मंगलवार, 31 मार्च 2009

आजा रे प्यार पुकारे, नैना तो रो रो हारे...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 38

"दिल ने फिर याद किया", 1966 की एक बेहद कामयाब फिल्म. इसी फिल्म से रातों रात मशहूर हुई थी संगीतकार जोडी सोनिक ओमी. सोनिक और ओमी रिश्ते में चाचा भतीजा हैं. सोनिक सन् 1952 में ममता, 1952 में ही ईश्वर भक्ति, और 1959 में एक पंजाबी फिल्म में संगीत दे चुके थे. सोनिक, जो ढाई साल की उम्र में अपनी ऑंखें खो चुके थे, उन्होने लाहौर और लखनऊ से पढाई पूरी की और फिर दिल्ली के आकाशवाणी से जुड गये और इस तरह से एक सुरीले सिलसिले की भूमिका बनती चली गयी. सोनिक और ओमी कई बार मुंबई आए लेकिन कोई ख़ास बात नहीं बन पाई. लेकिन वो अपने अपने तरीके से कोशिश करते रहे. इसी बीच सोनिक बने संगीतकार मदन मोहन के सहायक और ओमी रोशन के. इस तरह से फिल्म संगीत जगत में इन दोनो की पहचान बनी, नतीजा यह हुआ कि उन्हे "दिल ने फिर याद किया" जैसी फिल्म मिल गयी और दोनो ने पहली बार अपनी जोडी बनाई. और कहने की ज़रूरत नहीं, पहली फिल्म में ही इन दोनो ने कमाल कर दिया. दिल ने फिर याद किया के सभी गीत बेहद मक़बूल हुए, उन्हे बहुत बहुत सहारना मिली. इस फिल्म को बनाया था सी एल रावल ने, वही फिल्म के निर्देशक भी थे और गीतकार भी. धर्मेन्द्र, नूतन और रहमान के अभिनय से सुसज्जित यह फिल्म लोकप्रियता की कसौटी पर खरी उतरी, जिसका मुख्य श्रेय फिल्म के संगीत को जाता है.

दोस्तों, हम बड़ी दुविधा में पड गये थे इस बात को लेकर कि इस फिल्म का कौन सा गीत आपको सुनवाएँ 'ओल्ड इस गोल्ड' में, क्योंकि जैसा कि हमने कहा इस फिल्म का हर एक गीत अपने आप में लोकप्रियता की मिसाल है. आखिरकार हमने जो गीत चुना वो है "आजा रे प्यार पुकारे" जिसे लता मंगेशकर ने बडे ही दर्दीले अंदाज़ में गाया है. अब आप पूछेंगें कि हमने इस गीत को ही क्यूँ चुना. वो इसलिए कि एक 'इंटरव्यू' में जब ओमी-जी से यह पुछा गया था कि इस फिल्म का कौन सा गीत उन्हे सबसे ज़्यादा पसंद है, तो उन्होने इसी गीत का ज़िक्र किया था. और क्यूँ ना हो, यह गीत है ही दिल को छू जाने वाला. उसी 'इंटरव्यू' में ओमी-जी ने इस गीत से जुडा एक मज़ेदार किस्सा भी बताया था. हुया यूँ कि इस गाने में नायिका अपने प्रेमी का इंतज़ार करती है और अपने प्यार की दुहाई देकर वापस लौट्ने के लिए आवाज़ लगाती है. तो जब लता-जी गाने की 'रेकॉर्डिंग' के बाद 'रेकॉर्डिंग रूम' से बाहर आईं, तो सी एल रावल साहब ने सोनिक ओमी से कहा, "ओमी, यह गाना सुनने के बाद भी अगर 'हीरो' वापस ना आए तो भाड में जाए". यह सुनकर वहाँ मौजूद सभी ज़ोर से हंस पडे. आप भी सुनिए और सुनकर अपनी राय 'पोस्ट' करना मत भूलिएगा.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. इस गीत में दो गायकों ने जम कर एक दूजे का मुकाबला किया है, एक हैं मन्ना डे...
२. राजेंदर कृष्ण ने बोल लिखे हैं इस बेमिसाल गीत के जिसका वाकई कोई सानी नहीं है.
३. मुखड़े में दूसरे गायक ने जिसका नाम हमने आपको नहीं बताया जो पंक्तियाँ गाते हैं उसमें शब्द है -"जाल"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम-
नीरज जी, मनु जी और सलिल जी सही जवाब, हाँ सही है ये ग़ज़ल नहीं गीत है, अंतिम अंतरा भी बहुत सुना हुआ है सही है, पर रिकॉर्ड में जो हमारे पास उपलब्ध था उसमें नहीं मिला. यदि इस गीत का पूरा संस्करण किसी श्रोता के पास मौजूद हो तो हमें उपलब्ध करवायें. संगीता जी आपका भी आभार. शरद जी देर से आये लेकिन दुरुस्त आये


खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




>

कहाँ हाथ से कुछ छूट गया याद नहीं - मीना कुमारी की याद में


मीना कुमारी ने 'हिन्दी सिनेमा' जगत में जिस मुकाम को हासिल किया वो आज भी अस्पर्शनीय है ।वे जितनी उच्चकोटि की अदाकारा थीं उतनी ही उच्चकोटि की शायरा भी । अपने दिली जज्बात को उन्होंने जिस तरह कलमबंद किया उन्हें पढ़ कर ऐसा लगता है कि मानो कोई नसों में चुपके -चुपके हजारों सुईयाँ चुभो रहा हो. गम के रिश्तों को उन्होंने जो जज्बाती शक्ल अपनी शायरी में दी, वह बहुत कम कलमकारों के बूते की बात होती है. गम का ये दामन शायद 'अल्लाह ताला' की वदीयत थी जैसे। तभी तो कहा उन्होंने -

कहाँ अब मैं इस गम से घबरा के जाऊँ
कि यह ग़म तुम्हारी वदीयत है मुझको

पैदा होते ही अब्बा अली बख्श ने रुपये के तंगी और पहले से दो बेटियों के बोझ से घबरा कर इन्हे एक मुस्लिम अनाथ आश्रम में छोड़ आए. अम्मी के काफी रोने -धोने पर वे इन्हे वापस ले आए ।परिवार हो या वैवाहिक जीवन मीना जो को तन्हाईयाँ हीं मिली

चाँद तन्हा है,आस्मां तन्हा
दिल मिला है कहाँ -कहाँ तन्हां

बुझ गई आस, छुप गया तारा
थात्थारता रहा धुआं तन्हां

जिंदगी क्या इसी को कहते हैं
जिस्म तन्हां है और जां तन्हां

हमसफ़र कोई गर मिले भी कहीं
दोनों चलते रहे यहाँ तन्हां

जलती -बुझती -सी रौशनी के परे
सिमटा -सिमटा -सा एक मकां तन्हां

राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जायेंगे ये मकां तन्हा

और जाते जाते सचमुच सरे जहाँ को तन्हां कर गयीं ।जब जिन्दा रहीं सरापा दिल की तरह जिन्दा रहीं ।दर्द चुनते रहीं संजोती रहीं और कहती रहीं -

टुकडे -टुकडे दिन बिता, धज्जी -धज्जी रात मिली
जितना -जितना आँचल था, उतनी हीं सौगात मिली

जब चाह दिल को समझे, हंसने की आवाज़ सुनी
जैसा कोई कहता हो, ले फ़िर तुझको मात मिली

होंठों तक आते -आते, जाने कितने रूप भरे
जलती -बुझती आंखों में, सदा-सी जो बात मिली

वह कोई साधारण अभिनेत्री नहीं थी, उनके जीवन की त्रासदी, पीडा, और वो रहस्य जो उनकी शायरी में अक्सर झाँका करता था, वो उन सभी किरदारों में जो उन्होंने निभाया बाखूबी झलकता रहा. फिल्म "साहब बीबी और गुलाम" में छोटी बहु के किरदार को भला कौन भूल सकता है. "न जाओ सैया छुडाके बैयाँ..." गाती उस नायिका की छवि कभी जेहन से उतरती ही नहीं. १९६२ में मीना कुमारी को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए तीन नामांकन मिले एक साथ. "साहब बीबी और गुलाम", मैं चुप रहूंगी" और "आरती". यानी कि मीना कुमारी का मुकाबला सिर्फ मीना कुमारी ही कर सकी. सुंदर चाँद सा नूरानी चेहरा और उस पर आवाज़ में ऐसा मादक दर्द, सचमुच एक दुर्लभ उपलब्धि का नाम था मीना कुमारी. इन्हें ट्रेजेडी क्वीन यानी दर्द की देवी जैसे खिताब दिए गए. पर यदि उनके सपूर्ण अभिनय संसार की पड़ताल करें तो इस तरह की "छवि बंदी" उनके सिनेमाई व्यक्तित्व के साथ नाइंसाफी ही होगी.

एक बार गुलज़ार साहब ने उनको एक नज़्म दिया था. लिखा था :

शहतूत की शाख़ पे बैठी मीना
बुनती है रेशम के धागे
लम्हा -लम्हा खोल रही है
पत्ता -पत्ता बीन रही है
एक एक सांस बजाकर सुनती है सौदायन
एक -एक सांस को खोल कर आपने तन पर लिपटाती जाती है
अपने ही तागों की कैदी
रेशम की यह शायरा एक दिन
अपने ही तागों में घुट कर मर जायेगी

पढ़ कर मीना जी हंस पड़ी । कहने लगी -"जानते हो न, वे तागे क्या हैं ?उन्हें प्यार कहते हैं । मुझे तो प्यार से प्यार है । प्यार के एहसास से प्यार है, प्यार के नाम से प्यार है । इतना प्यार कि कोई अपने तन से लिपट कर मर सके तो और क्या चाहिए?" महजबीं से मीना कुमारी बनने तक (निर्देशक विजय भट्ट ने उन्हें ये नाम दिया), और मीना कुमारी से मंजू (ये नामकरण कमाल अमरोही ने उनसे निकाह के बाद किया ) तक उनका व्यक्तिगत जीवन भी हजारों रंग समेटे एक ग़ज़ल की मानिंद ही रहा. "बैजू बावरा","परिणीता", "एक ही रास्ता", 'शारदा". "मिस मेरी", "चार दिल चार राहें", "दिल अपना और प्रीत पराई", "आरती", "भाभी की चूडियाँ", "मैं चुप रहूंगी", "साहब बीबी और गुलाम", "दिल एक मंदिर", "चित्रलेखा", "काजल", "फूल और पत्थर", "मँझली दीदी", 'मेरे अपने", "पाकीजा" जैसी फिल्में उनकी "लम्बी दर्द भरी कविता" सरीखे जीवन का एक विस्तार भर है जिसका एक सिरा उनकी कविताओं पर आके रुकता है -

थका थका सा बदन,
आह! रूह बोझिल बोझिल,
कहाँ पे हाथ से,
कुछ छूट गया याद नहीं....

३१ मार्च १९७२ को उनका निधन हुआ. आज उनकी ३७ वीं पुण्यतिथि पर उन्हें 'आवाज़' का सलाम. सुनते हैं उन्ही की आवाज़ में उन्हीं का कलाम. जिसे खय्याम साहब ने स्वरबद्ध किया है -

चाँद तन्हा...


मेरा माज़ी


ये नूर किसका है...


