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मंगलवार, 18 मई 2010

मोरा पिया मोसे बोलत नाहीं.. लोक, शास्त्रीय और पाश्चात्य-संगीत की मोहक जुगलबंदी का नाम है "राजनीति"

ताज़ा सुर ताल १९/२०१०

विश्व दीपक - नमस्कार दोस्तों, 'ताज़ा सुर ताल' की एक और ताज़ी कड़ी के साथ हम हाज़िर हैं। आज जिस फ़िल्म के संगीत की चर्चा हम करने जा रहे हैं वह है प्रकाश झा की अपकमिंग् फ़िल्म 'राजनीति'। १० बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित प्रकाश झा ने हमेशा ही अपने फ़िल्मों में समाज और राजनीति के असली चेहरों से हमारा बावस्ता करवाया है। और 'राजनीति' भी शायद उसी जौनर की फ़िल्म है।

सुजॊय - हाँ, और सुनने में आया है कि 'राजनीति' की कहानी जो है वह सीधे 'महाभारत' से प्रेरित है। दर-असल यह एक ऐसी औरत के सफर की कहानी है जो भ्रष्टाचार से लड़ती हुईं देश की प्रधान मंत्री बन जाती हैं। कैटरीना कैफ़ ने ही यह किरदार निभाया है और ऐसा कहा जा रहा है कि यह चरित्र सोनिया गांधी से काफ़ी मिलता-जुलता है, वैसे कैटरीना का यह कहना है कि उन्होंने प्रियंका गाँधी के हावभाव को अपनाया है। ख़ैर, फ़िल्म की कहानी पर न जाते हुए आइए अब सीधे फ़िल्म के संगीत पक्ष पर आ जाते हैं।

विश्व दीपक - लेकिन उससे पहले कम से कम हम इतना ज़रूर बता दें कि 'राजनीति' में कैटरीना कैफ़ के अलावा जिन मुख्य कलाकारों ने काम किए हैं वो हैं अजय देवगन, नाना पाटेकर, रणबीर कपूर, नसीरुद्दिन शाह, अर्जुन रामपाल, मनोज बाजपयी, सारा थॊम्पसन, दर्शन जरीवाला, श्रुति सेठ. निखिला तिरखा, चेतन पण्डित, विनय आप्टे, किरण कर्मकार, दया शंकर पाण्डेय, जहांगीर ख़ान, और रवि खेमू।

सुजॊय - वाक़ई बहुत बड़ी स्टार कास्ट है। विश्व दीपक जी, अभी हाल ही में एक फ़िल्म रिलीज़ हुई थी 'स्ट्राइकर', आपको याद होगा। फ़िल्म कब आयी कब गयी पता ही नहीं चला, लेकिन उस फ़िल्म के संगीत में कुछ बात थी। और सब से बड़ी बात यह थी कि उसमें ६ अलग अलग संगीतकार थे और ६ अलग अलग गीतकार। 'स्ट्राइकर' फ़िल्म की हमने जिस अंक में चर्चा की थी, हमने कहा था शायद यह पहली फ़िल्म है इतने सारे संगीतकार गीतकार वाले। अब देखिए, 'राजनीति' में भी वही बात है।

विश्व दीपक - हाँ, लगता है कुछ फ़िल्मकार अब इस राह पर भी चलने वाले हैं। अच्छी बात है कि एक ही एल्बम के अंदर लोगों को और ज़्यादा विविधता मिलेगी। अगर एक ही फ़िल्म में प्रीतम, शान्तनु मोइत्रा, आदेश श्रीवास्तव, और वेन शार्प जैसे बिल्कुल अलग अलग शैली के संगीतकार हों, तो लोगों को उसमें दिलचस्पी तो होगी ही।

सुजॊय - तो चलिए, 'राजनीति' का पहला गाना सुनते हैं मोहित चौहान और अंतरा मित्रा की आवाज़ों में। गीत इरशाद कामिल का है और धुन प्रीतम की।

