जानते और याद करते है। बांग्ला और हिन्दी फिल्म संगीत जगत पर पूरे 45 वर्षों तक छाए रहने वाले हेमन्त कुमार ने अपने राग आधारित संगीत, लोक और रवीन्द्र संगीत की रचनाओं से फिल्म संगीत को समृद्ध किया। आज के अंक में हम उनके शास्त्रीय राग आधारित रचनाओं के सन्दर्भ में उनकी गायक और संगीतकार की भूमिका को रेखांकित करेंगे। यह भी सुखद संयोग है कि कल ही अर्थात 16 जून को हेमन्त कुमार का 95वाँ जन्मदिवस भी है। इस अवसर पर ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार की ओर से इस महान संगीत साधक की स्मृतियों को सादर नमन है।





भारतीय फिल्म संगीत के बहुआयामी कलासाधकों की सूची में पार्श्वगायक और संगीतकार हेमन्त कुमार का नाम शिखर पर अंकित है। बाँग्ला और हिन्दी के गीतों के गायन और संगीतबद्ध करने में समान रूप से दक्ष हेमन्त कुमार का जन्म 16 जून, 1920 को बनारस स्थित उनके ननिहाल में हुआ था। उनकी शिक्षा-दीक्षा बंगाल में हुई। परिवार में संगीत का शौक तो था, किन्तु इसे व्यवसाय के तौर पर अपनाने के लिए कोई भी सहमत नहीं था। बालक हेमन्त के स्कूल से प्रायः यह शिकायत मिलती थी कि उनकी रुचि पढ़ाई की ओर कम और गाने में अधिक है। पिता के एक मित्र सुभाष मुखर्जी की सहायता से मात्र 13 वर्ष की आयु में रेडियो के बाल कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर मिलने लगा। कुछ बड़े होने पर हेमन्त कुमार को कोलम्बिया कम्पनी के लिए रवीन्द्र संगीत रिकार्ड करने का अवसर मिला। कम्पनी के संगीत निर्देशक शैलेन दासगुप्त को उनका गायन इतना पसन्द आया कि एक वर्ष में हेमन्त कुमार के बारह रिकार्ड प्रकाशित किये। आगे चल कर हेमन्त कुमार, संगीतकार शैलेन दासगुप्त के सहायक बने और पहली बार बाँग्ला फिल्म ‘निमाई संन्यास’ में उन्हे पार्श्वगायन का अवसर मिला। वर्ष 1944 में उन्हें पं. अमरनाथ के संगीत निर्देशन में पहली बार हिन्दी फिल्म ‘इरादा’ में दो गीत गाने का अवसर मिला। अगले वर्ष ही हेमन्त कुमार को बाँग्ला फिल्म ‘पूर्वराग’ में संगीत निर्देशन का दायित्व मिल गया। इसके बाद उन्होने अनेक छोटी-बड़ी बाँग्ला फिल्मों का संगीत निर्देशन किया। परन्तु 1951 में हेमेन गुप्ता की बाँग्ला फिल्म ‘आनन्दमठ’ में हेमन्त कुमार का संगीत अत्यन्त लोकप्रिय हुआ। फिल्म की सफलता से उत्साहित होकर इसी वर्ष ‘आनन्दमठ’ का हिन्दी संस्करण भी बनाया गया। इस संस्करण में भी हेमन्त कुमार का संगीत था। बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय की अमर रचना ‘वन्देमातरम्’ की विलक्षण धुन और गायन के कारण हेमन्त कुमार की हिन्दी फिल्मों के क्षेत्र में पार्श्वगायक के रूप में धाक जम गई। सचिनदेव बर्मन, सी. रामचन्द्र जैसे प्रतिष्ठित संगीतकारों के निर्देशन में हेमन्त कुमार के गाये अनेक गीत लोकप्रियता और गुणबत्ता की दृष्टि से शिखर पर रहे। आइए, अब हम आपको संगीतकार सी. रामचन्द्र के संगीत निर्देशन में हेमन्त कुमार का गाया एक सदाबहार गीत सुनवाते हैं। 1953 में प्रदर्शित, सी. रामचन्द्र के राग आधारित गीतों से सुसज्जित फिल्म ‘अनारकली’ में हेमन्त कुमार ने राग बागेश्री पर आधारित एक मनमोहक गीत गाया था। दादरा ताल में निबद्ध यह एक युगलगीत है, जिसमें हेमन्त कुमार का साथ लता मंगेशकर ने दिया है।