प्रस्तुति - उज्जवल कुमार

सोमवार, 30 मार्च 2009

आंसू समझ के क्यों मुझे आँख से तुमने गिरा दिया...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 37

कुछ गीत ऐसे होते हैं कि जिनके लिए संगीतकार के दिमाग़ में बस एक ही गायक होता है. जैसे कि वो गीत उसी गायक के लिए बनाया गया हो. या फिर हम ऐसे भी कह सकते हैं कि हर गायक की अपनी एक खूबी होती है, कुछ विशेष तरह के गीत उनकी आवाज़ में खूब खिलते हैं. ऐसे ही एक गायक थे तलत महमूद जिनकी मखमली आवाज़ में दर्द भरी, ठहराव वाली गज़लें ऐसे पुरस्सर होते थे कि जिनका कोई सानी नहीं. आज 'ओल्ड इस गोल्ड' में तलत साहब की मखमली आवाज़ का जादू छा रहा है दोस्तों. सलिल चौधरी की धुन पर राजेंदर कृष्ण के बोल, फिल्म "छाया" से. 1961 में बनी हृषिकेश मुखर्जी की इस फिल्म में सुनील दत्त और आशा पारेख ने मुख्य भूमिकाएँ निभायी. यूँ तो इस फिल्म में एक से एक 'हिट' गीत मौजूद हैं जैसे कि "मुझसे तू इतना ना प्यार बढा", और "आँखों में मस्ती शराब की". लेकिन तलत साहब का गाया जो गीत हम आज शामिल कर रहे हैं वो थोडा सा कमचर्चित है.

"आँसू समझ के क्यूँ मुझे आँख से तुमने गिरा दिया, मोती किसी के प्यार का मिट्टी में क्यूँ मिला दिया" तलत महमूद के गाए फिल्मी गज़लों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है. सलिल चौधुरी के गीतों में पाश्चात्य संगीत का बहुत ही सुंदर इस्तेमाल हुया करता था.पाश्चात्य 'हार्मोनी' के वो दीवाने थे. जिस तरह से मदन मोहन फिल्मी ग़ज़लों के बादशाह माने जाते हैं, सलिल-दा द्वारा स्वरबद्ध इस ग़ज़ल को सुनकर आपको यह अंदाज़ा हो जाएगा कि सलिल-दा भी कुछ कम नहीं थे इस मामले में. किसी ग़ज़ल में 'वेस्टर्न हार्मोनी' का ऐसा सुंदर प्रयोग शायद ही किसी और ने किया हो! और राजेंदर कृष्ण साहब के भी क्या कहने! "मेरी खता माफ़ मैं भूले से आ गया यहाँ, वरना मुझे भी है खबर मेरा नहीं है यह जहाँ". इस गीत की एक और ख़ास बात यह है कि फिल्म में इस गीत के तीन अंतरे हैं, लेकिन 'ग्रामोफोन रेकॉर्ड' पर इस गीत के केवल दो ही अँतरे हैं. इस तरह से 'रेकॉर्ड' पर 3 मिनिट 14 सेकेंड्स का यह गीत फिल्म में 4 मिनिट 52 सेकेंड्स अवधि का है. दोस्तों, हम तो आपको 'रेकॉर्ड' वाला 'वर्ज़न' ही सुनवा सकते हैं, लेकिन फिल्म में शामिल वो तीसरा अंतरा जो 'रेकॉर्ड' पर नहीं है, वो कुछ इस तरह से है - "नग्मा हूँ कब मगर मुझे अपने पे कोई नाज़ था, गाया गया हूँ जिस पे मैं टूटा हुआ वो साज़ था, जिस ने सुना वो हंस दिया हंस के मुझे रुला दिया, आँसू समझ के..."



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. प्रेमी को पुकारती लता की आवाज़.
२. सोनिक ओमी का संगीत.
३. मुखड़े में शब्द है -"नैना".

कुछ याद आया...?



खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




ये रहे सरताज गीत, लोकप्रिय गीत और शीर्ष 10 गीत

आज दिन है आवाज़ पर बहुप्रतीक्षित परिणामों का. आवाज़ पर नए संगीत का दूसरा सत्र जुलाई 2008 के प्रथम शुक्रवार से आरंभ हुआ था जो दिसम्बर के अंतिम शुक्रवार को संपन्न हुआ। इस दौरान कुल 27 नए गाने प्रसारित किये गए। संगीत के इस महाकुम्भ में कुल 47 नए संगीत कर्मियों ने अपने फन का जौहर दुनिया के सामने रखा, जिसमें 15 संगीतकार, 13 गीतकार, 24 गायक/गायिकाएँ, 2 संगीत सहायक शामिल हैं। इससे पहले अपने पहले सत्र के 10 गीतों को लेकर युग्म ने अपना प्रथम संगीत एल्बम "पहला सुर" फरवरी 2008 में जारी किया गया था। पर दूसरा सत्र हर लिहाज से बेहतर रहा; अपने पहले सत्र की तुलना में. पहले से अधिक संगीत कर्मी, पहले से अधिक रचनाएँ और तकनीकी स्तर पर भी लगभग हर गीत की गुणवत्ता इस सत्र के गीतों में बहुत बेहतर रही, इन सभी गीतों को श्रोताओं का भरपूर प्यार मिला, इन गीतों को हमने 5 संगीत विशेषज्ञों ने भी सुना, परखा, और दो चरण में सपन्न हुए इस प्रक्रिया में इन गीतों को अंक दिए गए, जिनके आधार पर निर्धारित किया गया कि एक सरताज गीत चुना जायेगा, और श्रेष्ठ 10 चुने हुए गीतों को हिंद युग्म अपने दूसरे संगीत एल्बम का हिस्सा बनाएगा। श्रोताओं की राय जानने के लिए एक पोल भी आयोजित हुआ, जिसमें कुल श्रोताओं ने अपनी राय रखी। श्रोताओं ने जिस गीत को सबसे अधिक पसंद किया उसे सत्र का सबसे लोकप्रिय गीत माना जायेगा. आज इन्हीं परिणामों की घोषणा करते हुए आवाज़ का संचालन दल बेहद गर्व और ख़ुशी अनुभव कर रहा है।

समीक्षक क्या कहते हैं?

हालांकि हमने अपने सभी समीक्षकों के नाम गुप्त रखे थे पर अंतिम समीक्षक जो कि देश के सबसे अनुभवी संगीत समीक्षकों में जाने जाते हैं, उनके कुछ विचार आप तक पहुँचाना जरूरी है, अजात शत्रु एक ऐसा नाम है जिससे संगीत से जुड़े सभी लोग अच्छी तरह से वाकिफ हैं, अपनी तमाम व्यस्तताओं के बीच भी उन्होंने हिंद युग्म के लिए इस कार्य को करने का बीड़ा उठाया, चूँकि वो इन्टरनेट से दूर हैं उन्होंने खुद इन पक्तियों के लेखक को फ़ोन कर बधाई दी और सत्र के गीतों कि मुक्तकंठ से प्रशंसा की। उन्होंने कहा -"इस संकलन की सबसे बड़ी उपलब्धि है, कविता-शायरी. "आवाज़ के पंखों पर...", "खुशमिजाज़ मिटटी पहले उदास थी...", तथा "ओ मुनिया मेरी गुड़िया संभल के चल..." जैसे गीत तो बेसाख्ता "वाह" कहा ले जाते हैं, मेलोडी के हिसाब से "ओ मुनिया" संकलन का सर्वोत्तम गीत है, यही वो धुन और संगीत्तना है जिस पर मेरी दो साल पूरी करती नातिन, एक अबोध बच्ची, थिरक उठी थी. गायक भी बेबाक है और खुलकर गाता है...". अजात शत्रु जी गायकों से अधिक संतुष्ट नज़र नहीं आये. उन्होंने कहा -" संकलन में एक दो गायकों की आवाज़ में बेस है, पर संवेदनशील गायन किसी का नहीं है, और न ही उनके गायन में कोई चौंकाने वाला तत्व है, 'अचानक' भी गायक से कुछ हो जाता है जो रिहर्सल के वक़्त नहीं था मगर रिकॉर्डिंग में पैदा हो जाता है. 'अचानक' का ये तत्व सभी में गायब है। फिर भी अपनी सीमा में उन्होंने प्रशंसनीय काम किया है"। हालाँकि उन्होंने यहाँ भी 'ओ मुनिया' के गायक की तारीफ की -"ओ मुनिया गीत का गायक ही इस आयोजन का पहला और अंतिम गायक है जिस पर किसी गायन, परंपरा या ज़माने का असर नहीं है वह सिर्फ अपने तौर पर गाता है..."। संगीतकारों को उन्होंने गायकों का चुनाव करने सम्बंधित ये सुझाव दिया -"सबसे पहले धुन पर ध्यान दें, फिर गायक का चुनाव करें, अच्छी शायरी भी मधुर धुन के बिना असर नहीं छोड़ती, अधिक से अधिक वह पढ़ने की चीज़ है. पर गाना प्रथमतः सिर्फ सुने जाने के लिए होता है। धुन की मेलोडी पर बहुत मेहनत करनी चाहिए, कहिये कि धुन ही सब कुछ है, जिस गीत पर बच्चा, पागल और गंवार थिरक उठे, वही अल्लाह का संगीत है"। अजात शत्रु जी ने और भी बहुत सी बातें कही, पर एक बात जो उन्होंने कही वो परिणामों की घोषणा करने से पहले हम भी कहना चाहेंगे- "कोई भी फैसला अंतिम या सम्पूर्ण नहीं होता। जो आज असफल वो कल संभवतः हीरो होंगे, हमारी नज़र में तो इस आयोजन में शामिल सभी कलाकार विजेता हैं। तो एक बार फिर सभी प्रतिभागियों को तहे दिल से ढेरों शुभकामनायें देते हुए सबसे पहले हम घोषणा कर रहे हैं सरताज गीत की।

सरताज़ गीत

सरताज गीत के रूप में टाई हुआ है दो गीतों को 40.5 अंक मिले हैं जो अधिकतम है। इस कारण हम इन दो गीतों को सामूहिक रूप से सरताज गीत घोषित करते हैं। मज़े की बात ये है कि इन दोनों गीतों या कहें गज़लों के गायक/संगीतकार एक ही हैं, जी हाँ आपने सही पहचाना- दूसरे सत्र की नायाब खोज - रफीक शेख. और ग़ज़लें हैं "जो शजर" और "सच बोलता है" जिनके शायर हैं क्रमशः दौर सैफी और अज़ीम नवाज़ राही। इसके अलावा इनकी टीम में एक संगीत संयोजक भी हैं- अविनाश। सभी 4 लोगों को बहुत बहुत बधाई। सरताज गीत को हिंद युग्म की तरफ से 6000 रुपए का नकद पुरस्कार दिया जायेगा. समीक्षकों के अंतिम अंक तालिका के अनुसार टॉप १० गीत जो चुने गए वो इस प्रकार हैं-

टॉप 10 गीत

1. जो शजर 40.5/50
2. सच बोलता है 40.5/50
3. चाँद का आंगन 40/50
4. वन अर्थ- हमारी एक सभ्यता 39.5/50
5. आखिरी बार बस 39/50
6. जीत के गीत 38/50
7. हुस्न 38/50
8. मुझे वक़्त दे 38/50
9. संगीत दिलों का उत्सव है 37.5/50
10. खुशमिजाज़ मिटटी 37.5/50
11. आवारदिल 37.5/50

चूँकि अंतिम 3 गीतों के अंक बराबर हैं इस कारण 10 के स्थान पर 11 गीतों को एल्बम में शामिल किया जायेगा. अन्य गीतों के कुछ इस प्रकार अंक मिले हैं -

12. चले जाना 36.5/50
13. जिस्म कमाने निकल गया है 35.5/50
14. चाँद नहीं विश्वास चाहिए 35/50
15. तेरे चेहरे पे 34/50
16. ओ साहिबा 34/50
17. सूरज चाँद और सितारे 33/50
18. तू रूबरू 33/50
19. मैं नदी 32/50
20. बढ़े चलो 31/50
21. बे इंतेहा 31/50
22. उड़ता परिंदा 31/50
23. ओ मुनिया 30/50
24. डरना झुकना 30/50
25. माहिया 28/50
26. राहतें सारी 27.5/50
27. मेरे सरकार 24/50

