Tuesday, June 9, 2009

आप आएँगे करार आ जाएगा.. .. महफ़िल-ए-चैन और "हुसैन"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१९

से कितने सारे गज़ल गायक होंगे जो यह दावा कर सकते हों कि उन्होंने भारत के राष्ट्रपति के सामने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। अगर इतना भी हो तो बहुत है, लेकिन अगर मैं यह पूछूँ कि किनका यह सौभाग्य रहा है कि उनके संगीत एलबम का विमोचन खुद भारत के प्रधानमंत्री ने किया हो , तो मुझे नहीं लगता कि आज के फ़नकार को छोड़कर और कोई होगा। यह समय और किस्मत का एक खेल हीं कहिए को जिनको खुदा ने धन नहीं दिया, उन्हें ऐसा बाकपन परोसा है कि सारी दुनिया बस इसी एक "तमगे" के लिए उनसे रश्क करती है, आखिर करे भी क्यों न, इस तमगे, इस सम्मान के सामने बाकियों की क्या बिसात! यह सन् ७६ की बात है, जब हमारे इन फ़नकार ने तत्कालीन राष्ट्रपति "श्री फखरूद्दीन अली अहमद" के सामने अपनी गज़ल की तान छेड़ी थी। इस मुबारक घटना के छह साल बाद यानी कि १९८२ में इनके "रिकार्ड" को श्रीमती इंदिरा गाँधी ने अपने कर-कमलों से विमोचित किया था। सरकारी महकमों तक में अपनी छाप छोड़ने वाले इन फ़नकारों( दर-असल आज हम जिनकी बात कर रहे हैं, वे महज एक फ़नकार नही, बल्कि दो हैं, जी हाँ हम गायक-बंधुओं की बात कर रहे हैं) ने ना सिर्फ़ गज़ल-गायकी का नाम रोशन किया है, बल्कि गज़ल के साथ "शास्त्रीय संगीत" का मिश्रण कर भारतीय संस्कृति के अमूल्य धरोहरों की भी निगेहबानी की है। यह खुदा की दुआ है कि १९५८ से संगीत का सफर शुरू करने वाले इन फ़नकारों की साधना अब तक जारी है। वैसे इतनी सारी जानकारी उन फ़नकारों की पहचाने के लिए काफ़ी होगी । लेकिन अगर फिर भी न पहचाना हो तो इतना बता दूँ कि कुछ सालों पहले "यश चोपड़ा" की एक महत्वाकांक्षी फिल्म, जो कि भारत-पाकिस्तान में बसे लोगों के रिश्तों को मद्देनज़र रखकर बनाई गई थी, में एक बेहद हीं खूबसूरत क़व्वाली को गाकर इन दोनों ने फ़िल्मी दुनिया में अपना कदम रखा था।

"ग्वालियर घराने" से ताल्लुक रखने वाले "उस्ताद अहमद हुसैन" और "उस्ताद मोहम्मद हुसैन", जिन्हें दुनिया एक साथ "हुसैन बंधु" या फिर "हुसैन ब्रदर्स" के नाम से जानती है के पिता जी "उस्ताद अफ़ज़ल हुसैन जयपुरी" भी एक जमाने में गज़ल और ठुमरी-गायन में अपना मुकाम रखते थे। यही कारण है कि इन दोनों की शास्त्रीय संगीत में बचपन से हीं रूचि रही। यह बात वाकई काबिल-ए-गौर है कि संगीत के क्षेत्र में भाईयों की ऐसी कोई दूसरी जोड़ी नहीं है ,जिन्होंने एक साथ महफ़िलों से लेकर एलबमों तक गज़ल और भजन को बराबर का सम्मान दिया हो और जिसे प्रशंसकों से भी भरपूर प्यार मिला हो। "हुसैन बंधु" की सबसे बड़ी खासियत यह कि इन्होंने कभी भी पैसों के लिए नहीं गाया, बल्कि जरूरत आने पर मुफ़्त में भी अपने कार्यक्रम किए। इनकी नेकदिली और दरियादिली के कई सारे किस्से प्रसिद्द हैं। इन्होंने अपने गायन में छुपी "आध्यात्मिक शक्ति" का प्रयोग कैंसर से पीड़ित इंसानों के उपचार के लिए भी किया है। अब जब कोई शख्स दूसरों के लिए इतना करे तो फिर उसके लिए खुदा कुछ न करे, ऐसा हो हीं नहीं सकता। "हुसैन बंधुओं" के बारे में कहने को बहुत कुछ है, लेकिन मुझे लगता है कि इसके लिए एक अलग अंक की जरूरत होगी, इसलिए अब सीधे गज़ल की ओर रूख करता हूँ।

