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Saturday, October 22, 2016

"पिया मिलन को जाना...", जानिये कि कैसे नृत्य के बोल रूपान्तरित हो गए एक गीत में


एक गीत सौ कहानियाँ - 96
 

'पिया मिलन को जाना...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना
रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 96-वीं कड़ी में आज जानिए 1939 की फ़िल्म ’कपालकुंडला’ के प्रसिद्ध गीत "पिया मिलन को जाना..." के बारे में जिसे पंकज मल्लिक ने गाया था। गीत लिखा है आरज़ू लखनवी ने और संगीत दिया है पंकज मल्लिक ने। 

बंगाल के प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित एक प्रसिद्ध उपन्यास है ’कपालकुंडला’
बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय
जो 1866 में प्रकाशित हुई थी। यह जंगलों, तान्त्रिकों और ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी लड़की कपालकुंडला की कहानी है जिसे एक शहरी लड़के नबकुमार से प्रेम हो जाता है। परन्तु नबकुमार से विवाह के पश्चात कपालकुंडला शहरी जीवन को अपना नहीं पाती। ’कपालकुंडला’ बंकिम चन्द्र के श्रेष्ठ कृतियों में से एक है जिसका अंग्रेज़ी, हिन्दी, गुजराती, तमिल, तेलुगू, संस्कृत और जर्मन भाषाओं में अनुवाद हुआ है। बांगला थिएटर के अग्रदूतों में से एक गिरिश चन्द्र घोष, तथा अतुल कृष्ण मित्र ने इस उपन्यास का नाटक-रूपान्तर किया। 1874 में बंकिम चन्द्र के एक आत्मीय दामोदर मुखोपाध्याय ने ’कपालकुंडला’ उत्तर-कृति (sequel) लिखा ’मृनमयी’ के शीर्षक से। ’कपालकुंडला’ का फ़िल्म रूपान्तर एकाधिक बार हुआ है। सबसे पहली बार प्रियनाथ गांगुली के निर्देशन में 1929 में मूक फ़िल्म बनी थी ’कपालकुंडला’; इसके बाद 1933 में प्रेमांकुर अतुर्थी ने इस उपन्यास पर बांगला सवाक फ़िल्म बनाई। इसके बाद आई 1939 की हिन्दी फ़िल्म ’कपालकुंडला’ जिसे नितिन बोस और फणी मजुमदार ने निर्देशित किया। बांगला में यह फ़िल्म दो बार और बनी - 1952 में अर्धेन्दु बनर्जी के निर्देशन में और 1981 में पिनाकी भूषण मुखर्जी के निर्देशन में। 1939 की हिन्दी फ़िल्म में पंकज मल्लिक का गाया "पिया मिलन को जाना" गीत बेहद लोकप्रिय हुआ था। इसे फ़िल्म-संगीत इतिहास का एक ट्रेण्डसेटर गीत भी माना जाता रहा है। शास्त्रीय संगीत और पाश्चात्य ऑरकेस्ट्रेशन के संगम से उत्पन्न एक हल्का-फुल्का गीत, जिसकी विशेषताएँ आगे चल कर फ़िल्म-संगीत की धारा बन गई।



दूरदर्शन के बांगला चैनल DD-7 पर बरसों पुराना रेकॉर्ड किया हुआ पंकज मल्लिक का एक बांगला में श्याम-
"पिया मिलन को जाना" गीत के दृश्य; बायीं ओर पंकज मल्लिक
श्वेत साक्षात्कार प्रसारित हुआ था जिसमें उन्होंने इस गीत के बनने की कहानी बताई थी। उसी बांगला में बताये कहानी का हिन्दी अनुवाद ये रहा - "पिया मिलन को जाना, इसके बनने की कहानी आपको शायद मालूम न हो, यह एक आश्चर्यजनक घटना थी। खेमचन्द प्रकाश जी, जिन्होंने बम्बई में ’तानसेन’ फ़िल्म की थी, खेमचन्द प्रकाश का असली परिचय था एक कोरियोग्राफ़र का। बहुत ही बेहतरीन नृत्य शिक्षक। बहुत ही बेहतरीन! और ख़ास तौर से कथक नृत्य में तो उनके जैसा कोई नहीं। ’कपालकुंडला’ में वो कोरिओग्राफ़र थे। उन्होंने कथक नृत्य का एक बोल अभिनेत्री कमलेश कुमारी को सिखाया था एक सीन के लिए। और ख़ुद तबला बजाना जानते थे, तो उन कथक के बोलों पर तबला बजा कर, कि नृत्य के बोल भी गा रहे हैं, तबले पर ताल भी पड़ रहे हैं, और कमलेश कुमारी नाच रही हैं, कुछ इस तरह का सीन था। तब मैंने खेमचन्द जी को कहा, खेमचन्द जी ’कपालकुंडला’ में मेरे सहयोगी थे, नहीं सहयोगी नहीं, सहकारी थे। ख़ैर, मैंने उनसे कहा कि अगर इस नृत्य के बोल के उपर एक गीत तैयार हो जाए तो कैसा हो? तब निर्देशक नितिन बोस जी बोले कि फिर तो बहुत ही अच्छी बात होगी! गाना तैयार हो सकता है क्या? मैंने कहा कि कोशिश करने में कोई हर्ज नहीं है, कोशिश करके देखते हैं। तब आरज़ू साहब लखनवी, जो कवि थे, उनसे पूछा गया कि क्या नृत्य के इन बोलों और तबले के इन तालों पर किसी गीत की रचना हो सकती है भला? मुझे वो ताल याद नहीं है, हाँ, फ़लाना फ़लाना राधा, पिया मिलन को जाना। तो "राधा" बन गया "जाना"। इस तरह से कथक नृत्य के बोलों को एक फ़िल्मी गीत के रूप में रूपान्तरित कर दिया गया था।" 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Thursday, October 18, 2012