लोकप्रिय गीत

हिन्द-युग्म ने 2 मार्च से 28 मार्च 2009 के मध्य एक पोल का भी आयोजन किया, जिसके माध्यम से लोकप्रिय गीत (श्रोताओं की पसंद) जानने की कोशिश की गई। इस पिल पृष्ठ को अब तक 3165 बार देखा गया जो किसी भी हिन्द) वेबसाइट के किसी एक पेज इतनी बार इतने समय अंतराल में कभी नहीं देखा गया। कुल 1067 मत मिले जिसमें से 233 मत फॉल्स हैं। चूँकि 25 मार्च को संध्या 7 से 9 बजे के बीच हमारे पास मात्र 57 श्रोता आये और 'चाँद नहीं विश्वास चाहिए' को इतने ही समय में 290 मत मिल गये, जो कि सम्भव नहीं है, क्योंकि हम एक सिस्टम से एक मत मान रहे थे। हम 57 मत चाँद नहीं विश्वास चाहिए को दे रहे हैं।

'संगीत दिलों का उत्सव है' और 'मेरे सरकार' के बीच जबरदस्त टक्कर रही। जहाँ 'संगीत दिलों का उत्सव है' को 223 वोट मिले, वहीं 'मेरे सरकार' को 221 । 'चाँद नहीं विश्वास चाहिए' को अधिकतम 57 देने के बाद 177। इस तरह 'संगीत दिलों का उत्सव है' को हम लोकप्रिय गीत चुन रहे हैं। इस गीत के टीम को रु 4000 का नग़द इनाम दिया जायेगा। सुनिए लोकप्रिय गीत-



हिन्द-युग्म सरताज गीत, लोकप्रिय गीत और शीर्ष 10 गीतों का एल्बम भी निकालने की योजना बना चुका है। यह एल्बम जल्द ही किसी सार्वजनिक महोत्सव में ज़ारी किया जायेगा।

स्पॉनसर करें (प्रायोजक बनें)

हिन्द-युग्म अपने कलाकारों के साथ मिलकर बहुत से सांगैतिक कार्यक्रमों को आयोजित करने की योजना बना है, जिसके लिए हम स्पॉन्सर (Sponsorer) की तलाश कर रहे हैं। स्पान्सर को निम्नलिखित लाभ होगा-

1. हिन्द-युग्म डॉट कॉम नेटवर्क के सभी वेबसाइट की लाखों की ट्रैफिक।
2. छः महीने तक सभी नेटवर्क पर बैनर फ्लैश करने का अवसर
3. कार्यक्रमों (जैसे सिंगिंग शो, ग़ज़ल कंसर्ट इत्यादि) के माध्यम से जन समुदाय तक अपना बॉन्ड पहुँचाने का मौका।

अधिक जानकारी के लिए admin@radioplaybackindia.com पर ईमेल करें या 9873734046, 9871123997 पर फोन करें।

रविवार, 29 मार्च 2009

पॉडकास्ट कवि सम्मलेन मार्च २००९

Doctor Mridul Kirti - image courtesy: www.mridulkirti.com
डॉक्टर मृदुल कीर्ति
मैं नीर भरी दुःख की बदली
कविता प्रेमी श्रोताओं के लिए प्रत्येक मास के अन्तिम रविवार का अर्थ है पॉडकास्ट कवि सम्मेलन। आवाज़ के तत्त्वावधान में इस बार हम लेकर आए हैं नवम् ऑनलाइन कवि सम्मेलन का पॉडकास्ट।

मेरा पग पग संगीत भरा,
श्वासों में स्वप्न पराग झरा,
नभ के नव रंग बुनते दुकूल,
छाया में मलय बयार पली

(महादेवी वर्मा की कविता "नीर भरी दुख की बदली" से)

कवि सम्मलेन के सभी श्रोताओं को हिंद युग्म की टीम की ओर से नव संवत्सर २०६६ की शुभ कामनाएं। देश भर में यह समय प्राचीन काल से ही उत्सवों का समय रहा है। राष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों में नाम चाहे भिन्न हों परन्तु गुडी पडवो, युगादि, चैत्रादि, चेती-चाँद, नव-रात्रि, राम नवमी, बोहाग बिहू के साथ ही उल्लास और आनंद की एक नयी लहर हर ओर दिखाई पड़ रही है। इस शुभ अवसर पर हम आपके समक्ष एक नया कवि सम्मेलन लेकर उपस्थित हैं। इस बार के कवि सम्मलेन के माध्यम से हम महान कवयित्री महादेवी वर्मा को नमन कर रहे हैं जिनका जन्मदिन २५ मार्च को है।
छायावाद की इस महान कवयित्री को श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए इस अंक में हमारे साथ उपस्थित हैं आचार्य संजीव सलिल महादेवी वर्मा के साथ अपनी व्यक्तिगत यादों को हमारे साथ साझा करने के लिए।
तो आईये इस बार के कवि सम्मलेन के माध्यम से आनंद लेते हैं एक नए युग की शुरुआत का। डॉक्टर मृदुल कीर्ति के मंझे हुए संचालन में चुनी हुई सुमधुर रचनाओं का आनंद उठाईये।

पिछले सम्मेलनों की सफलता के बाद हमने आपकी बढ़ी हुई अपेक्षाओं को ध्यान में रखा है। हमें आशा ही नहीं वरन पूर्ण विश्वास है कि इस बार का सम्मलेन आपकी अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा और आपका सहयोग हमें इसी जोरशोर से मिलता रहेगा। यदि आप हमारे आने वाले पॉडकास्ट कवि सम्मलेन में भाग लेना चाहते हैं तो अपनी आवाज़ में अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके podcast.hindyugm@gmail.com पर भेजें। कवितायें भेजते समय कृपया ध्यान रखें कि वे १२८ kbps स्टीरेओ mp3 फॉर्मेट में हों और पृष्ठभूमि में कोई संगीत न हो। आपकी ऑनलाइन न रहने की स्थिति में भी हम आपकी आवाज़ का समुचित इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगे। पॉडकास्ट कवि सम्मेलन के अगले अंक का प्रसारण २५ अप्रैल २००९ को किया जायेगा और इसमें भाग लेने के लिए रिकॉर्डिंग भेजने की अन्तिम तिथि है १९ अप्रैल २००९

नीचे के प्लेयर से सुनें:


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)
VBR MP364Kbps MP3Ogg Vorbis

हम सभी कवियों से यह अनुरोध करते हैं कि अपनी आवाज़ में अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके podcast.hindyugm@gmail.com पर भेजें। आपकी ऑनलाइन न रहने की स्थिति में भी हम आपकी आवाज़ का समुचित इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगे।

रिकॉर्डिंग करना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। हिन्द-युग्म के नियंत्रक शैलेश भारतवासी ने इसी बावत एक पोस्ट लिखी है, उसकी मदद से आप सहज ही रिकॉर्डिंग कर सकेंगे।

अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।

# Podcast Kavi Sammelan. Part 9. Month: March 2009.
कॉपीराइट सूचना: हिंद-युग्म और उसके सभी सह-संस्थानों पर प्रकाशित और प्रसारित रचनाओं, सामग्रियों पर रचनाकार और हिन्द-युग्म का सर्वाधिकार सुरक्षित है.

शनिवार, 28 मार्च 2009

भीगी भीगी फज़ा, छन छन छनके जिया...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 36

ता मंगेशकर और आशा भोंसले, फिल्म संगीत के आकाश में चमकते सूरज और चाँद. यूँ तो यह दोनो बहनें अपने अपने तरीके से नंबर-1 हैं, लेकिन गुलज़ार साहब के शब्दों में, आर्मस्ट्रॉंग और एडविन, दोनो ने ही चाँद पर कदम रखा था लेकिन क्योंकि आर्मस्ट्रॉंग ने पहले कदम रखा, उन्ही का नाम पहले लिया जाता है. ठीक इसी तरह से लताजी को पहला और आशाजी को दूसरा स्थान दिया जाता है पार्श्वगायिकाओं में. सुनहरे दौर में एक प्रथा जैसी बन गयी थी कि जिस फिल्म में लताजी और आशाजी दोनो के गाए गीत होते थे, उसमें लताजी 'नायिका' का पार्श्वगायन करती थी और आशाजी दूसरी नायिका, या नायिका की सहेली, या फिर खलनायिका के लिए गाती थी. ऐसी ही फिल्म थी "अनुपमा" जो आज अमर हो गयी है अपने गीत संगीत की वजह से. हेमंत कुमार के संगीत से संवारे हुए जितनी भी फिल्में हैं, उनमें अनुपमा का एक ख़ास मुकाम है. आज 'ओल्ड इस 'गोल्ड' में फिल्म अनुपमा से एक गीत पेश है.

1966 में बनी थी अनुपमा जिसके मुख्य कलाकार थे शर्मिला टैगोर और धर्मेन्द्र. और शर्मिला की सहेली और धर्मेन्द्र की बहन बनी शशिकला. लता मंगेशकर ने शर्मिला के लिए अगर दो खूबसूरत गीत गाए तो आशा भोंसले ने भी शशिकला के लिए दो बेहद 'हिट' गीत गाए. फिल्म की कहानी के मुताबिक लताजी के गाए यह गाने ज़रा संजीदे किस्म के थे और दूसरी तरफ आशाजी के गाने बेहद खुशमिजाज़ और खुशरंग. इनमें से एक गीत था "क्यूँ मुझे इतनी खुशी दे दी कि घबराता है दिल", और दूसरा गीत जो आज 'ओल्ड इस गोल्ड' की शान बना है, वो था "भीगी भीगी फजा सुन सुन सुन के जिया". फिल्म में यह गीत शशिकला अपने सहेलियों के साथ 'पिकनिक' मनाते हुए गाती हैं. गीतकार कैफ़ी आज़मी के बोल और हेमंत कुमार का संगीत आज 'ओल्ड इस गोल्ड' में पहली बार पेश हो रहा है दोस्तों.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. सलिल चौधरी का संगीत, राजेंदर कृष्ण के बोल.
२. सुनील दत्त थे हृषिकेश मुख़र्जी निर्देशित इस फिल्म की प्रमुख भूमिका में.
३. तलत साहब के गाये इस गीत में मुखड़े में शब्द आता है - "मोती".

कुछ याद आया...?

सूचना - ओल्ड इस गोल्ड का अगला अंक सोमवार शाम को प्रसारित होगा.