गीत: भीगी सी भागी सी


सुजॊय - प्रीतम और इरशाद कामिल की जोड़ी ने हमेशा हिट गीत हमें दिए हैं। इस गीत को सुन कर भी लगता है कि यह लम्बी रेस का घोड़ा बनेगा। एक बार सुन कर शायद उतना असर ना कर पाए, लेकिन दो तीन बार सुनने के बाद गीत दिल में उतरने लगती है। मेलडी के साथ साथ एक यूथ अपील है इस गीत में।

विश्व दीपक - जी हाँ, आप सही कह रहे हैं और जिस तरह से गीत को रचा गया है, वह भी काफ़ी अलग तरीके का है। अमूमन मोहित चौहान हीं अपने आलाप के साथ गीत की शुरूआत करते हैं, लेकिन इस गाने में पहली दो पंक्तियाँ अंतरा मित्रा की हैं, जो अपनी मीठी-सी आवाज़ के जरिये मोहित की पहाड़ी आवाज़ के लिए रास्ता तैयार करती हैं। और जहाँ तक मोहित की बात है तो ये किसी से छुपा नहीं है कि मोहित इरशाद-प्रीतम के पसंदीदा गायक हैं और वे कभी निराश भी नहीं करते। इस गाने में इरशाद का भी कमाल दिख पड़ता है। "संदेशा", "अंदेशा", "गुलाबी", "शराबी" जैसे एक-दूसरे से मिलते शब्द कानों को बड़े हीं प्यारे लगते हैं।

सुजॊय - चलिए इस गीत के बाद अब जो गीत हम सुनेंगे वह शायद फ़िल्म का सब से महत्वपूर्ण गीत है। तभी तो फ़िल्म के प्रोमोज़ में इसी गीत का सहारा लिया जा रहा है। "मोरा पिया मोसे बोलत नाही, द्वार जिया के खोलत नाही"। शास्त्रीय और पाश्चात्य संगीत का सुंदर फ़्युज़न सुनने को मिलता है इस गीत में, जिसे आदेश श्रीवास्तव ने स्वरबद्ध किया है और गाया भी ख़ुद ही है। पार्श्व में उनका साथ दिया है शशि ने तो अंग्रेज़ी के शब्दों को अपनी मोहक आवाज़ से सजाया है रोज़ाली निकॊलसन ने। इस गीत को लिखा है समीर ने। बहुत दिनों के बाद समीर और आदेश श्रीवस्तव का बनाया गीत सुनने को मिल रहा है। लेकिन अच्छी बात यह है कि इन्होने ९० के दशक के अंदाज़ में नहीं, बल्कि समय के साथ चलते हुए इसी दौर के टेस्ट के मुताबिक़ इस गीत को ढाला है।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, वैसे शायद आपको यह याद हो कि कुछ सालों पहले पाकिस्तानी ग्रुप फ़्युज़न का एक गीत आया था "मोरा सैंया मोसे बोले ना"। यह गीत बाद में "नागेश कुकुनूर" की फिल्म "हैदराबाद ब्लूज़-२" में भी सुनने को मिला था और हाल-फिलहाल में इसे "अमन की आशा" में शामिल किया गया है। मेरे हिसाब से "समीर"/"आदेश श्रीवास्तव" इस गाने की पहली पंक्ति से प्रेरित हुए हैं और उन्होंने उस पंक्ति में आवश्यक परिवर्त्तन करके इस गाने को एक अलग हीं रूप दे दिया है। या ये भी हो सकता है कि यह पंक्ति किसी पुराने सूफ़ी कवि की हो, जहाँ से दोनों गानों के गीतकार प्रभावित हुए हों। मुझे ठीक-ठीक मालूम नहीं,इसलिए कुछ कह नहीं सकता। वैसे जो भी हो, समीर ने इस गाने को बहुत हीं खूबसूरत लिखा है और उसी खूबसूरती से आदेश ने धुन भी तैयार की है। आदेश श्रीवास्तव हर बार हीं अपने संगीत से हम सबको चौंकाते रहे हैं, लेकिन इस बार तो अपनी आवाज़ के बदौलत इन्होंने हम सबको स्तब्ध हीं कर दिया है। इनकी आवाज़ में घुले जादू को जानने के लिए पेश-ए-खिदमत है आप सबके सामने यह गीत:

