Thursday, December 1, 2011

एक राधा एक मीरा, दोनों ने श्याम को चाहा...दादु की दिव्य चेतना में कायम रहे उनकी संगीत साधना

टी.पी. साहब ने ज़िक्र किया कि दादु, राज साहब को गाना सुनाओ। यह गीत मैंने 'जीवन' फ़िल्म के लिए लिखा था, 'राजश्री' वालों के लिए। दो ऐसे गीत हैं जो दूसरी फ़िल्म में आ गए, उसमें से एक है 'अखियों के झरोखों से' का टाइटल सॉंग, सिप्पी साहब के लिए लिखा था जो 'घर' फ़िल्म बना रहे थे, लेकिन वो कुछ ऐसी बात हो गई कि उनके डिरेक्टर को पसन्द नहीं आया, उनको गाना ठंडा लगा। तो मैंने राज बाबू को सुना दिया तो उन्होंने यह टाइटल रख लिया। फिर सिप्पी साहब ने वही गाना माँगा मुझसे, मैंने कहा कि अब तो मैंने गाना दे दिया किसी को। बाद में ज़रा वो नाख़ुश भी हो गए थे। तो यह गाना 'जीवन' फ़िल्म के लिए, प्रशान्त नन्दा जी डिरेक्ट करने वाले थे, उसके लिए "एक राधा एक मीरा" लिखा था मैंने। तो राज साहब वहाँ बैठे थे। तो यह गाना जब सुनाया तो राज साहब ने दिव्या से पूछा कि यह गीत किसी को दिया तो नहीं? मैंने कहा कि नहीं, दिया तो नहीं! राज साहब तीन दिन थे और तीनो दिन वो मुझसे यह गाना सुनते रहे। और टी.पी. भाईसाहब से सवा रुपय लिया और मुझे देकर कहा कि आज से यह गाना मेरा हो गया, मुझे दे दो।
ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 800/2011/240