पिछली पहेली का परिणाम -
लीजिये वहाँ न्यूजीलैंड में भारतीय बल्लेबाज़ फ्लॉप हुए यहाँ हमारे धुरंधर भी मुंह के बल गिरे. ह्म्म्म क्या किया जाए....गीत का आनंद लीजिये.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




सुनो कहानी: प्रेमचंद की 'बड़े घर की बेटी'

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी 'बड़े घर की बेटी'

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी 'बोहनी' का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं प्रेमचंद की अमर कहानी "बड़े घर की बेटी", जिसको स्वर दिया है शन्नो अग्रवाल ने। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 23 मिनट।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ...मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
~ मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए प्रेमचंद की एक नयी कहानी

आनंदी अपने नये घर में आयी, तो यहॉँ का रंग-ढंग कुछ और ही देखा। जिस टीम-टाम की उसे बचपन से ही आदत पड़ी हुई थी, वह यहां नाम-मात्र को भी न थी। हाथी-घोड़ों का तो कहना ही क्या, कोई सजी हुई सुंदर बहली तक न थी। रेशमी स्लीपर साथ लायी थी; पर यहॉँ बाग कहॉँ। मकान में खिड़कियॉँ तक न थीं, न जमीन पर फर्श, न दीवार पर तस्वीरें।
(प्रेमचंद की 'बड़े घर की बेटी' से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)
VBR MP364Kbps MP3Ogg Vorbis
रविवार २९ मार्च २००९ को सुनना न भूलें, पॉडकास्ट कवि सम्मेलन का महादेवी वर्मा विशेषांक


#Fourteenth Story, Bade Ghar Ki Beti: Munsi Premchand/Hindi Audio Book/2009/09. Voice: Shanno Aggarwal

शुक्रवार, 27 मार्च 2009

आयो कहाँ से घनश्याम...रैना बितायी किस धाम...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 35

शास्त्रिया संगीत के जानकारों को ठुमरी की विशेषताओं के बारे में पता होगा. ठुमरी उपशास्त्रिया संगीत की एक लोकप्रिय शैली है जो मुख्यतः राधा और कृष्ण का प्रेमगीत है. ठुमरी केवल गायिकाएँ ही गाती हैं और इस पर कथक शैली में नृत्य किया जा सकता है. श्रृंगार रस, यानी कि प्रेम रस की एक महत्वपूर्ण मिसाल है ठुमरी. ठुमरी को कई रागों में गाया जा सकता है. राग खमाज में एक बेहद मशहूर ठुमरी है "कौन गली गयो श्याम". समय समय पर इसे बहुत से शास्त्रिया गायिकाओं ने गाया है. फिल्म में भी इसे जगह मिली है. जैसे कि कमाल अमरोही ने अपनी महत्वकांक्षी फिल्म "पाकीजा" में परवीन सुल्ताना से यह ठुमरी गवायी थी. हालाँकि इस फिल्म के संगीतकार थे गुलाम मोहम्मद, लेकिन उनकी मृत्यु हो जाने के कारण नौशाद साहब ने 'पार्श्वसंगीत' के रूप में इस ठुमरी को पेश किया था. दोस्तों, आज 'ओल्ड इस गोल्ड' में हम "पाकीजा" फिल्म की यह ठुमरी नहीं पेश कर रहे हैं, बल्कि इसी ठुमरी से प्रेरित एक लोकप्रिय फिल्मी गीत सुनवा रहे हैं फिल्म "बुड्डा मिल गया" से.

1971 में बनी फिल्म "बुद्धा मिल गया" में राहुल देव बर्मन का संगीत था. इस फिल्म में "रात कली एक ख्वाब में आई" और "भली भली सी एक सूरत" जैसे गाने बेहद मशहूर हुए थे. लेकिन इसमें मन्ना डे और अर्चना का गाया शास्त्रिया रंग में ढाला हुआ "आयो कहाँ से घनश्याम, रैना बिताई किस धाम" भी काफ़ी चर्चित हुया था. शास्त्रिया संगीत पर आधारित गीत को आम लोगों में लोकप्रिय बनाने में जिन संगीतकारों को महारत हासिल थी उनमें से एक पंचम भी थे. यूँ तो राग खमाज पर कई लोकप्रिय गीत बने हैं जैसे कि "अमर प्रेम" फिल्म का "बडा नट्खट है रे कृष्ण कन्हैया", इसी फिल्म से "कुछ तो लोग कहेंगे", "काला पानी" फिल्म का "नज़र लागी राजा तोरे बंगले पर", और फिर वो प्रसिद्ध भजन "वैष्णवा जन तो तेने कहिए", और भी कई गीत हैं, लेकिन "बुद्धा मिल गया" फिल्म का यह गीत भी अपने आप में अनूठा है, बेजोड है. यूँ तो पूरे गीत में मन्ना डे की आवाज़ है, बस आखिर में अर्चना, जो की इस फिल्म की अभिनेत्री भी हैं, एक 'लाइन' गाती हैं और गीत समाप्त हो जाता है. तो लीजिए पेश है "आयो कहाँ से घनश्याम".



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. १९६६ में आई इस फिल्म में थे धर्मेन्द्र और शर्मीला टैगोर.
२. मगर ये गीत आशा की आवाज़ में शशिकला पर फिल्माया गया है.
३. मुखड़े में शब्द है -"खुश्बू".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
नीरज जी, मनु जी आप दोनों के लिए वाकई ये आसान रहा होगा. लगता है अब पहेली कुछ मुश्किल करनी पड़ेगी...नीलम जी ने भी सही चुटकी ली है :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




बीसवीं सदी की १० सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्में (अंतिम भाग)

हम जिक्र कर रहे थे बीसवीं सदी की १० सर्वश्रेष्ठ फिल्मों का प्रतिष्टित हिंदी फिल्म समीक्षक विनोद भारद्वाज द्वारा चुनी गयी सूची के आधार पर. कल हमने ५ फिल्में किस्मत, आवारा, अलबेला, देवदास, और मदर इंडिया की चर्चा की, आगे बढ़ते हैं -

६. प्यासा (१९५७) -गुरुदत्त इस फिल्म के निर्देशक और नायक थे. वहीदा रहमान, माला सिन्हा, जॉनी वाकर, और रहमान थे अन्य प्रमुख भूमिकाओं में. फिल्म के केंद्र में एक प्रतिभाशाली मगर असफल कवि की त्रासदी है जिसे मारा हुआ समझा जाने के बाद खूब बिकने लगता है. जीवित कवि दर दर भटक रहा है पर उसके मृत रूप की पूजा हो रही है. "ये बस्ती है मुर्दा-परस्तों की बस्ती...", गीतकार शायर साहिर लुधियानवीं ने सुनिया की सच्चाईयों को अपनी कलम से नंगा किया और सचिन देव बर्मन ने अपने संगीत से इस कृति को अमर कर दिया. सुनिए इसी फिल्म से ये गीत -



७. मुग़ल - ए- आज़म (१९६०) - के आसिफ की इस एतिहासिक फिल्म को बनने में ९ साल लगे. अकबर बने पृथ्वी राज कपूर और शहजादे सलीम की भूमिका निभाई दिलीप कुमार ने. मधुबाला ने अपनी सुन्दरता और अदाकारी से अनारकली को परदे पर जिन्दा कर दिया. फिल्म के संवाद, अदाकारी, सेट संरचना, और सभी कलात्मक पक्ष बेहद सशक्त थे. संगीत था नौशाद साहब का. सुनते चलिए इस फिल्म का ये नायाब गीत -



८. गाईड (१९६५) - आर के नारायण के चर्चित अंग्रेजी उपन्यास पर आधारित इस फिल्म के निर्देशक थे विजय आनंद. देव आनंद, वहीदा रहमान और किशोर साहू के अभिनय से सजी इस फिल्म में गजब की कशिश है, क्योंकि इसके पात्र आम फिल्मों की तरफ "ब्लैक" और "व्हाइट" नहीं हैं उनके किरदार में "ग्रे" शेड्स हैं जो उन्हें वास्तविक बनाते हैं. मूल लेखक को तो इस फिल्म ने संतुष्ट नहीं किया पर हिंदी सिनेमा के इतिहास में यह एक मील का पत्थर थी. संगीत सचिन देव बर्मन का था, और इस फिल्म के संगीत की जितनी भी तारीफ की जाए कम है. सुनिए ये गीत -



९. शोले (1975) - सितारों से सजी इस फिल्म का निर्देशन किया था रमेश सिप्पी ने. धर्मेन्द्र, अमिताभ बच्चन, हेमा मैलिनी, जया भादुडी, संजीव कुमार, के अलावा फिल्म में एक नए रूप में खलनायक ने जन्म लिया गब्बर सिंह के रूप में जिसे अपने अभिनय से यादकर कर दिया अमजद खान ने. सलीम जावेद सरीखे सिनेमा ने यहीं से सफलता का स्वाद चखा. फिल्म के हर छोटे बड़े किरदारों को आज तक याद किया जाता है उनके संवाद तक बेहद लोकप्रिय हैं आज भी. संगीत था राहुल देव बर्मन का. इसी फिल्म से ये गीत -



१०. हम आपके हैं कौन (१९९४) - एक बार फिर राजश्री वालों ने अपनी ही सफल फिल्म "नदिया के पार" को नए रूप में पेश किया. हिंसा और अश्लीलता से त्रसित हिंदी फिल्मों को इस साफ़ सुथरी पारिवारिक फिल्म ने नयी संजीवनी दे दी. लोग सपरिवार वापस सिनेमा घरों में जाने लगे. १५ गानों से भरी इस फिल्म अधिकतर बातें गीतों के माध्यम से ही कही गयी है. युवा निर्देशक सूरज भड्जात्या ने अपने बैनर की परम्पराओं को निभाते हुए मध्यम वर्गीय मूल्यों पर इस फिल्म का ताना बाना रचा. माधुरी दिक्षित ने अपनी अदाओं से सब के मन को मोह लिया, यहाँ तक कि मकबूल फ़िदा हुसैन को भी माधुरी फ़िदा हुसैन के नाम से जाना जाने लगा. राम लक्ष्मण का संगीत पारम्परिक और मधुर था. सुनिए ये गीत -



कल हमें कुछ पाठकों के विचार प्राप्त हुए. ज्ञानी मानन्धर ने जी ने जिन फिल्मों का जिक्र किया उनमें से बॉबी, दोस्ती, और अमर अकबर एंथोनी भी सफलता के लिहाज से और उन सभी कारणों से जिनका आपने जिक्र किया, निश्चित रूप से इस सूची के प्रबल दावेदार हैं. मेरे हिसाब से भी बॉबी और दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगें संगीत प्रधान रोमांटिक फिल्मों का प्रतिनिधित्व करती हैं. आचार्य जी ने भी बॉबी का जिक्र किया है. जंजीर भी एक सफलतम कृति है. पर जैसा कि हमने पहले भी बताया कि कोई भी सूची इस मामले में मुक्कमल नहीं हो सकती. नीरज गुरु ने भी हमें लिखा और बताया कि वो हिंदी की १०० श्रेष्ठ फिल्मों पर रिसर्च कर रहे हैं. उम्मीद करते है कि उस सूची में हम सब की प्रिय फिल्में अपना स्थान पाएंगीं.

विनोद जी ने फिल्म समीक्षक के नज़रिए से भी एक सूची बनायीं है. चलते चलते आईये एक नज़र डालें उस सूची पर भी. नीचा नगर (चेतन आनंद), जागते रहो (शम्भू मित्र), कागज़ के फूल (गुरु दत्त), भुवन शोम (मृणाल सेन), भूमिका और सूरज का सातवाँ घोड़ा (श्याम बेनेगल), दुविधा (मणि कॉल), तरंग (कुमार शहानी), तीसरी कसम (बासु भट्टाचार्य), और गर्म हवा (एम् एस सत्यु) विनोद की नज़र में समीक्षकों की टॉप १० फिल्में हैं.


गुरुवार, 26 मार्च 2009

अरे तौबा ये तेरी अदा...हंसती बिजली गाता शोला ये किसने देखा...अरे तौबा...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 34

'ओल्ड इस गोल्ड' की एक और शाम लेकर हम हाज़िर हैं दोस्तों! आज हम आप को एक ऐसा गीत सुनवाने जा रहे हैं जिसे आप ने एक लंबे अरसे से नहीं सुना होगा, और आप में से कई लोग तो शायद पहली बार यह गीत सुनेंगे. यह जो आज का गीत है वो है तो एक चर्चित फिल्म से ही, लेकिन इस गीत को शायद उतना बढावा नहीं मिला जीतने फिल्म के दूसरे गीतों को मिला. इससे पहले कि इस गीत का ज़िक्र हम करें, गीता दत्त के बारे में चंद अल्फ़ाज़ कहना चाहूँगा. गीता दत्त की आवाज़ की ख़ासियत यह थी कि कभी उसमें वेदना की आह मिलती तो कभी रूमानियत की शोखी, कभी भक्ति रस में लीन हो जाती तो कभी अपनी आवाज़ को लंबा खींचकर लोगों को भाव-विभोर कर देती. अपने शुरूआती दिनों में गीता दत्त को केवल भक्ति रचनाएँ ही गाने को मिलते थे. उनकी आवाज़ में भक्ति गीत बेहद सुंदर जान पड्ते. ऐसा लगने लगा था कि गीता दत्त की प्रतिभा को भक्ति रस के खाँचे में ही क़ैद कर दिया जाएगा. लेकिन संगीतकार ओ पी नय्यर ने पहली बार अपनी पहली ही फिल्म "आसमान" में गीता दत्त से गाने गवाए और यहाँ से शुरू हुई एक नशीली लंबी यात्रा. फिर तो जैसे नय्यर और गीता के 'हिट' गीतों की लडी ही लग गयी, मसलन, आर पार, सी आई डी, मिस्टर एंड मिसिस 55, हावडा ब्रिज, 12 ओ'क्लॉक वैगेरह. आज 'ओल्ड इस गोल्ड' में 12 ओ'क्लॉक से एक मचलता हुया नग्मा आपकी खिदमत में पेश है.