आज हो जो गज़ल आपके सामने पेश कर रहे हैं, उसे हमने "गोल्डन मोमेंट्स- प्यार का जज़्बा" एलबम से लिया है। इस गज़ल के बोल जनाब दिनेश ठाकुर ने लिखे हैं। यूँ तो हसरत जयपुरी साहब "हुसैन बंधुओं" की पसंद रहे हैं,लेकिन ऐसा नहीं है कि इन दोनों ने दूसरे शायरों से परहेज किया हो। अन्य शायरों के साथ भी इन दोनों भाईयों ने कई सारी नामचीन गज़लें दी हैं। वैसे आपको यह बता दूँ कि "जयपुर" का होने के कारण और "हसरत जयपुरी" से इतना बढिया रिश्ता होने के कारण कई लोग यह भी मानते हैं कि "हसरत जयपुरी" हीं इनके पिता हैं। शुक्र है कि मुझे उनके पिता का नाम मिल गया, नहीं तो मुमकिन था कि मैं भी यही मान बैठता । चलिए अब कुछ लीक से हटकर बात करता हूँ। आप लोगों ने यह महसूस किया होगा कि आज का अंक बाकी के अंकों से काफ़ी छोटा है, इसका कारण यह है कि मुझे यह पूरा का पूरा आलेख बेमन से लिखना पड़ा। दर-असल मैं जब यह लिखने बैठा तभी मुझे "हिन्दी साहित्य के तीन बड़े कवियों की दुर्घटना में मृत्यु" की जानकारी मिली। पूरा ब्योरा जानने के लिए यहाँ जाएँ। इसके बाद मै लाख कोशिशों के बावजूद अपने मन को संयत न कर सका। भले हीं मेरे पास "हुसैन बंधुओं" के बारे में अच्छी-खासी जानकारी थी, लेकिन जब दिल और दिमाग हीं काम न करे तो उन जानकारियों का क्या फ़ायदा। वैसे मैं आपको यह विश्वास दिलाता हूँ कि आने वाले कुछ दिनों में मैं इन दोनों बंधुओं पर एक आलेख लेकर हाजिर होऊँगा, लेकिन आज मुझे मुआफ़ कीजिए। ग़म की इस घड़ी में "हसरत जयपुरी" का लिखा एक शेर मुझे याद आ रहा है, जिसे संयोगवश "हुसैन बंधुओं" ने हीं अपनी आवाज़ से सजाया था। ध्यान देंगे:

आपके दम से हीं कायम है निज़ाम-ए-ज़िंदगी,
एक पल के वास्ते भी छोड़ न जाना हमें।


इस बात का ग़म है कि हमें वे लोग छोड़ गएं,लेकिन उनके शब्द हमारे बीच हमेशा जिंदा रहेंगे, क्योंकि हम सबने उनकी कला से इश्क किया था और इश्क के दरिया में उतरने वाले डूब कर भी उभर जाते हैं। :

इश्क के दरिया में जब आ जाएगा,
दिल ग़मों से खुद उभरता जाएगा।

तोड़ देगा ये हदों को एक दिन,
बहते पानी को जो रोका जाएगा।

हम हुए बर्बाद भी तो देखना,
कुछ सबब तुमसे भी पूछा जाएगा।

मुंतज़िर है हम इसी उम्मीद पर,
आप आएँगे करार आ जाएगा।

हश्र के दिन को भी हमारी रूह को,
आप के कूचे में ढूँढा जाएगा।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

कहीं आँसूओं की है दास्ताँ, कहीं मुस्कुराहटों का बयां,
कहीं बरकतों की है ___, कहीं तिशनगी बेहिसाब है...

आपके विकल्प हैं -
a) बारिशें, b) रहमतें, c) बरसातें, d) तोहमतें

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-

पिछली महफिल का सही शब्द था -"अँधेरा". पर कोई भी श्रोता सही जवाब नहीं दे पाया. सब ने "घर जला" कर उजाला होने की बात सोच ली, पर मैकदे में जहाँ घर जलाकर शराब पी जाए वहां उजाला कैसे हो सकता है. शायर ने बहुत समझदारी से यहाँ विरोधाभासी शब्दों का तालमेल बिठाया है. सही शेर कुछ यूँ था -

इसीलिए तो अँधेरा है मैकदे में बहुत,
यहाँ घरों को जलाकर शराब पीते हैं ...

मंजू जी और जाकिर जी आपका महफ़िल में स्वागत है. रचना जी, सुमित जी, फ़राज़ जी, आशीष जी, मनु जी, कुलदीप अंजुम जी, आप सब ने कोशिश की...आज आप सब सही जवाब देंगें हमें यकीन है. बहरहाल कुछ शेर जो आप सब ने याद दिलाये उनमें से कुछ में "अँधेरा" शब्द भी आया है. कुछ चुनिन्दा शेर गौर फरमाएं-

चिरागो ने जब अंधेरो से दोस्ती की है,
जला के अपना घर हमने रोशनी की है। (सुमित)

इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी
रात जंगल में कोई शम्मा जलाने से रही (आशीष)

उजालो में अब हमे दिखाई नहीं देता
अँधेरे में कोई बाहर जाने नहीं देता (कुलदीप अंजुम)

चलिए महफिले शाद रहे आबाद रहे हम तो बस यही दुआ करेंगे...

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर सोमवार और गुरूवार दो अनमोल रचनाओं के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

5 comments:

शरद तैलंग said...

कहीं आँसूओं की है दास्ताँ, कहीं मुस्कुराहटों का बयां,
कहीं बरकतों की है बारिशें, कहीं तिशनगी बेहिसाब है...
मेरे मित्र राजेश रेड्डी की ग़ज़ल का ये शे’र है ।

आंसू ही मेरी आंख के बारिश से कम नहीं थे
बस इसलिए बरसात में घर में छुपा रहा । (स्वरचित)

Manju Gupta said...

This post has been removed by the author.

Manju Gupta said...

कहीं आँसूओं की है दास्ताँ, कहीं मुस्कुराहटों का बयां,
कहीं बरकतों की है ___, कहीं तिशनगी बेहिसाब है...

jawab hai - बारिशें.

Manju Gupta.

रज़िया "राज़" said...

कहीं आँसूओं की है दास्ताँ, कहीं मुस्कुराहटों का बयां,
कहीं बरकतों की है "बारिशें" कहीं तिशनगी बेहिसाब है...
और एक मशहुर शेर..पेश है।

ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो।
भले छिन लो मुज़से मेरी जवानी।
मगर मुज़को लौटादो बचपन का सावन,
वो कागज़ की कश्ती, वो "बारिश" का पानी।

Shamikh Faraz said...

वह शरद जी वाह

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