बुधवार, 3 जून 2009

"ऐसा कोई जिंदगी से वादा तो नहीं था..."- उस्ताद अमजद अली खान के संगीत का सतरंगी वादा

बात एक एल्बम की (८)
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - वादा
फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - उस्ताद अमजद अली खान, गुलज़ार, रूप कुमार राठोड, साधना सरगम.

"बात एक एल्बम की" का एक नया महीना है और हम हाज़िर हैं एक नयी एल्बम के साथ. इस माह की एल्बम में हैं चार दिग्गज फनकार, जो सभी के सभी अपने अपने क्षेत्र में महारत रखते हैं. जहाँ संगीतकार हों उस्ताद अमजद अली खान जैसे, गीतकार हों गुलज़ार साहब जैसे, गायक हों रूप कुमार राठोड और गायिका हों साधना सरगम जैसी तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि एल्बम किस स्तर की होगी. जी हाँ ये एल्बम है -"वादा". सच्चे और अच्छे संगीत का वादा ही तो है ये नायाब एल्बम जिसका एक एक गीत हमारा दावा है, आपके अन्तर्मन में कुछ यूं उतर जायेगा कि उसका खुमार उम्र भर नहीं उतरेगा.

दरअसल इस पूरी टीम में जो नाम सबसे ज्यादा चौंकाता है वो निसंदेह उस्ताद अमजद अली खान साहब का ही है. अपने सरोद वादन से लगभग ४० सालों से भी अधिक समय से दुनिया भर के संगीत के कद्रदानों को मंत्रमुग्ध करने वाला ये महान फनकार एक व्यावसायिक एल्बम का हिस्सा बने, जरा विचित्र लगता है. पर खान साहब के क्या कहने, इतने मधुर संगीत से सजाया है पूरी एल्बम को जैसे मोती चुन लाये हो अपने सुरों के अद्भुत लोक से. खुद उन्हीं के शब्दों में -"कोई मूलभूत फर्क नहीं है शास्त्रीय और लोकप्रिय संगीत में. संगीत संगीत है. मेरा मकसद अपने श्रोताओं से जुड़ना है...". ग्वालियर के हाफिज़ अली खान के शिष्य रहे खान साहब ने ६ साल की उम्र में पहली बार मंच पर सरोद वादन किया था, कितने लोगों को उस वक़्त ये ख़्याल आया होगा कि ये बालक एक दिन सरोद को हिमालय सी ऊँच्चाईयों पर पहुंचा देगा. देश विदेश में जाने कितने कंसर्ट, जाने कितने सम्मान (जिसमें पद्म विभूषण भी शामिल है), ढेरों नए प्रयोग, इस बात पे शायद ही कोई शक होगा कि खान साहब ने अफगान के घोडों के व्यापारी मोहम्मद हाशमी खान बंगेश द्वारा हिंदुस्तान लाये गए इस वाध्य को जन जन तक पहुँचाने में अहम् भूमिका निभाई है, जिस परंपरा को उनको दोनों सुपत्र बहुत खूबी से आगे ले जा रहे हैं.

उस्ताद पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है, पर फिलहाल हमारा मकसद है उनके सगीत से सजे इस एल्बम से कुछ गीत आपको सुनवाना. तो चलिए शुरुआत करते हैं इस शीर्षक गीत से. गुलज़ार साहब के शब्दों को स्वर दिया है रूप कुमार राठोड ने. "ऐसा कोई जिंदगी से वादा तो नहीं था...तेरे बिना जीने का इरादा तो नहीं था....". आनंद लीजिये इतना सार्थक आरंभिक संगीत(prelude) बहुत कम गीतों में सुनने को मिलता है-



दूसरी आवाज़ है इस एल्बम में साधना सरगम की. उनकी आवाज़ में सुनिए एक बेहद खूबसूरत सा गीत इस लाजवाब एल्बम से. जहाँ पहले गीत में दर्द और तन्हाईयों की असीम गहराईयाँ थी वहीँ इस गीत एक मीठा सा चुलबुलापन है, साधना की आवाज़ में ये गीत बार बार सुनने जाने लायक है. "दिल का रसिया और कहाँ होगा..."



और अब सुनिए इन दोनों गीतों को खान साहब के सरोद पर. स्वरों की मधुर स्वरलहरियों में गोते खाईये और डूब जाईये उस्ताद के बेमिसाल सरोद वादन के सुर सागर में -



(जारी....)



"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की.यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.

2 टिप्‍पणियां:

Shamikh Faraz ने कहा…

वाकई एक लाजवाब एल्बम

Shamikh Faraz ने कहा…

आपने लिखा के आप आगरा किसी फनकार को देखना सुनना चाहते है तो हमें लिखिए जी मैं गुलज़ार साहब का बहुत फैन हूँ. इस मामले में उन्हीं का नाम लेना चौंगा.

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