12 ओ'क्लॉक फिल्म बनी थी 1958 में. प्रमोद चक्रवर्ती की यह 'क्लॅसिक थ्रिलर' कहानी थी वहीदा रहमान अभिनीत लड्की की जिसे ग़लती से अपने भाई के खून के जुर्म में फँसाया गया था, और गुरु दत्त उसके वक़ील बने थे जिन्होने अंत में उसे बेक़सूर साबित करवाया. रोमहर्षक कहानी, जानदार अदाकारी, दिलकश संगीत, कुल मिलाकर जनता को यह फिल्म काफ़ी पसंद आई. इस फिल्म में रफ़ी साहब और गीता दत्त का गाया "तुम जो हुए मेरे हमसफ़र" बेहद मशहूर गीत है. उसकी तुलना में हेलेन पर फिल्माया गया "अरे तौबा यह तेरी अदा" कुछ कमसुना सा रह गया. लेकिन किसी भी दृष्ठि से यह गीत इस फिल्म के अन्य गीतों से कम नहीं है. पाश्चात्य रंग में ढाला हुआ यह गीत 'ऑर्केस्ट्रेशन' की दृष्ठि से काफ़ी ऊँचे स्तर का है और गीता दत्त ने अपनी मचलती आवाज़ से गीत में जान डाल दिया है. तो सुनिए मजरूह सुल्तनुपरी के बोल आज के 'ओल्ड इस गोल्ड' में.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. मन्ना डे और अर्चना की आवाजें.
२. आर डी बर्मन का संगीत है इस फिल्म में जिसके शीर्षक में तीन शब्द हैं और बीच का शब्द है "मिल" (जैसे-"कोई मिल गया").
३. मुखड़े में शब्द है -"धाम"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
डार्क होर्स पी एन साहब रहे आज के बाजीगर. बधाई जनाब. नीरज जी आपकी इमानदारी के सदके. मनु जी और संगीता जी महफिलें सजती रहेंगी, जब तक आप जैसे सुनने वाले होंगे.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




बीसवीं सदी की १० सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्में (भाग १)

विनोद भारद्वाज हमारी फिल्मों के प्रतिष्टित हिंदी समीक्षकों में से एक हैं. पिछले दिनों उनकी पुस्तक, "सिनेमा- कल आज और कल" पढ़ रहा था. इस पुस्तक में एक जगह उन्होंने बीती सदी की टॉप दस फिल्मों की एक सूची दी है. मुझे लगा १९९९ में उनके लिखे इस आलेख पर कुछ चर्चा की जा सकती है. हालाँकि खुद विनोद मानते हैं कि इस तरह का चयन कभी भी विवादों के परे नहीं रह सकता. पर विनोद के इस "टॉप १०" को यहाँ देकर मैं आप श्रीताओं/पाठकों की राय जानना चाहता हूँ कि उनके हिसाब से ये टॉप सूची परफेक्ट है या वो कोई और फिल्म भी वो इस सूची में देखना चाहते हैं. आज हम बात करेंगे ५ फिल्मों की (रिलीस होने के क्रम में), आगे की पांच फिल्में कौन सी होंगी ये आप बतायें. याद रखें इस सूची का प्रमुख आधार लोकप्रियता ही है. जाहिर है समीक्षकों की राय में जो सूची होगी वो बिलकुल ही अलग होगी. घबराईये मत, वो सूची भी मैं कल पेश करूँगा. फिलहाल लोकप्रिय के आधार पर २० वीं सदी की इन फिल्मों को परखते हैं -

१. किस्मत (१९४३) - बॉम्बे टौकीस की इस फिल्म के निर्देशक थे ज्ञान मुखर्जी. अशोक कुमार और मुमताज़ शांति की प्रमुख भूमिकाएं थी. यह एक संगीत प्रधान अपराध फिल्म थी जो अपने समय की हॉलीवुड की फिल्मों से प्रभावित थी. कोलकत्ता में ये फिल्म ३ साल तक एक ही सिनेमा घर में चलती रही थी. सुनते चलिए इसी फिल्म से अमीरबाई कर्नाटकी का गाया ये मधुर गीत-



२. आवारा (१९५१) - अभिनेता निर्देशक राज कपूर की ये सबसे लोकप्रिय फिल्म है. नर्गिस उनकी हेरोइन थी. ये फिल्म भारत में ही नहीं सोवियत संघ, अफ्रीका और अरब देशों में भी खूब लोकप्रिय हुई थी. शंकर जयकिशन का संगीत हिट था और फिल्म के एक गाने के "स्वप्न प्रसंग" ने बड़ी चर्चा पायी थी. सुनिए इस फिल्म का ये मधुर दोगाना -



३. अलबेला (१९५१) - मास्टर भगवान् इस फिल्म के निर्देशक - नायक थे. चुलबुली और शोख गीता बाली थी नायिका. सी रामचंद्र का शानदार संगीत इस मस्ती भरी अलबेली फिल्म के केंद्र में था. फिल्म गीत- नृत्य- संगीत के दम पर हिट हुई. 'शोला जो भड़के" ने बहुतों को भड़काया. सुनते हैं यही मस्त गीत -



४. देवदास (१९५५) - विमल राय के निदेशन में बनी देवदास दिलीप कुमार के अभिनय के लिए भी याद की जाती है. सुचित्रा सेन, मोती लाल और वैजयंतीमाला की भी फिल्म में प्रमुख भूमिकाएं थी. १९३५ में बनी के एल सहगल अभिनीत देवदास में बिमल राय कैमरा मैन थे. शरत के प्रसिद्ध उपन्यास के कई संस्करण अब तक बॉलीवुड में बन चुके हैं. देवदास के संगीत की मिठास का भी आनंद लें -



५. मदर इंडिया (1957) - अपनी ही फिल्म औरत (१९४०) का रंगीन संस्करण किया महबूब खान ने मदर इंडिया के रूप में. नर्गिस ने भारतीय माँ की बहुचर्चित भूमिका निभाई थी. राज कुमार, राजेंद्र कुमार, सुनील दत्त और कन्हैया लाल ने भी अपनी भूमिकाओं से फिल्म में जान डाली थी.नौशाद का संगीत था. ग्रामीण पृष्ठभूमि में एक बूढी माँ अपने विद्रोही बेटे को खुद अपने हाथों से मारने के लिए मजबूर हो जाती है. सुनिए इसी अविस्मरणीय फिल्म का ये सदाबहार गीत -



इसी आलेख में विनोद ने हॉलीवुड की टॉप १० फिल्मों का भी जिक्र किया है, जिसमें १९४१ में बनी "सिटिज़न केन" का दर्जा सबसे ऊपर रखा गया है. विनोद के अनुसार ये फिल्म हमेशा से हॉलीवुड के समीक्षकों की प्रिय रही है. इसी तर्ज पर यदि भारतीय टॉप १० सूची में से एक को चुनना पड़े तो विनोद "मदर इंडिया" को चुनना पसंद करेंगें. उनके अनुसार ये फिल्म सभी हिंदी फिल्मों का "माँ" है. शेष ५ फिल्मों की चर्चा लेकर कल उपस्थित होउंगा. तब तक आप अपनी सूची दें.

(जारी...)




बुधवार, 25 मार्च 2009

तेरे सुर और मेरे गीत...दोनों मिलकर बनेगी प्रीत...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 33

सुर संगीतकार का क्षेत्र है तो गीत गीतकार का. एक अच्छा सुरीला गीत बनने के लिए सुर और गीत, यानी कि संगीतकार और गीतकार का आपस में तालमेल होना बेहद ज़रूरी है, वरना गीत तो किसी तरह से बन जायेगा लेकिन शायद उसमें आत्मा का संचार ना हो सकेगा. शायद इसी वजह से फिल्म संगीत जगत में कई संगीतकार और गीतकारों ने अपनी अपनी जोडियाँ बनाई जिनका आपस में ताल-मेल 'फिट' बैठ्ता था, जैसे कि नौशाद और शक़ील, शंकर जयकिशन और हसरत शैलेन्द्र, गुलज़ार और आर डी बर्मन, वगैरह. ऐसी ही एक जोड़ी थी गीतकार भारत व्यास और संगीतकार वसंत देसाई की. इस जोडी ने भी कई मधुर से मधुर संगीत रचनाएँ हमें दी हैं जिनमें शामिल है फिल्म "गूँज उठी शहनाई". इस फिल्म का एक सुरीला नग्मा आज गूँज रहा है 'ओल्ड इस गोल्ड' में.

फिल्म निर्माता और निर्देशक विजय भट्ट ने एक बार किसी संगीत सम्मेलन में उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान का शहनाई वादन सुन लिया था. वो उनसे और उनकी कला से इतने प्रभावित हुए कि वो न केवल अपनी अगली फिल्म का नाम रखा 'गूँज उठी शहनाई', बल्कि फिल्म की कहानी भी एक शहनाई वादक के जीवन पर आधारित थी. और क्या आप जानते हैं दोस्तों कि कहानी और फिल्म में जान डालने के लिए विजय भट्ट ने उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान से ही निवेदन किया कि फिल्म में वही शहनाई बजाएँ. ख़ान साहब ने न केवल पूरी फिल्म में शहनाई बजाई बल्कि इस फिल्म का एक गीत खुद स्वरबद्ध भी किया, और वो गीत है "दिल का खिलौना हाय टूट गया". लेकिन यह गीत हम आप को फिर कभी सुनवाएँगे, आज सुनिए लता मंगेशकर का ही गाया एक दूसरा गीत इस फिल्म का. गूँज उठी शहनाई 1959 की फिल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे राजेन्द्र कुमार, अमीता और अनिता गुहा. तो पेश है राग बिहाग पर आधारित फिल्म संगीत के सुनहरे दौर का एक सुनहरा नग्मा - "तेरे सुर और मेरे गीत".



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. जब घडी की दोनों सुईयां मिलती है इस वक़्त को जो अंग्रेजी में कहा जाता है वही है फिल्म का नाम.
२. ओपी नय्यर का संगीतबद्ध गीत है मादक आवाज़ है गीत दत्त की.
३. मुखडा शुरू होता है "अरे" शब्द से.

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
नीरज जी लौटे हैं शतक के साथ बहुत बहुत बधाई. पारुल, मनु और दिलीप जी के लिए वैसे ये कोई मुश्किल नहीं था, जैसा कि मनु जी ने बताया कि ये गाना उनका "अलार्म" भी है, आप सब को इस प्यारे से गीत की बधाई. महेंद्र मिश्र जी आपका स्वागत, और आचार्य जी आपकी देरी भी सर आँखों पर.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




आपको देख कर देखता रह गया...- जगजीत की गायिकी को शिशिर का सलाम


अभी कुछ दिनों पहले हमने आपको सुनवाया था शिशिर पारखी की रेशमी आवाज़ में जिगर मुरादाबादी का कलाम. जैसा कि हमने आपको बताया था कि शिशिर इन दिनों अपने अफ्रीका दौरे पर हैं जहाँ वो अपनी ग़ज़लों से श्रोताओं को मन्त्रमुग्ध कर रहे हैं. पर वहां भी वो प्रतिदिन आवाज़ को पढना नहीं भूलते. बीते सप्ताह नारोबी (दक्षिण अफ्रीका) में हुए एक कंसर्ट में उन्होंने जगजीत सिंह साहब की एक खूबसूरत ग़ज़ल को अपनी आवाज़ दी जिसकी रिकॉर्डिंग आज हम आपके लिए लेकर आये हैं. जगजीत की ये ग़ज़ल अपने समय में बेहद मशहूर हुई थी और आज भी इसे सुनकर मन मचल उठता है. कुछ शेर तो इस ग़ज़ल में वाकई जोरदार हैं. बानगी देखिये -

उसकी आँखों से कैसे छलकने लगा,
मेरे होंठों पे जो माज़रा रह गया....