राग बागेश्री, दादरा ताल : ‘जाग दर्द-ए-इश्क़ जाग...’ हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर : संगीत – सी. रामचन्द्र : गीत – राजेन्द्र कृष्ण : फिल्म - अनारकली  




हिन्दी फिल्मों में पार्श्वगायक के रूप में अपनी पहचान बना लेने के बावजूद हेमन्त कुमार को एक स्वतंत्र संगीतकार के रूप में स्वयं को स्थापित करना अभी बाकी था। ‘आनन्दमठ’ का संगीत उत्कृष्ट स्तर का होने के बावजूद काफी समय तक उन्हें कोई ऐसी फिल्म नहीं मिली जिसके माध्यम से वे अपनी प्रतिभा दिखा सकें। इस बीच उन्हें फिल्मिस्तान की ‘शर्त’ और ‘सम्राट’ तथा हेमेन गुप्ता द्वारा निर्देशित फिल्म ‘फेरी’ के लिए संगीत निर्देशन का अवसर मिला, किन्तु ये फिल्में कुछ विशेष चली नहीं, यद्यपि फिल्म ‘शर्त’ के गीत उत्कृष्ट स्तर के थे। निराशा के इन क्षणों में 1954 में उन्हें फिल्मिस्तान की फिल्म ‘नागिन’ का संगीत तैयार करने का अवसर मिला। इस फिल्म के गीत जनसामान्य के बीच इतना लोकप्रिय हुआ कि हेमन्त कुमार फिल्म संगीत के शिखर पर विराजमान हो गए। फिल्म ‘नागिन’ के संगीत के लिए हेमन्त कुमार को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा गया था। इसके बाद उनकी एक और सफलतम फिल्म ‘जागृति’ आई, जिसमें गीतकार प्रदीप के गाये गीत ‘आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिन्दुस्तान की...’ सहित अन्य गीतों ने गली-गली में धूम मचा दी थी। इन दो फिल्मों की आशातीत सफलता से संगीत निर्देशक के रूप में हेमन्त कुमार की माँग बढ़ गई थी। सामाजिक सरोकार की फिल्मों के साथ कुछ धार्मिक फिल्मों के संगीत निर्देशन का अवसर उन्हें मिलने लगा। वर्ष 1955 में शक्ति सामन्त निर्देशित ‘बहू’, सत्येन बोस निर्देशित ‘बन्दिश’, ‘लगन’ के साथ फिल्मिस्तान की भक्ति फिल्म ‘भागवत महिमा’ में उनके संगीत को सराहा गया। इसी प्रकार 1956 में हेमन्त कुमार ने ‘अनजान’, एस.डी. नारंग निर्देशित ‘अरब का सौदागर’, ‘बन्धन’, ‘ताज’ और ‘एक ही रास्ता’ फिल्मों में संगीत दिया था। अभी तक उन्होने अपने गीतों को भारतीय मेलोडी, बंगाल व उत्तर प्रदेश की लोकधुनों और भक्तिसंगीत की प्रचलित धुनों से सजाया था। हेमन्त कुमार के कुछ गीतों में भारतीय संगीत के रागों का स्पर्श भले ही परिलक्षित होता हो किन्तु सप्रयास राग का आधार देकर किसी गीत की धुन को तैयार करने की प्रवृत्ति 1956 की फिल्म ‘एक ही रास्ता’ में नज़र आती है। बी.आर. चोपड़ा ने अपनी इस फिल्म में संगीतकार के रूप में हेमन्त कुमार को चुना। फिल्म में अभिनेत्री मीना कुमारी पर द्रुत लय का एक नृत्य फिल्माना था। इस नृत्यगीत की रचना मजरूह सुल्तानपुरी ने की और हेमन्त कुमार ने भैरवी राग के स्वरों का आधार देकर गीत की धुन बनाई। द्रुत लय के कहरवा ताल का लोच गीत को द्विगुणित बनाता है। गीत को स्वयं हेमन्त कुमार ने स्वर दिया था। यह गीत हेमन्त कुमार के सदाबहार गीतों का सिरमौर है। आइए , अब आप हेमन्त कुमार का संगीतबद्ध किया और गाया यह गीत आप भी सुनिए।