स्मृतियों के झरोखे से : पार्श्व गायन की शुरुआत "धूप छांव" से


भूली-बिसरी यादें


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में आयोजित विशेष श्रृंखला ‘स्मृतियों के झरोखे से’ के एक नये अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आपके बीच उपस्थित हूँ और आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज मास का तीसरा गुरुवार है और इस दिन हम आपके लिए मूक और सवाक फिल्मों की कुछ रोचक दास्तान लेकर आते हैं। तो आइए पलटते हैं, भारतीय फिल्म-इतिहास के कुछ सुनहरे पृष्ठों को।

यादें मूक फिल्म-युग की : लन्दन में भी प्रदर्शित हुआ ‘राजा हरिश्चन्द्र’ 

दादा साहब फालके की बनाई पहली भारतीय मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ से ही भारतीय सिनेमा का इतिहास आरम्भ होता है। इस फिल्म का पूर्वावलोकन 21अप्रैल 1913 को और नियमित प्रदर्शन 3मई, 1913 को हुआ था। भारतीय दर्शकों के लिए परदे पर चलती-फिरती तस्वीरें देखना किसी चमत्कार से कम नहीं था। दादा साहब फालके ने इस फिल्म के निर्माण के लिए ‘फालके ऐंड कम्पनी’ की स्थापना बम्बई (अब मुम्बई) में की थी। फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ के प्रदर्शन के बाद फालके ने अपनी अगली फिल्मों का निर्माण नासिक में किया। इसके लिए उन्होने अपना कार्यालय और स्टूडिओ बम्बई से नासिक स्थानान्तरित किया।

प्रथम अभनेत्री कमला बाई 
वर्ष 1913 में ही दादा साहब फालके ने नासिक के स्टूडिओ में अपनी दूसरी फिल्म ‘भष्मासुर मोहिनी’ का निर्माण किया। 3245 फुट लम्बी यह फिल्म एक पौराणिक कथानक पर आधारित थी। यह वही फिल्म थी, जिसमे भारतीय फिल्मों के इतिहास में पहली बार स्त्री भूमिका में एक अभिनेत्री को प्रस्तुत किया गया था। पिछले अंक में हम भारतीय सिनेमा के इतिहास की पहली अभिनेत्री कमला बाई की चर्चा कर चुके हैं। फाल्के द्वारा निर्मित दूसरी फिल्म ‘भष्मासुर मोहिनी’ का प्रदर्शन 27दिसम्बर, 1913 को हुआ था। इसी वर्ष एक ऐसी घटना भी हुई, जिससे भारतीय सिनेमा को दक्षिण भारत में भी स्थायित्व मिला। रघुपति वेंकैया नायडू उन दिनों घुमन्तू (टूरिंग) सिनेमा का व्यावसायिक प्रदर्शन दक्षिण भारत में किया करते थे। ‘राजा हरिश्चन्द्र’ के सफल प्रदर्शन से उत्साहित होकर उन्होने तत्कालीन मद्रास शहर में पहला स्थायी सिनेमाघर बनवाया। अगले वर्ष अर्थात 1914 में जे.एफ. मदान ने दिल्ली में एक स्थायी सिनेमाघर- ‘एल्फ़िस्टन पिक्चर पैलेस’ का निर्माण कराया था। दादा साहब फालके ने वर्ष 1913 में दो मूक फिल्मों का निर्माण कर अपना जो वर्चस्व कायम किया था, वह अगले वर्ष 1914 में भी बना रहा। इस वर्ष फाल्के की तीसरी फिल्म ‘सावित्री-सत्यवान’ का निर्माण और प्रदर्शन हुआ था। 6जून, 1914 को प्रदर्शित यह फिल्म भी एक पौराणिक कथा पर आधारित थी। वर्ष 1914 की एक महत्त्वपूर्ण घटना यह भी थी कि फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ का प्रदर्शन लन्दन में हुआ था।

सवाक युग के धरोहर : पार्श्वगायन परम्परा का सूत्रपात फिल्म ‘धूप छाँव’ से हुआ

भारतीय फिल्मों में आवाज़ का आगमन 1931 में बनी फिल्म ‘आलमआरा’ से हुआ था। इस दौर की फिल्मों में अभिनेता-अभिनेत्रियों को अपने गाने स्वयं गाने पड़ते थे। वर्ष 1935 को हिन्दी सिने-संगीत के इतिहास का एक स्मरणीय वर्ष माना जाएगा। संगीतकार रायचन्द्र बोराल ने, अपने सहायक और संगीतकार पंकज मल्लिक के साथ मिलकर ‘न्यू थिएटर्स’ में प्लेबैक पद्धति, अर्थात पार्श्वगायन की शुरुआत की। पर्दे के बाहर रेकॉर्ड कर बाद में पर्दे पर फ़िल्माया गया पहला गीत था फ़िल्म ‘धूप छाँव’ का। इस फिल्म में के.सी. डे का गाया “तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफ़िर जाग ज़रा...” और “मन की आँखें खोल बाबा...” लोकप्रिय गीतों में था। इन गीतों से पार्श्वगायन की शुरुआत ज़रूर हुई, पर सही मायने में इन्हें प्लेबैक गीत नहीं कहा जा सकता क्योंकि के.सी. डे के गाये इन गीतों को उन्हीं पर फ़िल्माया गया था। इन गीतों को सुन कर साफ़ महसूस होता है कि इससे पहले के गीतों से इन प्री-रेकॉर्डेड गीतों के स्तर में कितना अन्तर है। इस फ़िल्म में सहगल का गाया “अंधे की लाठी तू ही है...” और उमा शशि का गाया “प्रेम कहानी सखी सुनत सुहाये चोर चुराये माल...” तथा पहाड़ी सान्याल व उमा शशि का गाया युगल गीत “मोरी प्रेम की नैया चली जल में...” भी फ़िल्म के चर्चित गाने थे। फिल्म इतिहासकार विजय कुमार बालकृष्णन के अनुसार फिल्म ‘धूप छाँव’ में पहला प्रीरिकार्ड किया गीत, जो फिल्माया गया था, वह के.सी. डे, सुप्रभा सरकार और साथियों का गाया गीत “मेरो घर मोहन आयो...” था। आइए, सुनते हैं इस पहले पार्श्वगायन के रूप में फिल्माए गीत को।