और

ऐसे बिछडे सभी रात के मोड़ पर,
आखिरी हमसफ़र रास्ता रह गया...


गौरतलब है कि अभी पिछले सप्ताह ही आवाज़ पर अनीता कुमार ने जगजीत सिंह पर दो विशेष आलेख प्रस्तुत किये थे, आज सुनिए शिशिर पारखी की आवाज़ में मूल रूप से जगजीत की गाई ये ग़ज़ल -






मंगलवार, 24 मार्च 2009

अपने जीवन की उलझन को कैसे मैं सुलझाऊं...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 32

दोस्तों, क्या आप ने कभी सोचा है कि हिन्दी फिल्म संगीत के इस लोकप्रियता का कारण क्या है? क्यूँ यह इतना लोकप्रिय माध्यम है मनोरंजन का? मुझे ऐसा लगता है कि फिल्म संगीत आम लोगों का संगीत है, उनकी ज़ुबान है, उनके जीवन से ही जुडा हुआ है, उनके जीवन की ही कहानी का बयान करते हैं. ज़िंदगी का ऐसा कोई पहलू नहीं जिससे फिल्म संगीत वाक़िफ़ ना हो, ऐसा कोई जज़्बात या भाव नहीं जिससे फिल्म संगीत अंजान रह गया हो. और यही वजह है कि लोग फिल्म संगीत को सर-आँखों पर बिठाते हैं, उन्हे अपने सुख दुख का साथी मानते हैं. सिर्फ़ खुशी, दर्द, प्यार मोहब्बत, और जुदाई ही फिल्म संगीत का आधार नहीं है, बल्कि समय समय पर हमारे फिल्मकारों ने ऐसे ऐसे 'सिचुयेशन्स' अपने फिल्मों में पैदा किये हैं जिनपर गीतकारों ने भी अपनी पूरी लगन और ताक़त से जानदार और शानदार गीत लिखे हैं. किसी के ज़िंदगी में जब कोई उलझन आ जाती है, जब अपने ही पराए बन जाते हैं, तो बाहरवालों से भला क्या कहा जाए! तो दिल से शायद कुछ ऐसी ही पुकार निकलती है कि "अपने जीवन की उलझन को कैसे मैं सुलझाऊं, अपनों ने जो दर्द दिए हैं कैसे मैं बतलाऊं".

1975 में बनी फिल्म "उलझन" को संजीव कुमार और सुलक्षणा पंडित की बेहतरीन अदाकारी के लिए याद किया जाता है. और याद किया जाता है इस फिल्म के शीर्षक गीत की वजह से भी. इस गीत के दो संस्करण हैं, एक लता मंगेशकर का गाया हुआ और दूसरा किशोर कुमार की आवाज़ में. इस फिल्म के संगीतकार थे कल्याणजी आनंदजी और गीतकार थे एम् जी हशमत. हशमत साहब ने फिल्म संगीत में बहुत लंबी पारी तो नहीं खेली लेकिन थोडे से समय में कुछ अच्छे गीत ज़रूर दे गए हैं. एम् जी हशमत के गीत उस छतरी की तरह है जिसके नीचे हर दुख दर्द समा जाते है. उनके शब्दों का चयन कुछ ऐसा होता था कि आम लोगों को उनके गीत अपनी ही आवाज़ जान पड्ती. यह तो भाग्य की बात है कि उन्हे गाने लिखने का ज़्यादा मौका नहीं मिला, उनके दिल का दर्द बयां हुआ उनकी कलम से निकले गीतों के ज़रिए, शायद कुछ इसी तरह से जैसा कि प्रस्तुत गीत में कहा गया है.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. टीम है भरत व्यास और बसंत देसाई की.
२. राजेंदर कुमार अभिनीत इस फिल्म का हर एक गीत इतना मधुर है कि हम क्या कहें.
३. इस दोगाने में "गीत" "मीत", "जीत" आदि काफिये इस्तेमाल हुए हैं.

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
लग रहा था कि ये पारुल के लिए ज़रा मुश्किल होगा, पर क्या करें भाई जबरदस्त फॉर्म हैं आजकल....बधाई स्वीकारें... मनु जी और नीरज जी हजारी लगते रहिएगा. शन्नो जी इन गीतों की मिठास आपके जीवन में रस घोल रही है ये जानकार बहुत ख़ुशी हुई.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




ए आर रहमान और ढेरों युवा संगीत कर्मियों के जोश को समर्पित एक गीत

ए आर रहमान का ऑस्कर जीतना पूरे भारत के युवा संगीत कर्मियों के लिए एक अनूठी प्रेरणा बन गया है. पहले हमारे संगीत योद्धा जो अब तक फिल्म फेयर या रास्ट्रीय पुरस्कारों के सपने सजाते थे अब उनमें साहस आ गया है कि वो बड़े अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों और सम्मानों के भी ख्वाब देख पा रहे हैं. उनमें अब ये यकीन भर गया है कि अब उनका मंच एक "ग्लोबल औडिएंस" का है और उनके यानी भारतीय अंदाज़ के संगीत के श्रोता और कद्रदान देश विदेश में फैले भारतीय ही नहीं बल्कि वो विदेशी श्रोता भी हैं जो अब तक भारतीय विशेषकर लोकप्रिय भारतीय फिल्म और गैर फ़िल्मी संगीत से जी चुराते थे.

"It is being an interesting Journey till now. I have come across criticism, flattery, highs and lows" - A.R. Rahman.
ए आर के इसी वक्तव्य से प्रेरित होकर आवाज़ के एक संगीत कर्मी प्रदीप पाठक ने एक गीत रचा,
प्रदीप पाठक
इन्टरनेट पर ही मिले संगीतकार सागर पाटिल ने जब इसे पढ़ा तो वो उसे स्वरबद्ध करने के लिए प्रेरित हुए. पुनीत देसाई ने इसे अपनी आवाज़ दी और इस तरह मात्र इंटरनेटिया प्रयासों से तैयार हुआ संगीत के बादशाह ए आर रहमान को समर्पित ये जोशीला गीत जो युवाओं को बेहद सशक्त रूप से प्रेरित करने की कुव्वत रखता है.

इस गीत के गीतकार, प्रदीप पाठक हिंदुस्तान टाईम्स में सॉफ्टवयेर प्रोफेशनल हैं, दिल से कवि हैं और अपने जज़्बात कलम के माध्यम से दुनिया के सामने रखते हैं. मूल रूप से उत्तराखंड निवासी प्रदीप गुलज़ार साहब और प्रसून जोशी के "फैन" हैं. ज़ाहिर है ए आर रहमान उनके पसंदीदा संगीतकार हैं. संगीतकार सागर पाटिल पिछले 3 वर्षों से एक अंतर्राष्ट्रीय संगीत संस्थानों के लिए कार्यरत हैं. उन्हें नए प्रयोगों में आनंद मिलता है, इस कारण ये प्रोजेक्ट भी उनके लिए विशेष महत्त्व रखता है. गीत के गायक पुनीत देसाई वैसे तो इंजीनियरिंग की पढाई कर रहे हैं पर वो खुद को एक गायक के तौर पर देखना अधिक पसंद करते हैं. वो एक रॉक बैंड के सदस्य भी है और गिटार भी अच्छा बजा लेते हैं. तो सुनिए आवाज़ का एक और नजराना, इंटरनेटिया गठबंधन से बना एक और थीम गीत. संगीतकार ए आर रहमान और संगीत की दुनिया में अपना सितारा बुलन्द करने की ख्वाहिश में दिन रात एक करते देश के ढेरों युवा संगीत कर्मियों के जोश को समर्पित ये गीत जिसका सही शीर्षक दिया है प्रदीप ने - "The Journey".



गीत के बोल -
सागर पाटिल
पुनीत देसाई

चुनी राहें हमने भी, खोली बाहें हमने भी ,
सब रातें खाली हुईं हैं ! हम जागे हैं जब कभी।
कुछ सियाही सी , नदिया जो रेत की -
गलियों से गुजरती, भागे है जब कभी।

रुख जो हवाओं का , संग ले गया ज़मी,
वो मस्त बहारों का- रंग, ले गया नमी,
हम जोश मे अपने, करतब दिखाते हैं,
मिट जायें! कभी नही ! ख्वाब वो सजाते हैं।

फिज़ाओं से बही जो- पलकों की बूँद तक,
सजी आँखों मे अपने- खुदा की रूह जब कभी।
चुनी राहें हमने भी...........

मासूम सा एक पल, नई ज़िन्दगी अपनी,
हर इश्क पे सजदा है, नई बंदगी अपनी,
हम होश मे अपने- इश्क को मिलाते हैं,
थम जायें! कभी नही- धुन वो जगाते हैं।

फ़िर चमकती शाम मे, नई मौज सी लगी,
छुपी पत्तों पे जैसे- सूरज की लौ जब कहीं।

चुनी राहें हमने भी, खोली बाहें हमने भी,
सब रातें खाली हुईं हैं ! हम जागे हैं जब कभी



सोमवार, 23 मार्च 2009

सुन मेरे बन्धू रे, सुन मेरे मितवा....

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 31

किसी सुदूर अनजाने गाँव की धरती से गुज़रती हुई नदी, उसकी कलकल करती धारा, दूर दिखाई देती है एक नाव, और कानो में गूंजने लगते हैं उस नाव पर बैठे किसी मांझी के सुर. अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए वो अपनी ही धुन में गाता चला जाता है. दोस्तों, शहरों में अपने 'कॉंक्रीट' के 'अपार्टमेंट' में रहकर शायद हम ऐसे दृश्य का नज़ारा ना कर सके, लेकिन एक गीत ऐसा है जिसे सुनकर आप उसी नज़ारे को ज़रूर महसूस कर पाएँगे, वही नदी, वही नाव और उसी मांझी की तस्वीर आपकी आँखों के सामने आ जाएँगे, यह हमारा विश्वास है. और वही गीत लेकर आज हम हाज़िर हुए हैं 'ओल्ड इस गोल्ड' की इस महफ़िल में.

भटियाली संगीत, यानी कि बंगाल के नाविकों का संगीत. नाव चलाते वक़्त वो जिस अंदाज़ में और सुर में गाते हैं उसी को भटियाली संगीत कहा जाता है. और बंगाल के लोक संगीत के इसी अंदाज़ में सचिन देव बर्मन ने इस क़दर महारत हासिल की है कि उनकी आवाज़ में इस तरह का गीत जैसे जीवंत कर देता है उसी मांझी को हमारी आँखों के सामने. 1959 में फिल्म "सुजाता" में बर्मन दादा ने ऐसा ही एक गीत गाया था. संख्या के हिसाब से अगर हम देखें तो भले ही दादा ने कम गीत गाए हैं, पर अदायगी और भाव सम्प्रेषणता की दृष्टि से देखें तो ऐसी गायिकी शायद ही किसी और गायक की आवाज़ में सुनने को मिले. और यही कारण है कि एस डी बर्मन के गाए गीत 'कवर वर्ज़न' के शिकार नहीं हुए. बर्मन दादा भले ही संगीतकार के रूप में विख्यात हुए हों लेकिन क्या आपको पता है कि उन्होने फिल्मजगत में अपनी शुरुआत बतौर गायक ही की थी. सन 1941 में संगीतकार मधुलल दामोदर मास्टर के लिए फिल्म "ताज महल" में पहली बार उन्होने गीत गाया था. तो लीजिए आज 'ओल्ड इस गोल्ड' में दादा बर्मन की गायिकी को सलाम करते हुए सुनते हैं उन्ही की आवाज़ में यह भटियाली सुर, फिल्म "सुजाता" से. फिल्म में यह एक पार्श्व-संगीत की तरह बजता है. सुनील दत्त और नूतन नदी के घाट पर खडे हैं और दूर किसी नाव में कोई मांझी यह गीत गा रहा है. तो सुन मेरे बंधु रे...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. संजीव कुमार और सुलक्षणा पंडित अभिनीत इस फिल्म का ये शीर्षक गीत है.
२. एम् जी हशमत और कल्याण जी आनंद जी की टीम.
३. अंतरे में पंक्ति आती है "चैन मेरा क्यों लूटे..."