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और स्वागत है आप सभी का इस स्तंभ के ८००-वे अंक में। जी हाँ, आज हम लगा रहे हैं अपना आठवाँ शतक और इस अवसर पर मैं और सजीव सारथी, साथी कृष्णमोहन मिश्र के साथ आप सभी श्रोता-पाठकों को हार्दिक धन्यवाद देता हूँ। रवीन्द्र जैन पर केन्द्रित शृंखला 'मेरे सुर में सुर मिला ले' की आज अन्तिम कड़ी में बातें राज कपूर और रवीन्द्र जैन की जोड़ी की। आपको पता है कि जिस दिन जैन साहब के बेटे का जन्म हुआ था, उसी दिन उन्हें राज कपूर से यह ख़ुशख़बरी मिली थी कि जैन साहब को 'राम तेरी गंगा मैली' के लिए गीतकार-संगीतकार चुन लिया गया है। आगे रवीन्द्र जैन साहब की ज़ुबानी पढ़िए - "राज साहब को एक दिन ऐसे ही मैंने कह दिया था कि राज साहब, एक दिन में दो अच्छी ख़बरें मिलना तो मुश्किल है, तो 'राम तेरी गंगा मैली' मिल गई, सबसे बड़ी ख़बर है, उनके मन में यह बात कैसे बैठ गई थी, उन्होंने मुझे बुलाया और शिरडी ले गए, शिरडी ले जाके कृष्णा भाभी को उन्होंने फ़ोन किया था, तब मुझे पता चला कि मेरे लिए वो बेटा माँगने आए थे। राज साहब को जो पसंद आ गया न, या उनके मेण्टल लेवेल पे जो फ़िट बैठ गया न, उनको लगता था कि मेरा काम होनेवाला है। उसका बड़ा पर्सोनल केयर करते थे और हर तरह से ख़ुश रखते थे और 'he knew how take out the work', और कैसे डील करना है अपने कम्पोज़र से, अपने नए आर्टिस्ट्स से, किस तरह 'best of their capability' काम कराना है, वो बहुत अच्छी तरह जानते थे। एक बार, हमारे कॉमन फ़्रेण्ड थे टी. पी. झुनझुनवाला साहब, वो इन्कम टैक्स कमिशनर थे, मुंबई में भी थे, लेकिन बेसिकली दिल्ली रहते थे। तो वहाँ उनके बिटिया की शादी थी। तो जैसे शादियों में संगीत की महफ़िल होती है, मैं भी गया था, मैं, हेमलता, दिव्या (रवीन्द्र जैन की पत्नी), टी.पी. भाईसाहब, हम सब लोग वहाँ पे थे। टी.पी. साहब ने ज़िक्र किया कि दादु, राज साहब को गाना सुनाओ। यह गीत मैंने 'जीवन' फ़िल्म के लिए लिखा था, 'राजश्री' वालों के लिए। दो ऐसे गीत हैं जो दूसरी फ़िल्म में आ गए, उसमें से एक है 'अखियों के झरोखों से' का टाइटल सॉंग, सिप्पी साहब के लिए लिखा था जो 'घर' फ़िल्म बना रहे थे, लेकिन वो कुछ ऐसी बात हो गई कि उनके डिरेक्टर को पसन्द नहीं आया, उनको गाना ठंडा लगा। तो मैंने राज बाबू को सुना दिया तो उन्होंने यह टाइटल रख लिया। फिर सिप्पी साहब ने वही गाना माँगा मुझसे, मैंने कहा कि अब तो मैंने गाना दे दिया किसी को। बाद में ज़रा वो नाख़ुश भी हो गए थे। तो यह गाना 'जीवन' फ़िल्म के लिए, प्रशान्त नन्दा जी डिरेक्ट करने वाले थे, उसके लिए "एक राधा एक मीरा" लिखा था मैंने। तो राज साहब वहाँ बैठे थे। तो यह गाना जब सुनाया तो राज साहब ने दिव्या से पूछा कि यह गीत किसी को दिया तो नहीं? मैंने कहा कि नहीं, दिया तो नहीं! राज साहब तीन दिन थे और तीनो दिन वो मुझसे यह गाना सुनते रहे। और टी.पी. भाईसाहब से सवा रुपय लिया और मुझे देकर कहा कि आज से यह गाना मेरा हो गया, मुझे दे दो। अब राज साहब को यह कौन पूछे कि इसका क्या करेंगे, न कोई कहानी है, न कोई बात। तो वहीं उन्होंने यह गीत तय कर लिया, फिर मुझे बम्बई बुलाया, कुछ गानें सुने, 'and he gave me a token of Rs 5000' कि तुम आज से RK के म्युज़िक डिरेक्टर हो गए।"

दोस्तों, आपने जाना कि "एक राधा एक मीरा" वह गीत था जिसकी बदौलत राज कपूर नें रवीन्द्र जैन को RK Camp में एन्ट्री दी, और यही नहीं इसी गीत को आधार बनाकर 'राम तेरी गंगा मैली' की कहानी लिखी गई। है न मज़ेदार और हैरत वाली बात! और दोस्तों, इस गीत के तो वाकई क्या कहने। पता है रवीन्द्र जैन के गीतों में से अगर मुझे एक गीत गीत चुनना हुआ तो मैं सदा इसी गीत को चुनूंगा। कुछ तो है इस गीत में कि जब भी इसे सुनें आंखें बरबस नम हो जाती हैं। राधा और मीरा के श्रीकृष्ण प्रेम में अन्तर को शायद इससे सुन्दर अभिव्यक्ति नहीं मिल सकती। रवीन्द्र जैन ने जिस काव्यात्मक तरीके से इस अन्तर को व्यक्त किया है, इस गीत के लिए दादु को प्रणाम करने का मन करता है। आइए आज इस अद्वितीय गीत को सुनें, लेकिन उससे पहले इस कविता को यहाँ लिखने का मन कर रहा है।