फिल्म धूप छाँव : “मेरो घर मोहन आयो...” : के.सी. डे, सुप्रभा सरकार और साथी


पंकज मल्लिक
फ़िल्म ‘धूप छाँव’ के गीतकार थे पण्डित सुदर्शन। प्लेबैक तकनीक के आने के बाद भी कई वर्षों तक बहुत से अभिनेता स्वयं गीत गाते रहे, फिर धीरे धीरे अभिनेता और गायक की अलग-अलग श्रेणी बन गई। ‘धूप छाँव’ में ही पारुल घोष, सुप्रभा सरकार और हरिमति का गाया एक गीत था “मैं ख़ुश होना चाहूँ, हो न पाऊँ...”, जो सही अर्थ में पहला प्लेबैक गीत था। इस तरह से इन तीन गायिकाओं को फ़िल्म-संगीत की प्रथम पार्श्वगायिकाएँ होने का गौरव प्राप्त है। हरमन्दिर सिंह ‘हमराज़’ को दिए एक साक्षात्कार में सुप्रभा सरकार ने पार्श्वगायन की शुरुआत से सम्बन्धित महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए बताया था – “उन्होंने (सुप्रभा सरकार ने) बताया कि फ़िल्मों में उनका प्रवेश 13 वर्ष की आयु में तत्कालीन अभिनेत्री लीला देसाई के भाई के प्रयत्नों से हुआ था। सन्‍ 1935 में जब ‘न्यू थिएटर्स’ द्वारा ‘जीवन मरण’ (बांग्ला) तथा ‘दुश्मन’ (हिन्दी) का निर्माण शुरु हुआ तब पार्श्वगायन पद्धति का प्रथम उपयोग इसी फ़िल्म में किया जाना था परन्तु फ़िल्म की शूटिंग के समय एक दृश्य में पेड़ से नीचे कूदते समय नायिका लीला देसाई की टाँग टूट गई और फ़िल्म का निर्माण रुक गया। इसी बीच फ़िल्म ‘धूप छाँव’ का निर्माण शुरु हुआ। निर्देशक नितिन बोस ने पहले तो सुप्रभा सरकार की आवाज़ को नामंज़ूर ही कर दिया था, लेकिन एक समूह गीत में सुप्रभा, हरिमती और पारुल घोष की आवाज़ों में रेकॉर्ड किया गया जो कि बाद में प्रथम पार्श्वगीत के रूप में जाना गया।” उधर पंकज मल्लिक ने भी अपनी आत्मकथा में पार्श्वगायन की शुरुआत का दिलचस्प वर्णन किया है। पंकज राग लिखित किताब ‘धुनों की यात्रा’ से प्राप्त जानकारी के अनुसार– “नितिन बोस स्टुडिओ जाते समय अपनी कार से पंकज मल्लिक के घर से उन्हें लेते हुए जाते थे। एक दिन उनके घर के सामने कई बार हार्न देने पर भी पंकज मल्लिक नहीं मिकले, और काफ़ी देर बाद अपने पिता के बताने पर कि नितिन बोस उनकी बाहर कार में प्रतीक्षा कर रहे हैं, वे हड़बड़ाते हुए बाहर आए और देरी का कारण बताते हुए कहा कि वे अपने मनपसंद अंग्रेज़ी गानों का रेकॉर्ड सुनते हुए गा रहे थे, इसी कारण हार्न की आवाज़ नहीं सुन सके। इसी बात पर नितिन बोस को विचार आया कि क्यों न इसी प्रकार पार्श्वगायन लाया जाए। उन्होंने बोराल से चर्चा की और अपने पूरे कौशल के साथ बोराल ने इस विचार को साकार करते हुए इसे ‘धूप छाँव’ में आज़माया।” इस प्रकार भारतीय फिल्मों में पार्श्वगायन की शुरुआत हुई। फिल्म में के.सी. डे के गाये जिन दो गीतों की चर्चा ऊपर की पंक्तियों में की गई है, आइए आपको वही दोनों गीत सुनवाते हैं।

फिल्म धूप छाँव : “बाबा मन की आँखें खोल...” : के.सी. डे

फिल्म धूप छाँव : “तेरी गठरी में लागा चोर...” : के.सी. डे



इसी गीत के साथ आज हम ‘भूली-बिसरी यादें’ के इस अंक को यहीं विराम देते हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल’ के आगामी अंक में बारी है- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ स्तम्भ की। अगला गुरुवार मास का चौथा गुरुवार होगा। इस दिन हम प्रस्तुत करेंगे एक बेहद रोचक संस्मरण। यदि आपने ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता के लिए अभी तक अपना संस्मरण नहीं भेजा है तो हमें तत्काल radioplaybackindia@live.com पर हमें मेल करें।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