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
पारुल ने एक बार फिर रंग जमा दिया. मनु जी और नीरज जी भी बधाई स्वीकारें. ये शायद बहुत आसान था आप सब धुरंधरों के लिए :). नीरज जी तलत साहब पर हमारा आलेख और उनके कुछ ख़ास गीत आप यहाँ सुनें. धुरंधरों की सूची में ममता भी शामिल हो चुकी हैं।

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




'स्माइल पिंकी' वाले डॉ॰ सुबोध सिंह का इंटरव्यू

सुनिए हज़ारों बाल-जीवन में स्माइल फूँकने वाले सुबोध का साक्षात्कार

वर्ष २००९ भारतीय फिल्म इतिहास के लिए बहुत गौरवशाली रहा। ऑस्कर की धूम इस बार जितनी भारत में मची, उतनी शायद ही किसी अन्य देश में मची हो। मुख्यधारा की फिल्म और वृत्तचित्र दोनों ही वर्गों में भारतीय पृष्ठभूमि पर बनी फिल्मों ने अपनी रौनक दिखाई। स्लमडॉग मिलिनेयर की जय हुई और स्माइल पिंकी भी मुस्कुराई। और उसकी इस मुस्कान को पूरी दुनिया ने महसूस किया।

मीडिया में 'जय हो' का बहुत शोर रहा। कलमवीरों ने अपनी-अपनी कलम की ताकत से इसके खिलाफ मोर्चा सम्हाला। हर तरफ यही गुहार थी कि 'स्माइल पिंकी' की मुस्कान की कीमत मोतियों से भी महँगी है। हमें अफसोस है कि यह सोना भारतीय नहीं सँजो पा रहे हैं। कलमकारों की यह चोट हमें भी लगातार मिलती रही। इसलिए हिन्द-युग्म की नीलम मिश्रा ने डॉ॰ सुबोध सिंह का टेलीफोनिक साक्षात्कार लिया और उनकी तपस्या की 'स्माइल' को mp3 में सदा के लिए कैद कर लिया।

ये वही डॉ॰ सुबोध हैं जो महज ४५ मिनट से दो घंटे के ऑपरेशन में 'जन्मजात कटे होंठ और तालु' (क्लेफ्ट लिप) से ग्रसित बच्चों की जिंदगियाँ बदलते हैं। 'स्माइल पिंकी' फिल्म ऐसे ही समस्या से पीड़ित, मिर्जापुर (उ॰प्र॰) के छोटे से गाँव की एक लड़की पिंकी कुमार की कहानी है, जिसके होंठ जन्म से कटे हैं, जिसके कारण वो अन्य बच्चों द्वारा तिरस्कृत होती है। अंतर्राष्ट्रीय संस्था 'स्माइल ट्रेन' के साथ मिलकर उ॰प्र॰ के लिए काम करने वाले डॉ॰ सिंह ने पिंकी का ऑपरेशन किया, जिससे उसकी पूरी दुनिया पलट गई। अब पिंकी भी बाकी बच्चों के साथ स्कूल जाती है, खेलती है। उसके लिए फ़ोन आते हैं तो आस-पास के सब लोग इकट्ठा हो जाते हैं। यह पिंकी अब तो अमेरिका भी घूम आई है।

क़रीब 39 मिनट के इस वृतचित्र में यह दिखाने की कोशिश की गई है कि किस तरह एक छोटी सी समस्या से किसी बच्चे पर क्या असर पड़ता है और ऑपरेशन के बाद ठीक हो जाने पर बच्चे की मनोदशा कितनी बेहतरीन हो जाती है। पिंकी के घर के लोग बताते हैं कि होंठ कटा होने के कारण वो बाक़ी बच्चों से अलग दिखती थी और उससे बुरा बर्ताव किया जाता था। डॉ॰ सुबोध ने बताया कि उनकी संस्था ने अब तक कई हज़ार बच्चों का ऑपरेशन किया है और उनकी ज़िंदगियों में हँसी बिखेरी है।

आज हम डॉ॰ सुबोध का साक्षात्कार लेकर उपस्थित हैं।



(डॉ॰ सुबोध और पिंकी के साथ 'स्माइल पिंकी' फिल्म की निर्देशक मेगन मायलन)


रविवार, 22 मार्च 2009

पिया पिया न लागे मोरा जिया...आजा चोरी चोरी....

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 30

दोस्तों, कुछ गीत ऐसे होते हैं जो केवल एक मुख्य साज़ पर आधारित होते हैं. उदाहरण के तौर पर कश्मीर की कली का गाना "है दुनिया उसी की ज़माना उसी का" केवल 'सेक्साफोन' पर आधारित है. इस गीत के संगीतकार थे ओपी नय्यर. नय्यर साहब ने ऐसे ही कुछ और गीतों में भी सिर्फ़ एक मुख्य साज़ का इस्तेमाल किया है. उनके संगीत की खासियत भी यही थी की वो '7-पीस ऑर्केस्ट्रा' से उपर नहीं जाते थे. इसी तरह का एक गीत था फिल्म "फागुन" में जिसमें केवल बाँसुरी का मुख्य रूप से इस्तेमाल हुआ. फिल्म फागुन के सभी गीतों में बाँसुरी सुनाई पड्ती है जिन्हे बजाया था उस ज़माने के मशहूर बाँसुरी वादक सुमंत राज ने. तो आज 'ओल्ड इस गोल्ड' में आप सुनने जा रहे हैं फिल्म फागुन का वही गीत जिसमें है सुमंत राज की मधुर बाँसुरी की तानें, ओपी नय्यर का दिलकश संगीत, और आशा भोंसले की मनमोहक आवाज़.

और अब इस फिल्म के गीत संगीत से जुडी कुछ बातें हो जाए? यह फिल्म बनी थी सन 1958 में. बिभूति मित्रा द्वारा निर्मित एवं निर्देशित इस फिल्म में भारत भूषण और मधुबाला ने मुख्य किरदार निभाए. इस फिल्म के कहानीकार, संवाद-लेखक और पट्कथा-लेखक थे क़मर जलालाबादी साहब. लेकिन बिभूति मित्रा चाहते थे कि ओपी नय्यर मजरूह सुल्तानपुरी से इस फिल्म के गाने लिखवाए. नय्यर साहब ने उन्हे समझाया कि क्योंकि कहानी और संवाद क़मर साहब ने लिखा है, तो उनसे बेहतर इस फिल्म के गाने और कोई दूसरा नहीं लिख सकता. तब जाकर क़मर साहब से गुज़ारिश की गयी और उन्होने गीत लेखन का भी ज़िम्मा अपने उपर ले लिया. और इस ज़िम्मे को कितनी सफलता से उन्होने निभाया यह शायद किसी को बताने की ज़रूरत नहीं है. क़मर साहब पूरे 11 के 11 गीत लिखकर ले आए और नय्यर साहब को सौंप गये. गाने हाथ में आते ही नय्यर साहब ने केवल दो घंटे में पूरे 11 के 11 गीत स्वरबद्ध कर डाले. लेकिन नय्यर साहब भी कुछ कम नहीं थे. उन्होने निर्माता महोदय से कहा कि उन्हे गाने स्वरबद्ध करने में 1 महीना चाहिए. वो उन्हे एक एक महीने बाद बुलाते और एक एक करके गाना थमाते जाते. और इस तरह से हर गीत पर वाह वाही लूटते. नय्यर साहब का यह मानना था कि अगर वो सभी के सभी गीत एक साथ उन्हे दे देते तो शायद वो उन गीतों का सही मूल्यांकन नहीं कर पाते. तो ऐसे थे हमारे ओपी नय्यर साहब. तो पेश है फिल्म फागुन से "पिया पिया ना लागे मोरा जिया".



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. १९५९ में बनी इस सुपर हिट फिल्म में थे सुनील दत्त और नूतन.
२. सीनियर बर्मन का संगीत और उन्हीं की दिव्य आवाज़.
३. पहला अंतरा शुरू होता है "होता तू..." से

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
पहली बार पहेली का जवाब देने आयी पारुल ने शतक जमा दिया, और इस बार मनु जी और नीरज जी से पहले ही बाज़ी भी मार ली. बहुत बहुत बधाई...गाना वाकई बहुत प्यारा है, आशा है आप सब ने इसका आनंद लिया होगा, मनु जी सही कहा, इस फिल्म के सभी गीत लाजवाब हैं.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




क्या नील नितिन मुकेश में भी हैं गायिकी के गुण ?

सप्ताह की संगीत सुर्खियाँ (14)
आ देखें ज़रा किसमें कितना है दम - नील की चुनौती
गायिकी के सरताज रहे मुकेश के सुपुत्र नितिन मुकेश ने भी गायिकी में ठीक ठाक मुकाम हासिल किया, पर बहुत अधिक कामियाब नहीं रह पाए तो उनके बेटे और सदाबहार मुकेश के पोते नील ने अभिनय का रास्ता चुना, "जोंनी गद्दार" में अपने शानदार अभिनय से नील ने एक लम्बी पारी की उम्मीद जगाई है. अब उनकी आने वाली नयी त्रिल्लर फिल्म "आ देखें ज़रा" में नील मात्र अभिनय नहीं कर रहे हैं, बल्कि अपने खानदान की परंपरा निभाते हुए उन्होंने इस फिल्म का शीर्षक गीत भी खुद ही गाया है, जो कि वास्तव में एक पुराने गीत "आ देखें ज़रा किस में कितना है दम" का नया वर्ज़न है. नील इस गीत के माध्यम से आर डी बर्मन और किशोर दा को अपनी श्रद्धांजली देना चाहते हैं. नील के दामन में इस वक़्त आदित्य चोपडा की "न्यू यार्क", मधुर भंडारकर की "जेल" और सुधीर मिश्रा की "तेरा क्या होगा जोंनी" जैसी फिल्में हैं. देखना ये होगा कि क्या इनमें से किसी फिल्म में भी श्रोताओं को उनकी गायिकी का नमूना देखने को मिलेगा.



भारतीय संगीत में भारतीयता होनी ही चाहिए - हरिहरन


फिल्मों में गायन हो या शास्त्रीय, या फिर किसी पॉप धुन पर ताल मिलाना हो, हरिहरन हमेशा अपनी मधुर आवाज़ और श्रेष्ठतम गायिकी को बेहद सधे हुए अंदाज़ में पेश करते रहे हैं. पर जब उनसे पुछा गया कि उन्हें सबसे अधिक क्या गाना पसंद है तो जवाब था कि ग़ज़ल गायन से अधिक संतुष्ठी किसी अन्य गायन में नहीं मिलती. उनका कहना है कि उन्होंने भाषा को सीखने में बहुत मेहनत की है, ग़ज़ल में शायरी, ख्याल, ठुमरी, सरगम, तान और रिदम का जबरदस्त संगम होता है, और चुनौती सबसे बड़ी ये होती है इन सब के बीच आपको शब्दों की गरिमा बनाये रखनी होती है, क्योंकि ग़ज़ल मुख्यता शब्द प्रधान होते हैं. हरिहरन मानते हैं कि माडर्न होना अपनी संस्कृति को भूलना नहीं है. भारतीय संगीत की आत्मा में भारतीयता होनी ही चाहिए. वो अपनी एल्बम "कोलोनिअल कसिन" की कमियाबी का श्रेय भी इसी भारतीयता में बसी अपनी जड़ों को मानते हैं.


