Wednesday, December 28, 2011

खुशियाँ ही खुशियाँ हो....जीवन में आपके यही दुआ है ओल्ड इस गोल्ड टीम की



प्रेम किशन और श्यामली की आवाज़ बन कर येसुदास और बनश्री गीत का अधिकांश हिस्सा गाते हैं जबकि हेमलता रामेश्वरी की आवाज़ बन कर अन्तिम अन्तरा गाती हैं, वह भी थोड़े उदास या डीसेन्ट अन्दाज़ में। आइए आज गायिका बनश्री सेनगुप्ता की थोड़ी बातें की जाए। आज के इस गीत के अलावा उन्होंने किसी हिन्दी फ़िल्म में गाया है या नहीं, इस बात की तो मैं पुष्टि नहीं कर पाया, पर बंगला संगीत जगत में उनका काफ़ी नाम है और बहुत से सुन्दर गीत उन्होंने गाए हैं।

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 819/2011/259

'आओ झूमे गाएं' शृंखला के कल की कड़ी में आपनें तीन गायकों की आवाज़ों का आनन्द लिया था। आज भी मामला कुछ वैसा ही है। १९७७ में एक फ़िल्म बनी थी 'दुल्हन वही जो पिया मन भाए'। इस फ़िल्म में येसुदास, हेमलता और बनश्री सेनगुप्ता की मिली-जुली आवाज़ों में एक बड़ा ही प्यारा सा गीत था "ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ हो दामन में जिसके क्यों न ख़ुशी से वो दीवाना हो जाए, ऐसे मुबारक़ मौक़े पे साथी पेश दुयाओं का नज़राना हो जाए"। रवीन्द्र जैन का गीत और उन्हीं का संगीत था इस फ़िल्म में। 'राजश्री प्रोडक्शन्स' की यह फ़िल्म बेहद कामयाब रही और कई शहरों में 'शोले' को भी अच्छी-ख़ासी टक्कर दी थी। फ़िल्म के गानें भी ख़ूब चले। इस फ़िल्म का एक गीत "ले तो आए हो हमें सपनों के गाँव में" अभी हाल ही में आपनें रवीन्द्र जैन पर केन्द्रित शृंखला में सुना होगा। रामेश्वरी, जिन्होंने इस फ़िल्म से अपना फ़िल्मी करीयर शुरु किया था, उनकी भी ख़ूब चर्चा हुई। लेकिन बाद की फ़िल्मों में वो ज़्यादा नाम न कमा सकीं। 'राजश्री' की अन्य फ़िल्मों की ही तरह यह फ़िल्म भी बड़ी साधारण सी फ़िल्म थी जिसमें बातें थी भारतीय संस्कृति की और जिसमें पाश्चात्य संस्कृति को ग़लत ठहराया जाता है; जिसमें साड़ी पहनने वाली औरत को घरेलु और अच्छी औरत का दर्जा दिया जाता है जबकि पाश्चात्य पोशाक में पार्टियों में जाने वाली आधुनिक लड़कियों पर उंगलियाँ उठाई जाती हैं।

"ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ हो" गीत बड़ा ही लोकप्रिय हुआ था अपने ज़माने में, जिसके फ़िल्मांकन में नायक प्रेम किशन (प्रेम नाथ के पुत्र) अपनी गर्ल फ़्रेण्ड श्यामली वर्मा के साथ डान्स करते और गाते हुए दिखाए जाते हैं जो उसके परिवार के लोग पसन्द नहीं कर रहे होते। उदाहरण स्वरूप, गीत में लीला मिश्र के चेहरे से साफ़ झलक रही है कि उन्हें उनका डान्स और तौर तरीके पसन्द नहीं आ रहे है। प्रेम किशन और श्यामली की आवाज़ बन कर येसुदास और बनश्री गीत का अधिकांश हिस्सा गाते हैं जबकि हेमलता रामेश्वरी की आवाज़ बन कर अन्तिम अन्तरा गाती हैं, वह भी थोड़े उदास या डीसेन्ट अन्दाज़ में। आइए आज गायिका बनश्री सेनगुप्ता की थोड़ी बातें की जाए। आज के इस गीत के अलावा उन्होंने किसी हिन्दी फ़िल्म में गाया है या नहीं, इस बात की तो मैं पुष्टि नहीं कर पाया, पर बंगला संगीत जगत में उनका काफ़ी नाम है और बहुत से सुन्दर गीत उन्होंने गाए हैं। उनका सर्वश्रेष्ठ ऐल्बम 'गोधुलिर आलो' (शाम की किरण) को माना जाता है जिसे 'प्राइम म्युज़िक' नें जारी किया था। बनश्री सेनगुप्ता १९८६ में सोवियत संघ में इण्डियन डेलिगेट बन कर गई थीं। एक गायिका के रूप में उन्होंने इंगलैण्ड, अमेरिका और कनाडा में कई शोज़ किए। १९९८ में 'उत्तर अमरीका बंग सम्मेलन' में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं और कोलकाता में आयोजित 'विश्व बंग सम्मेलन' में १९९९-२००० में भी शिरकत की। बनश्री का जन्म पश्चिम बंगाल के हुगली ज़िले में एक म्युज़िशियन के परिवार में हुआ था। पिता स्व: शैलेन्द्रनाथ रॉय एक शास्त्रीय गायक व शिक्षक थे, जिन्होंने अपनी इस बेटी को संगीत सिखाया। बाद में बनश्री नें श्री राजेन बनर्जी से भी सीखा। शान्ति सेनगुप्ता से विवाह के बाद बनश्री कोलकाता चली आईं जहाँ पर उन्हें सुप्रसिद्ध संगीतकार श्री सुधिन दासगुप्ता से सीखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इनके अलावा संगीत की कई अलग-अलग विधाओं में उन्हें पारंगत किया सर्वश्री प्रबीर मजुमदार, नीता सेन, सगिरुद्दीन ख़ाब्न, उषा रंजन मुखर्जी, शैलेन बनर्जी, दीनेन्द्र चौधरी, संतोष सेनगुप्ता और कमल गांगुली जैसे कलाकारों नें। तो लीजिए सुनिए बनश्री के साथ साथ येसुदास और हेमलता की भी आवाज़ें इस ख़ूबसूरत से गीत में।



मित्रों, ये आपके इस प्रिय कार्यक्रम "ओल्ड इस गोल्ड" की अंतिम शृंखला है, ८०० से भी अधिक एपिसोडों तक चले इस यादगार सफर में हमें आप सबका जी भर प्यार मिला, सच कहें तो आपका ये प्यार ही हमारी प्रेरणा बना और हम इस मुश्किल काम को इस अंजाम तक पहुंचा पाये. बहुत सी ऐसी बातें हैं जिन्हें हम सदा अपनी यादों में सहेज कर रखेंगें. पहले एपिसोड्स से लेकर अब तक कई साथी हमसे जुड़े कुछ बिछड़े भी पर कारवाँ कभी नहीं रुका, पहेलियाँ भी चली और कभी ऐसा नहीं हुआ कि हमें विजेता नहीं मिला हो. इस अंतिम शृंखला में हम अपने सभी नए पुराने साथियों से ये गुजारिश करेंगें कि वो भी इस श्रृखला से जुडी अपनी कुछ यादें हम सब के साथ शेयर करें....हमें वास्तव में अच्छा लगेगा, आप सब के लिखे हुए एक एक शब्द हम संभाल संभाल कर रखेंगें, ये वादा है.

खोज व आलेख- सुजॉय चट्टर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें admin@radioplaybackindia.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें +91-9811036346 (सजीव सारथी) या +91-9878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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