“मैंने देखी पहली फिल्म” : आपके लिए एक रोचक प्रतियोगिता
दोस्तों, भारतीय सिनेमा अपने उदगम के 100 वर्ष पूरा करने जा रहा है। फ़िल्में हमारे जीवन में बेहद खास महत्त्व रखती हैं, शायद ही हम में से कोई अपनी पहली देखी हुई फिल्म को भूल सकता है। वो पहली बार थियेटर जाना, वो संगी-साथी, वो सुरीले लम्हें। आपकी इन्हीं सब यादों को हम समेटेगें एक प्रतियोगिता के माध्यम से। 100 से 500 शब्दों में लिख भेजिए अपनी पहली देखी फिल्म का अनुभव radioplaybackindia@live.com पर। मेल के शीर्षक में लिखियेगा ‘मैंने देखी पहली फिल्म’। सर्वश्रेष्ठ तीन आलेखों को 500 रूपए मूल्य की पुस्तकें पुरस्कारस्वरुप प्रदान की जायेगीं। तो देर किस बात की, यादों की खिड़कियों को खोलिए, कीबोर्ड पर उँगलियाँ जमाइए और लिख डालिए अपनी देखी हुई पहली फिल्म का दिलचस्प अनुभव। प्रतियोगिता में आलेख भेजने की अन्तिम तिथि 31अक्टूबर, 2012 है।



Sunday, April 3, 2011

करूँ क्या आस निरास भयी...एक और कालजयी गीत सहगल साहब का गाया

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 626/2010/326

'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक और नए सप्ताह के साथ हाज़िर हैं दोस्तों। आशा है रविवार की इस छुट्टी के दिन का आपनें भरपूर आनंद लिया होगा और विश्व कप में भारत की शानदार जीत से सुरूर से अभी पूरी तरह से उभर नहीं पाए होंगें। कुंदन लाल सहगल साहब पर केन्द्रित लघु शृंखला में पिछले हफ़्ते हम उनकी संगीत यात्रा की चर्चा करते हुए और उनके गाये गीतों व ग़ज़लों को सुनते हुए आप पहुँचे थे साल १९३७ में। आइए आज वहीं से उस सुरीली यात्रा को आगे बढ़ाते हैं। १९३८ में न्यु थिएटर्स नें आर.सी. बोराल और पंकज मल्लिक को मौका दिया अपनी संगीत यात्रा को एक बार फिर से बुलंदी पर बनाये रखने का। बोराल साहब नें 'अभागिन' और 'स्ट्रीट-सिंगर' में, तथा मल्लिक बाबू नें 'धरतीमाता' में कालजयी संगीत दिया। 'स्टीट-सिंगर' और 'धरतीमाता' में सहगल साहब के स्वर गूंजे। 'स्ट्रीट-सिंगर' की कालजयी ठुमरी "बाबुल मोरा नैहर छूटो जाये" हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' और 'सुर-संगम', दोनों ही स्तंभों में सुनवा चुके हैं। १९३८ में सहगल साहब नें 'प्रयाग संगीत समारोह' में भाग लिया, जिसमें मौजूद थे उस्ताद फ़ैयाज़ ख़ान, अब्दुल करीम ख़ान, बाल गंधर्व और पंडित ओम्कार नाथ जैसे दिग्गज फ़नकार। सहगल साहब की गायकी से वे इतने प्रभावित हुए कि उनकी गायी राग दरबारी सुनने के बाद उस्ताद फ़ैयाज़ ख़ान साहब ने उनसे कहा, "बेटे, ऐसा कुछ नहीं है जो मैं तुम्हे अब सिखा सकूँ"।

फिर आया साल १९३९। न्यु थिएटर्स अपनी पूरी शबाब पर था। इस कंपनी के चार फ़िल्में इस साल प्रदर्शित हुई - 'बड़ी दीदी', 'दुश्मन', 'जवानी की रीत' और 'सपेरा'। पहले दो में संगीत पंकज बाबू का था और बाक़ी दो में बोराल साहब के धुन गूंजे। इन चारों फ़िल्मों में 'दुश्मन' के गानें सब से ज़्यादा लोकप्रिय हुए। आरज़ू लखनवी साहब के लिखे गीतों को सहगल साहब ने अपनी जादूई आवाज़ में ढाला। फ़िल्म का सब से लोकप्रिय गीत "करूँ क्या आस निरास भयी" सहगल साहब के करीयर का एक और बेहद महत्वपूर्ण गीत रहा है। यह गीत आशावादी और निराशावादी, दोनों है। गीत शुरु होता है "करूँ क्या आस निरास भयी", लेकिन अंतिम अंतरे में आरज़ू साहब लिखते हैं "करना होगा ख़ून का पानी, देनी होगी हर क़ुर्बानी, हिम्मत है इतनी तो समझ ले आस बंधेगी नयी, कहो ना आस निरास भयी, कहो ना आस निरास भयी"। यानी कि 'आस निरास भयी' ऐसा न कहने की सलाह दी जा रही है। फ़िल्म के साउण्डट्रैक में हर गीत से पहले कुछ न कुछ शब्द बोले गये हैं। अब इसी गीत को लीजिए, गीत शुरु होने से पहले सहगल साहब कहते हैं, "आवाज़ की दुनिया के दोस्तों, फ़र्ज़ कीजिए कि किसी की ख़ुशी की दुनिया बरबाद हो चुकी हो और जहाँ तक उसकी निगाह जाती हो, उसे अंधेरे की निराशा और निराशा के अंधेरे के सिवा और कोई चीज़ दिखायी न देती हो, ऐसे वक़्त में उसे क्या करना चाहिए? मेरा ख़याल है कि.... करूँ क्या आस निरास भयी"। तो 'आवाज़' की दुनिया के दोस्तों, लीजिए इस कालजयी रचना का आनंद लीजिए सहगल साहब की कालजयी आवाज़ में।



क्या आप जानते हैं...
कि तलत महमूद साहब नें 'विविध भारती' में 'जयमाला' कार्यक्रम को प्रस्तुत करते हुए सहगल साहब के गाये इसी गीत "करूँ क्या आस निरास भयी" को बजाया था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 6/शृंखला 13
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - सहगल साहब का गाया एक और क्लास्सिक गीत.