अभिजीत सावंत अब नायक भी

फिल्म के चाहने वालों के लिए इस हफ्ते एक नहीं दो नहीं बल्कि ५ नयी फिल्में प्रदर्शन के लिए उतरी है. और मज़े की बात है कि इन पांचों फिल्मों के माध्यम से ५ नए निर्देशकों ने अपनी कला को दुनिया के सामने रखा है. इनमें अभिनेत्री नंदिता दास (फिराक) भी शामिल हैं. पहले इंडियन आइडल रहे अभिजीत सावंत अभिनीत "लौटरी" का निर्देशन किया है हेमंत प्रभु ने, अन्य नवोदित निर्देशकों में हैं रजा मेनोन (बारह आना), रूबी ग्रेवाल (आलू चाट), और पार्वती बलागोपालन (स्ट्रेट). एक और अच्छी खबर ये है कि अब भारतीय फिल्म संगीत की तरह हिंदी फिल्मों की कहानियां भी हॉलीवुड के निर्देशकों को भा रही है, हालिया प्रर्दशित माधवन अभिनीत "१३ बी" अब विदेशी कलाकारों को लेकर अंग्रेजी में भी बनेगी. तो दोस्तों इस सप्ताह की ५ नयी फिल्मों के अलावा आपके पास "13 बी" और "गुलाल" जैसी फिल्में भी हैं, देखने के लिए. अब तक नहीं देखी तो अब देखिये.

दिल गिरा कहीं दफतन

किसी भी गीत की कामियाबी में उसके फिल्मांकन का भी बहुत बड़ा हाथ होता है. आज के "साप्ताहिक गीत" शृंखला में हम न सिर्फ आपको एक गीत सुनवायेंगें बल्कि उसका विडियो भी दिखाएंगें. दिल्ली ६ के यूँ तो सभी गीत मशहूर हुए हैं पर इस गीत को बहुत अधिक लोकप्रियता नहीं मिल पायी, पर शायद इसीलिए निर्देशक राकेश ने इस गीत को चुना अपनी कल्पनाशीलता की ऊंचाईयां दिखाने का जरिए. गीत बहुत धीमा है पर जब आप इसे परदे पर देखते हैं तो शब्द और संगीत कहीं पीछे छूट जाते हैं और दृश्य आप पर जादू सा कर देते हैं. न्यू यार्क शहर में दिल्ली ६ को स्थापित करता ये गीत दो संस्कृतियों को जैसे एक कर देता है, और प्रेम की सुखद अनुभूतियों के बीच धीमे धीमे स्पंधित होता है पार्श्व में - प्रसून के बोल और ए आर आर का संगीत.
निश्चित ही बहतरीन फिल्मांकित गीतों में सूची में ये गीत एक नया शाहकार है - देखिये और सुनिए



(विडियो क्वालिटी बहुत अच्छी नहीं है )

शनिवार, 21 मार्च 2009

जा जा रे जा बालमवा....सौतन के संग रात बितायी...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 29

'ओल्ड इस गोल्ड' की आज की कडी रंगी है शास्त्रीयता के रंग में. शंकर जयकिशन के संगीत की जब हम बात करते हैं तो मुख्यतः बहुत सारे साज़ और 'ऑर्केस्ट्रेशन' में लिपटे हुए गाने याद आते हैं. लेकिन उनकी कुछ फिल्में ऐसी भी हैं जिनका आधार ही शास्त्रिया संगीत है. और फिल्म "बसंत बहार" तो एक ऐसी फिल्म है जिसके लगभग सभी गाने शास्त्रिया संगीत की चादर ओढे हैं. ऐसे गीतों को आम जनता में लोकप्रिय बनाना आसान काम नहीं है. लेकिन एक अच्छा फिल्म संगीतकार वही है जो शास्त्रिया संगीत को भी ऐसा रूप दें जो आम जनता गुनगुना सके, गा सके. और यही गुण शंकर जयकिशन में भी था. बसंत बहार फिल्म यह साबित करती है कि शंकर जयकिशन केवल 'किंग ऑफ ऑर्केस्ट्रेशन' ही नहीं थे, बल्कि शास्त्रिया संगीत पर आधारित गीत रचने में भी उतने ही माहिर थे. बसंत बहार, मीया मल्हार, तोडि, पीलू, तिलक, भैरवी, और झिंझोटी जैसे रागों का असर इस फिल्म के गीतों में महसूस किया जा सकता है.

आज हमने इस फिल्म से जिस गीत को चुना है वो आधारित है राग झिंझोटी पर. इस राग पर कई मशहूर गीत बने हैं फिल्म संगीत के उस स्वर्ण युग में. इस राग की तकनीकी विशेषताएँ शायद आपको मालूम ना हो, लेकिन अगर मैं इस राग पर आधारित कुछ गीतों का उल्लेख करूँ तो इन गीतों को गुनगुनाकर शायद आप इस राग के मूल स्वरूप का अंदाज़ा लगा पाएँगे. राग झिंझोटी पर आधारित कुछ मशहूर गीत हैं "मेरे महबूब तुझे मेरी मोहब्बत की क़सम", "तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है", "घुँघरू की तरह बजता ही रहा हूँ मैं", "छुप गया कोई रे दूर से पुकार के", "जाऊं कहाँ बता ए दिल", "कोई हमदम ना रहा", "मोसे छल कीए जाए देखो सैयाँ बेईमान", "तुम मुझे यूँ भुला ना पायोगे", और ना जाने कितने ही ऐसे सदाबहार नग्में हैं जो इस राग पर आधारित हैं. तो इसी राग पर आधारित बसंत बहार फिल्म से एक गीत आज पेश है लता मंगेशकर की आवाज़ में, गीत लिखा है शैलेंद्रा ने. सुनिए.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. ओपी नय्यर का संगीत, आशा की मधुर आवाज़.
२. इस फिल्म का नाम एक माह के नाम पर है, वो माह जिसमें होली आती है.
३. मुखड़े में शब्द युग्म है -"चोरी चोरी"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
नीरज जी का सहारा लेकर मनु जी भी पार लग ही गए, नीरज जी मान गए आपको. नीलम जी दिए गए सभी सूत्रों पर ध्यान दिया कीजिये, आपने जो गाना दिया उसके संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल थे, फिल्म थी "दाग" और गीतकार थे साहिर लुधियानवीं. आचार्य जी हौंसला अफ़जाई के लिए धन्येवाद.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




सुनो कहानी: प्रेमचंद की 'बोहनी'

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी 'बोहनी'

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में पंकज सुबीर की रचना ''ईस्ट इंडिया कंपनी'' का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं प्रेमचंद की अमर कहानी "बोहनी", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 13 मिनट।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ...मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
~ मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए प्रेमचंद की एक नयी कहानी

भवों की कमान और बरौनियों का नेजा और मुस्कराहट का तीर उस वक्त बिलकुल कोई असर नहीं करते जब आप आंखें लाल किये, आस्तीनें समेटे इसलिए आसमान सर पर उठा लेते हैं कि नाश्ता और पहले क्यों नहीं तैयार हुआ। तब सालन में नमक और पान में चूना ज्यादा कर देने के सिवाय बदला लेने का उनके हाथ में और क्या साधन रह जाता है?
(प्रेमचंद की "बोहनी" से एक अंश)



नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)
VBR MP364Kbps MP3Ogg Vorbis

#Thirteeth Story, Bohni: Munsi Premchand/Hindi Audio Book/2009/08. Voice: Anurag Sharma

शुक्रवार, 20 मार्च 2009

http://www.archive.org/download/tamasha/Subeer-Tamasha_64kb.mp3


ईन मीना डीका...रम पम पोस रम पम पोस....

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 28

निर्देशक एम् वी रमण किशोर कुमार को बतौर नायक दो फिल्मों में अभिनय करवा चुके थे. 1954 की फिल्म "पहली झलक" में और 1956 की फिल्म "भाई भाई" में. 1957 में जब रमण साहब ने खुद फिल्म निर्माण का काम शुरू किया तो अपनी पहली निर्मित और निर्देशित फिल्म "आशा" में किशोर कुमार को ही बतौर नायक मौका दिया. नायिका बनी वैजैन्तीमाला. "पहली झलक" में राजेंदर कृष्ण और हेमंत कुमार पर गीत संगीत का भार था तो "भाई भाई" में राजेंदर कृष्ण और मदन मोहन पर. "आशा" में एक बार फिर राजेंदर कृष्ण ने गीत लिखे, लेकिन संगीतकार एक बार फिर बदलकर बने सी रामचंद्र. इस फिल्म में सी रामचंद्र ने एक ऐसा गीत दिया किशोर कुमार और आशा भोंसले को जो इन दोनो के संगीत सफ़र का एक मील का पत्थर बनकर रह गया. "ईना मीना डीका" का शुमार सदाबहार 'क्लब सॉंग्स' में होता है. इस गीत की धुन, 'ऑर्केस्ट्रेशन', संगीत संयोजन, और 'कॉरल सिंगिंग', कुल मिलकर यह गीत उस ज़माने के 'क्लब्स' और 'पार्टीस' में बजनेवाले 'ऑर्केस्ट्रा' को ध्यान में रखते हुए बनाया गया था. इस गीत के दो 'वर्ज़न' हैं, एक किशोर कुमार की आवाज़ में और दूसरे में आशा भोंसले की आवाज़ है. आशाजी की आवाज़ कभी और, आज आपको किशोर-दा की आवाज़ में यह गीत सुनवा रहे हैं.

"ईना मीना डीका" हिन्दी फिल्म संगीत के पहले 'रॉक एन रोल' गीतों में से एक है. ऐसा कहा जाता है कि सी रामचंद्र के संगीत कक्ष के बाहर कुछ बच्चे खेल रहे थे और "ईनी, मीनी, मिनी, मो" जैसे शब्द बोल रहे थे. इसी से प्रेरित होकर उन्होने अपने सहायक जॉन गोमेस के साथ मिलकर इस गीत के पहले 'लाइन' का ईजाद किया - "ईना मीना डीका, दे डाई दमनिका". जॉन गोमेस, जो की गोआ के रहनेवाले थे, उन्होने आगे गीत को बढाया और कहा "मका नाका", जिसका कोंकनी में अर्थ है "मुझे नहीं चाहिए". इस तरह से वो शब्द जुड्ते चले गये और "रम रम पो" पे जाके उनकी गाडी रुकी. है ना मज़ेदार किस्सा! इस गाने को पूरा किया राजेंदर कृष्ण ने. यह गीत सुनवाने से पहले आपको यह भी बता दें की इसी गीत के मुख्डे से प्रेरित होकर डेविड धवन ने 1994 में फिल्म बनाई थी "ईना मीना डीका". तो अब इतनी जानकारी के बाद आप उठाइये आनंद किशोर-दा के खिलंदड और मस्ती भरे अंदाज़ का.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. शैलेन्द्र के बोल और शंकर जयकिशन का अमर संगीत.
२. लता की दिव्य आवाज़.
३. मुखड़े में शब्द है - "सौतन".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
नीरज जी एक बार फिर आपने सही पकडा, चूँकि ईना मीना डीका "डमी" शब्द हैं इसलिए वैसे संकेत दिए थे. तो मनु जी और आचार्य जी परेशान न होइए आपके system में कोई प्रॉब्लम नहीं है, हा हा हा....अब तो हँसना भी पाप हो गया भाई. राज जी पहेली भी बूझा कीजिये कभी कभी

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