राग भैरवी, कहरवा ताल : ‘चली गोरी पी के मिलन को चली...’ स्वर और संगीत – हेमन्त कुमार : गीत – मजरूह सुल्तानपुरी : फिल्म - एक ही रास्ता




हेमन्त कुमार के सांगीतिक जीवन में छठाँ दशक सर्वाधिक उल्लेखनीय रहा है। इस पूरे दशक में फिल्म संगीत की बदलती प्रवृत्तियों का सहज अध्ययन उनके संगीत के माध्यम से किया जा सकता है। उनके शुरुआती दौर के संगीत में भारी-भरकम वाद्यों की भीड़ नहीं थी। फिल्म ‘नागिन’ की सफलतम धुनों में भी बाँसुरी, वायलिन, इसराज, और सारंगी के अलावा बीन की ध्वनि के विकल्प के तौर पर क्लेवायलिन का मोहक प्रयोग हुआ है। आगे चल कर आनन्द जी के साथ संगीतकार जोड़ी बनाने वाले कल्याण जी उन दिनों हेमन्त कुमार के सहायक थे और क्लेवायलिन से बीन की ध्वनि का वादन उन्होने ही किया था। हेमन्त कुमार के सांगीतिक जीवन का पहला पड़ाव यदि फिल्म ‘आनन्दमठ’ को माना जाए तो ‘नागिन’ इस यात्रा का दूसरा सुखद पड़ाव है। ‘नागिन’ के बाद काफी समय तक उनके गीतों की धुनों में नृत्यात्मक तत्त्व बने रहे। थिरकन से युक्त लय गीत के भावों की अनुगूँज उनके अधिकतर गीतों में उपस्थित है। इसी दशक में वह आधुनिक वाद्यवृन्द का उपयोग भी अपने गीतों में करने लगे थे। पियानो का सुंदर उपयोग उनके इस दौर के गीतों में मिलता है। गायक और संगीतकार के रूप में न केवल हिन्दी फिल्मों में बल्कि बाँग्ला फिल्मों में भी वे समान रूप से व्यस्त रहे। कभी-कभी तो उनकी सुबह मुम्बई में तो शाम कोलकाता में बीतती थी। कुछेक गीतों में पाश्चात्य धुनों की नकल भी परिलक्षित होती है, किन्तु आदि से अन्त तक के प्रायः सभी गीतों में हेमन्त कुमार की विशेष शैली उपस्थित मिलती है। उन्होने शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा ग्रहण नहीं की, किन्तु अनेक गीतों में उनका रागों का ज्ञान स्पष्ट रूप से झलकता है। इस कड़ी के अन्त में हम आपको हेमन्त कुमार का संगीतबद्ध किया एक ऐसा गीत सुनवाते है जिसमें नृत्यत्मकता है, प्रकृति अर्थात लोक का स्पर्श है, रागानुकूल तानों का समावेश है, ताल का लोच है और इन सब विशेषताओं के साथ ठुमरी अंग का मोहक स्पर्श भी है। 1957 में प्रतिष्ठित फिल्म निर्माण संस्था ए.वी.एम. की फिल्म ‘मिस मेरी’ प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म में हेमन्त कुमार का संगीत एकदम अनूठा था और उपरोक्त सभी गुणों से अलंकृत था। इसी फिल्म का एक गीत हमने आपके लिए चुना है। गीत के बोल हैं- ‘सखि री सुन बोले पपीहा उस पार...’। राजेन्द्र कृष्ण के लिखे गीत को हेमन्त कुमार ने तीनताल में निबद्ध किया है। गीत लता मंगेशकर और आशा भोसले के युगल स्वरों में है। इस गीत में राग मिश्र खमाज की छाया है। इस रचना में ठुमरी अंग का स्पर्श भी किया गया है। कुल मिला कर इस गीत में हेमन्त कुमार के प्रायः सभी सांगीतिक गुणों का समावेश नज़र आता है। आप यह मधुर गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग मिश्र खमाज, तीनताल : ‘सखि री सुन बोले पपीहा उस पार...’ लता मंगेशकर और आशा भोसले : संगीत – हेमन्त कुमार : गीत – राजेन्द्र कृष्ण : फिल्म - मिस मेरी