सवाल १ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - ३ अंक
सवाल ३ - मात्र इसी फिल्म में इस संगीतकार ने सहगल से गवाया था, संगीतकार कौन हैं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी, अवध जी और अंजाना जी के साथ साथ आज हम पूरे देश वासियों को भी बधाई देना चाहेंगें विश्व कप में शानदार जीत के लिए

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, March 29, 2011

नुक्ताचीं है गमे दिल...सुनिए ग़ालिब का कलाम सहगल साहब की आवाज़ में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 623/2010/323

'मधुकर श्याम हमारे चोर', हिंदी सिनेमा के पहले सिंगिंग् सुपरस्टार कुंदन लाल सहगल पर केन्द्रित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला की तीसरी कड़ी में आज भी हम कल ही की तरह बने रहेंगे साल १९३३ में। सहगल साहब को एक से एक लाजवाब गीत गवाने में अगर पहला नाम राय चंद बोराल का है, तो निस्संदेह दूसरा नाम है पंकज मल्लिक का। पंकज बाबू के संगीत निर्देशन में सहगल साहब के बहुत से गीत हैं जो बहुत बहुत मशहूर हुए हैं। दोस्तों, अभी कुछ दिनों पहले जब मेरी संगीतकार तुषार भाटिया जी से बातचीत हो रही थी, तो बातों ही बातों में न्यु थिएटर्स की चर्चा छिड़ गई थी, और तुषार जी ने बताया कि राय चंद बोराल निस्संदेह फ़िल्म संगीतकारों के भीष्म पितामह हैं, लेकिन फ़िल्मी गीत का जो अपना स्वरूप है, और जो स्वरूप आज तक चलता आया है, वह पंकज मल्लिक साहब की ही देन है। पंकज बाबू का बतौर फ़िल्म संगीतकार सफ़र शुरु हुआ था बोलती फ़िल्मों के पहले ही साल, यानी १९३१ में, जिस साल उन्होंने बंगला फ़िल्म 'देना पाओना' में बोराल साहब के साथ संगीत दिया था। हिंदी फ़िल्मों में उनका आगमन हुआ १९३३ की फ़िल्म 'यहूदी की लड़की' में। वैसे यह बात सच है कि इस फ़िल्म में मल्लिक साहब का वह ऒर्केस्ट्रेशन वाला हल्का फुल्का पर शास्त्रीयता से भरपूर अंदाज़ सुनने को नहीं मिला, लेकिन सहगल साहब के गाये गीतों व ग़ज़लों ने ऐसा असर किया कि इस फ़िल्म का नाम सिनेमा के इतिहास में अमर हो गया। दोस्तो, यह सत्य है कि पंकज साहब के संगीत में सहगल साहब नें इसके बाद के वर्षों में इससे भी बहुत ज़्यादा लोकप्रिय गीत गाये (जिनकी चर्चा हम आगे चलकर इसी शृंखला में करेंगे), लेकिन इस फ़िल्म के किसी गीत को सुनवाये बग़ैर आगे बढ़ने का दिल नहीं कर रहा। इसलिए आइए आज सुनें 'यहूदी की लड़की' फ़िल्म में शामिल मिर्ज़ा ग़ालिब की मशहूर ग़ज़ल "नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल जिसको सुनाये न बनें"। सुरैया की आवाज़ में इसी ग़ज़ल का आनंद आप ने कुछ दिनों पहले 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर लिया था, आज इसी का एक अन्य रूप, जिसे पंकज बाबू नें नौटंकी की लोकप्रिय शैली काफ़ी में स्वरबद्ध किया था।

और आइए अब कुछ उद्गार पढ़ें जिन्हें फ़िल्म जगत की कुछ जानीमानी हस्तियों ने व्यक्त किए हैं सहगल साहब की शान में। सबसे पहले ये हैं गायक मुकेश: "आज हमारे फ़िल्म इंडस्ट्री में कई गायक-कलाकार फ़िल्म संगीत की शोभा बढ़ा रहे हैं। मगर एक वक़्त ऐसा था जब इतने गायक नहीं थे। लेकिन उस वक़्त भी सिर्फ़ यही दीपक जल रहा था, जिसका नाम था कुंदन लाल सहगल। स्वरों के इस राजा नें, जिसनें फ़िल्म संगीत की शुरुआत की, कई फ़िल्मों में अभिनेता के रूप में भी काम किया, और फिर युं नज़रों से ओझल हो गया, मानो कहीं छुप गया हो, और देख रहा हो हमें, सुन रहा हो हमें, और मानो कह रहा हो कि कला की कोई सीमा नहीं है, तुम्हें अभी बहुत दूर जाना है, बहुत आगे बढ़ना है।" मुकेश के बाद ये हैं दादामुनि अशोक कुमार। दादामुनि नें भी उसी दौर में अभिनय शुरु किया था जब सहगल आसमान पर सूरज की तरह चमक रहे थे। "मैं तो मानता हूँ कि फ़िल्म संगीत की धारा बदल रही है, रूप भी बदल रहा है। कभी लगता है कि अपने अच्छे गायक और संगीतकार भी इसी जैज़ और लातिन अमरीकन संगीत की बाढ़ में बह जायेंगे। मेरा ख़याल है कि आज अगर सहगल ज़िंदा होते तो शायद इस बाढ़ को रोक सकते थे।" तो दोस्तों, आइए अब एक बार फिर भावविभोर होकर सुनें सहगल साहब की आवाज़ में ग़ालिब की यह ग़ज़ल फ़िल्म 'यहूदी की लड़की' से।



क्या आप जानते हैं...
कि 'पूरन भगत' और 'चण्डीदास' फ़िल्मों में सहगल के गाये अमर गीतों के पीछे पंकज मल्लिक का बहुत बड़ा योगदान था, लेकिन संगीतकार के रूप में आर.सी. बोराल का ही नाम पर्दे पर आया। पंकज बाबू बोराल साहब के सहायक थे इन फ़िल्मों में।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 3/शृंखला 13
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - सहगल साहब का गाया एक और क्लास्सिक गीत.