एक राधा एक मीरा,
दोनों ने श्याम को चाहा,
अन्तर क्या दोनों की चाह में बोलो,
एक प्रेम दीवानी, एक दरस दीवानी।

राधा ने मधुबन में ढूंढा,
मीरा ने मन में पाया,
राधा जिसे खो बैठी वो गोविन्द
मीरा हाथ बिकाया,
एक मुरली एक पायल
एक पगली एक घायल
अन्तर क्या दोनों की प्रीत में बोलो,
एक सूरत लुभानी, एक मूरत लुभानी।

मीरा के प्रभु गिरिधर नागर,
राधा के मनमोहन,
राधा नित शृंगार करे,
और मीरा बन गई जोगन,
एक रानी एक दासी
दोनों हरि प्रेम की प्यासी,
अन्तर क्या दोनों की तृप्ति में बोलो,
एक जीत न मानी, एक हार न मानी।

तो आइए सुनते हैं राग किरवानी पर आधारित यह गीत और इसी के साथ रवीन्द्र जैन जी को ढेरों शुभकामनाए~म देते हुए उनके गीतों से सजी यह लघु शृंखला 'मेरे सुर में सुर मिला ले' हम यहीं समाप्त करते हैं। इस सूचना के साथ कि अगली शृंखला श्री कृष्णमोहन मिश्र प्रस्तुत करेंगे, और राज कपूर के संगीतकारों का ज़िक्र जारी रहेगा उस शृंखला में भी, आज मैं अनुमति लेता हूँ, 'शनिवार विशेष' में फिर आपकी और हमारी मुलाक़ात होगी, नमस्कार!



खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


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4 comments:

कृष्णमोहन said...

नये जाल-स्थल पर ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ का आठवाँ शतक लगाने पर सूजोय जी को बधाई। एक सुझाव है, ताज़ा पोस्ट संक्षिप्त न देकर पूरा-पूरा दें। अगली पोस्ट आने पर इसे संक्षिप्त कर दिया करें। आलेख के नीचे ही comments का स्थान रखें तो पाठकों को सुविधा रहेगी।

Sajeev said...

कृष्ण मोहन जी आपका आदेश सर आँखों पर :) मैं भी यही सोच रहा था. मैं बहुत खुशकिस्मत रहा हूँ कि मुझे दादू यानी रविन्द्र जैन के साथ पूरा एक दिन व्यतीत करने का मौका मिला. अद्भुत इंसान है वो...और सुजॉय ने जो गाने चुने वो भी सब कमाल के हैं, खास कर ये वाला और "श्याम तेरी बंसी.."

AVADH said...

प्रिय सुजॉय,सजीव,कृष्ण मोहन जी एवं रेडियो प्लेबैक टीम के सब सदस्यों को नवीन प्रयास के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं.
ओल्ड इस गोल्ड की ८००वीं कड़ी पूरी करने के लिए बहुत बहुत बधाई. मैं सौभाग्यशाली हूँ कि मैं प्रथम कड़ी से ही इसका रसास्वादन कर पाया. किसी भी श्रृंखला को इतनी लंबी अवधि तक चलाना बहुत बड़ी उपलब्धि तो है ही परन्तु एक बड़ी चुनौती होती है उसकी स्तरीयता को निरंतर कायम रख पाना और अपने पाठक/श्रोता वृन्द को इस प्रकार बाँध सकना कि वोह सदैव आगामी कड़ी की उत्सुकता सहित प्रतीक्षा करते रहें. आप सब लोगों ने जिस कठिन परिश्रम और लगन से हम लोगों को संगीत रस के आनंद की अनुभूति कराई है उसके लिए आप सबका बहुत बहुत आभार और साधुवाद.
अवध लाल

Unknown said...

Bahut Sunder shrankhla hai

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