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 172वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 180वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत का यह अंश सुन कर राग पहचाइए और हमे राग का नाम बताइए।

2 – इस गीत के गायक कलाकार को पहचानिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 174वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली और श्रृंखला के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 170वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको वरिष्ठ संगीतज्ञ पण्डित विश्वनाथ श्रीखण्डे की आवाज़ में गायी ठुमरी का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- ठुमरी शैली और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग मिश्र खमाज। इस अंक के दोनों प्रश्नों के सही उत्तर चण्डीगढ़ के हरकीरत सिंह, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। यह हमारी 170वीं कड़ी की पहेली का परिणाम था। इसी के साथ वर्ष 2014 की दूसरी श्रृंखला का परिणाम भी स्पष्ट हो गया है। इस श्रृंखला के विजेता और उनके प्राप्तांक इस प्रकार रहे।

1- डी. हरिणा माधवी, हैदराबाद – 20 अंक प्रथम

2- क्षिति तिवारी, जबलपुर – 20 अंक प्रथम

3- हरकीरत सिंह, चंडीगढ़ – 16 अंक द्वितीय

4- विजया राजकोटिया, पेंसिलवानिया, अमेरिका – 8 अंक तृतीय

आप सभी श्रृंखला विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सम्पादक मण्डल की ओर से हार्दिक बधाई।





अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने आपसे सुप्रसिद्ध फिल्म संगीतकार हेमन्त कुमार के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा की। अगले अंक में भी हम एक और फिल्म संगीत के विख्यात संगीतकार की सांगीतिक कृतियों की चर्चा करेंगे। यह अंक आपको कैसा लगा, हमें अवश्य बताइए। आप भी अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश हमें भेज सकते हैं। हमारी अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों की प्रतीक्षा करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Sunday, June 8, 2014

संगीत के प्रचार, प्रसार और संरक्षण में संलग्न एक साधक



स्वरगोष्ठी – 171 में आज

व्यक्तित्व – 1 : पण्डित विश्वनाथ श्रीखण्डे 

‘छवि दिखला जा बाँके साँवरिया ध्यान लगे मोहे तोरा...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, आपके प्रिय स्तम्भ की आज से एक नई लघु श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ आरम्भ हो रही है। इस श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ ऐसे संगीत-साधकों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करेंगे जिन्होंने मंच अथवा विभिन्न प्रसारण माध्यमों पर प्रदर्शन से इतर संगीत के प्रचार, प्रसार, शिक्षा, संरक्षण या अभिलेखीकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान किया है। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हम भारतीय संगीत के उच्चकोटि के कलाकार होने के साथ ही संगीत के शास्त्रीय और प्रायोगिक पक्ष के विद्वान पण्डित विश्वनाथ वि. श्रीखण्डे के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करेंगे। वर्ष 1983 से 1993 तक उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी में सचिव पद पर रहते हुए उन्होने भारतीय संगीत के प्रचार-प्रसार के साथ ही अभिलेखीकरण का उल्लेखनीय कार्य किया था। आज 80 वर्ष की आयु में भी वे संगीत विषयक विभिन्न कार्यों में सक्रिय हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के पाठकों के लिए सुपरिचित, इसराज और मयूर वीणा के सुप्रसिद्ध वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने श्रीखण्डे जी के व्यक्तित्व और कृतित्व का उल्लेख किया है। यह भी सुखद संयोग है कि श्रीखण्डे जी दो दिन बाद ही अर्थात 10 जून को अपनी आयु के 80 वर्ष पूर्ण कर 81वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। श्रीखण्डे जी को उनके 81वें जन्मदिवस पर ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ अर्पित करता है।

 


ह मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच से शास्त्रीय गायन के उच्चकोटि के कलाकार, संगीत के शास्त्रीय एवं प्रायोगिक पक्ष के मूर्धन्य विद्वान, संगीत के अभिलेखीकरण के विशेषज्ञ और संगीत संस्थाओं के योग्य प्रशासनिक अधिकारी पण्डित विश्वनाथ वि. श्रीखण्डे के व्यक्तित्व और कृतित्व के उल्लेख करने का अवसर मिला। मेरे लिए यह भी सौभाग्य का विषय है कि उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी मे 10 वर्षों तक श्रीखण्डे जी के साथ कार्य करने का अवसर भी मिला। इस अवधि में संगीत के इस बहुआयामी व्यक्तित्व के बारे में जो कुछ भी जान सका उसे आप सबके बीच बाँट रहा हूँ।