सवाल १ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - संगीतकार कौन हैं इस गीत के - ३ अंक
सवाल ३ - फिल्म के निर्देशक बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी बढ़त पर हैं पर अंजाना जी भी मौके की ताड़ में हैं, अवध जी सही जवाब आपका भी

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, February 10, 2010

मैं क्या जानूँ क्या जादू है- सहगल साहब की आवाज़ का जादू

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 341/2010/41

दोस्तों, 'ओल्ड इज़ गोल्ड' ने देखते ही देखते लगभग एक साल का सफ़र पूरा कर लिया है। पिछले साल २० फ़रवरी की शाम से शुरु हुई थी यह शृंखला। गुज़रे ज़माने के सदाबहार नग़मों को सुनते हुए हम साथ साथ जो सुरीला सफ़र तय किया है, उसको हमने समय समय पर १० गीतों की विशेष लघु शृंखलाओं में बाँटा है, ताकि फ़िल्म संगीत के अलग अलग पहलुओं और कलाकारों को और भी ज़्यादा नज़दीक से और विस्तार से जानने और सुनने का मौका मिल सके। आज १० फ़रवरी है और आज से जो लघु शृंखला शुरु होगी वह जाकर समाप्त होगी १९ फ़रवरी को, यानी कि उस दिन जिस दिन 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पूरा करेगा अपना पहला साल। इसलिए यह लघु शृंखला बेहद ख़ास बन पड़ी है, और इसे और भी ज़्यादा ख़ास बनाने के लिए हम इसमें लेकर आए हैं ४० के दशक के १० सदाबहार सुपर डुपर हिट गीत, जो ४० के दशक के १० अलग अलग सालों में बने हैं। यानी कि १९४० से लेकर १९४९ तक, दस गीत दस अलग अलग सालों के। हम यह दावा तो नहीं करते कि ये गीत उन सालों के सर्वोत्तम गीत रहे, लेकिन इतना आपको विश्वास ज़रूर दिला सकते हैं कि इन गीतों को आप ज़रूर पसंद करेंगे और उस पूरे दशक को, उस ज़माने के फ़नकारों को एक बार फिर सलाम करेंगे। तो पेश-ए-ख़िदमत है आज से लेकर अगले दस दिनों तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के पहले वर्ष की आख़िरी लघु शृंखला 'प्योर गोल्ड'। फ़िल्म संगीत के दशकों का अगर हम मानवीकरण करें तो मेरे ख़याल से ३० का दशक इसका शैशव है, ४० का दशक इसका बचपन, ५० और ६० के दशक इसका यौवन। क्यों सही कहा ना? यानी कि इस शृंखला में फ़िल्म संगीत के बचपन की बातें। १९३१ में 'आलम आरा' से जो यात्रा फ़िल्मों ने और फ़िल्म संगीत ने शुरु की थी, जिन कलाकारों की उंगलियाँ थामे संगीत की इस विधा ने चलना सीखा था, उनमें से कई कलाकार ४० के दशक में भी सक्रीय रहे। उस ज़माने में कलकत्ता हिंदी फ़िल्म निर्माण का एक मुख्य केन्द्र हुआ करता था। युं तो कई छोटी बड़ी कपनियाँ थीं वहाँ पर, पर उन सब में अग्रणी हुआ करता था 'न्यु थिएटर्स'। और अग्रणी क्यों ना हो, राय चंद बोराल, पंकज मल्लिक, कुंदन लाल सहगल, तिमिर बरन, कानन देवी, के. सी. डे जैसे कलाकार जिस कंपनी के पास हो, वो तो सब से आगे ही रहेगी ना! इस पूरी टीम ने ३० के दशक के मध्य भाग में फ़िल्म संगीत के घोड़े को विशुद्ध शास्त्रीय संगीत और नाट्य संगीत की भीड़ से बाहर खींच निकाला, और सुगम संगीत, लोक संगीत और पाश्चात्य ऒर्केस्ट्रेशन के संगम से फ़िल्म संगीत को एक निर्दिष्ट स्वरूप दिया, एक अलग पहचान दी। और फिर उसके बाद साल दर साल नये नये कलाकार जुड़ते गये, नये नये प्रयोग होते गये, और फ़िल्म संगीत एक विशाल वटवृक्ष की तरह फैल गया। आज यह वृक्ष इतना व्यापक हो गया है कि यह ना केवल मनोरंजन का सब से लोकप्रिय साधन है, बल्कि फ़िल्मों से भी ज़्यादा उनके गीत संगीत की तरफ़ लोग आकर्षित होते हैं।