गीत: मोरा पिया


सुजॊय - इसी गीत का एक रीमिक्स वर्ज़न भी है, लेकिन ख़ास बात यह कि सीधे सीधे ऒरिजिनल गीत का ही रीमिक्स नहीं कर दिया गया है, बल्कि कविता सेठ की आवाज़ में इस गीत को गवाकर दीप और डी.जे. चैण्ट्स के द्वारा रीमिक्स करवाया गया है। मेरा व्यक्तिगत विचार है कि आदेश श्रीवास्तव वाला वर्जन बेहतर है। आइए सुनते हैं कविता सेठ की आवाज़ में यह गीत:

गीत: मोरा पिया मोसे बोलत नाही (ट्रान्स मिक्स)


विश्व दीपक - प्रीतम-इरशाद कामिल और आदेश-समीर के बाद अब बारी है शांतनु-स्वानंद की। शांतनु मोइत्रा और स्वानंद किरकिरे की जोड़ी भी एक कमाल की जोड़ी है, जिनका स्कोर १००% रहा है। भले इनकी फ़िल्में बॊक्स ऒफ़िस पर कामयाब रही हो या असफल, इनके गीत-संगीत के साथ हमेशा ही 'ऒल इज़ वेल' रहा है। '३ इडियट्स' की अपार लोकप्रियता के बाद अब 'राजनीति' में ये दोनों वापस आए हैं और केवल एक गीत इन्होने इस फ़िल्म को दिया है। यह एक डांस नंबर है "इश्क़ बरसे बूंदन बूंदन"।

सुजॊय - प्रणब बिस्वास, हंसिका अय्यर और स्वानंद किरकिरे की आवाज़ों में यह गीत एक मस्ती भरा गीत है। 'लागा चुनरी में दाग' फ़िल्म के "हम तो ऐसे हैं भ‍इया" की थोड़ी बहुत याद आ ही जाती है इस गीत को सुनते हुए। स्वानंद किरकिरे क्रमश: एक ऐसे गीतकार की हैसियत रखने लगे हैं जिनकी लेखन शैली में एक मौलिकता नज़र आती है। भीड़ से अलग सुनाई देते हैं उनके लिखे हुए गीत। और भीड़ से अलग है शांतनु का संगीत भी। "मोरा पिया" में अगर शास्त्रीय संगीत के साथ पाश्चात्य का फ़्युज़न हुआ है, तो इस गीत में हमारे लोक संगीत और शास्त्रीय संगीत का संगम है। कुल मिलाकर एक कर्णप्रिय गीत है पिछले गीत की तरह ही। सुनते हैं बारिश को समर्पित यह गीत और इस चिलचिलाती गर्मी में थोड़ी सी राहत की सांस लेते हैं इस गीत को सुनते हुए।

गीत: इश्क़ बरसे


सुजॊय - और अब गुलज़ार के कलम की जादूगरी। "धन धन धरती रे" गीत समर्पित है इस धरती को। वेन शार्प के संगीत से सजे इस गीत के दो रूप हैं। पहले वर्ज़न में आवाज़ है शंकर महादेवन की और दूसरी में सोनू निगम की। सोनू वाले वर्ज़न का शीर्षक रखा गया है "कॊल ऒफ़ दि सॊयल"। एक देश भक्ति की भावना जागृत होती है इस गीत को सुनते हुए। पार्श्व में बज रहे सैन्य रीदम के इस्तेमाल से यह भावना और भी ज़्यादा बढ़ जाती है। मुखड़े से पहले जो शुरुआती बोल हैं "बूढ़ा आसमाँ, धरती देखे रे, धन है धरती रे, धन धन धरती रे", इसकी धुन "वंदे मातरम" की धुन पर आधारित है। और इसे सुनते हुए आपको दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले "बजे सरगम हर तरफ़ से गूंजे बन कर देश राग" गीत की याद आ ही जाएगी।