पं. श्रीखण्डे जी का जन्म उत्तर प्रदेश के जालौन जनपद स्थित उरई नामक एक छोटे नगर में 10 जून, 1934 को हुआ था। इनके पिता श्री विश्वास राव श्रीखण्डे ने इनकी सांगीतिक प्रतिभा को पहचान कर उरई के ही शिक्षक पं. प्रभुनाथ मिश्र से संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा दिलाई। इसके बाद इन्हें गायन की विविध विधाओं और क्लिष्ट रचनाओं की शिक्षा इलाहाबाद के प्रख्यात संगीतज्ञ पं. भोलानाथ भट्ट से प्राप्त हुई। शास्त्रीय गायन की उच्च शिक्षा विश्वविख्यात गायक उस्ताद अमीर खाँ (इन्दौर) से इन्हें प्राप्त हुई। उस्ताद अमीर खाँ की रागानुसार सटीक सुरलगाव, मीड़, कण, गमक, मुर्की आदि से युक्त स्वर प्रस्तार एवं अन्यान्य कलात्मक विशेषताओं को इन्होंने अपनी गायकी में आत्मसात किया। युवावस्था में ही अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर आपके गायन की भरपूर प्रशंसा हुई। वर्ष 1958 से 1967 तक आकाशवाणी के दिल्ली, नागपुर और हैदराबाद केन्द्रों पर प्रोड्यूसर के रूप में कार्य किया। 1967 से 1972 तक जम्मू कश्मीर के इन्स्टीच्यूट आफ म्यूजिक एंड फाइन आर्ट में प्रधानाचार्य रहे। 1975 से 1982 के बीच भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद की ओर से फीजी के सांस्कृतिक केन्द्र में और फिर उसके बाद मारीशस के महात्मा गाँधी संस्थान में निदेशक पद पर कार्य किया। 1983 में श्रीखण्डे जी ने उतार प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के सचिव पद पर कार्यभार ग्रहण किया और 1993 में यहीं से सेवानिवृत्त हुए। यहाँ प्रशासनिक दायित्व का निर्वहन करते हुए उन्होने अकादमी को अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति दिलायी। इस अवधि में उन्होने संगीत, नाटक और कथक नृत्य के प्रचार, प्रसार और विकास के अनेक नए कार्यक्रमों को मूर्तरूप दिया। इससे भी बढ़कर कम प्रचलित या लुप्तप्राय संगीत शैलियों का सर्वेक्षण, वैज्ञानिक ढंग से उनका संग्रह और अभिलेखीकरण करा कर अकादमी के अभिलेखागार को समृद्ध बनाने में श्रीखण्डे जी का योगदान स्तुत्य है।

आगे बढ्ने से पहले आइए, श्रीखण्डे जी के बहुआयामी व्यक्तित्व के शास्त्रीय गायक पक्ष का अवलोकन करते चलें। वर्तमान में श्रीखण्डे जी की आयु 80 वर्ष हो चुकी है। लगभग दो वर्ष पूर्व संगीत-प्रेमियों की एक बैठक में उन्होने राग बागेश्री का गायन प्रस्तुत किया था। अब हम आपको उसी प्रस्तुति का एक अंश सुनवाते हैं। पण्डित विश्वनाथ श्रीखण्डे द्वारा प्रस्तुत राग बागेश्री के खयाल की इस प्रस्तुति में तबला संगति अनिल खरे ने और वायलिन संगति श्रीपाद तिलक ने की है।


राग बागेश्री : खयाल तीनताल : ‘बलमा मोरी तोरे संग लागली प्रीत...’ : पण्डित विश्वनाथ श्रीखण्डे