ख़ैर, ४० के दशक का पहला साल १९४०, और इस साल के एक बेहतरीन गीत से इस शृंखला की शुरुआत हम कर रहे हैं। न्यु थिएटर्स के बैनर तले बनी फ़िल्म 'ज़िंदगी' का गीत कुंदन लाल सहगल की आवाज़ में, संगीतकार हैं पंकज मल्लिक और गीतकार हैं किदार शर्मा। फ़िल्म 'देवदास' के बाद सहगल साहब और जमुना इसी फ़िल्म में फिर एक बार एक ही पर्दे पर नज़र आये थे। और यह फ़िल्म भी प्रमथेश बरुआ के निर्देशन में ही बनी थी। इस गीत को अगर एक ट्रेंडसेटर गीत भी कहा जाए तो ग़लत ना होगा, क्योंकि इसमें मल्लिक जी ने जो पाश्चात्य ऒर्केस्ट्रेशन के नमूने पेश किए हैं, वह उस ज़माने के हिसाब से नये थे। दोस्तों, हम इस शृंखला में पंकज मल्लिक का गाया फ़िल्म 'कपालकुण्डला' का गीत "पिया मिलन को जाना" भी सुनवाना चाहते थे, लेकिन जैसे कि इस शृंखला की रवायत है कि एक साल का एक ही गीत सुनवा रहे हैं, इसलिए इस गीत को हम फिर कभी आपको ज़रूर सुनवाएँगे। लेकिन मल्लिक साहब के बारे में कुछ बातें यहाँ पर हम ज़रूर आपको बताना चाहेंगे। १० मई १९०५ को कलकत्ता में जन्मे पंकज मल्लिक ने कई फ़िल्मों में अभिनय किया था। संगीत के प्रति उनमें गहरा रुझान था। संगीत की बारीकियाँ सीखी दुर्गादास बैनर्जी और दीनेन्द्रनाथ टैगोर से। पंकज मल्लिक भारतीय सिनेमा संगीत आकाश के ध्रुव नक्षत्र हैं। महात्मा का मन और राजर्षी का हृदय, दोनों विधाता ने उन्हे दिए थे। सन् १९२६ में पंकज दा का पहला ग्रामोफ़ोन रिकार्ड रिलीज़ हुआ विडियोफ़ोन कंपनी से। १९२७ में इंडियन ब्रॊडकास्टिंग् कंपनी से जुड़े जहाँ उन्होने लम्बे अरसे तक प्रस्तुतकर्ता, संगीतकार और संगीत शिक्षक के रूप में काम किया। १९२९ से रेडियो पर संगीत शिक्षा पर केन्द्रित उनका कार्यक्रम प्रसारित होना शुरु हुआ। १९२९ में ही उनका एक और कार्यक्रम हर वर्ष दुर्गा पूजा के उपलक्ष्य पर रेडियो पर प्रसारित होता रहा, जिसका शीर्षक था 'महीषासुरमर्दिनी'। दोस्तों, यह रेडियो कार्यक्रम तब से लेकर आज तक प्रति वर्ष आकाशवाणी कोलकाता, अगरतला और पोर्ट ब्लेयर जैसे केन्द्रों से महालया (जिस दिन दुर्गा पूजा का देवी पक्ष शुरु होता है) की सुबह ४:३० बजे से ६ बजे तक प्रसारित होता है। एक साल ऐसा हुआ कि आकाशवाणी कोलकाता ने सोचा कि इस कार्यक्रम का एक नया संस्करण निकाला जाए और उस साल महालया की सुबह 'महीषासुरमर्दिनी' का नया संस्करण प्रसारित कर दिया गया। इसके चलते अगले दिन आकाशवाणी के कोलकाता केन्द्र में जनता ने इस क़दर विरोध प्रदर्शन किया और इस तरह इसकी समालोचना हुई कि अगले वर्ष से फिर से वही पंकज मल्लिक वाला संस्करण ही बजने लगा और आज तक बज रहा है। और आइए अब वापस आते हैं आज के गीत की फ़िल्म 'ज़िंदगी' पर। 'ज़िंदगी प्रमथेश बरुआ की न्यु थिएटर्स के लिए अंतिम फ़िल्म थी। इसी साल, यानी कि १९४० में एक भयंकर अग्निकांड ने न्यु थिएटर्स को भारी नुकसान पहुँचाया। बेहद अफ़सोस इस बात का रहा कि इस कंपनी की सारी फ़िल्मों के नेगेटिव्स उस आग की चपेट में आ गए। चलिए दोस्तों, अब आज का गीत सुना जाए, ४० के दशक की और भी कई रोचक जानकारी हम इस शृंखला में आपको देते रहेंगे, फ़िल्हाल १९४० को सलाम करता हुआ सहगल साहब की आवाज़, "मैं क्या जानू क्या जादू है"। भई हम तो यही कहेंगे कि यह जादू है सहगल साहब की आवाज़ का, मल्लिक साहब की धुनों का, और शर्मा जी के बोलों का।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. साथ ही जवाब देना है उन सवालों का जो नीचे दिए गए हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

भंवरे मंडलाये क्यों,
तू फूल फूल हरजाई,
नैन तेरे बतियाते हैं,
किस भाषा में सौदाई...

1. बताईये इस गीत की पहली पंक्ति कौन सी है - सही जवाब को मिलेंगें ३ अंक.
2. ये गायिका का पहला हिंदी फ़िल्मी गीत है, कौन है ये गायिका - सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.
3. इस संगीतकार के नाम से पहले "मास्टर" लगता है, इनका पूरा नाम बताईये -सही जवाब के मिलेंगें १ अंक.
4. १९४१ में आई इस फिल्म का नाम क्या है जिसका ये गीत है - सही जवाब के मिलेंगें १ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी आपके सुझाव पर आज से हम पहेली का रूप रंग बदल रहे हैं. आज से एक बार फिर नए सिरे से मार्किंग करेंगे. शरद जी आप अब तक आगे चल रहे थे, पर मुझे लगता है इस नए प्रारूप में आपको भी मज़ा आएगा.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, January 18, 2010