विश्व दीपक - सुजॊय जी, सही पकड़ा है आपने। वैसे इस गीत के बारे में कुछ कहने से पहले मैं वेन शार्प से सबको परिचित करवाना चाहूँगा। वेन शार्प एक अमेरिकन संगीतकार हैं, जिन्होंने इससे पहले प्रकाश झा के हीं "गंगाजल" और "अपहरण" में संगीत दिया है। साथ हीं साथ पिछले दिनों आई फिल्म "लाहौर" में भी इन्हीं का संगीत था। ये एकलौते अमेरिकन संगीतकार हैं जिन्हें फिल्मफ़ेयर से नवाजा गया है। अब तो ये प्रकाश झा के फेवरेट बन चुके हैं। चूँकि ये हिन्दी नहीं समझते, इसलिए इनका संगीत पूरी तरह से निर्देशक की सोच और गीतकार के शब्दों में छुपी भावना पर निर्भर करता है। इनका मानना है कि हिन्दी फिल्म-संगीत की तरफ़ इनका रूझान "ए आर रहमान" की "ताल" को सुनने के बाद हुआ। चलिए अब इस गाने की भी बात कर लेते हैं। तो इस गाने में "वंदे मातरम" को एक नया रूप देने की कोशिश की गई है। धरती को पूजने की बजाय गुलज़ार साहब ने धरती की कठिनाईयों की तरफ़ हम सबका ध्यान आकर्षित किया है और इसके लिए उन्होंने बड़े हीं सीधे और सुलझे हुए शब्द इस्तेमाल किए हैं, जैसे कि "सूखा पड़ता है तो ये धरती फटती है।" अंतिम पंक्तियों में आप "सुजलां सुफलां मलयज शीतलां, शस्य श्यामलां मातरम" को महसूस कर सकते हैं। अब ज्यादा देर न करते हुए हम आपको दोनों हीं वर्जन्स सुनवाते हैं। आप खुद हीं निर्णय लें कि आपको किसकी गायकी ने ज्यादा प्रभावित किया:

गीत: धन धन धरती (शंकर महादेवन)


गीत: धन धन धरती रिप्राईज (सोनू निगम)


"राजनीति" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****
तो दोस्तों, अब आपकी बारी है, कहिए 'राजनीति' के गानें कैसे लगे आपको? क्या कुछ ख़ास बात लगी इन गीतों में? क्या आपको लगता है कि चार अलग अलग तरह के गीतकार-संगीतकार जोड़ियों से फ़िल्म के गीत संगीत पक्ष को फ़ायदा पहुँचा है? प्रकाश झा के दूसरे फ़िल्मों के गीत संगीत की तुलना में इस फ़िल्म को आप क्या मुक़ाम देंगे? ज़रूर लिख कर बताइएगा टिप्पणी में।

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ५५- हाल ही में ख़बर छपी थी कि रणबीर कपूर लता जी से मिलने वाले हैं किसी ख़ास मक़सद के लिए। बता सकते हैं क्या है वह ख़ास मक़सद?

TST ट्रिविया # ५६- गीतकार समीर एक इंटरविउ में बता रहे हैं - "मैने अपना गीत जब अमित जी (अमिताभ बच्चन) को सुनाया, तो वो टेबल पर खाना खा रहे थे। वो गाने लगे और रोने भी लगे, उनको अपनी बेटी श्वेता याद आ गईं।" दोस्तों, जिस गीत के संदर्भ में समीर ने ये शब्द कहे, उस गीत को आदेश श्रीवास्तव ने स्वरबद्ध किया था। अंदाज़ा लगा सकते हैं कौन सा गीत है यह?

TST ट्रिविया # ५७- प्रकाश झा ने 'राजनीति' में गुलज़ार साहब से एक गीत लिखवाया है। क्या आप १९८४ की वह मशहूर फ़िल्म याद कर सकते हैं जिसमें गुलज़ार साहब ने प्रकाश झा के साथ पहली बार काम किया था?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. प्रशान्त तामांग।
२. प्रकाश मेहरा, जिन्होने लिखा था "जिसका कोई नहीं उसका तो ख़ुदा है यारों"।
३. फ़िल्म 'अपना सपना मनी मनी' में "देखा जो तुझे यार, दिल में बजी गिटार"।

सीमा जी, आपके दोनों जवाब सही हैं। तीसरे सवाल का जवाब तो आपने जान हीं लिया। दिमाग पर थोड़ा और जोड़ देतीं तो इस सवाल का जवाब भी आपके पास होता। खैर कोई नहीं.. इस बार की प्रतियोगिता में हिस्सा लीजिए।

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