श्रीखण्डे जी ने अकादमी के अभिलेखागार को समृद्ध करने के लिए शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम और लोक, सभी विधाओं के वरिष्ठ संगीतज्ञों को आमंत्रित कर उनकी रिकार्डिंग कराई। श्रीखण्डे जी ऐसे अन्वेषक हैं जो महासागर की अथाह गहराई में प्रवेश करके रत्नों को प्राप्त कर लेते हैं। शास्त्रीय और लोक संगीत के वाद्यों के विविध पक्षों से जुड़ी जानकारियों एवं दुर्लभ, पारम्परिक रचनाओं की खोज व उनकी रिकार्डिंग कराई और भावी पीढ़ियों के लिए सुलभ कराया। ध्रुवपद क्षेत्र में स्व. बालजी चतुर्वेदी, स्व. रामचतुर मलिक, स्व. सियाराम तिवारी, स्व. जिया मोहिउद्दीन डागर (रुद्रवीणा), खयाल गायन के क्षेत्र में स्व. काशीनाथ बोडस, स्व. हरिशंकर मिश्र, स्व. मल्लिकार्जुन मंसूर, स्व. जी.एन. नातू, स्व. के.जी. गिण्डे, स्व. रामाश्रय झा आदि, उपशास्त्रीय, सुगम और लोक संगीत के दिग्गज कलाकारों की रिकार्डिंग से अकादमी समृद्ध है। इसी प्रकार श्रीखण्डे जी ने वाद्य संगीत के वरिष्ठ कलाकारों को आमंत्रित कर उनकी वार्ता और प्रस्तुतियों की रिकार्डिंग कराई। अकादमी में संग्रहीत सांगीतिक सामग्री का अध्ययन कर अनेक शोधछात्र और अध्येता लाभान्वित हो चुके हैं। श्रीखण्डे जी ने अपने कार्यकाल में लगभग 3000 घण्टे की गुणात्मक महत्त्व की विविध पारम्परिक व दुर्लभ सामग्री का संग्रह कराया था।

अभिलेखागार को समृद्ध बनाने के अलावा श्रीखण्डे जी ने कई नए कार्यक्रमों का सूत्रपात और पहले से जारी कई कार्यक्रमों को विस्तार भी दिया था। इनमें अकादमी की सांस्कृतिक आदान-प्रदान योजना, सम्भागीय व प्रादेशिक संगीत प्रतियोगिता, कथक समारोह, नाट्य समारोह, कठपुतली समारोह, अवध संध्या आदि के आयोजन में उनकी दृष्टि की सराहना कलाप्रेमी आज भी करते हैं। कलाप्रेमियों से सीधे संवाद के लिए उन्होने कलामित्र योजना का आरम्भ भी किया था। कलासाधकों और कलाप्रेमियों के बीच उन्होने सेतु बनाने का सफल प्रयास किया। आइए, अब श्रीखण्डे जी की आवाज़ में एक ठुमरी सुनी जाए। पूरब अंग की मिश्र खमाज की इस ठुमरी में तबला संगति सतीश तारे ने और हारमोनियम संगति विवेक दातार ने की है। आप इस ठुमरी का रसास्वादन कीजिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


ठुमरी मिश्र खमाज : ‘छवि दिखला जा बाँके साँवरिया ध्यान लगे मोहे तोरा...’ : पण्डित विश्वनाथ श्रीखण्डे






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 171वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक पुरानी फिल्म के बेहद लोकप्रिय गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 180वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत के इस अंश को सुन कर गायक कलाकार को पहचानिए और हमें उनका नाम लिख भेजिए।

2 – इस गीतांश में आपको किस राग का आधार दिख रहा है? राग का नाम लिखिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 173वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 169वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको तंत्रवाद्य सारंगी के लोक स्वरूप में वादन का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राजस्थानी सारंगी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राजस्थान। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी, चंडीगढ़ के हरकीरत सिंह तथा पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर ‘व्यक्तित्व’ शीर्षक से एक नवीन श्रृंखला आरम्भ हुई है। इस श्रृंखला में हम शास्त्रीय संगीत के कुछ ऐसे कलाकारों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं जिन्होंने मंच प्रदर्शन के अलावा अन्य क्षेत्रों में यश पाया है। अगले अंक में हम आपसे एक ऐसे संगीतकार की चर्चा करेंगे जिन्होंने फिल्म संगीत को रागों से सुसज्जित कर अपना योगदान किया है। आप भी यदि ऐसे किसी संगीतकार की जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पते पर भेज दें। अपने पाठको/श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित/प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।



आलेख : श्रीकुमार मिश्र  
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


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