सो जा राजकुमारी सो जा...हिंदी फिल्म संगीत के पहले सुपर सिंगर को नमन

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 318/2010/18

'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर इन दिनों हम अपको सुनवा रहे हैं लघु शृंखला 'स्वरांजली', जिसके अन्तर्गत हम याद कर रहे हैं फ़िल्म संगीत के उन लाजवाब कलाकारों को जो या तो हमसे बिछड़े थे जनवरी के महीने में, या फिर वो मना रहे हैं अपना जन्मदिन इस महीने। यशुदास और जावेद अख़तर को हम जनमदिन की शुभकामनाएँ दे चुके हैं, और श्रद्धांजली अर्पित की है सी. रामचन्द्र, जयदेव, चित्रगुप्त, कैफ़ी आज़मी, और ओ. पी. नय्यर को। आज १८ जनवरी जिस महान कलाकार का स्मृति दिवस है, उनके बारे में यही कह सकते हैं कि वो हिंदी सिनेमा के पहले सिंगिंग् सुपरस्टार हैं, जिन्होने फ़िल्म संगीत को एक दिशा दिखाई। जब फ़िल्म संगीत का जन्म हुआ था, उस समय प्रचलित नाट्य और शास्त्रीय संगीत ही सीधे सीधे फ़िल्मी गीतों के रूप में प्रस्तुत कर दिए जाते थे। लेकिन इस अज़ीम गायक अभिनेता फ़िल्मों में लेकर आए सुगम संगीत और जिनकी उंगली थाम फ़िल्म संगीत ने चलना सीखा, आगे बढ़ना सीखा, अपना एक अलग पहचान बनाया। आप हैं फ़िल्म जगत के पहले सिंगिंग् सुपरस्टार कुंदन लाल सहगल। सहगल साहब ने फ़िल्म संगीत में जो योगदान दिया है, उनका शुक्रिया अदा करने की किसी के पास ना तो शब्द हैं और ना ही कोई और तरीक़ा। फिर भी विविध भारती उन्हे श्रद्धा स्वरूप दशकों से अपने दैनिक 'भूले बिसरे गीत' कार्यक्रम में हर रोज़ याद करते हैं कार्यक्रम के अंतिम गीत के रूप में। और यह सिलसिला दशकों से बिना किसी रुकावट से चली आ रही है। सहगल साहब की आवाज़ में 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के ५०-वे एपिसोड में हमने आपको फ़िल्म 'शाहजहाँ' का गीत सुनवाया था "ग़म दिए मुस्तक़िल"। आज हम कुछ साल और पीछे की तरफ़ जा रहे हैं और आपके लिए चुन कर लाए हैं सन् १९४० की फ़िल्म 'ज़िंदगी' से सहगल साहब की गाई हुई लोरी "सो जा राजकुमारी सो जा"। इस फ़िल्म में संगीत पकज मल्लिक साहब का था, और सहगल साहब के अलावा फ़िल्म में अभिनय किया जमुना और पहाड़ी सान्याल ने। इस कालजयी लोरी को लिखा था किदार शर्मा ने। यह लोरी फ़िल्मी लोरियों में एक ख़ास मुक़ाम रखती है। सहगल साहब की कोमल आवाज़ जिस तरह से "सो जा" कहती है, बस सुन कर ही इसे अनुभव किया जा सकता है।

दोस्तों, सहगल साहब का १८ जनवरी १९४७ को निधन हो गया था। शराब की लत ऐसी लग गई थी कि कोई दवा काम न आ सकी। उनके दिमाग़ में यह बात बैठ गई थी कि जब तक वो शराब न पी लें, वो अच्छी तरह से गा नहीं सकते। एक बार नौशद साहब ने फ़िल्म 'शाहजहाँ' के गाने की रिकार्डिंग् के दौरान उनसे कहा कि आप बिना पीये मुझे एक टेक दे दीजिए, फिर उसके बाद आप जो कहेँगे हम सुनेँगे। सहगल साहब मान गए, बिना पीए टेक दे दिया और उसके बाद फिर पीना शुरु किया। घर जाने से पहले नशे की हालत में फिर एक टेक उन्होने दिया, जो उनके हिसाब से बिना पीये टेक से बेहतर था। अगले दिन नौशाद साहब ने दोनों टेक सहगल साहब को सुनवाए लेकिन यह नहीं बताया कि कौन सा टेक बिना पीये है और कौन सा नशे की हालत में। सहगल साहब ने बिना पीये टेक को बेहतर क़रार देते हुए कहा कि देखा, मैंने कहा था न कि बिना पीये मेरी आवाज़ नहीं खुलती! इस पर जब नौशाद साहब ने उनसे कहा कि दरअसल यह बिना पीये वाला रिकार्डिंग् था तो वो आश्चर्यचकित रह गए। नौशाद साहब ने उनसे कहा था कि "जिन लोगों ने आप से यह कहा है कि पीये बग़ैर आपकी आवाज़ नहीं खुलती, वो आपके दोस्त नहीं हैं।" ये सुनकर सहगल साहब का जवाब था "अगर यही बात मुझसे पहले किसी ने कहा होता तो शायद कुछ दिन और जी लेता!!!" दोस्तों, लता मंगेशकर ने ९० के दशक में 'श्रद्धांजली' शीर्षक से एक ट्रिब्युट ऐल्बम जारी किया था जिसमें उन्होने सुनहरे दौर के दिग्गज गायकों को श्रद्धांजली स्वरूप याद करते हुए उनके एक एक गाने गाए थे। पहला गाना सहगल साहब का था, और आपको पता है वह कौन सा गाना था? जी हाँ, आज का प्रस्तुत गीत। लता जी कहती हैं, "स्वर्गीय श्री के. एल. सहगल, वैसे तो उनसे सीखने का सौभाग्य मुझे प्राप्त नहीं हुआ, मगर उनके गाए गानें सुन सुन कर ही मुझमें सुगम संगीत गाने की इच्छा जागी। मेरे पिताजी, श्री दीनानाथ मंगेशकर, जो अपने ज़माने के माने हुए गायक थे, उनको सहगल साहब की गायकी बहुत पसंद थी। वो अक्सर मुझे सहगल साहब का कोई गीत सुनाने को कहते थे।" चलिए दोस्तों, सहगल साहब की स्वर्णिम आवाज़ में सुनते है फ़िल्म 'ज़िंदगी' का यह गीत। बेहद बेहद ख़ास है आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड', है न?



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

तरसे अखियाँ,
बरसे बादल,
सूखी दुनिया,
दिल का अंचल

अतिरिक्त सूत्र - इस गीतकार ने ९ जनवरी २००३ का दिन चुना था दुनिया को अलविदा कहने के लिए

पिछली पहेली का परिणाम-


खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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